अध्याय 7क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

पूरा अध्याय35 मिनटस्रोत जाँचे गए

यह अध्याय अपने आप में पूर्ण है। इसे पढ़ने के लिए पाठ्यपुस्तक साथ रखना आवश्यक नहीं। पाठ्यपुस्तक की पूरी विषय-वस्तु यहाँ है, और उसके आगे सत्यापित तथ्य, संवैधानिक विवरण, आँकड़े और तुलनात्मक दृष्टि भी।

स्रोत-चिह्न: 【पाठ】 NCERT · ◆ प्राथमिक स्रोत · ◇ द्वितीयक स्रोत · ➕ व्याख्या

प्रस्तावना · सात भाषाओं वाला एक पोस्टर

उत्तराखंड आंदोलन का एक पोस्टर है। उस पर एक ही माँग सात भाषाओं में लिखी है — हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, बांग्ला, तमिल, तेलुगु और गुजराती।

एक सवाल स्वाभाविक है। माँग तो सिर्फ़ उत्तराखंड की थी। फिर वह तमिल और बांग्ला में क्यों लिखी गई?

उत्तर वही है जो इस पूरे अध्याय का उत्तर है। वह आंदोलन देश से बात कर रहा था, देश के खिलाफ़ नहीं। वह चाहता था कि उसकी बात पूरे भारत तक पहुँचे — क्योंकि उसे लगता था कि पूरा भारत उसका है।

पाठ्यपुस्तक इसी पन्ने पर एक काले बॉक्स में यह वाक्य रखती है 【पाठ】:

“क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है।”

यह अध्याय इसी वाक्य को चार अलग-अलग कहानियों से परखता है — तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर।

भाग 1 · क्षेत्र और राष्ट्र — बहस का ढाँचा

1.1 दो नज़रिये

दुनिया में क्षेत्रीय विविधता को लेकर दो नज़रिये रहे हैं।

पहला नज़रिया कहता है कि विविधता ख़तरा है। अगर एक देश में कई भाषाएँ, कई संस्कृतियाँ और कई पहचानें होंगी, तो वह देश टूट जाएगा। इसलिए विविधता को मिटाना या दबाना चाहिए — एक भाषा, एक संस्कृति, एक पहचान।

दूसरा नज़रिया कहता है कि विविधता स्वाभाविक है, और उसे मान लेने से देश कमज़ोर नहीं, मज़बूत होता है।

★भारत ने दूसरा रास्ता चुना। पाठ्यपुस्तक इसे स्पष्ट शब्दों में कहती है 【पाठ】:

“भारत का नज़रिया यूरोप के कई देशों से अलग रहा, जहाँ सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरे के रूप में देखा गया।”

1.2 भारत सरकार का नज़रिया — चार बातें 【पाठ】

  1. ★राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि क्षेत्र को नकार दिया जाए।
  2. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं।
  3. क्षेत्रीय मुद्दों और माँगों का उठना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति है।
  4. इन्हें दबाने के बजाय लोकतांत्रिक बातचीत से सुलझाना बेहतर है।

1.3 ➕ यह नज़रिया कहाँ से आया?

भारत ने यह रास्ता अचानक नहीं चुना। इसकी जड़ें स्वतंत्रता संग्राम में हैं ◇:

  • 1920 में कांग्रेस ने अपने प्रांतीय संगठन भाषा के आधार पर पुनर्गठित किए — यानी आज़ादी से 27 वर्ष पहले ही भाषायी इकाई का सिद्धांत स्वीकार कर लिया गया था
  • संविधान सभा ने संघीय ढाँचा चुना, यद्यपि विभाजन के तुरंत बाद का माहौल केंद्रीकरण के पक्ष में था
  • ➕ संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह शक्ति देता है कि वह नए राज्य बना सके और सीमाएँ बदल सके — और इसके लिए संबंधित राज्य की सहमति अनिवार्य नहीं है ◆

➕ यह अंतिम बिंदु महत्वपूर्ण है। अधिकांश संघीय देशों में राज्यों की सीमाएँ लगभग स्थायी होती हैं — अमेरिका में किसी राज्य की सीमा उसकी सहमति के बिना नहीं बदली जा सकती। भारत ने जान-बूझकर लचीलापन चुना। पाठ्यपुस्तक इसी को कहती है 【पाठ】: “विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं का पुनर्निर्धारण किया गया।”

1.4 1980 का दशक — तनाव का चक्र

पाठ्यपुस्तक कहती है कि 1980 के दशक में असम, पंजाब, मिज़ोरम और जम्मू-कश्मीर — चारों जगह क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया। ➕ चारों जगह एक ही चक्र दोहराया गया:

माँग → हथियार → सरकारी जवाबी कार्रवाई → सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया अवरुद्ध → बातचीत → समझौता

★और चारों जगह सरकार का घोषित लक्ष्य एक ही रहा 【पाठ】: “विवाद के मुद्दों को संविधान के दायरे में रहकर निपटा लिया जाए।”

भाग 2 · तमिलनाडु — वह आंदोलन जो हथियार तक नहीं गया

2.1 आंदोलन का दर्जा

पाठ्यपुस्तक द्रविड़ आंदोलन को बहुत ऊँचा दर्जा देती है 【पाठ】 — यह “भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर आंदोलन” था और “क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति”।

इसकी शिकायत साफ़ थी — उत्तर भारत का राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वर्चस्व। इसका नारा था: ‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन-दिन घटता जाए’।

2.2 और फिर भी — हथियार कभी नहीं★★

यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है 【पाठ】:

“हालाँकि आंदोलन के नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, पर आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी। नेतृत्व ने सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया।”

★इस वाक्य में दो बातें एक साथ हैं — आकांक्षा अलगाव की थी, पर तरीक़ा लोकतांत्रिक रहा। आकांक्षा और तरीक़ा — दो अलग चीज़ें हैं। यही पूरे अध्याय का सबसे गहरा सिद्धांत है।

2.3 पेरियार से 1967 तक

पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर ने 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया 【पाठ】। वे पहले कांग्रेस में थे, फिर जस्टिस पार्टी से जुड़े, और बाद में द्रविड़ कड़गम बनाया। उनका विरोध तीन चीज़ों से था — ब्राह्मणवाद, हिंदी थोपा जाना, और उत्तर भारतीय वर्चस्व।

डीएमके ने 1953–54 में तीन-सूत्री माँगों से जन-आंदोलन का रूप लिया 【पाठ】:

  1. कल्लाकुडी का नाम बदलकर डालमियापुरम रखने का विरोध
  2. तमिल संस्कृति के इतिहास को पाठ्यक्रम में जगह
  3. शिल्पकर्म शिक्षा कार्यक्रम हटाने की माँग

1965 के हिंदी-विरोधी आंदोलन ने डीएमके को व्यापक जन-समर्थन दिलाया, और 1967 में वह सत्ता में आ गई। ★तब से तमिलनाडु में सत्ता द्रविड़ दलों के पास ही रही है।

2.4 ➕ आंदोलन ने हथियार क्यों नहीं उठाया? — चार कारण

पाठ्यपुस्तक तथ्य देती है, कारण नहीं। ➕ कारण चार गिनाए जा सकते हैं:

पहला — चुनावी रास्ता खुला था। 1967 में आंदोलन सत्ता में आ गया। जब मतपत्र से सत्ता मिल जाए, बंदूक की ज़रूरत नहीं रहती।

दूसरा — आंदोलन का आधार सामाजिक सुधार था। पेरियार का लक्ष्य जाति-व्यवस्था के विरुद्ध लड़ाई थी। इसका हल राज्य-सत्ता में हिस्सेदारी से निकल सकता था, अलगाव से नहीं।

तीसरा — 16वाँ संविधान संशोधन, 1963 ◆। इसने चुनाव लड़ने और पद ग्रहण करने के लिए भारत की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखने की शपथ अनिवार्य कर दी। ➕ डीएमके ने अलगाव की माँग औपचारिक रूप से छोड़ दी और चुनावी राजनीति चुनी।

चौथा — माँग मान ली गई। 1965 के आंदोलन के बाद केंद्र ने अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा के रूप में बनाए रखा। ➕ जो माँग मान ली जाए, वह विद्रोह नहीं बनती।

★★चारों कारण मिलकर एक सिद्धांत बनाते हैं: किसी आंदोलन का चरित्र इस बात से तय होता है कि व्यवस्था उसे कितनी जगह देती है।

2.5 आगे की कहानी

अन्नादुरै की मृत्यु के बाद डीएमके दोफाड़ हुई और AIADMK बना। 1990 के दशक में एमडीएमके, पीएमके और डीएमडीके भी निकले 【पाठ】।

★और फिर वह बात जो सब कुछ बदल देती है 【पाठ】: 1996 से केंद्र की हर सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार में इनमें से कोई एक दल शामिल रहा है।

पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष 【पाठ】:

“तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है।”

भाग 3 · जम्मू और कश्मीर

3.1 सबसे पहले — यह एक क्षेत्र नहीं, तीन हैं 【पाठ】

क्षेत्रसामाजिक बुनावट
जम्मूहिंदू, मुसलमान और सिख — मिली-जुली आबादी; अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले समूह
कश्मीरकश्मीरी बोलने वाले मुसलमानों का बहुमत; एक छोटी हिंदू आबादी
लद्दाखपहाड़ी, बहुत कम आबादी; बौद्ध और मुसलमान लगभग बराबर-बराबर

★यह सारणी अध्याय की सबसे उपयोगी सारणी है। जब लोग ‘कश्मीर समस्या’ कहते हैं, तो अक्सर वे तीनों क्षेत्रों की अलग-अलग आकांक्षाओं को एक मान लेते हैं — जो ग़लत है।

3.2 1947 — तीन दावे, एक फ़ैसला

  • महाराजा हरि सिंह न भारत में मिलना चाहते थे, न पाकिस्तान में — वे स्वतंत्र दर्जा चाहते थे 【पाठ】
  • पाकिस्तान का दावा था कि मुस्लिम-बहुल होने के नाते कश्मीर उसका है
  • ★पर कश्मीर के लोगों का नज़रिया दोनों से अलग था 【पाठ】:

    “उन्होंने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। क्षेत्रीय अभिलाषा का यह मुद्दा ‘कश्मीरियत’ कहलाता है।”

अक्तूबर 1947 — पाकिस्तान की शह पर कबायली घुसपैठ हुई। महाराजा ने भारत से सैनिक सहायता माँगी। भारत ने मदद दी और साथ ही विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर हुए 【पाठ】।

3.3 ➕ ‘कश्मीरियत’ — गहराई से

पाठ्यपुस्तक इसे एक वाक्य में परिभाषित करती है। ➕ विद्वानों की समझ में यह तीन तत्वों से बनी है ◇:

  • सूफ़ी-ऋषि परंपरा — लाल देद और शेख़ नूरुद्दीन (नुंद ऋषि) की साझी विरासत, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं से जुड़ी है
  • भाषायी पहचान — कश्मीरी भाषा, जो धर्म के आर-पार जाती है
  • स्थान-बोध — घाटी का भूगोल स्वयं एक पहचान बनाता है

! संतुलन के लिए: कुछ विद्वान इसे आदर्शीकृत मानते हैं और कहते हैं कि यह 1990 के बाद की वास्तविकता को — विशेषकर कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को — पूरी तरह नहीं पकड़ता। दोनों दृष्टियाँ जानना ज़रूरी है।

3.4 21 अप्रैल 1948 — संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव 【पाठ】

मामला संयुक्त राष्ट्र पहुँचा। प्रस्ताव में तीन चरण थे:

  1. पाकिस्तान अपने नागरिकों को वापस बुलाए
  2. भारत अपनी फ़ौज न्यूनतम स्तर तक घटाए
  3. जनमत संग्रह कराया जाए

! “इस प्रस्ताव के अंतर्गत कोई प्रगति न हो सकी।” ➕ पहला चरण ही कभी पूरा नहीं हुआ, इसलिए बाक़ी दोनों की नौबत नहीं आई।

3.5 अनुच्छेद 370 — दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ 【पाठ】

मार्च 1948 में शेख अब्दुल्ला राज्य के प्रधानमंत्री बने। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 के ज़रिए राज्य को विशेष दर्जा मिला। इस पर दो बिल्कुल उलटी प्रतिक्रियाएँ हुईं:

कौनक्या कहा
भारत के बाक़ी हिस्सों का एक वर्गविशेष दर्जा राज्य के पूर्ण एकीकरण में बाधा है; इसे हटाया जाए
अधिकांश कश्मीरी370 पर्याप्त नहीं; इसने वह स्वायत्तता नहीं दी जिसका वादा किया गया था

★यह सारणी अपने आप में एक पूरा उत्तर है — क्योंकि यह दिखाती है कि एक ही प्रावधान को दो पक्ष बिल्कुल उलटे कारणों से नापसंद करते थे।

3.6 कश्मीरियों की तीन शिकायतें 【पाठ】

  1. जनमत संग्रह का वादा कभी पूरा नहीं हुआ
  2. अनुच्छेद 370 के तहत मिली स्वायत्तता व्यवहार में घटती चली गई
  3. लोकतंत्र वैसा नहीं फल-फूल सका जैसा देश के बाक़ी हिस्सों में

3.7 1953 से 2019 — पूरी समय-रेखा 【पाठ】

वर्षघटना
1953! शेख अब्दुल्ला पद से हटाए गए और गिरफ़्तार
1965‘प्रधानमंत्री’ और ‘सदर-ए-रियासत’ पदनाम बदले; गुलाम मोहम्मद सादिक पहले मुख्यमंत्री
1974इंदिरा गाँधी–शेख अब्दुल्ला समझौता; शेख फिर मुख्यमंत्री
1982शेख का निधन; फ़ारूक़ अब्दुल्ला उत्तराधिकारी
1986नेशनल कांफ्रेंस–कांग्रेस गठबंधन
1987!! धाँधली के आरोपों वाला चुनाव
1989उग्रवाद की शुरुआत
1996चुनाव; फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार; स्वायत्तता का प्रस्ताव
2002निष्पक्ष चुनाव; पीडीपी–कांग्रेस सरकार; मुफ़्ती मोहम्मद सईद
2008राष्ट्रपति शासन
2009उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री
2014रिकॉर्ड मतदान; पीडीपी–भाजपा सरकार
अप्रैल 2016महबूबा मुफ़्ती — राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री
जून 2018गठबंधन टूटा; राष्ट्रपति शासन
5 अगस्त 2019★★जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019

3.8 ➕ 1987 ‘निर्णायक मोड़’ क्यों है? —★★

पाठ्यपुस्तक इसे मोड़ बताती है। ➕ पूरा तर्क यह है:

1987 से पहले असंतोष चुनावी राजनीति के भीतर व्यक्त हो रहा था — मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट जैसे मंच चुनाव लड़ रहे थे। धाँधली के आरोपों के बाद यह विश्वास टूटा कि मतपत्र से बदलाव संभव है। जब संस्थागत रास्ता बंद दिखा, तो असंतोष संस्थाओं के बाहर चला गया — और 1989 में उग्रवाद शुरू हुआ।

★★यह पूरे अध्याय का केंद्रीय सिद्धांत है: जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपनी विश्वसनीयता खो देती हैं, तो जो विकल्प बचते हैं वे संवैधानिक नहीं रह जाते। यही बात अध्याय 6 (आपातकाल) से भी जुड़ती है।

3.9 5 अगस्त 2019 और उसके बाद

पाठ्यपुस्तक यहाँ तक जाती है 【पाठ】: जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 पारित हुआ, अनुच्छेद 370 समाप्त हुआ, और राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में बँटा। पाठ्यपुस्तक का मानचित्र “केंद्र शासित प्रदेश : जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख” शीर्षक से pib.gov.in के आधार पर दिया गया है।

आगे के तथ्य ◆

तथ्यविवरण
प्रभावी तिथि31 अक्तूबर 2019 — सरदार पटेल की जयंती, राष्ट्रीय एकता दिवस
ढाँचाजम्मू एवं कश्मीर — विधानसभा सहित; लद्दाख — बिना विधानसभा
उच्चतम न्यायालय11 दिसंबर 2023 — पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ (CJI डी.वाई. चंद्रचूड़) ने निरसन वैध ठहराया; राज्य-दर्जा बहाल करने और चुनाव कराने का निर्देश
चुनाव18 सितंबर – 1 अक्तूबर 2024; NC–कांग्रेस को 48 सीटें
सरकार16 अक्तूबर 2024 — उमर अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली

➕ इसका अर्थ: पाठ्यपुस्तक का अपना तर्क — “दबाने के बजाय लोकतांत्रिक बातचीत से सुलझाना बेहतर है” — इस चुनाव से एक नया अध्याय पाता है। चुनाव का लौटना ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया का लौटना है।

! परीक्षा के लिए: उत्तर में पाठ्यपुस्तक की स्थिति (5 अगस्त 2019) ही लिखें। ऊपर के तथ्य समझ के लिए हैं, और उत्तर की अंतिम पंक्ति में एक वाक्य के रूप में जोड़े जा सकते हैं।

भाग 4 · पंजाब

4.1 पृष्ठभूमि 【पाठ】

विभाजन का सबसे गहरा असर पंजाब पर पड़ा। 1966 में पंजाब से हरियाणा अलग हुआ, पहाड़ी इलाक़े हिमाचल को गए, और शेष पंजाब पंजाबी-भाषी प्रांत बना।

अकाली दल 1920 के दशक में बना और उसने ‘पंजाबी सूबा’ आंदोलन का नेतृत्व किया।

4.2 अकालियों की तीन कठिनाइयाँ 【पाठ】

  1. सरकार बनने पर भी वह समय से पहले बर्ख़ास्त कर दी जाती थी
  2. राज्य के हिंदुओं में समर्थन नहीं जुटा पाए
  3. ★सिख समुदाय भी जाति और वर्ग के धरातल पर बँटा हुआ था — दलितों में कांग्रेस को अधिक समर्थन

★तीसरा कारण सबसे कम याद रखा जाता है और सबसे ज़रूरी है। यह दिखाता है कि धार्मिक पहचान अपने आप में एकजुट वोट-बैंक नहीं बनाती।

4.3 आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, 1973 — चार बातें 【पाठ】

  1. क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग
  2. केंद्र-राज्य संबंधों की पुनर्परिभाषा
  3. सिख ‘कौम’ की आकांक्षाएँ और ‘बोलबाला’
  4. ★“यह प्रस्ताव भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है।”

➕ यह विवादास्पद क्यों बना?

सरकार ने इसे अलगाववादी दस्तावेज़ के रूप में पढ़ा; कुछ लोगों ने इसमें पृथक सिख राष्ट्र की माँग देखी। ! पाठ्यपुस्तक स्वयं कारण बताती है: इसकी सीमित लोकप्रियता ही एक कारण थी कि इसे अलग-अलग तरीक़ों से पढ़ा गया।

➕ ऐतिहासिक संदर्भ जो पाठ्यपुस्तक नहीं देती ◆: प्रस्ताव में केंद्र के पास केवल रक्षा, विदेश-नीति, संचार, मुद्रा और रेल रखने की बात थी। यह माँग उसी दौर की केंद्र-राज्य संबंधों पर मुख्यधारा की बहस से मिलती-जुलती थी — सरकारिया आयोग (1983–1988) ठीक इन्हीं प्रश्नों पर काम कर रहा था।

★➕ इसलिए जिस बात ने प्रस्ताव को विवादास्पद बनाया, वह इसका संघीय-आर्थिक हिस्सा नहीं था, बल्कि ‘कौम’ और ‘बोलबाला’ जैसी शब्दावली थी — जिसकी दो तरह से व्याख्या हो सकती थी।

4.4 हिंसा का दौर 【पाठ】

नेतृत्व नरमपंथियों के हाथ से निकलकर चरमपंथियों के हाथ में चला गया। माँग धीरे-धीरे अलग देश की माँग में बदलती दिखी। स्वर्णमंदिर को हथियारबंद लोगों ने अपना मुख्यालय बना लिया।

जून 1984 — ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’। इस कार्रवाई ने सिख भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाई।

31 अक्तूबर 1984 — इंदिरा गाँधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या। इसके बाद उत्तर भारत के कई हिस्सों में सिख-विरोधी हिंसा हुई; दिल्ली में दो हज़ार से ज़्यादा सिख मारे गए।

➕ आधिकारिक आँकड़े ◆

आहूजा समिति ने पाया कि 31 अक्तूबर से 7 नवंबर 1984 के बीच दिल्ली में 2,733 सिख मारे गए। हिंसा दिल्ली तक सीमित नहीं थी — कानपुर, बोकारो और अन्य शहरों में भी हुई।

! कक्षा-निर्देश: आँकड़ा बताइए, भावनात्मक अतिरंजना से बचिए, और किसी समुदाय को दोषी न ठहराएँ। पाठ्यपुस्तक की संयत भाषा ही आदर्श है।

4.5 दो अवतरण 【पाठ】

नानावती आयोग, 2005: “भले ही अपराधियों को सज़ा दिलाने में देरी हुई हो, अब समय आ गया है कि हम इन दुखद घटनाओं के अध्याय को बंद करें।”

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा, 11 अगस्त 2005: “मैं सिख समुदाय से ही नहीं, पूरे भारतीय राष्ट्र से माफ़ी माँगता हूँ, क्योंकि 1984 में जो कुछ हुआ वह राष्ट्रीयता की उस अवधारणा का निषेध था जो हमारे संविधान में दर्ज है।”

➕ यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा एक विशिष्ट सांप्रदायिक हिंसा के लिए संसद में की गई दुर्लभ औपचारिक माफ़ी थी ◆। यह नानावती आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई-रिपोर्ट की चर्चा के दौरान दी गई।

4.6 राजीव गाँधी–लोंगोवाल समझौता, जुलाई 1985 — पाँच प्रावधान 【पाठ】

  1. चंडीगढ़ पंजाब को सौंपा जाएगा
  2. हिंदी-भाषी क्षेत्रों के निर्धारण के लिए एक अलग आयोग
  3. नदी-जल विवाद के लिए न्यायाधिकरण
  4. हिंसा-पीड़ितों को मुआवज़ा और पुनर्वास
  5. अलगाववादियों से निपटने के विशेष प्रावधान

4.7 पर समझौता लागू पूरा नहीं हुआ — ➕ध्यान

पाठ्यपुस्तक कहती है 【पाठ】 कि “न तो अमन आसानी से कायम हुआ और न ही समझौते के तत्काल बाद” — हिंसा वर्षों जारी रही, लंबा राष्ट्रपति शासन रहा, 1992 के चुनाव में मात्र 24 फ़ीसदी मतदान हुआ, और 1997 में अकाली दल (बादल)–भाजपा गठबंधन की जीत के बाद सामान्य राजनीति लौटी।

➕ पर पाठ्यपुस्तक यह नहीं बताती कि कौन-से वादे आज भी लंबित हैं:

प्रावधानस्थिति
चंडीगढ़ पंजाब को! लागू नहीं — चंडीगढ़ आज भी पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी और केंद्र शासित प्रदेश है
नदी-जल न्यायाधिकरण! सतलुज-यमुना लिंक नहर का विवाद आज तक अनसुलझा
हिंदी-भाषी क्षेत्रों का निर्धारणआयोग बना, विवाद बना रहा
मुआवज़ा और पुनर्वासआंशिक रूप से लागू

★➕ इससे एक ज़रूरी निष्कर्ष निकलता है: समझौता होना और समझौता लागू होना — दो अलग बातें हैं। बातचीत आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं — अनुपालन भी चाहिए।

भाग 5 · पूर्वोत्तर

5.1 भूगोल ही पहली चुनौती है 【पाठ】

  • आठ राज्य — असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम
  • ‘सात बहनें’ + सिक्किम ‘भाई’
  • देश की मात्र 4 फ़ीसदी आबादी
  • शेष भारत से जुड़ाव केवल 22 किलोमीटर की राहदारी से
  • ★“भारत के लिए एक तरह से दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश-द्वार”

➕ संख्याओं में ◇: पूर्वोत्तर की लगभग 98% सीमा अंतरराष्ट्रीय है — चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल से लगती है। शेष भारत से जुड़ाव केवल सिलीगुड़ी गलियारे (‘चिकन नेक’) से है। क्षेत्रफल देश का लगभग 8% है, पर आबादी 4%।

★पाठ्यपुस्तक का हाशिया-प्रश्न इस उपेक्षा को पकड़ता है 【पाठ】:

“दिल्ली के लोग यूरोप के नक्शे के बारे में ज्यादा जानते हैं और अपने देश के पूर्वोत्तर के हिस्से के बारे में कम।”

5.2 राज्यों का पुनर्गठन 【पाठ】

वर्षराज्य
1963नगालैंड
1972मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय
1987मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश

5.3 तीन मुद्दे★★

(क) स्वायत्तता की माँग 【पाठ】

आज़ादी के बाद पूरा क्षेत्र असम के अधीन था। ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन से शुरुआत हुई, फिर 1960 में ऑल पार्टी हिल्स लीडर्स कांफ्रेंस बनी, और अंततः कई जनजातीय राज्य बने।

पर माँगें यहीं नहीं रुकीं। असम में करबी और दिमसा को स्वायत्त जिला परिषदें मिलीं, बोडो को अलग स्वायत्त परिषद्। ★क्योंकि 【पाठ】:

“छोटे-छोटे और निरंतर लघुतर होते राज्य बनाते चले जाना संभव नहीं था।”

➕ यहीं संविधान की छठी अनुसूची काम आती है ◆ — यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त ज़िला परिषदों की व्यवस्था करती है, जिन्हें भूमि, वन, प्रथागत विधि और स्थानीय प्रशासन पर अधिकार मिलते हैं। ★यह ‘राज्य बनाए बिना स्वायत्तता देने’ का औज़ार है।

(ख) अलगाव के आंदोलन

मिज़ोरम — भारत की सबसे सफल शांति कहानी

1959 के अकाल में असम सरकार की उदासीनता से गहरी नाराज़गी पैदा हुई 【पाठ】। मिज़ो नेशनल फ्रंट बना, नेता लालडेंगा। 1966 से सशस्त्र अभियान शुरू हुआ जो दो दशक चला। 1986 में राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच शांति समझौता हुआ; मिज़ोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।

★पाठ्यपुस्तक का वाक्य: “आज मिज़ोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांतिपूर्ण राज्य है” — और विकास में भी अग्रणी।

➕ अतिरिक्त तथ्य ◆

  • समझौते पर हस्ताक्षर 30 जून 1986 को हुए — भारत सरकार, मिज़ोरम सरकार और MNF के बीच
  • मिज़ोरम में यह दिन ‘रेम्ना नी’ (Remna Ni — शांति दिवस) के रूप में मनाया जाता है
  • ➕ विद्वानों में व्यापक सहमति है कि यह भारत का सबसे सफल शांति समझौता है ◇

नगालैंड — अनसुलझा प्रश्न 【पाठ】

1951 में अंगामी ज़ापू फ़िजो के नेतृत्व में स्वतंत्रता की घोषणा हुई। 1963 में नगालैंड राज्य बना, पर संघर्ष जारी रहा। ! फ़िजो ने बातचीत के कई प्रस्ताव ठुकरा दिए। कुछ समझौते हुए, पर “समाधान होना अब भी बाकी है।”

मिज़ोरम बनाम नगालैंड — यह तुलना ही अध्याय का सबक है ➕★★

कसौटीमिज़ोरमनगालैंड
आंदोलन की एकताएक संगठन (MNF), एक निर्विवाद नेताकई गुट, कई धड़े
बातचीत की स्वीकृतिलालडेंगा ने बातचीत स्वीकारी! फ़िजो ने कई प्रस्ताव ठुकराए
समझौते की व्यापकतादर्जा + स्वायत्तता + पुनर्वास एक साथखंडित, चरणबद्ध समझौते
वादे का पालनअगले ही वर्ष राज्य का दर्जाराज्य 1963 में, पर मूल प्रश्न अनसुलझा
आजसबसे शांतिपूर्ण राज्य! समाधान अब भी बाक़ी

★★➕ निष्कर्ष: फ़र्क़ ताक़त का नहीं, बातचीत का है।

(ग) ‘बाहरी’ लोगों का विरोध — असम आंदोलन 【पाठ】

1979 से 1985 — छह साल का आंदोलन, नेतृत्व आसू (AASU) के हाथ में, जो एक छात्र संगठन था। माँग थी कि 1951 के बाद आए विदेशी नागरिकों की पहचान की जाए और उन्हें वापस भेजा जाए। ! आंदोलन पूरी तरह अहिंसक नहीं रह पाया।

★इसके पीछे दो कारण साथ-साथ थे — यह परीक्षा में सबसे अधिक पूछा जाने वाला बिंदु है:

सांस्कृतिक चिंताआर्थिक शिकायत
असमिया पहचान और भाषा पर संकट का भयतेल, चाय और कोयला — फिर भी राज्य ग़रीब
बाहरी लोगों से जनसंख्या-संतुलन बदलने का डरसंसाधन बाहर जाते हैं, लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता
मताधिकार और भूमि पर असर की आशंकाबेरोज़गारी और पिछड़ापन

5.4 असम समझौता, 1985 — तीन कट-ऑफ़ 【पाठ】

कब आएक्या मिला
1951–1961पूर्ण नागरिकता और मताधिकार
1961–1971नागरिकता, पर मताधिकार नहीं
1971 के बादवापस भेजा जाएगा

आसू ने असम गण परिषद् बनाई और 1985 में सत्ता में आई; नारा था ‘स्वर्णिम असम’।

! पर पाठ्यपुस्तक साफ़ कहती है: “‘आप्रवास’ की समस्या का समाधान नहीं हो पाया।”

➕ इस दावे का सबसे ठोस प्रमाण ◆

  • राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की अंतिम सूची 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित हुई
  • इसमें लगभग 19 लाख लोग (कुल आवेदकों का लगभग 6%) बाहर रह गए
  • प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चली
  • ! आधार-तिथि वही रही जो 1985 के असम समझौते ने तय की थी — 24 मार्च 1971

➕ 34 वर्ष बाद भी वही कट-ऑफ़, वही प्रश्न, वही विवाद। समझौता एक तारीख़ तय कर सका, पर तारीख़ को लागू करना कहीं अधिक कठिन निकला।

★और पाठ्यपुस्तक का हाशिया-प्रश्न इस पूरे प्रश्न की जड़ पकड़ता है 【पाठ】:

“कोई आदमी कहीं पहले चला गया हो तो वही दूसरों को ‘बाहरी’ समझने लगता है।”

भाग 6 · सिक्किम और गोवा — जब जनमत ने फ़ैसला किया

6.1 सिक्किम 【पाठ】

सिक्किम भारत का ‘शरणागत’ (protectorate) था — रक्षा और विदेश-नीति भारत के पास, आंतरिक शासन चोग्याल के हाथ में। आबादी में नेपाली मूल के लोग बहुसंख्यक थे, पर सत्ता में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी।

1974 के पहले चुनाव में सिक्किम कांग्रेस को भारी जीत मिली। अप्रैल 1975 में विधानसभा ने भारत में विलय का प्रस्ताव पारित किया, जनमत-संग्रह में लोगों ने इसका समर्थन किया, और भारतीय संसद ने प्रस्ताव स्वीकार किया। सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना।

★पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष: “विलय को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल था। इस कारण यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका!”

➕ संवैधानिक विवरण ◆ — यह पाठ्यपुस्तक नहीं देती★

यह दो चरणों में हुआ:

चरणक्या हुआ
35वाँ संविधान संशोधन (1974)सिक्किम को ‘सहयुक्त राज्य’ (associate state) बनाया गया — भारतीय संविधान में यह श्रेणी सिर्फ़ सिक्किम के लिए बनी
36वाँ संविधान संशोधन (1975)★16 मई 1975 को प्रभावी; सिक्किम पूर्ण राज्य — 22वाँ राज्य; ‘सहयुक्त राज्य’ की श्रेणी हटा दी गई

★★➕ यह ‘संविधान के लचीलेपन’ का सबसे शुद्ध उदाहरण है। भारत ने एक बिल्कुल नई संवैधानिक श्रेणी बनाई, उसका उपयोग किया, और फिर उसे हटा दिया। कोई और लोकतंत्र इतनी सहजता से यह नहीं कर पाता।

6.2 गोवा 【पाठ】

पुर्तगाली शासन भारत की आज़ादी के बाद भी जारी रहा — गोवा, दमन और दीव पुर्तगाल के अधीन थे। दिसंबर 1961 में भारतीय सेना की दो दिन की कार्रवाई से तीनों क्षेत्र भारत में शामिल हुए और केंद्र शासित प्रदेश बने।

पर असली सवाल इसके बाद उठा। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी गोवा का महाराष्ट्र में विलय चाहती थी; यूनाइटेड गोवन्स पार्टी अलग गोवानी पहचान बनाए रखना चाहती थी।

★जनवरी 1967 में भारत सरकार ने जनमत सर्वेक्षण कराया। लोगों ने अलग बने रहने के पक्ष में मत दिया। 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला; दमन और दीव अलग केंद्र शासित प्रदेश रहे।

➕ अतिरिक्त तथ्य ◆

  • सर्वेक्षण की तिथि 16 जनवरी 1967; यह भारत का इकलौता ऐसा जनमत सर्वेक्षण है
  • गोवा में 16 जनवरी को ‘ओपिनियन पोल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है ◇
  • गोवा 30 मई 1987 को पूर्ण राज्य बना — भारत का 25वाँ राज्य

★➕ सिक्किम और गोवा — एक ही सबक, दो रूप: दोनों जगह जनमत ने फ़ैसला किया, हथियार ने नहीं। और इसीलिए दोनों जगह मुद्दा स्थायी विभाजन-रेखा नहीं बना।

भाग 7 · संविधान के औज़ार — लचीलापन कहाँ है?

पाठ्यपुस्तक का पाँचवाँ सबक कहता है कि संविधान में लचीलापन है। ➕ वह लचीलापन ठीक-ठीक कहाँ है? ◆

औज़ारक्या करता हैउदाहरण
अनुच्छेद 3संसद नए राज्य बना सकती है, सीमाएँ बदल सकती है — राज्य की सहमति अनिवार्य नहीं1966 का पंजाब-हरियाणा; 2000 के तीन राज्य
पाँचवीं अनुसूचीअनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासनमध्य भारत के जनजातीय क्षेत्र
छठी अनुसूची ★असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम में स्वायत्त ज़िला परिषदेंकरबी आंगलोंग, बोडोलैंड
अनुच्छेद 371, 371A–371Jअलग-अलग राज्यों के लिए विशेष प्रावधान★371A — नगालैंड: नगा प्रथागत विधि और भू-स्वामित्व पर संसद का क़ानून राज्य विधानसभा की सहमति के बिना लागू नहीं
अनुच्छेद 370जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा! 5 अगस्त 2019 को निरस्त

➕ सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन★★

अनुच्छेद 371A अब भी लागू है। यानी भारत ने 370 हटाने के बाद भी क्षेत्रीय विशिष्टता की व्यवस्था नहीं छोड़ी — केवल एक विशेष प्रावधान बदला, सिद्धांत नहीं।

➕ यह पाठ के सबक 5 को कमज़ोर नहीं करता — उसे और सूक्ष्म बनाता है। असममित संघवाद भारत की व्यवस्था का स्थायी अंग है, कोई अपवाद नहीं।

➕ तुलनात्मक दृष्टि ◇

देशक्या कियानतीजा
स्पेनबास्क और कातालोन्या को विशेष स्वायत्तताअलगाववाद फिर भी तीव्र रहा
कनाडाक्यूबेक में 1980 और 1995 में अलगाव पर जनमत-संग्रह1995 में प्रस्ताव बहुत कम अंतर से हारा
ब्रिटेनस्कॉटलैंड में 2014 का जनमत-संग्रहसंघ बना रहा
भारतअलगाव पर जनमत-संग्रह नहीं; पर राज्य बनाने, सीमाएँ बदलने और विशेष दर्जा देने का रास्ता खुलाअलगाववाद कहीं सफल नहीं हुआ

➕ निबंध-प्रश्न: क्या भारत का मॉडल अधिक टिकाऊ है — और किस क़ीमत पर?

भाग 8 · पाँच सबक 【पाठ】

सबक 1 — यह वैश्विक परिघटना है

क्षेत्रीय आकांक्षाएँ केवल भारत की समस्या नहीं हैं। ब्रिटेन में स्कॉटलैंड और वेल्स, स्पेन में बास्क क्षेत्र, श्रीलंका में तमिल प्रश्न — हर लोकतंत्र इनसे जूझता है।

सबक 2 — दमन नहीं, बातचीत

★क्षेत्रीय आकांक्षाओं को बलपूर्वक दबाना समाधान नहीं है। दमन से आंदोलन और तीखे होते हैं। मिज़ोरम इसका सबसे अच्छा उदाहरण है — दो दशक के संघर्ष के बाद एक समझौते ने सब बदल दिया।

सबक 3 — सत्ता की साझेदारी

क्षेत्रों को सत्ता में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए — केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर। ★“क्षेत्रों को मिलाकर ही पूरा देश बनता है।” ➕ 1996 के बाद गठबंधन की राजनीति ने यह हिस्सेदारी काफ़ी बढ़ाई।

सबक 4 — आर्थिक असमानता को गंभीरता से लीजिए

क्षेत्रीय असंतुलन क्षेत्रीय असंतोष को जन्म देता है। असम इसका उदाहरण है — तेल, चाय और कोयला होते हुए भी पिछड़ापन। ➕ असंतोष हमेशा सांस्कृतिक नहीं होता; अक्सर आर्थिक होता है।

सबक 5 — संविधान का लचीलापन

संविधान ने विशेष प्रावधानों की गुंजाइश रखी — छठी अनुसूची, अनुच्छेद 371, और (2019 तक) अनुच्छेद 370। ! अनुच्छेद 370 अगस्त 2019 में निरस्त हुआ, पर ➕ 371A अब भी प्रवृत्त है।

भाग 9 · राजीव गाँधी और तीन समझौते 【पाठ】

समझौताकबकिसके साथनतीजा
पंजाबजुलाई 1985हरचंद सिंह लोंगोवालशांति में वर्षों लगे; कई वादे लंबित
असम1985आसूअसम गण परिषद् सत्ता में; ! आप्रवास अनसुलझा
मिज़ोरम30 जून 1986 ◆लालडेंगा★सबसे सफल

➕ ★एक ही सरकार, एक ही औज़ार — बातचीत — तीन अलग-अलग नतीजे। फ़र्क़ इस बात से पड़ा कि समझौता कितना व्यापक था, नेतृत्व कितना एकीकृत था, और वादा कितनी जल्दी निभाया गया।

निष्कर्ष · वृत्त पूरा होता है

हमने शुरुआत की थी सात भाषाओं वाले एक पोस्टर से। अब उसका अर्थ साफ़ है।

तमिलनाडु ने दिखाया कि एक आंदोलन हथियार के बिना भी जीत सकता है — और जब वह जीत जाए, तो अलगाव की ज़रूरत ही नहीं रहती।

मिज़ोरम ने दिखाया कि हथियार उठ जाने के बाद भी वापसी संभव है — बशर्ते बातचीत ईमानदार हो और वादा निभाया जाए।

पंजाब ने दिखाया कि समझौता होना काफ़ी नहीं — उसे लागू भी होना पड़ता है।

जम्मू-कश्मीर ने दिखाया कि जब चुनाव पर भरोसा टूटता है, तो विकल्प संवैधानिक नहीं रह जाते — और जब चुनाव लौटता है, तो राजनीति भी लौटती है।

और सिक्किम तथा गोवा ने दिखाया कि जनमत सबसे मज़बूत औज़ार है — जो फ़ैसला लोगों ने ख़ुद किया हो, वह विभाजन-रेखा नहीं बनता।

पाठ्यपुस्तक इन सबको एक वाक्य में समेट देती है 【पाठ】:

★★“क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला। भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता, लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।”

और इसीलिए वह पोस्टर सात भाषाओं में लिखा गया था।

📋 परिशिष्ट · तथ्य-पत्र

तथ्यउत्तरचिह्न
उत्तराखंड पोस्टर की भाषाएँसात【पाठ】
आत्मसम्मान आंदोलनपेरियार, 1925【पाठ】
डीएमके सत्ता में1967【पाठ】
16वाँ संविधान संशोधन1963 — संप्रभुता-अखंडता की शपथ◆
यूएन प्रस्ताव21 अप्रैल 1948 — तीन चरण【पाठ】
शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्रीमार्च 1948【पाठ】
पहले मुख्यमंत्रीगुलाम मोहम्मद सादिक, 1965【पाठ】
निर्णायक चुनाव1987【पाठ】
उग्रवाद की शुरुआत1989【पाठ】
पहली महिला मुख्यमंत्रीमहबूबा मुफ़्ती, अप्रैल 2016【पाठ】
पुनर्गठन अधिनियम5 अगस्त 2019; प्रभावी 31 अक्तूबर 2019【पाठ】◆
उच्चतम न्यायालय का निर्णय11 दिसंबर 2023, 5-न्यायाधीश पीठ◆
J&K विधानसभा चुनाव18 सितंबर – 1 अक्तूबर 2024; NC–कांग्रेस 48 सीटें◆
उमर अब्दुल्ला की शपथ16 अक्तूबर 2024◆
अकाली दल का गठन1920 के दशक में【पाठ】
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव1973【पाठ】
ऑपरेशन ब्लू स्टारजून 1984【पाठ】
इंदिरा गाँधी की हत्या31 अक्तूबर 1984【पाठ】
आहूजा समिति का आँकड़ा2,733 सिख; दिल्ली; 31-10-84 से 7-11-84◆
नानावती आयोग2005【पाठ】
मनमोहन सिंह की माफ़ी11 अगस्त 2005, लोकसभा【पाठ】◆
पंजाब समझौताजुलाई 1985【पाठ】
1992 पंजाब मतदान24 फ़ीसदी【पाठ】
पूर्वोत्तर के राज्यआठ; आबादी 4%; राहदारी 22 किमी【पाठ】
पूर्वोत्तर की अंतरराष्ट्रीय सीमालगभग 98%◇
नगालैंड राज्य1963【पाठ】
मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय1972【पाठ】
मिज़ोरम, अरुणाचल1987【पाठ】
मिज़ोरम समझौता30 जून 1986◆
मिज़ोरम में शांति दिवस‘रेम्ना नी’◇
नगा स्वतंत्रता की घोषणाफ़िजो, 1951【पाठ】
असम आंदोलन1979–1985; आसू【पाठ】
असम समझौते की कट-ऑफ़24 मार्च 1971◆
असम NRC अंतिम सूची31 अगस्त 2019; ~19 लाख बाहर (~6%)◆
सिक्किम — सहयुक्त राज्य35वाँ संशोधन, 1974◆
सिक्किम — पूर्ण राज्य36वाँ संशोधन; 16 मई 1975; 22वाँ राज्य◆
गोवा की मुक्तिदिसंबर 1961【पाठ】
गोवा जनमत सर्वेक्षण16 जनवरी 1967 — भारत का इकलौता◆
गोवा पूर्ण राज्य30 मई 1987; 25वाँ राज्य◆
छठी अनुसूची के राज्यअसम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम◆
नगालैंड का विशेष प्रावधानअनुच्छेद 371A — अब भी प्रवृत्त◆