(Independent Chapter — पाठ्यपुस्तक से आगे, पर उसी क्रम में)
यह क्या है? यह NCERT अध्याय 5 का सारांश नहीं है। यह उसी विषय पर लिखा गया एक स्वतंत्र, पूर्ण अध्याय है — जो वह सब बताता है जो पाठ्यपुस्तक जगह की कमी के कारण नहीं बता पाई।
किसके लिए? (1) बोर्ड में उच्चतम अंक चाहने वाले विद्यार्थी के लिए; (2) UPSC/राज्य-PCS, CUET की तैयारी साथ-साथ करने वाले के लिए; (3) उस शिक्षक के लिए जो कक्षा में “सर, उसका नाम क्या था?” का उत्तर देना चाहता है।
स्रोत-चिह्न और उपयोग की चेतावनीध्यान
| चिह्न | अर्थ |
|---|---|
| 【पाठ】 | NCERT पाठ्यपुस्तक में मौजूद — बोर्ड-परीक्षा में यही प्रमाण है |
| ◆ | प्राथमिक स्रोत — संविधान, न्यायालय का निर्णय, चुनाव-अभिलेख |
| ◇ | द्वितीयक स्रोत — प्रामाणिक अकादमिक/पत्रकारीय अभिलेख |
| ➕ | व्याख्या और संश्लेषण — तथ्य नहीं, तर्क |
!! बोर्ड-परीक्षा: उत्तर की रीढ़ 【पाठ】 रहे। ◆/◇ सामग्री उत्तर के अंत में एक-दो पंक्तियों में जोड़िए — वह उत्तर को चमकाती है, उसकी जगह नहीं लेती।
भाग एक · वह प्रश्न जिससे यह अध्याय शुरू होता है
1.1 【पाठ】 दो सवाल, एक बड़ा और एक बहुत बड़ा
मई 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद पाठ्यपुस्तक दो सवाल दर्ज़ करती है:
| सवाल | पाठ के शब्द |
|---|---|
| छोटा सवाल | “नेहरू के बाद कौन?” |
| ★★बड़ा सवाल | “नेहरू के बाद आखिर इस देश में होगा क्या?” |
और तीन आशंकाएँ: (1) “नेहरू के बाद लोकतंत्र कायम भी रह पाएगा या नहीं”; (2) “राजनीतिक उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा… असफल रहने की सूरत में भय था कि सेना राजनीतिक भूमिका में उतर आएगी”; (3) “नया नेतृत्व… समाधान खोज पाएगा या नहीं।”
1.2 ➕ यह आशंका निराधार नहीं थी — और यही बात कक्षा में सबसे कम बताई जाती है
➕ 1960 का दशक वह दशक था जब एशिया और अफ्रीका के अनेक नव-स्वतंत्र देशों में नागरिक सरकारें गिरीं और सेना सत्ता में आई। भारत के अपने पड़ोस में भी नागरिक शासन बार-बार बाधित हुआ। इसी पृष्ठभूमि में पाठ का हाशिया-प्रश्न (पृ. 73) पढ़िए: “फ्रांस और कनाडा में ऐसी सूरत कायम हो, तो वहाँ कोई भी लोकतंत्र के असफल होने अथवा देश के टूटने की बात नहीं कहता। हम ही आखिर लगातार इतने शक में क्यों पड़े रहते हैं?”
★★➕ दोनों बातें एक साथ सच हैं, और अच्छे उत्तर दोनों कहते हैं: आशंका का एक वास्तविक आधार था — उस दशक में कई नव-स्वतंत्र देशों में लोकतंत्र सचमुच टूटा। पर उसमें एक पूर्वाग्रह भी था — वही घटना यूरोप में होती तो उसे ‘सामान्य राजनीतिक अस्थिरता’ कहा जाता, एशिया में उसे ‘लोकतंत्र की विफलता’ कहा गया।
1.3 【पाठ】 और भारत ने क्या किया
| वर्ष | प्रक्रिया | परिणाम |
|---|---|---|
| 1964 | कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज का सलाह-मशविरा | ★शास्त्री निर्विरोध — “आलोचक ठगे-से रह गए” |
| 1966 | सर्वसम्मति नहीं बनी → कांग्रेस सांसदों का गुप्त मतदान | ★इंदिरा गाँधी ने मोरारजी देसाई को हराया, दो-तिहाई से अधिक मत |
★★【पाठ】 का निष्कर्ष: “प्रतिस्पर्धा के बावजूद… सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया।” ★और विदेशी अख़बार का फ़ैसला भी पाठ ने ही रखा है: “तमाम अंदेशों के बावजूद इंग्लैंड की तुलना में भारत में प्रधानमंत्री का सवाल ज्यादा शालीनता और तेज़ी के साथ हल कर लिया गया।” (‘गार्जियन’, 3 जून 1964)
भाग दो · 1967 — ‘राजनीतिक भूकंप’ का पूरा हिसाब
2.1 आँकड़े जो पाठ नहीं देता ◇★★
【पाठ】 कहती है — “अब से पहले कांग्रेस को कभी न तो इतने कम वोट मिले थे और न ही इतनी कम सीटें मिली थीं।” ! पर संख्या नहीं देती।
| चुनाव | कांग्रेस की लोकसभा सीटें |
|---|---|
| 1962 (तीसरा आम चुनाव) | 361 |
| ★★1967 (चौथा आम चुनाव) | 283 — यानी 78 सीटों की गिरावट |
| ★★1971 (पाँचवाँ आम चुनाव) | कांग्रेस (आर) अकेले 352, 44% वोट 【पाठ】 |
★★➕ तीन संख्याओं में पूरा अध्याय: 361 → 283 → 352। गिरी, टूटी, और पहले से भी ऊपर पहुँच गई। ! और ध्यान दीजिए — 352 सीटें टूटी हुई आधी पार्टी की हैं। यही इंदिरा गाँधी की जीत का असली पैमाना है।
2.2 【पाठ】 संकट के आठ कारक — और उनमें छिपी तीन अध्यायों की कड़ी
| # | कारक | ➕ किस अध्याय से जुड़ा |
|---|---|---|
| 1 | मानसून की असफलता | — |
| 2 | व्यापक सूखा | — |
| 3 | खेती की पैदावार में गिरावट | ★अध्याय 3 — दूसरी योजना में कृषि की उपेक्षा |
| 4 | ! गंभीर खाद्य संकट | ★अध्याय 3 — ‘योजना-अवकाश’ की जड़ |
| 5 | विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी | अध्याय 3 — भारी उद्योग के लिए आयात |
| 6 | औद्योगिक उत्पादन में गिरावट | — |
| 7 | निर्यात में गिरावट | अध्याय 4 — “बाहरी दुनिया से आर्थिक लेन-देन बड़ा सीमित” |
| 8 | ★★सैन्य खर्चे में भारी बढ़ोतरी — “नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधनों को सैन्य-मद में लगाना पड़ा” | ★★अध्याय 4 — 1962 और 1965 के युद्ध |
★★➕ यही इस पुस्तक की सबसे सुंदर बात है: तीन अध्याय — नियोजित विकास, विदेश संबंध और कांग्रेस प्रणाली — 1967 के एक चुनाव-परिणाम पर आकर मिल जाते हैं। उत्तर में यह कड़ी जोड़ दीजिए और वह तुरंत अलग दिखेगा।
2.3 वह एक वाक्य जो अध्याय 6 की जड़ हैध्यान★
【पाठ】 पृ. 77: “सरकार ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या माना न कि जनता की बदहाली की अभिव्यक्ति। इससे लोगों की नाराजगी बढ़ी और जन विरोध ने ज्यादा उग्र रूप धारण किया।”
★★➕ इस वाक्य को याद रखिए। यह इस पुस्तक में तीन बार लौटता है: 1967 में — विरोध को ‘कानून-व्यवस्था’ मानना। 1974 में — गुजरात और बिहार के आंदोलनों को ‘व्यक्तिगत विरोध’ मानना। 1975 में — असहमति को ‘अराजकता’ मानना। ★यानी एक ही प्रवृत्ति, तीन बार, और हर बार परिणाम अधिक गंभीर।
2.4 ‘गैर-कांग्रेसवाद’ — सफलता और सीमा, दोनों★
| ✓ सफलता | ! सीमा |
|---|---|
| नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर 【पाठ】 | “अधिकतर गैर-कांग्रेसी गठबंधन की सरकारें ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाईं” 【पाठ】 |
| ★“साबित कर दिया कि कांग्रेस को चुनावों में हराया जा सकता है” 【पाठ】 | ! “बहरहाल, अब भी कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं था” 【पाठ】 |
| 1971 में ‘ग्रैंड अलायंस’ के रूप में राष्ट्रीय दोहराव | !★“कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था” — 60 से कम सीटें 【पाठ】 |
★★➕ इससे एक स्थायी सबक निकलता है: केवल ‘किसके विरुद्ध’ होने से बना गठबंधन चुनाव जीत सकता है, पर सरकार नहीं चला सकता। 1967 में विपक्ष जीता क्योंकि उसके पास साझा शत्रु था; 1971 में हारा क्योंकि साझा कार्यक्रम नहीं था।
2.5 1967 की जड़ें 1990 के दशक में नहीं, 1967 में ही हैं★
【पाठ】 का हाशिया-प्रश्न (पृ. 82) कहता है: “मैं तो सोचती थी कि ऐसा केवल 1990 के दशक में हुआ।”
➕ आम धारणा यह है कि गठबंधन-युग 1989 में शुरू हुआ। पाठ दिखाता है कि सब कुछ 1967 में ही आ चुका था:
| परिघटना | 1967 में |
|---|---|
| त्रिशंकु विधानसभा | ✓ नौ राज्यों में |
| गठबंधन सरकार | ✓ ‘संयुक्त विधायक दल’ |
| वैचारिक रूप से विपरीत दलों का साथ | ✓ बिहार — वामपंथी सीपीआई और दक्षिणपंथी जनसंघ एक ही सरकार में |
| दल-बदल | ✓ ‘आया राम-गया राम’ |
| क्षेत्रीय दल की पूर्ण-बहुमत सरकार | ✓ मद्रास में डीएमके |
➕ अंतर बस इतना है कि 1967 का प्रयोग राज्यों तक सीमित रहा और केंद्र में कांग्रेस बची रही; 1989 के बाद वही परिघटना केंद्र तक पहुँची।
भाग तीन · दल-बदल — किस्से से कानून तक
3.1 【पाठ】 किस्सा
हरियाणा के विधायक गया लाल ने “एक पखवाड़े के अंदर तीन दफा” पार्टी बदली — कांग्रेस → यूनाइटेड फ्रंट → कांग्रेस → और लौटने के 9 घंटों के अंदर फिर यूनाइटेड फ्रंट। ★कांग्रेस नेता राव वीरेन्द्र सिंह की घोषणा — “गया राम था अब आया राम है।”
3.2 ➕ और अब असली पैमाना ◇★★
1967 और 1971 के चुनावों में केंद्रीय और राज्य विधायिकाओं के लिए चुने गए लगभग 4,000 सांसदों/विधायकों में से करीब आधों ने आगे चलकर दल-बदल किया।”
★★➕ अब ‘आया राम-गया राम’ मज़ाक नहीं, एक व्यवस्थागत संकट लगता है — और 【पाठ】 की वह पंक्ति भारी हो जाती है: “बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया।”
3.3 ◆ वह संशोधन जिसका नाम पाठ नहीं लेता★★
| मद | विवरण |
|---|---|
| ★★कानून | 52वाँ संविधान संशोधन, 1985 — इसी ने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी |
| प्रावधान | दल-बदल के आधार पर सांसदों और विधायकों की अयोग्यता |
| ★91वाँ संशोधन, 2003 | (1) मंत्रिपरिषद् का आकार सदन की कुल सदस्य-संख्या के 15% तक सीमित; (2) दल-बदल पर मिलने वाली ‘विभाजन’ (split) की छूट समाप्त — अब केवल विलय (merger) पर संरक्षण |
★★➕ समय-रेखा पर रखिए: 1967 में एक विधायक की हड़बड़ी → 1985 में कानून → 2003 में उसका छेद बंद। अठारह साल लगे पहला कदम उठाने में, और छत्तीस साल लगे उसे पूरा करने में। ! और आज भी बहस जारी है कि यह कानून विधायक की स्वतंत्र राय छीन तो नहीं लेता।
भाग चार · 1969 — अदालत, संसद और पार्टी
4.1 बैंक-राष्ट्रीयकरण — पूरी कहानी ◇+◆★★
【पाठ】 केवल कहती है: “चौदह अग्रणी बैंकों के राष्ट्रीयकरण… जैसी कुछ बड़ी और जनप्रिय नीतियों की घोषणा भी की।”
| तिथि / मद | विवरण |
|---|---|
| ★★19 जुलाई 1969 | एक अध्यादेश से 14 बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण |
| ★कसौटी | हर बैंक की जमा-राशि ₹50 करोड़ से अधिक |
| ★★पैमाना | इन 14 बैंकों के पास देश की कुल बैंक-जमा का लगभग 85 प्रतिशत |
| ! 10 फ़रवरी 1970 | सर्वोच्च न्यायालय की 11 न्यायाधीशों की पीठ ने 10–1 के बहुमत से आर.सी. कूपर बनाम भारत संघ में अध्यादेश को अवैध ठहराया |
| ✓ आगे | सरकार ने मुआवज़े का प्रावधान करते हुए नया कदम उठाया — और राष्ट्रीयकरण कायम रहा |
★★➕ यहाँ एक बहुत सुंदर विडंबना है: राष्ट्रपति पद पर इंदिरा गाँधी ने जिन वी.वी. गिरि को जितवाया था, इस मामले की अगली कार्रवाई पर उन्हीं राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए। यानी 1969 का राष्ट्रपति चुनाव केवल प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं थी — उसके ठोस नीतिगत परिणाम थे।
4.2 ‘प्रिवी पर्स’ — तीन दरवाज़ों की कहानी★★
【पाठ】 का बॉक्स चरण बताता है, पर न मुकदमे का नाम देता है, न संशोधन की संख्या।
| दरवाज़ा | क्या हुआ |
|---|---|
| 1. संसद | ! 1970 में संविधान संशोधन का प्रयास — राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली 【पाठ】 |
| 2. अदालत | ! राष्ट्रपति-आदेश जारी हुआ, पर 15 दिसंबर 1970 को सर्वोच्च न्यायालय ने माधव राव सिंधिया बनाम भारत संघ में उसे असंवैधानिक ठहराया — तर्क: सरकार संवैधानिक गारंटी को एकतरफ़ा वापस नहीं ले सकती ◆ |
| ★★3. जनता | ✓ 1971 की भारी जीत और दो-तिहाई बहुमत के बाद 26वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 (28 दिसंबर 1971) — इसने प्रिवी पर्स समाप्त किया, शासकों की मान्यता हटाई और पुराने समझौतों से मिले सभी विशेषाधिकार समाप्त कर दिए ◆ |
★★➕ सीख के दो पक्ष — उत्तर में दोनों लिखिए: (क) लोकतंत्र में अंतिम अदालत जनता है; जो नीति संसद और न्यायालय में हारी, वह चुनाव में जीत गई। ! (ख) पर यही घटना दिखाती है कि बड़ा बहुमत मिलने पर संविधान संशोधन कितना आसान हो जाता है — और यही चिंता आगे अध्याय 6 का विषय बनेगी।
4.3 1969 का राष्ट्रपति चुनाव — वह विवरण जो इसे अनोखा बनाता है ◇★★
【पाठ】 केवल कहती है कि “आखिरकार… वी.वी. गिरि ही विजयी हुए।” ➕ पर वे कैसे जीते — यह भारत के चुनावी इतिहास की अनूठी घटना है।
| मद | विवरण |
|---|---|
| प्रणाली | राष्ट्रपति का चुनाव वरीयता-क्रम (एकल संक्रमणीय मत) से होता है |
| पहली गिनती | गिरि को सबसे अधिक प्रथम-वरीयता मत, पर किसी को आवश्यक कोटा नहीं मिला |
| ★★निर्णायक मोड़ | तीसरे उम्मीदवार सी.डी. देशमुख के बाहर होने पर उनके द्वितीय-वरीयता मत बँटे — और उन्हीं से गिरि जीते |
| ★अंतिम अंतर | गिरि लगभग 4,20,000 मूल्य-मत; रेड्डी लगभग 4,05,000 — यानी अत्यंत निकट मुकाबला |
| ★★विशिष्टता | यह भारत का एकमात्र राष्ट्रपति चुनाव है जो द्वितीय-वरीयता मतों की गिनती के बाद तय हुआ |
★★➕ अब 【पाठ】 का ‘अंतरात्मा की आवाज़’ वाला दाँव और भी बड़ा दिखता है। अगर ‘व्हिप’ का पालन हुआ होता, तो रेड्डी आसानी से जीत जाते। अंतर इतना कम था कि इंदिरा गाँधी की यह एक अपील ही निर्णायक साबित हुई — और उसी ने पार्टी तोड़ दी।
4.4 बहस — क्या वह अपील उचित थी?★
| ✓ ‘व्हिप’ के पक्ष में | ✓ ‘अंतरात्मा’ के पक्ष में |
|---|---|
| पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार था; दलीय अनुशासन लोकतंत्र की ज़रूरत है | ★राष्ट्रपति पूरे देश का होता है, किसी दल का नहीं |
| प्रधानमंत्री का अपनी ही पार्टी के व्हिप के विरुद्ध जाना संगठन को तोड़ता है | यह गुप्त मतदान था — जहाँ व्हिप का पालन वैसे भी सिद्ध नहीं किया जा सकता |
| ! निजलिंगप्पा का आरोप — नेता “राजनीतिक आत्ममोह का शिकार” हो जाता है | उम्मीदवार का चयन ही ऊपर से थोपा गया था — “इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद” 【पाठ】 |
★यह प्रश्न 5 का सर्वोत्तम अभ्यास है — और उसका कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं है।
भाग पाँच · 1971 और उसके बाद
5.1 ‘गरीबी हटाओ’ — क्या वह “महज चुनावी छलावा” था?★★
【पाठ】 स्वयं हाशिये में पूछती है (पृ. 86), और प्रश्न 10 का अवतरण कहता है: “कई नारे उछाले गए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार की नीतियाँ भी बनानी थीं।”
| ✓ “केवल नारा नहीं था” के तर्क | ! “नारा ही रह गया” के तर्क |
|---|---|
| 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण — एक ठोस नीति 【पाठ】+◇ | कविराज का दावा — नारों और नीतियों में मेल नहीं 【पाठ】 |
| प्रिवी पर्स की समाप्ति — 26वाँ संशोधन, 1971 ◆ | ! 【पाठ】 स्वयं: “विकास और आर्थिक बदहाली के मुद्दों पर जनाक्रोश तथा लामबंदी लगातार बढ़ती रही” |
| “भूमि सुधार के मौजूदा कानूनों के क्रियान्वयन के लिए ज़बरदस्त अभियान”; भू-परिसीमन के नए कानून 【पाठ】 | ! अगले अध्याय में गुजरात और बिहार के आंदोलनों के मुद्दे वही हैं — कीमतें, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार |
★★➕ सबसे परिपक्व उत्तर: ‘गरीबी हटाओ’ एक साथ दोनों था — एक वास्तविक नीति-दिशा भी और एक चुनावी उपकरण भी। नीतियाँ बनीं ज़रूर, पर उनका असर उतना गहरा नहीं हुआ जितना नारे ने वादा किया था। और इसी अंतर से 1974 का असंतोष जन्मा।
5.2 ‘कांग्रेस प्रणाली’ — तीन लक्षण, और उनमें से कितने लौटे★★
【पाठ】 पहले पन्ने पर अध्याय 2 का हवाला देती है, पर परिभाषा दोहराती नहीं। ➕ उत्तर लिखने से पहले वह याद होनी चाहिए।
| # | लक्षण | 1967 | 1969 | 1971 |
|---|---|---|---|---|
| 1 | चुनावी प्रभुत्व | ! टूटा | — | ✓ लौटा |
| 2 | दल के भीतर कई गुट — यानी विपक्ष पार्टी के अंदर ही | — | ! खत्म | ❌ नहीं लौटा |
| 3 | ★★हर तनाव को भीतर ही पचा लेने की क्षमता | — | ! खत्म | ❌ नहीं लौटा |
★★➕ इसलिए अध्याय का शीर्षक ही उत्तर है: चुनौती तीनों लक्षणों पर आई; पुनर्स्थापना केवल पहले लक्षण की हुई। यही 【पाठ】 के निष्कर्ष-वाक्य का अर्थ है — “पुनर्स्थापित ज़रूर किया, लेकिन… प्रकृति को बदलकर”। ★और यही सुदीप्त कविराज के “कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई” का भी अर्थ है।
5.3 ➕ अध्याय की सबसे बड़ी दार्शनिक सीख★★
【पाठ】 पृ. 89: “कांग्रेस प्रणाली के भीतर हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता थी… लेकिन नयी कांग्रेस ज्यादा लोकप्रिय होने के बावजूद इस क्षमता से हीन थी। …जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई।”
★★➕ इसे एक सामान्य नियम के रूप में समझिए: जो संस्था असहमति को अपने भीतर जगह देती है, वह असहमति को व्यवस्था के भीतर बनाए रखती है। जो संस्था असहमति को बाहर धकेल देती है, वह असहमति को सड़क पर पहुँचा देती है।
1969 में कांग्रेस ने अपने भीतर की असहमति को बाहर कर दिया। 1974 में वही असहमति गुजरात और बिहार की सड़कों पर लौटी। यही अध्याय 5 और अध्याय 6 के बीच का पुल है — और उसे पाठ्यपुस्तक स्वयं अंतिम अनुच्छेद में बना देती है।
5.4 और वह फ़िल्म जो संयोग नहीं है★
【पाठ】 अध्याय के अंत में ‘ज़ंजीर’ (1973) रखती है — “‘ज़ंजीर’ के साथ सातवें दशक में एक नए तरह के गुस्सैल नौजवान नायक का जन्म हुआ।”
★★➕ पूछिए कि यह बॉक्स यहीं क्यों है। 1971 में सत्ता अपने चरम पर; 1973 में परदे पर व्यवस्था से नाराज़ नायक; 1974 में सड़कों पर छात्र-आंदोलन। तीनों एक ही तीन-वर्षीय खिड़की में हैं। यह संयोग नहीं — यह उसी निराशा की तीन अभिव्यक्तियाँ हैं जिसका ज़िक्र पाठ्यपुस्तक ठीक इसी पृष्ठ पर करती है।
भाग छह · निष्कर्ष और बहस
6.1 पाँच वाक्य जो पूरे अध्याय को पकड़ते हैं★★
- नेहरू के बाद जो सबसे बड़ा डर था — कि भारत उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा — वह दो बार गलत साबित हुआ: 1964 में निर्विरोध, 1966 में गुप्त मतदान से।
- 1967 का चौथा आम चुनाव ‘राजनीतिक भूकंप’ था — कांग्रेस केंद्र में बची, पर नौ राज्यों में सत्ता से बाहर हो गई और मद्रास में डीएमके ने पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत दिलाया।
- उससे दो नयी परिघटनाएँ जन्मीं — गठबंधन और दल-बदल — जिनकी जड़ें आज तक जीवित हैं।
- 1969 में असली चुनौती भीतर से आई: इंदिरा गाँधी ने एक साधारण सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया, राष्ट्रपति चुनाव निर्णायक मोड़ बना, और पार्टी दो हो गई।
- ★★1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के सहारे कांग्रेस लौटी — पर वह पार्टी अपने सर्वोच्च नेता पर आश्रित थी, उसका संगठन कमज़ोर था, और उसमें असहमति को पचाने की वह क्षमता नहीं बची थी जो पुरानी कांग्रेस की पहचान थी।
6.2 बहस के लिए छह प्रश्न★
| # | प्रश्न |
|---|---|
| 1 | क्या ‘अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट’ का आह्वान लोकतांत्रिक था, या पार्टी-अनुशासन का उल्लंघन? |
| 2 | 1967 का जनादेश ‘भूकंप’ था, या एक स्वस्थ लोकतंत्र का सामान्य संकेत? |
| 3 | दल-बदल विरोधी कानून विधायक की स्वतंत्र राय छीन लेता है — क्या यह सही है? |
| 4 | प्रिवी पर्स का मामला बताता है कि बड़ा बहुमत संविधान बदल सकता है। यह लोकतंत्र की ताक़त है या ख़तरा? |
| 5 | ★एक पार्टी जो चुनाव जीतती रहे पर संगठन के रूप में खोखली हो — क्या उसे ‘सफल’ कहा जा सकता है? |
| 6 | 1964 में विदेशी पर्यवेक्षकों की आशंका गलत साबित हुई। क्या उनका संदेह तथ्य-आधारित था या पूर्वाग्रह? |
6.3 परीक्षा में जोड़ने योग्य दस पंक्तियाँ★
एक उत्तर में एक ही जोड़िए।
- “1962 में कांग्रेस की 361 सीटें थीं, 1967 में 283 रह गईं — और 1971 में अकेले कांग्रेस (आर) को 352 मिलीं।”
- “1967 और 1971 में चुने गए लगभग 4,000 विधायकों में से करीब आधों ने आगे चलकर दल-बदल किया।”
- “दल-बदल रोकने वाला संशोधन 52वाँ संविधान संशोधन, 1985 था, जिसने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी।”
- “91वें संशोधन (2003) ने मंत्रिपरिषद् का आकार सदन के 15% तक सीमित किया और ‘विभाजन’ की छूट समाप्त की।”
- “14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण 19 जुलाई 1969 के अध्यादेश से हुआ; इनके पास देश की कुल बैंक-जमा का लगभग 85 प्रतिशत था।”
- “सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 1970 में उस अध्यादेश को अवैध ठहराया, पर राष्ट्रीयकरण अंततः कायम रहा।”
- “प्रिवी पर्स की समाप्ति 26वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 से हुई — 1971 की भारी जीत के बाद।”
- “1969 का राष्ट्रपति चुनाव भारत का एकमात्र ऐसा चुनाव है जो द्वितीय-वरीयता मतों की गिनती के बाद तय हुआ।”
- “1967 का आर्थिक संकट अध्याय 3 की योजना-विफलता और अध्याय 4 के युद्धों — दोनों का जोड़ था।”
- “1969 में कांग्रेस ने अपने भीतर की असहमति को बाहर कर दिया, और 1974 में वही असहमति सड़कों पर लौटी।”
अंतिम चेतावनीध्यान
बोर्ड-परीक्षा का उत्तर 【पाठ】 से लिखिए। इस दस्तावेज़ की सामग्री उत्तर को गहराई देने के लिए है, उसकी जगह लेने के लिए नहीं। ★सही तरीक़ा: पाठ्यपुस्तक का उत्तर पूरा लिखिए, फिर अंत में एक-दो पंक्तियाँ जोड़िए — जैसे “उल्लेखनीय है कि प्रिवी पर्स की समाप्ति 26वें संविधान संशोधन, 1971 से हुई” या “1967 में कांग्रेस की सीटें 361 से घटकर 283 रह गई थीं।”
स्रोत-संदर्भ
| क्षेत्र | स्रोत-प्रकार |
|---|---|
| NCERT पाठ 【पाठ】 | स्वतंत्र भारत में राजनीति, कक्षा 12, अध्याय 5, पृष्ठ 72–91 — 150 dpi पर दृश्य पठन |
| 1962/1967 की कांग्रेस सीटें (361 → 283) | ◇ चुनाव-अभिलेख आधारित संकलन |
| 1971: कांग्रेस (आर) 352 सीटें, 44% वोट | 【पाठ】+◇ |
| 1967–71 में लगभग आधे विधायकों का दल-बदल | ◇ |
| 52वाँ संविधान संशोधन, 1985 और दसवीं अनुसूची | ◆ भारत का संविधान |
| 91वाँ संविधान संशोधन, 2003 | ◆+◇ |
| 19 जुलाई 1969 का बैंक-राष्ट्रीयकरण; ₹50 करोड़ की कसौटी; ~85% जमा | ◇ |
| आर.सी. कूपर बनाम भारत संघ — 11-न्यायाधीश पीठ, 10–1, 10 फ़रवरी 1970 | ◆ न्यायालय का निर्णय |
| माधव राव सिंधिया बनाम भारत संघ — 15 दिसंबर 1970 | ◆ न्यायालय का निर्णय |
| 26वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 (28 दिसंबर 1971) | ◆ भारत का संविधान |
| 1969 का राष्ट्रपति चुनाव — द्वितीय-वरीयता मतों से निर्णय; सी.डी. देशमुख का बाहर होना; गिरि ~4.20 लाख, रेड्डी ~4.05 लाख मूल्य-मत | ◇ चुनाव-अभिलेख |
! सटीकता-नीति: कोई भी तथ्य स्मृति से नहीं लिखा गया। जहाँ स्रोतों में मामूली भिन्नता है (विशेषकर मत-मूल्यों में), वहाँ “लगभग” लिखा गया है।