अध्याय 1सत्ता की साझेदारी

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NCERT, लोकतांत्रिक राजनीति (कक्षा 10), अध्याय 1

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अध्याय 1 — सत्ता की साझेदारी · लोकतांत्रिक राजनीति · कक्षा 10

कक्षा — 10 · विषय — राजनीति विज्ञान (लोकतांत्रिक राजनीति) · पृष्ठ — 1 से 12

यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के नीचे एक हैं। उद्धरण-चिह्नों के भीतर सिर्फ़ किताब के शब्द हैं, और स्लाइड के ऊपर किताब का पृष्ठ लिखा है। जो बात हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है।

बच्चों की आम भूलें और दोनों देशों के आँकड़े शिक्षक संदर्शिका में हैं। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।

कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:

  • कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर दो देश, दो समस्याएँ
  • कालांश 2 — श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद
  • कालांश 3 — बेल्जियम की समझदारी
  • कालांश 4 — दोनों से क्या सीखा (एनिते और सेलवी वाली गतिविधि समेत)
  • कालांश 5 — साझेदारी क्यों ज़रूरी है
  • कालांश 6 — खलील की उलझन
  • कालांश 7 — साझेदारी के चार रूप (पृष्ठ 10 की गतिविधि समेत)
  • कालांश 8 — दोहराइए, फिर किताब की प्रश्नावली

पहले यह पढ़िए — किताब में एक सवाल

पृष्ठ 2

=

“मेरे दिमाग में सीधा सा समीकरण यह है कि सत्ता का बँटवारा = सत्ता के टुकड़े करना = देश को कमज़ोर करना। हम इस बात से शुरुआत क्यों कर रहे हैं?”

हमारी ओर से: पूरा अध्याय इसी समीकरण की जाँच करता है।

क्या यह समीकरण सही है? हाथ उठाइए — और यह गिनती याद रखिए।

अध्याय का नक्शा

किताब का परिचय, पृष्ठ 1

  • यह अध्याय: सत्ता का बँटवारा क्यों ज़रूरी है, और वह किन-किन रूपों में होता है
  • “पहले तीन अध्यायों में हम सत्ता के बँटवारे पर सोच-विचार को आगे बढ़ाएँगे।”
  • “इससे हम सत्ता के बँटवारे के उन रूपों पर बातचीत कर सकेंगे जिनकी चर्चा अगले दो अध्यायों में की गई है।”

शुरुआत दो देशों की कहानी से: बेल्जियम और श्रीलंका।

1 | दो देश, दो समस्याएँ

बेल्जियम — पहचान

पृष्ठ 2

तथ्यविवरण
कहाँयूरोप का छोटा-सा देश — “क्षेत्रफल में हमारे हरियाणा राज्य से भी छोटा”
सीमाएँफ़्रांस, नीदरलैंड, जर्मनी और लक्ज़मबर्ग
आबादीएक करोड़ से थोड़ी अधिक — हरियाणा की आबादी से क़रीब आधी
बनावट“इस छोटे से देश के समाज की जातीय बुनावट बहुत जटिल है”

बेल्जियम में कौन कितना

पृष्ठ 2

पूरे देश में

  • फ्लेमिश इलाक़ा: 59% — डच बोलते हैं
  • वेलोनिया क्षेत्र: 40% — फ़्रेंच बोलते हैं
  • बाक़ी 1% — जर्मन बोलते हैं

राजधानी ब्रूसेल्स में

  • 80% — फ़्रेंच बोलते हैं
  • 20% — डच बोलते हैं
  • यानी देश में 59% डच-भाषी, पर राजधानी में सिर्फ़ 20%

और यहीं असली उलझन है

पृष्ठ 2

⚖

“अल्पसंख्यक फ़्रेंच-भाषी लोग तुलनात्मक रूप से ज़्यादा समृद्ध और ताक़तवर रहे हैं। बहुत बाद में जाकर आर्थिक विकास और शिक्षा का लाभ पाने वाले डच-भाषी लोगों को इस स्थिति से नाराज़गी थी।”

“डच बोलने वाले लोग संख्या के हिसाब से अपेक्षाकृत ज़्यादा थे लेकिन धन और समृद्धि के मामले में कमज़ोर और अल्पमत में थे।” तनाव 1950 और 1960 के दशक में बढ़ा; “इन दोनों समुदायों के टकराव का सबसे तीखा रूप ब्रूसेल्स में दिखा।”

डच बोलने वालों के पास गिनती की ताक़त, फ़्रेंच बोलने वालों के पास पैसे की ताक़त। किसे ज़्यादा हक़ मिलना चाहिए?

श्रीलंका — पहचान

पृष्ठ 2–3

तथ्यविवरण
कहाँद्वीपीय देश — “तमिलनाडु के दक्षिणी तट से कुछ किलोमीटर” की दूरी पर
आबादीक़रीब दो करोड़ — हरियाणा की आबादी के बराबर
सिंहली74 फ़ीसदी — “सबसे प्रमुख सामाजिक समूह”
तमिल18 फ़ीसदी — इनमें 13 फ़ीसदी श्रीलंकाई मूल के तमिल, बाक़ी हिंदुस्तानी तमिल
हिंदुस्तानी तमिल“औपनिवेशिक शासनकाल में बागानों में काम करने के लिए भारत से लाए गए” लोगों की संतान
ईसाई7 फ़ीसदी — सिंहली और तमिल, दोनों भाषाएँ बोलते हैं

किताब का सवाल: ऐसे में क्या हो सकता था?

“बेल्जियम में डच-भाषी लोग अपनी बड़ी संख्या के बल पर फ़्रेंच-भाषी और जर्मन-भाषी लोगों पर अपनी इच्छाएँ थोप सकते थे। इससे उनके बीच की लड़ाई और बढ़ जाती।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 3 — फिर किताब पूछती है कि दोनों देशों में असल में क्या हुआ।

2 | श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद

पहले परिभाषा

पृष्ठ 3, हाशिये पर

①

बहुसंख्यकवाद — “यह मान्यता कि अगर कोई समुदाय बहुसंख्यक है तो वह अपने मनचाहे ढंग से देश का शासन कर सकता है और इसके लिए वह अल्पसंख्यक समुदाय की ज़रूरत या इच्छाओं की अवहेलना कर सकता है।”

श्रीलंका में क्या हुआ

पृष्ठ 3–4 · सरकारी क़दमों में किताब सिर्फ़ 1956 के क़ानून की तारीख़ देती है; बाक़ी दो बिना तारीख़ के हैं

  1. 1948श्रीलंका स्वतंत्र राष्ट्र बना; इसके बाद सिंहली नेताओं ने बहुसंख्या के बल पर शासन पर प्रभुत्व जमाना चाहा
  2. 1956क़ानून बना: तमिल को दरकिनार करके सिंहली एकमात्र राजभाषा
  3. और भीविश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में सिंहलियों को प्राथमिकता देने की नीति
  4. नए संविधान मेंसरकार बौद्ध मत को संरक्षण और बढ़ावा देगी
  5. 1980 के दशक तकस्वतंत्र तमिल ईलम की माँग करते हुए अनेक राजनीतिक संगठन बने
  6. 2009गृहयुद्ध का अंत

किताब कहती है, यह सरकार “लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित” थी। फिर भी उसने जो किया, वह ग़लत क्यों था?

जवाब की ओर पहला क़दम

!

हमारी ओर से: लोकतंत्र सिर्फ़ गिनती का नाम नहीं है। बहुमत मिलने का मतलब यह नहीं कि बाक़ी लोगों की इच्छाओं को अनदेखा कर दिया जाए।

तमिलों की तीन माँगें

पृष्ठ 4

  • तमिल को राजभाषा बनाना
  • क्षेत्रीय स्वायत्तता हासिल करना
  • शिक्षा और रोज़गार में समान अवसर

“तमिलों की आबादी वाले इलाक़े की स्वायत्तता की उनकी माँगों को लगातार नकारा गया।”

और नतीजा

“श्रीलंका में दो समुदायों के बीच पारस्परिक अविश्वास ने बड़े टकराव का रूप ले लिया। यह टकराव गृहयुद्ध में परिणत हुआ। परिणामस्वरूप दोनों पक्ष के हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं। अनेक परिवार अपने मुल्क से भागकर शरणार्थी बन गए हैं। इससे भी कई गुना ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी चौपट हो गई है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 4

श्रीलंका: एक कदम से दूसरा

पृष्ठ 3–4

सिंहली प्रभुत्व के सरकारी कदमसिंहली एकमात्र राजभाषा · नौकरियों और विश्वविद्यालयों में प्राथमिकता · बौद्ध मत को संरक्षण
तमिलों में नाराज़गी और बेगानापन
1980 के दशक तकस्वतंत्र तमिल ईलम की माँगउत्तर-पूर्वी श्रीलंका में
गृहयुद्धदोनों पक्ष के हज़ारों लोग मारे गए; 2009 में अंत

3 | बेल्जियम की समझदारी

बेल्जियम ने अलग रास्ता चुना

पृष्ठ 4

4

“1970 और 1993 के बीच उन्होंने अपने संविधान में चार संशोधन सिर्फ़ इस बात के लिए किए कि देश में रहने वाले किसी भी आदमी को बेगानेपन का अहसास न हो और सभी मिल-जुलकर रह सकें।”

किताब आगे कहती है: “उन्होंने इसके लिए जो व्यवस्था की वह बहुत ही कल्पनाशील है तथा कोई और देश ऐसा नहीं कर पाया।”

बेल्जियम मॉडल — चार बातें

पृष्ठ 4–5

#व्यवस्था
1केंद्र सरकार में डच और फ़्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान; कुछ विशेष क़ानून तभी बनते हैं जब दोनों भाषा-समूहों के सांसदों का बहुमत साथ हो — “किसी एक समुदाय के लोग एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं कर सकते”
2केंद्र की कई शक्तियाँ देश के दो इलाक़ों की क्षेत्रीय सरकारों को — “राज्य सरकारें केंद्रीय सरकार के अधीन नहीं हैं”
3ब्रूसेल्स में अलग सरकार, जिसमें दोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व
4सामुदायिक सरकार — केंद्र और राज्य के अलावा तीसरे स्तर की सरकार

ब्रूसेल्स का लेन-देन

पृष्ठ 4

⇄

“फ़्रेंच-भाषी लोगों ने ब्रूसेल्स में समान प्रतिनिधित्व के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया क्योंकि डच-भाषी लोगों ने केंद्रीय सरकार में बराबरी का प्रतिनिधित्व स्वीकार किया था।”

हमारी ओर से: दोनों ने कुछ छोड़ा, दोनों को कुछ मिला।

सामुदायिक सरकार — भाषा की सरकार

पृष्ठ 5

3

“इस सरकार का चुनाव एक ही भाषा बोलने वाले लोग करते हैं। डच, फ़्रेंच और जर्मन बोलने वाले समुदायों के लोग चाहे वे जहाँ भी रहते हों, इस सामुदायिक सरकार को चुनते हैं।”

“इस सरकार को संस्कृति, शिक्षा और भाषा जैसे मसलों पर फैसले लेने का अधिकार है।” हमारी ओर से: यह किसी इलाक़े की नहीं, एक भाषा बोलने वालों की सरकार है।

क्या यह मॉडल सफल हुआ?

पृष्ठ 5

किताब मानती है

  • “आपको बेल्जियम का मॉडल कुछ जटिल लग सकता है।”
  • “निश्चित रूप से यह जटिल है – खुद बेल्जियम में रहने वालों के लिए भी।”

पर नतीजा

  • “पर यह व्यवस्था बेहद सफल रही है।”
  • “इससे मुल्क में गृहयुद्ध की आशंकाओं पर विराम लग गया है वरना गृहयुद्ध की स्थिति में बेल्जियम भाषा के आधार पर दो टुकड़ों में बँट गया होता।”
  • “जब अनेक यूरोपीय देशों ने साथ मिलकर यूरोपीय संघ बनाने का फैसला किया तो ब्रूसेल्स को उसका मुख्यालय चुना गया।”

बेल्जियम: टकराव से साझेदारी तक

पृष्ठ 2, 4–5

1950 और 1960 के दशकफ़्रेंच और डच-भाषियों में तनावटकराव का सबसे तीखा रूप ब्रूसेल्स में
1970–1993संविधान में चार संशोधनताकि किसी को बेगानेपन का अहसास न हो
केंद्रडच और फ़्रेंच मंत्री बराबर
क्षेत्रराज्य सरकारें केंद्र के अधीन नहीं
ब्रूसेल्सदोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व
समुदायतीसरे स्तर की सामुदायिक सरकार
व्यवस्था जटिल, पर बेहद सफलगृहयुद्ध की आशंकाओं पर विराम

जिस ब्रूसेल्स में दोनों समुदायों का टकराव सबसे तीखा था, उसी को यूरोपीय संघ का मुख्यालय चुना गया। किताब यह बात बेल्जियम की सफलता के साथ ही क्यों बताती है?

4 | दोनों से क्या सीखा

दो देश, दो रास्ते

पृष्ठ 4–5

दोनों लोकतांत्रिक देश
बेल्जियमसत्ता की साझेदारीनेताओं को लगा कि "विभिन्न समुदाय और क्षेत्रों की भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है"
श्रीलंकाबहुसंख्यकवाद"श्रीलंका में ठीक उलटा रास्ता अपनाया गया"
देश भाषा के आधार पर बँटने से बचाव्यवस्था बेहद सफल रही
गृहयुद्ध2009 में अंत

हमारी ओर से: दोनों लोकतांत्रिक देश हैं। फ़र्क़ चुने गए रास्ते का है।

किताब का निष्कर्ष

पृष्ठ 5

⚡

”…अगर बहुसंख्यक समुदाय दूसरों पर प्रभुत्व कायम करने और सत्ता में उनको हिस्सेदार न बनाने का फैसला करता है तो इससे देश की एकता ही संकट में पड़ सकती है।”

हमारी ओर से: पहले दिन के समीकरण का जवाब यहीं से शुरू होता है — सत्ता न बाँटने से देश की एकता संकट में पड़ सकती है।

गतिविधि: एनिते और सेलवी

पृष्ठ 6

एनिते — बेल्जियम

  • उत्तरी इलाक़े के एक डच माध्यम के स्कूल में पढ़ती है
  • फ़्रेंच बोलने वाले उसके कई साथी चाहते हैं कि पढ़ाई फ़्रेंच में हो

सेलवी — श्रीलंका

  • राजधानी कोलंबो के एक स्कूल में पढ़ती है
  • वह और उसके कई दोस्त तमिल-भाषी हैं; उनके माता-पिता पढ़ाई का माध्यम तमिल रखना चाहते हैं

किताब का सवाल: “कौन-सी सरकार एनिते और सेलवी के माता-पिता की इच्छा पूरी कर सकती है? किसे सफलता मिलने की संभावना अधिक है और क्यों?”

5 | साझेदारी क्यों ज़रूरी है

दो तरह के तर्क

पृष्ठ 6

2

“इस प्रकार सत्ता के बँटवारे के पक्ष में दो तरह के तर्क दिए जा सकते हैं।”

युक्तिपरक — हाशिये पर किताब का अर्थ: “हानि-लाभ का सावधानीपूर्वक हिसाब लगाकर लिया गया फ़ैसला”। नैतिक — मुख्य पाठ में: नैतिक तर्क “सत्ता के बँटवारे के अंतर्भूत महत्व को बताता है”।

युक्तिपरक तर्क — चार बातें

पृष्ठ 6

  • “इससे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव का अंदेशा कम हो जाता है”
  • सामाजिक टकराव आगे बढ़कर अकसर हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का रूप ले लेता है, इसलिए साझेदारी “राजनीतिक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए अच्छा” है
  • बहुमत की इच्छा थोपना “तात्कालिक तौर पर लाभकारी लग सकता है पर आगे चलकर यह देश की अखंडता के लिए घातक हो सकता है”
  • “बहुसंख्यकों का अत्याचार सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के लिए ही परेशानी पैदा नहीं करता अकसर यह बहुसंख्यकों के लिए भी हानिकारक होता है।”

युक्तिपरक तर्क: दो रास्ते, दो नतीजे

पृष्ठ 6

रास्ता 1सत्ता बाँटी गई
रास्ता 2बहुमत की इच्छा सब पर थोपी गई
सामाजिक समूहों में टकराव का अंदेशा घटता है
तात्कालिक तौर पर फ़ायदेमंद लग सकता है
राजनीतिक व्यवस्था स्थिर रहती है
देश की अखंडता के लिए घातक हो सकता हैबहुसंख्यकों का अत्याचार अकसर बहुसंख्यकों को भी नुकसान पहुँचाता है

श्रीलंका के गृहयुद्ध में नुक़सान किसका हुआ — सिर्फ़ तमिलों का? पृष्ठ 4 फिर से देखिए।

नैतिक तर्क — “वह बात कहीं ज़्यादा गहरी है”

पृष्ठ 6

❤

“सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है। लोकतंत्र का मतलब ही होता है कि जो लोग इस शासन-व्यवस्था के अंतर्गत हैं उनके बीच सत्ता को बाँटा जाए और ये लोग इसी ढर्रे से रहें।”

“इसलिए, वैध सरकार वही है जिसमें अपनी भागीदारी के माध्यम से सभी समूह शासन व्यवस्था से जुड़ते हैं।”

दोनों तर्कों का फ़र्क़

पृष्ठ 6

युक्तिपरक तर्क

  • आधार: हानि-लाभ का हिसाब
  • “लाभकर परिणामों पर जोर देता है”
  • हमारी ओर से, एक पंक्ति में: बाँटिए, क्योंकि इससे फ़ायदा है

नैतिक तर्क

  • आधार: सभी समूहों की भागीदारी से ही सरकार वैध
  • “सत्ता के बँटवारे के अंतर्भूत महत्व को बताता है”
  • हमारी ओर से, एक पंक्ति में: बाँटिए, क्योंकि यही सही है

6 | खलील की उलझन

लेबनान का समझौता

पृष्ठ 7 — गृहयुद्ध के बाद

पदकिसके लिए तय
राष्ट्रपतिमैरोनाइट पंथ का कैथोलिक
प्रधानमंत्रीसिर्फ़ सुन्नी मुसलमान
उपप्रधानमंत्रीआर्थोडॉक्स ईसाई
संसद के अध्यक्षशिया मुसलमान

साथ ही: ईसाई फ़्रांस से संरक्षण की माँग नहीं करेंगे; मुसलमान सीरिया से एकीकरण की माँग छोड़ देंगे।

और एक चौंकाने वाली बात

पृष्ठ 7

=

“जब ईसाइयों और मुसलमानों के बीच यह समझौता हुआ था तब दोनों की आबादी लगभग बराबर थी। बाद में मुसलमान स्पष्ट रूप से बहुमत में आ गए पर दोनों पक्ष अभी भी उस समझौते का आदर करते हुए उसे मान रहे हैं।”

सोचिए: बहुमत में आने के बाद भी समझौता क्यों नहीं तोड़ा गया?

खलील बनाम बुज़ुर्ग

पृष्ठ 7

खलील का कहना

  • वह “राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा वाला लोकप्रिय व्यक्ति” है, पर सबसे बड़े पद तक पहुँच ही नहीं सकता
  • वह “न तो माँ के धर्म को मानता है और न ही पिता के”
  • वह पूछता है: सिर्फ़ चुनाव क्यों न हों, और जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिलें वह राष्ट्रपति बने, चाहे किसी भी समुदाय का हो?

बुज़ुर्गों का कहना

  • उन्होंने गृहयुद्ध देखा है
  • “मौजूदा व्यवस्था ही शांति की सबसे अच्छी गारंटी है”
  • हमारी ओर से: यह व्यवस्था आबादी बदलने के बाद भी टिकी हुई है

अगर लेबनान का यह नियम फिर से लिखने का अधिकार आपको मिलता, तो आप क्या करते?

7 | साझेदारी के चार रूप

पहले पुरानी मान्यता

“अगर फ़ैसले लेने की शक्ति बिखर गई तो तुरंत फ़ैसले लेना और उन्हें लागू करना संभव नहीं होगा।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 8 — पुरानी धारणा यह थी कि राजनीतिक सत्ता का बँटवारा नहीं किया जा सकता

किताब का जवाब: “लोकतंत्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि जनता ही सारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत है।” हमारी ओर से: यह पहले दिन के समीकरण से मिलता-जुलता डर है।

चार रूप — याद रखने का एक सूत्र

पृष्ठ 8–9

4

हमारी ओर से: अंग · स्तर · समूह · दल

किताब में: क्षैतिज वितरण · उर्ध्वाधर वितरण · सामाजिक समूहों के बीच · राजनीतिक दलों, दबाव-समूहों और आंदोलनों के बीच

चार रूप एक चित्र में

पृष्ठ 8–9

आधुनिक लोकतंत्र में सत्ता किनके बीच बँटती है?
1 · अंगसरकार के अंगों मेंक्षैतिज वितरण
2 · स्तरसरकार के स्तरों मेंउर्ध्वाधर वितरण
3 · समूहसामाजिक समूहों मेंभाषायी और धार्मिक समूह
4 · दलदलों, दबाव-समूहों और आंदोलनों मेंपार्टियों की होड़ और गठबंधन

रूप 1 — क्षैतिज वितरण (अंग)

पृष्ठ 8

बातविवरण
किनके बीचविधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका
क्षैतिज क्यों“सरकार के विभिन्न अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी-अपनी शक्ति का उपयोग करते हैं”
फ़ायदा“कोई भी एक अंग सत्ता का असीमित उपयोग नहीं कर सकता। हर अंग दूसरे पर अंकुश रखता है।”
उदाहरणकार्यपालिका संसद के अधीन; न्यायपालिका कार्यपालिका और क़ानूनों पर अंकुश रखती है
नाम“नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था”

रूप 2 — उर्ध्वाधर वितरण (स्तर)

पृष्ठ 8–9

बातविवरण
किनके बीचकेंद्र या संघ सरकार और राज्य सरकार; उससे नीचे नगरपालिका और पंचायतें
कहाँ लिखा है“संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता का बँटवारा किस तरह होगा”
किताब का उदाहरण“बेल्जियम में तो यह काम हुआ है पर श्रीलंका में नहीं हुआ है।”

क्षैतिज या उर्ध्वाधर?

पृष्ठ 8–9

क्षैतिज: एक ही स्तर पर तीन अंग

विधायिकासंसदकार्यपालिका इसके अधीन काम करती है
कार्यपालिकासत्ता का उपयोग करती हैन्यायपालिका की नियुक्ति करती है
न्यायपालिकानियुक्ति कार्यपालिका करती हैपर कार्यपालिका और क़ानूनों पर अंकुश यही रखती है

उर्ध्वाधर: ऊपर से नीचे सरकार के स्तर

पूरे देश के लिएसंघ या केंद्र सरकार
प्रांत या क्षेत्र के लिएभारत में राज्य सरकार
स्थानीयनगरपालिका और पंचायतें

हमारी ओर से: आड़ी रेखा पर तीनों अंग बराबर में → क्षैतिज; खड़ी रेखा पर ऊपर केंद्र, नीचे पंचायत → उर्ध्वाधर

रूप 3 — सामाजिक समूहों के बीच

पृष्ठ 9

बातविवरण
किनके बीचभाषायी और धार्मिक समूहों के बीच
उदाहरण 1बेल्जियम की सामुदायिक सरकार
उदाहरण 2कुछ देशों के संविधान और कानून: कमज़ोर समुदायों और महिलाओं को विधायिका और प्रशासन में हिस्सेदारी
उदाहरण 3भारत में आरक्षित चुनाव क्षेत्र, “ऐसी ही व्यवस्था”
उद्देश्यताकि लोग ख़ुद को शासन से अलग न समझें; अल्पसंख्यकों को भी इसी तरीक़े से “सत्ता में उचित हिस्सेदारी” दी जाती है

रूप 4 — राजनीतिक दलों और दबाव-समूहों के बीच

पृष्ठ 9

बातविवरण
कैसे“लोगों के सामने सत्ता के दावेदारों के बीच चुनाव का विकल्प ज़रूर रहना चाहिए”
मुख्य बात“पार्टियों की यह आपसी प्रतिद्वंद्विता ही इस बात को सुनिश्चित कर देती है कि सत्ता एक व्यक्ति या समूह के हाथ में न रहे।”
सीधी साझेदारीदो या अधिक पार्टियाँ मिलकर सरकार बनाती हैं — गठबंधन सरकार
हित-समूहव्यापारी, उद्योगपति, किसान, औद्योगिक मज़दूर — सरकारी समितियों में सीधी भागीदारी से या दबाव बनाकर

गतिविधि: कौन किसके साथ?

पृष्ठ 10 · हर उदाहरण पर दो सवाल: सत्ता कौन किसके साथ बाँट रहा है, और यह चार में से कौन-सा रूप है?

उदाहरणकौन किसके साथ?कौन-सा रूप?
बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि मुंबई के सात अनाथालयों के 2000 बच्चों का रख-रखाव सुधारे??
कनाडा के ओंटेरियो प्रांत की सरकार ने मूलवासी समुदाय के साथ ज़मीन के दावे निपटाने पर सहमति दी??
रूस की दो पार्टियों ने गठबंधन के लिए अपने संगठनों का विलय तय किया??
नाइजीरिया के प्रांतों के वित्तमंत्रियों ने माँग की कि संघीय सरकार अपनी आमदनी के स्रोत बताए??

8 | दोहराइए

पूरा अध्याय एक चित्र में

पृष्ठ 2–6

सत्ता बाँटने से देश कमज़ोर होगा?
श्रीलंकाबहुसंख्यकवादगृहयुद्ध
बेल्जियमसत्ता की साझेदारीव्यवस्था बेहद सफल
बहुसंख्यक सत्ता न बाँटे तो देश की एकता ही संकट में पड़ सकती है
युक्तिपरकटकराव घटता है, व्यवस्था स्थिर रहती है
नैतिकसाझेदारी लोकतंत्र की आत्मा है

चारों रूप एक नज़र में

हमारी ओर से सूत्र: अंग · स्तर · समूह · दल

रूपकिनके बीचउदाहरण
1. क्षैतिजशासन के अंगों के बीचन्यायपालिका का कार्यपालिका पर अंकुश
2. उर्ध्वाधरसरकार के स्तरों के बीचकेंद्र, राज्य, पंचायत
3. सामाजिक समूहभाषायी और धार्मिक समूहों के बीचसामुदायिक सरकार, आरक्षित चुनाव क्षेत्र
4. दल और दबाव-समूहपार्टियों और हित-समूहों के बीचगठबंधन सरकार, किसानों-मज़दूरों के संगठन

और अब पहले दिन वाला समीकरण

पृष्ठ 2 का सवाल, अध्याय के बाद

?

पहले दिन: “सत्ता का बँटवारा = सत्ता के टुकड़े करना = देश को कमज़ोर करना”

हमारी ओर से, अध्याय के बाद: सत्ता का बँटवारा = टकराव कम करना = देश की एकता बचाना

अब फिर हाथ उठवाइए, और पहले दिन की गिनती से मिलाइए।

अध्याय की आख़िरी सीख

“सत्ता की साझेदारी दरअसल लोकतंत्र की आत्मा है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 6