Chapter 3स्थलरूप एवं जीवन

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NCERT — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, अध्याय 3, पृ. 41–58।

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फ़ाइल: fhes103.pdf (18 पृष्ठ) · संस्करण: पुनर्मुद्रण 2026-27 विषय (क) — भारत एवं विश्व : भूभाग एवं उनके निवासी · तीसरा अध्याय

0. यह अध्याय किस बारे में है

अध्याय 1 ने बताया कि किसी स्थान का पता कैसे बताया जाए। अध्याय 2 ने बताया कि पृथ्वी की सतह पर जल और स्थल कैसे बँटे हैं। यह अध्याय उसी स्थल के भीतर जाता है और पूछता है — वह भूमि दिखती कैसी है, और उसका आकार वहाँ रहने वाले मनुष्य का जीवन कैसे तय करता है।

अध्याय का ढाँचा तीन-तीन का है और हर बार एक ही क्रम में लौटता है:

स्थलरूप → उसका परिवेश (वनस्पति व प्राणी) → उस पर का जीवन (व्यवसाय, संस्कृति) → उसकी चुनौतियाँ और अवसर।

यही क्रम पर्वत पर चलता है, फिर पठार पर, फिर मैदान पर। अंत में पुस्तक स्वयं मानती है कि तीन पर्याप्त नहीं हैं और मरुस्थल को जोड़ देती है।

अध्याय का असली सबक तीन नामों की सूची नहीं है। वह दो वाक्यों में है —

  1. मानव हर स्थलरूप के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है — यही अनुकूलन और लचीलापन है।
  2. कोई भी स्थलरूप केवल चुनौती या केवल अवसर नहीं है; हर एक में दोनों साथ हैं। पर्वत में मनोरम दृश्य भी है और भूस्खलन भी; मैदान में उपजाऊ मिट्टी भी है और गिरता जलस्तर भी।

तीसरी धारा पूरे अध्याय में बहती रहती है — स्थलरूप भारतीय संस्कृति के भीतर हैं: अथर्ववेद का भूमि सूक्त, कालिदास का कुमारसंभव, कैलाश और एवरेस्ट की पवित्रता, नदी-संगम पर त्योहार, और तमिल संगम कविता की पाँच तिणै।

1. अध्याय का आरंभ (पृ. 41)

उद्धरण (पृ. 41)

“मनुष्यों के भार से मुक्त; अनेक प्रकार की ऊँचाइयों, ढलानों तथा विशाल समतल भूमि से युक्त; अनेक प्रकार की शक्तियों से संपन्न पेड़-पौधों को आधार प्रदान करती हुई, हम सभी के लिए विस्तार को प्राप्त हो तथा अपनी संपन्नता को प्रदर्शित करे। पृथ्वी मेरी माता है तथा मैं उसकी संतान।” — अथर्ववेद, ‘भूमि सूक्त’ (पृथ्वी के लिए स्तोत्र)

पढ़ाते समय ध्यान दें: उद्धरण स्वयं अध्याय की तीन श्रेणियाँ गिना देता है — ऊँचाइयाँ (पर्वत), ढलान, विशाल समतल भूमि (मैदान)। यह संयोग नहीं है, यही अध्याय का प्रवेश-द्वार है।

महत्वपूर्ण प्रश्न (पृ. 41) — अध्याय की रीढ़

  1. स्थलरूपों के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं और जीवन तथा संस्कृति के लिए इनका क्या महत्व है?
  2. प्रत्येक स्थलरूप के साथ संबंधित जीवन की क्या चुनौतियाँ एवं अवसर हैं?

इन दो प्रश्नों से बाहर की कोई बात इस अध्याय में नहीं है। हर उपशीर्षक इन्हीं में से किसी एक का उत्तर है।

2. परिचय — एक यात्रा जो तीनों स्थलरूप दिखा देती है (पृ. 42)

  • अन्य स्तनधारी जीवों के समान, मानव भी पृथ्वी पर निवास करता है। भूमि के अनेक रूप और विशेषताएँ हैं; एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में इसका स्वरूप बहुत परिवर्तित हो जाता है।
  • पुस्तक की अपनी काल्पनिक यात्रा — झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र से सड़क द्वारा → उत्तर प्रदेश के प्रयागराज → उत्तराखंड में अल्मोड़ा।
  • इस रास्ते में अलग-अलग दृश्यभूमि (लैंडस्केप) दिखाई देंगी। वास्तव में तीन प्रकार के स्थलरूप (लैंडफ़ॉर्म्स) दिखाई देंगे।

यही यात्रा अभ्यास-प्रश्न 2 में लौटती है (पृ. 58)। छोटा नागपुर = पठार, प्रयागराज = मैदान, अल्मोड़ा = पर्वत। पढ़ाते समय इसे बोर्ड पर एक तीर-शृंखला के रूप में रखिए — पूरा अध्याय इसी एक पंक्ति पर टँगा है।

हाशिये की परिभाषा (पृ. 42)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
तुंगता (एल्टीट्यूड)समुद्र तल से किसी वस्तु/लक्ष्य की ऊँचाई। उदाहरणार्थ — पर्वत की ऊँचाई, एक उड़ती हुई चिड़िया अथवा उड़ते हुए वायुयान की ऊँचाई, एक उपग्रह की ऊँचाई।

आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 42)

  • कक्षा की गतिविधि के रूप में चार अथवा पाँच विद्यार्थियों के समूह बनाइए और विद्यालय के आस-पास के क्षेत्रों का अवलोकन कीजिए। आपको किस प्रकार की दृश्यभूमि दिखाई देती है? क्या कुछ किलोमीटर की दूरी पर दृश्यभूमि में कोई परिवर्तन दिखाई देता है? क्या लगभग 50 किलोमीटर के भीतर परिदृश्य में बदलाव होगा? अन्य समूहों द्वारा दी गई जानकारी के साथ इनकी तुलना कीजिए।
  • इन्हीं समूहों के साथ भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र की यात्रा के बारे में चर्चा कीजिए, जहाँ वे जा चुके हैं। उन क्षेत्रों में दिखाई देने वाली विभिन्न प्रकार की दृश्यभूमियों की सूची बनाइए। अन्य समूहों द्वारा दी गई जानकारी के साथ इनकी तुलना कीजिए।

निष्कर्ष जो निकलवाना है: दृश्यभूमि दूरी के साथ बदलती है — और 50 किमी में बदल भी सकती है और नहीं भी। यही “स्वरूप एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में परिवर्तित होता है” का प्रत्यक्ष अनुभव है।

स्थलरूप की परिभाषा और तीन श्रेणियाँ (पृ. 42)★

  • स्थलरूप = पृथ्वी की सतह का एक भौतिक स्वरूप।
  • स्थलरूप लाखों वर्षों में आकार लेते हैं।
  • पर्यावरण तथा जीवन के साथ इनका महत्वपूर्ण संबंध है।
  • इन्हें व्यापक रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है — पर्वत, पठार और मैदान (चित्र 3.1)।
  • इन स्थलरूपों में विभिन्न प्रकार की जलवायु और अलग-अलग प्रकार के पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु पाए जाते हैं।
  • मानव ने सभी स्थलरूपों के अनुसार स्वयं को ढाला है, किंतु विभिन्न प्रकार के स्थलरूपों पर रहने वाले लोगों की संख्या विश्व-भर में भिन्न-भिन्न होती है।

3. पर्वत (पृ. 42–43)

परिभाषा और पहचान (पृ. 42)

  • पर्वत वे स्थलरूप हैं जो आस-पास की भूमि से कुछ अधिक ऊँचे होते हैं।
  • इन्हें तीन लक्षणों से पहचाना जा सकता है —
लक्षणपुस्तक के शब्द
आधारचौड़ा आधार
ढलानखड़ी ढलान (चढ़ाई)
शीर्षसँकरे शिखर (चोटियाँ)

हिम, तुंगता और नदियाँ (पृ. 42–43)

  • कुछ पर्वत अपनी अधिक ऊँचाई के कारण हिम से ढँके होते हैं।
  • ग्रीष्म ऋतु में कम तुंगता पर हिम पिघल जाती है और जल में बदलने के बाद नदियों में पहुँचती है।
  • बहुत अधिक ऊँचाइयों (तुंगता) पर हिम कभी नहीं पिघलती और ये पर्वत स्थायी रूप से हिम से ढँके होते हैं।

यह वाक्य अभ्यास-प्रश्न 4 में सही/गलत के रूप में लौटता है — “हिम के पिघलने से नदियों में जल आता है।”

पर्वत बनाम पहाड़ी (पृ. 43) — अध्याय का सबसे आम भ्रम★

  • पहाड़ी (छोटे पहाड़ या हिल) = कम ऊँचाई वाले अन्य ऊँचे स्थान, जहाँ कम खड़ी चढ़ाइयाँ और गोल आकार के शीर्ष होते हैं।
पर्वतपहाड़ी
ऊँचाईअधिककम
चढ़ाईखड़ीकम खड़ी
शीर्षसँकरे शिखरगोल आकार

अभ्यास-प्रश्न 4 का कथन “पर्वत और पहाड़ियाँ एक ही प्रकार के स्थलरूप हैं” सीधे इसी तालिका से गलत सिद्ध होता है।

हाशिये की परिभाषा (पृ. 43)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
वर्षणवायुमंडल से भूमि पर किसी भी रूप में जल का गिरना — वर्षा, हिमपात और ओले गिरना, वर्षण के सामान्य रूप हैं।

आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 43)

हिम क्या है? यदि आप हिमालयी क्षेत्र (जैसे — कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि) में नहीं रहते हैं, तो संभव है कि आपने हिम नहीं देखी होगी! शेष भारत में अधिकांश वर्षण, वर्षा और ओले के रूप में ही होता है। बहुत ऊँचे स्थानों पर यदि काफी ठंडक है, तो वहाँ हिम गिरेगी और वहाँ पर हिम का एक नरम और सुंदर आवरण बन जाएगा। हिम और ओले का गिरना वास्तव में जल का ठोस रूप में गिरना है।

4. विश्व के छह पर्वत और पर्वत शृंखलाएँ (पृ. 44–45)

पर्वत शृंखला (पृ. 45)★

  • विश्व के अधिकांश पर्वतों को पर्वत शृंखलाओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • उदाहरण — एशिया में हिमालय, यूरोप में आल्प्स तथा दक्षिणी अमेरिका में एंडीज।
  • इनमें से कुछ शृंखलाएँ हजारों किलोमीटर तक फैली हुई हैं।

छह पर्वत — यह तालिका पूरी परीक्षा-योग्य है (चित्र 3.2 व चित्र 3.3, पृ. 44–45)★

गिरिशृंगस्थितिशृंखला / विशेषता
एवरेस्टनेपाल तथा तिब्बत के बीचहिमालय शृंखला की सबसे ऊँची चोटियों में से एक
कंचनजुंगाभारत के सिक्किम राज्य और नेपाल के बीचहिमालय शृंखला की दो सबसे ऊँची चोटियों में दूसरी
अकोंकागुआदक्षिणी अमेरिकाएंडीज पर्वत शृंखला की सबसे ऊँची चोटी
किलिमंजारोपूर्वी अफ्रीकाएक पृथक पर्वत — किसी शृंखला से संबंधित नहीं
ब्लांकपश्चिमी यूरोपआल्प्स का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर
अनाईमुडीकेरल (दक्षिण भारत)दक्षिण भारत का सबसे ऊँचा गिरिशृंग; केरल में इसे ‘अनाई शिखर’ भी कहते हैं

पुस्तक का अपना वाक्य: एवरेस्ट गिरिशृंग और कंचनजुंगा हिमालय पर्वत शृंखला की दो सबसे ऊँची चोटियाँ (शिखर) हैं।

परीक्षा में सबसे अधिक पूछा जाने वाला अंतर: किलिमंजारो किसी शृंखला का भाग नहीं है — शेष पाँच में से चार अपनी-अपनी शृंखला के हैं। यही इस चित्र-पृष्ठ का एकमात्र वैचारिक बिंदु है।

चित्र 3.3 (पृ. 45) — विश्व के छह पर्वतों की सापेक्ष ऊँचाई दर्शाने वाला एक रेखाचित्र। बाईं ओर 1000 मी. से 9000 मी. तक का पैमाना दिया गया है और छहों को ऊपर से नीचे तक एक साथ प्रस्तुत करके ऊँचाई का दृश्य प्रभाव दिया गया है।

कक्षा में क्या करवाएँ: चित्र 3.3 केवल क्रम सिखाने के लिए है, संख्या नहीं। पुस्तक ने इन छह की ऊँचाइयाँ अंकों में नहीं दीं — केवल एवरेस्ट की 8848 मीटर (पृ. 51 के बॉक्स में)। इससे आगे की संख्याएँ छात्र-सामग्री में मत जोड़िए।

5. नवीन और प्राचीन पर्वत (पृ. 46)

  • हिमालय जैसे ऊँचे और नुकीली चोटियों वाले पर्वत अपेक्षाकृत नवीन हैं — अर्थात पृथ्वी के इतिहास में ये हाल ही में निर्मित (युवा) पर्वत हैं — किंतु फिर भी इन्हें बने हुए लाखों वर्ष हो चुके हैं!
  • कुछ छोटे और अधिक गोलाकार पर्वत और पहाड़ियाँ, जैसे — अरावली शृंखला, काफी पुरानी हैं और अपरदन के कारण ये गोल आकार की हो गई हैं।
  • उन्नयन और अपरदन आज भी चल रहा है (पुस्तक कहती है: इन प्रक्रियाओं और उनके कारणों के बारे में विज्ञान में और अधिक पढ़ेंगे) — विश्व के कुछ पर्वतों, जैसे हिमालय की ऊँचाई आज भी बढ़ रही है।

नवीन बनाम प्राचीन पर्वत★

नवीन (युवा) पर्वतप्राचीन पर्वत
उदाहरणहिमालयअरावली शृंखला
ऊँचाईऊँचेछोटे
चोटियाँनुकीलीगोलाकार
कारणहाल ही में निर्मितअपरदन से घिसकर गोल

यह तालिका अभ्यास-प्रश्न 4 के पहले कथन का सीधा उत्तर है — “हिमालय गोल शिखरों वाली नवीन पर्वत शृंखला है” → गलत, क्योंकि हिमालय नवीन तो है पर उसकी चोटियाँ नुकीली हैं, गोल नहीं।

6. पर्वतीय परिवेश (पृ. 46)

  • पर्वतों की ढलानों पर प्राय: एक प्रकार का वन होता है जिसे पर्वतीय वन कहते हैं।
  • यहाँ शंकुधारी वृक्ष सामान्य रूप से पाए जाते हैं — पाइन (चीड़), फर, स्प्रूस, देवदार आदि।
  • इन पेड़ों की ऊँचाई अधिक होती है, ये शंकु के आकार के होते हैं तथा इनकी पत्तियाँ पतली, नोंकदार होती हैं।
  • अधिक ऊँचाई पर पेड़ों की जगह घास, मॉस (काई) और लाइकेन उग जाते हैं।

ऊँचाई के साथ वनस्पति बदलती है — यही इस उपशीर्षक का पूरा विचार है: शंकुधारी वन → (और ऊपर) → घास, मॉस, लाइकेन।

हाशिये की परिभाषाएँ (पृ. 46)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
पर्वतीय वनपर्वतीय क्षेत्र में उगने वाले वनों का एक प्रकार।
मॉसफूलों और वास्तविक जड़ों से रहित छोटा हरा पौधा या वनस्पति, जो बहुधा मखमली आवरण की तरह फैलता है।
लाइकेनपौधे के समान जीव, जो सामान्यत: चट्टानों, दीवारों या पेड़ों से चिपके हुए होते हैं।

कालिदास का ‘कुमारसंभव’ (बॉक्स, पृ. 46)★

कम से कम 1500 वर्ष पूर्व, प्राचीन भारत के महान कवि कालिदास के काव्य से यहाँ दो श्लोक दिए गए हैं। उनका काव्यग्रंथ ‘कुमारसंभव’ हिमालय की स्तुति से आरंभ होता है (पुस्तक में उन संस्कृत श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद दिया गया है)।

भारत के उत्तरी भाग में देवता सदृश पूजनीय हिमालय नाम का पर्वतों का राजा है, जो पश्चिमी से लेकर पूर्वी समुद्र तक फैला हुआ है। देखकर ऐसा लगता है कि मानो वह पृथ्वी को नापने का मापदंड है।

गंगा के झरनों की फुहारों से युक्त, देवदार के वृक्षों को हिलाने और मोर पंखों को फरफराने वाली शीतल, मंद और सुगंधित वायु से पर्वतवासी जो मृगों की खोज में हिमालय में घूमते रहते हैं, अपनी थकान मिटाते हैं।

कक्षा में चर्चा के प्रश्न (बॉक्स में ही दिए गए):

  • ‘पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक’ से क्या तात्पर्य है? चित्र 5.2 में क्या आप इनकी और ‘पर्वतों के देवता’ की स्थिति को दिखा सकते हैं?
  • गंगा का उल्लेख क्यों किया गया है? (संकेत — इसके अनेक कारण हो सकते हैं।)

शिक्षक के लिए दो बातें:

  1. ‘पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक’ = अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक — अर्थात हिमालय भारत की पूरी उत्तरी सीमा पर आड़ा फैला है। यही “पृथ्वी को नापने का मापदंड” रूपक का आधार है।
  2. गंगा का उल्लेख — गंगा हिमालय से ही निकलती है (पृ. 48 का बॉक्स), और वह पवित्र भी है। दोनों उत्तर स्वीकार्य हैं; पुस्तक स्वयं कहती है कि कारण अनेक हो सकते हैं।

! सावधानी: यह बॉक्स चित्र 5.2 का उल्लेख करता है, जो इस अध्याय में नहीं, अध्याय 5 में है। यह पुस्तक का आगे की ओर संदर्भ है — छात्र इसे इसी अध्याय में ढूँढ़ते रह जाते हैं। विवरण 10-Verification-Log.md में।

7. पर्वतीय जीव-जंतु (पृ. 47–48)

पुस्तक का वाक्य (पृ. 48): पर्वतों में घने वन, बहती नदियाँ, झीलें, घास के मैदान और कंदराएँ अनेक प्रकार के जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं।

नामों की सूची (पृ. 48 का पाठ + चित्र 3.4, पृ. 47)★

पुस्तक के पाठ में (पृ. 48)कोष्ठक में दिया हिंदी नाम
गोल्डन ईगलसुनहरा गरुड़
पेरेग्रिन फाल्कनघुमंतू बाज
कैनेडियन लिंक्स—
हिम तेंदुआ—
आइबेक्सजंगली भेड
हिमालयन तहर—
पर्वतीय खरगोश—
याक—
ग्रे फॉक्स—
भालू—

चित्र 3.4 (पृ. 47) — कुछ पहाड़ी जीव-जंतु। चित्रों के लेबल: पेरेग्रिन फाल्कन, हिमालयी तहर, पहाड़ी खरगोश, गोल्डन ईगल, कैनेडियन लिंक्स, याक, आइबेक्स, ग्रे फॉक्स, तेंदुआ, भालू।

ध्यान दें: पाठ में हिम तेंदुआ और पर्वतीय खरगोश लिखा है, जबकि चित्र-लेबल में तेंदुआ और पहाड़ी खरगोश; पाठ में हिमालयन तहर, चित्र में हिमालयी तहर। दोनों रूप पुस्तक के ही हैं — किसी एक को गलत मत कहिए।

ध्यान रखें (बॉक्स, पृ. 48) — गंगा और उसकी सहायक नदियाँ★

  • हिमालय से निकलने वाली भारतीय नदियों में से गंगा विशालतम है।
  • यह नदी लगभग 2500 कि.मी. लंबी है।
  • इसकी बहुत सी सहायक नदियाँ हैं — (उसमें आकर मिलने वाली अन्य नदियाँ)।
  • उनमें से कुछ, जैसे — यमुना और घाघरा भी हिमालय से निकलती हैं।
  • अन्य नदियाँ जैसे — सोन, गंगा के मैदान के दक्षिण में पड़ने वाले विंध्यांचल की शृंखलाओं से निकलती हैं।

यह बॉक्स दो अभ्यास-प्रश्नों में लौटता है: सही/गलत का “गंगा, यमुना की सहायक नदी है” (गलत — उलटा है) और जोड़े बनाने का “यमुना — सहायक नदी”।

चित्र 3.5 (पृ. 48) — उत्तरी भारत में सीढ़ीदार (वेदिका) कृषि।

8. पर्वतीय जीवन (पृ. 49)

कृषि और पशुपालन

  • पर्वतीय भूभाग सामान्य रूप से खड़े ढलानों के साथ ऊबड़-खाबड़ या ऊँचे-नीचे होते हैं।
  • इसलिए कुछ ही घाटियों में नियमित रूप से कृषि की जा सकती है।
  • ढलानों पर वेदिका कृषि — अर्थात ढलान की भूमि को काटकर सीढ़ीनुमा स्थान पर कृषि करना — एक प्रचलित प्रथा है।
  • विश्व-भर के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि की जगह पशुपालन को अधिक महत्व दिया जाता है।

पर्यटन

  • पर्यटन, पर्वतीय लोगों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन है।
  • स्वच्छ हवा और मनोरम प्राकृतिक दृश्य सभी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
  • साहसिक खेल — स्कीइंग, हाइकिंग, पर्वतारोहण और पैरा ग्लाइडिंग।
  • अनेक शताब्दियों से लोग पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा पर जाने के लिए पर्वतों की यात्राएँ करते रहे हैं।
  • परंतु बहुत सारे पर्यटकों के एक साथ आने से पर्वतों के पर्यावरण पर दबाव पड़ता है। प्राय: इनमें सही संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है।

यह “अवसर और चुनौती एक साथ” का सबसे साफ़ उदाहरण है — वही पर्यटन जो आय देता है, वही पर्यावरण पर दबाव भी डालता है। महत्वपूर्ण प्रश्न 2 का सीधा उत्तर।

हाशिये की परिभाषाएँ (पृ. 49)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
भूभागभौतिक आकृतियों की दृष्टि से भूमि का एक खंड।
घाटीपहाड़ों के बीच का एक निचला क्षेत्र, जिसमें प्राय: नदी अथवा जलधारा बहती है।

ध्यान रखें (बॉक्स, पृ. 49) — दो पर्वतारोही★

बछेंद्री पाल

  • बहुत कम आयु में ही पर्वतारोहण प्रारंभ कर दिया था।
  • अनेक महिलाओं द्वारा किए जाने वाले पर्वतारोहण अभियानों का नेतृत्व किया।
  • 1984 में एवरेस्ट गिरिशृंग पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला थीं।
  • सम्मान — पद्मश्री (1984) एवं पद्मभूषण (2019)।

अरुणिमा सिन्हा

  • जब 22 वर्ष की थीं, तब एक दुर्घटना में अपना एक पैर गवाँ दिया था।
  • बछेंद्री पाल के प्रोत्साहन एवं प्रशिक्षण से 2013 में एवरेस्ट गिरिशृंग पर चढ़ाई की।
  • इसके बाद अंटार्कटिका के विंसन गिरिशृंग सहित सभी महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटियों पर भी चढ़ाई की।
  • सम्मान — 2015 में पद्मश्री।

तिथियाँ अलग-अलग रखिए: 1984 = बछेंद्री पाल का एवरेस्ट और पद्मश्री। 2019 = पद्मभूषण। 2013 = अरुणिमा का एवरेस्ट। 2015 = अरुणिमा का पद्मश्री। यह चार-संख्या का समूह परीक्षा में आपस में बदलकर पूछा जाता है।

आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 49)

चित्रों के माध्यम से (चित्र 3.6, पृष्ठ 50) पर्वतों पर रहने वाले लोगों के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाया गया है। कक्षा में समूह बनाकर चर्चा कीजिए और प्रत्येक पर एक अनुच्छेद लिखिए। यह भी विचार कीजिए कि जब पर्वतों पर इतनी सारी चुनौतियाँ हैं, फिर भी लोग वहाँ क्यों रहते हैं?

यह अंतिम प्रश्न अध्याय का वैचारिक शिखर है — उत्तर लचीलापन और अनुकूलन है, जिसे पुस्तक पृ. 56 पर नाम देकर बंद करती है।

9. पर्वतीय जीवन की चुनौतियाँ (चित्र 3.6, पृ. 50)

चित्र 3.6 का पूरा शीर्षक (पुस्तक के शब्द): “पर्वतीय जीवन के कई सकारात्मक पक्ष हैं, जैसे — शुद्ध वायु, मनोरम दृश्य आदि। इसमें प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों तरह की कठिन चुनौतियाँ भी सम्मिलित हैं, जिनमें से कुछ को चित्रों में दर्शाया गया है।”

सात चुनौतियाँ (चित्र-लेबल) — प्राकृतिक बनाम मानव-निर्मित★

चुनौतीप्रकार
आकस्मिक बाढ़प्राकृतिक
भूस्खलनप्राकृतिक
हिमस्खलन (एवलांश)प्राकृतिक
भारी हिमपातप्राकृतिक
बादल फटनाप्राकृतिक
ठंडा मौसमप्राकृतिक
पर्यटकों का अनियंत्रित रूप से आ जानामानव-निर्मित

परीक्षा-बिंदु: सात में से केवल एक मानव-निर्मित है। “प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों” वाक्य पुस्तक का अपना है, इसलिए यह वर्गीकरण पूछा जा सकता है।

हाशिये की चार परिभाषाएँ (पृ. 50) — चारों परीक्षा-योग्य★

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
आकस्मिक बाढ़स्थान विशेष में अकस्मात बाढ़ आना, बहुधा ऐसा बादल फटने से होता है।
भूस्खलनपर्वतीय भूखंड के एक बड़े भाग या एक चट्टान का अकस्मात टूटकर गिरना।
हिमस्खलन (एवलांश)पर्वत से अकस्मात हिम का गिरना, हिमपात अथवा चट्टानें टूटकर गिरना; ऐसा प्राय: तब होता है जब हिम का पिघलना आरंभ होता है।
बादल फटनाअचानक प्रचंड तूफ़ान सहित वर्षा होना।

कारण-श्रृंखला जो पुस्तक स्वयं बनाती है: बादल फटना → आकस्मिक बाढ़। और हिम का पिघलना आरंभ होना → हिमस्खलन। दीर्घ उत्तर में यही जोड़ी अंक दिलाती है।

भ्रम की जड़: भूस्खलन में चट्टान/भूमि गिरती है, हिमस्खलन में हिम गिरती है। दोनों के हिंदी नाम एक जैसे लगते हैं — यही सबसे आम गलती है।

10. पर्वत और पवित्रता ( ध्यान रखें बॉक्स, पृ. 51)★

  • विश्व-भर के अनेक पारंपरिक समुदाय पर्वतों को पवित्र स्थल मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं।
  • एवरेस्ट गिरिशृंग विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर है, जिसकी ऊँचाई 8848 मीटर है और इसके अनेक नाम हैं।
नामकिसका दियाअर्थ
चोमोलुंगमातिब्बती लोग‘जगत जननी’ — और पर्वत की उसी रूप में पूजा करते हैं
सागरमाथानेपाल निवासी‘आकाश की देवी’
  • इसी प्रकार तिब्बत में कैलाश पर्वत है जिसे हिंदू दर्शन, बौद्ध मत, जैन मत और बॉन (तिब्बत का एक प्राचीन धर्म) के अनुयायी पवित्र मानते हैं।
  • पर्वत शिखरों के लिए इतनी श्रद्धा-भावना भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य भागों में भी देखी जाती है।

कैलाश = चार परंपराएँ। यह “चार” संख्या याद रखने योग्य है और सीधे पूछी जाती है।

11. पठार (पृ. 51–52)

परिभाषा (पृ. 51)★

  • पठार एक ऐसी स्थलाकृति है जो आस-पास की भूमि से उठी होती है और प्राय: इसकी सतह चपटी होती है।
  • इसके कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले होते हैं।
  • पर्वतों के समान, कुछ पठार पृथ्वी के इतिहास के संदर्भ में नवीन और प्राचीन हो सकते हैं।
  • ऊँचाई: कुछ सौ मीटर से लेकर कई हजार मीटर तक।

दो उदाहरण जो पुस्तक स्वयं देती है (पृ. 51)

पठारपुस्तक का वाक्य
तिब्बत का पठारविश्व का सबसे बड़ा और ऊँचा पठार
दक्षिणी पठार— (दूसरा उदाहरण, बिना विशेषण के)

ध्यान रखें (बॉक्स, पृ. 51) — दो पठार, दो तथ्य★

तिब्बत का पठार

  • औसत ऊँचाई 4500 मीटर, जिसके कारण इसे ‘विश्व की छत’ का नाम दिया गया है।
  • पूर्व से पश्चिम दिशा तक यह लगभग 2500 किलोमीटर लंबा है — अर्थात चंडीगढ़ से कन्याकुमारी तक की दूरी जितना।

दक्कन का पठार

  • मध्य और दक्षिण भारत में है।
  • विश्व के सबसे पुराने पठारों में से एक है।
  • कई लाख वर्ष पहले ज्वालामुखी की सक्रियता के कारण बना था।

! दो ‘2500’ एक ही अध्याय में हैं और छात्र इन्हें मिला देते हैं: गंगा = लगभग 2500 कि.मी. लंबी (पृ. 48) और तिब्बत का पठार = लगभग 2500 किलोमीटर लंबा (पृ. 51)। इन्हें कभी एक साथ मत पढ़ाइए।

पठार और खनिज (पृ. 51)

  • पर्वतों की तरह, पठारों में खनिजों का प्रचुर मात्रा में जमाव देखने को मिलता है।
  • इस कारण इन्हें ‘खनिजों का भंडार-गृह’ भी कहा जाता है।
  • परिणामस्वरूप पठारों में खनन मुख्य गतिविधि है, जहाँ विश्व की सबसे बड़ी खानें पाई जाती हैं।
पठारखनिज
पूर्वी अफ्रीका का पठारसोने और हीरे के खनन के लिए प्रसिद्ध
छोटा नागपुर का पठार (भारत)लौह, कोयला और मैंगनीज के प्रचुर भंडार

पठार और कृषि (पृ. 52)

  • विश्व-भर में पठारों का पर्यावरण बहुत विविधतापूर्ण है।
  • कई पठारों में चट्टानी मिट्टी पाई जाती है जो उन्हें मैदानी मिट्टी की तुलना में कम उपजाऊ बनाती है। इसलिए पठार कृषि के लिए कम अनुकूल होते हैं।
  • लेकिन ज्वालामुखी क्रियाओं से निर्मित लावा पठार उपजाऊ होते हैं, क्योंकि उनमें समृद्ध काली मिट्टी पाई जाती है।

यह “लेकिन” परीक्षा का प्रिय वाक्य है — सामान्य नियम (पठार कम उपजाऊ) और उसका अपवाद (लावा पठार उपजाऊ, काली मिट्टी) एक ही वाक्य में हैं।

पठार और जल प्रपात (पृ. 52)★

जल प्रपातनदीस्थान
विक्टोरिया जल प्रपातजम्बेजी नदीदक्षिण अफ्रीका (पुस्तक के शब्द)
हुंडरू जल प्रपातसुवर्ण रेखा नदीछोटा नागपुर पठार
जोग जल प्रपातशरावती नदीपश्चिमी घाट
नहकालीकाई जल प्रपात—चेरापूंजी (मेघालय) का पठार — 340 मीटर की ऊँचाई से गिरता है

चित्र 3.7 (पृ. 52) — चेरापूंजी पठार से गिरता नहकालीकाई जल प्रपात।

340 मीटर इस अध्याय की एकमात्र जल-प्रपात संख्या है, और इसीलिए निश्चित रूप से पूछी जाती है।

12. मैदान (पृ. 53)

परिभाषा (पृ. 53)★

  • मैदान ऐसी स्थलाकृति होती है जिसका विस्तृत सपाट अथवा हल्का तरंगित धरातल होता है।
  • उसमें कोई ऊँची पहाड़ियाँ अथवा गहरी घाटियाँ नहीं पाई जातीं।
  • सामान्यत: मैदान की ऊँचाई समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक नहीं होती।

मैदान कैसे बनते हैं — कारण-श्रृंखला (पृ. 53)★

पुस्तक यह पूरी श्रृंखला एक अनुच्छेद में देती है। दीर्घ उत्तर में इसे इसी क्रम में लिखवाइए —

पर्वत शृंखलाओं से नदियाँ निकलती हैं → नदियों की बाढ़ से समतल भूमि बनती है → नदियाँ रेत, चट्टानों के कणों और गाद को एकत्र करती हैं (इन्हें तलछट कहा जाता है) → नदियाँ इन तलछटों को बहाकर समतल भूमि में लाकर जमा कर देती हैं → मिट्टी उपजाऊ बनती है → मैदान सभी प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त हो जाते हैं → लोगों का मुख्य आर्थिक व्यवसाय कृषि हो जाता है।

  • तलछट = नदियों द्वारा एकत्र किए गए रेत, चट्टानों के कण और गाद।
  • मैदान विविध प्रकार की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का भी भरण-पोषण करते हैं।

हाशिये की परिभाषा (पृ. 53)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
समुद्र तलसमुद्र की सतह का औसत स्तर; इसे ‘माध्य समुद्र तल’ भी कहते हैं।

चित्र 3.8 (पृ. 53) — विश्व-मानचित्र★

“यह विश्व-मानचित्र कुछ प्रमुख पर्वत शृंखलाओं, पठारों और मैदानों को दर्शाता है।” मानचित्र पर स्पष्ट लिखा है — “मानचित्र पैमाने पर आधारित नहीं है।”

रंग-संकेत (लीजेंड):

रंगक्या दर्शाता है
भूरापठार
हरानदियों के मैदान
नारंगीपर्वत शृंखला

मानचित्र पर अंकित नाम:

श्रेणीनाम
पर्वत शृंखलाअलास्का, रॉकीज़, एंडीज़, एटलस, यूराल, हिमालय
पठारमंगोलियन, तिब्बत, पूर्वी अफ्रीकी, पैटागोनियन
नदियों के मैदानमिसिसीपी, अमेजन, नील, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र, यांगत्सी

आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 53)

चित्र 3.8 में दर्शाए गए स्थलरूपों में रंगों के कोड का प्रयोग कीजिए। उदाहरणार्थ — तिब्बत का पठार, रॉकी शृंखला, नील नदी का मैदान (आपको मानचित्र में दिए नाम स्मरण करने की आवश्यकता नहीं है)।

पुस्तक स्वयं कहती है कि मानचित्र के नाम याद करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इस सूची से “अमुक कहाँ है” प्रकार के प्रश्न मत बनाइए — केवल रंग का कोड पहचानना पूछिए।

13. मैदानी जीवन (पृ. 54–55)

चित्र 3.9 (पृ. 54) — गंगा के मैदान का उपग्रह से लिया गया चित्र।

आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 54)

कक्षा की गतिविधि के रूप में बहुत ऊँचाई से लिए गए उत्तर भारत के क्षेत्र के उपग्रह चित्र (चित्र 3.9) का अवलोकन कीजिए और उस पर चर्चा कीजिए —

  • गंगा के मैदान का रंग कौन-सा है?
  • सफेद रंग किस वस्तु को दर्शा रहा है?
  • उपग्रह चित्र के नीचे बाईं ओर भूरे रंग का फैलाव क्या दर्शा रहा है?

अपेक्षित उत्तर: मैदान हरा (उपजाऊ, कृषि से ढका), सफेद = बादल तथा हिमालय पर की हिम, भूरा फैलाव = शुष्क/कम वनस्पति वाला भूभाग। पुस्तक उत्तर नहीं छापती — यह अवलोकन का अभ्यास है, स्मरण का नहीं।

सभ्यताएँ और जनसंख्या (पृ. 54–55)

  • हजारों वर्ष पहले, आरंभिक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के आस-पास विकसित हुई थीं।
  • हमारे समय में भी विश्व की अधिकांश जनसंख्या मैदानों में रहती है।
  • भारत की कुल जनसंख्या की एक-चौथाई से अधिक, अर्थात लगभग 40 करोड़ की जनसंख्या भारत के गंगा के मैदान में रहती है।

व्यवसाय और फसलें (पृ. 55)

  • विश्व के बहुत से अन्य मैदानों के समान इन क्षेत्रों में रहने वालों का मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन और कृषि है।
फसल-वर्गपुस्तक में दिए नाम
खाद्य फसलेंचावल, गेहूँ, मक्का, जौ और मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी)
रेशेदार फसलेंकपास, जूट और सन

सिंचाई — अवसर के साथ आई चुनौती (पृ. 55)★

  • परंपरागत कृषि मुख्यत: वर्षा पर निर्भर होती है (अर्थात, वर्षा जल से फसलों को जल मिलता है)।
  • किंतु हाल के दशकों में नहरों के जाल (नेटवर्क) द्वारा और भूमिगत जल को पंप से निकालकर खेतों की सिंचाई करने में वृद्धि हुई है।
  • यद्यपि सिंचाई से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है, किंतु इससे भूमिगत जलस्तर में गिरावट आई है।
  • इससे इस क्षेत्र में कृषि के भविष्य को लेकर चुनौतीपूर्ण स्थिति भी उत्पन्न हो गई है।
  • गंगा के मैदानी भागों को प्रभावित करने वाली कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं, जैसे — बढ़ती हुई जनसंख्या और प्रदूषण।

यह अध्याय का दूसरा “अवसर बनाम चुनौती” जोड़ा है (पहला पर्वतीय पर्यटन था)। दोनों में ढाँचा एक ही है: एक ही चीज़ लाभ भी देती है और समस्या भी बनाती है। महत्वपूर्ण प्रश्न 2 का उत्तर इन्हीं दो जोड़ों से बनता है।

नदियाँ और संस्कृति (पृ. 55)

  • चाहे पर्वत हों या मैदान, विश्व में बहने वाली नदियाँ बहुत से सांस्कृतिक मूल्यों का वहन करती हैं।
  • बहुत से समुदाय नदी के स्रोत और दो नदियों के संगम स्थल को पवित्र स्थल मानते हैं।
  • भारत में इन स्थानों पर बहुत से त्योहार, समारोह और धार्मिक कृत्य किए जाते हैं।

नौका-संचालन (पृ. 55)

  • मैदान में हल्की ढलान होती है, अत: वहाँ नदी में नौका-संचालन सुगम होता है और इससे बहुत-सी आर्थिक गतिविधियों को भी सहायता मिलती है।
  • पहले लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए नदी मार्ग का ही व्यापक रूप से प्रयोग करते थे।
  • आज भी गंगा के किनारे ऐसे स्थान हैं जहाँ लोग आने-जाने के लिए नौकाओं का ही प्रयोग करते हैं (चित्र 3.10, पृ. 56)।

हाशिये की परिभाषा (पृ. 55)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
संगम स्थलदो या दो से अधिक नदियों के मिलने का स्थान।

आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 55)

  • क्या आप अपने प्रदेश की नदी के स्रोतों अथवा संगम के कुछ उदाहरण दे सकते हैं जिन्हें किसी समुदाय द्वारा पवित्र स्थल माना जाता है?
  • अपने पास की नदी पर जाइए और वहाँ होने वाली सभी आर्थिक या सांस्कृतिक गतिविधियों का अवलोकन कीजिए। उन्हें लिखकर अपने सहपाठियों के साथ उन पर चर्चा कीजिए।
  • भारत के कुछ लोकप्रिय पर्यटन स्थलों के नाम बताइए। साथ ही पहचानिए कि वे पर्यटन स्थल किस प्रकार के स्थलरूप से संबंधित हैं।

चित्र 3.10 (पृ. 56) — गंगा नदी में नौका-परिवहन।

14. चौथा स्थलरूप — मरुस्थल (पृ. 56)

पुस्तक स्वयं अपनी तीन-श्रेणी की सीमा मानती है:

“इस अध्याय में हमने पूरी पृथ्वी के तीन प्रमुख स्थलरूपों के बारे में समझा। परंतु, इसका स्वरूप जटिल है और विशेषज्ञ प्राय: कुछ और स्थलरूपों के बारे में भी बताते हैं। इनमें से एक स्थलरूप मरुस्थल है।”

  • यदा-कदा वर्षा प्राप्त करने वाले मरुस्थल व्यापक व दूर-दूर तक शुष्कता का फैलाव लिए होते हैं।
  • उनके वनस्पति जगत और प्राणि जगत विलक्षण ही होते हैं।

गर्म और ठंडे मरुस्थल★

प्रकारउदाहरण (पुस्तक के)
गर्म मरुस्थलअफ्रीका का सहारा मरुस्थल; भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में स्थित थार मरुस्थल
ठंडे मरुस्थलएशिया का गोबी मरुस्थल
विशेषज्ञों का मतकुछ विशेषज्ञ अंटार्कटिक महाद्वीप को भी मरुस्थल मानते हैं।

अभ्यास-प्रश्न 4 का अंतिम कथन — “सभी मरुस्थल गर्म होते हैं” → गलत, क्योंकि गोबी ठंडा है। यह प्रश्न सीधे इसी तालिका से निकलता है।

मरुस्थल का जीवन और लचीलापन (पृ. 56)

  • जीवन जीने की कठिन परिस्थितियों के उपरांत भी लोगों ने अधिकांश मरुस्थलों के पर्यावरण के अनुसार अपने आप को ढाल लिया है।
  • भारत के थार मरुस्थल में रहने वाले समुदाय अथवा समय-समय पर वहाँ से जाने वाले लोग मरुस्थल में गाए और सुनाए जाने वाले लोक गीतों और किंवदंतियों या दंत कथाओं जैसी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को सँजोकर रखते हैं।

अध्याय का समापन-वाक्य (पृ. 56)★

“मानव ने जिस प्रकार सभी स्थलाकृतियों में विभिन्न प्रकार से अपने घर बनाए हैं, वह हमारे अनुकूलन अर्थात स्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने और लचीलेपन का साक्षी है।”

हाशिये की परिभाषा (पृ. 56)

पदपरिभाषा (पुस्तक के अपने शब्द)
लचीलापन (रेजिलियंस)चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करने अथवा उनके अनुसार ढलने की क्षमता।

15. तमिल संगम की पाँच तिणै (बॉक्स, पृ. 57)★

पुस्तक का परिचय-वाक्य: “प्राचीन तमिल संगम कविता की पाँच तिणै पाँच दृश्यभूमि हैं, जो कुछ विशिष्ट देवताओं, जीवन-शैलियों, मनोदशाओं अथवा भावनाओं (जैसे — प्रेम, अनुराग, अलगाव, झगड़ा आदि) से जुड़ी हैं। यह तालिका केवल पाँच दृश्यभूमियों की विशेषताओं और प्रत्येक में मुख्य मानव व्यवसायों को सूचीबद्ध करती है।”

तिणैदृश्यभूमिमुख्य व्यवसाय
कुरिंजीपर्वतीय क्षेत्रआखेट और संग्रह करना
मुल्लाईघास के मैदान और वनपशु पालन
मरूदमउपजाऊ कृषि के मैदानकृषि
नेयदलतटीय क्षेत्रमत्स्य पालन और समुद्री यात्रा
पालैशुष्क, मरुस्थल जैसे प्रदेशघुमंतू और युद्धरत

पुस्तक का अपना निष्कर्ष:

  • अभी तक जिन स्थलरूपों को देखा है, उनकी अपेक्षा ये पाँच तिणै भिन्न प्रकार का वर्गीकरण है।
  • परंतु ये विविधता वाले प्रदेशों और उनकी विशेषताओं के प्रति गहन जागरूकता को दिखाते हैं।
  • ये हमारे और पर्यावरण के बीच गहन संबंध को भी दर्शाते हैं।

! पुस्तक का स्पष्ट निर्देश: “आपको तिणै के विवरण को याद रखने की आवश्यकता नहीं है, परंतु उससे प्रतिबिंबित अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता है।” इसलिए तालिका रटवाने का प्रश्न मत बनाइए। जो पूछा जा सकता है वह यह है — तिणै किस बात को दर्शाते हैं? उत्तर: दृश्यभूमि और मानव व्यवसाय के बीच के गहरे संबंध को। यही अध्याय का केंद्रीय विचार है, तमिल में कहा हुआ।

16. आगे बढ़ने से पहले… — पुस्तक का अपना सार (पृ. 57)

  1. स्थलरूप तीन प्रकार के होते हैं — पर्वत, पठार और मैदान। उनकी भौतिक विशेषताएँ और पर्यावरण बहुत अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
  2. ऐतिहासिक समय से लोगों द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप उस स्थलरूप से संबधित होते हैं जिसमें वे निवास करते हैं। ये स्थलरूप विश्व की संस्कृति के अभिन्न भाग हैं; विशेष रूप से भारतीय संस्कृति विविध प्रकार से उन्हें मनाती रही है।
  3. प्रत्येक स्थलरूप, विभिन्न प्रकार की चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों को भी प्रस्तुत करता है।

ये तीन वाक्य ही अध्याय की आधिकारिक “टेकअवे” हैं। तीनों को शब्दश: याद करवाइए — दीर्घ उत्तर का आरंभ और अंत इन्हीं से करना चाहिए।

अभ्यास — प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ (पृ. 58)

1. आपका कस्बा या गाँव या नगर किस प्रकार के स्थलरूप पर स्थित है? इस अध्याय में बताई गई विशेषताओं में से कौन-सी विशेषताएँ आप अपने आस-पास देखते हैं?

2. आइए, छोटा नागपुर से प्रयागराज और अल्मोड़ा की हमारी आरंभिक यात्रा पर चलें। इस मार्ग में आने वाले तीन स्थलरूपों के बारे में बताइए।

3. भारत के कुछ प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों की सूची बनाइए। यह भी लिखिए कि वे कौन-से स्थलरूप के अंतर्गत आते हैं।

4. सही या गलत बताइए —

  • हिमालय गोल शिखरों वाली नवीन पर्वत शृंखला है।
  • पठार प्राय: एक ओर से उठे हुए होते हैं।
  • पर्वत और पहाड़ियाँ एक ही प्रकार के स्थलरूप हैं।
  • भारत में पर्वत, पठार और नदियों में एक ही प्रकार के वनस्पति और प्राणी जगत पाए जाते हैं।
  • गंगा, यमुना की सहायक नदी है।
  • मरुस्थल का वनस्पति जगत और प्राणी जगत विलक्षण होता है।
  • हिम के पिघलने से नदियों में जल आता है।
  • मैदानों में नदियों द्वारा एकत्र किए गए तलछट भूमि को उपजाऊ बनाते हैं।
  • सभी मरुस्थल गर्म होते हैं।

5. शब्दों के जोड़े बनाइए —

स्तंभ 1 (जैसा छपा है)स्तंभ 2 (जैसा छपा है)
एवरेस्ट गिरिशृंगअफ्रीका
राफ्टिंगविश्व की छत
ऊँटधान के खेत
पठारमरुस्थल
गंगा का मैदाननदी
जलमार्गगंगा
किलिमंजारो गिरिशृंगसहायक नदी
यमुनापर्वतारोहण

उत्तर-कुंजी — पुस्तक मेंनहीं छपी हैध्यान

इस अध्याय की किसी भी अभ्यास-प्रश्न की उत्तर-कुंजी पाठ्यपुस्तक में नहीं दी गई है। नीचे दिए उत्तर पुस्तक के पाठ से निकाले गए हैं (हर उत्तर के आगे उसका पृष्ठ दिया है), NCERT द्वारा छापे हुए नहीं। छात्र-सामग्री में इन्हें “पुस्तक की उत्तर-कुंजी” कहकर मत दीजिए।

प्रश्न 4 — सही/गलत

#कथनउत्तरआधार
1हिमालय गोल शिखरों वाली नवीन पर्वत शृंखला है।गलतहिमालय नवीन तो है, पर उसकी चोटियाँ नुकीली हैं; गोल चोटियाँ अरावली जैसे प्राचीन पर्वतों की हैं (पृ. 46)।
2पठार प्राय: एक ओर से उठे हुए होते हैं।गलतपठार आस-पास की भूमि से उठा होता है, किसी एक ओर से नहीं; कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले होते हैं (पृ. 51)।
3पर्वत और पहाड़ियाँ एक ही प्रकार के स्थलरूप हैं।गलतपहाड़ी कम ऊँची, कम खड़ी चढ़ाई वाली और गोल शीर्ष वाली होती है (पृ. 43)।
4भारत में पर्वत, पठार और नदियों में एक ही प्रकार के वनस्पति और प्राणी जगत पाए जाते हैं।गलतप्रत्येक स्थलरूप में विभिन्न प्रकार की जलवायु और अलग-अलग पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु होते हैं (पृ. 42)।
5गंगा, यमुना की सहायक नदी है।गलतउलटा है — यमुना गंगा की सहायक नदी है (पृ. 48)।
6मरुस्थल का वनस्पति जगत और प्राणी जगत विलक्षण होता है।सहीपुस्तक का अपना वाक्य (पृ. 56)।
7हिम के पिघलने से नदियों में जल आता है।सहीग्रीष्म में कम तुंगता पर हिम पिघलकर नदियों में पहुँचती है (पृ. 42–43)।
8मैदानों में नदियों द्वारा एकत्र किए गए तलछट भूमि को उपजाऊ बनाते हैं।सहीतलछट जमा होकर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं (पृ. 53)।
9सभी मरुस्थल गर्म होते हैं।गलतगोबी मरुस्थल ठंडा है (पृ. 56)।

प्रश्न 5 — शब्दों के जोड़े

स्तंभ 1⟶स्तंभ 2आधार
एवरेस्ट गिरिशृंग⟶पर्वतारोहणबछेंद्री पाल व अरुणिमा सिन्हा का एवरेस्ट आरोहण (पृ. 49)
राफ्टिंग⟶नदीराफ्टिंग नदी में होती है
ऊँट⟶मरुस्थलथार मरुस्थल (पृ. 56)
पठार⟶विश्व की छततिब्बत का पठार = ‘विश्व की छत’ (पृ. 51)
गंगा का मैदान⟶धान के खेतगंगा के मैदान में चावल उगाया जाता है (पृ. 55)
जलमार्ग⟶गंगागंगा में नौका-परिवहन (पृ. 55–56)
किलिमंजारो गिरिशृंग⟶अफ्रीकापूर्वी अफ्रीका का पृथक पर्वत (पृ. 45)
यमुना⟶सहायक नदीयमुना गंगा की सहायक नदी (पृ. 48)

प्रश्न 2 का ढाँचा (सबसे अधिक पूछा जाने वाला)

पड़ावस्थलरूपपहचान
छोटा नागपुर (झारखंड)पठारखनिज-भंडार — लौह, कोयला, मैंगनीज; हुंडरू जल प्रपात
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)मैदानगंगा का मैदान; कृषि; संगम स्थल
अल्मोड़ा (उत्तराखंड)पर्वतहिमालय; वेदिका कृषि; पर्यटन

प्रश्न 1 और 3 खुले प्रश्न हैं — उत्तर छात्र के अपने स्थान पर निर्भर है। प्रश्न 3 के लिए ध्यान रहे कि अध्याय ने तीर्थयात्रा को पर्वतों से जोड़ा है (पृ. 49) और नदी-संगम को मैदानों से (पृ. 55); दोनों उदाहरण पुस्तक के भीतर से मिल जाते हैं।

चित्र और तालिकाएँ

संदर्भपृष्ठविषय-वस्तु
चित्र 3.143आरेख — तीन स्थलरूप एक साथ: पृष्ठभूमि में पर्वत (इनमें से दो हिमाच्छादित), बाईं ओर एक पठार, और आगे एक मैदान जहाँ पर्वतों से आती हुई नदी दिखाई गई है
चित्र 3.244विश्व के छह पर्वतों के चित्र — एवरेस्ट, अकोंकागुआ, किलिमंजारो, ब्लांक, कंचनजुंगा, अनाईमुडी गिरिशृंग
चित्र 3.345विश्व के छह पर्वतों की सापेक्ष ऊँचाई दर्शाने वाला रेखाचित्र; बाईं ओर 1000–9000 मी. का पैमाना
चित्र 3.447कुछ पहाड़ी जीव-जंतु — पेरेग्रिन फाल्कन, हिमालयी तहर, पहाड़ी खरगोश, गोल्डन ईगल, कैनेडियन लिंक्स, याक, आइबेक्स, ग्रे फॉक्स, तेंदुआ, भालू
चित्र 3.548उत्तरी भारत में सीढ़ीदार (वेदिका) कृषि
चित्र 3.650पर्वतीय जीवन की चुनौतियाँ — आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन, पर्यटकों का अनियंत्रित रूप से आ जाना, हिमस्खलन (एवलांश), भारी हिमपात, बादल फटना, ठंडा मौसम
चित्र 3.752चेरापूंजी पठार से गिरता नहकालीकाई जल प्रपात
चित्र 3.853विश्व-मानचित्र — प्रमुख पर्वत शृंखलाएँ, पठार और नदियों के मैदान; रंग-संकेत सहित; “मानचित्र पैमाने पर आधारित नहीं है”
चित्र 3.954गंगा के मैदान का उपग्रह से लिया गया चित्र
चित्र 3.1056गंगा नदी में नौका-परिवहन
तालिका (बिना संख्या)57तमिल संगम की पाँच तिणै — तिणै, दृश्यभूमि, मुख्य व्यवसाय

इस अध्याय में कोई क्रमांकित तालिका नहीं है। पृ. 57 की तिणै-तालिका पर पुस्तक ने संख्या नहीं दी है — उसे “तालिका 3.1” मत कहिए।


पदइस अध्याय में प्रयुक्त अर्थ
स्थलरूप (लैंडफ़ॉर्म)पृथ्वी की सतह का एक भौतिक स्वरूप; लाखों वर्षों में आकार लेता है
दृश्यभूमि (लैंडस्केप)किसी क्षेत्र का दिखाई देने वाला भू-दृश्य
तुंगता (एल्टीट्यूड)समुद्र तल से किसी वस्तु/लक्ष्य की ऊँचाई
समुद्र तलसमुद्र की सतह का औसत स्तर; ‘माध्य समुद्र तल’ भी कहते हैं
पर्वतआस-पास की भूमि से कुछ अधिक ऊँचा स्थलरूप; चौड़ा आधार, खड़ी ढलान, सँकरे शिखर
पहाड़ी (छोटे पहाड़ / हिल)कम ऊँचाई वाला ऊँचा स्थान; कम खड़ी चढ़ाई और गोल आकार का शीर्ष
पर्वत शृंखलापर्वतों का समूह जिस रूप में विश्व के अधिकांश पर्वत वर्गीकृत हैं
गिरिशृंग / शिखर / चोटीपर्वत का सबसे ऊँचा भाग
वर्षणवायुमंडल से भूमि पर किसी भी रूप में जल का गिरना — वर्षा, हिमपात, ओले
पर्वतीय वनपर्वतीय क्षेत्र में उगने वाले वनों का एक प्रकार
शंकुधारी वृक्षपाइन (चीड़), फर, स्प्रूस, देवदार — ऊँचे, शंकु के आकार के, पतली नोंकदार पत्तियों वाले
मॉस (काई)फूलों और वास्तविक जड़ों से रहित छोटा हरा पौधा, जो मखमली आवरण की तरह फैलता है
लाइकेनपौधे के समान जीव, जो सामान्यत: चट्टानों, दीवारों या पेड़ों से चिपके होते हैं
भूभागभौतिक आकृतियों की दृष्टि से भूमि का एक खंड
घाटीपहाड़ों के बीच का निचला क्षेत्र, जिसमें प्राय: नदी अथवा जलधारा बहती है
वेदिका कृषि (सीढ़ीदार कृषि)ढलान की भूमि को काटकर सीढ़ीनुमा स्थान पर कृषि करना
आकस्मिक बाढ़स्थान विशेष में अकस्मात बाढ़ आना; बहुधा बादल फटने से
भूस्खलनपर्वतीय भूखंड के एक बड़े भाग या एक चट्टान का अकस्मात टूटकर गिरना
हिमस्खलन (एवलांश)पर्वत से अकस्मात हिम का गिरना; प्राय: तब जब हिम पिघलना आरंभ होती है
बादल फटनाअचानक प्रचंड तूफ़ान सहित वर्षा होना
उन्नयनपर्वत के ऊपर उठने की प्रक्रिया, जो आज भी चल रही है
अपरदनघिसने की वह प्रक्रिया जिससे प्राचीन पर्वत गोल आकार के हो गए
पठारआस-पास की भूमि से उठी स्थलाकृति, सतह प्राय: चपटी, कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले
लावा पठारज्वालामुखी क्रियाओं से निर्मित उपजाऊ पठार, जिसमें समृद्ध काली मिट्टी होती है
खनिजों का भंडार-गृहपठारों को दिया गया नाम, क्योंकि उनमें खनिजों का प्रचुर जमाव है
मैदानविस्तृत सपाट अथवा हल्का तरंगित धरातल; न ऊँची पहाड़ियाँ, न गहरी घाटियाँ
तलछटनदियों द्वारा एकत्र किए गए रेत, चट्टानों के कण और गाद
सहायक नदीमुख्य नदी में आकर मिलने वाली अन्य नदी
संगम स्थलदो या दो से अधिक नदियों के मिलने का स्थान
मरुस्थलयदा-कदा वर्षा प्राप्त करने वाला, दूर-दूर तक शुष्कता के फैलाव वाला स्थलरूप
लचीलापन (रेजिलियंस)चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करने अथवा उनके अनुसार ढलने की क्षमता
अनुकूलनस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेना
तिणैप्राचीन तमिल संगम कविता की पाँच दृश्यभूमियाँ
मोटे अनाजज्वार, बाजरा, रागी
रेशेदार फसलेंकपास, जूट और सन

मुख्य संख्याएँ

नियम: नीचे की हर संख्या पाठ्यपुस्तक की है। इनसे बाहर की कोई ऊँचाई, लंबाई या वर्ष छात्र-सामग्री में मत जोड़िए — बाहरी मान 10-Verification-Log.md में हैं।

मानकिसकापृष्ठ
3स्थलरूपों की प्रमुख श्रेणियाँ — पर्वत, पठार, मैदान42, 57
लाखों वर्षस्थलरूपों को आकार लेने में लगा समय42
50 किलोमीटरगतिविधि में दी गई दूरी, जिसके भीतर परिदृश्य-बदलाव देखना है42
8848 मीटरएवरेस्ट गिरिशृंग की ऊँचाई — विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर51
लगभग 2500 कि.मी.गंगा की लंबाई48
4500 मीटरतिब्बत के पठार की औसत ऊँचाई — इसीलिए ‘विश्व की छत’51
लगभग 2500 किलोमीटरतिब्बत के पठार की पूर्व-से-पश्चिम लंबाई (= चंडीगढ़ से कन्याकुमारी की दूरी जितनी)51
कई लाख वर्ष पहलेदक्कन के पठार का ज्वालामुखी सक्रियता से बनना51
340 मीटरनहकालीकाई जल प्रपात की ऊँचाई (चेरापूंजी, मेघालय)52
300 मीटर से अधिक नहींमैदान की समुद्र तल से ऊँचाई53
कुछ सौ से कई हजार मीटरपठारों की ऊँचाई का परिसर51
लगभग 40 करोड़गंगा के मैदान की जनसंख्या55
एक-चौथाई से अधिकभारत की कुल जनसंख्या का वह भाग जो गंगा के मैदान में रहता है55
कम से कम 1500 वर्ष पूर्वकालिदास का काल46
1984बछेंद्री पाल — एवरेस्ट आरोहण और पद्मश्री49
2019बछेंद्री पाल — पद्मभूषण49
22 वर्षअरुणिमा सिन्हा की आयु, जब दुर्घटना में एक पैर गया49
2013अरुणिमा सिन्हा — एवरेस्ट आरोहण49
2015अरुणिमा सिन्हा — पद्मश्री49
6चित्र 3.2 व 3.3 में दिखाए गए पर्वतों की संख्या44–45
7चित्र 3.6 में दिखाई गई पर्वतीय चुनौतियाँ50
5तमिल संगम की तिणै57
4कैलाश पर्वत को पवित्र मानने वाली परंपराएँ — हिंदू दर्शन, बौद्ध, जैन, बॉन51
1000–9000 मी.चित्र 3.3 के रेखाचित्र का पैमाना45

भ्रमित करने वाले युग्म

युग्मअंतर जो अंक दिलाता है
पर्वत बनाम पहाड़ीपर्वत — अधिक ऊँचा, खड़ी चढ़ाई, सँकरा शिखर। पहाड़ी — कम ऊँची, कम खड़ी चढ़ाई, गोल शीर्ष।
नवीन (युवा) बनाम प्राचीन पर्वतनवीन — हिमालय, ऊँचा, नुकीली चोटियाँ। प्राचीन — अरावली, छोटा, गोल आकार (अपरदन से)।
भूस्खलन बनाम हिमस्खलनभूस्खलन — चट्टान/भूखंड गिरता है। हिमस्खलन (एवलांश) — हिम गिरती है, प्राय: हिम पिघलना आरंभ होने पर।
आकस्मिक बाढ़ बनाम बादल फटनाबादल फटना = कारण (अचानक प्रचंड तूफ़ान सहित वर्षा)। आकस्मिक बाढ़ = परिणाम।
गंगा 2500 कि.मी. बनाम तिब्बत का पठार 2500 कि.मी.पहला नदी की लंबाई (पृ. 48), दूसरा पठार की पूर्व-पश्चिम लंबाई (पृ. 51)। संख्या एक, विषय दो।
गंगा बनाम यमुनायमुना गंगा की सहायक नदी है — उलटा नहीं। घाघरा भी सहायक, वह भी हिमालय से।
यमुना/घाघरा बनाम सोनयमुना व घाघरा हिमालय से; सोन विंध्यांचल की शृंखलाओं से (गंगा के मैदान के दक्षिण में)।
पठार सामान्यत: कम उपजाऊ बनाम लावा पठार उपजाऊसामान्य पठार — चट्टानी मिट्टी, कम उपजाऊ। लावा पठार — समृद्ध काली मिट्टी, उपजाऊ।
किलिमंजारो बनाम शेष पाँच पर्वतकिलिमंजारो किसी शृंखला का भाग नहीं — एक पृथक पर्वत।
एवरेस्ट बनाम कंचनजुंगा (स्थिति)एवरेस्ट — नेपाल तथा तिब्बत के बीच। कंचनजुंगा — भारत के सिक्किम राज्य और नेपाल के बीच।
चोमोलुंगमा बनाम सागरमाथाचोमोलुंगमा — तिब्बती, अर्थ ‘जगत जननी’। सागरमाथा — नेपाली, अर्थ ‘आकाश की देवी’।
गर्म बनाम ठंडा मरुस्थलगर्म — सहारा, थार। ठंडा — गोबी। (कुछ विशेषज्ञ अंटार्कटिका को भी मरुस्थल मानते हैं।)
तुंगता बनाम समुद्र तलतुंगता = ऊँचाई का माप। समुद्र तल = वह आधार-रेखा जिससे तुंगता नापी जाती है।
वर्षण बनाम वर्षावर्षण व्यापक पद है — इसमें वर्षा, हिमपात और ओले तीनों आते हैं। वर्षा उसका एक रूप है।
मॉस बनाम लाइकेनमॉस — छोटा हरा पौधा, मखमली आवरण की तरह फैलता है। लाइकेन — पौधे के समान जीव, चट्टानों/दीवारों/पेड़ों से चिपका।
तलछट बनाम गादतलछट = रेत + चट्टानों के कण + गाद — तीनों का साझा नाम। गाद उसका एक अवयव है।
स्थलरूप बनाम दृश्यभूमिस्थलरूप = पृथ्वी की सतह का भौतिक स्वरूप (पर्वत/पठार/मैदान)। दृश्यभूमि = किसी क्षेत्र का दिखाई देने वाला दृश्य।
कुरिंजी बनाम पालैकुरिंजी — पर्वतीय क्षेत्र, आखेट व संग्रह। पालै — शुष्क/मरुस्थल जैसा प्रदेश, घुमंतू व युद्धरत।