अध्याय 1दो ध्रुवीयता का अंत

शिक्षण नोट्स48 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT — समकालीन विश्व राजनीति (पुस्तक 1), अध्याय 1, पृ. 1–14. पुनर्मुद्रण 2026-27.

शिक्षक हेतु मास्टर नोट्स — कक्षा 12, राजनीति विज्ञान

पाठ्यपुस्तक फ़ाइल: lhps101.pdf (14 पृष्ठ)। पाठ पूर्व-यूनिकोड फ़ॉन्ट में है, इसलिए पृष्ठ-चित्रों (lhps101-pages/) से पढ़ा गया।

! नाम और क्रम — पहले यह पढ़ें

यह पुस्तक 1 (समकालीन विश्व राजनीति) का अध्याय 1 है और इसका शीर्षक ‘दो ध्रुवीयता का अंत’ है — ‘शीतयुद्ध का दौर’ नहीं। पृष्ठ पर छपा QR कोड 12108CH02 बताता है कि युक्तिकरण से पहले यह अध्याय 2 था; पुराना अध्याय 1 (‘शीतयुद्ध का दौर’) हटा दिया गया और यह अध्याय पहले स्थान पर आ गया। इसका एक व्यावहारिक परिणाम है: अध्याय ‘शीतयुद्ध’, ‘वारसा समझौता’, ‘दो ध्रुवीयता’ जैसे पदों का प्रयोग करता है पर उन्हें कहीं परिभाषित नहीं करता — क्योंकि उनकी परिभाषा हटाए गए अध्याय में थी। प्रश्नावली का प्रश्न 5(ख) सीधे ‘वारसा’ पूछता है। विवरण 10-Verification-Log.md में।

0. यह अध्याय किस बारे में है

यह अध्याय एक विश्व-व्यवस्था के ढहने की कथा है। 1945 से 1991 तक दुनिया दो ध्रुवों में बँटी थी — एक ओर अमरीका के नेतृत्व वाला पूँजीवादी खेमा, दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व वाला समाजवादी खेमा, जिसे ‘दूसरी दुनिया’ कहा जाता था। 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरी और दिसंबर 1991 में सोवियत संघ समाप्त हो गया — और उसके साथ यह दो-ध्रुवीय व्यवस्था भी।

अध्याय का तर्क तीन चरणों में चलता है: सोवियत प्रणाली थी क्या (उसकी असली ताकत भी और असली कमज़ोरियाँ भी), वह टूटी क्यों (आर्थिक ठहराव, राजनीतिक जड़ता, और सबसे तात्कालिक कारण — राष्ट्रवाद का उभार), और उसके बाद क्या हुआ (शीतयुद्ध की समाप्ति, अमरीका का अकेली महाशक्ति बनना, नए देशों का जन्म, और ‘शॉक थेरेपी’ नामक वह आर्थिक प्रयोग जो बुरी तरह विफल रहा)। अंत में अध्याय भारत की ओर मुड़ता है — भारत-सोवियत संबंध और आज के भारत-रूस संबंध।

1. परिचय — बर्लिन की दीवार (पृ. 1)

  • शीतयुद्ध के सबसे सरगर्म दौर में बर्लिन-दीवार खड़ी की गई थी और यह दीवार शीतयुद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक थी।
  • ★1989 में पूर्वी जर्मनी की आम जनता ने इस दीवार को गिरा दिया।
  • इस नाटकीय घटना के बाद और भी नाटकीय तथा ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया, जिसकी परिणति दूसरी दुनिया के पतन और शीतयुद्ध की समाप्ति में हुई।
  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद विभाजित हो चुके जर्मनी का अब एकीकरण हो गया।
  • ★सोवियत संघ के खेमे में शामिल पूर्वी यूरोप के आठ देशों ने एक-एक करके जनता के प्रदर्शनों को देखकर अपने साम्यवादी शासन को बदल डाला।
  • ★शीतयुद्ध के अंत के समय सोवियत संघ को यह सब चुपचाप देखते रहना पड़ा। ऐसा किसी सैन्य मजबूरी से नहीं, बल्कि आम जनता की सामूहिक कार्रवाई के दबाव के कारण हुआ। अंत में स्वयं सोवियत संघ का विघटन हो गया।

चित्र और उसका शीर्षक (पृ. 1)★

“बर्लिन की दीवार पूँजीवादी दुनिया और साम्यवादी दुनिया के बीच विभाजन का प्रतीक थी। 1961 में बनी यह दीवार पश्चिमी बर्लिन को पूर्वी बर्लिन से अलग करती थी। 150 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी यह दीवार 28 वर्षों तक खड़ी रही और आखिरकार जनता ने इसे 9 नवंबर, 1989 को तोड़ दिया। यह दोनों जर्मनी के एकीकरण और साम्यवादी खेमे की समाप्ति की शुरुआत थी।”

तीन चित्र: (1) लोग दीवार में छोटा-सा छेद कर रहे हैं; (2) मुक्त आवागमन को संभव बनाने के लिए दीवार के एक हिस्से को गिरा दिया गया है; (3) 1989 से पहले बर्लिन की दीवार। (चित्र फ्रेडरिक रेम और यूनिवर्सिटी ऑफ यूटाह से साभार।)

2. सोवियत प्रणाली क्या थी? (पृ. 2)

2.1 उत्पत्ति और स्वरूप

  • ★समाजवादी सोवियत गणराज्य (यू.एस.एस.आर.) रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया।
  • यह क्रांति पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध में हुई थी और समाजवाद के आदर्शों तथा समतामूलक समाज की ज़रूरत से प्रेरित थी।
  • ★“यह मानव इतिहास में निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त करने और समाज को समानता के सिद्धांत पर सचेत रूप से रचने की सबसे बड़ी कोशिश थी।”
  • ऐसा करने में सोवियत प्रणाली के निर्माताओं ने राज्य और ‘पार्टी की संस्था’ को प्राथमिक महत्त्व दिया।
  • ★सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। इसमें किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिए जगह नहीं थी।
  • अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी।

2.2 ‘दूसरी दुनिया’ कैसे बनी

  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के अंकुश में आ गये; सोवियत सेना ने इन्हें फासीवादी ताकतों के चंगुल से मुक्त कराया था।
  • इन सभी देशों की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को सोवियत संघ की समाजवादी प्रणाली की तर्ज़ पर ढाला गया।
  • ★“इन्हें ही समाजवादी खेमे के देश या ‘दूसरी दुनिया’ कहा जाता है। इस खेमे का नेता समाजवादी सोवियत गणराज्य था।”

2.3 सोवियत संघ की ताकत★★

  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ महाशक्ति के रूप में उभरा।
  • ★“अमरीका को छोड़ दें तो सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था शेष विश्व की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित थी।”
क्षेत्रविवरण
संचारसंचार प्रणाली बहुत उन्नत थी
ऊर्जा और खनिजविशाल ऊर्जा-संसाधन — खनिज-तेल, लोहा और इस्पात तथा मशीनरी उत्पाद
परिवहनदूर-दराज के इलाके भी आवागमन की सुव्यवस्थित और विशाल प्रणाली से जुड़े हुए थे
उपभोक्ता-उद्योगघरेलू उपभोक्ता-उद्योग भी बहुत उन्नत — ★“पिन से लेकर कार तक सभी चीजों का उत्पादन वहाँ होता था”
जीवन-स्तरवस्तुओं की गुणवत्ता पश्चिमी स्तर की नहीं थी, लेकिन सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर दिया था
लोक-कल्याणस्वास्थ्य-सुविधा, शिक्षा, बच्चों की देखभाल तथा लोक-कल्याण की अन्य चीजें रियायती दर पर
स्वामित्वमिल्कियत का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व; भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व तथा नियंत्रण, दोनों राज्य के पास

2.4 सोवियत संघ की कमज़ोरियाँ★★

  • सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया। यह प्रणाली सत्तावादी होती गई और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।
  • ★“लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं होने के कारण लोग अपनी असहमति अक्सर चुटकुलों और कार्टूनों में व्यक्त करते थे।”
  • सोवियत संघ की अधिकांश संस्थाओं में सुधार की ज़रूरत थी।
  • ★एक दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
  • ★“जनता ने अपनी संस्कृति और बाकी मामलों की साज-संभाल अपने आप करने के लिए 15 गणराज्यों को आपस में मिलाकर सोवियत संघ बनाया था। लेकिन पार्टी ने जनता की इस इच्छा को पहचानने से इंकार कर दिया।”
  • ★“सोवियत संघ के नक्शे में रूस, संघ के पन्द्रह गणराज्यों में से एक था लेकिन वास्तव में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था। अन्य क्षेत्रों की जनता अक्सर उपेक्षित और दमित महसूस करती थी।”

2.5 गिरावट के आर्थिक कारण (पृ. 3)★

  • हथियारों की होड़ में सोवियत संघ ने अमरीका को बराबर की टक्कर दी लेकिन उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।
  • सोवियत संघ प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढाँचे (मसलन — परिवहन, ऊर्जा) के मामले में पश्चिमी देशों की तुलना में पीछे रह गया।
  • ★“लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह थी कि सोवियत संघ अपने नागरिकों की राजनीतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका।”
  • ★सोवियत संघ ने 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप किया। इससे सोवियत संघ की व्यवस्था और भी कमजोर हुई।
  • लोगों का पारिश्रमिक लगातार बढ़ा लेकिन उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के मामले में वह पश्चिम से बहुत पीछे छूट गया। इससे हर तरह की उपभोक्ता-वस्तु की कमी हो गई और खाद्यान्न का आयात साल-दर-साल बढ़ता गया।
  • ★“1970 के दशक के अंतिम वर्षों में यह व्यवस्था लड़खड़ा रही थी और अंततः ठहर सी गयी।”

जोक-बॉक्स (पृ. 4) — असहमति का लहजा

कम्युनिस्ट पार्टी का एक अधिकारी सामूहिक खेती के एक ‘फार्म’ पर आलू की पैदावार दर्ज करने पहुँचा। “किसान साथी, इस साल की पैदावार कैसी रही?” “ईश्वर की कृपा से आलू के पहाड़ लग गये हैं।” “लेकिन ईश्वर तो होता नहीं!” — अधिकारी ने बात काटी। “तो फिर, आलू के पहाड़ भी नहीं होते!” — किसान ने जवाब दिया।

3. गोर्बाचेव और सोवियत संघ का विघटन (पृ. 3–4)

  • ★मिख़ाइल गोर्बाचेव 1980 के दशक के मध्य में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने।
  • पश्चिम के देशों में सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति हो रही थी और सोवियत संघ को इसकी बराबरी में लाने के लिए सुधार ज़रूरी हो गए थे।
  • ★गोर्बाचेव ने पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने, सोवियत संघ को लोकतांत्रिक रूप देने और वहाँ सुधार करने का फ़ैसला किया।
  • इस फ़ैसले की कुछ ऐसी भी परिणतियाँ रहीं जिनका किसी को कोई अंदाजा नहीं था:
    • पूर्वी यूरोप के देशों की जनता ने अपनी सरकारों और सोवियत नियंत्रण का विरोध करना शुरू कर दिया।
    • ★“गोर्बाचेव के शासक रहते सोवियत संघ ने ऐसी गड़बड़ियों में उस तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जैसा अतीत में होता था। पूर्वी यूरोप की साम्यवादी सरकारें एक के बाद एक गिर गईं।”
  • सोवियत संघ के अंदर भी संकट गहराता जा रहा था; गोर्बाचेव ने आर्थिक-राजनीतिक सुधारों और लोकतंत्रीकरण की नीति चलायी। ★इन सुधार नीतियों का कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं द्वारा विरोध किया गया।
  • ★1991 में एक तख़्तापलट भी हुआ, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े गरमपंथियों ने बढ़ावा दिया था। तब तक जनता को स्वतंत्रता का स्वाद मिल चुका था और वे कम्युनिस्ट पार्टी के पुरानी रंगत वाले शासन में नहीं जाना चाहते थे।
  • ★“येल्तसिन ने इस तख़्तापलट के विरोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वे नायक की तरह उभरे।”
  • रूसी गणराज्य ने, जहाँ बोरिस येल्तसिन ने आम चुनाव जीता था, केंद्रीकृत नियंत्रण को मानने से इंकार कर दिया। सत्ता मास्को से गणराज्यों की तरफ खिसकने लगी — ख़ासकर उन भागों में जो ज्यादा यूरोपीकृत थे और अपने को संप्रभु राज्य मानते थे।
  • ★“आश्चर्यजनक तौर पर मध्य-एशियाई गणराज्यों ने अपने लिए स्वतंत्रता की माँग नहीं की। वे ‘सोवियत संघ’ के साथ ही रहना चाहते थे।”
  • ★सन् 1991 के दिसम्बर में येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ के तीन बड़े गणराज्य — रूस, यूक्रेन और बेलारूस — ने सोवियत संघ की समाप्ति की घोषणा की। कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिबंधित हो गई और परवर्ती सोवियत गणराज्यों ने पूँजीवाद तथा लोकतंत्र को अपना आधार बनाया।

3.1 विघटन के तत्काल बाद (पृ. 4)

  • साम्यवादी सोवियत गणराज्य के विघटन की घोषणा और स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल (कॉमनवेल्थ ऑव इंडिपेंडेंट स्टेट्स / CIS) का गठन बाकी गणराज्यों, खासकर मध्य एशियाई गणराज्यों के लिए बहुत आश्चर्यचकित करने वाला था — ये गणराज्य अभी ‘स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल’ से बाहर थे। ★इस मुद्दे को तुरंत हल कर लिया गया; इन्हें ‘राष्ट्रकुल’ का संस्थापक सदस्य बनाया गया।
  • ★रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य स्वीकार किया गया। रूस को सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ की सीट मिली। सोवियत संघ ने जो अंतर्राष्ट्रीय करार और संधियाँ की थीं, उन सबको निभाने का जिम्मा अब रूस का था।
  • ★विघटन के बाद पूर्ववर्ती गणराज्यों के बीच एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश का दर्ज़ा रूस को मिला। उसने अमरीका के साथ परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में कुछ कदम भी उठाए।
  • ★“सोवियत संघ अब नहीं रहा; वह दफ़्न हो चुका था।”

4. सोवियत संघ का विघटन क्यों हुआ? (पृ. 4–7)★★

अध्याय स्वयं कहता है कि “सोवियत संघ के रूप में न तो कोई राज-व्यवस्था पहली बार टूटी है और न ही आखिरी बार। सोवियत संघ के विघटन के कुछ विशेष कारण जरूर हो सकते हैं लेकिन इस मामले से हम एक सर्व-सामान्य सबक सीख सकते हैं।”

कारण — क्रम से

#कारणविवरण
1संस्थाओं की अंदरूनी कमज़ोरी★“सोवियत संघ की राजनीतिक-आर्थिक संस्थाएँ अंदरुनी कमजोरी के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं। यही सोवियत संघ के पतन का कारण रहा।” कई सालों तक अर्थव्यवस्था गतिरुद्ध रही; उपभोक्ता-वस्तुओं की बड़ी कमी; आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी राजव्यवस्था को शक की नज़र से देखने लगा और खुलेआम सवाल खड़े करने लगा
2संसाधनों का सैन्य-व्यय में झोंका जाना★“सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का अधिकांश परमाणु हथियार और सैन्य साजो-सामान पर लगाया।” उसने संसाधन पूर्वी यूरोप के अपने पिछलग्गू देशों के विकास पर भी खर्च किए ताकि वे सोवियत नियंत्रण में बने रहें। इससे गहरा आर्थिक दबाव बना
3पश्चिम से तुलना का मनोवैज्ञानिक धक्का★“सालों से इन लोगों को बताया जा रहा था कि सोवियत राजव्यवस्था पश्चिम के पूँजीवाद से बेहतर है लेकिन सच्चाई यह थी कि सोवियत संघ पिछड़ चुका था और अपने पिछड़ेपन की पहचान से लोगों को राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा।”
4प्रशासनिक और राजनीतिक जड़ता★“सोवियत संघ पर कम्युनिस्ट पार्टी ने 70 सालों तक शासन किया और यह पार्टी अब जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रह गई थी।” गतिरुद्ध प्रशासन, भारी भ्रष्टाचार, गलतियों को सुधारने में अक्षमता, खुलापन लाने के प्रति अनिच्छा, और देश की विशालता के बावजूद सत्ता का केंद्रीकृत होना — इन सबसे आम जनता अलग-थलग पड़ गई। ‘पार्टी’ के अधिकारियों को आम नागरिक से ज्यादा विशेषाधिकार मिले हुए थे
5गोर्बाचेव के सुधारों की अनपेक्षित परिणति★“जब गोर्बाचेव ने सुधारों को लागू किया और व्यवस्था में ढील दी तो लोगों की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं का ऐसा ज्वार उमड़ा जिसका अनुमान शायद ही कोई लगा सकता था। इस पर काबू पाना एक अर्थ में असंभव हो गया।”
6 ★★राष्ट्रवाद और संप्रभुता की इच्छा का उभार★★“राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और सर्वाधिक तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ।”

4.1 गोर्बाचेव क्यों घिर गए (पृ. 5)

जनमत दो विपरीत दिशाओं में बँट गया —

  • एक तबका: गोर्बाचेव को ज्यादा तेज गति से कदम उठाने चाहिए थे। ये लोग उनकी कार्यपद्धति से धीरज खो बैठे और निराश हो गए; उन्हें लगा कि फायदा नहीं हुआ या बहुत धीमी गति से हो रहा है।
  • दूसरा हिस्सा — ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और वे लोग जो सोवियत व्यवस्था से फायदे में थे — का कहना था कि “हमारी सत्ता और विशेषाधिकार अब कम हो रहे हैं और गोर्बाचेव बहुत जल्दबाजी दिखा रहे हैं।”
  • ★“इस खींचतान में गोर्बाचेव का समर्थन हर तरफ से जाता रहा और जनमत आपस में बँट गया। जो लोग उनके साथ थे उनका भी मोहभंग हुआ।”

4.2 राष्ट्रवाद की विडंबना (पृ. 7) — परीक्षा का पसंदीदा बिंदु★★

  • शीतयुद्ध के दौरान बहुत-से लोग सोचते थे कि मध्य-एशियाई गणराज्यों में राष्ट्रवादी आकांक्षाओं का उभार सबसे दमदार होगा, क्योंकि ये गणराज्य रूस से धार्मिक और नस्ली लिहाज़ से अलग और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए थे।
  • ★★“लेकिन हुआ यह कि सोवियत संघ के प्रति राष्ट्रवादी असंतोष यूरोपीय और अपेक्षतया समृद्ध गणराज्यों — रूस, उक्रेन, जार्जिया और बाल्टिक क्षेत्र — में सबसे प्रबल नज़र आया।”
  • कारण: “यहाँ के आम लोग अपने को मध्य एशियाई गणराज्यों के लोगों से अलग-थलग महसूस कर रहे थे… इन गणराज्यों के लोगों में यह भाव घर कर गया कि ज्यादा पिछड़े इलाकों को सोवियत संघ में शामिल रखने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।”
  • दो मत: (क) राष्ट्रीयता की भावना समूचे इतिहास में कहीं-न-कहीं जारी थी और सुधार होते या न होते, अंदरूनी संघर्ष होना ही था; (ख) गोर्बाचेव के सुधारों ने राष्ट्रवादियों के असंतोष को इस सीमा तक भड़काया कि उस पर शासकों का नियंत्रण नहीं रहा।

5. सोवियत संघ के विघटन का घटना-चक्र (बॉक्स, पृ. 6)★★

तिथिघटना
मार्च 1985मिख़ाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए। बोरिस येल्तसिन को रूस की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रमुख बनाया। सोवियत संघ में सुधारों की शृंखला शुरू की
जून 1988लिथुआनिया में आज़ादी के लिए आंदोलन शुरू। एस्टोनिया और लातविया में भी फैला
अक्टूबर 1989सोवियत संघ की घोषणा कि ‘वारसा समझौते’ के सदस्य अपना भविष्य तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। नवंबर में बर्लिन की दीवार गिरी
फरवरी 1990गोर्बाचेव ने सोवियत संसद ड्यूमा के चुनाव के लिए बहुदलीय राजनीति की शुरुआत की। ★सोवियत सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का 72 वर्ष पुराना एकाधिकार समाप्त
मार्च 1990★लिथुआनिया स्वतंत्रता की घोषणा करने वाला पहला सोवियत गणराज्य बना
जून 1990रूसी संसद ने सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता घोषित की
जून 1991येल्तसिन का कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफा। रूस के राष्ट्रपति बने
अगस्त 1991कम्युनिस्ट पार्टी के गरमपंथियों ने गोर्बाचेव के ख़िलाफ एक असफल तख़्तापलट किया
सितंबर 1991एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया — तीनों बाल्टिक गणराज्य संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य बने। (मार्च 2004 में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन में शामिल)
दिसंबर 1991रूस, बेलारूस और उक्रेन ने 1922 की सोवियत संघ के निर्माण से संबद्ध संधि को समाप्त करने का फैसला किया और स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रकुल बनाया। आर्मेनिया, अजरबैजान, माल्दोवा, कज़ाकिस्तान, किर्गिजिस्तान, ताज़िकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान भी राष्ट्रकुल में शामिल। ★जार्जिया 1993 में राष्ट्रकुल का सदस्य बना। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सोवियत संघ की सीट रूस को मिली
★25 दिसंबर, 1991गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दिया। सोवियत संघ का अंत।

यह तालिका पूरे अध्याय का सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला हिस्सा है। कालक्रम वाले प्रश्न सीधे यहीं से बनते हैं।

6. विघटन की परिणतियाँ (पृ. 7–8)★★

अध्याय स्पष्ट कहता है कि “मोटे तौर पर तीन प्रकार के दूरगामी परिवर्तन हुए”।

परिणति 1 — शीतयुद्ध के दौर के संघर्ष की समाप्ति

  • ‘दूसरी दुनिया’ के पतन का एक परिणाम शीतयुद्ध के दौर के संघर्ष की समाप्ति में हुआ।
  • ★“समाजवादी प्रणाली पूँजीवादी प्रणाली को पछाड़ पाएगी या नहीं — यह विचारधारात्मक विवाद अब कोई मुद्दा नहीं रहा।”
  • शीतयुद्ध के इस विवाद ने दोनों गुटों की सेनाओं को उलझाया था, हथियारों की तेज होड़ शुरू की थी, परमाणु हथियारों के संचय को बढ़ावा दिया था तथा विश्व को सैन्य गुटों में बाँटा था।
  • ★“शीतयुद्ध के समाप्त होने से हथियारों की होड़ भी समाप्त हो गई और एक नई शांति की संभावना का जन्म हुआ।”

परिणति 2 — विश्व राजनीति में शक्ति-संबंध बदल गए

  • विचारों और संस्थाओं के आपेक्षिक प्रभाव में भी बदलाव आया।
  • ★शीतयुद्ध के अंत के समय केवल दो संभावनाएँ थीं —
    • या तो बची हुई महाशक्ति का दबदबा रहेगा और एकध्रुवीय विश्व बनेगा;
    • या फिर कई देश अथवा देशों के अलग-अलग समूह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण मोहरे बनकर उभरेंगे और इस तरह बहुध्रुवीय विश्व बनेगा, जहाँ किसी एक देश का बोलबाला नहीं होगा।
  • ★“हुआ यह कि अमरीका अकेली महाशक्ति बन बैठा।”
  • अमरीका की ताकत और प्रतिष्ठा की शह पाने से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली अर्थव्यवस्था है।
  • ★विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएँ विभिन्न देशों की ताकतवर सलाहकार बन गईं, क्योंकि इन देशों को पूँजीवाद की ओर कदम बढ़ाने के लिए इन संस्थाओं ने कर्ज़ दिया है।
  • ★“राजनीतिक रूप से उदारवादी लोकतंत्र राजनीतिक जीवन को सूत्रबद्ध करने की सर्वश्रेष्ठ धारणा के रूप में उभरा है।”

परिणति 3 — नए देशों का उदय

  • सोवियत खेमे के अंत का एक अर्थ था नए देशों का उदय। इन सभी देशों की स्वतंत्र पहचान और पसंद है।
  • ★कुछ देश, ख़ासकर बाल्टिक और पूर्वी यूरोप के देश, ‘यूरोपीय संघ’ से जुड़ना और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का हिस्सा बनना चाहते थे।
  • ★मध्य एशियाई देश अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाना चाहते थे — इन देशों ने रूस के साथ अपने मजबूत रिश्ते को जारी रखा और पश्चिमी देशों, अमरीका, चीन तथा अन्य देशों के साथ संबंध बनाए।
  • “इस तरह अंतर्राष्ट्रीय फलक पर कई नए खिलाड़ी सामने आये। हरेक के हित, पहचान और आर्थिक-राजनीतिक समस्याएँ अलग-अलग थीं।”

7. साम्यवादी शासन के बाद ‘शॉक थेरेपी’ (पृ. 8–9)★★

7.1 यह थी क्या

  • साम्यवाद के पतन के बाद पूर्व सोवियत संघ के गणराज्य एक सत्तावादी, समाजवादी व्यवस्था से लोकतांत्रिक पूँजीवादी व्यवस्था तक के कष्टप्रद संक्रमण से होकर गुजरे।
  • ★रूस, मध्य एशिया के गणराज्य और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवाद की ओर संक्रमण का एक खास मॉडल अपनाया गया। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्देशित इस मॉडल को ‘शॉक थेरेपी’ (आघात पहुँचाकर उपचार करना) कहा गया। 🔁
  • भूतपूर्व ‘दूसरी दुनिया’ के देशों में शॉक थेरेपी की गति और गहनता अलग-अलग रही लेकिन इसकी दिशा और चरित्र बड़ी सीमा तक एक जैसे थे।

7.2 शॉक थेरेपी के तत्व★

तत्वविवरण
पूर्ण पूँजीवादी मोड़हर देश को पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर पूरी तरह मुड़ना था — सोवियत संघ के दौर की हर संरचना से पूरी तरह निजात पाना
निजी स्वामित्व★“शॉक थेरेपी की सर्वोपरि मान्यता थी कि मिल्कियत का सबसे प्रभावी रूप निजी स्वामित्व होगा।” इसके अंतर्गत राज्य की संपदा के निजीकरण और व्यावसायिक स्वामित्व के ढाँचे को तुरंत अपनाने की बात शामिल थी
खेतीसामूहिक ‘फार्म’ को निजी ‘फार्म’ में बदला गया और पूँजीवादी पद्धति से खेती शुरू हुई
कोई ‘तीसरा रुख़’ नहीं★“इस संक्रमण में राज्य नियंत्रित समाजवाद या पूँजीवाद के अतिरिक्त किसी भी वैकल्पिक व्यवस्था या ‘तीसरे रुख़’ को मंजूर नहीं किया गया।”
मुक्त व्यापारबाहरी व्यवस्थाओं के प्रति रुझान बुनियादी तौर पर बदले — “अब माना जाने लगा कि ज्यादा से ज्यादा व्यापार करके ही विकास किया जा सकता है।” इसलिए ‘मुक्त व्यापार’ को पूर्ण रूप से अपनाना ज़रूरी माना गया
वित्तीय खुलापनवित्तीय खुलापन, मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता और मुक्त व्यापार की नीति महत्त्वपूर्ण मानी गई
व्यापारिक पुनर्संरेखण★सोवियत खेमे के देशों के बीच मौजूद व्यापारिक गठबंधनों को समाप्त कर दिया गया। खेमे के प्रत्येक देश को एक-दूसरे से जोड़ने की जगह सीधे पश्चिमी मुल्कों से जोड़ा गया। इस तरह धीरे-धीरे इन देशों को पश्चिमी अर्थतंत्र में समाहित किया गया

8. ‘शॉक थेरेपी’ के परिणाम (पृ. 9–10)★★

★“1990 में अपनायी गई ‘शॉक थेरेपी’ जनता को उपभोग के उस ‘आनंदलोक’ तक नहीं ले गई जिसका उसने वादा किया था। अमूमन ‘शॉक थेरेपी’ से पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई और इस क्षेत्र की जनता को बर्बादी की मार झेलनी पड़ी।”

8.1 आर्थिक तबाही

परिणामविवरण
औद्योगिक ढाँचा चरमरायारूस में पूरा का पूरा राज्य-नियंत्रित औद्योगिक ढाँचा चरमरा उठा
★‘इतिहास की सबसे बड़ी गराज-सेल’लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कंपनियों को बेचा गया। चूँकि पुनर्निर्माण सरकार द्वारा निर्देशित औद्योगिक नीति के बजाय बाज़ार की ताकतें कर रही थीं, यह कदम सभी उद्योगों को मटियामेट करने वाला साबित हुआ। महत्त्वपूर्ण उद्योगों की कीमत कम से कम करके आंकी गई और उन्हें औने-पौने दामों में बेच दिया गया
अधिकार-पत्रमहा-बिक्री में भाग लेने के लिए सभी नागरिकों को अधिकार-पत्र दिए गए थे, लेकिन अधिकांश नागरिकों ने अपने अधिकार-पत्र कालाबाजारियों के हाथों बेच दिये क्योंकि उन्हें धन की ज़रूरत थी
मुद्रा का पतन★रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में नाटकीय ढंग से गिरावट आई। मुद्रास्फीति इतनी ज्यादा बढ़ी कि लोगों की जमापूँजी जाती रही
खाद्य-सुरक्षासामूहिक खेती की प्रणाली समाप्त हो चुकी थी और लोगों को अब खाद्यान्न की सुरक्षा मौजूद नहीं रही। रूस ने खाद्यान्न का आयात करना शुरू किया
★जीडीपीसन् 1999 में वास्तविक ‘सकल घरेलू उत्पाद’ 1989 की तुलना में कहीं नीचे था
व्यापारिक ढाँचापुराना व्यापारिक ढाँचा टूट चुका था लेकिन इसकी जगह कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो पायी थी
बैंक(चित्र-टिप्पणी, पृ. 10) रूस में कुल डेढ़ हज़ार बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान थे जिनमें से लगभग आधे ‘शॉक थेरेपी’ के परिणामस्वरूप दिवालिया हो गए। मिसाल — इंकॉम बैंक, रूस के इस दूसरे सबसे बड़े बैंक के दिवालिया होने से ग्राहकों के अलावा दस हज़ार कंपनियों और शेयरधारकों की जमापूँजी भी डूब गई

8.2 सामाजिक तबाही

  • समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था को क्रम से नष्ट किया गया।
  • ★“सरकारी रियायतों के खात्मे के कारण ज्यादातर लोग ग़रीबी में पड़ गए।”
  • ★“मध्य वर्ग समाज के हाशिए पर आ गया और अकादमिक-बौद्धिक कामों से जुड़े लोग या तो बिखर गए या बाहर चले गए।”
  • ★“कई देशों में एक ‘माफिया वर्ग’ (जरायमपेशा लोग) उभरा और उसने अधिकतर आर्थिक गतिविधियों को अपने नियंत्रण में ले लिया।”
  • ★“निजीकरण ने नई विषमताओं को जन्म दिया। पूर्व सोवियत संघ में शामिल रहे गणराज्यों और खासकर रूस में अमीर और गरीब लोगों के बीच तीखा विभाजन हो गया। पहले की व्यवस्था के विपरीत, अब धनी और निर्धन लोगों के बीच बहुत गहरी आर्थिक असमानता थी।”

8.3 राजनीतिक विफलता★

  • ★“आर्थिक बदलाव को बड़ी प्राथमिकता दी गई और उस पर पर्याप्त ध्यान भी दिया गया लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण का कार्य ऐसी प्राथमिकता के साथ नहीं हो सका।”
  • इन सभी देशों के संविधान हड़बड़ी में तैयार किए गए।
  • ★रूस सहित अधिकांश देशों में राष्ट्रपति को कार्यपालिका प्रमुख बनाया गया और उसके हाथ में लगभग हरसंभव शक्ति थमा दी गई। फलस्वरूप संसद अपेक्षाकृत कमजोर संस्था रह गई।
  • मध्य एशिया के देशों में राष्ट्रपति को बहुत अधिक शक्तियाँ प्राप्त थीं और इनमें से कुछ सत्तावादी हो गए। ★मिसाल — तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपतियों ने पहले 10 वर्षों के लिए अपने को इस पद पर बहाल किया और इसके बाद समय-सीमा को अगले 10 सालों के लिए बढ़ा दिया। इन राष्ट्रपतियों ने अपने फैसलों से असहमति या विरोध की अनुमति नहीं दी।
  • ★“अधिकतर देशों में न्यायिक संस्कृति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को स्थापित करने का काम करना अभी भी बाकी है।”

8.4 और फिर सुधार (पृ. 10)★

  • ★“रूस सहित अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था ने सन् 2000 में यानी अपनी आज़ादी के 10 साल बाद खड़ा होना शुरू किया।”
  • कारण: ★खनिज — तेल, प्राकृतिक गैस और धातु जैसे प्राकृतिक संसाधनों का निर्यात।
  • ★रूस, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और अज़रबैजान तेल और गैस के बड़े उत्पादक देश हैं।
  • बाकी देशों को अपने क्षेत्र से तेल की पाईप-लाइन गुजरने के कारण फायदा हुआ — इस एवज में इन्हें किराया मिलता है। एक हद तक विनिर्माण का काम भी फिर शुरू हुआ।
  • कार्टून-संवाद (पृ. 9): “मुझे ‘आघात’ तो दीख रहा है लेकिन ‘उपचार’ कहाँ है? हम इतने बड़े-बड़े जुमलों में क्यों बोलते हैं?”

9. संघर्ष और तनाव (पृ. 10–11)★

“पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्ष की आशंका वाले क्षेत्र हैं। अनेक गणराज्यों ने गृहयुद्ध और बग़ावत को झेला है। इसके साथ-साथ इन देशों में बाहरी ताकतों की दखल भी बढ़ी है।”

क्षेत्रसंघर्ष
चेचन्या और दाग़िस्तान (रूस के दो गणराज्य)★हिंसक अलगाववादी आंदोलन। “मास्को ने चेचन विद्रोहियों से निपटने के जो तरीके अपनाये और जिस ग़ैर-जिम्मेदार तरीके से सैन्य बमबारी की उसमें मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन हुआ लेकिन इससे आज़ादी की आवाज दबायी नहीं जा सकी।”
ताज़िकिस्तान★दस वर्षों यानी 2001 तक गृहयुद्ध की चपेट में रहा
अज़रबैजान — नगरनो-कराबाख★यहाँ के कुछ स्थानीय अर्मेनियाई अलग होकर अर्मेनिया से मिलना चाहते हैं
जार्जियादो प्रांत स्वतंत्रता चाहते हैं और गृहयुद्ध लड़ रहे हैं
यूक्रेन, किरगिज़स्तान, जार्जियामौजूदा शासन को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन
कई देश और प्रांतनदी-जल के सवाल पर आपस में भिड़े हुए हैं
चेकोस्लोवाकिया★शांतिपूर्वक दो भागों में बँट गया — चेक तथा स्लोवाकिया नाम के दो देश बने
युगोस्लाविया ★★सबसे गहन संघर्ष बाल्कन क्षेत्र में। सन् 1991 के बाद युगोस्लाविया कई प्रांतों में टूट गया और इसमें शामिल बोस्निया-हर्जेगोविना, स्लोवेनिया तथा क्रोएशिया ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया। यहाँ ‘नाटो’ को हस्तक्षेप करना पड़ा; युगोस्लाविया पर बमबारी हुई और जातीय संघर्ष ने गृहयुद्ध का रूप लिया

9.1 मध्य एशिया — बड़ी ताकतों का अखाड़ा (पृ. 11)★

  • मध्य एशियाई गणराज्यों में हाइड्रोकार्बनिक (पेट्रोलियम) संसाधनों का विशाल भंडार है। इससे आर्थिक लाभ हुआ, लेकिन इसी कारण यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन चला है।
  • यह क्षेत्र रूस, चीन और अफ़ग़ानिस्तान से सटा है तथा पश्चिम एशिया से नजदीक है।
  • ★11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अमरीका इस क्षेत्र में सैनिक ठिकाना बनाना चाहता था। उसने किराए पर ठिकाने हासिल करने के लिए मध्य एशिया के सभी राज्यों को भुगतान किया और अफ़ग़ानिस्तान तथा इराक में युद्ध के दौरान इन क्षेत्रों से अपने विमानों को उड़ाने की अनुमति ली।
  • ★“रूस इन राज्यों को अपना निकटवर्ती ‘विदेश’ मानता है और उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए।”
  • खनिज-तेल जैसे संसाधन की मौजूदगी के कारण चीन के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है।

बॉक्स — उज़्बेकिस्तान में हिंदुस्तानी फिल्मों की धूम (पृ. 11)

  • सोवियत संघ को विघटित हुए सात साल बीत गये लेकिन हिंदी फिल्मों के लिए उज्बेक लोगों में वही ललक मौजूद है।
  • हिंदुस्तान में कोई नई फिल्म रिलीज़ हुई नहीं कि चंद हफ्तों के भीतर इसकी पाइरेटेड कापियाँ उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में बिकने के लिए उपलब्ध हो जाती हैं।
  • मुहम्मद शरीफ़ की दुकान — वे अफगानी हैं और पाकिस्तान के सीमाप्रांत के शहर पेशावर से वीडियो मँगाते हैं। उनका कहना है — “ताशकंद के 70 फीसदी लोग इन फिल्मों को खरीदते हैं। हम लोग रोजाना लगभग 100 वीडियो बेच लेते हैं। मैंने अभी-अभी 1000 और वीडियो का ‘आर्डर’ दिया है। उज्बेक लोग मध्य एशियाई हैं; वे एशिया के अंग हैं। उनकी एक साझी संस्कृति है। इसी कारण वे लोग भारतीय फिल्मों को पसंद करते हैं।”
  • ताशकंद स्थित भारतीय दूतावास के अशोक शर्मा बताते हैं — “हम जहाँ भी जाते हैं और स्थानीय अधिकारियों से मिलते हैं — काबीना मंत्री तक — बातचीत में हमेशा इसका जिक्र करते हैं… भारतीय फिल्म, संस्कृति, गीत और ख़ास तौर पर राजकपूर यहाँ घर-घर जाने जाते हैं। यहाँ अधिकांश लोग हिंदी गीत गा लेते हैं। अर्थ चाहे न मालूम हों लेकिन उनका उच्चारण सही होता है…”
  • स्रोत: बीबीसी के मध्य एशिया संवाददाता लुईस हिदाल्गो की रिपोर्ट।

10. भारत और सोवियत संघ (बॉक्स, पृ. 12)★★

“शीतयुद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के संबंध बहुत गहरे थे। इससे आलोचकों को यह कहने का अवसर भी मिला कि भारत सोवियत खेमे का हिस्सा था। इस दौरान भारत और सोवियत संघ के संबंध बहुआयामी थे।”

आयामविवरण
★आर्थिकसोवियत संघ ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की ऐसे वक्त में मदद की जब ऐसी मदद पाना मुश्किल था। उसने भिलाई, बोकारो और विशाखापट्टनम के इस्पात कारखानों तथा भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स जैसी मशीनरी संयंत्रों के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता दी। भारत में जब विदेशी मुद्रा की कमी थी तब सोवियत संघ ने रुपये को माध्यम बनाकर भारत के साथ व्यापार किया
★राजनीतिकसोवियत संघ ने कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत के रुख को समर्थन दिया। उसने भारत के संघर्ष के गाढ़े दिनों, ख़ासकर सन् 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान मदद की। भारत ने भी सोवियत संघ की विदेश नीति का अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्त्वपूर्ण तरीके से समर्थन किया
★सैन्यभारत को सोवियत संघ ने ऐसे वक्त में सैनिक साजो-सामान दिए जब शायद ही कोई अन्य देश अपनी सैन्य टेक्नालॉजी भारत को देने के लिए तैयार था। सोवियत संघ ने भारत के साथ कई ऐसे समझौते किए जिससे भारत संयुक्त रूप से सैन्य उपकरण तैयार कर सका
सांस्कृतिकहिंदी फिल्म और भारतीय संस्कृति सोवियत संघ में लोकप्रिय थे। बड़ी संख्या में भारतीय लेखक और कलाकारों ने सोवियत संघ की यात्रा की

11. पूर्व-साम्यवादी देश और भारत (पृ. 12–13)★★

  • भारत ने साम्यवादी रह चुके सभी देशों के साथ अच्छे संबंध कायम किए हैं लेकिन भारत के संबंध रूस के साथ सबसे ज्यादा गहरे हैं।
  • ★“भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण पहलू भारत का रूस के साथ संबंध है। भारत-रूस संबंधों का इतिहास आपसी विश्वास और साझे हितों का इतिहास है।”
  • भारतीय हिन्दी फिल्मों के नायकों में राजकपूर से लेकर अमिताभ बच्चन तक रूस और पूर्व सोवियत संघ के बाकी गणराज्यों में घर-घर जाने जाते हैं।

11.1 बहुध्रुवीय विश्व का साझा सपना★★

“रूस और भारत दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है।” बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों देशों का आशय —

  1. अंतर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ मौजूद हों;
  2. ★सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी हो — यानी किसी भी देश पर हमला हो तो सभी देश उसे अपने लिए खतरा मानें और साथ मिलकर कार्रवाई करें;
  3. क्षेत्रीयताओं को ज्यादा जगह मिले;
  4. अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का समाधान बातचीत के द्वारा हो;
  5. हर देश की स्वतंत्र विदेश नीति हो;
  6. संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किए जाएँ तथा इन संस्थाओं को मजबूत, लोकतांत्रिक और शक्तिसंपन्न बनाया जाय।
  • ★“2001 के भारत-रूस सामरिक समझौते के अंग के रूप में भारत और रूस के बीच 80 द्विपक्षीय दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर हुए हैं।”

11.2 भारत को क्या मिलता है

कश्मीर, ऊर्जा-आपूर्ति, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से संबंधित सूचनाओं के आदान-प्रदान, पश्चिम एशिया में पहुँच बनाने तथा चीन के साथ अपने संबंधों में संतुलन लाने जैसे मसलों में फायदे हुए हैं।

11.3 रूस को क्या मिलता है

  • ★“रूस को इस संबंध से सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत रूस के लिए हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार देश है।” भारतीय सेना को अधिकांश सैनिक साजो-सामान रूस से प्राप्त होते हैं।
  • चूँकि भारत तेल के आयातक देशों में से एक है इसलिए भी भारत रूस के लिए महत्त्वपूर्ण है। उसने तेल के संकट की घड़ी में हमेशा भारत की मदद की है।
  • भारत रूस से अपने ऊर्जा-आयात को भी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसी कोशिश कज़ाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ भी चल रही है — सहयोग के अंतर्गत तेल वाले इलाकों में साझेदारी और निवेश भी शामिल है।
  • ★“रूस भारत की परमाण्विक योजना के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। रूस ने भारत के अंतरिक्ष उद्योग में भी ज़रूरत के वक्त क्रायोजेनिक रॉकेट देकर मदद की है। भारत और रूस विभिन्न वैज्ञानिक परियोजनाओं में साझीदार हैं।”

12. जीवनी-बॉक्स — ‘सोवियत संघ के नेता’★★

नेताजीवन-कालविवरण
व्लादिमीर लेनिन1870–1924बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक; 1917 की रूसी क्रांति के नायक और क्रांति के बाद के सबसे मुश्किल दौर (1917–1924) में सोवियत समाजवादी गणराज्य के संस्थापक-अध्यक्ष; मार्क्सवाद को अमली जामा पहनाने में समर्थ; पूरी दुनिया में साम्यवाद के प्रेरणास्रोत
जोजेफ स्टालिन1879–1953लेनिन के उत्तराधिकारी; सोवियत संघ के मजबूत बनने के दौर में (1924–1953) नेतृत्व किया; औद्योगीकरण को तेजी से बढ़ावा और खेती का बलपूर्वक सामूहिकीकरण; दूसरे विश्व युद्ध में जीत का श्रेय; 1930 के दशक के भयानक आतंक, पार्टी के अंदर अपने विरोधियों को कुचलने और तानाशाही रवैये के लिए जिम्मेदार ठहराए गए
निकिता ख़्रुश्चेव1894–1971सोवियत संघ के राष्ट्रपति (1953–1964); स्टालिन की नेतृत्व-शैली के आलोचक; 1956 में कुछ सुधार लागू किए; पश्चिम के साथ ★‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ का सुझाव रखा; हंगरी के जन-विद्रोह के दमन और क्यूबा के मिसाइल संकट में शामिल
लिओनिड ब्रेझनेव1906–1982सोवियत संघ के राष्ट्रपति (1964–1982); ★एशिया की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का सुझाव दिया; अमरीका के साथ संबंधों में तनाव की कमी के दौर से संबंध; चेकोस्लोवाकिया के जन-विद्रोह के दमन और अफगानिस्तान पर आक्रमण में शामिल
मिख़ाइल गोर्बाचेवजन्म 1931★सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्रपति (1985–1991); ★पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) और ग्लासनोस्त (खुलेपन) के आर्थिक और राजनीतिक सुधार शुरू किए; अमरीका के साथ हथियारों की होड़ पर रोक लगाई; अफगानिस्तान और पूर्वी यूरोप से सोवियत सेना वापस बुलाई; जर्मनी के एकीकरण में सहायक; शीतयुद्ध समाप्त किया; सोवियत संघ के विघटन का आरोप लगा
बोरिस येल्तसिन1931–2007★रूस के पहले चुने हुए राष्ट्रपति (1991–1999); कम्युनिस्ट पार्टी में सत्ता केंद्र तक पहुँचे; गोर्बाचेव द्वारा मास्को के मेयर बनाए गए; बाद में गोर्बाचेव के आलोचकों में शामिल और कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफा; 1991 में सोवियत संघ के शासन के खिलाफ विरोध का नेतृत्व; ★सोवियत संघ के विघटन में केंद्रीय भूमिका; साम्यवाद से पूँजीवाद की ओर संक्रमण के दौरान रूसी लोगों को हुए कष्ट के लिए जिम्मेदार ठहराया गया

13. मानचित्र और गतिविधियाँ

सामग्रीपृ.विवरण
मानचित्र8पूर्वी, मध्य यूरोप और ‘स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल’ का मानचित्र — रूसी संघ, बेलारूस, उक्रेन, माल्दोवा, जॉर्जिया, अज़रबैजान, आर्मेनिया, कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताज़िकिस्तान, किरगिज़स्तान; सर्बिया, मोंटेनीग्रो, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, बोस्निया और हर्जेगोविना, कोसोवो (यूएनएससीआर 1244), अल्बानिया, एफवाईआर मैसेडोनिया, रोमानिया, बुल्गारिया, तुर्की। स्रोत: unicef.org। (नोट: सीमाएँ और नाम संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक रूप से अनुमोदित नहीं।) गतिविधि: मानचित्र पर मध्य एशियाई देशों को चिह्नित करें
गतिविधि11“भारत और सोवियत संघ की आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराओं की समानताओं की एक सूची बनाएँ।”
आओ मिलजुल कर करें12चरण: (1) सोवियत और अमरीकी दोनों खेमों के शीतयुद्ध के दौर के पाँच-पाँच देशों को चुनें; (2) कक्षा में समूह बनायें, हर समूह को एक देश का जिम्मा; शीतयुद्ध के दौर में वहाँ के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हालात कैसे थे; (3) साम्यवाद के पतन के बाद उस देश की स्थिति क्या हुई; दूसरी दुनिया के विघटन का प्रभाव उस देश पर क्या हुआ; (4) हर समूह अपने निष्कर्ष कक्षा के सामने रखे। अध्यापकों के लिए: निष्कर्षों को लोकतांत्रिक और साम्यवादी व्यवस्था के सिद्धांत और व्यवहार से जोड़ें; “क्या साम्यवाद और पूँजीवाद का कोई विकल्प हो सकता है” — इस पर चर्चा को बढ़ावा दें
कार्टून-संवाद4“मैं हैरान हूँ! आखिर दुनियाभर के इतने सारे संजीदा लोगों ने ऐसी व्यवस्था को क्यों सराहा?”
कार्टून-संवाद8“मैंने किसी को कहते हुए सुना है कि, ‘सोवियत संघ का अंत समाजवाद का अंत नहीं है’। क्या यह संभव है?”
कार्टून-संवाद9“मुझे ‘आघात’ तो दीख रहा है लेकिन ‘उपचार’ कहाँ है?”
कार्टून-संवाद10★“आखिर राष्ट्रवाद और अलगाववाद में अंतर क्या है? अगर आप कामयाब हो जाते हैं तो राष्ट्रीय नायक कहलाते हैं और अगर नाकामयाब रह जाते हैं तो अलगाववाद फैलाने के अपराधी ठहराए जाते हैं।”

1. सोवियत अर्थव्यवस्था की प्रकृति के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ग़लत है? (क) सोवियत अर्थव्यवस्था में समाजवाद प्रभावी विचारधारा थी। (ख) उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व/नियंत्रण होना। (ग) जनता को आर्थिक आज़ादी थी। (घ) अर्थव्यवस्था के हर पहलू का नियोजन और नियंत्रण राज्य करता था।

2. निम्नलिखित को कालक्रमानुसार सजाएँ? (क) अफ़ग़ान-संकट (ख) बर्लिन-दीवार का गिरना (ग) सोवियत संघ का विघटन (घ) रूसी क्रांति

3. निम्नलिखित में कौन-सा सोवियत संघ के विघटन का परिणाम नहीं है? (क) संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के बीच विचारधारात्मक लड़ाई का अंत (ख) स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल (सीआईएस) का जन्म (ग) विश्व-व्यवस्था के शक्ति-संतुलन में बदलाव (घ) मध्यपूर्व में संकट

4. निम्नलिखित में मेल बैठाएं —

(1)मिख़ाइल गोर्बाचेव(क)सोवियत संघ का उत्तराधिकारी
(2)शॉक थेरेपी(ख)सैन्य समझौता
(3)रूस(ग)सुधारों की शुरुआत
(4)बोरिस येल्तसिन(घ)आर्थिक मॉडल
(5)वारसॉ(ङ)रूस के राष्ट्रपति

5. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें। (क) सोवियत राजनीतिक प्रणाली ______ की विचारधारा पर आधारित थी। (ख) सोवियत संघ द्वारा बनाया गया सैन्य गठबंधन ______ था। (ग) ______ पार्टी का सोवियत राजनीतिक व्यवस्था पर दबदबा था। (घ) ______ ने 1985 में सोवियत संघ में सुधारों की शुरुआत की। (ङ) ______ का गिरना शीतयुद्ध के अंत का प्रतीक था।

6. सोवियत अर्थव्यवस्था को किसी पूँजीवादी देश जैसे संयुक्त राज्य अमरीका की अर्थव्यवस्था से अलग करने वाली किन्हीं तीन विशेषताओं का जिक्र करें।

7. किन बातों के कारण गोर्बाचेव सोवियत संघ में सुधार के लिए बाध्य हुए?

8. भारत जैसे देशों के लिए सोवियत संघ के विघटन के क्या परिणाम हुए?

9. शॉक थेरेपी क्या थी? क्या साम्यवाद से पूँजीवाद की तरफ संक्रमण का यह सबसे बेहतर तरीका था?

10. निम्नलिखित कथन के पक्ष या विपक्ष में एक लेख लिखें — “दूसरी दुनिया के विघटन के बाद भारत को अपनी विदेश-नीति बदलनी चाहिए और रूस जैसे परंपरागत मित्र की जगह संयुक्त राज्य अमरीका से दोस्ती करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।”

उत्तर देखिए

उत्तर-कुंजी: पाठ्यपुस्तक में कोई उत्तर-कुंजी मुद्रित नहीं है और कोई सारांश खंड भी नहीं है। उत्तर 05-Question-Bank.md में शिक्षक द्वारा तैयार हैं।

शब्दावली

पदअंग्रेज़ीअध्याय में प्रयुक्त अर्थ
दो ध्रुवीयताBipolarityविश्व का दो महाशक्तियों के खेमों में बँटा होना
‘दूसरी दुनिया’Second Worldसमाजवादी खेमे के देश; इस खेमे का नेता समाजवादी सोवियत गणराज्य था
सोवियत प्रणालीSoviet systemकम्युनिस्ट पार्टी की धुरी, विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं, योजनाबद्ध और राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था
पेरेस्त्रोइकाPerestroikaपुनर्रचना — गोर्बाचेव का आर्थिक-राजनीतिक सुधार
ग्लासनोस्तGlasnostखुलापन — गोर्बाचेव का सुधार
शॉक थेरेपीShock therapy★‘आघात पहुँचाकर उपचार करना’ — विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्देशित पूँजीवाद की ओर संक्रमण का मॉडल
‘इतिहास की सबसे बड़ी गराज-सेल’Largest garage sale in historyरूस में लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को औने-पौने दामों में बेचे जाने को दिया गया नाम
स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रकुलCommonwealth of Independent States (CIS)दिसंबर 1991 में रूस, बेलारूस और उक्रेन द्वारा गठित
वारसा समझौताWarsaw Pactसोवियत संघ द्वारा बनाया गया सैन्य गठबंधन (अध्याय में केवल एक बार, घटना-चक्र में)
नाटोNATOउत्तर अटलांटिक संधि संगठन
एकध्रुवीय / बहुध्रुवीय विश्वUnipolar / Multipolar worldएक महाशक्ति का दबदबा / कई शक्तियों की मौजूदगी
‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’Peaceful coexistenceख़्रुश्चेव का पश्चिम के साथ सुझाव
निकटवर्ती ‘विदेश’Near abroadरूस मध्य एशियाई राज्यों को इस रूप में देखता है
माफिया वर्गMafia classजरायमपेशा लोग — शॉक थेरेपी के बाद उभरा वर्ग
अधिकार-पत्रVouchersनिजीकरण की महा-बिक्री में भाग लेने के लिए नागरिकों को दिए गए

मुख्य आँकड़े और तिथियाँ

मानसंदर्भ
1917रूस की समाजवादी क्रांति; सोवियत संघ की उत्पत्ति
15सोवियत संघ के गणराज्यों की संख्या
1961 / 28 वर्ष / 150 किमी से अधिक / 9 नवंबर 1989बर्लिन की दीवार — निर्माण / अवधि / लंबाई / गिरना
आठपूर्वी यूरोप के वे देश जिन्होंने साम्यवादी शासन बदला
1979सोवियत संघ का अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप
70 सालकम्युनिस्ट पार्टी के शासन की अवधि
72 वर्षसोवियत सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार (फरवरी 1990 में समाप्त)
मार्च 1985गोर्बाचेव महासचिव बने
मार्च 1990लिथुआनिया — स्वतंत्रता घोषित करने वाला पहला गणराज्य
दिसंबर 1991रूस, बेलारूस, उक्रेन — सोवियत संघ की समाप्ति; CIS का गठन; 1922 की संधि समाप्त
25 दिसंबर 1991गोर्बाचेव का इस्तीफा — सोवियत संघ का अंत
1993जार्जिया राष्ट्रकुल का सदस्य बना
मार्च 2004तीनों बाल्टिक गणराज्य नाटो में शामिल
1990शॉक थेरेपी अपनायी गई
लगभग 90 प्रतिशतनिजी हाथों में बेचे गए उद्योग
1999 बनाम 19891999 का वास्तविक GDP 1989 से कहीं नीचे
डेढ़ हज़ार / लगभग आधेरूस के बैंक और वित्तीय संस्थान / शॉक थेरेपी से दिवालिया
दस हज़ारइंकॉम बैंक के दिवालिया होने से डूबीं कंपनियाँ और शेयरधारक
सन् 2000 / 10 सालअर्थव्यवस्थाओं का खड़ा होना शुरू / आज़ादी के कितने साल बाद
10 + 10 वर्षतुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपतियों का कार्यकाल-विस्तार
2001ताज़िकिस्तान का गृहयुद्ध समाप्त (दस वर्ष); भारत-रूस सामरिक समझौता; 11 सितंबर
80भारत-रूस के बीच हस्ताक्षरित द्विपक्षीय दस्तावेज़
1991युगोस्लाविया का टूटना
1971पाकिस्तान से युद्ध में सोवियत मदद
दूसरा सबसे बड़ारूस के लिए भारत — हथियारों का खरीददार
सात साल / 70 फीसदी / 100 / 1000उज्बेकिस्तान बॉक्स — विघटन के बाद / ताशकंद में फिल्म खरीदने वाले / रोज़ाना बिकते वीडियो / नया ऑर्डर

भ्रमित करने वाले युग्म

युग्मभेद
पेरेस्त्रोइका बनाम ग्लासनोस्तपुनर्रचना बनाम खुलापन
1917 बनाम 19221917 समाजवादी क्रांति; 1922 सोवियत संघ के निर्माण की संधि (दिसंबर 1991 में समाप्त)
बर्लिन की दीवार — 1961 बनाम 1989बनी 1961, गिरी 9 नवंबर 1989; बीच में 28 वर्ष
लिथुआनिया बनाम रूस★लिथुआनिया — स्वतंत्रता घोषित करने वाला पहला गणराज्य (मार्च 1990); रूसी संसद ने जून 1990 में घोषित किया
राष्ट्रवाद का उभार कहाँ प्रबल था★मध्य एशिया में नहीं — बल्कि रूस, उक्रेन, जार्जिया और बाल्टिक में। मध्य एशियाई गणराज्यों ने स्वतंत्रता माँगी ही नहीं
CIS का गठन — तीन देशरूस, बेलारूस, उक्रेन (कज़ाकिस्तान नहीं)
उत्तराधिकारी राज्यरूस — UNSC सीट, एकमात्र परमाणु शक्ति, संधियों का जिम्मा
शॉक थेरेपी किसने निर्देशित की★विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
विघटन के तीन परिणाम(1) शीतयुद्ध के संघर्ष की समाप्ति (2) शक्ति-संबंध बदले → अमरीका अकेली महाशक्ति (3) नए देशों का उदय
चेकोस्लोवाकिया बनाम युगोस्लाविया★चेकोस्लोवाकिया शांतिपूर्वक दो में बँटा; युगोस्लाविया में गृहयुद्ध और नाटो की बमबारी
गोर्बाचेव बनाम येल्तसिनगोर्बाचेव — सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्रपति; येल्तसिन — रूस के पहले चुने हुए राष्ट्रपति
ख़्रुश्चेव बनाम ब्रेझनेवख़्रुश्चेव — ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’, हंगरी और क्यूबा मिसाइल संकट; ब्रेझनेव — एशियाई सामूहिक सुरक्षा, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान
अध्याय का नाम★‘दो ध्रुवीयता का अंत’ — ‘शीतयुद्ध का दौर’ वाला अध्याय युक्तिकरण में हटा दिया गया