कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · पृष्ठ — 1 से 12
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, दोनों देशों के तथ्य, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं; 2024-25 वाली किताब में भी यही पृष्ठ हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
अध्याय एक ग़लत धारणा से शुरू होता है। पृष्ठ 2 पर एक विद्यार्थी पूछता है: “मेरे दिमाग में सीधा सा समीकरण यह है कि सत्ता का बँटवारा = सत्ता के टुकड़े करना = देश को कमज़ोर करना। हम इस बात से शुरुआत क्यों कर रहे हैं?”
पूरा अध्याय इसी सवाल का जवाब है। किताब पहले दो लोकतंत्रों की कहानी सुनाती है, फिर उनसे सबक़ निकालती है, फिर सत्ता बाँटने के दो तर्क देती है, उन्हें लेबनान की एक उलझन पर परखती है, और आख़िर में बताती है कि सत्ता किन-किन के बीच बँटती है।
अध्याय का क्रम
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “बेल्जियम के नेताओं को लगा कि विभिन्न समुदाय और क्षेत्रों की भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है।” (पृष्ठ 5)
- “सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है।” (पृष्ठ 6)
हमारी ओर से — उलटा समीकरण: अध्याय के अंत में पृष्ठ 2 वाला समीकरण उलटकर लिखवाइए, पृष्ठ 6 के शब्दों से: सत्ता का बँटवारा = टकराव का अंदेशा कम = राजनीतिक व्यवस्था में स्थायित्व। यह इस रूप में किताब में नहीं है। पाठ योजना पहले कालांश में पुराना समीकरण चार्ट पेपर पर लिखवाती है और आख़िरी कालांश में उसे उलटवाती है।
हमारी ओर से — एक सवाल जो पूरे अध्याय में काम आता है: जब भी कोई फ़ैसला बहुमत के नाम पर लिया जाए, बच्चों से पूछिए: और बाक़ी लोगों का क्या? श्रीलंका, बेल्जियम और लेबनान, तीनों कहानियाँ इसी सवाल से खोली जा सकती हैं।
दोनों देश — तथ्य एक नज़र में
| बात | बेल्जियम | श्रीलंका |
|---|---|---|
| कहाँ | यूरोप का छोटा-सा देश; सीमाएँ फ्रांस, नीदरलैंड, जर्मनी और लक्समबर्ग से (पृष्ठ 2) | द्वीपीय देश, तमिलनाडु के दक्षिणी तट से कुछ किलोमीटर दूर (पृष्ठ 2) |
| आकार और आबादी | क्षेत्रफल में हरियाणा से भी छोटा; आबादी एक करोड़ से थोड़ी अधिक, यानी हरियाणा की करीब आधी (पृष्ठ 2) | आबादी करीब दो करोड़, यानी हरियाणा के बराबर (पृष्ठ 2) |
| मुख्य समूह | 59% डच बोलने वाले (फ्लेमिश इलाका), 40% फ़्रेंच बोलने वाले (वेलोनिया), 1% जर्मन बोलने वाले (पृष्ठ 2) | सिंहली 74%, तमिल 18%; तमिलों के दो समूह: श्रीलंकाई मूल के तमिल (13%) और हिंदुस्तानी तमिल (पृष्ठ 2–3) |
| और ध्यान देने की बात | राजधानी ब्रूसेल्स में 80% फ़्रेंच और 20% डच बोलने वाले; टकराव का सबसे तीखा रूप वहीं दिखा (पृष्ठ 2) | ज़्यादातर सिंहली बौद्ध; तमिलों में कुछ हिंदू, कुछ मुसलमान; ईसाई 7%, जो दोनों भाषाएँ बोलते हैं (पृष्ठ 3) |
| टकराव की जड़ | फ़्रेंच-भाषी अल्पसंख्यक ज़्यादा समृद्ध और ताकतवर रहे; डच-भाषियों को आर्थिक विकास और शिक्षा का लाभ बहुत बाद में मिला (पृष्ठ 2) | 1948 में आज़ादी के बाद सिंहली नेताओं ने बहुसंख्या के बल पर शासन पर प्रभुत्व चाहा (पृष्ठ 3) |
| सरकार ने क्या किया | 1970 से 1993 के बीच संविधान में चार संशोधन; सत्ता की साझेदारी का मॉडल (पृष्ठ 4–5) | 1956 में सिंहली एकमात्र राजभाषा; विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में सिंहलियों को प्राथमिकता; नए संविधान में बौद्ध मत को संरक्षण (पृष्ठ 3) |
| नतीजा | व्यवस्था जटिल, पर बेहद सफल; गृहयुद्ध की आशंकाओं पर विराम (पृष्ठ 5) | स्वायत्तता की माँगें लगातार नकारी गईं; गृहयुद्ध; दोनों पक्ष के हज़ारों लोग मारे गए; 2009 में गृहयुद्ध का अंत (पृष्ठ 4) |
दोनों देशों का क्रम
आँकड़े तस्वीर बनाने के लिए हैं, रटवाने के लिए नहीं। बच्चे को इतना याद रहे कि बेल्जियम में बहुसंख्यक डच-भाषी थे पर ताकत फ़्रेंच-भाषियों के पास ज़्यादा थी, और श्रीलंका में सिंहली बहुत बड़ा बहुमत थे।
ध्यान दीजिए: किताब बस इतना कहती है कि “जब अनेक यूरोपीय देशों ने साथ मिलकर यूरोपीय संघ बनाने का फैसला किया तो ब्रूसेल्स को उसका मुख्यालय चुना गया।” (पृष्ठ 5) इसे बेल्जियम के मॉडल का इनाम मत बताइए, और ब्रूसेल्स को “पूरे यूरोप की राजधानी” भी मत कहिए; किताब ऐसा नहीं कहती।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| एथनीक या जातीय | “ऐसा सामाजिक विभाजन जिसमें हर समूह अपनी-अपनी संस्कृति को अलग मानता है यानी यह साझी संस्कृति पर आधारित सामाजिक विभाजन है।” | 2 |
| बहुसंख्यकवाद | “यह मान्यता कि अगर कोई समुदाय बहुसंख्यक है तो वह अपने मनचाहे ढंग से देश का शासन कर सकता है और इसके लिए वह अल्पसंख्यक समुदाय की ज़रूरत या इच्छाओं की अवहेलना कर सकता है।” | 3 |
| गृहयुद्ध | “किसी मुल्क में सरकार विरोधी समूहों की हिंसक लड़ाई ऐसा रूप ले ले कि वह युद्ध सा लगे तो उसे गृहयुद्ध कहते हैं।” | 4 |
| सामुदायिक सरकार | बेल्जियम में केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा तीसरे स्तर की सरकार: “इस सरकार का चुनाव एक ही भाषा बोलने वाले लोग करते हैं।” यह संस्कृति, शिक्षा और भाषा जैसे मसलों पर फ़ैसले लेती है। | 5 |
| युक्तिपरक | “हानि-लाभ का सावधानीपूर्वक हिसाब लगाकर लिया गया फ़ैसला। पूरी तरह से नैतिकता पर आधारित फ़ैसला अकसर इसके उलट होता है।” | 6 |
| युक्तिपरक और नैतिक तर्क | “युक्तिपरक या समझदारी का तर्क लाभकर परिणामों पर जोर देता है जबकि नैतिक तर्क सत्ता के बँटवारे के अंतर्भूत महत्व को बताता है” | 6 |
| गठबंधन सरकार | किताब इसे उदाहरण से समझाती है: जर्मनी में किसी दल को अपने बूते सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला, तो दो बड़ी पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाई (पृष्ठ 6)। पृष्ठ 9 पर: “दो या अधिक पार्टियाँ मिलकर चुनाव लड़ती हैं या सरकार का गठन करती हैं” | 6, 9 |
| नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था | सरकार के अंग एक-दूसरे पर अंकुश रखते हैं। किताब का भारत वाला उदाहरण: “कार्यपालिका सत्ता का उपयोग करती ज़रूर है पर यह संसद के अधीन कार्य करती है; न्यायपालिका की नियुक्ति कार्यपालिका करती है पर न्यायपालिका ही कार्यपालिका पर और विधायिका द्वारा बनाए कानूनों पर अंकुश रखती है” | 8 |
| क्षैतिज वितरण | विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच बँटवारा, जिसमें “सरकार के विभिन्न अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी-अपनी शक्ति का उपयोग करते हैं।” | 8 |
| उर्ध्वाधर वितरण | “उच्चतर और निम्नतर स्तर की सरकारों के बीच सत्ता के ऐसे बँटवारे को उर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है।” पूरे देश के लिए संघ या केंद्र सरकार, प्रांत या क्षेत्र के लिए अलग सरकार (भारत में राज्य सरकार), और उससे नीचे नगरपालिका और पंचायतें। | 8–9 |
| हित-समूह और दबाव-समूह | व्यापारी, उद्योगपति, किसान और औद्योगिक मज़दूर जैसे संगठित हित-समूह; दबाव-समूह और आंदोलन शासन को प्रभावित और नियंत्रित करते हैं। | 9 |
किताब “उर्ध्वाधर” लिखती है; उत्तर में बच्चे यही वर्तनी लिखें तो ग़लत मत मानिए।
पिछली कक्षा और अगले अध्यायों से जोड़
- पृष्ठ 1 याद दिलाता है: “पिछले साल हमने देखा था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सारी ताकत किसी एक अंग तक सीमित नहीं होती।” इसलिए सरकार के अंगों वाला बँटवारा बच्चों के लिए नया नहीं है; पाठ योजना का कालांश 7 वहीं से शुरू होता है।
- पृष्ठ 9 पर आरक्षित चुनाव क्षेत्रों के बारे में भी किताब कहती है: “पिछले साल हमने अपने देश में प्रचलित आरक्षित चुनाव क्षेत्र वाली ऐसी ही व्यवस्था के बारे में पढ़ा था”।
- आगे के लिए पृष्ठ 1 कहता है: “पहले तीन अध्यायों में हम सत्ता के बँटवारे पर सोच-विचार को आगे बढ़ाएँगे।” और सत्ता के बँटवारे के जिन रूपों की बात यह अध्याय करता है, उनकी “चर्चा अगले दो अध्यायों में की गई है।” किताब यहाँ उन अध्यायों के नाम नहीं लेती।
- सरकार के स्तरों वाले बँटवारे पर पृष्ठ 9 कहता है: “हम अगले अध्याय में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।” अगला अध्याय संघवाद है। इसलिए यहाँ उर्ध्वाधर बँटवारे को पहचान और एक उदाहरण तक रखिए; विस्तार वहाँ होगा।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
पृष्ठ 10 की गतिविधि — चार उदाहरण, कौन किसके साथ
किताब पूछती है कि ये उदाहरण सत्ता की साझेदारी की चार श्रेणियों में से किसमें आते हैं, और “यहाँ सत्ता का साझा कौन किसके साथ कर रहा है?” किताब इसके उत्तर नहीं छापती। नीचे हमारी ओर से जवाब हैं; बच्चों से रूप का नाम कम, कारण ज़्यादा पूछिए।
| उदाहरण (पृष्ठ 10) | कौन, किसके साथ | रूप (हमारी ओर से) |
|---|---|---|
| बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि वह तत्काल कार्रवाई करे और मुंबई के सात अनाथालयों के 2000 बच्चों के रख-रखाव में सुधार करे | न्यायपालिका (उच्च न्यायालय) और कार्यपालिका (राज्य सरकार) | सरकार के अंगों के बीच, यानी क्षैतिज: न्यायपालिका कार्यपालिका पर अंकुश रख रही है |
| कनाडा के ओंटेरियो प्रांत की सरकार ने वहाँ के मूलवासी समुदाय के साथ ज़मीन के दावों का निपटारा करने पर सहमति दी | प्रांत की सरकार और एक समुदाय (मूलवासी) | सामाजिक समूहों के साथ साझेदारी |
| रूस की दो प्रभावशाली पार्टियों ने एक मज़बूत गठबंधन बनाने के लिए अपने संगठनों के विलय का फ़ैसला किया; अगले संसदीय चुनाव में उम्मीदवारों की साझा सूची | दो राजनीतिक दल, आपस में | दलों के बीच साझेदारी |
| नाइजीरिया के प्रांतों के वित्तमंत्रियों ने माँग की कि संघीय सरकार अपनी आमदनी के स्रोत घोषित करे; वे यह भी जानना चाहते थे कि प्रांतों के बीच राजस्व का बँटवारा किस आधार पर होता है | प्रांतों की सरकारें और संघीय सरकार | सरकार के स्तरों के बीच, यानी उर्ध्वाधर |
हमारी ओर से — पहचानने का तरीक़ा: देखिए कि दोनों तरफ़ कौन है। एक ही स्तर के दो अंग (अदालत और सरकार) हों तो क्षैतिज; ऊपर-नीचे के दो स्तर (केंद्र और प्रांत) हों तो उर्ध्वाधर; एक तरफ़ कोई समुदाय हो तो सामाजिक समूह; दोनों तरफ़ दल हों तो दल।
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
प्रश्न 1 — साझेदारी के अलग-अलग तरीक़े, हर एक का उदाहरण (पृष्ठ 8–9)
- सरकार के अंगों के बीच (क्षैतिज वितरण): भारत में कार्यपालिका संसद के अधीन काम करती है और न्यायपालिका कार्यपालिका और क़ानूनों पर अंकुश रखती है (पृष्ठ 8)।
- सरकार के स्तरों के बीच (उर्ध्वाधर वितरण): केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, और उनसे नीचे नगरपालिका और पंचायतें (पृष्ठ 8–9)।
- सामाजिक समूहों के बीच: बेल्जियम की सामुदायिक सरकार; हमारे देश में आरक्षित चुनाव क्षेत्र (पृष्ठ 9)।
- राजनीतिक दलों, दबाव-समूहों और आंदोलनों के बीच: गठबंधन सरकार (पृष्ठ 6 पर जर्मनी का उदाहरण); व्यापारी, किसान, मज़दूर जैसे हित-समूहों का शासन पर असर (पृष्ठ 9)।
जाँचते समय: हर रूप के साथ उसका उदाहरण देखिए; सिर्फ़ चार नाम लिख देना पूरा उत्तर नहीं है।
प्रश्न 2 — भारत का एक उदाहरण, एक युक्तिपरक और एक नैतिक कारण (पृष्ठ 6, 8–9)
- उदाहरण: केंद्र, राज्य और पंचायत-नगरपालिका के बीच सत्ता का बँटवारा; या आरक्षित चुनाव क्षेत्र।
- युक्तिपरक कारण: सत्ता बाँटने से सामाजिक समूहों के बीच टकराव का अंदेशा कम होता है और राजनीतिक व्यवस्था में स्थायित्व आता है।
- नैतिक कारण: “सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है।” जिन पर शासन होता है, उन्हें शासन में हिस्सा मिलना चाहिए।
जाँचते समय: उदाहरण भारत का हो, और दोनों कारण अलग-अलग पहचानकर लिखे गए हों।
प्रश्न 3 — थम्मन, मथाई या औसेफ? (करीब 50 शब्द)
उत्तर: औसेफ। थम्मन साझेदारी को सिर्फ़ क्षेत्र, भाषा या जातीयता पर बँटे समाजों के लिए ज़रूरी मानता है, और मथाई सिर्फ़ क्षेत्रीय विभाजन वाले बड़े देशों के लिए। दोनों बस टकराव घटाने वाला, यानी युक्तिपरक तर्क देख रहे हैं। नैतिक तर्क हर समाज पर लागू होता है।
नमूना उत्तर — मैं औसेफ से सहमत हूँ। सत्ता की साझेदारी सिर्फ़ टकराव घटाने का उपाय नहीं है, जिसकी ज़रूरत बँटे हुए या बड़े देशों को हो। यह लोकतंत्र की आत्मा है: जनता ही सारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत है, इसलिए छोटे और बिना बँटवारे वाले समाज में भी हर समूह को शासन में हिस्सा मिलना चाहिए। (आधार: पृष्ठ 6 और 8)
प्रश्न 4 — मर्चटेम के मेयर का फ़ैसला (करीब 50 शब्द)
उत्तर: नहीं, यह फ़ैसला बेल्जियम की व्यवस्था की मूल भावना से मेल नहीं खाता।
नमूना उत्तर — बेल्जियम के नेताओं ने माना कि विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों की भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है। स्कूलों में फ़्रेंच बोलने पर रोक एक भाषा-समूह की इच्छा दूसरे पर थोपती है। यह साझेदारी का नहीं, प्रभुत्व का रास्ता है, वही जो श्रीलंका ने अपनाया था। (आधार: पृष्ठ 3, 5)
प्रश्न 5 — अंश में से एक युक्तिपरक कारण चुनिए (पृष्ठ 11)
उत्तर: “भ्रष्टाचार कम करने और प्रशासनिक कुशलता को बढ़ाने का एक उपाय पंचायतों को अधिकार देना भी है।” (या: लोगों की भागीदारी से भ्रष्ट बिचौलियों को खत्म किया जा सकेगा।) यह युक्तिपरक है, क्योंकि यह एक लाभकर परिणाम बताता है (पृष्ठ 6 की परिभाषा)।
अंश के बाक़ी कारण, जैसे महात्मा गांधी के सपने, “वास्तविक लोकतंत्र” और सत्ता उन लोगों के हाथों में सौंपना जिनके हाथों में इसे होना चाहिए, नैतिक तर्क के क़रीब हैं। बच्चे इनमें से कोई चुनें तो यही फ़र्क़ समझाइए।
6 से 9 तक के प्रश्न — कुंजी और कारण
| प्रश्न | सही विकल्प | कारण |
|---|---|---|
| 6. साझेदारी के बारे में कौन-से कथन सही हैं | (सा) क, ख, घ, च | (क) और (च) पृष्ठ 6 से हैं: बँटवारे से “विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव का अंदेशा कम हो जाता है”, और वैध सरकार वह है “जिसमें अपनी भागीदारी के माध्यम से सभी समूह शासन व्यवस्था से जुड़ते हैं”। (घ) बेल्जियम से निकलता है: वहाँ के नेताओं ने “क्षेत्रीय अंतरों और सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार किया” (पृष्ठ 4)। (ख) का “पक्षपात” किताब का पाठ सीधे नहीं कहता; हमारी ओर से — सत्ता एक जगह न रहे तो मनमानी का मौक़ा घटता है, जैसे पृष्ठ 8 पर “हर अंग दूसरे पर अंकुश रखता है”। ग, ङ और छ नुक़सान गिनाते हैं, इसलिए (सा)। |
| 7. बेल्जियम और श्रीलंका के बारे में कौन-से कथन सही हैं | (मा) ख, ग और घ | कथन (क) ग़लत है: पृष्ठ 3 पर किताब बस इतना कहती है कि डच-भाषी अपनी इच्छाएँ “थोप सकते थे”; असल में बेल्जियम के नेताओं ने दूसरा रास्ता चुना (पृष्ठ 4)। (ख) पृष्ठ 3 की नीतियाँ हैं: सिंहली एकमात्र राजभाषा, नौकरियों में प्राथमिकता, बौद्ध मत को संरक्षण। (ग) तमिलों ने “क्षेत्रीय स्वायत्तता हासिल करने तथा शिक्षा और रोज़गार में समान अवसरों की माँग” की (पृष्ठ 4)। (घ) पृष्ठ 4: “राज्य सरकारें केंद्रीय सरकार के अधीन नहीं हैं”; पृष्ठ 5: नहीं तो बेल्जियम “भाषा के आधार पर दो टुकड़ों में बँट गया होता”। “संघीय ढाँचा” और “एकात्मक की जगह संघीय” प्रश्न के अपने शब्द हैं, अध्याय के पाठ में ये नहीं आते। |
| 8. सूची I और सूची II का मिलान | (गा) 1-ख, 2-घ, 3-क, 4-ग | अंगों के बीच = अधिकारों का वितरण; स्तरों के बीच = संघीय सरकार; सामाजिक समूहों के बीच = सामुदायिक सरकार; दलों के बीच = गठबंधन सरकार। |
| 9. कथन (अ) और (ब) | (ख) अ और ब दोनों सही हैं | (ब) पृष्ठ 6 पर लगभग इन्हीं शब्दों में है: सत्ता का बँटवारा ठीक है, क्योंकि इससे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव का अंदेशा कम हो जाता है। (अ) पृष्ठ 6 के दोनों तर्कों से निकलता है: युक्तिपरक तर्क लाभकर परिणाम बताता है, और नैतिक तर्क साझेदारी को लोकतंत्र की आत्मा कहता है। |
प्रश्न 6 में छपाई की उलझन: किताब में कथनों की सूची में (घ) दो बार छपा है। दूसरा (घ), “अस्थिरता और आपसी फूट को बढ़ाती है”, असल में (ङ) है; विकल्प (रे) में यही “ङ” लिखा है। प्रश्न हल करवाने से पहले बच्चों को बता दीजिए।
प्रश्न 8 का “(ख) अधिकारों का वितरण”: यहाँ इसका मतलब सरकार के अंगों के बीच शक्तियों का बँटवारा है (अंग्रेज़ी किताब में यहाँ “सेपरेशन ऑफ़ पावर्स”, यानी शक्तियों का अलगाव, लिखा है)। शब्द देखकर बच्चे इसे स्तरों वाला बँटवारा समझ लेते हैं।
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — आठ आम भूलें
1. “बहुमत की बात मानना ही लोकतंत्र है।” किताब इसी सोच को बहुसंख्यकवाद कहती है (पृष्ठ 3) और पृष्ठ 6 पर लिखती है: “बहुसंख्यकों का अत्याचार सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए ही परेशानी पैदा नहीं करता अकसर यह बहुसंख्यकों के लिए भी हानिकारक होता है।” बहुमत से सरकार बनना एक बात है, बहुमत का अपनी इच्छा सब पर थोपना दूसरी।
2. क्षैतिज और उर्ध्वाधर उलझ जाते हैं। हमारी ओर से याद रखने का तरीक़ा: आड़ी रेखा पर अंग, खड़ी रेखा पर स्तर। दोनों चित्र बोर्ड पर बनाइए और फिर पूछिए कि पंचायत किस रेखा पर आएगी।
क्षैतिज: एक ही स्तर पर तीन अंग
उर्ध्वाधर: ऊपर से नीचे सरकार के स्तर
3. प्रश्न 7 का जाल: “थोप सकते थे” को “थोपा” पढ़ लेना। पृष्ठ 3 पर किताब पूछती है कि ऐसी स्थिति में क्या हो सकता था, और कहती है कि डच-भाषी अपनी संख्या के बल पर अपनी इच्छाएँ थोप सकते थे। यह एक संभावना है, घटना नहीं। इसीलिए प्रश्न 7 का कथन (क) ग़लत है।
4. “बेल्जियम अच्छा देश, श्रीलंका बुरा देश।” किताब तुलना लोगों की नहीं, रास्तों की करती है: “दोनों ही देश लोकतांत्रिक हैं। फिर भी सत्ता में साझेदारी के सवाल को उन्होंने अलग-अलग ढंग से निपटाने की कोशिश की।” (पृष्ठ 5) श्रीलंका के कदम भी “लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार” ने उठाए थे (पृष्ठ 3)।
5. युक्तिपरक और नैतिक तर्क आपस में मिल जाते हैं। हमारी ओर से एक घरेलू उदाहरण: घर में मिठाई सबमें बाँटी जाती है। “बाँटिए, नहीं तो झगड़ा होगा” युक्तिपरक तर्क है, क्योंकि यह नतीजा देखता है। “बाँटिए, क्योंकि सबका हक़ है” नैतिक तर्क है, क्योंकि यह सही-ग़लत देखता है। फिर पृष्ठ 6 की दोनों परिभाषाओं से मिलाइए।
6. “बेल्जियम ने चार बार नया संविधान बनाया।” नहीं। 1970 से 1993 के बीच उसी संविधान में चार संशोधन किए गए (पृष्ठ 4)।
7. ओंटेरियो वाले उदाहरण को उर्ध्वाधर मान लेना। “प्रांत” शब्द देखकर बच्चे इसे स्तरों वाला बँटवारा लिख देते हैं। उनसे पूछिए कि दूसरी तरफ़ कौन है: कोई दूसरी सरकार नहीं, एक समुदाय। (चारों उदाहरणों पर हमारे जवाब ऊपर पृष्ठ 10 की गतिविधि वाले हिस्से में हैं; किताब इनके उत्तर नहीं छापती।)
8. दो तथ्य जो उलटे लिखे जाते हैं।
- “श्रीलंका टूट गया।” नहीं। वहाँ गृहयुद्ध हुआ, जिसका 2009 में अंत हुआ (पृष्ठ 4)। दो टुकड़ों वाली बात किताब बेल्जियम के लिए कहती है, वह भी “वरना” के रूप में: गृहयुद्ध होता तो बेल्जियम भाषा के आधार पर दो टुकड़ों में बँट गया होता (पृष्ठ 5)।
- “डच-भाषियों ने ब्रूसेल्स में बराबरी मान ली।” उलटा है: “फ़्रेंच-भाषी लोगों ने ब्रूसेल्स में समान प्रतिनिधित्व के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया क्योंकि डच-भाषी लोगों ने केंद्रीय सरकार में बराबरी का प्रतिनिधित्व स्वीकार किया था” (पृष्ठ 4)।
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
ये पंक्तियाँ रटवाने के लिए नहीं हैं। पहले बात समझाइए, फिर उत्तर में यह पंक्ति लिखवाइए; किताब के अपने शब्द उत्तर को सधा हुआ बनाते हैं।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “फ़्रेंच-भाषी लोगों ने ब्रूसेल्स में समान प्रतिनिधित्व के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया क्योंकि डच-भाषी लोगों ने केंद्रीय सरकार में बराबरी का प्रतिनिधित्व स्वीकार किया था” | 4 | बेल्जियम का मॉडल, ब्रूसेल्स |
| “बेल्जियम के नेताओं को लगा कि विभिन्न समुदाय और क्षेत्रों की भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है।” | 5 | दोनों देशों की तुलना; प्रश्न 4 |
| “अगर बहुसंख्यक समुदाय दूसरों पर प्रभुत्व कायम करने और सत्ता में उनको हिस्सेदार न बनाने का फैसला करता है तो इससे देश की एकता ही संकट में पड़ सकती है।” | 5 | श्रीलंका का सबक़ |
| “बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को बाकी सभी पर थोपना तात्कालिक तौर पर लाभकारी लग सकता है पर आगे चलकर यह देश की अखंडता के लिए घातक हो सकता है।” | 6 | युक्तिपरक तर्क |
| “बहुसंख्यकों का अत्याचार सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए ही परेशानी पैदा नहीं करता अकसर यह बहुसंख्यकों के लिए भी हानिकारक होता है।” | 6 | युक्तिपरक तर्क; बहुमत वाली भूल |
| “सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है।” | 6 | नैतिक तर्क; प्रश्न 2 और 3 |
| “वैध सरकार वही है जिसमें अपनी भागीदारी के माध्यम से सभी समूह शासन व्यवस्था से जुड़ते हैं।” | 6 | नैतिक तर्क |
| “लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि जनता ही सारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत है” | 8 | प्रश्न 3 (औसेफ) |
| “कोई भी एक अंग सत्ता का असीमित उपयोग नहीं कर सकता। हर अंग दूसरे पर अंकुश रखता है।” | 8 | क्षैतिज वितरण; प्रश्न 1 |
| “पार्टियों की यह आपसी प्रतिद्वंद्विता ही इस बात को सुनिश्चित कर देती है कि सत्ता एक व्यक्ति या समूह के हाथ में न रहे।” | 9 | दलों के बीच साझेदारी |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
ये सवाल किताब में ही पूछे गए हैं, और कक्षा में भी यही उठते हैं। उत्तर किताब से ही निकालिए।
पृष्ठ 2 — “सत्ता का बँटवारा = सत्ता के टुकड़े करना = देश को कमज़ोर करना। हम इस बात से शुरुआत क्यों कर रहे हैं?” क्योंकि पूरा अध्याय इसी धारणा को परखता है। बेल्जियम ने सत्ता बाँटी और गृहयुद्ध की आशंकाओं पर विराम लगा (पृष्ठ 5); श्रीलंका में बहुमत ने सत्ता नहीं बाँटी और गृहयुद्ध हुआ (पृष्ठ 4)। यह सवाल पहले दिन पूछिए और जवाब अध्याय के अंत में बच्चों से ही निकलवाइए।
पृष्ठ 4 — “बहुसंख्यक समुदाय के शासन में क्या हर्ज है? अगर श्रीलंका में सिंहलियों का राज नहीं होगा तो किसका राज होगा?” बहुमत से सरकार बने, इसमें हर्ज नहीं। हर्ज तब है जब बहुमत अल्पसंख्यकों की ज़रूरतों और इच्छाओं की अवहेलना करे; किताब इसे बहुसंख्यकवाद कहती है (पृष्ठ 3)। श्रीलंका में एक के बाद एक आए ऐसे सरकारी फ़ैसलों ने तमिलों की नाराज़गी बढ़ाई (पृष्ठ 3)। फिर उनकी स्वायत्तता की माँगें लगातार नकारी गईं, दोनों समुदायों का आपसी अविश्वास बड़े टकराव में बदला, और यह टकराव गृहयुद्ध बन गया (पृष्ठ 4)।
पृष्ठ 4 — “भला यह भी कोई समाधान हुआ? मुझे इस बात की खुशी है कि हमारा संविधान ऐसी बातें नहीं कहता कि किस समुदाय से कितने मंत्री होंगे।” किताब ख़ुद मानती है: “आपको बेल्जियम का मॉडल कुछ जटिल लग सकता है। निश्चित रूप से यह जटिल है”, और साथ ही बताती है कि यह व्यवस्था बेहद सफल रही (पृष्ठ 5)। पृष्ठ 9 पर किताब यह भी दिखाती है कि हमारे देश में भी सामाजिक समूहों को हिस्सेदारी दी जाती है, जैसे आरक्षित चुनाव क्षेत्र।
पृष्ठ 5 — ”…सत्ता में हिस्सेदारी से हम ज़्यादा ताकतवर होते हैं। यह बात तो कुछ अजीब लगती है।” पृष्ठ 6 का युक्तिपरक तर्क यही समझाता है: बाँटने से टकराव का अंदेशा घटता है और व्यवस्था स्थिर रहती है। बेल्जियम ने बाँटा और एक रहा; श्रीलंका में बहुमत ने नहीं बाँटा और देश गृहयुद्ध में फँसा।
पृष्ठ 7 — बेताल विक्रम से पूछता है: “अगर आपको लेबनान का कानून फिर से लिखने का अधिकार होता तो आप क्या करते? क्या आप पुरानी व्यवस्था ही चलने देते या आप कुछ नया करते?” किताब कोई एक सही उत्तर नहीं देती। बच्चों से दोनों पक्ष तौलवाइए। पुरानी व्यवस्था रखने के पक्ष में: “बाद में मुसलमान स्पष्ट रूप से बहुमत में आ गए पर दोनों पक्ष अभी भी उस समझौते का आदर करते हुए उसे मान रहे हैं।” बदलने के पक्ष में: खलील राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा वाला लोकप्रिय व्यक्ति है, पर मौजूदा व्यवस्था के रहते वह सबसे बड़े पद पर पहुँच ही नहीं सकता (पृष्ठ 7)। अंक कारणों पर दीजिए, पक्ष पर नहीं।
पृष्ठ 9 — “मेरे स्कूल में हर महीने क्लास मॉनीटर बदल जाता है। क्या आप इसे ही सत्ता की भागीदारी बता रहे हैं?” हमारी ओर से उत्तर (किताब उत्तर नहीं छापती): आधा सही। बारी-बारी से मॉनीटर बदलना कुछ वैसा ही है जैसा किताब दलों के बारे में कहती है, कि लंबे समय में सत्ता “बारी-बारी से अलग-अलग विचारधारा और सामाजिक समूहों वाली पार्टियों के हाथ आती-जाती रहती है” (पृष्ठ 9)। पर उस महीने मॉनीटर पर कोई अंकुश नहीं रखता। साझेदारी में सत्ता एक ही समय पर भी बँटी रहती है, जैसे सरकार के अंगों में, जहाँ “हर अंग दूसरे पर अंकुश रखता है।” (पृष्ठ 8)
सावधानी
गृहयुद्ध वाला हिस्सा शांत आवाज़ में पढ़ाइए। तथ्य बोलिए, दृश्य मत खींचिए। किताब बताती है कि दोनों पक्ष के हज़ारों लोग मारे गए, अनेक परिवार शरणार्थी बने, इससे कई गुना ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी चौपट हुई, और देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में काफ़ी परेशानियाँ पैदा हुईं (पृष्ठ 4)। कक्षा में किसी बच्चे के परिवार ने हिंसा या घर छूटना देखा हो सकता है।
कोई पूछे कि श्रीलंका में नौकरियों में प्राथमिकता ग़लत थी तो हमारे यहाँ आरक्षण क्यों? किताब के भीतर रहिए। श्रीलंका में प्राथमिकता बहुसंख्यक सिंहलियों को दी गई, और प्रश्न 7 का कथन (ख) कहता है कि “सरकार की नीतियों ने सिंहली-भाषी बहुसंख्यकों का प्रभुत्व बनाए रखने का प्रयास किया।” (पृष्ठ 3, 11) पृष्ठ 9 पर किताब जिन व्यवस्थाओं की बात करती है, उनका मक़सद है कि “सामाजिक रूप से कमज़ोर समुदाय और महिलाओं को विधायिका और प्रशासन में हिस्सेदारी दी जाए”। आज की राजनीतिक बहस में मत जाइए।
बाक़ी सावधानियाँ (किसी धर्म या समुदाय पर टिप्पणी नहीं, आज की भारतीय राजनीति नहीं, “अच्छा देश, बुरा देश” नहीं, आँकड़ों में उलझना नहीं, समीकरण वाला चार्ट) पाठ योजना के शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ वाले हिस्से में हैं।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- सत्ता बाँटने से देश कमज़ोर नहीं होता: बेल्जियम ने बाँटी और गृहयुद्ध की आशंकाओं पर विराम लगा (पृष्ठ 5); श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद से गृहयुद्ध हुआ (पृष्ठ 3–4)।
- बहुसंख्यकवाद की परिभाषा, किताब के शब्दों में (पृष्ठ 3)।
- बेल्जियम के मॉडल की मुख्य बातें: केंद्र में डच और फ़्रेंच-भाषी मंत्री बराबर; कुछ विशेष क़ानूनों के लिए दोनों भाषा-समूहों के सांसदों का बहुमत ज़रूरी; राज्य सरकारें केंद्र के अधीन नहीं; ब्रूसेल्स में अलग सरकार और बराबर प्रतिनिधित्व; सामुदायिक सरकार (पृष्ठ 4–5)।
- सबक़: भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है (पृष्ठ 5)।
- दो तर्क: युक्तिपरक (टकराव का अंदेशा कम, स्थायित्व) और नैतिक (लोकतंत्र की आत्मा) (पृष्ठ 6)।
- चार रूप: अंगों में (क्षैतिज), स्तरों में (उर्ध्वाधर), सामाजिक समूहों में, और दलों, दबाव-समूहों और आंदोलनों में (पृष्ठ 8–9)।
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड।