Chapter 1सत्ता की साझेदारी

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NCERT, लोकतांत्रिक राजनीति (कक्षा 10), अध्याय 1

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कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · बाहर की बातें जाँचीं — 7 अक्टूबर 2026

यह पन्ना किसलिए — किताब की दोनों कहानियाँ जहाँ रुकती हैं, उसके आगे क्या हुआ, यह कक्षा को बताने के लिए: श्रीलंका 2009 के बाद, बेल्जियम आज, और अपने देश में, ख़ास तौर पर राजस्थान में, सत्ता का बँटवारा। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर आज क्या है (स्रोत और तारीख़ के साथ), और फिर इसे कक्षा में कैसे उठाएँ।

परीक्षा में बच्चे किताब वाले आँकड़े और बातें ही लिखें। यहाँ की नई बातें सिर्फ़ यह समझाने के लिए हैं कि आज हाल क्या है। ये बातें 7 अक्टूबर 2026 तक की हैं। नेता, आँकड़े और हालात बदलते रहते हैं, इसलिए पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। बाहर के ज़्यादातर स्रोत अंग्रेज़ी में हैं; उनकी बात यहाँ हिंदी में अपने शब्दों में लिखी है, इसलिए उस पर उद्धरण-चिह्न नहीं हैं। जो बात किसी स्रोत की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है।

इस अध्याय में बात धर्म और भाषा की आती है। कक्षा में चर्चा संस्थाओं, क़ानूनों और नीतियों पर रखिए, किसी समुदाय पर नहीं।

श्रीलंका — 2009 के बाद

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 4 पर श्रीलंका की कहानी इस पंक्ति पर ख़त्म होती है: “2009 में इस गृहयुद्ध का अंत हुआ।” पृष्ठ 9 पर किताब सरकार के स्तरों वाले बँटवारे की बात करती है। वह कहती है कि जिन देशों में ऐसी व्यवस्था है, वहाँ के “संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता का बँटवारा किस तरह होगा।” और फिर: “बेल्जियम में तो यह काम हुआ है पर श्रीलंका में नहीं हुआ है।” (पृष्ठ 9)

आज का श्रीलंका, एक नज़र में

  • आबादी: जनगणना 2024 में 2,17,81,800 लोग गिने गए, यानी करीब 2 करोड़ 18 लाख। किताब (पृ. 2) में: करीब दो करोड़। यह जनगणना हर दस साल पर होती है; पिछली 2012 में हुई थी। कोरोना महामारी और उसके बाद आए आर्थिक संकट की वजह से अगली जनगणना 2024 में हो पाई। स्रोत: जनगणना 2024, श्रीलंका का जनगणना और सांख्यिकी विभाग (अंग्रेज़ी में)
  • समुदाय: जनगणना 2024 में हर व्यक्ति ने अपना जातीय समूह खुद बताया: सिंहली 74.1%, श्रीलंकाई तमिल 12.3%, मूर/मुसलमान 10.5%, हिंदुस्तानी तमिल 2.7%, बाकी 0.3%। किताब (पृ. 2) में: सिंहली 74%, तमिल 18%, जिनमें श्रीलंकाई तमिल 13%। ध्यान दीजिए: किताब के अंग्रेज़ी संस्करण (पृ. 2) में ये आँकड़े सिंहली और तमिल बोलने वालों के हैं, और तमिल-भाषी लोगों में कुछ मुसलमान भी हैं (पृ. 3)। जनगणना ने जातीय समूह गिने हैं और मुसलमानों को अलग समूह माना है। इसलिए दोनों गिनतियों को सीधे मत मिलाइए। स्रोत: जनगणना 2024 (अंग्रेज़ी में)
  • धर्म: जनगणना 2024: बौद्ध 69.8%, हिंदू 12.6%, इस्लाम 10.7%, रोमन कैथोलिक 5.6%, दूसरे ईसाई 1.3%। किताब (पृ. 3) में ईसाई 7% हैं; जनगणना की दोनों ईसाई गिनतियाँ मिलाकर 6.9% बनती हैं। स्रोत: जनगणना 2024 (अंग्रेज़ी में)
  • भाषाएँ: संविधान के अनुच्छेद 18 के अनुसार (संसद का 2021 का संस्करण): सिंहली राजभाषा है, तमिल भी राजभाषा है, और अंग्रेज़ी संपर्क भाषा है। सिंहली और तमिल, दोनों राष्ट्रीय भाषाएँ हैं (अनुच्छेद 19)। किताब (पृ. 3) से मिलाइए: 1956 के कानून ने सिर्फ़ सिंहली को राजभाषा बनाया था। स्रोत: श्रीलंका का संविधान, संसद का 2021 का संस्करण (अंग्रेज़ी में)
  • सरकार का ढाँचा: संविधान के अनुच्छेद 2 के अनुसार श्रीलंका एक एकात्मक राज्य है। (नीचे बेल्जियम के संविधान से मिलाइए: वह अपने देश को संघीय राज्य कहता है।) प्रांतों के लिए प्रांतीय परिषदें हैं, जो चुनाव से बनती हैं (अनुच्छेद 154क)। पर संसद की चुनाव-सूची में प्रांतीय परिषदों के आख़िरी चुनाव 2012 से 2014 के बीच के हैं; उसके बाद का कोई चुनाव वहाँ दर्ज नहीं है। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में); चुनावों की तारीखें, श्रीलंका की संसद (अंग्रेज़ी में)
  • राष्ट्रपति और संसद के चुनाव: 2009 के बाद राष्ट्रपति के चुनाव: 2010, 2015, 2019 और 21 सितंबर 2024। संसद के चुनाव: 2010, 2015, 2020 और 14 नवंबर 2024। स्थानीय निकायों के सबसे हाल के चुनाव: 6 मई 2025। स्रोत: चुनावों की तारीखें, श्रीलंका की संसद (अंग्रेज़ी में)
  • अभी कौन: राष्ट्रपति: अनुरा कुमारा दिसानायके, 23 सितंबर 2024 से (श्रीलंका के नौवें कार्यकारी राष्ट्रपति)। प्रधानमंत्री: डॉ. हरिनी अमरसूर्या। स्रोत: राष्ट्रपति सचिवालय (अंग्रेज़ी में); प्रधानमंत्री कार्यालय (अंग्रेज़ी में)

प्रांतीय परिषदें: संविधान में हैं, चुनाव नहीं

  • श्रीलंका के संविधान में प्रांतीय परिषदों वाला अध्याय (अध्याय 17क) 13वें संशोधन से जोड़ा गया था। यह बात संविधान के उसी अध्याय के फ़ुटनोट में लिखी है। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में)
  • संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की 3 सितंबर 2026 की श्रीलंका रिपोर्ट (दस्तावेज़ संख्या A/HRC/63/18) कहती है कि मई 2025 में स्थानीय निकायों के चुनाव तो हुए, पर 13वें संशोधन वाली प्रांतीय परिषदों के चुनाव 2014 के बाद से अब तक नहीं हुए हैं।
  • 7 अक्टूबर 2026 तक हमें किसी सरकारी स्रोत में इन चुनावों की कोई तय तारीख़ नहीं मिली।
  • भारत का रुख़: 8 सितंबर 2025 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 60वें सत्र में भारत ने कहा कि वह लगातार श्रीलंका के संविधान को पूरी तरह लागू करने, प्रांतीय परिषदों के चुनाव जल्दी कराने और सत्ता के सार्थक हस्तांतरण की बात कहता आया है। भारत का मानना है कि सार्थक हस्तांतरण और सबको साथ लेकर किया गया मेल-मिलाप राष्ट्र-निर्माण और टिकाऊ शांति में मदद करेगा, और इसका फ़ायदा श्रीलंका के सभी समुदायों को होगा। स्रोत: जिनेवा में भारत का स्थायी मिशन, 8 सितंबर 2025 का बयान (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में

सवाल रखिए: गृहयुद्ध 2009 में ख़त्म हो गया। तो क्या समस्या भी ख़त्म हो गई?

उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): लड़ाई रुक जाना और सत्ता बँट जाना दो अलग बातें हैं। संविधान में प्रांतों के लिए चुनी हुई परिषदें हैं, पर 2014 के बाद उनके चुनाव ही नहीं हुए। किताब की पृष्ठ 9 वाली बात, “बेल्जियम में तो यह काम हुआ है पर श्रीलंका में नहीं हुआ है”, इसी से जोड़िए: क़ानून में व्यवस्था लिख देना काफ़ी नहीं, वह चलनी भी चाहिए।

नक्शे के लिए इंटरैक्टिव अध्याय के नक्शे और श्रीलंका की कहानी के लिए इंटरैक्टिव: श्रीलंका खोलिए।

बेल्जियम — आज

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि “1970 और 1993 के बीच उन्होंने अपने संविधान में चार संशोधन सिर्फ़ इस बात के लिए किए कि देश में रहने वाले किसी भी आदमी को बेगानेपन का अहसास न हो और सभी मिल-जुलकर रह सकें।” (पृष्ठ 4) फिर वह ईमानदारी से मानती है: “आपको बेल्जियम का मॉडल कुछ जटिल लग सकता है। निश्चित रूप से यह जटिल है – खुद बेल्जियम में रहने वालों के लिए भी। पर यह व्यवस्था बेहद सफल रही है।” (पृष्ठ 5)

आज का बेल्जियम, एक नज़र में

केंद्र में सरकार बनने में लंबी देर, फिर भी देश चलता रहा

  • 2010–11: 13 जून 2010 के चुनाव के बाद 541 दिन तक नई सरकार नहीं बन पाई। उस बीच एक कार्यवाहक सरकार काम चलाती रही। नई सरकार 6 दिसंबर 2011 को बनी। गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स इसे शांति के समय में सरकार के बिना सबसे लंबे समय का रिकॉर्ड मानता है। स्रोत: गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (अंग्रेज़ी में)
  • उस दौरान स्कूल और अस्पताल: मई 2011 में ब्रिटेन की पत्रिका प्रॉस्पेक्ट ने लिखा कि बारह महीने की खींचतान के बाद भी बेल्जियम के स्कूल और अस्पताल पहले जैसे ही चल रहे थे, कूड़ा उठ रहा था और लोग अपना काम कर रहे थे। यह एक पत्रिका की रिपोर्ट है, सरकारी स्रोत नहीं। स्रोत: प्रॉस्पेक्ट, 25 मई 2011 (अंग्रेज़ी में)
  • 2018–20: एक बड़ा फ़्लेमिश दल (एन-वीए) दिसंबर 2018 तक केंद्र की सरकार में था। मई 2019 के चुनाव के बाद नई सरकार नहीं बनी, और 2020 की शुरुआत में भी केंद्र में कार्यवाहक सरकार ही थी। कार्यवाहक सरकार के नियमों में किसी बड़े नीति-क्षेत्र में नई पहल नहीं हो सकती थी। मार्च 2020 में कोरोना महामारी आई। 17 मार्च 2020 को सोफ़ी विल्मेस के नेतृत्व में एक अल्पमत सरकार ने शपथ ली। यह अस्थायी सरकार थी, पर इसके पास पूरे अधिकार थे, और 26 मार्च से महामारी के लिए ख़ास अधिकार भी मिले। प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि बाकी कामों में वे कार्यवाहक सरकार की तरह ही चलेंगी, और वादे के मुताबिक़ 17 सितंबर 2020 से यह फिर कार्यवाहक सरकार बन गई। नियमित नई सरकार 1 अक्टूबर 2020 को बनी, यानी मई 2019 के चुनाव के सोलह महीने बाद। स्रोत: यूरोपियन जर्नल ऑफ़ पॉलिटिकल रिसर्च, पॉलिटिकल डेटा ईयरबुक 2020, बेल्जियम (अंग्रेज़ी में)
  • संकट के बाद और बँटवारा: 2010–11 की लंबी बातचीत के बीच, अक्टूबर 2011 में दलों में राज्य के छठे सुधार पर समझौता हुआ। यह 6 जनवरी 2014 के विशेष क़ानूनों से क़ानून बना, और मार्च 2014 की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ इसे 1 जुलाई 2014 से लागू होना था। इसमें केंद्र से सबसे बड़े काम समुदायों के पास गए: परिवारों को मिलने वाले भत्ते, और स्वास्थ्य-सेवा व सामाजिक सहायता के कई काम। स्रोत: बेल्जियम की सरकारी ऋण एजेंसी, बेल्जियन प्राइम न्यूज़ अंक 63, मार्च 2014 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में

सवाल रखिए: बेल्जियम में 541 दिन तक केंद्र में नई सरकार नहीं बनी। फिर भी स्कूल चलते रहे। यह कैसे हुआ?

उत्तर की दिशा: किताब पृष्ठ 5 पर सामुदायिक सरकार के बारे में बताती है: “इस सरकार को संस्कृति, शिक्षा और भाषा जैसे मसलों पर फैसले लेने का अधिकार है।” यानी स्कूलों के ज़्यादातर फ़ैसले केंद्र के हाथ में थे ही नहीं। बेल्जियम का संविधान (अनुच्छेद 127) शिक्षा के क़ानून बनाने का काम समुदायों की संसदों को देता है; केंद्र के पास कुछ ही बातें रहती हैं, जैसे अनिवार्य पढ़ाई कब शुरू हो और कब ख़त्म, और डिप्लोमा देने के न्यूनतम मानक। स्रोत: बेल्जियम का संविधान (अंग्रेज़ी में)

निचोड़ (हमारी ओर से): सारी सत्ता एक जगह नहीं थी, इसलिए एक जगह अटकने से सब नहीं रुका।

फिर पहले दिन वाला समीकरण याद कराइए: “मेरे दिमाग में सीधा सा समीकरण यह है कि सत्ता का बँटवारा = सत्ता के टुकड़े करना = देश को कमज़ोर करना।” (पृष्ठ 2) पूछिए: बेल्जियम की यह घटना इस समीकरण के पक्ष में जाती है या विरोध में?

साथ में यह भी बताइए (हमारी ओर से): किताब ख़ुद कहती है कि यह व्यवस्था जटिल है। इतनी लंबी देर उसी जटिलता की क़ीमत है। इसलिए बच्चों से यह फ़र्क़ करवाइए: कोई व्यवस्था सफल हो, तो ज़रूरी नहीं कि वह आसान भी हो।

बेल्जियम की कहानी के लिए इंटरैक्टिव: बेल्जियम खोलिए।

राजस्थान — पंचायती राज की शुरुआत

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 9 पर किताब कहती है: “नगरपालिका और पंचायतें ऐसी ही इकाइयाँ हैं। उच्चतर और निम्नतर स्तर की सरकारों के बीच सत्ता के ऐसे बँटवारे को उर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है।” और आगे: “हम अगले अध्याय में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।” (पृष्ठ 9) अध्याय में राजस्थान का नाम नहीं है।

नागौर, 2 अक्टूबर 1959

1993: पंचायतें संविधान में

प्रश्नावली का प्रश्न 5 (पृष्ठ 11)

प्रश्न कहता है: “नीचे दिए गए उद्धरण को गौर से पढ़ें और इसमें सत्ता की साझेदारी के जो युक्तिपरक कारण बताए गए हैं उसमें से किसी एक का चुनाव करें।” उद्धरण शुरू होता है: “महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने और अपने संविधान निर्माताओं की उम्मीदों को पूरा करने के लिए हमें पंचायतों को अधिकार देने की ज़रूरत है। पंचायती राज ही वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना करता है। …” (पृष्ठ 11)

यहाँ बच्चे गांधी जी के सपने वाली पंक्ति चुन सकते हैं। पर प्रश्न युक्तिपरक कारण माँगता है, यानी कोई लाभकर नतीजा, जैसे भ्रष्टाचार कम होना और प्रशासन का कुशल होना। गांधी जी का सपना और “वास्तविक लोकतंत्र” नैतिक तर्क के क़रीब हैं। पूरी कुंजी संदर्शिका में है: 1 से 5 तक के प्रश्न, उत्तर के मुख्य बिंदु।

उत्तर पक्का हो जाने के बाद नागौर से जोड़िए (हमारी ओर से): पंचायतों को अधिकार देने का जो विचार इस उद्धरण में है, उसे तीन-स्तरीय पंचायती राज के रूप में देश में सबसे पहले 1959 में राजस्थान ने लागू किया।

अगला अध्याय

सरकार के स्तरों वाला बँटवारा, और 1992 का संशोधन, संघवाद में विस्तार से आते हैं। यहाँ नागौर की कहानी से बस जोड़ बना दीजिए; विस्तार वहीं कीजिए।

भारत में सत्ता की साझेदारी के चारों रूप

किताब (पृष्ठ 8–9) चारों रूप समझाती है। अपने देश में ये कहाँ दिखते हैं, इसकी सूची नीचे है। जहाँ किताब ख़ुद भारत का उदाहरण देती है, वहाँ उसकी पंक्ति है; बाकी के लिए संविधान का हवाला है।

  • सरकार के अंगों के बीच (क्षैतिज वितरण): किताब कहती है कि हमारे देश में “कार्यपालिका सत्ता का उपयोग करती ज़रूर है पर यह संसद के अधीन कार्य करती है; न्यायपालिका की नियुक्ति कार्यपालिका करती है पर न्यायपालिका ही कार्यपालिका पर और विधायिका द्वारा बनाए कानूनों पर अंकुश रखती है” (पृष्ठ 8)।
  • सरकार के स्तरों के बीच (उर्ध्वाधर वितरण): केंद्र, राज्य, और उनके नीचे पंचायतें और नगरपालिकाएँ। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं: संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। पंचायतें संविधान के भाग 9 में और नगरपालिकाएँ भाग 9क में हैं। राजस्थान में पंचायतों के तीन स्तर हैं: ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और ज़िला परिषद। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में); राजस्थान का तीसरा राज्य वित्त आयोग, रिपोर्ट, फ़रवरी 2008 (अंग्रेज़ी में)
  • सामाजिक समूहों के बीच: किताब कहती है: “पिछले साल हमने अपने देश में प्रचलित आरक्षित चुनाव क्षेत्र वाली ऐसी ही व्यवस्था के बारे में पढ़ा था।” (पृष्ठ 9) संविधान में लोकसभा (अनुच्छेद 330) और राज्यों की विधानसभाओं (अनुच्छेद 332) में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं। पंचायतों में इन वर्गों के साथ महिलाओं के लिए भी सीटें आरक्षित हैं (अनुच्छेद 243घ)। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में)
  • दलों, दबाव-समूहों और आंदोलनों के बीच: किताब कहती है कि लोकतंत्र में हम “व्यापारी, उद्योगपति, किसान और औद्योगिक मज़दूर जैसे कई संगठित हित-समूहों” को भी सक्रिय देखते हैं (पृष्ठ 9)। साथ में गठबंधन सरकारें, जब दो या ज़्यादा दल मिलकर सरकार बनाते हैं।

राजस्थान में आज: चारों रूप

किताब के चारों रूप (पृष्ठ 8–9) अपने राज्य में कहाँ दिखते हैं, यह नीचे है। पहले बच्चों से ख़ुद उदाहरण निकलवाइए, फिर ये बातें जोड़िए। सब बातें 7 अक्टूबर 2026 को स्रोतों पर पढ़ी गईं; जहाँ स्रोत पुराना है, उसकी तारीख़ साथ लिखी है।

सरकार के अंगों के बीच

  • विधानसभा: राजस्थान विधानसभा में 200 सीटें हैं। स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग, राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 (अंग्रेज़ी में)
  • एक ही सदन: संविधान का अनुच्छेद 168 उन राज्यों के नाम गिनाता है जिनके विधानमंडल में दो सदन हैं; बाकी राज्यों में एक ही सदन है। राजस्थान उस सूची में नहीं है। राजस्थान में विधान परिषद बनाने का विधेयक 6 अगस्त 2013 को राज्यसभा में रखा गया था, पर 11 नवंबर 2025 तक के संविधान-पाठ में भी राजस्थान दो सदनों वाले राज्यों में नहीं है। विधेयक रखा जाना और क़ानून बनना अलग बातें हैं, यह बच्चों को यहीं दिखाइए। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में); राज्यसभा की कार्यवाही, 6 अगस्त 2013 (अंग्रेज़ी में)
  • कार्यपालिका: मुख्यमंत्री को राज्यपाल नियुक्त करते हैं, और बाकी मंत्रियों को मुख्यमंत्री की सलाह पर। मंत्रिपरिषद मिलकर विधानसभा के प्रति ज़िम्मेदार है (अनुच्छेद 164)। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में)
  • न्यायपालिका: राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्य पीठ 1 नवंबर 1956 से जोधपुर में है। जयपुर में उसकी स्थायी पीठ 8 दिसंबर 1976 के एक आदेश से बनी। स्रोत: राजस्थान हाईकोर्ट, इतिहास (अंग्रेज़ी में)
  • कक्षा में (हमारी ओर से): पृष्ठ 8 वाली किताब की बात, कि कार्यपालिका संसद के अधीन काम करती है और न्यायपालिका दोनों पर अंकुश रखती है, राज्य पर भी लगाइए। राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के नाम यहाँ जान-बूझकर नहीं दिए हैं, क्योंकि ये बदलते रहते हैं। बच्चों से पूछिए कि आज कौन हैं, और हर एक का काम क्या है।

सरकार के स्तरों के बीच

  • पंचायती राज के तीन स्तर: राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार राजस्थान में 41 ज़िला परिषदें, 457 पंचायत समितियाँ और 14,403 ग्राम पंचायतें हैं। शहरों में 309 नगरीय निकाय हैं। स्रोत: राज्य निर्वाचन आयोग, राजस्थान, हमारे बारे में (अंग्रेज़ी में)
  • चुनाव कौन कराता है: पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है (अनुच्छेद 243ट और 243यक)। राजस्थान का आयोग जुलाई 1994 में बना। हर पंचायत का कार्यकाल, बीच में भंग न हो तो, पाँच साल का है, और नई पंचायत का चुनाव पुरानी का कार्यकाल ख़त्म होने से पहले पूरा हो जाना चाहिए (अनुच्छेद 243ङ)। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में); राज्य निर्वाचन आयोग, राजस्थान (अंग्रेज़ी में)
  • 7 अक्टूबर 2026 का हाल: नगरीय निकायों के 2026 के आम चुनाव हो चुके हैं, और उनके नतीजे आयोग की वेबसाइट पर हैं। पंचायतों के 2026 के आम चुनाव अभी होने हैं। आयोग के 6 अक्टूबर 2026 के आदेश के अनुसार पहले तीन चरणों का मतदान 22 अक्टूबर से 5 नवंबर 2026 के बीच है, और कुछ पंचायत समितियों के लिए चौथा चरण भी है। यह आदेश 3 अक्टूबर की समय-सारणी को बदलकर आया है, इसलिए कक्षा से पहले आयोग की वेबसाइट पर ताज़ा तारीख़ें देख लीजिए। स्रोत: राज्य निर्वाचन आयोग, राजस्थान; आयोग का आदेश, 6 अक्टूबर 2026
  • कक्षा में: यह किताब का उर्ध्वाधर वितरण है, जो अक्टूबर–नवंबर 2026 में बच्चों के सामने घट रहा है। पूछिए: आपकी ग्राम पंचायत या वार्ड का पिछला चुनाव कब हुआ था? इस बार किन पदों के लिए वोट पड़ेंगे: पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, ज़िला परिषद सदस्य? चर्चा उम्मीदवारों और दलों पर नहीं, पदों और उनके कामों पर रखिए।

सामाजिक समूहों के बीच

  • आरक्षित सीटें: विधानसभा की 200 सीटों में से 34 अनुसूचित जातियों और 25 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। लोकसभा में राजस्थान की 25 सीटों में से 4 अनुसूचित जातियों और 3 अनुसूचित जनजातियों के लिए हैं। पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण की बात ऊपर 1993 वाले हिस्से में है। स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग, विधानसभा चुनाव 2023 (अंग्रेज़ी में); भारत निर्वाचन आयोग, एटलस 2024, पृष्ठ 33 (अंग्रेज़ी में)
  • अनुसूचित क्षेत्र: संविधान की पाँचवीं अनुसूची के तहत दक्षिण राजस्थान के 5,697 गाँव अनुसूचित क्षेत्र हैं। ये वे गाँव हैं जिनमें जनजातीय आबादी 50% से ज़्यादा है, और इनकी अधिसूचना 19 मई 2018 को जारी हुई। केंद्रीय मंत्रिमंडल के अप्रैल 2018 के फ़ैसले के अनुसार इसमें बाँसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ ज़िले पूरे आते हैं; उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, पाली और सिरोही ज़िलों के कुछ हिस्से भी आते हैं। ये ज़िलों के 2018 वाले नाम हैं; उसके बाद राज्य में कुछ नए ज़िले बने हैं। स्रोत: लोक भवन, राजस्थान, अनुसूचित क्षेत्र (अंग्रेज़ी में); पीआईबी, 25 अप्रैल 2018, जनजातीय कार्य मंत्रालय की वेबसाइट पर (अंग्रेज़ी में)
  • अनुसूचित क्षेत्रों की पंचायतें: इन इलाक़ों की पंचायतों के लिए राजस्थान ने 2011 में अलग नियम बनाए। उनमें ग्राम सभा, यानी गाँव की मतदाता-सूची में दर्ज सब लोग, कुछ शर्तों के साथ अपने इलाक़े की लघु वनोपज की मालिक है (नियम 25)। सरकार किसी क़ानून के तहत ज़मीन लेना चाहे, तो उसे पहले ग्राम सभा को लिखित जानकारी देनी होती है, और ग्राम सभा अपनी सिफ़ारिश देती है। सरकार उस सिफ़ारिश से असहमत हो, तो मामला दोबारा ग्राम सभा के पास जाता है, और उसके बाद भी असहमत रहने पर सरकार को कारण लिखने पड़ते हैं (नियम 18)। स्रोत: अनुसूचित क्षेत्रों के लिए राजस्थान पंचायती राज नियम, 2011, पंचायती राज मंत्रालय की वेबसाइट पर (अंग्रेज़ी में)
  • जनजाति सलाहकार परिषद: केंद्र सरकार ने 6 दिसंबर 2021 को लोकसभा में बताया था कि राजस्थान उन राज्यों में है जहाँ पाँचवीं अनुसूची के तहत जनजाति सलाहकार परिषद बनी है। स्रोत: पीआईबी, 6 दिसंबर 2021 (अंग्रेज़ी में)
  • कक्षा में (हमारी ओर से): किताब बेल्जियम के समुदायों को अपने मामलों पर फ़ैसले का हक़ देने की बात करती है। अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभा उसी विचार का एक छोटा, अपने राज्य का रूप है। पर यह बात साफ़ रखिए कि ज़मीन के मामले में ग्राम सभा सिफ़ारिश करती है, आख़िरी फ़ैसला उसके हाथ में नहीं है।

दबाव-समूहों और आंदोलनों के बीच: सूचना का अधिकार

  • मज़दूर किसान शक्ति संगठन: संगठन के अपने परिचय के अनुसार यह 1990 में राजस्थान के देवडूंगरी गाँव में बना। 1994 में इसने पहली जन सुनवाई की, जिसमें सरकारी कामों के रिकॉर्ड गाँव वालों के सामने पढ़कर सुनाए गए। 1996 में राज्य-भर में सूचना के अधिकार के लिए आंदोलन हुआ। संगठन के अनुसार जानने के हक़ को जीने के हक़ से जोड़ने वाला नारा ब्यावर के चांग गेट से निकला। स्रोत: संगठन की अपनी वेबसाइट, mkssindia.org (वेबसाइट का सुरक्षा-प्रमाणपत्र पुराना है, इसलिए लिंक नहीं दिया)
  • क़ानून: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का अधिनियम संख्या 22) को 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। स्रोत: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (अंग्रेज़ी में)
  • जन सूचना पोर्टल: राजस्थान सरकार का यह पोर्टल वार्ड और पंचायत में चल रही सरकारी योजनाओं की जानकारी एक जगह देता है। पोर्टल की अपनी पुस्तिका कहती है कि यह सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 4(2) को लागू करता है, यानी जानकारी माँगे बिना ख़ुद सामने रखना। स्रोत: जन सूचना पोर्टल; पोर्टल की पुस्तिका (अंग्रेज़ी में)
  • कक्षा में (हमारी ओर से): किताब का चौथा रूप यही है: सत्ता सिर्फ़ चुनी हुई सरकार के पास नहीं रहती; संगठित लोग भी फ़ैसलों पर असर डालते हैं। यहाँ गाँव के रिकॉर्ड देखने की माँग से राज्य-भर का आंदोलन बना, और संगठन 2005 के क़ानून में अपने अभियानों का बड़ा हाथ मानता है। कक्षा में पोर्टल खोलकर अपनी पंचायत की किसी योजना की जानकारी दिखाइए।

भाषा: श्रीलंका से तुलना

  • किताब में: “1956 में एक कानून बनाया गया जिसके तहत तमिल को दरकिनार करके सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया गया।” (पृष्ठ 3)
  • अपने संविधान में: अनुच्छेद 345 के अनुसार राज्य का विधानमंडल क़ानून बनाकर राज्य में बोली जाने वाली एक या ज़्यादा भाषाएँ, या हिंदी, राज्य के सरकारी कामों के लिए अपना सकता है। आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं; राजस्थानी उनमें नहीं है। स्रोत: संविधान (अंग्रेज़ी में)
  • राजस्थानी की माँग: गृह मंत्रालय ने 11 फ़रवरी 2025 को लोकसभा में बताया कि राजस्थानी समेत कई भाषाओं को आठवीं अनुसूची में जोड़ने की माँगें समय-समय पर आती रही हैं, पर किसी भाषा को जोड़ने का कोई तय पैमाना नहीं है। स्रोत: गृह मंत्रालय, लोकसभा तारांकित प्रश्न 118, 11 फ़रवरी 2025 (अंग्रेज़ी में)
  • कक्षा में (हमारी ओर से): पूछिए कि श्रीलंका के 1956 के क़ानून और हमारे संविधान के रास्ते में सत्ता की साझेदारी के हिसाब से क्या फ़र्क़ है। एक में बहुमत की भाषा क़ानून से सब पर लागू हुई; दूसरे में भाषा के फ़ैसले विधानमंडल और संविधान की प्रक्रिया से होते हैं, और माँगें उसी रास्ते से उठती हैं। चर्चा संस्थाओं और क़ानूनों पर रखिए; किसी भाषा या उसे बोलने वालों को ऊँचा-नीचा मत ठहराइए।

गृहकार्य दीजिए: चारों रूपों का एक-एक उदाहरण अपने ज़िले या राज्य से ढूँढ़कर लाइए। ऊपर के उदाहरणों के अलावा कोई नया उदाहरण लाएँ, तो और अच्छा।

दूसरे अध्यायों से जोड़

  • राजनीति विज्ञान, अध्याय 2 — संघवाद: सरकार के स्तरों वाला बँटवारा यहीं खुलता है।
  • राजनीति विज्ञान, अध्याय 3 — जाति, धर्म और लैंगिक मसले: सामाजिक समूहों वाला रूप, और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण, यहाँ आगे बढ़ते हैं।
  • अर्थशास्त्र, अध्याय 5 — उपभोक्ता अधिकार: यह अध्याय साल में बाद में आता है। वहाँ पहुँचकर श्रीलंका को याद कीजिए (हमारी ओर से): अधिकार या संस्था क़ानून में लिखी होना एक बात है, उसका सचमुच चलना दूसरी।

कक्षा के लिए पाँच सवाल (सोचने के, परीक्षा के नहीं)

  1. बेल्जियम में 2010–11 में 541 दिन तक केंद्र में नई सरकार नहीं बनी, पर कार्यवाहक सरकार काम चलाती रही और स्कूल चलते रहे। अपने देश में ऐसा हो, तो किन कामों पर असर पड़ेगा और किन पर नहीं?
  2. श्रीलंका में गृहयुद्ध 2009 में ख़त्म हुआ, पर प्रांतीय परिषदों के चुनाव 2014 के बाद नहीं हुए। क्या लड़ाई रुक जाने से सत्ता बँट गई?
  3. आपके गाँव की पंचायत या शहर के वार्ड पार्षद किन बातों पर फ़ैसला करते हैं? घर पर पूछकर आइए।
  4. किताब (पृष्ठ 9) आरक्षित चुनाव क्षेत्रों को सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी का उदाहरण मानती है। आपकी ग्राम पंचायत या नगरपालिका में कौन-कौन सी सीटें आरक्षित हैं, और इससे पंचायत तक किन लोगों की आवाज़ पहुँचती है?
  5. किताब का अपना सवाल: “मेरे स्कूल में हर महीने क्लास मॉनीटर बदल जाता है। क्या आप इसे ही सत्ता की भागीदारी बता रहे हैं?” (पृष्ठ 9) और अगर मॉनीटर के पास कोई अधिकार ही न हो, तो?

अंत में

(हमारी ओर से) किताब में श्रीलंका की कहानी 2009 पर रुकती है, और बेल्जियम की कहानी 1993 तक के संविधान-संशोधनों पर। आज श्रीलंका में लड़ाई तो रुकी है, पर प्रांतों के साथ सत्ता का बँटवारा अब भी अधूरा है; और बेल्जियम में व्यवस्था जटिल है, पर लंबे संकटों में भी देश चलता रहा। ये बातें किताब की बात को कमज़ोर नहीं करतीं, उसे और साफ़ करती हैं। अध्याय का अंत किताब के इसी वाक्य पर कीजिए: “सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है।” (पृष्ठ 6)

जाँच की तिथि — 7 अक्टूबर 2026। बाहर की हर बात ऊपर दिए स्रोत पर इसी दिन पढ़ी गई।