स्रोत: स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, NCERT — अध्याय 5, पृष्ठ 72–91 (20 पृष्ठ) QR कोड:
12122CH05— ★युक्तिकरण के बाद भी यह अध्याय 5 ही रहा। पठन-विधि: ! फ़ॉन्ट LEGACY (8/8 अविश्वसनीयता) — 150 dpi पर दृश्य पठन, पाठ-निष्कर्षण नहीं।
⚡ अध्याय की एक-पंक्ति कुंजी
★★“इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन कांग्रेस-प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।” — 【पाठ】 पृ. 89
यही अध्याय का शीर्षक भी है और उसका उत्तर भी। पूरा अध्याय इसी एक वाक्य तक पहुँचता है। और उसी पृष्ठ का हाशिया-प्रश्न उसे और तेज़ कर देता है —
“यह तो कुछ ऐसा ही है कि कोई मकान की बुनियाद और छत बदल दे फिर भी कहे कि मकान वही है। पुरानी और नयी कांग्रेस में कौन-सी चीज़ समान थी?”
पृष्ठ 72 · अध्याय-आरंभ
🎨 आर.के. लक्ष्मण का चार-खाने वाला कार्टून
चारों खानों में बैलों की एक जोड़ी और एक किसान — और नीचे लिखा है 1 YEAR · 9 YEARS · 17 YEARS · 22 YEARS। हर खाने में जोड़ी और बिगड़ती जाती है, अंत में दोनों बैल अलग-अलग दिशाओं में भाग जाते हैं।
चित्र-शीर्षक: “आज़ादी के बाद शुरुआत में कांग्रेस का चुनाव चिह्न दो बैलों की जोड़ी था। इस प्रसिद्ध कार्टून में कांग्रेस के भीतर आए बदलावों को दर्शाया गया है। कार्टून में दिखाया गया है कि आज़ादी के 22 वर्ष गुजरते-गुजरते कांग्रेस किस कदर फूट का शिकार हो गई थी।”
★★कक्षा की शुरुआत यहीं से कीजिए। पूछिए: “22 साल बाद यानी कौन-सा वर्ष?” — 1969। यही वह वर्ष है जिसमें कांग्रेस टूटी। यानी कार्टून पूरे अध्याय का सारांश है, और वह पहले पन्ने पर है।
‘इस अध्याय में…’(पाठ का अपना परिचय)
“इस किताब के दूसरे अध्याय में आपने कांग्रेस प्रणाली के उद्भव के बारे में पढ़ा था। इस प्रणाली को 1960 के दशक में पहली बार चुनौती मिली। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा गहन हो चली थी और ऐसे में कांग्रेस को अपना प्रभुत्व बरकरार रखने में मुश्किलें आ रही थीं। विपक्ष अब पहले की अपेक्षा कम विभाजित और कहीं ज्यादा ताकतवर था। कांग्रेस को इस विपक्ष की चुनौती का सामना करना पड़ा। ★कांग्रेस को अंदरूनी चुनौतियाँ भी झेलनी पड़ीं, क्योंकि अब यह पार्टी अपने अंदर की विभिन्नता को एक साथ थामकर नहीं चल पा रही थी।”
चार प्रश्न जिन पर अध्याय चलेगा:
- नेहरू के बाद राजनीति ने क्या करवट ली;
- विपक्ष की एकता और खुद के बिखराव ने कांग्रेस के प्रभुत्व को कैसे चुनौती दी;
- इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में एक नयी कांग्रेस किस तरह इन चुनौतियों से उबरी; और
- कैसे नयी नीतियों तथा विचारधाराओं ने कांग्रेस प्रणाली की पुनर्वापसी की?
★ध्यान दीजिए — चुनौती दो तरफ़ से है: बाहर विपक्ष, और भीतर फूट। इसी दो-तरफ़ा ढाँचे में पूरा अध्याय चलता है।
पृष्ठ 73 · राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती
📰 समाचारपत्र-कोलाज
The Hindustan Times (New Delhi, Thursday, May 28, 1964): ★★“PRIME MINISTER NEHRU IS DEAD” · “100,000 wait to pay last homage” · “Country stunned by sudden end” · “State mourning for twelve days” साथ में एक कार्टून — शीर्षक “The Void” (“शून्य”) — भीड़ के बीच एक बड़ा खाली आकार।
★‘The Void’ कार्टून पर एक मिनट रुकिए। यह पूरे प्रश्न को एक चित्र में कह देता है: नेहरू के बाद जो खाली जगह बनी, उसे भरेगा कौन?
🔷 पाठ का आरंभ
“1964 के मई में नेहरू की मृत्यु हो गई। वे पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से बीमार चल रहे थे। इससे नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर बड़े अंदेशे लगाए गए कि नेहरू के बाद कौन? लेकिन, भारत जैसे नव-स्वतंत्र देश में इस माहौल में एक और गंभीर सवाल हवा में तैर रहा था कि ★★नेहरू के बाद आखिर इस देश में होगा क्या?”
अंतर्राष्ट्रीय संदेह — तीन आशंकाएँध्यान
| # | आशंका |
|---|---|
| 1 | “भारत से बाहर के बहुत से लोगों को संदेह था कि यहाँ नेहरू के बाद लोकतंत्र कायम भी रह पाएगा या नहीं।” |
| 2 | ★“आशंका थी कि बाकी बहुत से नव-स्वतंत्र देशों की तरह भारत भी राजनीतिक उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा। असफल रहने की सूरत में भय था कि सेना राजनीतिक भूमिका में उतर आएगी।” |
| 3 | “संदेह थे कि देश के सामने बहुविध कठिनाइयाँ आन खड़ी हैं और नया नेतृत्व उनका समाधान खोज पाएगा या नहीं।” |
💬 हाशिये का प्रश्न( यह बहुत तीखा है)★
“फ्रांस और कनाडा में ऐसी सूरत कायम हो, तो वहाँ कोई भी लोकतंत्र के असफल होने अथवा देश के टूटने की बात नहीं कहता। हम ही आखिर लगातार इतने शक में क्यों पड़े रहते हैं?” ★★यह प्रश्न कक्षा में ज़रूर उठाइए — यह विद्यार्थी को यह सोचने पर मजबूर करता है कि नव-स्वतंत्र देशों के बारे में पश्चिमी आकलन अक्सर पूर्वाग्रह से भरे रहे हैं।
पृष्ठ 74 · ‘खतरनाक दशक’, शास्त्री, और उत्तराधिकार का दूसरा दौर
‘खतरनाक दशक’★★
“1960 के दशक को ‘खतरनाक दशक’ कहा जाता है क्योंकि गरीबी, गैर-बराबरी, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन आदि के सवाल अभी अनसुलझे थे। संभव था कि इन सारी कठिनाइयों के कारण देश में लोकतंत्र की परियोजना असफल हो जाती अथवा खुद देश ही बिखर जाता।” ★‘खतरनाक दशक’ — यह पद परीक्षा में सीधे पूछा जाता है। चार कारण याद रखिए: गरीबी · गैर-बराबरी · सांप्रदायिक विभाजन · क्षेत्रीय विभाजन।
🔷 नेहरू के बाद शास्त्री
★“नेहरू के उत्तराधिकारी का सवाल इतनी आसानी से हल कर लिया गया कि आलोचक ठगे-से रह गए।”
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने पार्टी के नेताओं और सांसदों से सलाह-मशविरा किया |
| 2 | “उन्होंने पाया कि सभी लालबहादुर शास्त्री के पक्ष में हैं।” |
| 3 | ★★“शास्त्री, कांग्रेस संसदीय दल के निर्विरोध नेता चुने गए और इस तरह वे देश के प्रधानमंत्री बने।” |
शास्त्री का परिचय (पाठ के अनुसार): उत्तर प्रदेश के थे; नेहरू के मंत्रिमंडल में कई सालों तक मंत्री; “उनको लेकर कभी किसी किस्म का विवाद नहीं उठा था”; ★“अपने आखिरी सालों में नेहरू उन पर ज्यादा-से-ज्यादा निर्भर होते गए थे”; “अपनी सादगी और सिद्धांत निष्ठा के लिए प्रसिद्ध”; ★★“एक दफा वे एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी स्वीकार करते हुए रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके थे।”
शास्त्री-काल की तीन चुनौतियाँ(1964–1966)ध्यान
| # | चुनौती |
|---|---|
| 1 | चीन-युद्ध से पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयों से उबरने की कोशिश |
| 2 | ! “मानसून की असफलता से देश में सूखे की स्थिति थी। कई जगहों पर खाद्यान्न का गंभीर संकट आन पड़ा था।” |
| 3 | “फिर, 1965 में पाकिस्तान के साथ भी युद्ध करना पड़ा। इसके बारे में आपने पिछले अध्याय में पढ़ा था।” ✓ (अध्याय 4 — सही संदर्भ) |
★★“शास्त्री ने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया, जिससे इन दोनों चुनौतियों से निपटने के उनके दृढ़ संकल्प का पता चलता है।” ★इसे ज़रूर समझाइए — ‘जय जवान’ = 1965 का युद्ध; ‘जय किसान’ = खाद्यान्न-संकट। एक नारे में दो मोर्चे।
शास्त्री का निधनध्यान
“11 जनवरी 1966 को ताशकंद में अचानक उनका देहान्त हो गया। ताशकंद तब भूतपूर्व सोवियत संघ में था और आज यह उज्बेकिस्तान की राजधानी है। युद्ध की समाप्ति के सिलसिले में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान से बातचीत करने और एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए वे ताशकंद गए थे।”
📦 बॉक्स:लालबहादुर शास्त्री (1904–1966)
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री · 1930 से स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी · उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्री · कांग्रेस पार्टी के महासचिव · 1951–56 तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री · ★इसी दौरान रेल-दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए रेलमंत्री पद से इस्तीफा · 1957–64 के बीच भी मंत्री · ‘जय जवान-जय किसान’ का मशहूर नारा।
अवतरण — ‘गार्जियन’ का संपादकीय, 3 जून 1964★
“तमाम अंदेशों के बावजूद इंग्लैंड की तुलना में भारत में प्रधानमंत्री का सवाल ज्यादा शालीनता और तेज़ी के साथ हल कर लिया गया।” ➕ (संपादकीय ने इंग्लैंड से तुलना की, जहाँ हैरॉल्ड मैकमिलन के बाद नए प्रधानमंत्री का मामला लंबे समय तक खिंचता रहा।) ★★यह अवतरण पृष्ठ 73 की तीनों आशंकाओं का जवाब है — इसे उसी के साथ पढ़ाइए।
🔷 शास्त्री के बाद इंदिरा गाँधी
“शास्त्री की मृत्यु से कांग्रेस के सामने दुबारा राजनीतिक उत्तराधिकारी का सवाल उठ खड़ा हुआ। इस बार मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी के बीच कड़ा मुकाबला था।”
| उम्मीदवार | पृष्ठभूमि |
|---|---|
| मोरारजी देसाई | बंबई प्रांत (मौजूदा महाराष्ट्र और गुजरात) के मुख्यमंत्री रह चुके थे; केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी मंत्री रह चुके थे |
| इंदिरा गाँधी | ★जवाहरलाल नेहरू की बेटी; गुजरे वक्त में कांग्रेस अध्यक्ष रह चुकी थीं; शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना मंत्रालय का प्रभार |
★★“इस दफा पार्टी के बड़े नेताओं ने इंदिरा गाँधी को समर्थन देने का मन बनाया लेकिन इंदिरा गाँधी के नाम पर सर्वसम्मति कायम नहीं की जा सकी। ऐसे में फ़ैसले के लिए कांग्रेस के सांसदों ने गुप्त मतदान किया। इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हरा दिया। उन्हें कांग्रेस पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने अपना मत दिया था।”
★★दोनों उत्तराधिकारों की तुलना बोर्ड पर लिखवाइए: 1964 — शास्त्री: सलाह-मशविरा → निर्विरोध। 1966 — इंदिरा गाँधी: मुकाबला → गुप्त मतदान → दो-तिहाई से अधिक मत। दोनों बार सत्ता-हस्तांतरण शांतिपूर्ण रहा — और यही पाठ का बड़ा दावा है।
पृष्ठ 75 · सत्ता-हस्तांतरण और नयी प्रधानमंत्री
🎨 कार्टून — आर.के. लक्ष्मण(टाइम्स ऑफ इंडिया, 18 जनवरी 1966)
इंदिरा गाँधी ‘1’ नंबर के मंच पर खड़ी हैं, हाथ में ‘PM’ लिखी ट्रॉफ़ी; चारों ओर नेता तालियाँ बजा रहे हैं। दाईं ओर ‘M’ लिखा एक धावक ‘START’ के निशान से फिर दौड़ना शुरू कर रहा है।
★अर्थ: मोरारजी देसाई हार के बाद भी दौड़ फिर से शुरू कर रहे हैं — यानी प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं हुई। यह कार्टून आगे के पूरे अध्याय की भविष्यवाणी है।
पाठ का निष्कर्ष★★
“प्रतिस्पर्धा के बावजूद पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया।”
और वह गणना जो उलटी पड़ीध्यान
“नए प्रधानमंत्री को जमने में थोड़ा वक्त लगा। इंदिरा गाँधी यों तो बड़े लंबे समय से राजनीति में सक्रिय थीं, लेकिन लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में बड़े कम दिनों से मंत्री पद पर थीं।” ★★“कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने संभवतया यह सोचकर उनका समर्थन किया होगा कि प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में खास अनुभव न होने के कारण समर्थन और दिशा-निर्देशन के लिए इंदिरा गाँधी उन पर निर्भर रहेंगी।” “प्रधानमंत्री बनने के एक साल के अंदर इंदिरा गाँधी को लोकसभा के चुनावों में पार्टी की अगुवाई करनी पड़ी।”
★★इस वाक्य पर निशान लगवाइए। पूरा अध्याय इसी गणना के उलट जाने की कहानी है — सिंडिकेट ने उन्हें इसलिए चुना कि वे निर्भर रहेंगी; और वही उनसे सबसे बड़ी चुनौती बन गईं।
📦 बॉक्स:इंदिरा गाँधी (1917–1984)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| प्रधानमंत्री | 1966 से 1977 तक, और फिर 1980 से 1984 तक |
| आरंभ | युवा कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में स्वतंत्रता-आंदोलन में भागीदारी |
| 1959 | ★कांग्रेस की अध्यक्ष |
| 1964–66 | शास्त्री मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री |
| चुनावी जीतें | ★1967, 1971 और 1980 के आम चुनावों में कांग्रेस को अपने नेतृत्व में विजयी बनाया |
| नारा | ★★‘गरीबी हटाओ’ |
| प्रमुख कदम | 1971 के युद्ध में जीत का श्रेय · प्रिवी पर्स की समाप्ति · बैंकों का राष्ट्रीयकरण · आण्विक-परीक्षण · पर्यावरण-संरक्षण |
| अन्य | जवाहरलाल नेहरू की पुत्री; ! 31 अक्तूबर 1984 के दिन उनकी हत्या कर दी गई |
पृष्ठ 76 · चौथा आम चुनाव, 1967 — संदर्भ
📷 चित्र(साभार: रघु राय)
इंदिरा गाँधी अन्य नेताओं के साथ — भीड़ के बीच।
💬 हाशिये का प्रश्न
“इंदिरा गाँधी के लिए स्थितियाँ सचमुच कठिन रही होंगी — पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में आखिर वे अकेली महिला थीं। ऊँचे पदों पर अपने देश में ज्यादा महिलाएँ क्यों नहीं हैं?” ★इस प्रश्न को टालिए मत — यह अध्याय का एकमात्र स्थान है जहाँ लैंगिक प्रश्न सीधे उठाया गया है।
🔷 चौथा आम चुनाव, 1967
★★“भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में 1967 के साल को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। दूसरे अध्याय में आप पढ़ चुके हैं कि 1952 के बाद से पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक दबदबा कायम था। 1967 के चुनावों में इस प्रवृत्ति में गहरा बदलाव आया।” ✓ (अध्याय 2 — सही संदर्भ)
🔷 चुनावों का संदर्भ
“चौथे आम चुनावों के आने तक देश में बड़े बदलाव हो चुके थे। दो प्रधानमंत्रियों का जल्दी-जल्दी देहावसान हुआ और नए प्रधानमंत्री को पद सँभाले हुए अभी पूरे एक साल का अरसा भी नहीं गुजरा था।”
पृष्ठ 77 · आर्थिक संकट, जन-असंतोष और एक गाँव की चुनाव-कथा
आर्थिक संकट — आठ कारक एक साथध्यान★★
“इस अरसे में देश गंभीर आर्थिक संकट में था।”
| # | कारक |
|---|---|
| 1 | मानसून की असफलता |
| 2 | व्यापक सूखा |
| 3 | खेती की पैदावार में गिरावट |
| 4 | ! गंभीर खाद्य संकट |
| 5 | विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी |
| 6 | औद्योगिक उत्पादन में गिरावट |
| 7 | निर्यात में गिरावट |
| 8 | ★सैन्य खर्चे में भारी बढ़ोतरी — “नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधनों को सैन्य-मद में लगाना पड़ा।” |
★★कारक 8 अध्याय 3 और 4 से सीधी कड़ी है — तीनों अध्याय यहाँ एक बिंदु पर मिलते हैं।
रुपये का अवमूल्यनध्यान
“इंदिरा गाँधी की सरकार के शुरुआती फ़ैसलों में एक था — रुपये का अवमूल्यन करना। माना गया कि रुपये का अवमूल्यन अमरीका के दबाव में किया गया। पहले के वक्त में 1 अमरीकी डॉलर की कीमत 5 रुपये थी, जो अब बढ़कर 7 रुपये हो गई।” ★यह आँकड़ा परीक्षा में पूछा जाता है — 5 से 7 रुपये।
जन-असंतोष और सरकार की भूलध्यान
“लोग आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, खाद्यान्न की कमी, बढ़ती हुई बेरोजगारी और देश की दयनीय आर्थिक स्थिति को लेकर विरोध पर उतर आए। देश में अकसर ‘बंद’ और ‘हड़ताल’ की स्थिति रहने लगी।” ★★“सरकार ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या माना न कि जनता की बदहाली की अभिव्यक्ति। इससे लोगों की नाराजगी बढ़ी और जन विरोध ने ज्यादा उग्र रूप धारण किया।” ★यह वाक्य रेखांकित करवाइए — यह अध्याय 6 (आपातकाल) की भी जड़ है। सरकार का जनता की माँग को ‘कानून-व्यवस्था’ मानना एक स्थायी प्रवृत्ति बन जाता है।
वामपंथी लामबंदी
“साम्यवादी और समाजवादी पार्टी ने व्यापक समानता के लिए संघर्ष छेड़ दिया। आप अगले अध्याय में पढ़ेंगे कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हुए साम्यवादियों के एक समूह ने मार्क्सवादी-लेनिनवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनायी और सशस्त्र कृषक-विद्रोह का नेतृत्व किया। साथ ही, इस पार्टी ने किसानों के बीच विरोध को संगठित किया।” ✓ सत्यापित — यह संदर्भ सही है। अध्याय 6 (पृ. 94) में यह अंश मौजूद है: “ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए। ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सक्रिय थे।”
सांप्रदायिक दंगेध्यान
“इस अवधि में गंभीर किस्म के हिन्दू-मुस्लिम दंगे भी हुए। आज़ादी के बाद से अब तक इतने गंभीर सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए थे।”
📦 बॉक्स:चुनाव-कथा राजस्थान के एक गाँव की( यह बॉक्स बहुत उपयोगी है)★
| मद | विवरण |
|---|---|
| संदर्भ | 1967 के विधानसभा चुनाव; चोमू निर्वाचन क्षेत्र — कांग्रेस बनाम स्वतंत्र पार्टी |
| गाँव | देवीसर |
| पात्र | शेर सिंह (पुराना दबदबा) और उसका भतीजा भीम सिंह (बढ़ती लोकप्रियता) — दोनों राजपूत |
| ★भीम सिंह की रणनीति | पंचायत का प्रधान बनने के बाद अन्य समुदायों के बीच भी जगह बनाई; “राजपूतों के अलावा गैर-राजपूत समुदायों को जोड़कर एक नया राजनीतिक समीकरण तैयार कर डाला”; आस-पास के गाँवों में ग्राम-प्रधान पद के उम्मीदवारों को समर्थन देकर एक गठबंधन-सा बनाया |
| राज्य से जुड़ाव | मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के पास प्रतिनिधिमंडल ले गया; सुखाड़िया ने उसे अपने मनपसंद उम्मीदवार का समर्थन करने पर राजी कर लिया |
| ★★भीम सिंह का हिसाब | “अगर कांग्रेसी उम्मीदवार जीत जाता है, तो उसका मंत्री बनना तय है और उसके मंत्री बनने का अर्थ है कि भीम सिंह मंत्री से सीधे संपर्क स्थापित कर सकता है।” |
| शेर सिंह | स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार (एक जागीरदार) का साथ देने के अलावा कोई चारा नहीं; प्रचार में कहता था कि जागीरदार गाँव में स्कूल बनवाएगा और अपनी जेब से पैसा लगाएगा |
| ★★निष्कर्ष | “देवीसर गाँव में विधानसभा चुनाव चाचा-भतीजे की खेमेबाजी में बदल गया था।” |
| स्रोत | आनंद चक्रवर्ती की पुस्तक ‘ए विलेज इन चोमू असेंबली कॉन्सटीट्यूऐंसी इन राजस्थान’ पर आधारित (संकलन: ‘The Grassroots of Democracy’, एम.एन. श्रीनिवास और ए.एम. शाह) |
★★इस बॉक्स का असली महत्व: यह दिखाता है कि ‘गठबंधन’ और ‘जाति-समीकरण’ की राजनीति दिल्ली से नहीं, गाँव की पंचायत से शुरू होती है। राष्ट्रीय दलों के चुनाव-चिह्न ऊपर से आते हैं; ज़मीन पर लड़ाई चाचा-भतीजे की होती है।
पृष्ठ 78 · गैर-कांग्रेसवाद और 1967 का जनादेश
गैर-कांग्रेसवाद★★
“कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उसके वोट बँट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन है। जो दल अपने कार्यक्रम अथवा विचारधाराओं के धरातल पर एक-दूसरे से एकदम अलग थे, वे सभी दल एकजुट हुए और उन्होंने कुछ राज्यों में एक कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाया तथा अन्य राज्यों में सीटों के मामले में चुनावी तालमेल किया।” “इन दलों को लगा कि इंदिरा गाँधी की अनुभवहीनता और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक से उन्हें कांग्रेस को सत्ता से हटाने का एक अवसर हाथ लगा है।”
★★नामकरण और तर्क: “समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने इस रणनीति को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नाम दिया। उन्होंने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ के पक्ष में सैद्धांतिक तर्क देते हुए कहा कि कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीब लोगों के हितों के खिलाफ़ है, इसलिए गैर-कांग्रेसी दलों का एक साथ आना जरूरी है, ताकि गरीबों के हक में लोकतंत्र को वापस लाया जा सके।”
★इस पर ज़ोर दीजिए — लोहिया ‘गैर-कांग्रेसवाद’ को केवल चुनावी चाल नहीं, एक लोकतांत्रिक सिद्धांत के रूप में पेश करते हैं। यही प्रश्न 2(घ) का मेल भी है।
अवतरण — नेविए मैक्सवेल,‘इंडियाज़ डिसइंटीग्रेटिंग डेमोक्रेसी’, लंदन टाइम्स (1967)ध्यान
”…भारत में जिस तरह की प्रवृत्तियाँ जारी हैं, उनमें एक सुव्यवस्थित समाज रचना को बनाए रखने का काम नागरिक सरकार के हाथों से जाता रहेगा और सेना ही फिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एकमात्र विकल्प होगी… भारत को लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर विकसित करने का महान प्रयोग असफल हो चुका है…”
★★यह अवतरण कक्षा में ज़रूर पढ़िए और फिर पूछिए: “यह भविष्यवाणी सही निकली या गलत?” यह पृष्ठ 73 की उसी विदेशी आशंका की अगली कड़ी है — और अध्याय अंततः दिखाता है कि लोकतंत्र टिका रहा।
📦 बॉक्स:सी. नटराजन अन्नादुरई (1909–1969)
1967 से मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री · चर्चित पत्रकार, लेखक एवं वक्ता · मद्रास राज्य में जस्टिस पार्टी से संबद्ध · बाद में द्रविड़ कषगम (1934) में शामिल · ★1949 में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम का बतौर राजनीतिक पार्टी गठन · द्रविड़ संस्कृति के समर्थक · हिंदी का विरोध एवं हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व · ★राज्यों की व्यापक स्वायत्तता के समर्थक।
📦 बॉक्स:राममनोहर लोहिया (1910–1967)
समाजवादी नेता एवं विचारक · स्वतंत्रता-सेनानी एवं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य · मूल पार्टी में विभाजन के बाद सोशलिस्ट पार्टी एवं बाद में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता · 1963 से 1967 तक लोकसभा सांसद · ‘मैनकाइंड’ एवं ‘जन’ के संस्थापक संपादक · गैर-यूरोपीय समाजवादी सिद्धांत के विकास में मौलिक योगदान · ★★गैर-कांग्रेसवाद के रणनीतिकार · पिछड़े वर्गों को आरक्षण की वकालत और अंग्रेजी विरोध · नेहरू के खिलाफ़ मोर्चा खोलने वाले नेता के रूप में चर्चित।
चुनाव का जनादेश★★
“व्यापक जन-असंतोष और राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण के इसी माहौल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए 1967 के फरवरी माह में चौथे आम चुनाव हुए। ★कांग्रेस पहली बार नेहरू के बिना मतदाताओं का सामना कर रही थी।”
| परिणाम | विवरण |
|---|---|
| धक्का | “चुनाव के परिणामों से कांग्रेस को राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर गहरा धक्का लगा।” |
| ★★संज्ञा | “तत्कालीन अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने चुनाव परिणामों को ‘राजनीतिक भूकंप’ की संज्ञा दी।” |
| लोकसभा | “कांग्रेस को जैसे-तैसे लोकसभा में बहुमत तो मिल गया था, लेकिन उसको प्राप्त मतों के प्रतिशत तथा सीटों की संख्या में भारी गिरावट आई थी।” |
| ★रिकॉर्ड | “अब से पहले कांग्रेस को कभी न तो इतने कम वोट मिले थे और न ही इतनी कम सीटें मिली थीं।” |
| ! मंत्री हारे | “इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के आधे मंत्री चुनाव हार गए थे।” |
| ★★दिग्गजों की हार | तमिलनाडु से कामराज, महाराष्ट्र से एस.के. पाटिल, पश्चिम बंगाल से अतुल्य घोष, बिहार से के.बी. सहाय — “जैसे राजनीतिक दिग्गजों को मुँह की खानी पड़ी थी।” |
★★इन चार नामों को याद रखिए — इनमें से तीन (कामराज, पाटिल, घोष) ‘सिंडिकेट’ के सदस्य हैं। यानी 1967 में सिंडिकेट की व्यक्तिगत हार भी हुई — और यही आगे इंदिरा गाँधी के लिए मौका बनी।
पृष्ठ 79 · 🗺 मानचित्र — विधानसभा चुनाव परिणाम, 1967ध्यान
| रंग | अर्थ |
|---|---|
| पीला | वे प्रदेश जहाँ कांग्रेस को 1967 के विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला |
| लाल | वे प्रदेश जहाँ कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला |
| विशेष | ★राजस्थान — “कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला लेकिन कुछ अन्य की सहायता से सरकार बनाई” |
लाल (बहुमत नहीं): पंजाब · राजस्थान · दिल्ली · उत्तर प्रदेश · बिहार · पश्चिम बंगाल · उड़ीसा · मद्रास · केरल पीला (बहुमत मिला): जम्मू और कश्मीर · हिमाचल प्रदेश · गुजरात · मध्य प्रदेश · महाराष्ट्र · मैसूर · आंध्र प्रदेश · असम · त्रिपुरा · मणिपुर (और अन्य)
! पाठ की अपनी नोट: “यह नक्शा किसी पैमाने के हिसाब से बनाया गया भारत का मानचित्र नहीं है। इसमें दिखाई गई भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए।”
💬 हाशिये का प्रश्न
“क्या आज गैर-कांग्रेसवाद प्रासंगिक है?” ★इसे कक्षा-चर्चा के लिए रखिए।
पृष्ठ 80 · राज्यों में बदलाव, गठबंधन
राज्यों का हिसाब — यह सारणी परीक्षा में सीधे आती है★★
| मद | विवरण |
|---|---|
| बहुमत नहीं मिला | सात राज्यों में |
| दलबदल के कारण सरकार नहीं बना सकी | दो अन्य राज्यों में |
| ★★कुल | नौ (9) राज्यों में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई |
| ★कौन-से नौ | पंजाब · हरियाणा · उत्तर प्रदेश · मध्य प्रदेश · बिहार · पश्चिम बंगाल · उड़ीसा · मद्रास · केरल |
| भौगोलिक फैलाव | “ये राज्य देश के किसी एक भाग में कायम राज्य नहीं थे। ये राज्य पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में थे।” |
मद्रास और डीएमके — पहली बार★★
“मद्रास प्रांत (अब इसे तमिलनाडु कहा जाता है) में एक क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पाने में कामयाब रही। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) हिंदी-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करके सत्ता में आई थी। यहाँ के छात्र हिंदी को राजभाषा के रूप में केंद्र द्वारा अपने ऊपर थोपने का विरोध कर रहे थे और डीएमके ने उनके इस विरोध को नेतृत्व प्रदान किया था।” ★★“चुनावी इतिहास में यह पहली घटना थी जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला।” “अन्य आठ राज्यों में विभिन्न गैर-कांग्रेसी दलों की गठबंधन सरकार बनी।”
वह प्रसिद्ध पंक्ति★
“उस समय आमतौर पर कहा जाता था कि दिल्ली से हावड़ा जाने के लिए ट्रेन पर बैठो, तो यह ट्रेन अपने पूरे रास्ते में एक भी कांग्रेस-शासित राज्य से होकर नहीं गुज़रेगी।” “लोग कांग्रेस को सत्तासीन देखने के अभ्यस्त थे और उनके लिए यह एक विचित्र अनुभव था। तो क्या मान लिया जाए कि कांग्रेस का दबदबा खत्म हो गया?” ★★यह अंतिम प्रश्न पूरे अध्याय का मोड़ है — और उसका उत्तर 1971 में आता है।
🔷 गठबंधन
“1967 के चुनावों से गठबंधन की परिघटना सामने आयी। चूँकि किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था, इसलिए अनेक गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने एकजुट होकर संयुक्त विधायक दल बनाया और गैर-कांग्रेसी सरकारों को समर्थन दिया। इसी कारण इन सरकारों को संयुक्त विधायक दल की सरकार कहा गया।” ★“अधिकतर मामलों में ऐसी सरकार के घटक दल विचारधारा के लिहाज से एक-दूसरे से भिन्न थे।”
| राज्य | गठबंधन के घटक |
|---|---|
| ★बिहार | दो समाजवादी पार्टियाँ — एसएसपी और पीएसपी; इनके साथ वामपंथी सीपीआई और दक्षिणपंथी जनसंघ भी |
| ★पंजाब | ‘पॉपुलर यूनाइटेड फ्रंट’ — दो परस्पर प्रतिस्पर्धी अकाली दल (संत ग्रुप और मास्टर ग्रुप); साथ में सीपीआई, सीपीआई (एम), एसएसपी, रिपब्लिकन पार्टी और भारतीय जनसंघ |
★★बिहार का उदाहरण ज़रूर पढ़ाइए — एक ही सरकार में वामपंथी सीपीआई और दक्षिणपंथी जनसंघ। यह ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की ताक़त भी दिखाता है और उसकी कमज़ोरी भी।
🎨 कार्टून
एक लंबी साझा साइकिल पर कई सवार — जिन पर बीएलडी, बीकेएस, एसएसपी, उत्कल कांग्रेस, बीकेडी आदि नाम लिखे हैं; सड़क पर बोर्ड: “KEEP RIGHT — No Left Turn”। चित्र-शीर्षक: “1974 में गैर-साम्यवादी दलों का एक संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिशों पर कार्टूनिस्ट का नज़रिया।”
💬 हाशिये का प्रश्न
“त्रिशंकु विधानसभा और गठबंधन सरकार की इन बातों में नया क्या है? ऐसी बातें तो हम आए दिन सुनते रहते हैं।” ★उत्तर: आज यह सामान्य है, पर 1967 में यह पहली बार हुआ था — इसीलिए वह ‘राजनीतिक भूकंप’ था।
पृष्ठ 81 · दल-बदल और कांग्रेस में विभाजन का आरंभ
🔷 दल-बदल
परिभाषा (पाठ के शब्दों में): “कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव लड़े और जीत जाए और चुनाव जीतने के बाद इस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे दल-बदल कहते हैं।” “1967 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस को छोड़ने वाले विधायकों ने तीन राज्यों — हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश — में गैर-कांग्रेसी सरकारों को बहाल करने में अहम भूमिका निभायी।”
📦 बॉक्स:‘आया राम-गया राम’
| मद | विवरण |
|---|---|
| कौन | ★हरियाणा के एक विधायक — गया लाल |
| ★★कीर्तिमान | “उन्होंने एक पखवाड़े के अंदर तीन दफा अपनी पार्टी बदली।” |
| क्रम | पहले कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट → फिर कांग्रेस में लौटे → और कांग्रेस में लौटने के 9 घंटों के अंदर दोबारा यूनाइटेड फ्रंट में चले गए |
| ★★जुमले का जन्म | कांग्रेस के नेता राव वीरेन्द्र सिंह ने उन्हें लेकर चंडीगढ़ में प्रेस के सामने घोषणा की — “गया राम था अब आया राम है।” |
| ★परिणाम | “बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया।” |
साथ में अमूल का कार्टून: “Aya Ram…Gaya Ram Hai Ram — Amul Delhi-cious”
🔷 कांग्रेस में विभाजन — पृष्ठभूमि
“1967 के चुनावों के बाद केंद्र में कांग्रेस की सत्ता कायम रही, लेकिन उसे पहले जितना बहुमत हासिल नहीं था। साथ ही अनेक राज्यों में इस पार्टी के हाथ से सत्ता जाती रही। ★★सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया था कि कांग्रेस को चुनावों में हराया जा सकता है।” ! “बहरहाल, अब भी कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं था। राज्यों में बनी अधिकतर गैर-कांग्रेसी गठबंधन की सरकारें ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाईं। इन सरकारों ने बहुमत खोया और उन्हें या तो नए सिरे से गठबंधन बनाना पड़ा अथवा राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा।”
★★यह संतुलन ज़रूरी है — 1967 ने कांग्रेस को हराया, पर उसका विकल्प नहीं दिया। और यही खाली जगह 1971 में इंदिरा गाँधी ने भर दी।
🔷 इंदिरा बनाम सिंडिकेट
★★“इंदिरा गाँधी को असली चुनौती विपक्ष से नहीं बल्कि खुद अपनी पार्टी के भीतर से मिली। उन्हें ‘सिंडिकेट’ से निपटना पड़ा।”
📦 बॉक्स:के. कामराज (1903–1975)
स्वतंत्रता-सेनानी और कांग्रेस के नेता · मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री रहे · ★मद्रास प्रांत में शिक्षा का प्रसार करने और स्कूली बच्चों को ‘दोपहर का भोजन’ देने की योजना लागू करने के लिए प्रसिद्ध · ★★1963 में उन्होंने प्रस्ताव रखा कि सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को इस्तीफा दे देना चाहिए, ताकि अपेक्षाकृत युवा पार्टी कार्यकर्ता कमान सँभाल सकें। यह प्रस्ताव ‘कामराज योजना’ के नाम से मशहूर हुआ। · कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे।
पृष्ठ 82 · ‘सिंडिकेट’ और इंदिरा गाँधी की रणनीति
📦 बॉक्स:कांग्रेसी ‘सिंडिकेट’( यह पूरा बॉक्स याद रखने लायक है)★★
“कांग्रेसी नेताओं के एक समूह को अनौपचारिक तौर पर ‘सिंडिकेट’ के नाम से इंगित किया जाता था। इस समूह के नेताओं का पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था।”
| सदस्य | कहाँ से |
|---|---|
| ★के. कामराज (अगुवा) | मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और फिर कांग्रेस अध्यक्ष |
| एस.के. पाटिल | बंबई सिटी (अब मुंबई) |
| एस. निजलिंगप्पा | मैसूर (अब कर्नाटक) |
| एन. संजीव रेड्डी | आंध्र प्रदेश |
| अतुल्य घोष | पश्चिम बंगाल |
★★सिंडिकेट की शक्ति: “लालबहादुर शास्त्री और उसके बाद इंदिरा गाँधी, दोनों ही सिंडिकेट की सहायता से प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ हुए थे। इंदिरा गाँधी के पहले मंत्रिपरिषद् में इस समूह की निर्णायक भूमिका रही। इसने तब नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में भी अहम भूमिका निभायी थी।” ! अंत: “कांग्रेस के विभाजित होने के बाद सिंडिकेट के नेता और उनके प्रति निष्ठावान कांग्रेसी कांग्रेस (ओ) में ही रहे। चूँकि इंदिरा गाँधी की कांग्रेस (आर) ही लोकप्रियता की कसौटी पर सफल रही, इसलिए भारतीय राजनीति के ये बड़े और ताकतवर नेता 1971 के बाद प्रभावहीन हो गए।”
इंदिरा गाँधी की दो चुनौतियाँ★★
“इस तरह इंदिरा गाँधी ने दो चुनौतियों का सामना किया।” | # | चुनौती | |---|---| | 1 | “उन्हें ‘सिंडिकेट’ के प्रभाव से स्वतंत्र अपना मुकाम बनाने की ज़रूरत थी।” | | 2 | “कांग्रेस ने 1967 के चुनाव में जो ज़मीन खोयी थी उसे भी उन्हें हासिल करना था।” |
और उनकी रणनीति — यह वाक्य पूरे अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है★★
“इंदिरा गाँधी ने बड़ी साहसिक रणनीति अपनायी। उन्होंने एक साधारण से सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया। उन्होंने सरकार की नीतियों को वामपंथी रंग देने के लिए कई कदम उठाए।”
★इसे बोर्ड पर लिखवाइए और घेर दीजिए। कक्षा से पूछिए: “अगर लड़ाई सिर्फ़ ‘कौन प्रधानमंत्री बने’ की होती तो जनता का उससे क्या लेना-देना? पर अगर वह ‘अमीर बनाम गरीब’ की हो जाए, तो जनता किसके साथ जाएगी?” यही इंदिरा गाँधी की पूरी चाल है।
दस-सूत्री कार्यक्रम, मई 1967★★
“1967 की मई में कांग्रेस कार्यसमिति ने उनके प्रभाव से दस-सूत्री कार्यक्रम अपनाया।”
| # | प्रावधान |
|---|---|
| 1 | बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण |
| 2 | आम बीमा का राष्ट्रीयकरण |
| 3 | शहरी संपदा और आय का परिसीमन |
| 4 | खाद्यान्न का सरकारी वितरण |
| 5 | भूमि सुधार |
| 6 | ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड देना |
! “हालाँकि सिंडिकेट के नेताओं ने औपचारिक तौर पर वामपंथी खेमे के इस कार्यक्रम को स्वीकृति दे दी, लेकिन इसे लेकर उनके मन में गहरे संदेह थे।” (पृ. 83 की पहली पंक्ति)
📦 बॉक्स:एस. निजलिंगप्पा (1902–2000)
वरिष्ठ कांग्रेस नेता · संविधान सभा के सदस्य · लोकसभा के सदस्य · तत्कालीन मैसूर प्रांत (अब कर्नाटक) के मुख्यमंत्री · आधुनिक कर्नाटक के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध · ★1968–71 के दौरान कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष।
📦 बॉक्स:कर्पूरी ठाकुर (1924–1988)
दिसंबर 1970 और जून 1971 तथा जून 1977 और अप्रैल 1979 के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री · स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजवादी नेता · मज़दूर एवं किसान आंदोलनों में सक्रिय · लोहिया के प्रबल समर्थक · जेपी द्वारा चलाए गए आंदोलन में भागीदारी · ★मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान बिहार में पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू करने वाले के रूप में पहचान · अंग्रेज़ी भाषा के इस्तेमाल के प्रबल विरोधी।
💬 हाशिये का प्रश्न
“इसका मतलब यह है कि राज्य स्तर के नेता पहले के समय में भी ‘किंगमेकर’ थे और इसमें कोई नयी बात नहीं है। मैं तो सोचती थी कि ऐसा केवल 1990 के दशक में हुआ।” ★यह प्रश्न कक्षा को दिखाता है कि गठबंधन-राजनीति की जड़ें 1960 के दशक में ही हैं।
पृष्ठ 83 · राष्ट्रपति पद का चुनाव, 1969
टकराव खुलकर सामने आया★★
“सिंडिकेट और इंदिरा गाँधी के बीच की गुटबाज़ी 1969 में राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय खुलकर सामने आ गई। तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु के कारण उस साल राष्ट्रपति का पद खाली था।”
| पक्ष | उम्मीदवार |
|---|---|
| सिंडिकेट (आधिकारिक) | ★एन. संजीव रेड्डी — तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष; “इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद” खड़ा किया गया; “एन. संजीव रेड्डी से इंदिरा गाँधी की बहुत दिनों से राजनीतिक अनबन चली आ रही थी” |
| इंदिरा गाँधी (परोक्ष) | ★★वी.वी. गिरि — तत्कालीन उपराष्ट्रपति; “उन्होंने… गिरि को बढ़ावा दिया कि वे एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद के लिए अपना नामांकन भरें” |
📦 बॉक्स:वी.वी. गिरि (1894–1980)
1969 से 1974 तक भारत के राष्ट्रपति · कांग्रेस नेता एवं आंध्र प्रदेश के मज़दूर नेता · सिलोन (श्रीलंका) में भारतीय उच्चायुक्त · केंद्रीय मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री · उत्तर प्रदेश, केरल, मैसूर (कर्नाटक) के राज्यपाल · उपराष्ट्रपति (1967 से 1969) · राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के निधन के बाद कार्यकारी राष्ट्रपति · ★इस्तीफ़ा एवं राष्ट्रपति चुनाव में स्वतंत्र प्रत्याशी; इंदिरा गाँधी के समर्थन से विजयी।
🎨 कार्टून — आर.के. लक्ष्मण(टाइम्स ऑफ इंडिया, 21 अगस्त 1969)
वी.वी. गिरि एक विजयी मुक्केबाज़ के रूप में, गले में माला; निजलिंगप्पा घुटने टेके हुए — सिंडिकेट के प्रतीक के रूप में; पास में ‘CONGRESS’ लिखा बैनर।
पाठ का प्रश्न: “क्या आप बता सकते हैं कि इस कार्टून में इंदिरा गाँधी को मुक्केबाज़ी वाला दस्ताना पहने क्यों दिखाया गया है?” ★★संकेत: गिरि जीते ज़रूर, पर असली मुक्का इंदिरा गाँधी का था — वे परदे के पीछे से लड़ रही थीं। कार्टूनिस्ट यही कह रहा है कि जीत गिरि की नहीं, इंदिरा गाँधी की थी।
पृष्ठ 84 · टूट, और ‘प्रिवी पर्स’
दो बड़ी जनप्रिय घोषणाएँ★★
“इंदिरा गाँधी ने चौदह अग्रणी बैंकों के राष्ट्रीयकरण और भूतपूर्व राजा-महाराजाओं को प्राप्त विशेषाधिकार यानी ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त करने जैसी कुछ बड़ी और जनप्रिय नीतियों की घोषणा भी की।” ! “उस वक्त मोरारजी देसाई देश के उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री थे। उपर्युक्त दोनों मुद्दों पर प्रधानमंत्री और उनके बीच गहरे मतभेद उभरे और इसके परिणामस्वरूप मोरारजी ने सरकार से किनारा कर लिया।”
शक्ति-परीक्षण — ‘व्हिप’ बनाम ‘अंतरात्मा की आवाज़’★★
“गुज़रे वक्त में भी कांग्रेस के भीतर इस तरह के मतभेद उठ चुके थे, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग ही था। दोनों गुट चाहते थे कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में ताकत को आजमा ही लिया जाए।”
| पक्ष | कदम |
|---|---|
| ★कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा | ‘व्हिप’ जारी किया कि सभी “कांग्रेसी सांसद और विधायक पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी को वोट डालें।” |
| इंदिरा-समर्थक गुट | अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की विशेष बैठक की याचना — ! स्वीकार नहीं की गई |
| ★★इंदिरा गाँधी | “वी.वी. गिरि का छुपे तौर पर समर्थन करते हुए… खुलेआम अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट डालने को कहा। इसका मतलब यह था कि कांग्रेस के सांसद और विधायक अपनी मनमर्ज़ी से किसी भी उम्मीदवार को वोट डाल सकते हैं।” |
★★परिणाम: “आखिरकार राष्ट्रपति पद के चुनाव में वी.वी. गिरि ही विजयी हुए। वे स्वतंत्र उम्मीदवार थे, जबकि एन. संजीव रेड्डी कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार थे।”
विभाजन★★
“कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार की हार से पार्टी का टूटना तय हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी से निष्कासित प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा कि उनकी पार्टी ही असली कांग्रेस है।”
| ★★नवंबर 1969 तक दो कांग्रेस | नाम |
|---|---|
| सिंडिकेट की अगुवाई वाला खेमा | कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) = कांग्रेस (ओ) = ‘पुरानी कांग्रेस’ |
| इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाला खेमा | कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) = कांग्रेस (आर) = ‘नयी कांग्रेस’ |
★★“इंदिरा गाँधी ने पार्टी की इस टूट को विचारधाराओं की लड़ाई के रूप में पेश किया। उन्होंने इसे ‘समाजवादी’ और ‘पुरातनपंथी’ तथा गरीबों के हिमायती और अमीरों के तरफ़दार के बीच की लड़ाई करार दिया।” (यह वाक्य पृ. 86 की पहली पंक्तियों में पूरा होता है।)
अवतरण — एस. निजलिंगप्पा का पत्र, 11 नवंबर 1969ध्यान
“इतिहास… लोकतंत्र की त्रासदी के ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब जनसमर्थन की लहर के बूते अथवा किसी लोकतांत्रिक संगठन के बल पर सत्तासीन हुआ नेता राजनीतिक आत्ममोह का शिकार हो जाता है और चरित्रहीन चाटुकार दरबारियों की बातों में जीने लगता है…” संदर्भ: “इंदिरा गाँधी को पार्टी से निष्कासित करते हुए एस. निजलिंगप्पा ने उन्हें 11 नवंबर 1969 को एक चिट्ठी लिखी। उपर्युक्त पंक्तियाँ इसी पत्र का अंश हैं।” ★★इस अवतरण को अध्याय 6 (आपातकाल) की भूमिका के रूप में पढ़ाइए — 1969 में लिखी गई यह चेतावनी 1975 में बहुत प्रासंगिक लगने लगती है।
📦 बॉक्स:‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति( पूरा बॉक्स परीक्षा-योग्य है)★★
| चरण | विवरण |
|---|---|
| मूल आश्वासन | “पहले अध्याय में आपने देसी रियासतों के विलय के बारे में पढ़ा था।” ✓ (अध्याय 1 — सही संदर्भ) — विलय से पहले सरकार ने आश्वासन दिया था कि शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार होगा और कुछ विशेष भत्ते दिए जाएँगे |
| आधार | ये दोनों चीज़ें “जिस राज्य का विलय किया जाना है उसका विस्तार, राजस्व और क्षमता कितनी है” — इसी आधार पर तय होतीं |
| नाम | ★“इस व्यवस्था को ‘प्रिवी पर्स’ कहा गया।” |
| शुरुआती स्वीकृति | “रियासतों के विलय के समय… इस विशेष सुविधा की कुछ खास आलोचना नहीं हुई थी। उस वक्त देश की एकता, अखंडता का लक्ष्य ही प्रमुख था।” |
| ! आपत्ति | ★★“ये वंशानुगत विशेषाधिकार भारतीय संविधान में वर्णित समानता और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते थे। नेहरू ने कई दफे इस व्यवस्था को लेकर अपना असंतोष जताया था।” |
| इंदिरा गाँधी | 1967 के चुनावों के बाद ‘प्रिवी पर्स’ खत्म करने की माँग का समर्थन किया |
| ! मोरारजी देसाई | ★“प्रिवी पर्स की समाप्ति को नैतिक रूप से गलत मानते थे। उनका कहना था कि यह ‘रियासतों के साथ विश्वासघात’ के बराबर होगा।” |
| 1970 | ! संविधान संशोधन का प्रयास — “राज्यसभा में यह मंजूरी नहीं पा सका” |
| फिर | ! सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया — “लेकिन इसे सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया” |
| ★★1971 | “इंदिरा गाँधी ने इसे 1971 के चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनाया और इस मुद्दे पर उन्हें जन समर्थन भी खूब मिला। 1971 में मिली भारी जीत के बाद संविधान में संशोधन हुआ और इस तरह प्रिवी पर्स की समाप्ति की राह में मौजूद कानूनी अड़चनें खत्म हो गईं।” |
★★इस बॉक्स की सबसे अच्छी सीख: एक नीति संसद में हारी, अदालत में हारी — और फिर चुनाव में जीत गई। यानी लोकतंत्र में अंतिम अदालत जनता है।
पृष्ठ 85 · विभाजन का दस्तावेज़ी प्रमाण
📰 समाचारपत्र
THE HINDUSTAN TIMES (New Delhi, Saturday, August 16, 1969): ★★“PM INSISTS ON FREE VOTE” · “Congress splits on historic day” · “No-confidence move against Nijalingappa” · “States trend shows no major change”
🎨 कार्टून(साभार: विजयन, शंकर्स वीकली, 20 जुलाई 1969)
बाईं ओर इंदिरा गाँधी एक झंडा लिए; दाईं ओर दो सिंडिकेट-नेता “The Indian National SYNDICATE” लिखा झंडा थामे कह रहे हैं — “We’d like to remind you Bapu’s wish was to see the Congress DISSOLVED” (हम आपको याद दिलाना चाहेंगे कि बापू की इच्छा थी कि कांग्रेस भंग कर दी जाए।) चित्र-शीर्षक: “1969 में कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के लिए प्रतिद्वंद्विता पर कार्टूनिस्ट का नज़रिया।”
★कार्टून का व्यंग्य समझाइए: दोनों पक्ष ‘असली कांग्रेस’ होने का दावा कर रहे हैं — और कार्टूनिस्ट याद दिला रहा है कि गांधी जी तो चाहते ही थे कि कांग्रेस भंग हो जाए।
पृष्ठ 86 · 1971 का चुनाव — मुकाबला
🔷 अल्पमत सरकार
“कांग्रेस की टूट से इंदिरा गाँधी की सरकार अल्पमत में आ गई। बहरहाल, डीएमके और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत कुछ अन्य दलों से प्राप्त मुद्दा आधारित समर्थन के बल पर इंदिरा गाँधी की सरकार सत्ता में बनी रही।” ★“इस अरसे के दौरान सरकार ने सचेत रूप से अपनी छवि को समाजवादी रंग में पेश किया। इसी दौर में इंदिरा गाँधी ने भूमि सुधार के मौजूदा कानूनों के क्रियान्वयन के लिए ज़बरदस्त अभियान चलाया। उन्होंने भू-परिसीमन के कुछ और कानून भी बनवाए।”
मध्यावधि चुनाव का साहसिक फ़ैसला★★
“दूसरे राजनीतिक दलों पर अपनी निर्भरता समाप्त करने, संसद में अपनी पार्टी की स्थिति मज़बूत करने और अपने कार्यक्रमों के पक्ष में जनादेश हासिल करने की गरज से इंदिरा गाँधी की सरकार ने 1970 के दिसंबर में लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश की। यह भी एक आश्चर्यजनक और साहसिक कदम था। लोकसभा के लिए पाँचवें आम चुनाव 1971 के फ़रवरी माह में हुए।” ★तीन कारण याद रखिए: निर्भरता समाप्त करना · संसद में स्थिति मज़बूत करना · कार्यक्रमों के पक्ष में जनादेश।
मुकाबला — कागज़ पर इंदिरा गाँधी कमज़ोर थींध्यान
“चुनावी मुकाबला कांग्रेस (आर) के विपरीत जान पड़ रहा था। आखिर नयी कांग्रेस एक जर्जर होती हुई पार्टी का हिस्सा भर थी। ★हर किसी को विश्वास था कि कांग्रेस पार्टी की असली सांगठनिक ताकत कांग्रेस (ओ) के नियंत्रण में है।”
‘ग्रैंड अलायंस’★★
“सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने एक चुनावी गठबंधन बना लिया था। इसे ‘ग्रैंड अलायंस’ कहा गया।”
| ग्रैंड अलायंस के घटक | शासक दल का गठजोड़ |
|---|---|
| संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) · प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) · भारतीय जनसंघ (बीजेएस) · स्वतंत्र पार्टी · भारतीय क्रांतिदल (बीकेएस) | कांग्रेस (आर) + भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) |
पर एक चीज़ इंदिरा गाँधी के पास थी और विपक्ष के पास नहीं★★
“नयी कांग्रेस के पास एक मुद्दा था; एक अजेंडा और कार्यक्रम था। ! ‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।” ★★“इंदिरा गाँधी ने देश भर में घूम-घूम कर कहा कि विपक्षी गठबंधन के पास बस एक ही कार्यक्रम है : इंदिरा हटाओ। इसके विपरीत उन्होंने लोगों के सामने एक सकारात्मक कार्यक्रम रखा और इसे अपने मशहूर नारे ‘गरीबी हटाओ’ के जरिए एक शक्ल प्रदान की।”
★★यह जोड़ी बोर्ड पर लिखवाइए: “इंदिरा हटाओ” बनाम “गरीबी हटाओ”। एक नकारात्मक, एक सकारात्मक। एक व्यक्ति के बारे में, दूसरा जनता के बारे में। चुनाव यहीं तय हो गया।
‘गरीबी हटाओ’ — कार्यक्रम और लक्ष्य-वर्ग
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| चुनाव-अभियान के मुद्दे | सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि · ग्रामीण भू-स्वामित्व और शहरी संपदा का परिसीमन · आय और अवसरों की असमानता की समाप्ति · ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति |
| ★★लक्ष्य-वर्ग | भूमिहीन किसान · दलित और आदिवासी · अल्पसंख्यक · महिलाएँ · बेरोज़गार नौजवान |
| ★उद्देश्य | “‘गरीबी हटाओ’ का नारा और इससे जुड़ा हुआ कार्यक्रम इंदिरा गाँधी की राजनीतिक रणनीति थी। इसके सहारे वे अपने लिए देशव्यापी राजनीतिक समर्थन की बुनियाद तैयार करना चाहती थीं।” |
💬 हाशिये का प्रश्न
“‘गरीबी हटाओ’ का नारा तो अब से लगभग चालीस साल पहले दिया गया था। क्या यह नारा महज चुनावी छलावा था?” ★यह प्रश्न प्रश्नावली-10 से सीधे जुड़ा है — इसे कक्षा-बहस के लिए रखिए।
पृष्ठ 87 · 1971 के परिणाम
आँकड़े — इन्हें ज्यों का त्यों याद रखिए★★
| दल/गठबंधन | सीटें | वोट |
|---|---|---|
| ★★कांग्रेस (आर) + सीपीआई | 375 | 48.4 प्रतिशत |
| ★★अकेले कांग्रेस (आर) | 352 | 44 प्रतिशत |
| ! कांग्रेस (ओ) | मात्र 16 | इंदिरा गाँधी की पार्टी को मिले वोटों का लगभग एक-चौथाई |
| ! ‘ग्रैंड अलायंस’ (महाजोट) | 60 से भी कम | — |
“1971 के लोकसभा चुनावों के नतीजे उतने ही नाटकीय थे, जितना इन चुनावों को करवाने का फ़ैसला।” “इस गठबंधन को जितने वोट या सीटें मिलीं, उतनी कांग्रेस पिछले चार आम चुनावों में कभी हासिल न कर सकी थी।” ★★“अपनी भारी-भरकम जीत के साथ इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने अपने दावे को साबित कर दिया कि वही ‘असली कांग्रेस’ है और उसे भारतीय राजनीति में फिर से प्रभुत्व के स्थान पर पुनर्स्थापित किया।”
🎨 कार्टून — आर.के. लक्ष्मण,‘द ग्रैंड फिनिश’
“MID-TERM RACE” लिखी दौड़; मंच पर 1-2-3 के खाने, जिन पर लिखा है “STRONG CONSTITUENCY / WEAK CONSTITUENCY / DOUBTFUL CONSTITUENCY” — और तीनों पर इंदिरा गाँधी ही खड़ी हैं। हारे हुए खिलाड़ी कह रहे हैं: “I CAN’T BELIEVE IT! I THOUGHT I WAS COMING FIRST, YOU SECOND AND HE THIRD…!”
चित्र-शीर्षक: “‘द ग्रैंड फिनिश’ नामक कार्टून में 1971 के आम चुनाव के परिणामों पर टिप्पणी की गई है। पराजित खिलाड़ियों के रूप में उस समय के प्रमुख विपक्षी नेताओं को दिखाया गया है।” ★★व्यंग्य: तीनों पदक इंदिरा गाँधी के — यानी मज़बूत, कमज़ोर और संदिग्ध, तीनों तरह की सीटें उन्होंने जीत लीं। विपक्ष को यह विश्वास ही नहीं हो रहा।
पृष्ठ 88 · 1971 का युद्ध और कांग्रेस का पूर्ण दबदबा
“1971 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में एक बड़ा राजनीतिक और सैन्य संकट उठ खड़ा हुआ। चौथे अध्याय में आप पढ़ चुके हैं कि… इसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश बना।” ✓ (अध्याय 4 — सही संदर्भ)
| परिणाम | विवरण |
|---|---|
| ★★लोकप्रियता | “इन घटनाओं से इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता में चार चाँद लग गए। ★विपक्ष के नेताओं तक ने उसके राज्यकौशल की प्रशंसा की।” |
| ★1972 के राज्य चुनाव | “1972 के राज्य विधानसभा के चुनावों में उनकी पार्टी को व्यापक सफलता मिली।” |
| छवि | “उन्हें गरीबों और वंचितों के रक्षक और एक मज़बूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में देखा गया।” |
| ! | “पार्टी के अंदर अथवा बाहर उसके विरोध की कोई गुंजाइश न बची।” |
★★“कांग्रेस लोकसभा के चुनावों में जीती थी और राज्य स्तर के चुनावों में भी। इन दो लगातार जीतों के साथ कांग्रेस का दबदबा एक बार फिर कायम हुआ। कांग्रेस अब लगभग सभी राज्यों में सत्ता में थी। समाज के विभिन्न वर्गों में यह लोकप्रिय भी थी। महज चार साल की अवधि में इंदिरा गाँधी ने अपने नेतृत्व और कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व के सामने खड़ी चुनौतियों को धूल चटा दी थी।” ★“महज चार साल” — 1967 से 1971। यह अंतराल ज़रूर बताइए।
🎨 दो कार्टून
| कार्टून | विवरण |
|---|---|
| आर.के. लक्ष्मण | इंदिरा गाँधी “MASSIVE SUPPORT” लिखी विशाल ट्रॉफ़ी थामे हुए। चित्र-शीर्षक: ★“1971 के आमचुनाव की जीत में अनेक चुनौतियाँ और समस्याएँ भी छुपी थीं।” |
| कुट्टी | एक कारखाने की पट्टी (conveyor belt) पर खड़े मुख्यमंत्री — जिन पर महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, म.प्र., आं.प्र., बिहार, असम लिखा है — और इंदिरा गाँधी उनमें से एक को उठा रही हैं। चित्र-शीर्षक: ★★“मुख्यमंत्री चुनने की इंदिरा गाँधी की शैली पर एक कार्टूनिस्ट की टिप्पणी।” |
★★कुट्टी का कार्टून बहुत महत्वपूर्ण है — यह अगले पृष्ठ के तर्क को चित्र में कह देता है: नयी कांग्रेस में मुख्यमंत्री राज्य से नहीं, दिल्ली से ‘चुने’ जाने लगे। यही ‘केंद्रीकरण’ है।
पृष्ठ 89 · कांग्रेस प्रणाली का पुनर्स्थापन? — अध्याय का निष्कर्ष★★
“बहरहाल कांग्रेस प्रणाली के पुनर्स्थापन का क्या मतलब निकलता है? ★इंदिरा गाँधी ने जो कुछ किया, वह पुरानी कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम नहीं था। कई मामलों में यह पार्टी इंदिरा गाँधी के हाथों नयी तर्ज़ पर बनी थी।”
नयी कांग्रेस की चार विशेषताएँ — यह सारणी सबसे ज़्यादा पूछी जाती है★★
| # | विशेषता |
|---|---|
| 1 | “इस पार्टी को लोकप्रियता के लिहाज से वही स्थान प्राप्त था, जो उसे शुरुआती दौर में हासिल था, लेकिन यह अलग किस्म की पार्टी थी।” |
| 2 | ★★“यह पार्टी पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित थी।” |
| 3 | ! “इस पार्टी का सांगठनिक ढाँचा भी अपेक्षाकृत कमजोर था।” |
| 4 | ★★“इस कांग्रेस पार्टी के भीतर कई गुट नहीं थे, यानी अब वह विभिन्न मतों और हितों को एक साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं थी।” |
| 5 | “इस जीत के लिए पार्टी कुछ सामाजिक वर्गों जैसे गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों पर ज्यादा निर्भर थी।” |
★★निष्कर्ष-वाक्य: “जो कांग्रेस उभरकर सामने आई, वह एकदम नयी कांग्रेस थी। इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन कांग्रेस-प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।”
और जो चीज़ खो गई — यह सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद है★★
“कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी। कांग्रेस प्रणाली को इसी खासियत के कारण जाना जाता था, लेकिन नयी कांग्रेस ज्यादा लोकप्रिय होने के बावजूद इस क्षमता से हीन थी।” !★★“कांग्रेस ने अपनी पकड़ मज़बूत की और इंदिरा गाँधी की राजनीतिक हैसियत अप्रत्याशित रूप से बढ़ी, लेकिन जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई। विकास और आर्थिक बदहाली के मुद्दों पर जनाक्रोश तथा लामबंदी लगातार बढ़ती रही।” “अगले अध्याय में आप पढ़ेंगे कि कैसे इन बातों से एक राजनीतिक संकट उठ खड़ा हुआ और जिससे देश के संवैधानिक लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही खतरा मँडराने लगा था।” ✓ (अध्याय 6 — सही संदर्भ)
★★यह अनुच्छेद पूरे अध्याय की सबसे गहरी बात है, और इसे विद्यार्थी अक्सर छोड़ देते हैं। एक वाक्य में: “कांग्रेस ने ताक़त पाई, पर संवाद की क्षमता खो दी — और जो पार्टी असहमति को अपने भीतर नहीं पचा सकती, वहाँ असहमति सड़क पर उतरती है। और वही आगे आपातकाल तक ले जाती है।”
💬 हाशिये का प्रश्न( अध्याय का सर्वश्रेष्ठ प्रश्न)★★
“यह तो कुछ ऐसा ही है कि कोई मकान की बुनियाद और छत बदल दे फिर भी कहे कि मकान वही है। पुरानी और नयी कांग्रेस में कौन-सी चीज़ समान थी?” ★उत्तर की दिशा: समान थे — नाम, चुनाव-चिह्न-परंपरा, और चुनावी प्रभुत्व। बदल गए — सांगठनिक ढाँचा, आंतरिक लोकतंत्र, गुटों का समावेश, और नेतृत्व-निर्भरता।
🎬 सिने-संसार:ज़ंजीर
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| वर्ष | 1973 |
| निर्देशक | प्रकाश मेहरा |
| पटकथा | सलीम खान–जावेद अख्तर |
| अभिनय | अमिताभ बच्चन, अजित, जया भादुड़ी, प्राण |
| कथानक | विजय एक नौजवान पुलिस अधिकारी है; गुंडागर्दी खत्म करना चाहता है, पर झूठे आरोप में जेल भेज दिया जाता है; बाहर आकर प्रतिशोध की ठानता है और अंततः खलनायक को सबक सिखाता है। |
| ★★महत्व | “इस फ़िल्म में नैतिक मूल्यों के पतन और उससे उपजी कुंठा को बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है। फ़िल्म के नायक विजय का गुस्सा और क्षोभ व्यवस्था की लाचारी को गहराई से चित्रित करता है। ‘ज़ंजीर’ के साथ सातवें दशक में एक नए तरह के गुस्सैल नौजवान नायक का जन्म हुआ।” |
★★इसे अध्याय से जोड़िए: 1973 में परदे पर ‘गुस्सैल नौजवान’ का जन्म और 1974 में सड़कों पर छात्र-आंदोलन — दोनों एक ही निराशा की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। पाठ्यपुस्तक यह फ़िल्म-बॉक्स यहीं क्यों रखती है, यह पूछिए।
पृष्ठ 90–91 · प्रश्नावली(NCERT के 10 प्रश्न)
1. 1967 के चुनावों के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन से बयान सही हैं: (क) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव वह हार गई। · (ख) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव भी हारी और विधानसभा के भी। · (ग) कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, लेकिन उसने दूसरी पार्टियों के समर्थन से एक गठबंधन सरकार बनाई। · (घ) कांग्रेस केंद्र में सत्तासीन रही और उसका बहुमत भी बढ़ा।
2. निम्नलिखित का मेल करें: (क) सिंडिकेट · (ख) दल-बदल · (ग) नारा · (घ) गैर-कांग्रेसवाद
- iकोई निर्वाचित जन-प्रतिनिधि जिस पार्टी के टिकट से जीता हो, उस पार्टी को छोड़कर अगर दूसरे दल में चला जाए। ·
- iiलोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला एक मनभावन मुहावरा। ·
- iiiकांग्रेस और इसकी नीतियों के खिलाफ़ अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों का एकजुट होना। ·
- ivकांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह।
3. निम्नलिखित नारे से किन नेताओं का संबंध है: (क) जय जवान, जय किसान · (ख) इंदिरा हटाओ! · (ग) गरीबी हटाओ!
4. 1971 के ‘ग्रैंड अलायंस’ के बारे में कौन-सा कथन ठीक है? (क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था। · (ख) इसके पास एक स्पष्ट राजनीतिक तथा विचारधारात्मक कार्यक्रम था। · (ग) इसका गठन सभी गैर-कांग्रेसी दलों ने एकजुट होकर किया था।
5. किसी राजनीतिक दल को अपने अंदरूनी मतभेदों का समाधान किस तरह करना चाहिए? प्रत्येक पर विचार कीजिए और उसके फ़ायदों और घाटों को लिखिए। (क) पार्टी के अध्यक्ष द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना। · (ख) पार्टी के भीतर बहुमत की राय पर अमल करना। · (ग) हरेक मामले पर गुप्त मतदान कराना। · (घ) पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से सलाह करना।
6. निम्नलिखित में से किसे/किन्हें 1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार के कारण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? तर्क दीजिए: (क) कांग्रेस पार्टी में करिश्माई नेता का अभाव। · (ख) कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट। · (ग) क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक समूहों की लामबंदी को बढ़ाना। · (घ) गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एकजुटता। · (ङ) कांग्रेस पार्टी के अंदर मतभेद।
7. 1970 के दशक में इंदिरा गाँधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई थी?
8. 1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में ‘सिंडिकेट’ का क्या अर्थ है? सिंडिकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई?
9. कांग्रेस पार्टी किन मसलों को लेकर 1969 में टूट की शिकार हुई?
10. अवतरण — सुदीप्त कविराज:
“इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस को अत्यंत केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक पार्टी संगठन में तब्दील कर दिया, जबकि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस शुरुआती दशकों में एक संघीय, लोकतांत्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच थी। नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज चुनावी विमर्श में बदल दिया। कई नारे उछाले गए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार की नीतियाँ भी बनानी थीं — 1970 के दशक के शुरुआती सालों में अपनी बड़ी चुनावी जीत के जश्न के बीच कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई।”
(क) लेखक के अनुसार नेहरू और इंदिरा गाँधी द्वारा अपनाई गई रणनीतियों में क्या अंतर था? (ख) लेखक ने क्यों कहा है कि सत्तर के दशक में कांग्रेस ‘मर गई’? (ग) कांग्रेस पार्टी में आए बदलावों का असर दूसरी पार्टियों पर किस तरह पड़ा?
📌 खुद करें-खुद सीखें
- राजनीतिक दलों द्वारा गढ़े गए नारों की एक सूची बनाएँ।
- क्या चीज़ों के विज्ञापन और राजनीतिक दलों के नारे, घोषणापत्र तथा विज्ञापनों में कोई समानता है?
- मँहगाई राजनीतिक दलों की नीतियों पर क्या प्रभाव डालती है? इस पर चर्चा कीजिए।
⚡ पूरे अध्याय का कालक्रम — एक पृष्ठ पर
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1963 | ‘कामराज योजना’ का प्रस्ताव |
| ★मई 1964 | जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु |
| ★★1964 | लालबहादुर शास्त्री निर्विरोध कांग्रेस संसदीय दल के नेता → प्रधानमंत्री |
| 1965 | पाकिस्तान से युद्ध; ‘जय जवान-जय किसान’ |
| !★11 जनवरी 1966 | ताशकंद में शास्त्री का निधन |
| ★★1966 | गुप्त मतदान में इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हराया (दो-तिहाई से अधिक मत) |
| 1966 | ! रुपये का अवमूल्यन — 1 डॉलर 5 रुपये से 7 रुपये |
| ★★मई 1967 | कांग्रेस कार्यसमिति का दस-सूत्री कार्यक्रम |
| ★★फरवरी 1967 | चौथे आम चुनाव — ‘राजनीतिक भूकंप’; कांग्रेस 9 राज्यों में सत्ता से बाहर; मद्रास में डीएमके को पूर्ण बहुमत |
| 1967 | ‘आया राम-गया राम’; संयुक्त विधायक दल की सरकारें |
| ★★1969 | ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु → राष्ट्रपति चुनाव → वी.वी. गिरि (स्वतंत्र) की जीत |
| ★1969 | 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण; प्रिवी पर्स समाप्ति की घोषणा; मोरारजी देसाई सरकार से बाहर |
| ★★11 नवंबर 1969 | निजलिंगप्पा का पत्र — इंदिरा गाँधी का निष्कासन |
| ★★नवंबर 1969 | कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) — पार्टी का औपचारिक विभाजन |
| 1970 | ! प्रिवी पर्स पर संविधान संशोधन राज्यसभा में विफल; अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त |
| ★दिसंबर 1970 | लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश |
| ★★फरवरी 1971 | पाँचवें आम चुनाव — कांग्रेस (आर)+सीपीआई को 375 सीटें, 48.4% वोट; कांग्रेस (ओ) को 16 सीटें |
| ★1971 | बांग्लादेश युद्ध और जीत; प्रिवी पर्स समाप्ति के लिए संविधान संशोधन |
| ★1972 | राज्य विधानसभा चुनावों में व्यापक सफलता — कांग्रेस का दबदबा पुनर्स्थापित |
| 1973 | फ़िल्म ‘ज़ंजीर’ |
✓ इस अध्याय की जाँच-सूची
| कसौटी | परिणाम |
|---|---|
| पढ़े गए पृष्ठ | ✓ 20 / 20 (150 dpi दृश्य पठन) |
| अंतर-अध्याय संदर्भ | ✓ 8 में से 8 सही (अध्याय 1, 2 ×2, 3, 4 ×2, 6 ×2) |
| ★★अनाथ संदर्भ (orphan) | ✓ शून्य — नक्सलवाद वाला संदर्भ अध्याय 6 (पृ. 94) में सत्यापित |
| स्पष्ट तथ्यात्मक त्रुटि | ✓ कोई नहीं मिली |
| कार्टून / दृश्य-सामग्री | ✓ 14 दर्ज़ |
| जीवनी-बॉक्स | ✓ 8 दर्ज़ (शास्त्री, इंदिरा गाँधी, अन्नादुरई, लोहिया, कामराज, निजलिंगप्पा, कर्पूरी ठाकुर, वी.वी. गिरि) |
| NCERT प्रश्न | ✓ 10 / 10 दर्ज़ |