Chapter 4राजनीतिक दल

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पाठ्यपुस्तक — लोकतांत्रिक राजनीति, कक्षा 10 राजनीति विज्ञान · NCERT · पृष्ठ 46 से 62


शून्य — पढ़ाने से पहले यह समझ लीजिए

!! इस अध्याय की सबसे बड़ी ख़ासियत — और सबसे बड़ी सावधानी — एक ही है: इसमें किताब स्वयं असली पार्टियों के नाम लेती है। पिछले अध्यायों में नियम था — “किसी दल का नाम नहीं।” यहाँ नियम बदल जाता है — “किताब जितना कहती है, उतना ही कहिए — शब्दश:, बराबरी से, और बिना अपनी राय जोड़े।” छहों राष्ट्रीय दलों को उतना ही समय, उतनी ही तटस्थता से पढ़ाइए जितना किताब देती है। वर्तमान राजनीति, चुनावी चर्चा या कोई मूल्यांकन — कक्षा में बिल्कुल नहीं।

अध्याय का मूल दावा★★

“इस तरह हम कह सकते हैं कि राजनीतिक दल लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त हैं।” (पृष्ठ 50)

और अध्याय का अंतिम वाक्य — जो पूरी किताब का भी संदेश है —

★★“खराब राजनीति का समाधान है ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति और बेहतर राजनीति।” (पृष्ठ 61)

अध्याय की बनावट — पाँच सीढ़ियाँ

सीढ़ीपृष्ठविषयसवाल
147–50अर्थ · कार्य · ज़रूरत“दल चाहिए ही क्यों?”
250–51कितने दल — एक, दो या बहुत?“कितने दल अच्छे?”
352जन-भागीदारी के आँकड़े“लोग दलों को कैसे देखते हैं?”
453–57छह राष्ट्रीय दल + क्षेत्रीय दल“हमारे देश में कौन-कौन?”
★557–61चार चुनौतियाँ और सुधार“क्या ग़लत है और क्या हो सकता है?”

बोर्ड पर पूरे अध्याय भर रहने वाली पंक्ति —

“दलों के बिना लोकतंत्र चल नहीं सकता — और दलों की ख़ामियाँ लोकतंत्र को चलने नहीं देतीं। इसीलिए सुधार ही एकमात्र रास्ता है।”

1 — राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्यों? (पृष्ठ 47)

“किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की संस्थाओं में राजनीतिक दल अलग से दिखाई देते हैं। अधिकतर आम नागरिकों के लिए लोकतंत्र का मतलब राजनीतिक दल ही है।” “लेकिन पार्टियों के बारे में हर कोई कुछ न कुछ जानता है तो इसका मतलब यह नहीं कि पार्टियाँ बहुत लोकप्रिय हैं। अधिकतर लोग आम तौर पर दलों के बारे में ख़राब राय रखते हैं। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक जीवन की हर बुराई के लिए वे दलों को ही जिम्मेवार मानते हैं।”

★और इतिहास का आँकड़ा — “करीब 100 साल पहले दुनिया के बस कुछ ही देशों में और वह भी गिनती के राजनीतिक दल थे। आज गिनती के ही देश ऐसे हैं जहाँ राजनीतिक दल नहीं हैं।”

कक्षा में यही विरोधाभास खोलिए — “लोग दलों को पसंद नहीं करते, फिर भी सौ साल में दल हर लोकतंत्र में फैल गए। ऐसा क्यों? — यही पूरा अध्याय है।”

2 — राजनीतिक दल का अर्थ (पृष्ठ 47–48)★★

परिभाषा — शब्दश: याद कीजिए

“राजनीतिक दल को लोगों के एक ऐसे संगठित समूह के रूप में समझा जा सकता है जो चुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से काम करता है। समाज के सामूहिक हित को ध्यान में रखकर यह समूह कुछ नीतियाँ और कार्यक्रम तय करता है।”

और तीन बारीक बातें —

  • “सामूहिक हित एक विवादास्पद विचार है। इसे लेकर सबकी राय अलग-अलग होती है। इसी आधार पर दल लोगों को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि उनकी नीतियाँ औरों से बेहतर हैं।”
  • ★“इस प्रकार दल किसी समाज के बुनियादी राजनीतिक विभाजन को भी दर्शाते हैं। पार्टी समाज के किसी एक हिस्से से संबंधित होती है इसलिए उसका नज़रिया समाज के उस वर्ग/समुदाय विशेष की तरफ़ झुका होता है।”
  • “किसी दल की पहचान उसकी नीतियों और उसके सामाजिक आधार से तय होती है।”

तीन प्रमुख हिस्से★

नेता · सक्रिय सदस्य · अनुयायी या समर्थक

3 — राजनीतिक दल के सात कार्य (पृष्ठ 48–49)★★

“मूलतः राजनीतिक दल राजनीतिक पदों को भरते हैं और राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल करते हैं। दल इस काम को कई तरह से करते हैं —”

#कार्यब्योरा
1चुनाव लड़ते हैं“अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों के बीच लड़ा जाता है।” अमरीका में उम्मीदवार का चुनाव दल के सदस्य और समर्थक करते हैं; भारत में दलों के नेता ही उम्मीदवार चुनते हैं।
2नीतियाँ और कार्यक्रम सामने रखते हैं“दल अलग-अलग नीतियों और कार्यक्रमों को मतदाताओं के सामने रखते हैं और मतदाता अपनी पसंद की नीतियाँ और कार्यक्रम चुनते हैं।” — “पार्टियाँ तरह-तरह के विचारों को कुछ बुनियादी राय तक समेट लाती हैं।”
3कानून-निर्माण में निर्णायक भूमिका“कानूनों पर औपचारिक बहस होती है और उन्हें विधायिका में पास करवाना पड़ता है लेकिन विधायिका के अधिकतर सदस्य किसी न किसी दल के होते हैं। इस कारण वे अपने दल के नेता के निर्देश पर फ़ैसला करते हैं।”
4सरकार बनाते और चलाते हैं“पार्टियाँ नेता चुनती हैं, उनको प्रशिक्षित करती हैं और फिर उन्हें मंत्री बनाती हैं ताकि वे पार्टी की इच्छा के अनुसार सरकार चला सकें।”
★5विपक्ष की भूमिका“चुनाव हारने वाले दल शासक दल के विरोधी पक्ष की भूमिका निभाते हैं। सरकार की गलत नीतियों और असफलताओं की आलोचना करते हैं… विपक्षी दल सरकार के खिलाफ़ आम जनता को भी गोलबंद करते हैं।”
6जनमत-निर्माण“वे मुद्दों को उठाते और उन पर बहस करते हैं। विभिन्न दलों के लाखों कार्यकर्ता देश-भर में बिखरे होते हैं… अक्सर विभिन्न दलों द्वारा रखी जाने वाली राय के इर्द-गिर्द ही समाज के लोगों की राय बनती जाती है।”
7सरकारी मशीनरी तक पहुँच“दल ही सरकारी मशीनरी और सरकार द्वारा चलाए जाने वाले कल्याण कार्यक्रमों तक लोगों की पहुँच बनाते हैं। एक साधारण नागरिक के लिए किसी सरकारी अधिकारी की तुलना में किसी राजनीतिक कार्यकर्ता से जान-पहचान बनाना, उससे संपर्क साधना आसान होता है।”

★याद रखने का सूत्र — “चुनाव · नीति · कानून · सरकार · विपक्ष · जनमत · पहुँच” ★★और सातवें कार्य के साथ की यह पंक्ति ज़रूर — “इसी कारण लोग दलों पर पूरा विश्वास न करते हुए भी उन्हें अपने करीब मानते हैं। दलों को भी हर हाल में लोगों की माँगों और ज़रूरतों पर ध्यान देना होता है वरना अगले चुनाव में लोग उन्हें धूल चटा सकते हैं।”

4 — राजनीतिक दल की ज़रूरत (पृष्ठ 49–50)★★

दलों के बिना क्या होगा — यह कल्पना कक्षा में कराइए

“अगर दल न हों तो — • “सारे उम्मीदवार स्वतंत्र या निर्दलीय होंगे। तब, इनमें से कोई भी बड़े नीतिगत बदलाव के बारे में लोगों से चुनावी वायदे करने की स्थिति में नहीं होगा।” • “सरकार बन जाएगी पर उसकी उपयोगिता संदिग्ध होगी।” ★• “निर्वाचित प्रतिनिधि सिर्फ़ अपने निर्वाचन क्षेत्रों में किए गए कामों के लिए जवाबदेह होंगे। लेकिन, देश कैसे चले इसके लिए कोई उत्तरदायी नहीं होगा।”

गैर-दलीय पंचायत चुनाव का प्रमाण★

“हालाँकि इन चुनावों में दल औपचारिक रूप से अपने उम्मीदवार नहीं खड़े करते लेकिन हम पाते हैं कि चुनाव के अवसर पर पूरा गाँव कई खेमों में बँट जाता है और हर खेमा सभी पदों के लिए अपने उम्मीदवारों का ‘पैनल’ उतारता है। राजनीतिक दल भी ठीक यही काम करते हैं।” ★“यही कारण है कि हमें दुनिया के लगभग सभी देशों में राजनीतिक दल नज़र आते हैं — चाहे वह देश बड़ा हो या छोटा, नया हो या पुराना, विकसित हो या विकासशील।”

और सैद्धांतिक कारण

“राजनीतिक दलों का उदय प्रतिनिधित्व पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के उभार के साथ जुड़ा है। जब समाज बड़े और जटिल हो जाते हैं तब उन्हें विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विचारों को समेटने और सरकार की नज़र में लाने के लिए किसी माध्यम या एजेंसी की ज़रूरत होती है।” ★★“इस तरह हम कह सकते हैं कि राजनीतिक दल लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त हैं।”

5 — कितने राजनीतिक दल? (पृष्ठ 50–51)★

“लोकतंत्र में नागरिकों का कोई भी समूह राजनीतिक दल बना सकता है। इस औपचारिक अर्थ में सभी देशों में बहुत से राजनीतिक दल हैं। भारत में ही चुनाव आयोग में नाम पंजीकृत कराने वाले दलों की संख्या 750 से ज़्यादा है। लेकिन, हर दल चुनाव में गंभीर चुनौती देने की स्थिति में नहीं होता।”

तीन तरह की दलीय व्यवस्थाएँ

व्यवस्थाब्योराउदाहरण
एकदलीय“कई देशों में सिर्फ़ एक ही दल को सरकार बनाने और चलाने की अनुमति है।” ! “हम एकदलीय व्यवस्था को अच्छा विकल्प नहीं मान सकते क्योंकि यह लोकतांत्रिक विकल्प नहीं है।”चीन — सिर्फ़ कम्युनिस्ट पार्टी
दो दलीय“कुछ देशों में सत्ता आमतौर पर दो मुख्य दलों के बीच ही बदलती रहती है। वहाँ अनेक दूसरी पार्टियाँ हो सकती हैं… पर सिर्फ़ दो ही दल बहुमत पाने और सरकार बनाने के प्रबल दावेदार होते हैं।”अमरीका और ब्रिटेन
★बहुदलीय“जब अनेक दल सत्ता के लिए होड़ में हों और दो दलों से ज़्यादा के लिए अपने दम पर या दूसरों से गठबंधन करके सत्ता में आने का ठीक-ठाक अवसर हो।” इसमें दल गठबंधन या मोर्चा बनाते हैं।भारत — 2004 के तीन प्रमुख गठबंधन: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और वाम मोर्चा

“किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कम से कम दो दलों को राजनीतिक सत्ता के लिए चुनाव में प्रतिद्वंद्विता करने की अनुमति तो होनी ही चाहिए।” ★बहुदलीय व्यवस्था के दोनों पक्ष — “अक्सर बहुदलीय व्यवस्था बहुत घालमेल वाली लगती है और देश को राजनीतिक अस्थिरता की तरफ़ ले जाती है पर इसके साथ ही इस प्रणाली में विभिन्न हितों और विचारों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल जाता है।”

“कौन-सी प्रणाली बेहतर है?” — किताब का जवाब सुंदर है★★

“अक्सर पूछे जाने वाले इस सवाल का संभवतः सबसे अच्छा जवाब यही होगा कि यह कोई बहुत अच्छा सवाल नहीं है। दलीय व्यवस्था का चुनाव करना किसी मुल्क के हाथ में नहीं है। यह एक लंबे दौर के कामकाज के बाद खुद विकसित होती है और इसमें समाज की प्रकृति, इसके राजनीतिक विभाजन, राजनीति का इतिहास और इसकी चुनाव प्रणाली — सभी चीज़ें अपनी भूमिका निभाती हैं।” “जैसे, अगर भारत में बहुदलीय व्यवस्था है तो उसका कारण यह है कि दो-तीन पार्टियाँ इतने बड़े मुल्क की सारी सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं को समेट पाने में अक्षम हैं। हर मुल्क और हर स्थिति में कोई एक ही आदर्श प्रणाली चले यह संभव नहीं है।”

6 — राजनीतिक दलों में जन-भागीदारी (पृष्ठ 52)

तथ्यब्योरा
! भरोसा“दक्षिण एशिया की जनता राजनीतिक दलों पर बहुत भरोसा नहीं करती।” और — “पूरी दुनिया में राजनीतिक दल ही एक ऐसी संस्था है जिस पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं।”
★पर भागीदारी“बहरहाल, राजनीतिक दलों के कामकाज में लोगों की भागीदारी का स्तर काफ़ी ऊँचा है। खुद को किसी राजनीतिक दल का सदस्य बताने वाले भारतीयों का अनुपात कनाडा, जापान, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों से भी ज़्यादा है।”
प्रवृत्ति“पिछले तीन दशकों के दौरान भारत में राजनीतिक दलों की सदस्यता का अनुपात धीरे-धीरे बढ़ता गया है। खुद को किसी दल का करीबी बताने वालों का अनुपात भी बढ़ा है।”

★यह विरोधाभास कक्षा में खोलिए — “भरोसा सबसे कम — पर भागीदारी बढ़ती हुई। यह कैसे? → क्योंकि लोग जानते हैं कि नाराज़ होकर भी काम दलों से ही चलता है।” (सातवाँ कार्य याद कीजिए।)

7 — राष्ट्रीय दल — मान्यता के नियम (पृष्ठ 53–54)★★

“देश की हर पार्टी को निर्वाचन आयोग में अपना पंजीकरण कराना पड़ता है। आयोग सभी दलों को समान मानता है पर यह बड़े और स्थापित दलों को कुछ विशेष सुविधाएँ देता है। इन्हें अलग चुनाव चिह्न दिया जाता है जिसका प्रयोग पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार ही कर सकता है। इस विशेषाधिकार… पाने वाली पार्टियों को ‘मान्यता प्राप्त’ दल कहते हैं।”

मान्यता की शर्तें — यह हर परीक्षा में आती है★★

दलशर्त
राज्यीय (क्षेत्रीय) दल“जब कोई पार्टी राज्य विधानसभा के चुनाव में पड़े कुल मतों का 6 फ़ीसदी या उससे अधिक हासिल करती है और कम से कम दो सीटों पर जीत दर्ज करती है।”
राष्ट्रीय दल“अगर कोई दल लोकसभा-चुनाव में पड़े कुल वोट का अथवा चार राज्यों के विधान सभाई चुनाव में पड़े कुल वोटों का 6 प्रतिशत हासिल करता है और लोकसभा के चुनाव में कम से कम चार सीटों पर जीत दर्ज करता है।”

★सूत्र — “राज्यीय: 6% + 2 (विधानसभा) · राष्ट्रीय: 6% + 4 (लोकसभा)” “इस वर्गीकरण के अनुसार 2023 में जारी भारत निर्वाचन आयोग की अधिसूचना के अनुसार देश में छः मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल हैं।”

8 — छह राष्ट्रीय दल (पृष्ठ 54–55)★★

! पढ़ाने का नियम — छहों दलों को किताब के ही शब्दों में, बराबर समय देकर, वर्णानुक्रम/किताब के क्रम में पढ़ाइए। कोई टिप्पणी, तुलना या वर्तमान राजनीति नहीं।

दलगठनमुख्य बातें (किताब के अनुसार)2019 लोकसभा
आम आदमी पार्टी (आप)26 नवंबर 2012 (2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद)“पार्टी की स्थापना जवाबदेही, स्वच्छ प्रशासन, पारदर्शिता और सुशासन के विचार पर की गई थी।” गठन के एक साल बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी; 2022 के गुजरात चुनाव के बाद वहाँ तीसरे मोर्चे के रूप में उभरी; पंजाब और दिल्ली में सरकार।1 सीट
बहुजन समाज पार्टी (बसपा)1984, स्व. कांशीराम के नेतृत्व में“बहुजन समाज — जिसमें दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियाँ और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं — के लिए राजनीतिक सत्ता पाने का प्रयास।” प्रेरणा — साहू महाराज, महात्मा फुले, पेरियार रामास्वामी नायकर और बाबा साहेब आंबेडकर। मुख्य आधार उत्तर प्रदेश; म.प्र., छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब में भी ताकतवर; उ.प्र. में चार बार सरकार।3.63% वोट · 10 सीटें
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)1980 (पुराने भारतीय जनसंघ — श्यामा प्रसाद मुखर्जी, 1951 — को पुनर्जीवित करके)“भारत की प्राचीन संस्कृति और मूल्य; दीनदयाल उपाध्याय के विचार — समग्र मानवतावाद एवं अंत्योदय।” “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (या हिंदुत्व)” अवधारणा का प्रमुख तत्व। जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के ख़िलाफ़; समान नागरिक संहिता और धर्मांतरण पर रोक के पक्ष में। 1998 में राजग (NDA) के नेता के रूप में सत्ता में।303 सीटें — सबसे बड़ा दल; राजग का नेतृत्व
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सवादी (सीपीआई-एम)1964“मार्क्सवाद-लेनिनवाद में आस्था। समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की समर्थक तथा साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता की विरोधी।” पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में मजबूत आधार; गरीबों, कारखाना मजदूरों, खेतिहर मजदूरों और बुद्धिजीवियों में पकड़; पश्चिम बंगाल में लगातार 34 वर्षों तक शासन।~1.75% वोट · 3 सीटें
इंडियन नेशनल काँग्रेस (कांग्रेस)1885 — “दुनिया के सबसे पुराने दलों में से एक”“जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में इस दल ने भारत को एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का प्रयास किया।” 1971 तक लगातार और फिर 1980–89 तक शासन। “मध्यमार्गी (न वामपंथी न दक्षिणपंथी)” रुझान; धर्मनिरपेक्षता और कमजोर वर्गों के हित मुख्य एजेंडा। 2004 से 2014 तक संप्रग (UPA) सरकार का नेतृत्व।19.5% वोट · 52 सीटें
नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी)जुलाई 2013, श्री पी.ए. संगमा के नेतृत्व में“एनपीपी पूर्वोत्तर भारत की पहली राजनीतिक पार्टी है जिसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त हुआ है।” मूल दर्शन — सभी को शिक्षा और रोजगार के साथ सशक्तिकरण; मेघालय में सरकार बनाई।1 सीट

★छह नाम याद रखने का सूत्र — “आ-ब-भा-सी-कां-ए” (आप · बसपा · भाजपा · सीपीआई-एम · कांग्रेस · एनपीपी)

9 — क्षेत्रीय दल (पृष्ठ 57)★

  • “इन सात पार्टियों के अलावा अन्य सभी प्रमुख दलों को निर्वाचन आयोग ने ‘राज्यीय दल’ के रूप में मान्यता दी है। आमतौर पर इन्हें क्षेत्रीय दल कहा जाता है पर यह ज़रूरी नहीं है कि अपनी विचारधारा या नज़रिए में ये पार्टियाँ क्षेत्रीय ही हों।”
  • “समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संगठन है और इनकी कई राज्यों में इकाइयाँ हैं। बीजू जनता दल, सिक्किम लोकतांत्रिक मोर्चा, मिजो नेशनल फ्रंट और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियाँ अपनी क्षेत्रीय पहचान को लेकर सचेत हैं।”

और सबसे बड़ी बात — क्षेत्रीय दलों ने क्या बदला★★

“पिछले तीन दशकों में क्षेत्रीय दलों की संख्या और ताकत में वृद्धि हुई है। इससे भारतीय संसद विविधताओं से और भी ज़्यादा संपन्न हुई है। 2014 तक, किसी एक राष्ट्रीय दल का लोकसभा में बहुमत नहीं रहा। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने को मजबूर हुए हैं। 1996 के बाद से लगभग प्रत्येक क्षेत्रीय दल को एक या दूसरी राष्ट्रीय स्तर की गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने का अवसर मिला है। इससे हमारे देश में संघवाद और लोकतंत्र मज़बूत हुए हैं।”

★यह अध्याय 2 की कड़ी है — वहीं पढ़ा था कि 1990 के बाद गठबंधन के दौर ने संघवाद मज़बूत किया। यह जोड़ ज़रूर दिखाइए।

10 — राजनीतिक दलों के लिए चुनौतियाँ (पृष्ठ 57–59)★★

“आम जनता की नाराजगी और आलोचना राजनीतिक दलों के कामकाज के चार पहलुओं पर ही केंद्रित रही है।”

#चुनौतीब्योरा
★1आंतरिक लोकतंत्र का न होना“सारी दुनिया में यह प्रवृत्ति बन गई है कि सारी ताकत एक या कुछेक नेताओं के हाथ में सिमट जाती है। पार्टियों के पास न सदस्यों की खुली सूची होती है, न नियमित रूप से सांगठनिक बैठकें… इनके आंतरिक चुनाव भी नहीं होते।” नतीजा — “पार्टी के नाम पर सारे फ़ैसले लेने का अधिकार उस पार्टी के नेता हथिया लेते हैं… जो उनसे असहमत होते हैं उनका पार्टी में टिके रह पाना मुश्किल हो जाता है। पार्टी के सिद्धांतों और नीतियों से निष्ठा की जगह नेता से निष्ठा ही ज़्यादा महत्वपूर्ण बन जाती है।”
2वंशवाद की चुनौती“चूँकि अधिकांश दल अपना कामकाज पारदर्शी तरीके से नहीं करते… जो लोग नेता होते हैं वे अनुचित लाभ लेते हुए अपने नजदीकी लोगों और यहाँ तक कि अपने ही परिवार के लोगों को आगे बढ़ाते हैं। अनेक दलों में शीर्ष पद पर हमेशा एक ही परिवार के लोग आते हैं। यह दल के अन्य सदस्यों के साथ अन्याय है… इससे अनुभवहीन और बिना जनाधार वाले लोग ताकत वाले पदों पर पहुँच जाते हैं। यह प्रवृत्ति कुछ प्राचीन लोकतांत्रिक देशों सहित कमोबेश पूरी दुनिया में दिखाई देती है।”
! 3पैसा और अपराधी तत्वों की घुसपैठ“(खासकर चुनाव के समय)… चूँकि पार्टियों की सारी चिंता चुनाव जीतने की होती है अतः इसके लिए कोई भी जायज़-नाजायज़ तरीका अपनाने से वे परहेज नहीं करतीं। वे ऐसे ही उम्मीदवार उतारती हैं जिनके पास काफ़ी पैसा हो या जो पैसे जुटा सकें। किसी पार्टी को ज़्यादा धन देने वाली कंपनियाँ और अमीर लोग उस पार्टी की नीतियों और फ़ैसलों को भी प्रभावित करते हैं। कई बार पार्टियाँ चुनाव जीत सकने वाले अपराधियों का समर्थन करती हैं या उनकी मदद लेती हैं।”
4विकल्पहीनता“सार्थक विकल्प का मतलब होता है कि विभिन्न पार्टियों की नीतियों और कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण अंतर हो। हाल के वर्षों में दलों के बीच वैचारिक अंतर कम होता गया है… जैसे ब्रिटेन की लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बीच अब बड़ा कम अंतर रह गया है। अपने देश में भी सभी बड़ी पार्टियों के बीच आर्थिक मसलों पर बड़ा कम अंतर रह गया है… कई बार लोगों के पास एकदम नया नेता चुनने का विकल्प भी नहीं होता क्योंकि वही थोड़े से नेता हर दल में आते-जाते रहते हैं।”

★याद रखने का सूत्र — “अंदर का लोकतंत्र · वंशवाद · पैसा-अपराध · विकल्पहीनता”

11 — दलों को कैसे सुधारा जा सकता है? (पृष्ठ 59–61)★★

(क) जो सुधार हो चुके हैं — तीन

#सुधारब्योरा और सीमा
1दल-बदल कानून“विधायकों और सांसदों को दल-बदल करने से रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया… नए कानून के अनुसार अपना दल-बदलने वाले सांसद या विधायक को अपनी सीट गँवानी होगी। इस नए कानून से दल-बदल में कमी आई है ! पर इससे पार्टी में विरोध का कोई स्वर उठाना और भी मुश्किल हो गया है। पार्टी नेतृत्व जो कोई फ़ैसला करता है, सांसद और विधायक को उसे मानना ही होता है।”
2शपथपत्र“उच्चतम न्यायालय ने पैसे और अपराधियों का प्रभाव कम करने के लिए एक आदेश जारी किया… चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को अपनी संपत्ति का और अपने खिलाफ़ चल रहे आपराधिक मामलों का ब्यौरा एक शपथपत्र के माध्यम से देना अनिवार्य कर दिया गया है।” ! सीमा — “उम्मीदवार द्वारा दी गई सूचनाएँ सही हैं या नहीं, यह जाँच करने की कोई व्यवस्था नहीं है।”
3चुनाव आयोग का आदेश“आयोग ने एक आदेश के जरिए सभी दलों के लिए सांगठनिक चुनाव कराना और आयकर का रिटर्न भरना ज़रूरी बना दिया है।” ! सीमा — “पर कई बार ऐसा सिर्फ़ खानापूरी करने के लिए होता है।”

(ख) जो सुझाव अक्सर दिए जाते हैं — तीन

#सुझाव
1“राजनीतिक दलों के आंतरिक कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। सभी दल अपने सदस्यों की सूची रखें, अपने संविधान का पालन करें, पार्टी में विवाद की स्थिति में एक स्वतंत्र प्राधिकारी को पंच बनाएँ और सबसे बड़े पदों के लिए खुला चुनाव कराएँ।”
★2“राजनीतिक दल महिलाओं को एक खास न्यूनतम अनुपात में (करीब एक तिहाई) ज़रूर टिकट दें। इसी प्रकार दल के प्रमुख पदों पर भी औरतों के लिए आरक्षण होना चाहिए।”
3“चुनाव का खर्च सरकार उठाए। सरकार दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन दे। यह मदद पेट्रोल, कागज, फोन वगैरह के रूप में भी हो सकती है या फिर पिछले चुनाव में मिले मतों के अनुपात में नकद पैसा दिया जा सकता है।”

! और किताब की चेतावनी — “हर राजनीतिक समस्या के लिए महज कानूनी समाधान की बात करते हुए हमें सावधान रहना चाहिए। दलों को ज़रूरत से ज़्यादा नियमों से जकड़ना नुकसानदेह भी हो सकता है। इससे सभी दल कानून को दरकिनार करने का तरीका ढूँढ़ने लगेंगे।”

(ग) दो और तरीके — और यही अध्याय का अंत है★★

(1) “राजनीतिक दलों पर लोगों द्वारा दबाव बनाने का। यह काम चिट्ठियाँ लिखने, प्रचार करने और आंदोलनों के जरिये किया जा सकता है। आम नागरिक, दबाव समूह, आंदोलन और मीडिया के माध्यम से यह काम किया जा सकता है।” (2) ★★“सुधार की इच्छा रखने वालों का खुद राजनीतिक दलों में शामिल होना। लोकतंत्र की गुणवत्ता लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी से तय होती है। अगर आम नागरिक खुद राजनीति में हिस्सा न लें और बाहर से ही बातें करते रहें तो सुधार मुश्किल है। खराब राजनीति का समाधान है ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति और बेहतर राजनीति।”

12 — NCERT प्रश्नावली के पूरे उत्तर (पृष्ठ 61–62)

प्रश्न 1 — लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की विभिन्न भूमिकाओं की चर्चा करें।

सातों कार्य — (1) चुनाव लड़ना (भारत में उम्मीदवार दलों के नेता चुनते हैं); (2) नीतियाँ और कार्यक्रम मतदाताओं के सामने रखना; (3) कानून-निर्माण में निर्णायक भूमिका (सदस्य “अपने दल के नेता के निर्देश पर फ़ैसला करते हैं”); (4) सरकार बनाना और चलाना (नेता चुनना, प्रशिक्षित करना, मंत्री बनाना); (5) विपक्ष की भूमिका (हारे दल आलोचना करते हैं और “आम जनता को भी गोलबंद करते हैं”); (6) जनमत-निर्माण (“दलों द्वारा रखी जाने वाली राय के इर्द-गिर्द ही समाज के लोगों की राय बनती जाती है”); (7) सरकारी मशीनरी और कल्याण कार्यक्रमों तक पहुँच (“राजनीतिक कार्यकर्ता से जान-पहचान बनाना… आसान होता है”)।

प्रश्न 2 — राजनीतिक दलों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?

चारों — आंतरिक लोकतंत्र का न होना (ताकत कुछेक नेताओं के हाथ में; न सूची, न बैठकें, न आंतरिक चुनाव; “नेता से निष्ठा ही ज़्यादा महत्वपूर्ण”) · वंशवाद (“शीर्ष पद पर हमेशा एक ही परिवार”; “अनुभवहीन और बिना जनाधार वाले लोग ताकत वाले पदों पर”) · पैसा और अपराधी तत्वों की घुसपैठ (“कोई भी जायज़-नाजायज़ तरीका”; धन देने वाले “नीतियों और फ़ैसलों को भी प्रभावित करते हैं”) · विकल्पहीनता (“वैचारिक अंतर कम”; “वही थोड़े से नेता हर दल में आते-जाते रहते हैं”)।

प्रश्न 3 — दलों को मजबूत बनाने के सुझाव दें।

हो चुके सुधार — दल-बदल कानून · शपथपत्र · चुनाव आयोग का आदेश (हर एक की सीमा सहित)। सुझाव — (1) आंतरिक कामकाज का कानून — सदस्यों की सूची, संविधान का पालन, स्वतंत्र पंच, खुले चुनाव; (2) महिलाओं को एक तिहाई टिकट और पदों पर आरक्षण; (3) चुनाव का खर्च सरकार उठाए। और दो तरीके — जनता का दबाव (चिट्ठियाँ, प्रचार, आंदोलन, मीडिया) और ★खुद दलों में शामिल होना — “खराब राजनीति का समाधान है ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति और बेहतर राजनीति।”

प्रश्न 4 — राजनीतिक दल का क्या अर्थ होता है?

“लोगों का एक ऐसा संगठित समूह जो चुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से काम करता है” और “समाज के सामूहिक हित को ध्यान में रखकर… कुछ नीतियाँ और कार्यक्रम तय करता है।” इसके तीन हिस्से — नेता, सक्रिय सदस्य, अनुयायी या समर्थक।

प्रश्न 5 — किसी भी राजनीतिक दल के क्या गुण होते हैं?

(1) वह चुनाव लड़ता है और सत्ता हासिल करना चाहता है; (2) उसके नीतियाँ और कार्यक्रम होते हैं; (3) वह समाज के सामूहिक हित का दावा करता है; (4) उसकी पहचान नीतियों और सामाजिक आधार से तय होती है; (5) उसके तीन हिस्से होते हैं — नेता, सक्रिय सदस्य, अनुयायी।

प्रश्न 6 — रिक्त स्थान

“चुनाव लड़ने और सरकार में सत्ता सँभालने के लिए एकजुट हुए लोगों के समूह को राजनीतिक दल कहते हैं।”

प्रश्न 7 — सुमेलन★

सूची Iसूची II
1. इंडियन नेशनल काँग्रेस(ग) संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन
2. भारतीय जनता पार्टी(क) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन
3. सीपीआई-एम(घ) वाम मोर्चा
4. तेलुगु देशम पार्टी(ख) क्षेत्रीय दल
उत्तर देखिए

उत्तर — (ग) 1-ग · 2-क · 3-घ · 4-ख

प्रश्न 8 — बहुजन समाज पार्टी का संस्थापक?

उत्तर देखिए

उत्तर — (क) कांशीराम

प्रश्न 9 — भारतीय जनता पार्टी का मुख्य प्रेरक सिद्धांत?

उत्तर देखिए

उत्तर — (स) समग्र मानवतावाद

प्रश्न 10 — कथनों पर गौर करें★

(अ) दलों पर लोगों का ज़्यादा भरोसा नहीं है — सही; (ब) दलों में बड़े नेताओं के घोटालों की गूँज — सही; (स) सरकार चलाने के लिए पार्टियों का होना ज़रूरी नहीं — ग़लत (दल “लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त” हैं)। उत्तर — (ख) अ और ब

प्रश्न 11 — मोहम्मद यूनुस वाला उद्धरण

कहानी — बांग्लादेश के अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस (ग्रामीण बैंक; 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार) ने फरवरी 2007 में ‘नागरिक शक्ति’ नामक नया राजनीतिक दल बनाने का फ़ैसला किया — उद्देश्य: “सही नेतृत्व को उभारना, अच्छा शासन देना और नए बांग्लादेश का निर्माण।” कुछ लोगों ने स्वागत किया, पुराने दलों के नेताओं ने संदेह जताया। उत्तर की दिशा — हाँ, नयी पार्टी बनाना उनका लोकतांत्रिक अधिकार था — किताब कहती है “लोकतंत्र में नागरिकों का कोई भी समूह राजनीतिक दल बना सकता है”, और ★यह अध्याय के अंतिम संदेश का जीता-जागता उदाहरण है — “सुधार की इच्छा रखने वालों का खुद राजनीतिक दलों में शामिल होना।” पर संगठन के लिए ज़रूरी होगा — आंतरिक लोकतंत्र (सदस्यों की सूची, खुले चुनाव), पारदर्शी चंदा, महिलाओं को हिस्सेदारी — यानी वही तीन सुझाव जो किताब देती है; तभी वह “पारंपरिक दलों से अलग” रह पाएगी।

13 — अनिवार्य तथ्य

तथ्यब्योरा
100 साल पहलेगिनती के देशों में ही दल थे; आज गिनती के देशों में ही नहीं हैं
तीन हिस्सेनेता · सक्रिय सदस्य · अनुयायी/समर्थक
सात कार्यचुनाव · नीति · कानून · सरकार · विपक्ष · जनमत · पहुँच
750 से ज़्यादाचुनाव आयोग में पंजीकृत दल (किताब के अनुसार)
एकदलीय — चीन · दो दलीय — अमरीका, ब्रिटेन · बहुदलीय — भारततीन व्यवस्थाएँ
2004 के तीन गठबंधनराजग · संप्रग · वाम मोर्चा
★मान्यताराज्यीय: 6% + 2 (विधानसभा) · राष्ट्रीय: 6% + 4 (लोकसभा)
2023 अधिसूचनाछः राष्ट्रीय दल — आप · बसपा · भाजपा · सीपीआई-एम · कांग्रेस · एनपीपी
2014 तककिसी एक राष्ट्रीय दल का लोकसभा में बहुमत नहीं; 1996 के बाद लगभग हर क्षेत्रीय दल गठबंधन सरकार में
चार चुनौतियाँअंदर का लोकतंत्र · वंशवाद · पैसा-अपराध · विकल्पहीनता
तीन हुए सुधारदल-बदल कानून · शपथपत्र · आयोग का आदेश
तीन सुझावकानून · महिला (एक तिहाई) · सरकारी खर्च

14 — शब्दावली

शब्दअर्थ
राजनीतिक दलचुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से काम करने वाला लोगों का संगठित समूह।
शासक दल“जिस दल का शासन हो यानी जिसकी सरकार बनी हो।”
गठबंधन/मोर्चाजब बहुदलीय व्यवस्था में अनेक पार्टियाँ चुनाव लड़ने और सत्ता में आने के लिए आपस में हाथ मिला लेती हैं।
मान्यता प्राप्त दलवे दल जिन्हें चुनाव आयोग अलग चुनाव चिह्न जैसी विशेष सुविधाएँ देता है।
दल-बदल“विधायिका के लिए किसी दल-विशेष से निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधि का उस दल को छोड़कर किसी अन्य दल में चले जाना।”
शपथपत्र“किसी अधिकारी को सौंपा गया एक दस्तावेज़। इसमें कोई व्यक्ति अपने बारे में निजी सूचनाएँ देता है और उनके सही होने के बारे में शपथ उठाता है।”
आंतरिक लोकतंत्रदल के भीतर सदस्यों की सूची, सांगठनिक बैठकें और आंतरिक चुनाव होने की स्थिति।
वंशवाददल के शीर्ष पदों पर हमेशा एक ही परिवार के लोगों का आना।

15 — एक वाक्य में पूरा अध्याय

राजनीतिक दल — यानी “चुनाव लड़ने और सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से बना लोगों का संगठित समूह” — के सात कार्य (चुनाव · नीति · कानून · सरकार · विपक्ष · जनमत · पहुँच) उसे “लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त” बनाते हैं, इसीलिए सौ साल में दल हर लोकतंत्र में फैल गए; भारत की बहुदलीय व्यवस्था में 2023 की अधिसूचना के अनुसार छह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल और अनेक क्षेत्रीय दल हैं, जिनके उभार ने “संघवाद और लोकतंत्र मज़बूत” किए; पर दलों के सामने चार चुनौतियाँ हैं — आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, वंशवाद, पैसा-अपराध की घुसपैठ और विकल्पहीनता — जिनके लिए तीन सुधार हो चुके (दल-बदल कानून, शपथपत्र, आयोग का आदेश) और तीन सुझाव दिए जाते हैं (आंतरिक कानून, महिलाओं को एक तिहाई टिकट, सरकारी चुनाव-खर्च); पर अंतिम उपाय क़ानून नहीं, भागीदारी है — ★★“खराब राजनीति का समाधान है ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति और बेहतर राजनीति।”