अध्याय 6लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

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स्रोत: स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, NCERT — अध्याय 6, पृष्ठ 92–111 (20 पृष्ठ) QR कोड: 12122CH06 — ★युक्तिकरण के बाद भी यह अध्याय 6 ही रहा। पठन-विधि: ! फ़ॉन्ट LEGACY (8/8 अविश्वसनीयता) — 150 dpi पर दृश्य पठन, पाठ-निष्कर्षण नहीं।

⚡ अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी

★★“इस तरह आपातकाल का एक सबक तो यही है कि भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।” — 【पाठ】 पृ. 102

! पर उसके साथ यह भी: “सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। फिर भी, इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया।” (पृ. 109)

★दोनों वाक्य एक साथ रखिए — यही पूरा अध्याय है: लोकतंत्र टूटा नहीं, पर वह ठप्प किया जा सका।

पृष्ठ 92 · अध्याय-आरंभ

📰 आवरण-सामग्री

‘नई दुनिया’ अख़बार का पन्ना — 27 जून 1975। मुख्य शीर्षक: “मिलावट रोकने में जन सहयोग का अभाव”; कोने में स्तंभ “पत्र, सम्पादक के नाम”।

🖤 और उसके साथ का काला बॉक्स — इसे कक्षा में सबसे पहले पढ़िए★★

“27 जून, 1975 के ‘नई दुनिया’ अखबार का संपादकीय भी बाकी दिनों की ही तरह बदस्तूर मौजूद था। बस अंतर यह था कि ‘संपादकीय’ की जगह खाली छोड़ दी गई थी। संपादकीय को आपातकालीन अधिकारों के अंतर्गत ‘सेंसर’ कर दिया गया था। कई अन्य अखबारों में भी जगह-जगह रिक्त स्थान छोड़े जाते थे। कई दफे ऐसा आपातकाल के प्रति विरोध जताने के लिए किया जाता था। बाद में खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।”

★★कक्षा से पूछिए: “एक खाली जगह किस तरह विरोध बन जाती है? और उस विरोध को रोकने के लिए सरकार को क्या करना पड़ा?” — उत्तर: खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी। यही सेंसरशिप की पूरी कहानी एक चित्र में है।

‘इस अध्याय में…’(पाठ का अपना परिचय)

“हम देख चुके हैं कि 1971 के बाद कांग्रेस को नवजीवन मिला लेकिन इस पार्टी में अब पहले वाली बात नहीं रही। कांग्रेस पार्टी अब बदल चुकी थी। 1973 से 1975 के बीच घटी घटनाओं से यह अंतर और भी ज्यादा स्पष्ट हो गया। इन घटनाओं से भारत की लोकतांत्रिक राजनीति और संविधान निर्देशित सांस्थानिक संतुलन को नयी चुनौतियों ने घेरा।” “1975 के जून माह में देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। आमतौर पर आपातकाल से हमारे मन में युद्ध और आक्रमण अथवा प्राकृतिक आपदा की तसवीर कौंधती है लेकिन अपने देश में आपातकाल की यह घोषणा अंदरूनी गड़बड़ियों की आशंका के मद्देनजर की गई थी। ★आपातकाल की घोषणा जिस नाटकीय रूप में हुई थी उसी अंदाज़ में इसका खात्मा भी हुआ। आपातकाल की घोषणा के कारण 1977 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस हार गई।”

चार प्रश्न जिन पर अध्याय चलेगा:

  1. आपातकाल क्यों लागू किया गया? क्या ऐसा करना जरूरी था?
  2. आपातकाल लागू करने का व्यावहारिक अर्थ क्या था?
  3. दलगत राजनीति के लिहाज से आपातकाल के क्या परिणाम हुए?
  4. आपातकाल से भारतीय लोकतंत्र ने क्या सबक सीखे?

पृष्ठ 93 · आपातकाल की पृष्ठभूमि

🔷 राजनीतिक पृष्ठभूमि

“1967 के बाद से भारतीय राजनीति में जो बदलाव आ रहे थे उनके बारे में हम पहले ही पढ़ चुके हैं। इंदिरा गाँधी एक कद्दावर नेता के रूप में उभरी थीं और उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी। इस दौर में दलगत प्रतिस्पर्धा कहीं ज्यादा तीखी और ध्रुवीकृत हो चली थी।” ✓ (अध्याय 5 का संदर्भ — सही)

न्यायपालिका और सरकार का तनाव — पहली झलक★★

पक्षतर्क
सर्वोच्च न्यायालय“सरकार की कई पहलकदमियों को संविधान के विरुद्ध माना”
कांग्रेस पार्टी“अदालत का यह रवैया लोकतंत्र के सिद्धांतों और संसद की सर्वोच्चता के विरुद्ध है”; और अदालत “एक यथास्थितिवादी संस्था है” जो “गरीबों को लाभ पहुँचाने वाले कल्याण-कार्यक्रमों को लागू करने की राह में रोड़े अटका रही है”
विपक्ष! “सरकारी प्राधिकार को निजी प्राधिकार मानकर इस्तेमाल किया जा रहा है और राजनीति हद से ज्यादा व्यक्तिगत होती जा रही है”

★“कांग्रेस की टूट से इंदिरा गाँधी और उनके विरोधियों के बीच मतभेद गहरे हो गए थे।”

🔷 आर्थिक संदर्भ — यह सारणी बोर्ड पर उतरवाइए★★

“1971 के चुनाव में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। बहरहाल 1971–72 के बाद के सालों में भी देश की सामाजिक-आर्थिक दशा में खास सुधार नहीं हुआ।”

#कारकविवरण
1बांग्लादेश संकट“भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा था। लगभग 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पार करके भारत आ गए थे।”
21971 का युद्ध“इसके बाद पाकिस्तान से युद्ध भी करना पड़ा।”
3! अमरीकी सहायता बंद“युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया।”
4★तेल-संकट“अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी हुई।”
5★★मूल्यवृद्धि“1973 में चीज़ों की कीमतों में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। इस तीव्र मूल्यवृद्धि से लोगों को भारी कठिनाई हुई।”
6औद्योगिक ठहराव“औद्योगिक विकास की दर बहुत कम थी और बेरोजगारी बहुत बढ़ गई थी। ग्रामीण इलाकों में बेरोज़गारी बेतहाशा बढ़ी थी।”
7! वेतन-रोक“खर्चे को कम करने के लिए सरकार ने अपने कर्मचारियों के वेतन को रोक लिया। इससे सरकारी कर्मचारियों में बहुत असंतोष पनपा।”
8मानसून की विफलता“1972–73 के वर्ष में मानसून असफल रहा। इससे कृषि की पैदावार में भारी गिरावट आई। खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया।”

★★कारक 7 पर रुकिए — सरकारी कर्मचारियों का असंतोष 1974 की रेल-हड़ताल की सीधी जड़ है।

“आर्थिक स्थिति की बदहाली को लेकर पूरे देश में असंतोष का माहौल था। इस स्थिति में गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने बड़े कारगर तरीके से जन-विरोध की अगुवाई की। 1960 के दशक से ही छात्रों के बीच विरोध के स्वर उठने लगे थे। ये स्वर इस अवधि में और ज्यादा प्रबल हो उठे।”

🎨 कार्टून(कुट्टी)

प्रधानमंत्री कह रही हैं: “आगे के दिन मुश्किल”; एक चिंतित नागरिक बैठा है। चित्र-शीर्षक: “अच्छा तो यही होता कि 1973 का यह साल जितनी जल्दी हो सके, बीत जाता।”

पृष्ठ 94 · नक्सलवाद, गुजरात और बिहार के आंदोलन

नक्सलवादी आंदोलन(यह अंश अध्याय 5 के अग्रिम-संदर्भ का उत्तर है)★★

“संसदीय राजनीति में विश्वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी इस अवधि में बढ़ी। इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाया तथा राज्यविरोधी तकनीकों का सहारा लिया। ★ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए। ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सक्रिय थे। पश्चिम बंगाल की सरकार ने इन्हें दबाने के लिए कठोर कदम उठाए।” ✓ यही अंश अध्याय 5 (पृ. 77) के उस वाक्य को पूरा करता है — “आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे कि… सशस्त्र कृषक-विद्रोह का नेतृत्व किया।”

🔷 गुजरात और बिहार के आंदोलन

“गुजरात और बिहार दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। यहाँ के छात्र-आंदोलन ने इन दोनों प्रदेशों की राजनीति पर गहरा असर तो डाला ही, राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर भी इसके दूरगामी प्रभाव हुए।”

गुजरात★

मदविवरण
कब1974 के जनवरी माह
मुद्देखाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमत; और उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार
विस्तार“छात्र-आंदोलन में बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शरीक हो गईं और इस आंदोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया।”
! परिणाम“ऐसे में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।”
★मोरारजी देसाई“अगर राज्य में नए सिरे से चुनाव नहीं करवाए गए तो मैं अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठ जाऊँगा।” — “मोरारजी अपने कांग्रेस के दिनों में इंदिरा गाँधी के मुख्य विरोधी रहे थे।”
★★अंत“विपक्षी दलों द्वारा समर्थित छात्र-आंदोलन के गहरे दबाव में 1975 के जून में विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस इस चुनाव में हार गई।”

बिहार★★

मदविवरण
कब1974 के मार्च माह
मुद्देबढ़ती हुई कीमतें, खाद्यान्न का अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार
★जेपी का आगमन“छात्रों ने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को बुलावा भेजा। जेपी तब सक्रिय राजनीति छोड़ चुके थे और सामाजिक कार्यों में लगे हुए थे।”
★★जेपी की दो शर्तें“जेपी ने छात्रों का निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा।”
परिणाम“इस प्रकार छात्र-आंदोलन ने एक राजनीतिक चरित्र ग्रहण किया और उसके भीतर राष्ट्रव्यापी अपील आई। जीवन के हर क्षेत्र के लोग अब आंदोलन से आ जुड़े।”
★★माँग और आह्वान“जयप्रकाश नारायण ने बिहार की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की माँग की। उन्होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया ताकि उन्हीं के शब्दों में ‘सच्चे लोकतंत्र’ की स्थापना की जा सके।”
!“बिहार की सरकार के खिलाफ़ लगातार घेराव, बंद और हड़ताल का एक सिलसिला चल पड़ा। बहरहाल, सरकार ने इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया।”

रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल★

“जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के साथ ही साथ रेलवे के कर्मचारियों ने भी एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। इससे देश के रोज़मर्रा के कामकाज के ठप्प हो जाने का खतरा पैदा हो गया।”

🖼 हाशिये की सामग्रीध्यान

मदपाठ
हाशिया-कार्टून“गरीब जनता पर सचमुच भारी मुसीबत आई होगी। आखिर गरीबी हटाओ के वादे का हुआ क्या?”
★नारा-बॉक्स 1“सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!” — 1974 के बिहार आंदोलन का एक नारा
★★नारा-बॉक्स 2“इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” — कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ (1974) ने यह नारा दिया था

★★दोनों नारे आमने-सामने रखिए — यही पूरा टकराव है। एक कहता है ‘भविष्य हमारा है’, दूसरा कहता है ‘देश और नेता एक ही हैं’। कक्षा से पूछिए: “दूसरे नारे में लोकतंत्र के लिए क्या खतरा छिपा है?”

पृष्ठ 95 · जेपी का संसद-मार्च और कार्टून

🎨 कार्टून — आर.के. लक्ष्मण(टाइम्स ऑफ इंडिया, 16 अप्रैल 1974)★★

पृष्ठभूमि में उथल-पुथल के बीच तीन शब्द तैरते हैं — ‘भ्रष्टाचार’, ‘जंगलराज’, ‘हिंसा’। दाईं ओर एक व्यक्ति चटाई पर बैठा है, हाथ में तख्ती — “लोकतंत्र बचाओ — जे.पी.” बाईं ओर कुछ नेता उँगली उठाकर कह रहे हैं — “देखो! वह लोकतंत्र को पलीता लगाना चाहता है, अराजकता फैलाना चाहता है और सत्ता हासिल…”

★★कार्टून का पूरा व्यंग्य समझाइए: जो आदमी ‘लोकतंत्र बचाओ’ की तख्ती लिए शांति से बैठा है, उसी पर ‘लोकतंत्र को पलीता लगाने’ का आरोप लग रहा है — जबकि पीछे भ्रष्टाचार, जंगलराज और हिंसा साफ़ दिख रहे हैं। ★यह कार्टून अध्याय के केंद्रीय प्रश्न को एक चित्र में रख देता है: लोकतंत्र के लिए असली खतरा किधर से था?

🔷 पाठ

“1975 में जेपी ने जनता के ‘संसद-मार्च’ का नेतृत्व किया। देश की राजधानी में अब तक इतनी बड़ी रैली नहीं हुई थी।” ★“जयप्रकाश नारायण को अब भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी जैसे गैर-कांग्रेसी दलों का समर्थन मिला। इन दलों ने जेपी को इंदिरा गाँधी के विकल्प के रूप में पेश किया।”

और आलोचनाएँ भी — यह संतुलन ज़रूरी हैध्यान

“बहरहाल जेपी के विचारों और उनके द्वारा अपनायी गई जन-प्रतिरोध की रणनीति की आलोचनाएँ भी मुखर हुईं। गुजरात और बिहार, दोनों ही राज्यों के आंदोलन को कांग्रेस विरोधी आंदोलन माना गया। कहा गया कि ये आंदोलन राज्य सरकार के खिलाफ़ नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व के खिलाफ़ चलाए गए हैं। ! इंदिरा गाँधी का मानना था कि ये आंदोलन उनके प्रति व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित हैं।”

★★यह वाक्य अध्याय 5 की उसी प्रवृत्ति की अगली कड़ी है — 1967 में जन-विरोध को ‘कानून-व्यवस्था’ माना गया; 1974 में उसे ‘व्यक्तिगत विरोध’ माना गया।

📦 बॉक्स:लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) (1902–1979)

युवावस्था में मार्क्सवादी · कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव · 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन के नायक · ★नेहरू के उत्तराधिकारी के रूप में देखे गए; नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार · 1955 के बाद सक्रिय राजनीति छोड़ी · गाँधीवादी बनने के बाद भूदान आंदोलन में सक्रिय · नगा विद्रोहियों से सुलह की बातचीत की; कश्मीर में शांति प्रयास किए; चंबल के डकैतों से आत्मसमर्पण कराया · ★★बिहार आंदोलन के नेता; आपातकाल के विरोध के प्रतीक बन गए थे; जनता पार्टी के गठन के प्रेरणास्रोत।

पृष्ठ 96 · न्यायपालिका से संघर्ष, और 1974 की रेल हड़ताल

📦 बॉक्स:1974 की रेल हड़ताल( पूरा बॉक्स परीक्षा-योग्य है)★★

“यदि रेलगाड़ियों का चलना बंद हो जाए तो क्या होगा? एक या दो दिन नहीं, बल्कि हफ़्ते भर से ज्यादा समय तक रेलगाड़ियाँ न चलें तो? …देश की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाएगी, क्योंकि रेलगाड़ियों के माध्यम से ही देश में एक जगह से दूसरी जगह सामानों की ज्यादातर ढुलाई होती है।”

मदविवरण
★किसने बुलाई“रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों की एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।”
माँगें“बोनस और सेवा से जुड़ी शर्तों के संबंध में अपनी माँगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए”
कब★1974 के मई महीने में — “भारत के इस सबसे बड़े सार्वजनिक उद्यम के कर्मचारी”
★★उठे सवाल“इस हड़ताल से मज़दूरों के अधिकार जैसे मसले तो उठे ही, यह सवाल भी उठा कि आवश्यक सेवाओं से जुड़े हुए कर्मचारी अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर सकते हैं या नहीं।”
! सरकार का रुख“सरकार ने इस हड़ताल को अवैधानिक करार दिया। …माँगों को मानने से इनकार कर दिया। उसने इसके कई नेताओं को गिरफ्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना को तैनात कर दिया।”
! अंत“ऐसे में 20 दिन के बाद यह हड़ताल बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई।”

🔷 न्यायपालिका से संघर्ष — तीन संवैधानिक मसले★★

“आपने पिछले साल पढ़ा था। इस क्रम में तीन संवैधानिक मसले उठे थे:” ✓ (कक्षा 11 की पुस्तक का संदर्भ — सही)

#मसलासर्वोच्च न्यायालय का उत्तर
1“क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है?”! “संसद ऐसा नहीं कर सकती।”
2“क्या संसद संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है?”! “सरकार, संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए।”
3“संसद ने… संविधान में संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है”! “सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया।”

★★केशवानंद भारती का मुकदमा: “इस संकट की परिणति केशवानंद भारती के मशहूर मुकदमे के रूप में सामने आई। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है।”

दो और बातें जिन्होंने तनाव बढ़ायाध्यान★

#घटना
1★★“1973 में केशवानंद भारती के मुकदमे में फ़ैसला सुनाने के तुरंत बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हुआ। …सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनाने की परिपाटी चली आ रही थी, लेकिन 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। ! यह निर्णय राजनीतिक रूप से विवादास्पद बन गया क्योंकि जिन तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी की गई थी उन्होंने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फ़ैसला दिया।”
2★★“इस संघर्ष का चरमबिंदु तब आया जब एक उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया।”

और वह शब्द जो इस दौर की पहचान बन गयाध्यान

“जो लोग प्रधानमंत्री के नज़दीकी थे वे एक ऐसी ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की ज़रूरत के बारे में बातें करने लगे जो विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण करे।” और हाशिया-प्रश्न: “क्या ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ और ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ का मतलब यह है कि न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी शासक दल के प्रति निष्ठावान हों?” ★★यह प्रश्न कक्षा में ज़रूर उठाइए — यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न है।

पृष्ठ 97 · आपातकाल की घोषणा

12 जून 1975 — इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला★★

मदविवरण
न्यायाधीश★जगमोहन लाल सिन्हा
याचिकाकर्ता★समाजवादी नेता राजनारायण — “इंदिरा गाँधी के खिलाफ़ 1971 में बतौर उम्मीदवार चुनाव में खड़े हुए थे”
आरोप“उन्होंने चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्तेमाल किया था”
★★फ़ैसला“लोकसभा के लिए इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया”
★अर्थ“कानूनन अब इंदिरा गाँधी सांसद नहीं रहीं और अगर अगले छह महीने की अवधि में दोबारा सांसद निर्वाचित नहीं होतीं, तो प्रधानमंत्री के पद पर कायम नहीं रह सकतीं।”
★★24 जून 1975सर्वोच्च न्यायालय का आंशिक स्थगनादेश — “जब तक इस फ़ैसले को लेकर की गई अपील की सुनवाई नहीं होती तब तक इंदिरा गाँधी सांसद बनी रहेंगी; लेकिन वे लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती हैं।”

🔷 संकट और सरकार का फ़ैसला

“एक बड़े राजनीतिक संघर्ष के लिए अब मैदान तैयार हो चुका था।”

तिथिघटना
★★25 जून 1975“जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी दलों ने… दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शन किया।”
★★“जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गाँधी से इस्तीफ़े की माँग करते हुए राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की।”
!★★“जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आह्वान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें। इससे भी सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ।”
—“देश का राजनीतिक मिजाज़ अब पहले से कहीं ज्यादा कांग्रेस के खिलाफ़ हो गया।”

हाशिया-प्रश्न: ! “यह तो सेना से सरकार के खिलाफ़ बगावत करने को कहने जैसा जान पड़ता है! क्या यह बात लोकतांत्रिक है?” ★★यह प्रश्न ज़रूर उठाइए — और दोनों पक्ष सुनिए। पाठ्यपुस्तक स्वयं इसे प्रश्न के रूप में छोड़ती है, उत्तर नहीं देती।

25 जून 1975 — आपातकाल की घोषणा★★

“सरकार ने इन घटनाओं के मद्देनजर जवाब में ‘आपातकाल’ की घोषणा कर दी। 25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया। इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।” “सरकार का निर्णय था कि गंभीर संकट की घड़ी आन पड़ी है और इस वजह से आपातकाल की घोषणा जरूरी हो गई है। ★तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा करना सरकार की शक्तियों के दायरे में था क्योंकि हमारे संविधान में सरकार को आपातकाल की स्थिति में विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।”

पृष्ठ 98 · आपातकाल की शक्तियाँ और 25 जून की रात

🎨 कार्टून — आर.के. लक्ष्मण(टाइम्स ऑफ इंडिया, 26 जून 1975)★★

एक कुर्सी पर बैठी आकृति उफनती लहरों के बीच है; लहरों पर लिखा है ‘राजनीतिक संकट’। कुर्सी की पीठ पर लिखा है ‘स्थगनादेश’। दाईं ओर भारी भीड़ है, जिसके हाथों में ‘JAY’ और ‘STAY’ की तख्तियाँ हैं; कोई कह रहा है — “इतने लोगों के साथ रहते हुए आपको कुर्सी छोड़ने की बात नहीं सोचनी चाहिए…”

चित्र-शीर्षक: “यह कार्टून आपातकाल की घोषणा के चंद रोज़ पहले छपा था। इसमें मौजूदा राजनीतिक संकट की आहटों को पढ़ा जा सकता है। ★कुर्सी को पीछे से सहारा देता हाथ कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ का है।” ★★इस कार्टून को पृ. 94 के नारे ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ से जोड़िए — वही डी.के. बरुआ, वही सहारा।

आपातकाल का व्यावहारिक अर्थ — दो बड़े बदलाव★★

#बदलाव
1★★“आपातकाल की घोषणा के साथ ही शक्तियों के बँटवारे का संघीय ढाँचा व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है और सारी शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथ में चली आती हैं।”
2★★“सरकार चाहे तो ऐसी स्थिति में किसी एक अथवा सभी मौलिक अधिकारों पर रोक लगा सकती है अथवा उनमें कटौती कर सकती है।”

“संविधान के प्रावधान में आए शब्दों से यह स्पष्ट हो जाता है कि आपातकाल को वहाँ एक असाधारण स्थिति के रूप में देखा गया है जब सामान्य लोकतांत्रिक राजनीति के कामकाज नहीं किए जा सकते।”

25 जून 1975 की रातध्यान

“25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी।” ! “आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई। तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई।” ★★“26 जून की सुबह 6 बजे एक विशेष बैठक में मंत्रिमंडल को इन बातों की सूचना दी गई, लेकिन तब तक बहुत कुछ हो चुका था।” (पृ. 101 की पहली पंक्तियाँ)

हाशिया-प्रश्न: !★“क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर आपातकाल की घोषणा करनी चाहिए थी? कितनी अजीब बात है!” ★★यह प्रश्न पृ. 102 के ‘सबक’ से जुड़ता है — बाद में यही खामी दूर की गई।

पृष्ठ 99–100 · दो समाचार-कोलाज(इन्हें छोड़िए मत)

📰 पृष्ठ 99 का कोलाज — सेंसरशिप का दस्तावेज़

सामग्रीविवरण
‘नई दुनिया’ (इंदौर, 26 जून 1975)“अखबारों पर बंदिश लगी, हटी”; “देश में तानाशाही रोकने के लंबे संघर्ष हेतु तैयार रहें” (रामलीला मैदान की विशाल सभा और ‘जयबाबू’ की घोषणा); “श्रीमती गांधी को प्रधान… बने रहना”
★★सेंसर के आदेश (टेलीप्रिंटर संदेश)“The censor rang up to say that the Prime Minister’s interview to the correspondent of the Daily Telegraph should be sent to him before publication.” (September 28, 1976)
★★दूसरा आदेश“No news, comments, rumour or other reports relating to the family planning programme should be published without clearance from the Censor.” (Editorial, 7/3/1976)
कार्टून (आर.के. लक्ष्मण, 11 दिसंबर 1975)एक व्यक्ति अख़बार पढ़ रहा है जिसमें केवल “FINE · GREAT · PLENTY · VERY GOOD · VERY HAPPY · ROSY” जैसे शब्द छपे हैं

★★लक्ष्मण के कार्टून का अर्थ: सेंसर के बाद अख़बार में केवल अच्छी ख़बरें बचीं — और इसीलिए वह अख़बार रहा ही नहीं।

📰 पृष्ठ 100 का कोलाज — घोषणा से पराजय तक

सामग्रीविवरण
‘नई दुनिया’ (26 जून 1975)★“नया आपातकाल : जयप्रकाश और कई नेता गिरफ्तार”; साथ में स्तंभ “क्या नहीं हुआ” — “(1) भारत का संविधान अब भी लागू है और वह समाप्त नहीं हुआ है… (2) राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हुआ है…”
सरकारी नारे“Emergency ensures — YOUR Security and the NATION’S”; “WORK MORE TALK LESS”; “प्रधान मन्त्री का क्रान्तिकारी कार्यक्रम — आइए, इसे सफल बनाएं”
हिंदुस्तान टाइम्स की सूचना“The city edition of Friday and dak editions… could not be brought out as no power was available from 12-45 pm on Friday…”
★★हिंदुस्तान टाइम्स (21 मार्च 1977)“MRS GANDHI DEFEATED”; “Janta Party forges ahead in North”; “Bansi Lal, Sanjay out”; “Cong rout in Delhi total”; “Nightmare over, says Vajpayee”
! अमूल का विज्ञापन“We’ve always practised Compulsory Sterilisation” — नसबंदी कार्यक्रम पर व्यंग्य

पृष्ठ 101 · आपातकाल के परिणाम

तात्कालिक परिणाम — यह सारणी अध्याय की सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली सारणी हैध्यान★★

#परिणाम
1“सरकार के इस फ़ैसले से विरोध-आंदोलन एकबारगी रुक गया; हड़तालों पर रोक लगा दी गई।”
2“अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक माहौल में तनाव भरा एक गहरा सन्नाटा छा गया।”
3★★प्रेस सेंसरशिप — “सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी। समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है। इसे प्रेस सेंसरशिप के नाम से जाना जाता है।”
4! “सामाजिक और सांप्रदायिक गड़बड़ी की आशंका के मद्देनजर सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया।”
5“धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी।”
6★★“सबसे बड़ी बात यह हुई कि… नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए। उनके पास अब यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ।”

निवारक नज़रबंदीध्यान★

परिभाषा (पाठ के शब्दों में): “इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।” ! “सरकार ने आपातकाल के दौरान निवारक नज़रबंदी अधिनियमों का प्रयोग करके बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ कीं। जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, वे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती भी नहीं दे सकते थे।”

अप्रैल 1976 — सर्वोच्च न्यायालय का विवादास्पद फ़ैसलाध्यान★★

“अनेक उच्च न्यायालयों ने फ़ैसला दिया कि आपातकाल की घोषणा के बावजूद अदालत किसी व्यक्ति द्वारा दायर की गई ऐसी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को विचार के लिए स्वीकार कर सकती है जिसमें उसने अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती दी हो।” !★★“1976 के अप्रैल माह में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले को उलट दिया और सरकार की दलील मान ली। इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले से नागरिकों के लिए अदालत के दरवाज़े बंद हो गए। इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया।”

हाशिया-प्रश्न: ! “अरे! सर्वोच्च न्यायालय ने भी साथ छोड़ दिया! उन दिनों सबको क्या हो गया था?”

प्रतिरोध — यह हिस्सा ज़रूर पढ़ाइए★★

#प्रतिरोध का रूप
1“पहली लहर में जो राजनीतिक कार्यकर्ता गिरफ्तारी से बच गए थे वे ‘भूमिगत’ हो गए और उन्होंने सरकार के खिलाफ़ मुहिम चलायी।”
2★“‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने प्रेस पर लगी सेंसरशिप का विरोध किया। जिन समाचारों को छापने से रोका जाता था उनकी जगह ये अखबार खाली छोड़ देते थे।”
3★★“‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ जैसी पत्रिकाओं ने सेंसरशिप के आगे घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा।”
4“सेंसरशिप को धत्ता बताते हुए गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर और लीफ़लेट्स निकले।”
5★★“पद्मभूषण से सम्मानित कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत और पद्मश्री से सम्मानित हिंदी लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने लोकतंत्र के दमन के विरोध में अपनी-अपनी पदवी लौटा दी।”
! पर संतुलन भी“बहरहाल, मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए।” (पृ. 102)

★★अंतिम पंक्ति पर ज़ोर दीजिए — पाठ्यपुस्तक प्रतिरोध को महिमामंडित नहीं करती। वह ईमानदारी से कहती है कि विरोध करने वाले थोड़े ही थे। और उसी पन्ने का हाशिया-प्रश्न पूछता है: “जिन चंद लोगों ने प्रतिरोध किया, उनकी बात छोड़ दें — बाकियों के बारे में सोचें कि उन्होंने क्या किया!”

पृष्ठ 102 · 42वाँ संशोधन और आपातकाल के सबक

🖼 हाशिया-कार्टूनध्यान

एक विद्यार्थी बोर्ड की ओर संकेत कर रहा है जिस पर लिखा है — “BIG OFFICIALS + INTELLECTUALS + SOCIAL LEADERS + CITIZENS = ?”

साथ का प्रश्न: “जिन चंद लोगों ने प्रतिरोध किया, उनकी बात छोड़ दें — बाकियों के बारे में सोचें कि उन्होंने क्या किया! क्या कर रहे थे बड़े-बड़े अधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक-धार्मिक नेता और नागरिक…?”

संविधान में हुए बदलाव★★

#बदलाव
1“इंदिरा गाँधी के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले की पृष्ठभूमि में संविधान में संशोधन हुआ। इस संशोधन के द्वारा प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।”
2★★“आपातकाल के दौरान ही संविधान का 42वाँ संशोधन पारित हुआ।”
3★“42वें संशोधन के जरिए हुए अनेक बदलावों में एक था — देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल करना। ! यह व्यवस्था मात्र आपातकाल की अवधि भर के लिए नहीं की गई थी। इसे आगे के दिनों में भी स्थायी रूप से लागू किया जाना था।”
4! “इसके अतिरिक्त अब आपातकाल के दौरान चुनाव को एक साल के लिए स्थगित किया जा सकता था।”
★★परिणाम“इस तरह देखें तो 1971 के बाद अब चुनाव 1976 के बदले 1978 में करवाए जा सकते थे।”

आपातकाल के तीन सबक★★

#सबक
1★★“हालाँकि बहुत-से पर्यवेक्षक मानते हैं कि आपातकाल के दौरान भारत लोकतांत्रिक नहीं रह गया था, लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि थोड़े ही दिनों के अंदर कामकाज फिर से लोकतांत्रिक ढर्रे पर लौट आया। इस तरह आपातकाल का एक सबक तो यही है कि भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।”
2★★“आपातकाल से संविधान में वर्णित आपातकाल के प्रावधानों के कुछ अर्थगत उलझाव भी प्रकट हुए, जिन्हें बाद में सुधार लिया गया। ★अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को लिखित में दे।”
3★★“आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुआ। आपातकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई। न्यायपालिका आपातकाल के वक्त नागरिक अधिकारों की कारगर तरीके से रक्षा नहीं कर पाई थी। इसे महसूस करके अब वह नागरिक अधिकारों की रक्षा में तत्पर हो गई। आपातकाल के बाद नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।”

★★सबक 2 पर ध्यान दीजिए — यह सीधे पृ. 98 के हाशिया-प्रश्न का उत्तर है (“क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर घोषणा करनी चाहिए थी?”)। अब वह लिखित सलाह अनिवार्य है।

और वे सवाल जो अनुत्तरित रह गए★

“बहरहाल, आपातकाल के संकटपूर्ण वर्षों ने कई ऐसे सवाल छोड़े हैं जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। …लोकतांत्रिक सरकार के रोज़मर्रा के कामकाज और विभिन्न दलों और समूहों के निरंतर जारी राजनीतिक विरोध के बीच तनाव की स्थिति बनती है। ऐसे में दोनों के बीच एक सधा हुआ संतुलन क्या हो सकता है? क्या नागरिकों को विरोध की कार्रवाई में शामिल होने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए अथवा उन्हें इसका कोई अधिकार ही नहीं होना चाहिए? ऐसे विरोध की सीमा क्या मानी जाए?”

पृष्ठ 103 · शाह आयोग, और आपातकाल के बाद की राजनीति

शाह आयोग का निष्कर्षध्यान★

“दूसरे, आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ। ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं। इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया। ★★शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।”

अवतरण-बॉक्स — ‘फ्री जेपी कैम्पेन’★★

“आज भारत की आज़ादी का दिन है… भारत के लोकतंत्र का दीपक बुझने न पाए।” संदर्भ: “यह विज्ञापन द टाइम्स (लंदन) में 15 अगस्त 1975 को छपवाया गया था।” ★तिथि पर ध्यान दीजिए — स्वतंत्रता दिवस, और आपातकाल के ठीक पचास दिन बाद।

🔷 आपातकाल के बाद की राजनीति

★★“जैसे ही आपातकाल खत्म हुआ और लोकसभा के चुनावों की घोषणा हुई, वैसे ही आपातकाल का सबसे ज़रूरी और कीमती सबक राजव्यवस्था ने सीख लिया। 1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे। उत्तर भारत में तो खासतौर पर, क्योंकि यहाँ आपातकाल का असर सबसे ज्यादा महसूस किया गया था।” “विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा। ★जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध था। …जिन सरकारों को जनता ने लोकतंत्र-विरोधी माना उसे मतदाता के रूप में उसने भारी दंड दिया। इस अर्थ में देखें तो 1975–77 के अनुभवों की एक परिणति भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद को पुख्ता बनाने में हुई।”

🔷 लोकसभा के चुनाव — 1977

क्रमघटना
★जनवरी 1977“18 महीने के आपातकाल के बाद 1977 के जनवरी माह में सरकार ने चुनाव कराने का फ़ैसला किया। इसी के मुताबिक सभी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा कर दिया गया।”
मार्च 1977“1977 के मार्च में चुनाव हुए। ऐसे में विपक्ष को चुनावी तैयारी का बड़ा कम समय मिला, लेकिन राजनीतिक बदलाव की गति बड़ी तेज़ थी।”
★★जनता पार्टी“चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। ★नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया।”
★कांग्रेस से टूट“कांग्रेस के कुछ नेता भी, जो आपातकाल के खिलाफ़ थे, इस पार्टी में शामिल हुए। कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में एक नयी पार्टी बनाई। इस पार्टी का नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ था और बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई।”

जनता पार्टी की रणनीति★★

“1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दिया। इस पार्टी ने चुनाव-प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर ज़ोर दिया। हज़ारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था।” ★★“जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। बात बिलकुल साफ़ थी कि कांग्रेस के लिए अब बड़ी मुश्किल आ पड़ी थी।”

★यह वाक्य अध्याय 5 के ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का तार्किक अंत है — 1967 में जो रणनीति थी, 1977 में वह एक ही पार्टी बन गई।

📦 बॉक्स:मोरारजी देसाई (1896–1995)

स्वतंत्रता सेनानी, गाँधीवादी नेता · खादी, प्राकृतिक चिकित्सा और निग्रह के प्रतिपादक · बॉम्बे प्रांत के मुख्यमंत्री · 1967–1969 के बीच उप-प्रधानमंत्री · पार्टी में टूट के बाद कांग्रेस (ओ) में शामिल · ★★1977–1979 तक एक गैर-कांग्रेसी दल की तरफ़ से प्रधानमंत्री रहे।

पृष्ठ 104 · 1977 के परिणाम

🎨 कार्टून — आर.के. लक्ष्मण(टाइम्स ऑफ इंडिया, 29 मार्च 1977)★★

ज़मीन पर गिरी एक आकृति, जिसकी कमर पर ‘CONG’ लिखा है। उसके पैरों में ‘EMERGENCY’ लिखी बेड़ी, गले में ‘CENSOR’ का पट्टा और ‘MISA’ लिखा काँटेदार गोला जंजीर से बँधा है; एक और जंजीर पर लिखा है ‘42nd AMENDMENT’। ऊपर आम लोगों की भीड़ खड़ी है और कोई कह रहा है — “रे बाबा! इस आम आदमी से बच के रहना। अब वह अपने साथ कोई बदतमीज़ी बर्दाश्त नहीं कर सकता है।”

चित्र-शीर्षक: “देखिए कि एक कार्टूनिस्ट ने 1977 के चुनावों में हारने और जीतने वालों को किस तरह देखा है! आम आदमी के साथ खड़े हुए लोगों में जगजीवन राम, मोरारजी देसाई, चरण सिंह और अटलबिहारी वाजपेयी को दिखाया गया है।” ★★इस कार्टून में आपातकाल के चारों औज़ार एक साथ दिखते हैं — EMERGENCY, CENSOR, MISA और 42वाँ संशोधन। इसे बोर्ड पर उतरवाइए।

चुनाव-परिणाम — ये आँकड़े ज्यों के त्यों याद रखिए★★

दलसीटेंटिप्पणी
! कांग्रेसमात्र 154“उसे 35 प्रतिशत से भी कम वोट हासिल हुए।”
★★जनता पार्टी और साथी दल330“लोकसभा की कुल 542 सीटों में से”
★अकेले जनता पार्टी295“उसे स्पष्ट बहुमत मिला था”

★★“आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई।” (पृ. 103 का अंतिम वाक्य)

उत्तर भारत में सफ़ायाध्यान

“उत्तर भारत में चुनावी माहौल कांग्रेस के एकदम खिलाफ़ था। ★★कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसे महज एक-एक सीट मिली।” !★★“इंदिरा गाँधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गाँधी अमेठी से चुनाव हार गए।”

पर कांग्रेस हर जगह नहीं हारी — यह संतुलन ज़रूरी है★★

“बहरहाल अगर आप चुनावी नतीजों के नक्शे पर नज़र दौड़ाएँ, तो पाएँगे कि कांग्रेस देश में हर जगह चुनाव नहीं हारी थी। महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में उसने कई सीटों पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखा था और दक्षिण भारत के राज्यों में तो एक तरह से उसकी चुनावी विजय का चक्का बेरोक-टोक चला था।”

दो कारण (पाठ के अनुसार):

#कारण
1★“आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था। लोगों को ज़बरन उजाड़ने और विस्थापित करने अथवा ज़बरन नसबंदी करने का काम ज्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था।”
2★★”…लेकिन इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि उत्तर भारत में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की प्रकृति में दूरगामी बदलाव आए थे। उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और मध्यवर्ग के कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर इससे आ जुड़े।”

★★“इस अर्थ में देखें, तो 1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते हैं, बल्कि इसके आगे की भी कुछ बातों का संकेत करते हैं।” ★यह वाक्य अध्याय 7 और 8 का द्वार है — इसे रेखांकित करवाइए।

पृष्ठ 105 · जनता सरकार

📷 चित्र

1977 में बनी गैर-कांग्रेसी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह। चित्र में जयप्रकाश नारायण, जे.बी. कृपलानी, मोरारजी देसाई और अटलबिहारी वाजपेयी बैठे हुए नज़र आ रहे हैं।

जनता सरकार — शुरू से ही बिखरावध्यान★★

“1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था। चुनाव के बाद नेताओं के बीच प्रधानमंत्री के पद के लिए होड़ मची।”

दावेदारपृष्ठभूमि
★मोरारजी देसाई“1966–67 से ही इंदिरा गाँधी के प्रतिद्वंद्वी थे”
चरण सिंह“भारतीय लोकदल के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के किसान नेता थे”
जगजीवन राम“कांग्रेसी सरकारों में मंत्री पद पर रहने का विशाल अनुभव था”

“बहरहाल मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन इससे जनता पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान खत्म न हुई।”

पतन का क्रमध्यान★★

क्रमघटना
1“आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका।”
2! आलोचना: “जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था।”
3! “जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी।”
4★★“जनता पार्टी बिखर गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 28 माह में ही अपना बहुमत खो दिया।”
5“कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर दूसरी सरकार चरण सिंह के नेतृत्व में बनी। लेकिन बाद में कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया। इस वजह से चरण सिंह की सरकार मात्र 4 महीने तक सत्ता में रही।”
★6“1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी बुरी तरह परास्त हुई। …★★कांग्रेस पार्टी को 353 सीटें मिलीं और वह सत्ता में आई।”

★★और पाठ का सबक: “1977–79 के चुनावों ने लोकतांत्रिक राजनीति का एक और सबक सिखाया — सरकार अगर अस्थिर हो और उसके भीतर कलह हो, तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।”

★दो सबक साथ रखिए: 1977 — अलोकतांत्रिक सरकार को दंड। 1980 — अस्थिर सरकार को दंड। यानी मतदाता दोनों को सज़ा देता है।

पृष्ठ 106 · 🗺 मानचित्र — लोकसभा चुनाव परिणाम 1977ध्यान

रंगदल
कालाजनता पार्टी (बी.एल.डी.)
पीलाभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई.एन.सी.)
लालवामदल
नीलाअन्य

स्रोत: भारत का चुनाव आयोग ! पाठ की नोट: “यह नक्शा किसी पैमाने के हिसाब से बनाया गया भारत का मानचित्र नहीं है… प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए।”

📌 मानचित्र के साथ का अभ्यास

“इस मानचित्र में उन जगहों को चिह्नित करें, जहाँ — कांग्रेस हारी · कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई · ऐसे राज्य जहाँ कांग्रेस और उसके साथी दलों को भारी विजय मिली।”

💬 हाशिये का प्रश्न(अध्याय का सबसे अच्छा चर्चा-प्रश्न)★★

“अगर उत्तर और दक्षिण के राज्यों में मतदाताओं ने इतने अलग ढर्रे पर मतदान किया, तो हम कैसे कहें कि 1977 के चुनावों का जनादेश क्या था?” ★यह प्रश्न विद्यार्थी को सिखाता है कि ‘जनादेश’ कोई एक चीज़ नहीं होती — वह क्षेत्रवार अलग हो सकता है।

पृष्ठ 107 · जनता पार्टी की गुटबाज़ी — तीन कार्टून

कार्टूनविवरण
1 (अनूप राय, इंडिया टुडे)एक नेता कान पर हाथ रखकर चिल्ला रहा है — “I CAN’T HEAR YOU!!” — जबकि चारों ओर से भोंपू चीख रहे हैं: ‘KISAN SAMMELLAN’, ‘PARTY INFIGHTING’, ‘KANTI PROBE’, ‘OPPOSITION DEMANDS’, ‘VIOLENCE’
2 (आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ इंडिया, 13 नवंबर 1979)★एक आकृति तख्ती लिए खड़ी है — “I TOPPLED JANATA GOVERNMENT!” — और बाकी नेता कह रहे हैं: “THAT’S A LIE. EVERYBODY KNOWS WE ALL WORKED FOR TWO YEARS AND BROUGHT IT DOWN!”
3 (आर.के. लक्ष्मण)मूसलाधार बारिश में सब एक ही छाता पकड़े खींचतान कर रहे हैं — “BY ALL MEANS, LET’S GET UNDER ONE UMBRELLA, BUT LET ME DO IT FIRST!”

चित्र-शीर्षक: “जनता पार्टी की गुटबाजी पर बहुत-से कार्टून बने। उसकी कुछ बानगी यहाँ आप भी देखें। ये कार्टून अंग्रेज़ी भाषा के अखबार और पत्रिकाओं में छपे।”

★★दूसरा कार्टून सबसे तीखा है — कोई अकेले सरकार गिराने का श्रेय नहीं ले सकता, क्योंकि गिराने में सब शामिल थे। इसे प्रश्न 4 (“1980 में मध्यावधि चुनाव क्यों?”) के उत्तर में उद्धृत कीजिए।

💬 हाशिये का प्रश्न

★★“मैं समझ गया! आपातकाल एक तरह से तानाशाही निरोधक टीका था। इसमें दर्द हुआ और बुखार भी आया, लेकिन अंततः हमारे लोकतंत्र के भीतर क्षमता बढ़ी।” ★यह उपमा कक्षा में बहुत काम आती है — पर उसकी सीमा भी बताइए: टीका जानबूझकर लगाया जाता है, आपातकाल जानबूझकर नहीं लाया गया था।

📦 बॉक्स:चौधरी चरण सिंह (1902–1987)

“जुलाई 1979 से जनवरी 1980 के बीच भारत के प्रधानमंत्री; स्वतंत्रता सेनानी; उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय; ★ग्रामीण एवं कृषि विकास के समर्थक; कांग्रेस छोड़ी और 1967 में भारतीय क्रांति दल का गठन; उत्तर प्रदेश में दो बार मुख्यमंत्री; बाद में 1977 में जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक, उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री (1977–79); लोकदल के संस्थापक।”

पृष्ठ 108 · विरासत

1980 में क्या सिर्फ़ इंदिरा गाँधी की वापसी हुई?★★

“लेकिन क्या 1980 के चुनाव में सिर्फ़ इंदिरा गाँधी की वापसी हुई थी? क्या मामला इतना भर था? 1977 और 1980 के चुनावों के बीच दलगत प्रणाली में नाटकीय बदलाव आए।”

कांग्रेस के स्वभाव में बदलाव — यह अध्याय 5 से सीधी कड़ी है★★

पहलेबाद में
“1969 से पहले तक कांग्रेस विविध विचारधारात्मक गति-मति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी”★★“अपने बदले हुए स्वभाव में कांग्रेस ने स्वयं को विशेष विचारधारा से जोड़ा। उसने अपने को देश की एकमात्र समाजवादी और ग़रीबों की हिमायती पार्टी बताना शुरू किया।”

★“इस तरह 1970 के दशक के शुरुआती सालों से कांग्रेस की सफलता इस बात पर निर्भर रही कि वह गहरे सामाजिक और विचारधारात्मक विभाजन के आधार पर लोगों को अपनी तरफ़ कितना खींच पाती है। इसके साथ-साथ यह पार्टी अब एक नेता यानी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता पर भी निर्भर हुई।”

विपक्ष पर असर★

“कांग्रेस की प्रकृति में आए बदलावों के मद्देनजर अन्य विपक्षी दल ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति की तरफ़ मुड़े। विपक्ष के नेताओं को अब यह बात साफ़-साफ़ नज़र आने लगी कि चुनावों में गैर-कांग्रेसी वोट बिखरने नहीं चाहिए। इस चीज़ ने 1977 के चुनावों में एक बड़ी भूमिका निभाई।”

और वह बदलाव जो सबसे दूरगामी था★★

“अप्रत्यक्ष रूप से 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ।”

🖼 दृश्य-सामग्रीध्यान

सामग्रीविवरण
दीवार-नारा★“इन्दिरा बुलओ देश बचाओ” — “Congress (I)‘s new slogan plastered on a Rae Bareli wall”
कार्टून (आर.के. लक्ष्मण)शीर्षक “मैदान साफ!” — एक ओर वोट-पेटी के चारों ओर उलझे हुए विपक्षी नेता, दूसरी ओर इंदिरा गाँधी अकेली आगे बढ़ती हुईं। “यह कार्टून 1980 के चुनावों के बाद छपा था।”

📦 बॉक्स:जगजीवन राम (1908–1986)

“स्वतंत्रता सेनानी एवं बिहार के कांग्रेसी नेता; 1977–79 के बीच भारत के उप-प्रधानमंत्री; संविधान सभा के सदस्य; 1952 से मृत्युपर्यंत सांसद; ★स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री; 1952 से 1977 के बीच अनेक मंत्रालयों की जिम्मेदारी; विद्वान और कुशल प्रशासक।”

पृष्ठ 109 · पिछड़े वर्ग, संवैधानिक संकट, और अध्याय का समापन

पिछड़ी जातियों की राजनीति★★

”…पिछड़ी जातियों के मतदान का असर पड़ा था, खासकर उत्तर भारत में। लोकसभा के चुनावों के बाद, 1977 में कई राज्यों में विधानसभा के भी चुनाव हुए। इसमें भी उत्तर भारत के राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। ★इन सरकारों के बनने में पिछड़ी जाति के नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।” ★★“बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचा। इसके बाद केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया। इस आयोग और पिछड़ी जातियों की राजनीति की भूमिका के बारे में ज्यादा विस्तार से आप अंतिम अध्याय में पढ़ेंगे।” ✓ सत्यापित — ‘अंतिम अध्याय’ = अध्याय 8 (भारतीय राजनीति: नए बदलाव), जहाँ मंडल आयोग का विस्तृत विवरण है। “आपातकाल के बाद हुए चुनावों ने दलीय व्यवस्था के भीतर इस बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी।”

आपातकाल — संवैधानिक संकट या राजनीतिक संकट?★★

“आपातकाल और इसके आसपास की अवधि को हम संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में भी देख सकते हैं। संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपातकाल के मूल में था।” ★★“दूसरी तरफ़ यह राजनीतिक संकट का भी दौर था। सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। फिर भी, इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया।”

और संविधान-निर्माताओं की दो अपेक्षाएँ जो टूटीं:

#अपेक्षा
1“भारतीय संविधान के निर्माताओं को विश्वास था कि सभी राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मानकों का पालन करेंगे।”
2“उन्हें यह भी विश्वास था कि आपातकाल की स्थिति में भी सरकार अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल विधि के शासन के दायरे में रहते हुए ही करेगी। ! इसी उम्मीद में सरकार को आपातकाल से जुड़े प्रावधानों के अंतर्गत व्यापक और चहुँमुखी शक्तियाँ दे दी गईं। इन शक्तियों का आपातकाल के दौरान दुरुपयोग हुआ।”

★★पाठ का निर्णय: “यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था।” ★यह वाक्य परीक्षा में सीधे पूछा जा सकता है — ‘आपातकाल संवैधानिक संकट था या राजनीतिक?’ उत्तर: दोनों, पर राजनीतिक अधिक गंभीर।

अंतिम प्रश्न — जो अगले अध्यायों तक ले जाता है★

“इस दौर में एक और महत्त्वपूर्ण मसला संसदीय लोकतंत्र में जन आंदोलन की भूमिका और उसकी सीमा को लेकर उठा। स्पष्ट ही इस दौर में संस्था आधारित लोकतंत्र और स्वतःस्फूर्त जन-भागीदारी पर आधारित लोकतंत्र में तनाव नज़र आया। इस तनाव का एक कारण यह भी कहा जा सकता है कि हमारी दलीय प्रणाली जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम साबित नहीं हुई।” “आगे के अध्याय में हम इस तनाव की कुछ अभिव्यक्तियों को समझने की कोशिश करेंगे। इस अध्याय में हम विशेष रूप से क्षेत्रीय पहचान से जुड़ी बहसों के बारे में पढ़ेंगे।” ✓ सत्यापित — यह संदर्भ अध्याय 7 (क्षेत्रीय आकांक्षाएँ) की ओर है, और नए क्रमांक के अनुसार सही है।

🎬 सिने-संसार:हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी

पहलूविवरण
वर्ष2005
निर्देशकसुधीर मिश्र
पटकथारुचि नारायण, शिव कुमार, सुब्रह्मण्यम
अभिनयके.के. मेनन, शाइनी आहूजा, चित्रांगदा सिंह
कथानक“सिद्धार्थ, विक्रम और गीता मेधावी और सामाजिक सरोकार वाले छात्र हैं। दिल्ली में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद तीनों अलग-अलग राह पर निकल पड़ते हैं। सिद्धार्थ सामाजिक बदलाव के लिए क्रांतिकारी विचारधारा का हिमायती है। विक्रम की दलील ज़िंदगी में कामयाबी हासिल करने की है, चाहे इसके लिए जो भी कीमत चुकानी पड़े।”
★★महत्व“फ़िल्म की पृष्ठभूमि सत्तर के दशक की है। इस फ़िल्म के युवा चरित्र उस दौर की अपेक्षाओं और आदर्शवाद की उपज हैं। सिद्धार्थ क्रांति के अपने मकसद में सफल नहीं होता है, लेकिन वह गरीबों के दुख-दर्द इस तरह अपना चुका है कि उसे क्रांति की जगह ऐसे लोगों की हालत में थोड़ी बेहतरी ला पाना भी अच्छा लगने लगता है। दूसरी तरफ़, विक्रम एक आमफहम राजनीतिक तिकड़मबाज बन जाता है। लेकिन अपने इस काम को लेकर उसका मन कचोटता रहता है।”

★इसे अध्याय से जोड़िए: यह फ़िल्म उसी पीढ़ी की कहानी है जो 1974 में सड़कों पर थी — और उसका अंत आदर्शवाद की थकान पर होता है। अध्याय भी वहीं समाप्त होता है: बड़े सवाल हल नहीं हुए, बस टल गए।

पृष्ठ 110–111 · प्रश्नावली(NCERT के 10 प्रश्न)

1. बताएँ कि आपातकाल के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत — (क) आपातकाल की घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की। · (ख) आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गए। · (ग) बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र आपातकाल की घोषणा की गई थी। · (घ) आपातकाल के दौरान विपक्ष के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। · (ङ) सी.पी.आई. ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया।

2. निम्नलिखित में से कौन-सा आपातकाल की घोषणा के संदर्भ से मेल नहीं खाता है: (क) ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान · (ख) 1974 की रेल-हड़ताल · (ग) नक्सलवादी आंदोलन · (घ) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला · (ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष

3. निम्नलिखित में मेल बैठाएँ: (क) संपूर्ण क्रांति · (ख) गरीबी हटाओ · (ग) छात्र आंदोलन · (घ) रेल हड़ताल

  1. iइंदिरा गाँधी ·
  2. iiजयप्रकाश नारायण ·
  3. iiiबिहार आंदोलन ·
  4. ivजॉर्ज फर्नान्डिस

4. किन कारणों से 1980 में मध्यावधि चुनाव करवाने पड़े? 5. जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था। इस आयोग की नियुक्ति क्यों की गई थी और इसके क्या निष्कर्ष थे? 6. 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करते हुए सरकार ने इसके क्या कारण बताए थे? 7. 1977 के चुनावों के बाद पहली दफा केंद्र में विपक्षी दल की सरकार बनी। ऐसा किन कारणों से संभव हुआ? 8. हमारी राजव्यवस्था के निम्नलिखित पक्ष पर आपातकाल का क्या असर हुआ?

  • नागरिक अधिकारों की दशा और नागरिकों पर इसका असर · कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंध · जनसंचार माध्यमों के कामकाज · पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयाँ

9. भारत की दलीय प्रणाली पर आपातकाल का किस तरह असर हुआ? अपने उत्तर की पुष्टि उदाहरणों से करें।

10. अवतरण — पार्थ चटर्जी:

“1977 के चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र, दो-दलीय व्यवस्था के जितना नज़दीक आ गया था उतना पहले कभी नहीं आया। बहरहाल अगले कुछ सालों में मामला पूरी तरह बदल गया। हारने के तुरंत बाद कांग्रेस दो टुकड़ों में बँट गई…. जनता पार्टी में भी बड़ी अफरा-तफरी मची…” (डेविड बटलर, अशोक लाहिड़ी और प्रणव रॉय के हवाले से)

(क) किन वज़हों से 1977 में भारत की राजनीति दो-दलीय प्रणाली के समान जान पड़ रही थी? (ख) 1977 में दो से ज्यादा पार्टियाँ अस्तित्व में थीं। इसके बावजूद लेखकगण इस दौर को दो-दलीय प्रणाली के नज़दीक क्यों बता रहे हैं? (ग) कांग्रेस और जनता पार्टी में किन कारणों से टूट पैदा हुई?

⚡ पूरे अध्याय का कालक्रम — एक पृष्ठ पर

तिथिघटना
1971–72! बांग्लादेश संकट का आर्थिक बोझ; 80 लाख शरणार्थी; युद्ध के बाद अमरीकी सहायता बंद
1972–73मानसून की विफलता; खाद्यान्न-उत्पादन 8% कम
★1973चीज़ों की कीमतों में 23% वृद्धि; ★★केशवानंद भारती का फ़ैसला — ‘बुनियादी ढाँचा’; ! तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे मुख्य न्यायाधीश
★जनवरी 1974गुजरात का छात्र-आंदोलन
★★मार्च 1974बिहार का छात्र-आंदोलन; जेपी का आगमन; ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान
★मई 1974रेल हड़ताल — जॉर्ज फर्नान्डिस; 20 दिन बाद बिना समझौते वापस
1974कीमतों में 30% वृद्धि; डी.के. बरुआ का नारा ‘इंदिरा इज़ इंडिया’
जून 1975गुजरात विधानसभा चुनाव — कांग्रेस हारी
★★12 जून 1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा) — इंदिरा गाँधी का निर्वाचन अवैध
★24 जून 1975सर्वोच्च न्यायालय का आंशिक स्थगनादेश
★★25 जून 1975रामलीला मैदान की रैली; जेपी का राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह का आह्वान; रात में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा (अनुच्छेद 352)
! 26 जून 1975सुबह 6 बजे मंत्रिमंडल को सूचना — “तब तक बहुत कुछ हो चुका था”
15 अगस्त 1975‘फ्री जेपी कैम्पेन’ का विज्ञापन — द टाइम्स, लंदन
!★अप्रैल 1976सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले उलटे
★197642वाँ संविधान संशोधन; विधायिका का कार्यकाल 5 से 6 वर्ष
★जनवरी 197718 महीने बाद चुनाव का फ़ैसला; नेताओं की रिहाई
★★मार्च 1977चुनाव — कांग्रेस 154 सीटें, 35% से कम वोट; जनता पार्टी और साथी 330/542; अकेले जनता पार्टी 295; इंदिरा गाँधी रायबरेली से और संजय गाँधी अमेठी से पराजित
1977मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री; शाह आयोग की नियुक्ति; मंडल आयोग की नियुक्ति
! 1979मोरारजी सरकार 28 माह में बहुमत खोई; जुलाई 1979 — चरण सिंह प्रधानमंत्री (मात्र 4 महीने)
★★जनवरी 1980मध्यावधि चुनाव — जनता पार्टी बुरी तरह परास्त; कांग्रेस को 353 सीटें

✓ इस अध्याय की जाँच-सूची

कसौटीपरिणाम
पढ़े गए पृष्ठ✓ 20 / 20 (150 dpi दृश्य पठन)
अंतर-अध्याय संदर्भ✓ 4 में से 4 सही — अध्याय 5 (पृ. 93), कक्षा 11 (पृ. 96), अध्याय 8 ‘अंतिम अध्याय’ (पृ. 109), अध्याय 7 ‘आगे के अध्याय’ (पृ. 109)
★★अनाथ संदर्भ (orphan)✓ शून्य
स्पष्ट तथ्यात्मक त्रुटि✓ कोई नहीं मिली
कार्टून / दृश्य-सामग्री✓ 16 दर्ज़ (7 कार्टून, 2 समाचार-कोलाज, 1 मानचित्र, 1 फ़ोटो, 1 फ़िल्म-बॉक्स, 4 हाशिया-कार्टून)
जीवनी-बॉक्स✓ 4 दर्ज़ (जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम)
विशेष बॉक्स✓ 2 (1974 की रेल हड़ताल; ‘फ्री जेपी कैम्पेन’ अवतरण)
NCERT प्रश्न✓ 10 / 10 दर्ज़