Chapter 2संघवाद

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पाठ्यपुस्तक — लोकतांत्रिक राजनीति, कक्षा 10 राजनीति विज्ञान · NCERT · पृष्ठ 13 से 28


शून्य — पढ़ाने से पहले यह समझ लीजिए

यह अध्याय पिछले अध्याय के दूसरे रूप (उर्ध्वाधर वितरण) का पूरा विस्तार है। किताब का परिचय यही कहता है —

“पिछले अध्याय में हमने गौर किया था कि शासन के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता का उर्ध्वाधर बँटवारा आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी का एक आम रूप है। इस अध्याय में हम सत्ता के बँटवारे के इसी स्वरूप पर विचार करेंगे। इसे आमतौर पर संघवाद कहा जाता है।”

अध्याय की बनावट — और यही इसे पढ़ाने की कुंजी है★★

यह अध्याय तीन परतों में चलता है, और हर परत अगली को सवाल में बदल देती है —

परतपृष्ठविषयजो सवाल यह उठाती है
1 — सिद्धांत14–15संघवाद क्या है, सात विशेषताएँ, दो तरह के संघ“तो क्या नियम बना देने से काम हो जाता है?”
2 — संविधान16–17भारत में संघीय व्यवस्था, तीन सूचियाँ“क्या काग़ज़ पर लिख देना काफ़ी है?”
★3 — व्यवहार18–21भाषायी राज्य · भाषा-नीति · केंद्र-राज्य संबंध“असली फ़र्क़ किसने डाला?”
4 — तीसरा स्तर24–26विकेंद्रीकरण और 1992 का संशोधन“और नीचे तक पहुँचा या नहीं?”

★★किताब ने अध्याय की आत्मा ख़ुद पृष्ठ 18 पर लिख दी है — “संघीय व्यवस्था के कारगर कामकाज के लिए संवैधानिक प्रावधान ज़रूरी हैं पर इतना ही पर्याप्त नहीं है। अगर भारत में संघीय शासन व्यवस्था कारगर हुई है तो इसका कारण सिर्फ़ संवैधानिक प्रावधानों भर का होना नहीं है। भारत में संघीय व्यवस्था की सफलता का मुख्य श्रेय यहाँ की लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र को देना होगा।”

इसीलिए बोर्ड पर पूरे अध्याय भर यह वाक्य रहना चाहिए —

“संघवाद सिर्फ़ संविधान में लिखी व्यवस्था नहीं है — वह रोज़ चलाई जाने वाली आदत है।”

1 — संघवाद क्या है? (पृष्ठ 14)★

परिभाषा — शब्दश: याद कीजिए

“संघीय शासन व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता केंद्रीय प्राधिकार और उसकी विभिन्न आनुषंगिक इकाइयों के बीच बँट जाती है।” “आम तौर पर संघीय व्यवस्था में दो स्तर पर सरकारें होती हैं। इसमें एक सरकार पूरे देश के लिए होती है जिसके ज़िम्मे राष्ट्रीय महत्व के विषय होते हैं। फिर, राज्य या प्रांतों के स्तर की सरकारें होती हैं जो शासन के दैनंदिन कामकाज को देखती हैं।” ★“सत्ता के इन दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र होकर अपना काम करती हैं।”

संघीय बनाम एकात्मक — यह तुलना हर परीक्षा में आती है★★

एकात्मक व्यवस्थासंघीय व्यवस्था
स्तर“शासन का एक ही स्तर होता है और बाकी इकाइयाँ उसके अधीन होकर काम करती हैं”दो या अधिक स्तर, और दोनों अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र
आदेश“केंद्रीय सरकार प्रांतीय या स्थानीय सरकारों को आदेश दे सकती है”“केंद्रीय सरकार राज्य सरकार को कुछ खास करने का आदेश नहीं दे सकती”
शक्तियाँनीचे की इकाइयों के पास अपनी शक्तियाँ नहीं“राज्य सरकारों के पास अपनी शक्तियाँ होती हैं”
जवाबदेहीनीचे की सरकारें ऊपर वाली के प्रति जवाबदेह★“इसके लिए वह केंद्रीय सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होती हैं। ये दोनों ही सरकारें अपने-अपने स्तर पर लोगों को जवाबदेह होती हैं।”

★इसे एक वाक्य में यों कहिए — “एकात्मक में नीचे वाली सरकार ऊपर वाली को जवाब देती है। संघीय में दोनों सीधे जनता को जवाब देती हैं।”

किताब की दो कड़ियाँ पिछले अध्याय से

  • बेल्जियम — “सन् 1993 में कुछ बदलाव हुए और प्रांतीय सरकारों को कुछ संवैधानिक अधिकार दिए गए। इन अधिकारों के लिए प्रांतीय सरकारें अब केंद्र पर निर्भर नहीं रहीं। इस प्रकार बेल्जियम ने एकात्मक शासन की जगह संघीय शासन प्रणाली अपना ली।”
  • ! श्रीलंका — “श्रीलंका में व्यावहारिक रूप से अभी भी एकात्मक शासन व्यवस्था है जिसमें केंद्रीय सरकार के पास ही सारे अधिकार हैं। श्रीलंका के तमिल नेता चाहते थे कि देश में सच्चे अर्थों में संघीय शासन व्यवस्था कायम हो।”

★यह कड़ी ज़रूर बनाइए — “पिछले अध्याय में तुमने देखा था कि बेल्जियम बच गया और श्रीलंका टूटा। आज पता चलेगा कि उस फ़र्क़ का नाम क्या है — संघवाद।”

2 — संघीय व्यवस्था की सात विशेषताएँ (पृष्ठ 15)★★

यह इस अध्याय का सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला हिस्सा है। सातों शब्दश: लिखवाइए —

#विशेषता
1“यहाँ सरकार दो या अधिक स्तरों वाली होती है।”
2“अलग-अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं पर कानून बनाने, कर वसूलने और प्रशासन का उनका अपना-अपना अधिकार-क्षेत्र होता है।”
3“विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकार-क्षेत्र संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित होते हैं इसलिए संविधान सरकार के हर स्तर के अस्तित्व और प्राधिकार की गारंटी और सुरक्षा देता है।”
4“संविधान के मौलिक प्रावधानों को किसी एक स्तर की सरकार अकेले नहीं बदल सकती। ऐसे बदलाव दोनों स्तर की सरकारों की सहमति से ही हो सकते हैं।”
5“अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तर की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है… विवाद की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय निर्णायक भूमिका निभाता है।”
6“वित्तीय स्वायत्तता निश्चित करने के लिए विभिन्न स्तर की सरकारों के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित हैं।”
★7“संघीय शासन व्यवस्था के दोहरे उद्देश्य हैं: देश की एकता की सुरक्षा करना और उसे बढ़ावा देना तथा इसके साथ ही क्षेत्रीय विविधताओं का पूरा सम्मान करना।”

★★सातवीं विशेषता पर पूरा रुकिए — यह पूरे अध्याय की जान है। “एकता की सुरक्षा और विविधता का सम्मान — दोनों एक साथ।” और यही तो अध्याय 1 का पूरा सबक़ था।

और दो चीज़ें, जो लिखी नहीं जा सकतीं

“इस कारण संघीय व्यवस्था के गठन और कामकाज के लिए दो चीज़ें सबसे महत्वपूर्ण हैं: विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच सत्ता के बँटवारे के नियमों पर सहमति होनी चाहिए और इनका एक-दूसरे पर भरोसा होना चाहिए कि वे अपने-अपने अधिकार-क्षेत्रों को मानेंगे।” ★“आदर्श संघीय व्यवस्था में ये दोनों पक्ष होते हैं: आपसी भरोसा और साथ रहने पर सहमति।”

कक्षा में पूछिए — “भरोसा संविधान में कैसे लिखोगे?” → लिख नहीं सकते। इसीलिए किताब आगे कहती है कि संघवाद संविधान से नहीं, राजनीति से चलता है।

3 — संघ बनने के दो तरीक़े (पृष्ठ 15)★

“यह बात इस चीज़ पर निर्भर करती है कि संघ की स्थापना किन ऐतिहासिक संदर्भों में हुई। संघीय शासन व्यवस्थाएँ आमतौर पर दो तरीक़ों से गठित होती हैं।”

(क) “साथ आकर संघ बनाना”(ख) “बड़े देश द्वारा राज्यों का गठन”
कैसे बनता है“दो या अधिक स्वतंत्र राष्ट्रों को साथ लाकर एक बड़ी इकाई गठित करने का”“बड़े देश द्वारा अपनी आंतरिक विविधता को ध्यान में रखते हुए राज्यों का गठन करना और फिर राज्य और राष्ट्रीय सरकार के बीच सत्ता का बँटवारा कर देना”
क्या होता है“दोनों स्वतंत्र राष्ट्र अपनी संप्रभुता को साथ करते हैं, अपनी अलग-अलग पहचान को भी बनाए रखते हैं और अपनी सुरक्षा तथा खुशहाली बढ़ाने का रास्ता अख़्तियार करते हैं”“राज्यों के बरक्स केंद्र सरकार ज़्यादा ताकतवर हुआ करती है”
★उदाहरणसंयुक्त राज्य अमरीका · स्विट्ज़रलैंड · ऑस्ट्रेलियाभारत · बेल्जियम · स्पेन
राज्यों की स्थिति“आमतौर पर प्रांतों को समान अधिकार होता है और वे केंद्र के बरक्स ज़्यादा ताकतवर होते हैं”“अक्सर इस व्यवस्था में विभिन्न राज्यों को समान अधिकार दिए जाते हैं पर विशेष स्थिति में किसी-किसी प्रांत को विशेष अधिकार भी दिए जाते हैं”

★कक्षा में सूत्र — “साथ आकर = नीचे से ऊपर (राज्य ताक़तवर) · साथ लेकर = ऊपर से नीचे (केंद्र ताक़तवर)।” और यह रिक्त-स्थान वाला अभ्यास प्रश्न 6 सीधे इसी पर है।

नक्शे वाला आँकड़ा (पृष्ठ 14)★

“हालाँकि दुनिया के 193 देशों में से केवल 25 में संघीय शासन व्यवस्था है लेकिन इन देशों में दुनिया की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। दुनिया के अधिकतर बड़े देश संघीय हैं।” ★किताब का सवाल — “क्या आप इस मानचित्र में इस नियम का एक अपवाद ढूँढ़ सकते हैं?” → उत्तर की दिशा: चीन एक बहुत बड़ा देश है पर संघीय नहीं है (नक्शे में उसका रंग नहीं भरा है); और बेल्जियम, स्विट्ज़रलैंड जैसे छोटे देश संघीय हैं।

4 — भारत में संघीय व्यवस्था (पृष्ठ 16–17)★★

शुरुआत

“एक बहुत ही दुखद और रक्तरंजित विभाजन के बाद भारत आज़ाद हुआ। आज़ादी के कुछ समय बाद ही अनेक स्वतंत्र रजवाड़े भारत में विलीन हो गए। भारतीय संविधान ने भारत को राज्यों का संघ घोषित किया।” ★“इसमें संघ शब्द नहीं आया पर भारतीय संघ का गठन संघीय शासन व्यवस्था के सिद्धांत पर हुआ है।” “संविधान ने मौलिक रूप से दो स्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया था — संघ सरकार (या हम जिसे केंद्र सरकार कहते हैं) और राज्य सरकारें… बाद में पंचायतों और नगरपालिकाओं के रूप में संघीय शासन का एक तीसरा स्तर भी जोड़ा गया।”

तीन सूचियाँ — यह तालिका रटवाइए★★

सूचीविषयक़ानून कौन बनाएगा
संघ सूचीप्रतिरक्षा · विदेशी मामले · बैंकिंग · संचार · मुद्रासिर्फ़ केंद्र सरकार
राज्य सूचीपुलिस · व्यापार · वाणिज्य · कृषि · सिंचाईसिर्फ़ राज्य सरकार
समवर्ती सूचीशिक्षा · वन · मज़दूर-संघ · विवाह · गोद लेना · उत्तराधिकारदोनों; ! पर टकराव होने पर केंद्र का क़ानून मान्य
अवशिष्ट (“बाकी बचे”) विषयजो किसी सूची में नहीं — जैसे कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर, जो संविधान बनने के बाद आयाकेंद्र सरकार

★याद रखने के सूत्र — संघ सूची: “प्र-वि-बैं-सं-मु” (प्रतिरक्षा · विदेशी मामले · बैंकिंग · संचार · मुद्रा) राज्य सूची: “पु-व्या-वा-कृ-सिं” (पुलिस · व्यापार · वाणिज्य · कृषि · सिंचाई) समवर्ती: “शि-व-म-वि-गो-उ” (शिक्षा · वन · मज़दूर-संघ · विवाह · गोद लेना · उत्तराधिकार)

★संघ सूची का तर्क बच्चों से निकलवाइए — “ये विषय केंद्र के पास क्यों?” → किताब का उत्तर: “पूरे देश के लिए इन मामलों में एक तरह की नीतियों की ज़रूरत है।” (सोचिए — अगर हर राज्य की अपनी सेना और अपनी मुद्रा हो तो?)

और सारे राज्यों को बराबर अधिकार नहींध्यान

“हमने ऊपर देखा कि ‘सबको साथ लेकर’ चलने की नीति मानकर बनी अधिकतर बड़ी संघीय व्यवस्थाओं में साथी इकाइयों को बराबर अधिकार नहीं मिलते। भारतीय संघ के सारे राज्यों को भी बराबर अधिकार नहीं हैं।”

क्याविवरण
विशेष दर्जा वाले राज्यअसम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम — “अपनी विशिष्ट सामाजिक तथा ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण… अनुच्छेद 371 के तहत विशेष शक्तियों का लाभ उठाते हैं”
वे शक्तियाँ किसलिए“उनकी संस्कृति और सरकारी सेवाओं में अधिमान्य रोज़गार के भूमि अधिकारों के संरक्षण के संबंध में स्पष्ट रूप से उपयोगी”
! केंद्र शासित प्रदेशचंडीगढ़, लक्षद्वीप और दिल्ली जैसे इलाक़े — “जो अपने आकार के चलते स्वतंत्र प्रांत नहीं बन सकते… इन क्षेत्रों को राज्यों वाले अधिकार नहीं हैं। इन इलाक़ों का शासन चलाने का विशेष अधिकार केंद्र सरकार को प्राप्त है।”

संविधान बदलना आसान नहीं★

“अकेले संसद इस व्यवस्था में बदलाव नहीं कर सकती। ऐसे किसी भी बदलाव को पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से मंज़ूर किया जाना होता है। फिर कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं से उसे मंज़ूर करवाना होता है।”

और न्यायपालिका तथा कर

  • “संवैधानिक प्रावधानों और क़ानूनों के क्रियान्वयन की देख-रेख में न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शक्तियों के बँटवारे के संबंध में कोई विवाद होने की हालत में फ़ैसला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में ही होता है।”
  • ”…ज़रूरी राजस्व की उगाही के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को कर लगाने और संसाधन जमा करने के अधिकार हैं।”

5 — संघीय व्यवस्था कैसे चलती है? (पृष्ठ 18)★★

“संघीय व्यवस्था के कारगर कामकाज के लिए संवैधानिक प्रावधान ज़रूरी हैं पर इतना ही पर्याप्त नहीं है।… भारत में संघीय व्यवस्था की सफलता का मुख्य श्रेय यहाँ की लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र को देना होगा। इसी से संघवाद की भावना, विविधता का आदर और संग-साथ रहने की इच्छा का हमारे देश के साझा आदर्श के रूप में स्थापित होना सुनिश्चित हुआ।”

और इसे तीन परीक्षाओं से गुज़रना पड़ा —

(क) पहली परीक्षा — भाषायी राज्य (पृष्ठ 19)★

“भाषा के आधार पर प्रांतों का गठन हमारे देश की लोकतांत्रिक राजनीति के लिए पहली और एक कठिन परीक्षा थी।” “भारत ने सन् 1947 में लोकतंत्र की राह पर अपनी जीवन-यात्रा शुरू की। उस वक़्त से लेकर सन् 2019 तक का अगर आप राजनीतिक मानचित्र देखें तो… अनेक पुराने प्रांत ग़ायब हो गए और कई नए प्रांत बनाए गए।”

आधारराज्य
भाषा“1950 के दशक में भारत के कई पुराने राज्यों की सीमाएँ बदलीं… ताकि एक भाषा बोलने वाले लोग एक राज्य में आ जाएँ”
संस्कृति, भूगोल या जातीयता“नगालैंड, उत्तराखंड और झारखंड जैसे राज्य शामिल हैं”

! उस समय का डर — “जब एक भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की बात उठी तो कई राष्ट्रीय नेताओं को डर था कि इससे देश टूट जाएगा। केंद्र सरकार ने इसी के चलते राज्यों का पुनर्गठन कुछ समय के लिए टाल दिया था।” ★★पर हुआ उल्टा — “पर हमारा अनुभव बताता है कि भाषावार राज्य बनाने से देश ज़्यादा एकीकृत और मज़बूत हुआ। इससे प्रशासन भी पहले की अपेक्षा कहीं ज़्यादा सुविधाजनक हो गया है।”

★रामचंद्र गुहा का उद्धरण (पृष्ठ 23) — यह ज़रूर पढ़वाइए (टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 1 नवंबर 2006)

  • “राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट को आज से ठीक पचास साल पहले 1 नवंबर 1956 को लागू किया गया था। अपने दौर में और अपने तरीक़े से इसने राष्ट्र के राजनीतिक और संस्थागत जीवन को एकदम बदल दिया था।”
  • “विभाजन धार्मिक आस्था से पुरातन जुड़ाव का परिणाम था। पुरातनी आस्था की एक ऐसी ही चीज़ भाषा — इसके आधार पर अब कितने विभाजन होंगे? नेहरू, पटेल और राजाजी के मन में यह सवाल कौंध रहा था।”
  • ★“बहरहाल, भारत की एकता को कमज़ोर करने की जगह भाषा के आधार पर गठित राज्यों ने इसकी एकता को मज़बूत करने में मदद की है। एक व्यक्ति कन्नड़ और भारतीय या बंगाली और भारतीय अथवा तमिल और भारतीय या गुजराती और भारतीय जैसी दो-दो पहचानों के साथ आसानी से जीता है।”
  • “ये विवाद सुखद तो नहीं लेकिन उतने बुरे भी नहीं कहे जा सकते।”
  • ★★“भाषावार राज्यों के गठन ने भारत को एक भयावह स्थिति से बचा लिया। अगर तेलुगु, मराठी वग़ैरह बोलने वालों की भावनाओं का ख़्याल न रखा गया होता तो यहाँ की स्थिति कुछ इस प्रकार की होती: एक भाषा : 14–15 राष्ट्र।”

★★“दो-दो पहचानों” वाली पंक्ति पर पूरा रुकिए और कक्षा से पूछिए — “तुम राजस्थानी भी हो और भारतीय भी। क्या इन दोनों में कोई टकराव है?” बच्चे तुरंत कहेंगे “नहीं”। ★और वही इस पूरे अध्याय का जवाब है।

(ख) दूसरी परीक्षा — भाषा-नीति (पृष्ठ 20)★★

बातविवरण
★राष्ट्रभाषा“हमारे संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया।”
हिंदी“हिंदी को राजभाषा माना गया पर हिंदी सिर्फ़ 40 फ़ीसदी (लगभग) भारतीयों की मातृभाषा है इसलिए अन्य भाषाओं के संरक्षण के अनेक दूसरे उपाय किए गए।”
अनुसूचित भाषाएँ“संविधान में हिंदी के अलावा अन्य 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है।” ! (देखिए नीचे का नोट)
परीक्षा“केंद्र सरकार के किसी पद का उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा दे सकता है बशर्ते उम्मीदवार इसको विकल्प के रूप में चुने।”
राज्यों की भाषा“राज्यों की भी अपनी राजभाषाएँ हैं। राज्यों का अपना अधिकांश काम अपनी राजभाषा में ही होता है।”

! एक ज़रूरी स्पष्टीकरण — किताब के शब्द हैं “हिंदी के अलावा अन्य 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा”, पर किताब की अपनी तालिका (पृष्ठ 22) में हिंदी सहित कुल 22 भाषाएँ गिनी गई हैं। परीक्षा में सुरक्षित उत्तर है — “आठवीं अनुसूची में कुल 22 अनुसूचित भाषाएँ हैं।”

★अंग्रेज़ी वाला विवाद — यह पूरी कहानी पढ़ाइए

“संविधान के अनुसार सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी का प्रयोग 1965 में बंद हो जाना चाहिए था पर अनेक ग़ैर-हिंदी भाषी प्रदेशों ने माँग की कि अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखा जाए। तमिलनाडु में तो इस माँग ने उग्र रूप भी ले लिया था।” ★“केंद्र सरकार ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी को राजकीय कामों में प्रयोग की अनुमति देकर इस विवाद को सुलझाया।”

★★और किताब का सबसे ज़रूरी वाक्य — “राजभाषा के रूप में हिंदी को बढ़ावा देने की भारत सरकार की नीति बनी हुई है पर बढ़ावा देने का मतलब यह नहीं कि केंद्र सरकार उन राज्यों पर भी हिंदी को थोप सकती है जहाँ लोग कोई और भाषा बोलते हैं। भारतीय नेताओं ने इस मामले में जो लचीला रुख अपनाया उसी से हम श्रीलंका जैसी स्थिति में पहुँचने से बच गए।”

★कक्षा में यह तुलना बोर्ड पर बनाइए —

श्रीलंका (1956)भारत (1965)
तमिल को हटाकर सिंहली एकमात्र राजभाषाहिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी भी जारी रखी
माँगें लगातार नकारी गईंमाँग मानकर विवाद सुलझाया
! नतीजा — गृहयुद्ध★नतीजा — देश जुड़ा रहा

“एक ही सवाल, दो जवाब, दो नतीजे।” — यह अध्याय 1 और अध्याय 2 को एक साथ जोड़ देता है।

भारत की भाषायी विविधता (पृष्ठ 22 का बॉक्स)★

आँकड़ाविवरण
1300 से ज़्यादा2011 की जनगणना में लोगों ने इतनी अलग-अलग भाषाओं को अपनी मातृभाषा दर्ज कराया
★समूहबद्ध करना“भोजपुरी, मगही, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी और ऐसी ही दूसरी भाषाओं को हिंदी के अंदर जोड़ लिया जाता है”
121समूहबद्धता के बाद बची प्रमुख भाषाएँ
22इनमें से आठवीं अनुसूची में रखी गईं — अनुसूचित भाषाएँ; बाक़ी ग़ैर-अनुसूचित
★हिंदी 43.63%“सबसे बड़ी भाषा हिंदी भी सिर्फ़ 44 फ़ीसदी लोगों की ही मातृभाषा है”; दूसरी-तीसरी भाषा जोड़ें तो भी 50 फ़ीसदी से कम
अंग्रेज़ी 0.02%मातृभाषा के रूप में; दूसरी या तीसरी भाषा के तौर पर 11 फ़ीसदी
निष्कर्ष“भाषा के हिसाब से भारत दुनिया का संभवत: सबसे ज़्यादा विविधता वाला देश है।”

बड़ी भाषाएँ (प्रतिशत) — हिंदी 43.63 · बांग्ला 8.03 · मराठी 6.86 · तेलुगु 6.70 · तमिल 5.70 · गुजराती 4.58 · उर्दू 4.19 · कन्नड़ 3.61 · ओड़िया 3.10 · मलयालम 2.88 · पंजाबी 2.74

! किताब ख़ुद कहती है — “इस सूची को ग़ौर से देखें लेकिन इसे याद करने की ज़रूरत नहीं है।” तो रटवाइए मत — बस हिंदी वाला आँकड़ा और निष्कर्ष याद रहे।

(ग) तीसरी परीक्षा — केंद्र-राज्य संबंध (पृष्ठ 20)★

“केंद्र-राज्य संबंधों में लगातार आए बदलाव का यह उदाहरण बताता है कि व्यवहार में संघवाद किस तरह मज़बूत हुआ है। सत्ता की साझेदारी की संवैधानिक व्यवस्था वास्तविकता में कैसा रूप लेगी यह ज़्यादातर इस बात पर निर्भर करता है कि शासक दल और नेता किस तरह इस व्यवस्था का अनुसरण करते हैं।”

दौरक्या हुआ
! पहले का दौर“काफ़ी समय तक हमारे यहाँ एक ही पार्टी का केंद्र और अधिकांश राज्यों में शासन रहा… इसका व्यावहारिक मतलब यह हुआ कि राज्य सरकारों ने स्वायत्त संघीय इकाई के रूप में अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं किया।”
! और जब दल अलग थे“जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें रहीं तो केंद्र सरकार ने राज्यों के अधिकारों की अनदेखी करने की कोशिश की। उन दिनों केंद्र सरकार अक्सर संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को भंग कर देती थी। यह संघवाद की भावना के प्रतिकूल काम था।”
★1990 के बाद“इस अवधि में देश के अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। यही दौर केंद्र में गठबंधन सरकार की शुरुआत का भी था।”
क्यों“चूँकि किसी एक दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला इसलिए प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों को क्षेत्रीय दलों समेत अनेक पार्टियों का गठबंधन बनाकर सरकार बनानी पड़ी।”
★★नतीजा“इससे सत्ता में साझेदारी और राज्य सरकारों की स्वायत्तता का आदर करने की नई संस्कृति पनपी।”
★और अदालत“इस प्रवृत्ति को सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े फ़ैसले से भी बल मिला। इस फ़ैसले के कारण राज्य सरकार को मनमाने ढंग से भंग करना केंद्र सरकार के लिए मुश्किल हो गया।”
आज“इस प्रकार आज संघीय व्यवस्था के तहत सत्ता की साझेदारी संविधान लागू होने के तत्काल बाद वाले दौर की तुलना में ज़्यादा प्रभावी है।”

गठबंधन सरकार — “एक से ज़्यादा राजनीतिक पार्टियों द्वारा साथ मिलकर बनाई गई सरकार को गठबंधन सरकार कहते हैं। आम तौर पर गठबंधन में शामिल दल एक राजनीतिक गठजोड़ करते हैं और एक साझा कार्यक्रम स्वीकार करते हैं।”

★★इस हिस्से का सार एक वाक्य में — “संविधान 1950 में ही संघीय था। पर संघवाद असल में 1990 के बाद शुरू हुआ — और उसे लाने वाला कोई संशोधन नहीं, चुनावी नतीजे थे।”

6 — भारत में विकेंद्रीकरण (पृष्ठ 24)★★

दो स्तर काफ़ी क्यों नहीं

“भारत जैसे विशाल देश में सिर्फ़ दो स्तर की शासन व्यवस्था से ही बढ़िया शासन नहीं चल सकता। भारत के प्रांत यूरोप के स्वतंत्र देशों से भी बड़े हैं। जनसंख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश रूस से भी बड़ा है और महाराष्ट्र लगभग जर्मनी के बराबर है। भारत के अनेक राज्य ख़ुद भी अंदरूनी तौर पर विविधताओं से भरे हैं।”

★यह तुलना बच्चों को चौंकाती है — बोर्ड पर ज़रूर लिखिए: “उत्तर प्रदेश > रूस · महाराष्ट्र ≈ जर्मनी।”

परिभाषा और तर्क

“जब केंद्र और राज्य सरकार से शक्तियां लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती हैं तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण कहते हैं।” “विकेंद्रीकरण के पीछे बुनियादी सोच यह है कि अनेक मुद्दों और समस्याओं का निपटारा स्थानीय स्तर पर ही बढ़िया ढंग से हो सकता है। लोगों को अपने इलाक़े की समस्याओं की बेहतर समझ होती है। लोगों को इस बात की भी अच्छी जानकारी होती है कि पैसा कहाँ खर्च किया जाए और चीज़ों का अधिक कुशलता से उपयोग किस तरह किया जा सकता है।” ★“इसके अलावा स्थानीय स्तर पर लोगों को फ़ैसलों में सीधे भागीदार बनाना भी संभव हो जाता है। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी की आदत पड़ती है। स्थानीय सरकारों की स्थापना स्व-शासन के लोकतांत्रिक सिद्धांत को वास्तविक बनाने का सबसे अच्छा तरीक़ा है।”

1992 से पहले क्या हालत थीध्यान

“सभी राज्यों में गाँव के स्तर पर ग्राम पंचायतों और शहरों में नगरपालिकाओं की स्थापना की गई थी। पर — • “इन्हें राज्य सरकारों के सीधे नियंत्रण में रखा गया था” • “इन स्थानीय सरकारों के लिए नियमित ढंग से चुनाव भी नहीं कराए जाते थे” • “इनके पास न तो अपना कोई अधिकार था न संसाधन” ! • “इस प्रकार प्रभावी ढंग से सत्ता का विकेंद्रीकरण नाम मात्र का हुआ था।”

1992 का संविधान संशोधन — पाँच बड़े बदलाव★★

“वास्तविक विकेंद्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम 1992 में उठाया गया। संविधान में संशोधन करके लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के इस तीसरे स्तर को ज़्यादा शक्तिशाली और प्रभावी बनाया गया।”

#बदलाव
1“अब स्थानीय स्वशासी निकायों के चुनाव नियमित रूप से कराना संवैधानिक बाध्यता है।”
2“निर्वाचित स्वशासी निकायों के सदस्य तथा पदाधिकारियों के पदों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं।”
★3“कम से कम एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।”
4“हर राज्य में पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराने के लिए राज्य चुनाव आयोग नामक स्वतंत्र संस्था का गठन किया गया है।”
5“राज्य सरकारों को अपने राजस्व और अधिकारों का कुछ हिस्सा इन स्थानीय स्वशासी निकायों को देना पड़ता है। सत्ता में भागीदारी की प्रकृति हर राज्य में अलग-अलग है।”

★याद रखने का सूत्र — “चुनाव · आरक्षण · महिला · आयोग · पैसा”

त्रिस्तरीय ढाँचा — गाँव में★

स्तरब्योरा
ग्राम पंचायत“एक तरह की परिषद है जिसमें कई सदस्य और एक अध्यक्ष होता है। सदस्य वार्डों से चुने जाते हैं और उन्हें सामान्यतया पंच कहा जाता है। अध्यक्ष को प्रधान या सरपंच कहा जाता है। इनका चुनाव गाँव अथवा वार्ड में रहने वाले सभी वयस्क लोग मतदान के ज़रिए करते हैं।”
★ग्राम सभा“पंचायतों का काम ग्राम-सभा की देखरेख में चलता है। गाँव के सभी मतदाता इसके सदस्य होते हैं। इसे ग्राम-पंचायत का बजट पास करने और इसके कामकाज की समीक्षा के लिए साल में कम से कम दो या तीन बार बैठक करनी होती है।”
पंचायत समिति“कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर… गठन होता है। इसे मंडल या प्रखंड स्तरीय पंचायत भी कह सकते हैं। इसके सदस्यों का चुनाव उस इलाक़े के सभी पंचायत सदस्य करते हैं।”
ज़िला परिषद“किसी ज़िले की सभी पंचायत समितियों को मिलाकर… गठन होता है। अधिकांश सदस्यों का चुनाव होता है। उस ज़िले से लोक सभा और विधान सभा के लिए चुने गए सांसद और विधायक तथा ज़िला स्तर की संस्थाओं के कुछ अधिकारी भी सदस्य के रूप में होते हैं। ज़िला परिषद का प्रमुख इस परिषद का राजनीतिक प्रधान होता है।”

शहरों में★

  • “शहरों में नगरपालिका होती है; बड़े शहरों में नगरनिगम का गठन होता है।”
  • “नगरपालिका और नगरनिगम, दोनों का कामकाज निर्वाचित प्रतिनिधि करते हैं।”
  • “नगरपालिका प्रमुख नगरपालिका के राजनीतिक प्रधान होते हैं। नगरनिगम के ऐसे पदाधिकारी को मेयर कहते हैं।”

उपलब्धि और कमी — दोनों साथ★★

✓ उपलब्धि! कमी
“स्थानीय सरकारों की यह नयी व्यवस्था दुनिया में लोकतंत्र का अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग है।”“ग्राम सभाओं की बैठकें नियमित रूप से नहीं होतीं”
★“नगरपालिकाओं और ग्राम-पंचायतों के लिए करीब 36 लाख लोगों का चुनाव होता है। यह संख्या ही अपने आप में दुनिया के कई देशों की कुल आबादी से ज़्यादा है।”★“अधिकांश राज्य सरकारों ने स्थानीय सरकारों को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए हैं।”
“स्थानीय सरकारों को संवैधानिक दर्जा दिए जाने से हमारे यहाँ लोकतंत्र की जड़ें और मज़बूत हुई हैं।”“इस प्रकार हम स्वशासन की आदर्श स्थिति से काफ़ी दूर हैं।”
★“इसने महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ ही हमारे लोकतंत्र में उनकी आवाज़ को मज़बूत किया है।”“पंचायतों के चुनाव तो नियमित रूप से होते हैं… लेकिन…”

! परीक्षा में इस हिस्से पर हमेशा दोनों कॉलम चाहिए। केवल उपलब्धियाँ लिख देना आधा उत्तर है।

ब्राज़ील का प्रयोग — पोर्तो एलेग्रे (पृष्ठ 26)★

क्याविवरण
कहाँब्राज़ील का शहर पोर्तो एलेग्रे
क्या किया“नगर-परिषद के समांतर एक संगठन खड़ा किया गया और अपने शहर के बारे में वास्तविक फ़ैसले करने का अधिकार स्थानीय निवासियों को दिया गया”
★कितने लोग“शहर के करीब 13 लाख लोग अपने शहर का बजट तैयार करने में भागीदारी करते हैं”
कैसेशहर उप-क्षेत्रों में बँटा (वार्ड जैसे); हर उप-क्षेत्र की बैठक ग्राम सभा की तरह; फिर पूरे शहर के मुद्दों पर बैठकें; प्रस्ताव नगरपालिका के सामने पेश, जो अंतिम फ़ैसला लेती है
हर साल“करीब 20,000 लोग हिस्सा लेते हैं”
★★नतीजा“यह सुनिश्चित हो गया है कि बजट को सिर्फ़ अमीर लोगों की बस्तियों में ही खर्च नहीं किया जाएगा। अब सभी गरीब बस्तियों तक बसें जाती हैं और पुनर्वास का इंतज़ाम किए बगैर भवन-निर्माता झुग्गी वालों को उजाड़ नहीं सकते।”
भारत में“अपने देश में भी केरल के कुछ इलाक़ों में ऐसे प्रयोग किए गए हैं।”

★कक्षा में यह सवाल ज़रूर पूछिए — “अगर तुम्हारे गाँव/वार्ड का बजट तुम्हारे मोहल्ले के लोग मिलकर बनाएँ, तो सबसे पहला ख़र्च क्या होगा?”

7 — NCERT प्रश्नावली के पूरे उत्तर (पृष्ठ 27–28)

प्रश्न 1 — भारत के खाली राजनीतिक नक्शे पर इन राज्यों की उपस्थिति दर्शाएँ: मणिपुर, सिक्किम, छत्तीसगढ़ और गोवा।

मणिपुर — पूर्वोत्तर भारत, म्यांमार की सीमा से लगा; राजधानी इंफाल। सिक्किम — पूर्वोत्तर में, नेपाल, भूटान, चीन (तिब्बत) के बीच; राजधानी गंगटोक। छत्तीसगढ़ — मध्य भारत, मध्य प्रदेश के पूर्व में; राजधानी रायपुर (2000 में मध्य प्रदेश से अलग हुआ)। गोवा — पश्चिमी तट पर, महाराष्ट्र के दक्षिण में; राजधानी पणजी।

प्रश्न 2 — भारत के अलावा संघीय शासन वाले तीन देश।

संयुक्त राज्य अमरीका (उत्तरी अमेरिका), ऑस्ट्रेलिया और ब्राज़ील (दक्षिण अमेरिका)। (अन्य विकल्प — कनाडा, रूस, जर्मनी, बेल्जियम, स्विट्ज़रलैंड, नाइजीरिया, स्पेन, मलेशिया, अर्जेंटीना।)

प्रश्न 3 — भारत की संघीय व्यवस्था में बेल्जियम से मिलती-जुलती एक विशेषता और उससे अलग एक विशेषता।★

मिलती-जुलती विशेषता — दोनों देशों में सत्ता का बँटवारा संविधान में स्पष्ट रूप से लिखा है और क्षेत्रीय/राज्य सरकारें केंद्र के अधीन नहीं हैं। दोनों ही “बड़े देश द्वारा राज्यों के गठन” वाली श्रेणी में आते हैं — यानी दोनों ने पहले से मौजूद देश के भीतर सत्ता बाँटी। (बेल्जियम में यह 1993 में हुआ।) अलग विशेषता — बेल्जियम में तीसरे स्तर की सरकार ‘सामुदायिक सरकार’ है, जिसे भाषा के आधार पर चुना जाता है — “चाहे वे जहाँ भी रहते हों।” जबकि भारत में तीसरा स्तर ‘स्थानीय शासन’ (पंचायत और नगरपालिका) है, जो भाषा नहीं, इलाक़े के आधार पर बनता है। (दूसरा स्वीकार्य अंतर — बेल्जियम में केंद्र सरकार में दोनों भाषायी समूहों के मंत्रियों की संख्या समान रहती है; भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं।)

प्रश्न 4 — शासन के संघीय और एकात्मक स्वरूपों में मुख्य अंतर।★

आधारएकात्मकसंघीय
सरकार के स्तरएक ही स्तर; बाक़ी इकाइयाँ उसके अधीनदो या अधिक स्तर, दोनों अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र
आदेशकेंद्र प्रांतीय/स्थानीय सरकारों को आदेश दे सकता हैकेंद्र राज्य को “कुछ खास करने का आदेश नहीं दे सकता”
शक्तियों का स्रोतसारी शक्तियाँ केंद्र के पास“राज्य सरकारों के पास अपनी शक्तियाँ होती हैं”
जवाबदेहीनीचे की सरकार ऊपर वाली को जवाबदेह“ये दोनों ही सरकारें अपने-अपने स्तर पर लोगों को जवाबदेह होती हैं”
संविधानबदलाव केंद्र अकेले कर सकता है“मौलिक प्रावधानों को किसी एक स्तर की सरकार अकेले नहीं बदल सकती”
उदाहरणश्रीलंका, ब्रिटेन, फ़्रांसभारत, बेल्जियम, अमरीका

प्रश्न 5 — 1992 के संविधान संशोधन के पहले और बाद के दो महत्वपूर्ण अंतर।

पहला अंतर — चुनाव। पहले स्थानीय निकायों के “नियमित ढंग से चुनाव भी नहीं कराए जाते थे”; अब “चुनाव नियमित रूप से कराना संवैधानिक बाध्यता है”, और इसके लिए हर राज्य में राज्य चुनाव आयोग नामक स्वतंत्र संस्था बनी। दूसरा अंतर — अधिकार और संसाधन। पहले “इनके पास न तो अपना कोई अधिकार था न संसाधन” और ये “राज्य सरकारों के सीधे नियंत्रण में” थे; अब “राज्य सरकारों को अपने राजस्व और अधिकारों का कुछ हिस्सा इन स्थानीय स्वशासी निकायों को देना पड़ता है।” (तीसरा अंतर, जो जोड़ा जा सकता है — अब अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं और कम से कम एक तिहाई पद महिलाओं के लिए।)

प्रश्न 6 — रिक्त स्थानों की पूर्ति★

“चूँकि अमरीका ‘साथ आकर संघ बनाने’ तरह का संघ है इसलिए वहाँ सभी इकाइयों को समान अधिकार है। संघीय सरकार के मुकाबले प्रांत ज़्यादा ताकतवर हैं। लेकिन भारत की संघीय प्रणाली ‘बड़े देश द्वारा राज्यों के गठन’ (साथ लेकर चलने) की है और यहाँ कुछ राज्यों को औरों से ज़्यादा शक्तियाँ प्राप्त हैं।”

प्रश्न 7 — भारत की भाषा नीति पर तीन प्रतिक्रियाएँ — आप किसे ठीक समझते हैं?★

कौनक्या कहता है
संगीता“प्रमुख भाषाओं को समाहित करने की नीति ने राष्ट्रीय एकता को मज़बूत किया है”
अरमान“भाषा के आधार पर राज्यों के गठन ने हमें बाँट दिया है”
हरीश“इस नीति ने अन्य भाषाओं के ऊपर अंग्रेज़ी के प्रभुत्व को मज़बूत करने भर का काम किया है”

★मैं संगीता से सहमत हूँ। तर्क और उदाहरण — (1) संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया और 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा मिला — यानी किसी की भाषा छीनी नहीं गई; (2) 1965 का अंग्रेज़ी विवाद केंद्र सरकार ने “हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी को राजकीय कामों में प्रयोग की अनुमति देकर” सुलझा लिया; (3) ★किताब का अपना निष्कर्ष — “भारतीय नेताओं ने इस मामले में जो लचीला रुख अपनाया उसी से हम श्रीलंका जैसी स्थिति में पहुँचने से बच गए।” (4) और भाषावार राज्यों के बारे में — “हमारा अनुभव बताता है कि भाषावार राज्य बनाने से देश ज़्यादा एकीकृत और मज़बूत हुआ”, तथा रामचंद्र गुहा के शब्दों में “भाषा के आधार पर गठित राज्यों ने इसकी एकता को मज़बूत करने में मदद की है” — इसलिए अरमान का डर तथ्यों से नहीं मिलता। (5) हरीश की बात आंशिक रूप से सही है, पर अंग्रेज़ी को जारी रखना गैर-हिंदी भाषी राज्यों की अपनी माँग थी — वह भाषाओं को दबाने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए थी।

प्रश्न 8 — संघीय सरकार की एक विशिष्टता है:

उत्तर देखिए

उत्तर — (घ) सरकार की शक्ति शासन के विभिन्न स्तरों के बीच बँट जाती है। (! विकल्प (क) ग़लत है क्योंकि संघीय व्यवस्था में केंद्र राज्यों को अधिकार “देता” नहीं — वे संविधान से मिलते हैं। विकल्प (ख) क्षैतिज वितरण है, संघवाद नहीं। विकल्प (ग) लोकतंत्र की विशेषता है, संघवाद की नहीं।)

प्रश्न 9 — विषयों को तीन सूचियों में बाँटिए★

सूचीविषय
संघीय सूचीरक्षा · बैंकिंग · संचार
राज्य सूचीपुलिस · कृषि · व्यापार
समवर्ती सूचीशिक्षा · वन · विवाह

प्रश्न 10 — कौन-सा जोड़ा सही मेल वाला नहीं है?

उत्तर देखिए

उत्तर — (घ) स्थानीय सरकार — अवशिष्ट अधिकार। कारण — “हमारे संविधान के अनुसार ‘बाकी बचे’ विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में चले जाते हैं।” यानी अवशिष्ट अधिकार केंद्र सरकार के पास हैं, स्थानीय सरकार के नहीं।

प्रश्न 11 — सुमेलित कीजिए★

सूची Iसूची II
1. भारतीय संघ(अ) प्रधानमंत्री
2. राज्य(स) राज्यपाल
3. नगर निगम(द) मेयर
4. ग्राम पंचायत(ब) सरपंच
उत्तर देखिए

उत्तर — (गा) 1-अ · 2-स · 3-द · 4-ब

प्रश्न 12 — इन बयानों पर ग़ौर करें★

बयानसही/ग़लतकारण
(अ) संघीय व्यवस्था में संघ और प्रांतीय सरकारों के अधिकार स्पष्ट रूप से तय होते हैंसहीयह संघवाद की तीसरी विशेषता है
(ब) भारत एक संघ है क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज हैंसहीतीन सूचियाँ इसी का प्रमाण हैं
(स) श्रीलंका में संघीय व्यवस्था है क्योंकि उसे प्रांतों में बाँट दिया गया हैग़लतकिताब कहती है — श्रीलंका में “व्यावहारिक रूप से अभी भी एकात्मक शासन व्यवस्था” है
(द) भारत में संघीय व्यवस्था नहीं रही क्योंकि राज्यों के कुछ अधिकार स्थानीय शासन को बाँट दिए गएग़लततीसरा स्तर जोड़ने से संघवाद ख़त्म नहीं, और मज़बूत होता है
उत्तर देखिए

उत्तर — (गा) अ और ब

8 — पृष्ठ 18 के तीन सोचने वाले प्रश्नों के उत्तर

प्रश्नउत्तर
1. ★पोखरण, जहाँ भारत ने परमाणु परीक्षण किए, राजस्थान में है। अगर राजस्थान सरकार केंद्र की परमाणु-नीति की विरोधी होती तो क्या वह परीक्षण रोक सकती थी?नहीं।* प्रतिरक्षा (रक्षा) संघ सूची का विषय है, इसलिए इस पर क़ानून और नीति बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है। राज्य सरकार अपनी असहमति व्यक्त कर सकती है, पर *रोक नहीं सकती।
2. अगर सिक्किम सरकार नयी पाठ्यपुस्तकें लागू करना चाहे और केंद्र को उनकी विषयवस्तु पसंद न हो — क्या अनुमति लेनी ज़रूरी है?नहीं, अनुमति लेना ज़रूरी नहीं। शिक्षा समवर्ती सूची में है, इसलिए राज्य सरकार भी क़ानून बना सकती है और अपनी पाठ्यपुस्तकें लागू कर सकती है। ! पर अगर दोनों के क़ानूनों में सीधा टकराव हो जाए, तो “केंद्र सरकार द्वारा बनाया कानून ही मान्य होता है।”
3. नक्सलियों से निपटने की नीतियों पर आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों की राय अलग-अलग है — क्या प्रधानमंत्री दख़ल देकर ऐसा आदेश जारी कर सकते हैं जिसे सभी मुख्यमंत्री मानें?नहीं। पुलिस और क़ानून-व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं, और संघीय व्यवस्था में “केंद्रीय सरकार राज्य सरकार को कुछ खास करने का आदेश नहीं दे सकती।” प्रधानमंत्री बैठक बुलाकर सलाह-मशविरा और समन्वय कर सकते हैं, आदेश नहीं दे सकते। ★यही तो संघवाद है।

9 — इस अध्याय के अनिवार्य तथ्य

तथ्यविवरण
193 में 25दुनिया में संघीय शासन वाले देश — पर उनमें 40 प्रतिशत जनसंख्या
1993बेल्जियम एकात्मक से संघीय बना
अनुच्छेद 371असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम को विशेष शक्तियाँ
दो-तिहाई + आधे राज्यसंविधान संशोधन की शर्त
★1 नवंबर 1956राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट लागू
1965अंग्रेज़ी का प्रयोग बंद होना था — पर जारी रखा गया
22आठवीं अनुसूची की अनुसूचित भाषाएँ
121 / 1300+प्रमुख भाषाएँ / दर्ज कराई गई मातृभाषाएँ (2011)
43.63% (≈44%)हिंदी को मातृभाषा बताने वाले; अंग्रेज़ी 0.02%
1990 के बादक्षेत्रीय दलों का उदय और गठबंधन सरकार का दौर
★1992विकेंद्रीकरण वाला संविधान संशोधन
एक तिहाईस्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित पद
36 लाखस्थानीय निकायों के लिए चुने जाने वाले लोग
13 लाख / 20,000पोर्तो एलेग्रे — बजट में भागीदारी करने वाले / हर साल हिस्सा लेने वाले
उ.प्र. > रूस · महाराष्ट्र ≈ जर्मनीभारत के राज्यों का आकार

10 — शब्दावली

शब्दअर्थ
संघवादवह व्यवस्था जिसमें सर्वोच्च सत्ता केंद्रीय प्राधिकार और उसकी विभिन्न आनुषंगिक इकाइयों के बीच बँट जाती है।
एकात्मक व्यवस्थाजिसमें शासन का एक ही स्तर होता है और बाकी इकाइयाँ उसके अधीन होकर काम करती हैं।
अधिकार-क्षेत्र“ऐसा दायरा जिस पर किसी का वैधानिक अधिकार हो।” यह दायरा भौगोलिक सीमा का हो सकता है या कुछ विषयों का भी।
संघ सूचीवे विषय जिन पर केवल केंद्र सरकार क़ानून बना सकती है — प्रतिरक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, संचार, मुद्रा।
राज्य सूचीवे विषय जिन पर केवल राज्य सरकार क़ानून बना सकती है — पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि, सिंचाई।
समवर्ती सूचीवे विषय जिन पर दोनों क़ानून बना सकते हैं; टकराव पर केंद्र का क़ानून मान्य — शिक्षा, वन, मज़दूर-संघ, विवाह, गोद लेना, उत्तराधिकार।
अवशिष्ट विषयजो किसी सूची में नहीं — ये केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में जाते हैं।
गठबंधन सरकार“एक से ज़्यादा राजनीतिक पार्टियों द्वारा साथ मिलकर बनाई गई सरकार”; दल एक राजनीतिक गठजोड़ करते हैं और एक साझा कार्यक्रम स्वीकार करते हैं।
विकेंद्रीकरण“जब केंद्र और राज्य सरकार से शक्तियां लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती हैं।”
ग्राम सभागाँव के सभी मतदाताओं की सभा, जो ग्राम-पंचायत का बजट पास करती है और कामकाज की समीक्षा करती है।
सरपंच/प्रधानग्राम पंचायत का अध्यक्ष, जिसे गाँव के सभी वयस्क मतदान से चुनते हैं।
मेयरनगरनिगम का राजनीतिक प्रधान (नगरपालिका में — नगरपालिका प्रमुख)।
राज्य चुनाव आयोगहर राज्य में पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराने वाली स्वतंत्र संस्था (1992 से)।

11 — एक वाक्य में पूरा अध्याय

संघवाद वह व्यवस्था है जिसमें सर्वोच्च सत्ता केंद्र और उसकी आनुषंगिक इकाइयों के बीच बँट जाती है और दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र होकर सीधे जनता को जवाबदेह होती हैं; भारत ऐसा संघ “साथ लेकर चलने” वाली श्रेणी का है, जिसमें संघ, राज्य और समवर्ती — तीन सूचियों से अधिकार बँटे हैं, अवशिष्ट विषय केंद्र के पास हैं और कुछ राज्यों को अनुच्छेद 371 के तहत विशेष दर्जा मिला है; पर किताब का असली दावा यह है कि “संवैधानिक प्रावधान ज़रूरी हैं पर इतना ही पर्याप्त नहीं” — भारत का संघवाद भाषायी राज्यों के गठन, लचीली भाषा-नीति (जिसने हमें “श्रीलंका जैसी स्थिति में पहुँचने से बचा लिया”) और 1990 के बाद क्षेत्रीय दलों तथा गठबंधन सरकारों से मज़बूत हुआ; और 1992 के संविधान संशोधन ने पंचायतों-नगरपालिकाओं को तीसरा स्तर बनाकर 36 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों का “दुनिया में लोकतंत्र का अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग” खड़ा कर दिया — यद्यपि ग्राम सभाएँ नियमित नहीं बैठतीं और अधिकांश राज्यों ने पर्याप्त अधिकार नहीं दिए, इसलिए “हम स्वशासन की आदर्श स्थिति से काफ़ी दूर हैं।”