यह अध्याय अपने आप में पूर्ण है। पाठ्यपुस्तक की पूरी विषय-वस्तु यहाँ है, और उसके आगे सत्यापित तथ्य, संवैधानिक विवरण, आँकड़े और तुलनात्मक दृष्टि भी।
स्रोत-चिह्न: 【पाठ】 NCERT · ◆ प्राथमिक स्रोत · ◇ द्वितीयक स्रोत · ➕ व्याख्या
प्रस्तावना · एक ऊँची चरखी
इस अध्याय के पहले पन्ने पर एक कार्टून है। एक रोलर-कोस्टर है जिस पर लिखा है — ‘INDIAN POLITY’। उस पर नौ नेता सवार हैं: राजीव गाँधी, वी.पी. सिंह, एल.के. आडवाणी, चंद्रशेखर, ज्योति बसु, एन.टी. रामाराव, देवीलाल, पी.के. महंत और के. करुणानिधि। उनके हाथों में तख्तियाँ हैं — MANDAL · RATH YATRA · V.P. HATAO — और नीचे आग की लपटें हैं: PRICES और RESERVATION।
पाठ्यपुस्तक का काला बॉक्स कहता है 【पाठ】: “1990 के दशक में विभिन्न राजनीतिक दलों में बड़ी अफ़रा-तफ़री मची। इस कार्टून की ही तरह कइयों को यह सब ऊँची चरखी की सवारी जैसा जान पड़ा।”
और फिर पाठ्यपुस्तक कुछ ऐसा कहती है जो किसी पाठ्यपुस्तक में शायद ही मिले 【पाठ】:
“यह अध्याय इन सवालों के जवाब नहीं देता।… ये सवाल राजनीतिक लिहाज़ से संवेदनशील हैं, लेकिन मात्र इसी कारण से हम इन सवालों को पूछने से बच नहीं सकते। आज़ादी के बाद की भारतीय राजनीति के इतिहास को आखिर पढ़ने का मकसद ही यही है कि हम अपने वर्तमान को समझ सकें।”
★यही इस अध्याय की भावना है — निष्कर्ष थोपना नहीं, सवाल पूछना सिखाना।
अध्याय के चार सवाल 【पाठ】
- गठबंधन की राजनीति के उदय का हमारे लोकतंत्र पर क्या असर पड़ा है?
- मंडलीकरण क्या है? इसने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्वभाव को किन रूपों में बदला है?
- राम जन्मभूमि आंदोलन ने क्या विरासत छोड़ी है?
- नीतिगत मामलों पर एक सर्व-सहमति सी बन गई है — इसका राजनीतिक विकल्पों के चयन पर क्या असर हुआ है?
भाग 1 · 1990 का दशक — पाँच बड़े बदलाव 【पाठ】
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने और 1984 के चुनाव में कांग्रेस को भारी विजय मिली। फिर, पाठ्यपुस्तक के शब्दों में —
“1980 के दशक के आखिर के सालों में देश में ऐसे पाँच बड़े बदलाव आए, जिनका हमारी आगे की राजनीति पर गहरा असर पड़ा।”
बदलाव 1 — 1989 में कांग्रेस की हार
- 1984 में 415 सीटें → 1989 में महज 197 सीटें
- 1991 में मध्यावधि चुनाव; कांग्रेस आँकड़ा सुधारते हुए सत्ता में लौटी
- ★★“1989 में ही उस परिघटना की समाप्ति हो गई थी, जिसे राजनीति विज्ञानी अपनी खास शब्दावली में ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहते हैं।”
- ! पर संतुलन ज़रूरी है: कांग्रेस महत्त्वपूर्ण पार्टी बनी रही और 1989 के बाद भी उसका शासन किसी अन्य पार्टी से ज़्यादा दिनों तक रहा — “लेकिन, दलीय प्रणाली के भीतर जैसी प्रमुखता इसे पहले के दिनों में हासिल थी, वैसी अब न रही।”
बदलाव 2 — ‘मंडल मुद्दे’ का उदय
- 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की नयी सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया
- प्रावधान — केंद्र सरकार की नौकरियों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को आरक्षण
- देश के विभिन्न भागों में मंडल-विरोधी हिंसक प्रदर्शन
- ★समर्थकों और विरोधियों के बीच चले विवाद को ही ‘मंडल मुद्दा’ कहा जाता है
बदलाव 3 — नयी आर्थिक नीति
- नाम — ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम अथवा नए आर्थिक सुधार
- शुरुआत राजीव गाँधी की सरकार के समय; 1991 तक बड़े पैमाने पर प्रकट
- ★“आज़ादी के बाद से अब तक भारतीय अर्थव्यवस्था जिस दिशा में चलती आई थी, वह इन नए आर्थिक सुधारों के कारण मूलगामी अर्थों में बदल गई।”
- नयी नीतियों की विभिन्न आंदोलनों और संगठनों की तरफ़ से भरपूर आलोचना हुई
- ★★और फिर भी: “बहरहाल इस अवधि में जितनी सरकारें बनीं, सबने नयी आर्थिक नीति पर अमल जारी रखा।”
➕ यह अंतिम वाक्य पूरे अध्याय की सबसे बड़ी कड़ी है — यही आगे ‘बढ़ती सहमति’ का पहला स्तंभ बनता है।
बदलाव 4 — अयोध्या का विवाद
- “अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर पर शताब्दियों से चले आ रहे विधिक एवं राजनीतिक विवाद ने भारत की राजनीति को प्रभावित करना आरम्भ किया”
- “राम जन्मभूमि आंदोलन के केन्द्रीय विषय बनने से धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के विमर्श की दिशा बदल गई”
- ★★“इन परिवर्तनों की परिणति सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के निर्णय (जिसकी घोषणा 9 नवम्बर, 2019) के उपरांत अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के रूप में हुई।”
बदलाव 5 — राजीव गाँधी की हत्या
- मई 1991 — वे चुनाव अभियान के सिलसिले में तमिलनाडु के दौरे पर थे
- लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिलों ने उनकी हत्या कर दी
- 1991 के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी विजयी पार्टी के रूप में सामने आई
- कांग्रेस ने पी.वी. नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री चुना
भाग 2 · गठबंधन का युग
2.1 1989 का विचित्र अंकगणित 【पाठ】
- कांग्रेस हारी — पर किसी दूसरी पार्टी को बहुमत भी नहीं मिला
- ★कांग्रेस अब भी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत न होने के कारण उसने विपक्ष में बैठने का फ़ैसला किया
- राष्ट्रीय मोर्चा बना — जनता दल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर
- ★★उसे परस्पर विरुद्ध दो राजनीतिक समूहों — भाजपा और वाम मोर्चे — ने समर्थन दिया
- “इस समर्थन के आधार पर राष्ट्रीय मोर्चे ने एक गठबंधन सरकार बनायी, लेकिन इसमें भाजपा और वाम मोर्चे ने शिरकत नहीं की।”
➕ यह भारतीय राजनीति में ‘बाहर से समर्थन’ का पहला बड़ा प्रयोग है — सत्ता में हिस्सेदारी नहीं, पर सरकार टिकाने की ज़िम्मेदारी। यही अगले दो दशकों की मुख्य कार्य-पद्धति बनी, और यही सरकारों की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी।
2.2 1989 बनाम 1996 — समीकरण कितने ‘छुईमुई’★★
| 1989 | 1996 | |
|---|---|---|
| सरकार | राष्ट्रीय मोर्चा (वी.पी. सिंह) | संयुक्त मोर्चा (देवगौड़ा) |
| घटक | जनता दल + क्षेत्रीय दल | जनता दल + क्षेत्रीय दल |
| समर्थन | भाजपा + वाम मोर्चा | कांग्रेस + वाम मोर्चा |
| उद्देश्य | कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना | भाजपा को सत्ता से बाहर रखना |
★“इससे पता चलता है कि राजनीतिक समीकरण किस कदर छुईमुई थे।” 【पाठ】
➕ ध्यान दीजिए कि वाम मोर्चा दोनों बार था — पर उसका साथी बदल गया। यही ‘छुईमुई’ का अर्थ है।
2.3 भाजपा का उभार और राजग 【पाठ】
- 1991 तथा 1996 के चुनावों में भाजपा ने स्थिति लगातार मज़बूत की
- 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी; सरकार बनाने का न्यौता मिला
- ! “लेकिन अधिकांश दल, भाजपा की नीतियों के खिलाफ़ थे और इस वजह से भाजपा की सरकार लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी।”
- आखिरकार बना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग)
- राजग की सरकारें — मई 1998 से जून 1999 और अक्तूबर 1999 से; दोनों में अटल बिहारी वाजपेयी PM
- ★“1999 की राजग सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया।”
2.4 ‘11 सरकारें’ 【पाठ】★★
“इस तरह 1989 के चुनावों से भारत में गठबंधन की राजनीति के एक लंबे दौर की शुरुआत हुई। इसके बाद से केंद्र में 11 सरकारें बनीं। ये सभी या तो गठबंधन की सरकारें थीं अथवा दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की सरकारें थीं जो इन सरकारों में शामिल नहीं हुए।”
“इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी।”
! “हालांकि, 2014 में यह प्रवृत्ति बदल गयी है।”
➕ सबसे चौंकाने वाला आँकड़ा: 1989 से 1998 के नौ वर्षों में छह प्रधानमंत्री — वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, वाजपेयी, देवगौड़ा, गुजराल। ★इसी अस्थिरता को समझने के बाद ही यह समझ आता है कि 1999 की सरकार का पूरा कार्यकाल करना कितनी बड़ी बात थी।
2.5 केंद्रीय सरकार 1989 के बाद 【पाठ】★★★
| अवधि | गठबंधन / सरकार में शामिल दल | प्रधानमंत्री |
|---|---|---|
| दिसंबर 1989 – नवंबर 1990 | राष्ट्रीय मोर्चा; वाम मोर्चा और भाजपा का समर्थन | वी.पी. सिंह |
| नवंबर 1990 – जून 1991 | राष्ट्रीय मोर्चा का एक तबका समाजवादी जनता पार्टी के नेतृत्व में; कांग्रेस का समर्थन | चंद्रशेखर |
| जून 1991 – मई 1996 | कांग्रेस; एआईएडीएमके तथा कुछ अन्य दलों का समर्थन | पी.वी. नरसिम्हा राव |
| मई 1996 – जून 1996 | भाजपा — अल्पमत सरकार | अटल बिहारी वाजपेयी |
| जून 1996 – अप्रैल 1997 | संयुक्त मोर्चा; कांग्रेस का समर्थन | एच.डी. देवगौड़ा |
| अप्रैल 1997 – मार्च 1998 | संयुक्त मोर्चा; कांग्रेस का समर्थन | इंद्रकुमार गुजराल |
| मार्च 1998 – अक्तूबर 1999 | भाजपा-नीत राजग | अटल बिहारी वाजपेयी |
| अक्तूबर 1999 – मई 2004 | भाजपा-नीत राजग | अटल बिहारी वाजपेयी |
| मई 2004 – मई 2014 | कांग्रेस-नीत संप्रग | मनमोहन सिंह |
| मई 2014 के बाद | भाजपा-नीत राजग | नरेंद्र मोदी |
2.6 ➕ गठबंधन-युग की संस्थागत उपज ◆
गठबंधन का दौर केवल राजनीति नहीं बदलता — संविधान भी बदलता है:
| उपाय | क्या करता है |
|---|---|
| दसवीं अनुसूची (52वाँ संशोधन, 1985) | दल-बदल विरोधी क़ानून |
| 91वाँ संविधान संशोधन (2003) | ★मंत्रिपरिषद का आकार सदन के 15 प्रतिशत तक सीमित — क्योंकि गठबंधन में हर सहयोगी मंत्री-पद माँगता था |
| एस.आर. बोम्मई निर्णय (1994) | ★★अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर रोक; बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर |
➕ ★★तीनों में सबसे महत्वपूर्ण बोम्मई है। 1994 के बाद राज्य सरकारों की मनमानी बर्खास्तगी लगभग रुक गई — और यही वह संस्थागत बदलाव है जिसने क्षेत्रीय दलों को केंद्र में सौदेबाज़ी की ताक़त दी।
भाग 3 · अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिक उदय
3.1 ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ क्या है 【पाठ】
- OBC = ‘अदर बैकवर्ड क्लासेज़’ — विचार-विवेचन की एक प्रशासनिक कोटि
- ★★“यह अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति से अलग एक कोटि है, जिसमें शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की गणना की जाती है।”
- इन्हें ‘पिछड़ा वर्ग’ भी कहा जाता है
3.2 राजनीतिक पृष्ठभूमि 【पाठ】
पिछड़ी जातियों के तबके कांग्रेस से दूर जा रहे थे → गैर-कांग्रेसी दलों के लिए जगह बनी। ★“गैर-कांग्रेसी दलों के राजनीतिक अभ्युदय की अभिव्यक्ति 1977 की जनता पार्टी की सरकार के रूप में हुई।” जनता पार्टी के घटकों — भारतीय क्रांतिदल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी — का ग्रामीण OBC में ताकतवर जनाधार था।
3.3 मंडल आयोग — पूरा क्रम 【पाठ】★★
| चरण | विवरण |
|---|---|
| पृष्ठभूमि | दक्षिण के राज्यों में कम-से-कम 1960 के दशक से OBC आरक्षण; ! उत्तर भारत में नहीं |
| आवाज़ | 1977–79 की जनता पार्टी सरकार के समय उत्तर भारत में राष्ट्रीय स्तर पर |
| अग्रणी | ★बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर; उनकी सरकार ने बिहार में नयी OBC नीति लागू की |
| गठन | 1978 में केंद्र सरकार ने आयोग बैठाया |
| नाम | आज़ादी के बाद दूसरा अवसर → ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’; अध्यक्ष बी.पी. मंडल → ‘मंडल कमीशन’ |
| उद्देश्य | शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाना और पहचान के तरीके बताना |
| रिपोर्ट | 1980 — तब तक जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी |
| मशविरा | पिछड़ा वर्ग को ‘पिछड़ी जाति’ के अर्थ में स्वीकार किया जाए |
| सर्वेक्षण | इन जातियों की शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में बड़ी कम मौजूदगी |
| मुख्य सिफ़ारिश | ★★शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत सीट आरक्षित |
| अन्य सुझाव | ★“कई और समाधान सुझाए जिनमें भूमि-सुधार भी एक था” |
| लागू | अगस्त 1990 — राष्ट्रीय मोर्चा सरकार; केंद्रीय सरकार और उसके उपक्रमों की नौकरियों में |
| विरोध | उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध |
| न्यायालय | ‘इंदिरा साहनी केस’; नवंबर 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सही ठहराया |
| सहमति | ★“अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के मसले पर देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों में सहमति थी” |
📦 बी.पी. मंडल (1918–1982) 【पाठ】
1967–1970 तथा 1977–1979 में बिहार से सांसद; दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष; बिहार के समाजवादी नेता; ★1968 में डेढ़ माह तक बिहार के मुख्यमंत्री; 1977 में जनता पार्टी में शामिल।
3.4 ➕ इंदिरा साहनी — निर्णय के भीतर ◆★★
पाठ्यपुस्तक केवल यह कहती है कि न्यायालय ने सरकार का निर्णय सही ठहराया। ➕ पूरा विवरण:
पूरा नाम: इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ · तिथि: 16 नवंबर 1992 · पीठ: नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ
निर्णय के चार स्थायी सिद्धांत:
| # | सिद्धांत |
|---|---|
| 1 | 27 प्रतिशत OBC आरक्षण वैध |
| 2 | ★★कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा |
| 3 | ★★‘क्रीमी लेयर’ — OBC के सम्पन्न वर्ग को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाए |
| 4 | पदोन्नति में आरक्षण नहीं (बाद में SC/ST के लिए 77वें संशोधन, 1995 द्वारा बदला गया) |
➕ ★★सबसे महत्वपूर्ण जोड़: पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 147 पर एक गुब्बारे में स्वयं पूछती है — “क्या इन समूहों के भीतर मौजूद कुछ ताकतवर जातियाँ और परिवार ही सारे फ़ायदे अपनी मुट्ठी में कर लेंगे?” — न्यायालय ने ठीक इसी चिंता का उत्तर ‘क्रीमी लेयर’ के रूप में दिया।
3.5 ➕ आरक्षण की कहानी 1992 के बाद ◆
| वर्ष | क्या हुआ |
|---|---|
| 1995 | 77वाँ संशोधन — SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण बहाल |
| 2006 | 93वाँ संशोधन — शैक्षणिक संस्थाओं में OBC आरक्षण की गुंजाइश |
| 2019 | ★103वाँ संशोधन — EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण |
| 2022 | ★उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीश पीठ ने 3:2 से इसे वैध ठहराया |
➕ और यह पाठ की ‘बढ़ती सहमति’ वाली दूसरी बात को पुष्ट करता है — 103वाँ संशोधन संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित हुआ। जो 1990 में हिंसक विवाद का विषय था, वह 2019 तक साझा नीति बन चुका था।
3.6 ➕ कर्पूरी ठाकुर — भारत रत्न ◆
पाठ्यपुस्तक उन्हें “इस दिशा में अग्रणी” बताती है। ➕ 2024 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया गया। वे दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे और ‘जननायक’ कहलाते हैं।
भाग 4 · दलित राजनीति
4.1 बामसेफ से बसपा तक 【पाठ】
- 1978 में ‘बामसेफ’ का गठन — बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज़ कम्युनिटीज़ एम्पलाइज़ फेडरेशन
- ! “यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण-सा ट्रेड यूनियन नहीं था।”
- इसने ‘बहुजन’ की राजनीतिक सत्ता की ज़बरदस्त तरफ़दारी की
- ★‘बहुजन’ = अनुसूचित जाति + अनुसूचित जनजाति + अन्य पिछड़ा वर्ग + अल्पसंख्यक
- परवर्ती विकास — ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’, जिससे बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ
- अगुआई कांशीराम ने की
4.2 बसपा का उभार 【पाठ】
- शुरुआती दौर में छोटी पार्टी; पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं का समर्थन
- ★1989 और 1991 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में सफलता
★★“आज़ाद भारत में यह पहला मौका था, जब कोई राजनीतिक दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी राजनीतिक सफलता हासिल कर पाया था।”
- बसपा का तर्क — बहुजन देश की आबादी में सबसे ज्यादा हैं और संख्या के लिहाज़ से एक मजबूत राजनीतिक ताकत का रूप ले सकते हैं
- बसपा उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत बनी और एक से ज्यादा दफे सरकार बनायी
- ★“भारत के कई हिस्सों में दलित राजनीति और अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति ने स्वतंत्र रूप धारण किया है और इन दोनों के बीच अक्सर प्रतिस्पर्धा भी चलती है।”
4.3 📦 कांशीराम (1934–2006) 【पाठ】◆
- बहुजन समाज के सशक्तीकरण के प्रतिपादक; बसपा के संस्थापक
- सामाजिक और राजनीतिक कार्य के लिए केंद्र सरकार की नौकरी से इस्तीफ़ा
- बामसेफ (1978) → डीएस-4 (1981) → बसपा (14 अप्रैल 1984) ◆
- कुशाग्र रणनीतिकार; ★“आप राजनीतिक सत्ता को सामाजिक समानता का आधार मानते थे”
- निधन — 9 अक्तूबर 2006 ◆
4.4 पाठ्यपुस्तक का खुला सवाल 【पाठ】★
पृष्ठ 147 पर दो गुब्बारे हैं:
“क्या इससे पिछड़े और दलित समुदायों के सभी नेताओं को लाभ होगा या इन समूहों के भीतर मौजूद कुछ ताकतवर जातियाँ और परिवार ही सारे फ़ायदे अपनी मुट्ठी में कर लेंगे?”
“असल मुद्दा नेताओं का नहीं, जनता का है! क्या इस बदलाव से सचमुच के वंचितों के लिए बेहतर नीतियाँ बनेंगी और उन पर कारगर तरीके से अमल होगा या फिर यह सारा कुछ एक राजनीतिक खेल मात्र बनकर रह जाएगा?”
➕ पाठ्यपुस्तक इन्हें खुला छोड़ती है — और यह जान-बूझकर है।
भाग 5 · सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र
5.1 भाजपा का उदय 【पाठ】
- आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी के साथ विलय
- जनता पार्टी के पतन और बिखराव के बाद पूर्ववर्ती जनसंघ के समर्थकों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनाई
- आरंभ में जनसंघ की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा राजनीतिक पटल अपनाया
- विचारधारा — गांधीवादी समाजवाद के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
- ! 1984 के चुनावों में भाजपा को बहुत सफलता नहीं मिली (केवल 2 सीटें)
- 1986 के बाद — राष्ट्रवाद पर विचारधारा के केन्द्र के रूप में बल; हिन्दुत्व की राजनीति भी अपनाई
5.2 ‘हिन्दुत्व’ — पाठ्यपुस्तक की परिभाषा 【पाठ】★★
“हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय राष्ट्रीयता के आधार के रूप में लोकप्रिय किया था। इसका मूल आशय यह था कि एक भारतीय होने के लिए आवश्यक है कि वह भारतभूमि को अपनी ‘पितृभूमि’ और साथ ही ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करे। हिंदुत्व के विश्वासियों का तर्क है कि एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण एक संगठित राष्ट्रीय संस्कृति के आधार पर संभव है। वे यह भी मानते हैं कि भारत के सन्दर्भ में हिन्दुत्व, यह आधार प्रदान कर सकता है।”
! यह एक विचारधारा की परिभाषा है — समर्थन या विरोध नहीं। इसे तटस्थ स्वर में पढ़िए।
5.3 शाहबानो वाद 【पाठ】
- 1985 का प्रकरण; एक 62 वर्षीय तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता माँगा
- सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया
- पुरातन पंथी मुसलमानों ने इसे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना
- कुछ मुस्लिम नेताओं की माँग पर सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया, जिसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया
- ★“सरकार के इस कार्य का अनेक महिला संगठनों, अनेक मुस्लिम समूहों तथा अधिकांश बुद्धिजीवियों ने विरोध किया।”
- भाजपा ने इसे “अल्पसंख्यक समुदाय को दी गयी अनावश्यक छूट और उसका तुष्टिकरण” बताकर आलोचना की
5.4 ➕ शाहबानो — पूरा विवरण ◆★★
- पूरा नाम: मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम · निर्णय: 23 अप्रैल 1985
- पीठ: पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ; अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़; निर्णय सर्वसम्मत
- शाहबानो इंदौर की निवासी, पाँच बच्चों की माँ; 43 वर्ष के विवाह के बाद तलाक
- विधिक आधार: दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 — एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान
- ★न्यायालय ने माना कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी धारा 125 के अर्थ में ‘पत्नी’ है
1986 का अधिनियम ठीक-ठीक क्या करता है: तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को धारा 125 के दायरे से बाहर करता है; पति की ज़िम्मेदारी ‘इद्दत’ की अवधि तक सीमित; उसके बाद रिश्तेदार और फिर राज्य वक्फ बोर्ड।
डेनियल लतीफ़ी बनाम भारत संघ (2001) ◆★★
➕ पाठ्यपुस्तक यहाँ रुक जाती है, पर कहानी अधूरी है। 2001 में उच्चतम न्यायालय ने 1986 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता बरक़रार रखी — पर उसकी ऐसी व्याख्या की कि पति को इद्दत की अवधि के भीतर ही पत्नी के भावी जीवन के लिए उचित और न्यायसंगत प्रावधान करना होगा।
➕ यानी न्यायालय ने क़ानून रद्द किए बिना, व्याख्या से शाहबानो के सिद्धांत को बहाल कर दिया। ★यह ‘संवैधानिक संवाद’ का उत्कृष्ट उदाहरण है: संसद क़ानून बदल सकती है; पर न्यायालय व्याख्या से उसका अर्थ फिर गढ़ सकता है।
5.5 अयोध्या — विवाद की जड़ें 【पाठ】
- यह विषय “देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास में गहराई तक बैठा हुआ था जिसमें विभिन्न हितधारकों के भिन्न दृष्टिकोण थे”
- विवाद श्री राम के जन्मस्थान के स्वामित्व से संबंधित था
- ★“1528 से प्रारम्भ होकर 500 वर्ष के सुदीर्घ इतिहास में अनेक संघर्ष लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के गजेटियर में अंकित हैं।”
- 1528 में जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचा निर्मित; ढाँचे के आन्तरिक और बाह्य भागों में हिन्दू प्रतीक तथा अवशेष प्रत्यक्ष देखे जा सकते थे
- 📦 28 नवंबर 1858 — निहंग सिखों ने औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा बलपूर्वक निकाले जाने से पहले जन्मभूमि स्थल पर नियंत्रण कर लिया तथा पूजन और हवन किया
5.6 अयोध्या की समय-रेखा 【पाठ】
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1528 | तीन-गुम्बद ढाँचे का निर्माण |
| 1858 | निहंग सिखों की घटना (28 नवंबर) |
| 1949 | ! न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भ होने के कारण ढाँचा सील कर दिया गया |
| 1986 | ★फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला न्यायालय के निर्णय से ताला खुला, पूजा की अनुमति |
| — | मन्दिर का शिलान्यास हुआ, किन्तु आगे का निर्माण प्रतिबन्धित रहा |
| 1992 | ! ढाँचे का ध्वंस — “कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है” |
| 9 नवम्बर 2019 | ★★उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ का 5–0 निर्णय |
➕ पाठ यह भी दर्ज करता है कि हिन्दू समुदाय ने प्रतिबंध को अपनी चिन्ताओं की उपेक्षा समझा, जबकि मुस्लिम समाज ढाँचे पर अधिकार के आश्वासन की माँग करता रहा — और ★“दोनों समुदाय दीर्घकाल से लम्बित इस विषय का समुचित समाधान चाहते थे।”
5.7 ‘विधिक कार्यवाही से मैत्रीपूर्ण स्वीकृति’ 【पाठ】★★
“यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी भी समाज में विवाद होते ही हैं। परन्तु एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक समाज में इन विवादों का हल सामान्यतः विधि की उचित प्रक्रिया से होता है।”
रास्ते: न्यायालय में सुनवाईयां · मध्यस्थता के प्रयास · जन आन्दोलन
निर्णय के दो आदेश:
- श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को विवादित स्थल राम मन्दिर निर्माण के लिए आवंटित
- संबंधित सरकार सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि आवंटित करे
पाठ्यपुस्तक का मूल्यांकन:
“इस प्रकार से हमारे जैसे विविधतापूर्ण समाज में लोकतन्त्र संविधान की समावेशी भावना के अनुरूप संघर्ष के समाधान का मार्ग खोलता है। यह विषय पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक अभिलेखों जैसे साक्ष्यों के आधार पर विधि की उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए सुलझाया गया। समाज में व्यापक रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उत्सवपूर्वक लिया गया।… यह भारत के सभ्यतागत स्वभाव में निहित लोकतान्त्रिक प्रकृति की परिपक्वता को प्रदर्शित करता है।”
5.8 ➕ निर्णय के आधार-तथ्य ◆
| मद | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 9 नवंबर 2019 (शनिवार — उच्चतम न्यायालय के लिए असामान्य) |
| पीठ | CJI रंजन गोगोई, एस.ए. बोबडे, डी.वाई. चंद्रचूड़, अशोक भूषण, एस. अब्दुल नज़ीर |
| निर्णय | ★5–0 सर्वसम्मत; एक ही संयुक्त निर्णय, किसी एक न्यायाधीश के नाम से नहीं |
| विवादित भूमि | 2.77 एकड़ |
| वैकल्पिक भूमि | 5 एकड़ — उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को |
| न्यास का गठन | फरवरी 2020 — श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र |
➕ ★निर्णय की तीन असामान्य बातें: किसी न्यायाधीश ने अलग मत नहीं लिखा; निर्णय अनाम था; और वह शनिवार को सुनाया गया। तीनों का एक ही अर्थ है — न्यायालय जानता था कि यह केवल विधिक नहीं, सामाजिक दस्तावेज़ भी है।
5.9 न्यायालय के दो अवतरण 【पाठ】◆★★
पहला (निर्णय, पृष्ठ 920):
”…संविधान के हृदय में कानून के शासन द्वारा कायम और लागू की गई समानता के प्रति प्रतिबद्धता है।… संविधान एक धर्म और दूसरे धर्म की आस्था और विश्वास के बीच अंतर नहीं करता है। सभी प्रकार के विश्वास, पूजा और प्रार्थना समान हैं…”
दूसरा (निर्णय, पृष्ठ 1045):
“इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला गया है… कि मस्जिद के निर्माण से पहले और उसके बाद से हिंदुओं की आस्था और विश्वास हमेशा यही रहा है कि भगवान राम का जन्मस्थान ही वह स्थान है जहां बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया है, जो कि ऊपर चर्चा किये गये दस्तावेजों और मौखिक साक्ष्यों से साबित होता है।”
➕ ★★पहला अवतरण पूरे पाठ्यक्रम में धर्मनिरपेक्षता की सबसे अच्छी परिभाषा है — भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से दूरी नहीं, सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार है।
भाग 6 · एक नयी सहमति का उदय
6.1 आरेख 1 — सीटें 【पाठ】★★
| वर्ष | भाजपा | कांग्रेस |
|---|---|---|
| 1984 | 2 | 415 |
| 1989 | 85 | 197 |
| 1991 | 120 | 232 |
| 1996 | 160 | 140 |
| 1998 | 182 | 141 |
| 1999 | 182 | 114 |
| 2004 | 138 | 145 |
| 2009 | 116 | 206 |
| 2014 | 282 | 44 |
| 2019 | 303 | 52 |
6.2 आरेख 2 — वोट में हिस्सा (%) 【पाठ】★★
| वर्ष | कांग्रेस | भाजपा |
|---|---|---|
| 1984 | 48.1 | 7.4 |
| 1989 | 39.5 | 11.4 |
| 1991 | 36.4 | 20.1 |
| 1996 | 28.8 | 20.3 |
| 1998 | (आरेख में अंकित नहीं) | 25.6 |
| 1999 | 28.3 | 23.8 |
| 2004 | 26.5 | 22.2 |
| 2009 | 28.6 | 18.8 |
| 2014 | 19.5 | 31.3 |
| 2019 | 19.5 | 37.4 |
! 1998 पर दोनों रेखाएँ लगभग मिल जाती हैं और आरेख में वहाँ केवल एक अंक — 25.6 — छपा है।
★★पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष: “1989 के चुनाव के बाद से, 1996, 2004 और 2009 को छोड़कर ज्यादातर समय दोनों पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को मिले वोटों का योग 50 फीसदी से ज्यादा रहा है।”
6.3 ➕ सीटें बनाम वोट — इस अध्याय का सबसे उपयोगी कौशल
2014 में भाजपा का वोट-हिस्सा 31.3% था और सीटें 282। एक-तिहाई से कम वोट पर आधे से ज़्यादा सीटें कैसे?
➕ क्योंकि भारत में ‘सर्वाधिक मत पाने वाला विजयी’ (First-Past-The-Post) प्रणाली है ◇ — हर निर्वाचन-क्षेत्र में जो सबसे अधिक वोट पाता है, वही जीतता है, भले ही उसे बहुमत न मिले। ★★इसमें वोट-हिस्से की छोटी वृद्धि सीटों में बहुत बड़ी वृद्धि बन जाती है।
और उलटी दिशा में भी: 2009 में कांग्रेस — 28.6% वोट, 206 सीटें; 2014 में — 19.5% वोट, 44 सीटें। वोट में 9 अंक की गिरावट पर सीटों में 162 की।
6.4 लोकसभा चुनाव 2004–2019 【पाठ】
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 2004 | कांग्रेस पूरे ज़ोर से गठबंधन में शामिल; राजग की हार; संप्रग सरकार; वाम मोर्चा का समर्थन; कांग्रेस का पुनरुत्थान; ! राजग और संप्रग के कुल वोटों का अंतर बड़ा कम |
| जुलाई 2008 | भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया — ★फिर भी सरकार ने कार्यकाल पूरा किया |
| 2009 | 15वीं लोकसभा; कांग्रेस 145 → 206; मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल |
| सितंबर 2013 | भाजपा ने नरेंद्र मोदी (तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री) को PM पद का उम्मीदवार घोषित किया |
| 2014 | 16वीं लोकसभा; भाजपा को स्पष्ट बहुमत, अपने दम पर 282; ★“30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी”; फिर भी राजग सरकार का विकल्प चुना |
| 2019 | भाजपा फिर से 303 सीटों के साथ विजयी |
★★“जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है तब भी गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है।” “इस तरह दलीय प्रणाली सत्तर के दशक की तुलना में एकदम ही बदल गई है।”
6.5 आरेख 3 — 17वीं लोकसभा 【पाठ】★★
| दल | सीटें | हिस्सा |
|---|---|---|
| भारतीय जनता पार्टी | 303 | 56% |
| इंडियन नेशनल कांग्रेस | 52 | 10% |
| द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम | 24 | 4% |
| शिवसेना | 18 | 3% |
| जनता दल यूनाईटेड | 16 | 3% |
| बीजू जनता दल | 12 | 2% |
| बहुजन समाज पार्टी | 10 | 2% |
| अन्य पार्टियाँ | 108 | 20% |
★‘अन्य’ का 20 प्रतिशत हिस्सा ही बताता है कि गठबंधन की राजनीति क्यों प्रासंगिक बनी हुई है।
6.6 ➕ पाठ्यपुस्तक के बाद — 2024 का चुनाव ◆★★
| मद | 2019 | 2024 |
|---|---|---|
| भाजपा | 303 | 240 |
| कांग्रेस | 52 | 99 |
| राजग कुल | — | लगभग 293 |
| भाजपा का वोट-हिस्सा | 37.4% | लगभग 37% |
| कांग्रेस का वोट-हिस्सा | 19.5% | लगभग 21% |
- भाजपा 272 के बहुमत-अंक से कम रह गई; सरकार राजग सहयोगियों के समर्थन से बनी
- यह नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल है और पहला जिसमें वे सहयोगियों पर निर्भर गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं
➕ ★★★इसका पाठ्यपुस्तक-सम्मत अर्थ: पाठ्यपुस्तक ने पृष्ठ 152 पर तब लिखा था जब भाजपा के पास 303 सीटें थीं — “गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है।” 2024 ने इस वाक्य को अक्षरशः सही सिद्ध कर दिया। यह भविष्यवाणी नहीं थी, संरचनात्मक समझ थी।
! परीक्षा-निर्देश: उत्तर में 17वीं लोकसभा (303/52) ही लिखें; 2024 का आँकड़ा केवल अंतिम पंक्ति में जोड़ा जा सकता है।
भाग 7 · बढ़ती सहमति — चार बातें 【पाठ】★★
“अनेक महत्त्वपूर्ण मसलों पर अधिकतर दलों के बीच एक व्यापक सहमति है। कड़े मुकाबले और बहुत-से संघर्षों के बावजूद अधिकतर दलों के बीच एक सहमति उभरती सी जान पड़ रही है। इस सहमति में चार बातें हैं।”
सहमति 1 — नयी आर्थिक नीति पर सहमति
“कई समूह नयी आर्थिक नीति के खिलाफ़ हैं, लेकिन ज्यादातर राजनीतिक दल इन नीतियों के पक्ष में हैं। अधिकतर दलों का मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत, विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।” ➕ प्रमाण: “इस अवधि में जितनी सरकारें बनीं, सबने नयी आर्थिक नीति पर अमल जारी रखा।”
सहमति 2 — पिछड़ी जातियों के दावे की स्वीकृति
“आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं। राजनीतिक दल यह भी सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं कि ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी मिले।” ➕ प्रमाण: 1990 में हिंसक विवाद → 1992 में सभी बड़े दलों की सहमति → 2019 में 103वाँ संशोधन लगभग सर्वसम्मति से पारित।
सहमति 3 — प्रांतीय दलों की भूमिका की स्वीकृति
★“प्रांतीय दल और राष्ट्रीय दल का भेद अब लगातार कम होता जा रहा है।… प्रांतीय दल केंद्रीय सरकार में साझीदार बन रहे हैं और इन दलों ने पिछले बीस सालों में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।” ➕ यह अध्याय 7 (क्षेत्रीय आकांक्षाएँ) का तर्क यहाँ पूरा होता है।
सहमति 4 — विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि
“गठबंधन की राजनीति के इस दौर में राजनीतिक दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर ज़ोर दे रहे हैं, जो मिसाल के लिए अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन ये दल भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और सरकार बनाई, जो पाँच साल तक चली।”
★यह चौथी बात ही प्रश्न 4 का पूरा उत्तर है।
निष्कर्ष · वृत्त पूरा होता है 【पाठ】
“भारत की राजनीति के इस अध्ययन की शुरुआत में हमने चर्चा की थी कि कांग्रेस किस तरह एक प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरी। इस स्थिति से चलकर अब हम एक ऐसे पड़ाव पर पहुँचे हैं, जहाँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कहीं ज्यादा तेज़ है लेकिन इस प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच मुख्य राजनीतिक दलों में कुछेक मसलों पर सहमति है।”
और फिर पाठ्यपुस्तक दलों से आगे देखती है:
“अगर राजनीतिक दल इस सहमति के दायरे में सक्रिय हैं, तो जन आंदोलन और संगठन विकास के नए रूप, स्वप्न और तरीकों की पहचान कर रहे हैं। गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मसले जन आंदोलनों के ज़रिए राजनीतिक एजेंडे के रूप में सामने आ रहे हैं। ये आंदोलन राज्य को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं। इसी तरह लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के संदर्भ में न्याय तथा लोकतंत्र के मुद्दे उठा रहे हैं।”
★★और अंतिम वाक्य: “हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक राजनीति जारी रहेगी और यह राजनीति इस अध्याय में वर्णित कुछ चीज़ों के मंथन के बीच आकार ग्रहण करेगी।”
पुस्तक का अंतिम प्रश्न 【पाठ】
“जैसा कि आप जानते हैं भारत की आजादी के आसपास कई अन्य देश भी आजाद हुए और लोकतंत्र को अपनाया। हालाँकि, भारत सामाजिक समानता और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने में एक महान भूमिका निभाते हुए एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा, लेकिन उनमें से कुछ देशों में ऐसा नहीं हुआ है। उन कारकों के बारे में आपस में चर्चा करें जिन्होंने भारत में लोकतंत्र को पनपने में सक्षम बनाया है।”
➕ और आठ अध्यायों का एक सूत्र
हमने यह पुस्तक शुरू की थी विभाजन और रियासतों के विलय से — जब यह तय भी नहीं था कि यह देश टिकेगा या नहीं। फिर हमने पढ़ा एक दल का प्रभुत्व, फिर उसका टूटना, फिर आपातकाल, फिर क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, और अंत में गठबंधन का युग।
➕ ★★अगर इन आठ अध्यायों से एक बात याद रखनी हो, तो वह यह है — भारत ने हर बार अपनी समस्याओं का हल संविधान के भीतर ढूँढ़ा। आपातकाल का हल चुनाव से निकला। क्षेत्रीय आकांक्षाओं का हल समझौतों से। अयोध्या का हल न्यायालय से।
इसीलिए पाठ्यपुस्तक का अंतिम वाक्य भविष्यवाणी नहीं है — वह एक ज़िम्मेदारी है।
📋 परिशिष्ट · तथ्य-पत्र
| तथ्य | उत्तर | चिह्न |
|---|---|---|
| 1984 / 1989 में कांग्रेस की सीटें | 415 / 197 | 【पाठ】 |
| ‘कांग्रेस प्रणाली’ की समाप्ति | 1989 | 【पाठ】 |
| राष्ट्रीय मोर्चा को समर्थन | भाजपा + वाम मोर्चा | 【पाठ】 |
| 1989 के बाद सरकारें | 11 | 【पाठ】 |
| राजीव गाँधी की हत्या | मई 1991, तमिलनाडु, लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिलों द्वारा | 【पाठ】 |
| नयी आर्थिक नीति की शुरुआत | राजीव गाँधी की सरकार के समय; 1991 तक व्यापक | 【पाठ】 |
| मंडल आयोग का गठन / रिपोर्ट | 1978 / 1980 | 【पाठ】 |
| आयोग का आधिकारिक नाम | दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग | 【पाठ】 |
| मुख्य सिफ़ारिश | 27 प्रतिशत आरक्षण | 【पाठ】 |
| अन्य सुझाव | भूमि-सुधार | 【पाठ】 |
| लागू | अगस्त 1990 | 【पाठ】 |
| इंदिरा साहनी | 16 नवंबर 1992; नौ न्यायाधीशों की पीठ | 【पाठ】◆ |
| निर्णय के चार सिद्धांत | 27% वैध · 50% सीमा · क्रीमी लेयर · पदोन्नति में नहीं | ◆ |
| कर्पूरी ठाकुर | भारत रत्न (मरणोपरांत), 2024 | ◆ |
| 103वाँ संशोधन | 2019 — EWS को 10%; 2022 में 3:2 से वैध | ◆ |
| बामसेफ | 1978 | 【पाठ】 |
| ‘बहुजन’ | SC + ST + OBC + अल्पसंख्यक | 【पाठ】 |
| कांशीराम | बामसेफ 1978 · डीएस-4 1981 · बसपा 14 अप्रैल 1984; निधन 9 अक्तूबर 2006 | 【पाठ】◆ |
| भाजपा का गठन | 1980 | 【पाठ】 |
| हिन्दुत्व | सावरकर; ‘पितृभूमि’ और ‘पुण्यभूमि’ | 【पाठ】 |
| शाहबानो | 23 अप्रैल 1985; पाँच-न्यायाधीश पीठ; CJI वाई.वी. चंद्रचूड़; धारा 125 | 【पाठ】◆ |
| 1986 का अधिनियम | मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम | 【पाठ】 |
| डेनियल लतीफ़ी | 2001 — अधिनियम वैध, पर व्याख्या से सिद्धांत बहाल | ◆ |
| तीन-गुम्बद ढाँचा | 1528 | 【पाठ】 |
| निहंग सिख | 28 नवंबर 1858 | 【पाठ】 |
| ढाँचा सील | 1949 | 【पाठ】 |
| ताला खुला | 1986, फैजाबाद जिला न्यायालय | 【पाठ】 |
| ध्वंस | 1992 | 【पाठ】 |
| अयोध्या निर्णय | 9 नवंबर 2019; 5–0; CJI रंजन गोगोई | 【पाठ】◆ |
| भूमि | 2.77 एकड़ विवादित; 5 एकड़ वैकल्पिक | ◆ |
| न्यास | श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र, फरवरी 2020 | ◆ |
| 2014 / 2019 में भाजपा | 282 / 303 | 【पाठ】 |
| मोदी उम्मीदवार घोषित | सितंबर 2013 | 【पाठ】 |
| वाम दलों का समर्थन-वापसी | जुलाई 2008, परमाणु समझौते पर | 【पाठ】 |
| लोकसभा के कुल सदस्य | 543 = राज्यों से 530 + केंद्रशासित प्रदेशों से 13 | 【पाठ】 |
| दल-बदल विरोधी क़ानून | 52वाँ संशोधन, 1985 — दसवीं अनुसूची | ◆ |
| मंत्रिपरिषद की सीमा | 91वाँ संशोधन, 2003 — 15 प्रतिशत | ◆ |
| एस.आर. बोम्मई | 1994 — अनुच्छेद 356 पर अंकुश | ◆ |
| 2024 लोकसभा | भाजपा 240; कांग्रेस 99; राजग ≈ 293 | ◆ |