मास्टर शिक्षण नोट्स — कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान
स्रोत: NCERT, समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे — भाग 1, कक्षा 6। अध्याय 7, पृष्ठ 105–124 (विषय-सूत्र: हमारी सांस्कृतिक विरासत एवं ज्ञान परंपराएँ)। PDF:
fhes107.pdf— 20 पृष्ठ। वर्गीकरण: CORRUPT (टूटा हुआ ToUnicode, 1.1% खंडित संयुक्ताक्षर)। पाठ-परत निकाली नहीं गई — सभी 20 पृष्ठ चित्र रूप में पढ़े गए। पृ. 108 की समय-रेखा 260 dpi पर पुनः पढ़ी गई।
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0. यह अध्याय किस बारे में है
! सबसे पहले यह समझ लीजिए कि यह अध्याय क्या नहीं है। यह धर्म पढ़ाने वाला अध्याय नहीं है। पुस्तक स्वयं पृ. 118 पर एक पूरा बॉक्स इसी बात को स्पष्ट करने में लगाती है कि वह ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग जान-बूझकर नहीं कर रही, बल्कि ‘दर्शन’, ‘मत’ और ‘विश्वास’ कह रही है। यह विचारों का इतिहास है।
अध्याय का रूपक पहले ही पैराग्राफ़ में आ जाता है और अंतिम पृष्ठ तक चलता है —
भारतीय संस्कृति एक प्राचीन वृक्ष की तरह है — अनेक जड़ें, एक सामान्य तना, और उससे निकलती अनेक शाखाएँ।
अध्याय की बनावट:
| क्रम | प्रश्न | उत्तर कहाँ |
|---|---|---|
| 1 | वेद क्या हैं? इनका संदेश क्या है? | पृ. 106–110 |
| 2 | प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में कौन-से नए दर्शन उभरे? इनके मूल सिद्धांत क्या हैं? | पृ. 110–119 |
| 3 | लोक और जनजातीय परंपराओं का भारतीय संस्कृति में क्या योगदान रहा है? | पृ. 119–121 |
अध्याय का दूसरा, गहरा विचार
पुस्तक बार-बार एक ही बात दिखाती है, और वही उसका असली पाठ है —
इन सब दर्शनों में भिन्नताएँ थीं, पर वे एक-दूसरे से कटे हुए नहीं थे। उनमें कुछ संकल्पनाएँ साझी थीं, और उनके बीच लगातार आदान-प्रदान चलता रहा।
पृ. 119 पर पुस्तक स्वयं कहती है कि “यह उस वृक्ष का तना या मूल भाग है जिसके उदाहरण के साथ हमने इस अध्याय की शुरुआत की थी।” और लोक-जनजातीय परंपराओं वाले खंड में यह आदान-प्रदान दोनों दिशाओं में दिखाया जाता है — यह उस खंड की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
1. अध्याय का आरंभ (पृ. 105)
उद्धरण — सुभाषित(नीतिशतक) (पृ. 105)
वह जिसे चुराया नहीं जा सकता; जिसे कोई शासक छीन नहीं सकता; …जो बोझ नहीं है क्योंकि इसका अपना कोई भार नहीं है; जिसका उपयोग करने से हर दिन इसमें वृद्धि ही होती है — यह सबसे बड़ी संपत्ति है, सच्चे ज्ञान की संपत्ति। — सुभाषित (नीतिशतक)
★यह उद्धरण अध्याय का विषय ही है — ज्ञान। और यह अध्याय 7 और 8 दोनों के विषय-सूत्र (हमारी सांस्कृतिक विरासत एवं ज्ञान परंपराएँ) से सीधा जुड़ता है।
आवरण-चित्र (पृ. 105)
तीन चित्र, बाएँ से दाएँ — एक ऋषि (हम्पी, कर्नाटक) · बुद्ध (भूटान) · महावीर (बिहार)।
★यह तीन-चित्रों वाली पट्टी ही पूरे अध्याय का नक़्शा है — वैदिक परंपरा, बौद्ध मत, जैन मत। और यह भी ध्यान दीजिए कि तीनों अलग-अलग जगहों से हैं, जिनमें एक भारत के बाहर (भूटान) है। कक्षा में यह पूछने लायक है: “बुद्ध की मूर्ति भूटान की क्यों है?”
महत्वपूर्ण प्रश्न (पृ. 105)
- वेद क्या हैं? इनका संदेश क्या है?
- प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में भारत में कौन-कौन से नए दर्शन/मत उभरे? इनके मूल सिद्धांत क्या हैं?
- लोक और जनजातीय परंपराओं का भारतीय संस्कृति में क्या योगदान रहा है?
2. वृक्ष का रूपक (पृ. 106)★
भारतीय संस्कृति, किसी भी अनुमान के अनुसार, अनेक सहस्राब्दियों वर्ष पुरानी है। किसी प्राचीन वृक्ष के समान इसमें अनेक जड़ें और अनेक शाखाएँ हैं। जड़ें एक सामान्य तने को पोषण देती हैं। इस तने से अनेक शाखाएँ निकलती हैं, जो भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं, हालाँकि ये एक सामान्य तने से जुड़ी हुई हैं।
शाखाएँ कौन-सी हैं: कला · साहित्य · विज्ञान · चिकित्सा · धर्म · शासन पद्धति · मार्शल आर्ट्स (युद्ध कलाएँ) — और कुछ ऐसे दर्शन भी, जिनसे तात्पर्य उन विचारकों के समूह या आध्यात्मिक साधकों से है जो मानव जीवन और विश्व के बारे में समान विचार रखते हैं।
शब्द-बॉक्स (हाशिया, पृ. 106)
आध्यात्मिक — आत्मा से संबंधित (संस्कृत तथा अनेक भारतीय भाषाओं में)। आध्यात्मिकता हमारे वर्तमान व्यक्तित्व से परे एक गहरे या ऊँचे आयाम की खोज है।
साधक — ऐसा व्यक्ति जो इस दुनिया के सत्य को जानना चाहता है। यह एक ऋषि, संत, योगी, दार्शनिक आदि हो सकता है।
अध्याय 6 से सीधी कड़ी★
“अनेक पुरातत्व विज्ञानियों तथा विद्वानों ने बताया है कि भारतीय संस्कृति की कुछ जड़ें सिंधु या हड़प्पा अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता की ओर जाती हैं (जिन्हें हम अध्याय 6 में पढ़ चुके हैं)।”
और आगे: “समय बीतने के साथ भारत में सैकड़ों प्रकार के जीवन दर्शन उभरे।” पुस्तक कहती है कि वह यहाँ कुछ प्रारंभिक दर्शनों की बात करेगी, “जिन्होंने भारत को एक विशिष्ट व्यक्तित्व वाले देश के रूप में आकार दिया है।”
★★और फिर वह वाक्य आता है जो अध्याय 5 से जुड़ता है: “इन्हें तथा इनकी जड़ों को समझकर ही हम ‘इंडिया अर्थात भारत’ को भलीभाँति समझ सकेंगे।” — यह अध्याय 5 के शीर्षक की सीधी प्रतिध्वनि है। कक्षा में यह जोड़ बनाइए।
3. वेद और वैदिक संस्कृति
(क) वेद क्या हैं? (पृ. 106)★
- ‘वेद’ शब्द विद् से आया है, जिसका अर्थ है ‘ज्ञान’ (उदाहरण के लिए — विद्या)।
- वास्तव में चार वेद हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
- ये भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और वस्तुत: विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक हैं।
ऋचाएँ और मौखिक परंपरा★
- वेदों में हजारों ऋचाएँ हैं — कविताओं और गीतों के रूप में प्रार्थनाएँ।
- ★ये लिखित रूप में नहीं थीं, अपितु इनका मौखिक पाठ किया जाता था।
- ये ऋचाएँ सप्तसिंधु क्षेत्र में रची गईं (जिनके बारे में अध्याय 5 में पढ़ चुके हैं)।
- यह कहना कठिन है कि इन चारों ग्रंथों में से प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद की रचना कब हुई। विशेषज्ञों ने इनकी रचना पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. के बीच किए जाने का प्रस्ताव किया है।
- ★★“इस प्रकार यह ग्रंथ 100 से 200 पीढ़ियों तक गहन प्रशिक्षण के माध्यम से स्मृतिबद्ध किए गए एवं मौखिक रूप से बिना किसी विशेष परिवर्तन के आगे संप्रेषित किए गए।”
★यह वाक्य इस अध्याय का सबसे चौंकाने वाला तथ्य है, और सबसे परीक्षा-योग्य भी। 100 से 200 पीढ़ियाँ। बिना लिखे। बिना विशेष परिवर्तन के। कक्षा में इसे ठहरकर कहिए — यह बच्चों को सचमुच चौंकाता है।
ध्यान रखें (बॉक्स, पृ. 107) — यूनेस्को की मान्यता★
हजारों वर्षों से किए गए वैदिक पाठशैली के इस सुव्यवस्थित संप्रेषण को 2008 में यूनेस्को ने ‘मानवीयता के मौखिक और अमूर्त विरासत की अनुपम कोटि’ के रूप में मान्यता दी।
शब्द-बॉक्स: यूनेस्को — पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन। यह संगठन शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से लोगों और राष्ट्रों के बीच संवाद को बढ़ावा देता है।
! 2008 की तिथि नोट कर लीजिए — यह परीक्षा में पूछी जा सकती है। (बाहरी सत्यापन: घोषणा 2003 में हुई और 2008 में प्रतिनिधि सूची में शामिल की गई — विवरण
10-Verification-Log.mdमें। विद्यार्थी को पुस्तक की 2008 ही पढ़ाइए।)
ऋचाओं की रचना किसने की (पृ. 107)
- वैदिक ऋचाओं की रचना ऋषियों (कवि) और ऋषिकाओं (कवियत्रियाँ) द्वारा संस्कृत भाषा के एक प्रारंभिक रूप में की गई थी।
- ★ध्यान दीजिए — पुस्तक ‘ऋषिकाओं’ का उल्लेख अलग से करती है। रचनाकारों में स्त्रियाँ भी थीं।
- ये ऋचाएँ अनेक देवों (देवताओं और देवियों) को काव्यात्मक रूप से संबोधित करती थीं, जैसे — इंद्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सरस्वती, उषा और अन्य।
- इन दृष्टाओं के साथ मिलकर देवों ने मानव जीवन और ब्रह्मांड में ऋत या सत्य और क्रम को बनाए रखा।
शब्द-बॉक्स: ब्रह्मांड — विश्व या ब्रह्मांड की सुव्यवस्थित और संतुलित संरचना।
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति (पृ. 107)★★
आद्य ऋषियों और ऋषिकाओं ने देवताओं और देवियों को अलग नहीं, बल्कि एक ही माना।
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति… अर्थात, परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं।
शब्द-बॉक्स: वैश्विक दर्शन — विश्व का एक निश्चित दर्शन या समझ, इसका उद्भव या इसकी कार्य प्रणाली।
★★यह अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति है। पुस्तक जोड़ती है कि “इस वैश्विक दर्शन में कुछ मान्यताएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण थीं जो ‘सत्य’ से आरंभ हुईं, जो ईश्वर का दूसरा नाम था। ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में लोगों के बीच एकता का भी आह्वान किया गया।”
यह पंक्ति अभ्यास के ‘सही या गलत’ प्रश्न 3 में भी आती है — और वहाँ वह ग़लत है। (विवरण नीचे अभ्यास की उत्तर-कुंजी में।)
एकता का मंत्र (पृ. 108)★
साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें, एक हो हमारा मन, हमारे विचार मिलें… एक हो हमारा उद्देश्य, एक हो हमारा हृदय… हमारे विचार एक हों, अत: सभी सहमत हों।
(यह ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में से है।)
(ख) वैदिक समाज (पृ. 108)
- प्रारंभिक वैदिक समाज विभिन्न जनों (अर्थात, लोगों का बड़ा समूह) में संगठित था।
- ऋग्वेद में ही ऐसे 30 से अधिक जनों की सूची दी गई है — उदाहरणार्थ भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुर्वश आदि।
- प्रत्येक जन उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग के एक विशेष क्षेत्र के साथ जुड़ा था।
★★‘भरत’ यहाँ फिर आता है — और यह अध्याय 5 से सीधी कड़ी है। अध्याय 5 (पृ. 77) में पढ़ा था कि ‘भरत’ ऋग्वेद में एक प्रमुख वैदिक जन-समूह है, कोई राजा नहीं — और उसी से ‘भारतवर्ष’ बना। यहाँ वही ‘जन’ की परिभाषा दोबारा मिलती है। कक्षा में यह जोड़ अवश्य बनाइए — दो अध्याय एक ही शब्द पर मिल जाते हैं।
चित्र — समय-रेखा (पृ. 108)★
| अंकित बिंदु | 1500 सा.सं.पू. · 1000 सा.सं.पू. · 500 सा.सं.पू. · 1 सा.सं. · 500 सा.सं. |
|---|---|
| तीर | बुद्ध और महावीर का जन्म — 1000 और 500 सा.सं.पू. के बीच, 500 के अधिक निकट |
| पट्टी 1 | उपनिषद् — लगभग 1500 से 500 सा.सं.पू. तक फैली (बीच का भाग ठोस, दोनों सिरे बिंदुदार) |
| पट्टी 2 | वैदिक दर्शन — लगभग 700 सा.सं.पू. से आगे, सा.सं. की आरंभिक शताब्दियों तक |
! दो बातें ध्यान से: (1) बिंदुदार सिरों का अर्थ है ‘अनिश्चित तिथि’ — यह पुस्तक की ईमानदारी है, और इसे पढ़ाया जाना चाहिए। इन पट्टियों की सटीक तिथियाँ याद कराने की कोई आवश्यकता नहीं। (2) समय-रेखा का तीर बाईं ओर (अतीत की ओर) दिखता है, जबकि तिथियाँ बाएँ से दाएँ बढ़ती हैं। (विवरण
10-Verification-Log.mdमें — इस पर कोई प्रश्न नहीं बनाया गया है।)
शासन के संकेत (पृ. 109)
- इसके बारे में बहुत अधिक ज्ञात नहीं है कि ये जन अपने समाज का शासन कैसे चलाते थे।
- वेदों में राजा (राजा या शासक), सभा और समिति जैसे कुछ शब्दों के माध्यम से कुछ ही संकेत मिलते हैं।
- ★“सभा और समिति दोनों शब्द सामूहिकता को इंगित करते हैं।”
वैदिक ग्रंथों में उल्लिखित व्यवसाय (पृ. 109)
किसान · बुनकर · कुम्हार · शिल्पकार · बढ़ई · आरोग्यकर्ता · नर्तक-नर्तकी · नाई · पुजारी
शब्द-बॉक्स: आरोग्यकर्ता — राहत देने या रोग ठीक करने के लिए पारंपरिक प्रथाओं का उपयोग करने वाला व्यक्ति।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 109)
क्या आप जानते हैं कि उस समाज को क्या कहते हैं, जहाँ लोग अपने नेता का चयन करते हैं? आपके विचार से लोगों को ऐसी स्थिति से कैसे लाभ होता है? यदि वे अपने द्वारा नहीं चुने गए नेता के अधीन रहते हैं तो क्या हो सकता है? (संकेत — ‘शासन और लोकतंत्र’ विषय में आपने जो पहले पढ़ा है, उस पर विचार कीजिए) अपने विचार 100–150 शब्दों में लिखिए।
4. (ग) वैदिक दर्शन (पृ. 109–110)★
अनुष्ठान
- वैदिक संस्कृति में अनेक अनुष्ठान (यज्ञ आदि) विकसित हुए, जो विभिन्न देवों के प्रति व्यक्तिगत अथवा सामूहिक हितों तथा मंगल के लिए समर्पित या निर्देशित थे।
- दैनिक अनुष्ठान सामान्य रूप से प्रार्थनाओं तथा अग्नि देव को आहुति और प्रार्थना के रूप में होते थे, किंतु ये अनुष्ठान समय के साथ और अधिक जटिल होते चले गए।
उपनिषद्★★
- ‘उपनिषद्’ वैदिक संकल्पनाओं के आधार पर रचित हैं, तथा इनमें कुछ नई संकल्पनाएँ प्राप्त होती हैं —
| नई संकल्पना | अर्थ |
|---|---|
| पुनर्जन्म | बार-बार जन्म लेना |
| कर्म | हमारे कर्म और कर्म-फल |
वेदांत और ब्रह्म
- एक दर्शन, जिसे सामान्यत: ‘वेदांत’ के नाम से जाना जाता है, के अनुसार सब कुछ — मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड — एक दैवी तत्व है, जिसे ‘ब्रह्म’ (यह ब्रह्मा देव से भिन्न है) अथवा कभी-कभी केवल ‘तत्’ कहा जाता है।
! यह कोष्ठक बहुत महत्वपूर्ण है — ब्रह्म और ब्रह्मा देव अलग हैं। विद्यार्थी इन्हें मिला देते हैं, और यह इस अध्याय की सबसे आम ग़लती है।
दो प्रसिद्ध मंत्र (पृ. 109)★
अहम् ब्रह्मास्मि “मैं ब्रह्म हूँ” (अर्थात, मैं दिव्य हूँ)
तत् त्वम् असि… “वह ब्रह्म आप ही हैं”
आत्मन् (पृ. 110)★
- उपनिषदों में भी आत्मन् या स्व की संकल्पना की गई है, जो कि प्रत्येक जीव में निवास करता है, परंतु ब्रह्म का ही स्वरूप होता है।
- इसके अनुसार इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और परस्पर निर्भर है।
- इसमें एक महत्वपूर्ण प्रार्थना समझाई गई है —
सर्वे भवन्तु सुखिन: “सभी जीव सुखी रहें” — और यह सबके लिए रोग तथा दुख से मुक्ति की कामना करती है।
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 110)
क्या आपने इस महत्वपूर्ण संदेश को प्रदान करने वाली कोई अन्य कहानी सुनी या पढ़ी है? उनसे आपको किन मूल्यों की शिक्षा मिली?
योग, और ‘हिंदू दर्शन’ शब्द (पृ. 110)★
“प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वेदों से कुछ अन्य दर्शनों का विकास हुआ। इनमें से एक था — योग, जिसने किसी व्यक्ति की चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक विधियाँ विकसित कीं। इन सभी दर्शनों से मिलकर कुछ आधारभूत विचार बने, जिन्हें हम आज ‘हिंदू दर्शन’ कहते हैं।”
शब्द-बॉक्स: चेतना — जागृत होने का गुण या अवस्था; उदाहरण के लिए व्यक्ति को स्वयं की चेतना होना।
★ध्यान दीजिए कि पुस्तक ‘हिंदू दर्शन’ शब्द को अनेक दर्शनों के मिलने से बना बताती है — एक ही स्रोत से निकला हुआ नहीं। यह पृ. 118 के बॉक्स से भी जुड़ता है।
5. उपनिषदों की तीन कथाएँ (पृ. 111–112)★
पुस्तक इन्हें एक अलग, सजावटी पन्ने पर रखती है और आरंभ में ही अपना उद्देश्य बता देती है — “उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है। फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों।”
★★यही वाक्य तीनों कथाओं की कुंजी है — तीनों में प्रश्न पूछने वाला नायक है: एक बच्चा (श्वेतकेतु), एक और बच्चा (नचिकेता), और एक स्त्री (गार्गी)। यह संयोग नहीं है, और कक्षा में यह जोड़ अवश्य दिखाइए।
(क) श्वेतकेतु और यथार्थबोध का बीज(छांदोग्य उपनिषद्)
- ऋषि उद्दालक आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को वेदों के अध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा।
- 12 वर्ष बाद श्वेतकेतु वापस आया, तो पिता ने अनुभव किया कि वह अपने ज्ञान के कारण बहुत अहंकारी हो गया है।
- इसलिए उद्दालक ने ब्रह्म के स्वरूप पर उसके ज्ञान का परीक्षण करने के लिए प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर श्वेतकेतु नहीं दे सका।
- ★उद्दालक के दो उदाहरण:
- बरगद के फल का बीज खोलने पर रिक्त (खाली) दिखाई देता है, किंतु इसमें बरगद के वृक्ष का भावी रूप निहित होता है।
- एक ही प्रकार की मिट्टी से अलग-अलग प्रकार के बर्तन बनाए जा सकते हैं — उसी प्रकार हमारे चारों ओर जो कुछ भी है, एक ही तत्व — ब्रह्म — से उसका उद्भव हुआ है।
- समापन: “सभी में यही सूक्ष्म तत्व व्याप्त है… तुम वही हो, श्वेतकेतु।”
★यह तत् त्वम् असि (पृ. 109) का ही कथा-रूप है। दोनों को साथ पढ़ाइए — तब मंत्र सूखा वाक्य नहीं रह जाता।
(ख) नचिकेता और उसकी ज्ञान पिपासा(कठोपनिषद्)
- एक व्यक्ति यज्ञ के समय अपनी समस्त संपत्ति का दान दे रहे थे।
- उनके पुत्र नचिकेता ने पूछा कि वे उसे किस देवता को अर्पित करेंगे?
- बार-बार यही प्रश्न पूछने पर पिता क्रोध में आ गए और उत्तर दिया — “मैं तुम्हें यम अर्थात मृत्यु के देवता को अर्पित करता हूँ।”
- इसके बाद नचिकेता यमलोक की ओर निकल पड़े। लंबी प्रतीक्षा के बाद वे यम से मिले।
- उनका प्रश्न था — “शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है?”
- यम ने पहले तो बालक के प्रश्न का उत्तर टालने का प्रयास किया, किंतु नचिकेता के निरंतर आग्रह करते रहने पर अंतत: यम देव ने प्रसन्न होकर उन्हें आत्मा के बारे में समझाया, जो सभी जीवों में निहित है।
- ★“इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु होती है; यह अमर है।”
- इस गहन ज्ञान की प्राप्ति के बाद नचिकेता अपने पिता के पास वापस आए, जिन्होंने उल्लासपूर्वक उसका स्वागत किया।
★इस कथा का असली पाठ ‘यम’ नहीं, ‘निरंतर आग्रह’ है — नचिकेता ने पीछा नहीं छोड़ा। यह कथा अभ्यास के प्रश्न 1 और कक्षा गतिविधि, दोनों में लौटती है।
(ग) गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ(बृहदारण्यक उपनिषद्)★
- विद्वान राजा जनक ने एक दार्शनिक शास्त्रार्थ के विजेता को पुरस्कार देने की घोषणा की।
- याज्ञवल्क्य नामक सुप्रसिद्ध ऋषि राजदरबार में आए और गार्गी (एक ऋषिका) के प्रश्न पूछने से पहले तक अनेक विद्वानों को पराजित किया।
- इसके बाद गार्गी ने विश्व के स्वरूप पर याज्ञवल्क्य से अनेक प्रश्न पूछे और अंत में ब्रह्म के स्वरूप पर भी प्रश्न पूछे।
- तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें आगे प्रश्न पूछने से मना किया।
- ★हालाँकि कुछ समय बाद गार्गी ने पुन: प्रश्न पूछा, तब याज्ञवल्क्य ने समझाया कि कैसे ब्रह्म ही संसार, ऋतुओं, नदियों तथा अन्य सभी चीज़ों का निर्माण करता है।
★★इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण अंश वह है जिसे लोग छोड़ देते हैं — गार्गी को मना किया गया, और उसने फिर भी पूछा। और तभी उत्तर मिला। यह वही ‘प्रश्न पूछने का महत्व’ है जिसकी घोषणा पुस्तक ने इन कथाओं के आरंभ में की थी। गार्गी एक ऋषिका हैं — वही शब्द जो पृ. 107 पर ऋचाओं के रचनाकारों के लिए आया था।
6. बौद्ध मत (पृ. 110, 113)★
आरंभ: “कुछ अन्य दर्शनों का भी अविर्भाव हुआ, जिन्होंने वेदों की प्रभुता को नहीं स्वीकार किया और अपनी स्वयं की पद्धति विकसित की। उनमें से एक बौद्ध मत है।”
जन्म और तिथि (पृ. 110)
- लगभग ढाई सहस्राब्दी पूर्व राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने लुंबिनी (वर्तमान नेपाल में) में जन्म लिया।
- ★★“उनके जन्म के समय के विषय में विद्वानों में सर्वसम्मति नहीं है। अध्याय 4 में हमने 560 सा.सं.पू. को उनका अनुमानित जन्म वर्ष माना है। इससे हमारी यह कहानी आगे किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं होगी।”
★यह वाक्य पुस्तक की सबसे परिपक्व पंक्तियों में से एक है, और अध्याय 4 से सीधी कड़ी है। पुस्तक स्वीकारती है कि तिथि विवादित है, अपनी पहले दी गई संख्या दोहराती है, और यह भी कहती है कि इससे कहानी नहीं बदलती। (अध्याय 4 में यही 560 सा.सं.पू. गणना के उदाहरण में आया था — 560 + 2024 − 1 = 2583.) कक्षा में यह जोड़ बनाइए।
जीवन-कथा (पृ. 110)★
- सिद्धार्थ गौतम राजमहल में एक सुरक्षित वातावरण में बड़े हुए।
- एक दिन, 29 वर्ष की आयु में उन्होंने रथ पर बैठकर नगर में घूमने की इच्छा प्रकट की।
- ★और उस समय उन्होंने अपने जीवन में पहली बार देखा — एक वृद्ध, एक रोगी, और एक शव।
- उन्होंने एक संन्यासी को भी देखा, जो प्रसन्न और शांत लग रहा था।
- इन सबका अनुभव करने के बाद सिद्धार्थ ने अपने राजसी जीवन, अपनी पत्नी और बेटे को त्यागने का विचार किया।
- एक संन्यासी की तरह पैदल चलते हुए और अन्य संन्यासियों तथा विद्वानों से मिलते हुए उन्होंने मानव जीवन में दुखों के मूल कारण को खोजा।
- ★बोधगया (वर्तमान बिहार में) में एक पीपल के वृक्ष के नीचे कई दिनों तक ध्यानरत रहने के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
शब्द-बॉक्स: संन्यासी — वह व्यक्ति जो चेतना का उच्चतर स्तर प्राप्त करने के लिए कठोर अनुशासन में रहता है।
खोज और उपदेश (पृ. 113)★
- उन्होंने अनुभव किया कि ‘अविद्या’ और ‘मोह’ मानवीय कष्ट के स्रोत हैं, और इन दोनों कारणों को दूर करने की विधि संकल्पित की।
- इसके बाद सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ के नाम से जाने गए, जिसका अर्थ है — ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ व्यक्ति।
शब्द-बॉक्स: मोह — किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ संबंध की स्थिति, सामान्य रूप से भावना या आदत के माध्यम से।
- उनके उपदेशों में ‘अहिंसा’ का विचार निहित है, जिसका मूल अर्थ है — चोट नहीं पहुँचाना या नुकसान नहीं पहुँचाना।
- उन्होंने निष्ठापूर्वक आंतरिक अनुशासन पर भी बल दिया।
संघ★
- बुद्ध ने संघ की स्थापना की, जो भिक्षुओं (आगे चलकर भिक्षुणियों) का एक समुदाय है, जिन्होंने स्वयं को बुद्ध के उपदेशों के पालन और प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।
- भारत और पूरे एशिया पर उनका गहरा प्रभाव था, “जिसे हम आगे पढ़ेंगे। यह प्रभाव आज भी अनुभव किया जा सकता है।”
शब्द-बॉक्स: भिक्षु — एक ऐसा व्यक्ति जो दुनिया के सामान्य जीवन को त्याग, स्वयं को किसी धार्मिक या आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए समर्पित कर देता है। भिक्षु सामान्य तौर पर व्रत लेता है, अर्थात वचनबद्ध रहता है कि वह अनुशासित जीवन के लिए कठोर नियमों का पालन करेगा। भिक्षुणी — महिला भिक्षु।
बुद्ध के दो कथन (पृ. 113)★★
“जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में) स्नान करते हैं। परंतु वह व्यक्ति शुद्ध है जिसमें सत्य और धर्म निवास करते हैं।”
“युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।”
★पहला कथन अभ्यास प्रश्न 3 का पूरा विषय है — पुस्तक चाहती है कि कक्षा में इस पर चर्चा हो “ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सबको इसका अर्थ समझ में आ गया है।” इसका आशय: बाहरी कर्मकांड से नहीं, भीतर के सत्य और आचरण से शुद्धता आती है।
चित्र (पृ. 114)
लगभग 1800 वर्ष पुरानी पत्थर की कृति, जिसमें बुद्ध उपदेश देते हुए दर्शाए गए हैं।
आइए पता लगाएँ (बॉक्स, पृ. 114)
- उपरोक्त कृति में बुद्ध को कैसे दर्शाया गया है, इस पर चर्चा कीजिए।
- क्या आप भारत के कुछ राज्यों या कुछ अन्य देशों के नाम बता सकते हैं जहाँ आज भी बौद्ध मत एक प्रमुख मत है? इन स्थानों को विश्व के मानचित्र पर अंकित करने का प्रयास कीजिए।
7. जैन मत (पृ. 114–115)★
- जैन मत एक अन्य महत्वपूर्ण दर्शन है जो उसी समय काफी लोकप्रिय हुआ, यद्यपि इस मत को अधिक प्राचीन माना जाता है।
- सिद्धार्थ गौतम के समान ही राजकुमार वर्धमान का जन्म छठी शताब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वैशाली (वर्तमान बिहार में) नगर के समीप हुआ था।
- उन्होंने 30 वर्ष की आयु में अपना घर त्यागने और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज का निर्णय लिया।
- उन्होंने संन्यासी जीवन के अनुशासन का पालन किया और 12 वर्ष बाद उन्हें ‘अनंत’ ज्ञान या सर्वोपरि विवेक प्राप्त हुआ।
- उन्हें ‘महावीर’ या ‘महानायक’ के नाम से जाना जाने लगा और उन्होंने अपने अर्जित ज्ञान का उपदेश देना आरंभ किया।
! बुद्ध और महावीर की संख्याएँ आपस में बदल दी जाती हैं — यह इस अध्याय का सबसे प्रभावी जाल है: बुद्ध — 29 वर्ष की आयु में गृह-त्याग का निर्णय; जन्म लुंबिनी (नेपाल)। महावीर — 30 वर्ष की आयु में गृह-त्याग; 12 वर्ष बाद ज्ञान; जन्म वैशाली के समीप (बिहार)।
ध्यान रखें (बॉक्स, पृ. 115) — ‘जैन’ शब्द★
‘जैन’ शब्द जिन से आया है, जिसका अर्थ है ‘विजेता’। इसका अर्थ किसी क्षेत्र या शत्रुओं पर विजय पाने से नहीं है, बल्कि अविद्या और मोह पर विजय पाने से है, ताकि ज्ञान प्राप्त किया जा सके।
★‘अविद्या और मोह’ — ठीक वही दो शब्द जो पृ. 113 पर बुद्ध के लिए आए थे। यह संयोग नहीं है, और यही पुस्तक का ‘साझा तना’ वाला तर्क है। कक्षा में इसे दिखाइए।
जैन मत के तीन विचार★★
| विचार | अर्थ |
|---|---|
| अहिंसा | (महावीर के कथन से) — “सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दूर हटाया जाए।” |
| अनेकांतवाद | ‘केवल एक’ पक्ष या दृष्टिकोण नहीं। अर्थात, सत्य के अनेक पक्ष हैं और इसे केवल एक कथन द्वारा पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता है। |
| अपरिग्रह | ‘असंग्रह’। इसके अंतर्गत पार्थिव वस्तुओं से दूर और स्वयं को जीवन में केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहने की सलाह दी जाती है। |
- पुस्तक कहती है कि ये विचार काफी हद तक बौद्ध तथा वेदांत दर्शन के विचारों को साझा करते हैं, जो कि भारतीय संस्कृति के केंद्र में हैं।
- ★जैन मत में सभी जीवों, मानवों से लेकर अदृश्य जीवों तक, आपसी संबद्धता और आपसी निर्भरता पर भी बल दिया गया है, क्योंकि ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं।
- “प्रकृति, जीवों और वनस्पतियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने इस गहन सत्य की बार-बार पुष्टि की है।”
★यह ‘आपसी संबद्धता’ वाला वाक्य पृ. 110 के उपनिषद् वाले वाक्य से मिलता है — “इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और परस्पर निर्भर है।” दो अलग दर्शन, लगभग एक ही वाक्य। यही अध्याय का ‘साझा तना’ है।
चित्र (पृ. 115)
महावीर वर्धमान का एक पारंपरिक चित्र।
8. दो कथाएँ — जातक और जैन (पृ. 116–117)
जातक कथाएँ★
“जातक कथाएँ पीढ़ियों से भारतीय बच्चों और वयस्कों को समान रूप से आह्लादित करती रही हैं। ये बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं और बड़े ही सरल तरीके से बौद्ध आदर्शों को व्यक्त करती हैं।”
वानर-राज की कथा (पृ. 116)
- बुद्ध वानरों के एक बड़े समूह के राजा थे।
- वे एक विशालकाय वृक्ष के समीप रहते थे, जिस पर मीठी सुगंध वाले और स्वादिष्ट फल लगे थे।
- वानर-राज के आदेश के बावजूद कि उस वृक्ष का कोई भी फल किसी और के हाथ न लगे, एक दिन एक पका हुआ फल नीचे नदी में जा गिरा।
- पानी की धारा के साथ बहकर वह फल जाल में फँसा और उसे राजमहल ले जाया गया।
- राजा उस फल के स्वाद से इतना सम्मोहित हुए कि उन्होंने अपने सैनिकों से उस फल के वृक्ष को ढूँढ़ निकालने के लिए कहा।
- लंबे समय तक खोजने के बाद उन्हें वह वृक्ष मिल गया, और उन्होंने देखा कि वानर उन फलों का आनंद उठा रहे थे। सैनिकों ने वानरों पर हमला किया।
- ★वानर-राज के पास अपने वानरों को बचाने का केवल एक ही रास्ता था कि नदी पार कराने में उनकी सहायता की जाए। किंतु वे अपने आप ऐसा नहीं कर पा रहे थे। उनसे आकार में बहुत बड़े होने के नाते वानर-राज ने नदी के दूसरे किनारे पर एक पेड़ को पकड़ा और उन्हें नदी पार कराने के लिए अपने शरीर को मानो एक पुल बना दिया।
- इस प्रक्रिया के दौरान उनका शरीर घायल हो गया और अंत में उनकी मृत्यु हो गई।
- राजा ने कुछ दूरी से यह दृश्य देखा और वह वानर-राज के इस नि:स्वार्थ बलिदान से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। वह भी प्रजा के साथ अपनी भूमिका पर सोच-विचार करने लगा।
चित्र (पृ. 116): वानर-राज की कथा दर्शाने वाली पत्थर की कृति (चित्र — मध्यप्रदेश)।
एक जैन कथा — रोहिनेय (पृ. 116–117)
- रोहिनेय एक बहुत कुशल चोर था, जो पकड़े जाने के सभी प्रयासों को विफल कर देता था।
- एक बार नगर की ओर जाते हुए रास्ते में उसने अकस्मात ही अज्ञान के साधारण जीवन से मुक्ति पाने के बारे में महावीर द्वारा दिए जा रहे उपदेश के कुछ वाक्य सुन लिए।
- नगर पहुँचने के बाद उसे पहचान लिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया। उसने स्वयं को एक साधारण कृषक बताया।
- ★एक मंत्री ने उसे अपनी पहचान प्रकट करने का दबाव डालने के लिए चतुराई से एक योजना बनाई, किंतु महावीर के शब्दों को याद रखते हुए रोहिनेय मंत्री की योजना समझ गया और उसके जाल से बच निकला।
- बाद में रोहिनेय को बहुत पछतावा हुआ। वह महावीर के पास गया और अपने अपराधों को स्वीकार किया। उसने चुराया हुआ धन वापस किया एवं अपने अपराधों के लिए क्षमा माँगी।
- वह भिक्षु बन गया और उसे अपने अब तक के भ्रमपूर्ण जीवन का एहसास हुआ। तत्पश्चात उसने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
- ★“यह कहानी सम्यक कर्म और सम्यक विचारों के महत्व को दर्शाती है और यह भी बताती है कि हर व्यक्ति को जीवन में दूसरा अवसर मिलना चाहिए।”
चित्र और बॉक्स (पृ. 117)
भित्तिचित्र — नई दिल्ली के एक जैन मंदिर से। (इसमें एक सिंह और एक बैल एक ही पात्र से जल पीते दिखते हैं।)
आइए पता लगाएँ: “उपरोक्त भित्तिचित्र का अवलोकन कीजिए। इसमें क्या विशेष दिखाई दे रहा है? इसमें क्या संदेश निहित है?”
★संकेत (शिक्षक के लिए): स्वाभाविक शत्रु — सिंह और बैल — एक साथ, शांति से। यह अहिंसा और सह-अस्तित्व का दृश्य-रूप है। (पुस्तक उत्तर नहीं देती; यह चर्चा का प्रश्न है।)
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 117) — अहिंसा का विस्तार★★
“बौद्ध मत और जैन मत दोनों में ही अहिंसा का अर्थ व्यक्ति या जीव के प्रति शारीरिक हिंसा न करने से भी कहीं अधिक है। इसमें विचारों की हिंसा से भी संयम रखने के लिए कहा गया है, जैसे कि किसी के बारे में बुरी भावना नहीं रखना। यदि हम अपने आप को ध्यान से देखें तो हमें ऐसे नकारात्मक विचार स्वयं में अनुभव होते हैं और हमें इन्हें सकारात्मक विचारों में बदलना सीखना चाहिए। कभी-कभार ये नकारात्मक विचार स्वयं हमारी ओर भी निर्देशित होते हैं।”
★यह बॉक्स इस अध्याय का सबसे सीधा जीवन-मूल्य वाला अंश है, और यह बुद्ध के दूसरे कथन (“स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है”) से मिलता है। दोनों को साथ पढ़ाइए।
9. गुफाएँ, और ‘धर्म’ शब्द वाला बॉक्स (पृ. 118)ध्यान
एलोरा और विहार
चित्र-कैप्शन: बौद्ध एलोरा (महाराष्ट्र) में छठवीं और दसवीं शताब्दी सा.सं. के बीच पहाड़ों में काटकर गुफाएँ बनाई गईं। इनमें से कुछ गुफाएँ हिंदू दर्शन से हैं, जबकि अन्य बौद्ध और जैन मतों से संबंधित हैं।
★एक ही स्थान पर तीनों परंपराओं की गुफाएँ — यह पूरे अध्याय के तर्क का पत्थर में बना प्रमाण है। कक्षा में इसे इसी रूप में दिखाइए।
- बौद्ध मत और जैन मत, दोनों में ही भिक्षुओं तथा कभी-कभी भिक्षुणियों ने भी देश के सुदूर स्थानों की यात्राएँ कीं तथा अपने-अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया।
- इनमें से कुछ लोगों ने विभिन्न स्थानों पर जाकर नए विहार बनाए, जबकि कुछ ने पत्थरों की गुफाओं में संन्यासी का जीवन बिताया।
- पुरातात्विक खोजों में इन विहारों के कुछ अवशेष मिले हैं।
- ★“कई स्थानों पर पत्थर की गुफाओं में उन भिक्षुओं के नाम भी मिले हैं जो यहाँ रहते थे और पत्थरों के बिस्तर पर सोए थे।”
आइए विचार करें (बॉक्स, पृ. 118) — पुस्तक अपनी शब्दावली समझाती हैध्यान
“अंग्रेजी भाषा में हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख मतों को ‘धर्म’ का नाम दिया जाता है। हमने इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया है, यहाँ इन्हें ‘दर्शन’ या ‘मत’ और (इस अध्याय में आगे) ‘विश्वास’ कहा गया है। इसका कारण यह है कि इन मतों और दर्शनों के अनेक आयाम हैं, जिनका हम आगे अध्ययन करेंगे, जैसे कि उनका दार्शनिक पक्ष, आध्यात्मिक पक्ष, नैतिक पक्ष, सामाजिक पक्ष, धार्मिक पक्ष इत्यादि। अनेक विद्वान मानते हैं कि अंग्रेजी का शब्द ‘रिलिजन’ भारतीय सभ्यता के संदर्भ में बहुत सीमित है।”
★★यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण बॉक्स है, और शिक्षक को इसे पहले पढ़ लेना चाहिए। पुस्तक अपनी शब्द-चयन की व्याख्या दे रही है — वह ‘धर्म’ नहीं, ‘दर्शन’, ‘मत’ और ‘विश्वास’ कहती है, क्योंकि ‘रिलिजन’ शब्द इन परंपराओं के लिए बहुत सीमित है।
पढ़ाते समय पुस्तक की शब्दावली का ही प्रयोग कीजिए। यह कोई शैली की बात नहीं — यह पुस्तक का सोचा-समझा निर्णय है, और वह उसे स्पष्ट रूप से लिखती भी है।
चार्वाक / लोकायत (पृ. 118–119)
- उस समय अन्य अनेक मत भी प्रचलित थे।
- उनमें से एक ‘चार्वाक’ दर्शन है, जिसे कभी-कभी ‘लोकायत’ भी कहा जाता है।
- ★इसके अनुसार यह भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य है और इसलिए मृत्यु के पश्चात जीवन का होना असंभव है।
- “ऐसा प्रतीत होता है कि इस दर्शन को अधिक लोकप्रियता नहीं मिली और समय के साथ यह विलुप्त हो गया।”
- ★★“हमने इसका उल्लेख यहाँ इसलिए किया ताकि यह दर्शाया जा सके कि यहाँ बौद्धिक या आध्यात्मिक विश्वास प्रथाओं में व्यापक विविधता थी और लोग अपने अनुसार इन्हें चुनने के लिए स्वतंत्र थे।”
★चार्वाक को पुस्तक ने जान-बूझकर शामिल किया है, और कारण भी बता दिया है। यह एक पूर्णत: भौतिकवादी दर्शन है जो पुनर्जन्म को अस्वीकार करता है — अर्थात बाक़ी सब से उलट। और फिर भी वह भारतीय दार्शनिक परंपरा का हिस्सा गिना जाता है। यही ‘विविधता और चुनने की स्वतंत्रता’ का प्रमाण है।
साझा संकल्पनाएँ (पृ. 119)★
“यद्यपि वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शनों में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ थीं, तथापि उनमें कुछ समान संकल्पनाएँ भी थीं, जैसे — धर्म, कर्म, पुनर्जन्म, दुखों और अज्ञानता के अंत की खोज एवं अनेक अन्य महत्वपूर्ण मूल्य आदि। वास्तव में यह उस वृक्ष का तना या मूल भाग है जिसके उदाहरण के साथ हमने इस अध्याय की शुरुआत की थी।”
★★यहाँ वृक्ष का रूपक बंद होता है। पृ. 106 में जड़ें और शाखाएँ; पृ. 119 में तना। कक्षा में यह वृत्त पूरा कीजिए।
10. लोक और जनजातीय जड़ें (पृ. 119–121)★
मौखिक परंपराएँ
- “हमने अब तक जिन सांस्कृतिक जड़ों को देखा है, उन्हें कई शास्त्रों में वर्णित किया गया है। भारत में समृद्ध मौखिक परंपराएँ भी रही हैं।”
- इसका अर्थ है — उन उपदेशों और प्रथाओं के बारे में ज्ञान जो कि नित्य अभ्यास के द्वारा आगे संचारित हुआ, न कि लिखित शास्त्रों के द्वारा।
- ★“वेदों के संदर्भ में यह लागू होता है।” (अर्थात वेद भी मौखिक परंपरा से आए — पृ. 106 वाली बात यहाँ लौटती है।)
- इनमें अनेक लोक प्रथाएँ हैं, जो आम लोगों द्वारा प्रसारित होती हैं, और जनजातीय परंपराएँ जनजातियों द्वारा प्रसारित होती हैं।
बॉक्स — जनजाति क्या है? (पृ. 119)★★
-
इस सामाजिक इकाई की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं।
-
आज के समय में मानव वैज्ञानिक (मानव विज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक) जनजाति को उन परिवारों या वंशों का समूह मानते हैं, जो —
- एक सामान्य उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा साझा करते हैं;
- आपस में निकट संबंध बनाए रखते हुए समुदाय में रहते हैं;
- जिसके एक मुखिया होते हैं;
- और उनके पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती है।
-
★★“यह जानना रुचिकर है कि प्राचीन भारत में जनजाति के लिए कोई शब्द नहीं था — जनजातियाँ केवल अलग-अलग जन थीं जो एक विशेष परिवेश में रहती थीं, जैसे कि वन या पहाड़।”
-
भारत के संविधान में अंग्रेजी में इनके लिए ‘ट्राइब’ और ‘ट्राइबल कम्युनिटी’ और हिंदी में ‘जनजाति’ शब्द का उपयोग किया गया है।
★★‘जन’ शब्द यहाँ तीसरी बार आता है — और यह अध्याय की सबसे सुंदर आंतरिक कड़ी है। अध्याय 5: ‘भरत’ एक जन था → ‘भारत’ नाम बना। अध्याय 7, पृ. 108: वैदिक समाज 30 से अधिक जनों में संगठित था। अध्याय 7, पृ. 119: जनजातियाँ “केवल अलग-अलग जन थीं”। अर्थात पुस्तक कह रही है कि यह कोई अलग श्रेणी के लोग नहीं थे — वे भी जन ही थे। यह कक्षा में अवश्य जोड़िए।
आँकड़े (पृ. 119)
- आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में भारत के अधिकांश राज्यों में 705 जनजातियाँ निवास करती थीं, जिनकी संख्या लगभग 104 मिलियन थी — यह ऑस्ट्रेलिया और युनाइटेड किंगडम की कुल जनसंख्या से अधिक है।
19वीं शताब्दी की पक्षपातपूर्ण दृष्टि (पृ. 119)★
“19वीं शताब्दी में जनजातियों का अध्ययन करने वाले मानव वैज्ञानिकों ने उन्हें प्राय: सभ्य मानवों की तुलना में ‘आदिम’ या ‘हीन’ बताया है। जनजातीय समुदायों तथा उनकी समृद्ध एवं जटिल संस्कृतियों के गहन अध्ययन के बाद इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण विचारों को अधिकांशत: नकार दिया गया है।”
★यह वाक्य महत्वपूर्ण है और इसे पढ़ाया जाना चाहिए। पुस्तक एक पुरानी, पक्षपाती धारणा का नाम लेकर उसे स्पष्ट रूप से नकारती है।
दोनों दिशाओं में आदान-प्रदान (पृ. 120)★★
“लोक और जनजातीय परंपराओं तथा प्रमुख विचारधाराओं के बीच निरंतर संपर्क होता रहा है। दोनों ही दिशाओं में देवताओं, संकल्पनाओं, दंतकथाओं और रीतियों का आपस में आदान-प्रदान होता रहा है।”
| दिशा | उदाहरण |
|---|---|
| जनजातीय → प्रमुख परंपरा | परंपरा के अनुसार पुरी (ओडिशा) के भगवान जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे। देवी माताओं के जिन विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है, उनके लिए भी यही बात कही जा सकती है। |
| प्रमुख परंपरा → जनजातीय | कुछ जनजातियों में हिंदू देवों को काफी समय पहले ही अपना लिया गया था, और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने रूप हैं — “यह भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर तमिलनाडु तक बहुत अच्छी तरह लिखा गया है।” |
★★यह तालिका इस खंड का हृदय है। पुस्तक जान-बूझकर दोनों दिशाओं के उदाहरण देती है — यह कहने के लिए कि प्रभाव एकतरफ़ा नहीं था। यदि केवल एक दिशा पढ़ाई गई, तो खंड का अर्थ ही बदल जाता है।
यह संपर्क इतनी सहजता से क्यों हुआ (पृ. 120)
“ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि लोक, जनजातियों और हिंदू विश्वास में अनेक समान प्रकार की संकल्पनाएँ थीं।”
- उदाहरण: तीनों में प्राकृतिक तत्वों जैसे कि पर्वतों, नदियों, पेड़ों, पौधों और जंतुओं तथा कुछ पत्थरों को भी पवित्र माना गया, क्योंकि इन सबमें चेतना है।
- जनजातियों द्वारा उन प्राकृतिक तत्वों से संबंधित कई देवताओं की पूजा की जाती है।
चार जनजातीय उदाहरण (पृ. 120–121)★
| जनजाति / क्षेत्र | विवरण |
|---|---|
| टोडा (तमिलनाडु, नीलगिरि पर्वत) | इस पर्वत के 30 से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास स्थान हैं; ये शिखर इतने पवित्र माने गए हैं कि टोडा जनजाति के लोग अपनी अंगुली से इनकी ओर संकेत भी नहीं करते हैं। |
| अरुणाचल प्रदेश की अनेक जनजातियाँ | डोनीपोलो की पूजा करती हैं, जो सूर्य और चंद्रमा के मिले-जुले रूप माने गए हैं और इन्हें आगे चलकर परमात्मा माना गया। |
| मध्य भारत | खंडोबा भगवान के संबंध में भी ऐसा ही है। |
| पूर्वी भारत — मुंडा और संथाल | अन्य दैविक शक्तियों के साथ सिंगबोंगा की पूजा करती हैं, जिन्हें वे परमेश्वर कहते हैं और जिन्होंने यह संपूर्ण विश्व बनाया है। |
★पुस्तक का निष्कर्ष: “देवताओं में इतनी बहुलता के पश्चात, हिंदू धर्म के समान अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है।” यह पृ. 107 के एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति से सीधा जुड़ता है — अनेक नाम, एक सत्य। यह अध्याय की सबसे गहरी कड़ी है।
आंद्रे बेते का उद्धरण (पृ. 121)★★
भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेते —
“भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाली हजारों जातियाँ और जनजातियाँ इतिहास के आरंभिक समय तथा उससे भी पहले से आपस में एक-दूसरे की धार्मिक आस्थाओं और प्रथाओं को प्रभावित करती रही हैं। जनजातीय धर्मों पर हुए हिंदू दर्शन के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, किंतु यह भी सत्य है कि न केवल इसके निर्माण के चरण में, बल्कि इसके पूरे विकास-क्रम में हिंदू दर्शन जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ है।”
★★यह उद्धरण पूरे खंड का सारांश है और अभ्यास प्रश्न 5 का विषय भी। इसका मुख्य बिंदु: पहली दिशा (हिंदू → जनजातीय) सब मानते हैं; बेते दूसरी दिशा (जनजातीय → हिंदू) पर ज़ोर देते हैं — और वह भी केवल आरंभ में नहीं, पूरे विकास-क्रम में। यही वाक्य का असली भार है।
पुस्तक का समापन: “स्पष्ट रूप से, इस लंबे समय के परस्पर संपर्क का परिणाम आपसी समृद्धि रही है। इस प्रकार लोक और जनजातीय मान्यताएँ और प्रथाएँ भारत की सांस्कृतिक जड़ों में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। हम अगले अध्याय में इस विषय को और भी विस्तार से बताएँगे।”
11. आगे बढ़ने से पहले… — पुस्तक का अपना सार (पृ. 121)
- भारत के प्राचीनतम ग्रंथ, वेदों ने अनेक दर्शनों को जन्म दिया। वेदांत और योग इनमें प्रमुख हैं।
- बौद्ध और जैन मत वेदों के प्राधिकार क्षेत्र से परे गए और उन्होंने कुछ विशिष्ट मूल्यों एवं प्रथाओं पर बल दिया।
- यद्यपि इन मतों के सिद्धांत और विधियाँ भिन्न थे, फिर भी इनमें कुछ महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ समान थीं। ये दुख के कारण और अज्ञान के निवारण के साधनों का पता लगाने का सतत प्रयास करते रहे।
- हजारों वर्षों से जनजातीय विश्वास, प्रथाओं तथा कलाओं का हिंदू दर्शन के साथ मेल-जोल होता रहा है। इनके बीच दोनों ओर से अबाधित आदान-प्रदान चलता रहा है। जनजातीय विश्वास प्रथाएँ आम तौर पर भूमि और उसकी विशेषताओं को पवित्र मानती हैं, उनमें प्राय: देवत्व की एक उच्च संकल्पना भी होती है।
12. वटवृक्ष — अध्याय का समापन-चित्र (पृ. 123)★
कैप्शन:
“वटवृक्ष, अध्याय 7 और 8 की विषयवस्तुओं के लिए एक उपयुक्त दृष्टांत तथा भारतीय सभ्यता का उत्कृष्ट प्रतीक है। अपनी गहरी जड़ों, विशाल तने और सभी दिशाओं में फैली शाखाओं के साथ यह व्यापक क्षेत्र में फैलता है और अनेक शताब्दियों तक बना रहता है। यह अनेक प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को आश्रय देता है और अपनी उन शाखाओं को, जो तने से जुड़ी होती हैं, को नई जड़ें बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। निस्संदेह हिंदू दर्शन और बौद्ध व जैन मतों में इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।”
★★यह चित्र पृ. 106 के रूपक को बंद करता है, और वटवृक्ष का चुनाव सटीक है — वटवृक्ष की शाखाएँ नीचे जाकर स्वयं जड़ें बन जाती हैं। अर्थात शाखा और जड़ का भेद मिट जाता है। यही इस अध्याय का पूरा तर्क है: दर्शन एक-दूसरे से निकले भी, और एक-दूसरे को पोसते भी रहे।
कक्षा 6 के लिए इससे बेहतर समापन नहीं हो सकता — और शिक्षक को यह कैप्शन पढ़कर सुनाना चाहिए।
अभ्यास — प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ (पृ. 122)
प्रश्न
- यदि आप नचिकेता होते तो आप यम से कौन-से प्रश्न पूछते? इन्हें 100–150 शब्दों में लिखिए।
- बौद्ध मत के कुछ केंद्रीय विचारों को समझाइए। इन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
- बुद्ध के उस उद्धरण पर कक्षा में चर्चा कीजिए जो इस प्रकार है — “जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में) स्नान करते हैं” ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सबको इसका अर्थ समझ में आ गया है।
- जैन मत के कुछ मुख्य विचारों को समझाइए। इन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
- कक्षा में आंद्रे बेते के कथन पर विचार-विमर्श कीजिए।
- अपने स्थानीय क्षेत्र में लोकप्रिय देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़े त्योहारों की एक सूची बनाइए।
- कक्षा की गतिविधि के रूप में अपने क्षेत्र या राज्य के दो या तीन जनजातीय समूहों की सूची बनाइए। इनमें से कुछ की परंपरा और विश्वास प्रणालियों के बारे में लिखिए।
सही या गलत(पृ. 122)★
- वैदिक ऋचाओं को ताड़-पत्र की पांडुलिपियों पर लिखा गया है।
- वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं।
- वैदिक कथन “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” में ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता की मान्यता प्रकट होती है।
- बौद्ध मत वेदों से अधिक पुराना है।
- जैन मत का उद्भव बौद्ध मत की एक शाखा के रूप में हुआ।
- बौद्ध और जैन मत दोनों ही शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा सभी जीवों को नुकसान न पहुँचाने का समर्थन करते हैं।
- जनजातीय विश्वास परंपराएँ आत्मा और छोटे देवों तक सीमित हैं।
कक्षा गतिविधि(पृ. 122)
- एक नाटक का मंचन कीजिए, जिसमें मृत्यु के देवता यम से अनेक बच्चे नचिकेता के रूप में जीवन के बारे में प्रश्न पूछ रहे हैं।
उत्तर-कुंजी — पुस्तक मेंनहीं छपी हैध्यान
(नीचे के उत्तर अध्याय के भीतर से बने हैं। ये शिक्षक के लिए हैं।)
सही या गलत — उत्तर
| # | उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| 1 | ग़लत | वैदिक ऋचाएँ लिखित रूप में नहीं थीं — उनका मौखिक पाठ किया जाता था, और वे 100 से 200 पीढ़ियों तक स्मृतिबद्ध होकर आगे बढ़ीं (पृ. 106)। |
| 2 | सही | “ये भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और वस्तुत: विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक हैं” (पृ. 106)। |
| 3 | ! ग़लत | एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति का अर्थ है “परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं” — यह परम सत्य की एकता की बात है, ‘ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता’ की नहीं (पृ. 107)। यह सबसे कठिन प्रश्न है। |
| 4 | ग़लत | वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं; बौद्ध मत प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में उभरा और उसने वेदों की प्रभुता को नहीं स्वीकार किया (पृ. 106, 110)। |
| 5 | ग़लत | जैन मत एक स्वतंत्र दर्शन है, और उसे बौद्ध मत से अधिक प्राचीन माना जाता है (पृ. 114) — वह उसकी शाखा नहीं है। |
| 6 | सही | दोनों में अहिंसा केंद्रीय है, और वह विचारों की हिंसा तक फैली है (पृ. 113, 115, 117)। |
| 7 | ग़लत | पुस्तक स्पष्ट कहती है कि अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है — जैसे डोनीपोलो और सिंगबोंगा, “जिन्हें वे परमेश्वर कहते हैं” (पृ. 120–121)। |
प्रश्नों के लिए संकेत
1. नचिकेता होते तो क्या पूछते — यह कल्पना-प्रश्न है, कोई एक सही उत्तर नहीं। अच्छे उत्तर में जीवन, मृत्यु, आत्मा या सही आचरण से जुड़ा कोई गहरा प्रश्न होगा, और कारण भी कि वह प्रश्न क्यों। (नचिकेता का अपना प्रश्न था — “शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है?”)
2. बौद्ध मत के केंद्रीय विचार — ‘अविद्या’ और ‘मोह’ मानवीय कष्ट के स्रोत हैं; अहिंसा (चोट या नुकसान न पहुँचाना); आंतरिक अनुशासन; संघ — भिक्षुओं और भिक्षुणियों का समुदाय; बुद्ध = ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’; और अहिंसा का विस्तार विचारों की हिंसा तक (पृ. 117)।
3. बुद्ध का कथन — आशय यह है कि बाहरी कर्मकांड (नदी में स्नान) से शुद्धता नहीं आती — शुद्ध वह है “जिसमें सत्य और धर्म निवास करते हैं”, अर्थात शुद्धता आचरण और भीतर के सत्य से आती है। (यह चर्चा-प्रश्न है; पुस्तक स्वयं कहती है कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सबको अर्थ समझ आ गया।)
4. जैन मत के मुख्य विचार — अहिंसा (महावीर के कथन सहित); अनेकांतवाद — सत्य के अनेक पक्ष हैं, इसे केवल एक कथन से पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता; अपरिग्रह — असंग्रह, केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना; और सभी जीवों की आपसी संबद्धता और निर्भरता।
5. आंद्रे बेते के कथन पर — मुख्य बिंदु यह है कि प्रभाव दोनों दिशाओं में गया। पहली दिशा (हिंदू दर्शन → जनजातीय धर्म) को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है; बेते जोड़ते हैं कि हिंदू दर्शन भी जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ — और केवल निर्माण के चरण में नहीं, पूरे विकास-क्रम में। पुस्तक के उदाहरण: जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे; और देवी माताओं के विभिन्न रूप।
6 और 7 — ये स्थानीय क्षेत्र पर आधारित हैं और हर कक्षा में अलग होंगे। इनका कोई निश्चित उत्तर नहीं है, और यही उनका उद्देश्य है।
चित्र और बॉक्स — पूरी सूची
| पृष्ठ | विषय |
|---|---|
| 105 | आवरण — एक ऋषि (हम्पी, कर्नाटक) · बुद्ध (भूटान) · महावीर (बिहार) |
| 107 | ध्यान रखें — यूनेस्को की 2008 की मान्यता |
| 107 | पट्टिका — एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति |
| 108 | पट्टिका — “साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें…” (ऋग्वेद के अंतिम मंत्र) |
| 108 | समय-रेखा — बुद्ध और महावीर का जन्म; उपनिषद्; वैदिक दर्शन |
| 109 | आइए पता लगाएँ — नेता का चयन करने वाला समाज (100–150 शब्द) |
| 109 | पट्टिका — अहम् ब्रह्मास्मि · तत् त्वम् असि |
| 110 | आइए विचार करें — सर्वे भवन्तु सुखिन: जैसा संदेश देने वाली अन्य कहानी |
| 111 | श्वेतकेतु — छांदोग्य उपनिषद् (चित्र सहित) |
| 111–112 | नचिकेता — कठोपनिषद् (यम के दरबार का चित्र) |
| 112 | गार्गी और याज्ञवल्क्य — बृहदारण्यक उपनिषद् (राजदरबार का चित्र) |
| 113 | बुद्ध की प्रतिमा; पट्टिका — बुद्ध के दो कथन |
| 114 | लगभग 1800 वर्ष पुरानी पत्थर की कृति — बुद्ध उपदेश देते हुए |
| 114 | आइए पता लगाएँ — कृति पर चर्चा; बौद्ध बहुल राज्य/देश |
| 115 | महावीर वर्धमान का पारंपरिक चित्र; ध्यान रखें — ‘जैन’ शब्द; पट्टिका — अहिंसा पर महावीर का कथन |
| 116 | वानर-राज की कथा दर्शाने वाली पत्थर की कृति (मध्यप्रदेश) |
| 117 | भित्तिचित्र — नई दिल्ली के एक जैन मंदिर से; आइए विचार करें — अहिंसा का विस्तार |
| 118 | एलोरा (महाराष्ट्र) की गुफाएँ; ! आइए विचार करें — ‘धर्म’ शब्द क्यों नहीं |
| 119 | बॉक्स — जनजाति क्या है? |
| 120 | जनजातीय कला (लाल-सफ़ेद भित्ति-अलंकरण); टोडा जनजाति का एक व्यक्ति |
| 121 | आंद्रे बेते का उद्धरण |
| 123 | वटवृक्ष — अध्याय 7 और 8 का प्रतीक |
| 124 | नूडल्स — नोट्स + डूडल्स के लिए ख़ाली पृष्ठ |
| पद | पुस्तक की परिभाषा / अर्थ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| आध्यात्मिक | आत्मा से संबंधित; वर्तमान व्यक्तित्व से परे एक गहरे या ऊँचे आयाम की खोज | 106 |
| साधक | ऐसा व्यक्ति जो इस दुनिया के सत्य को जानना चाहता है — ऋषि, संत, योगी, दार्शनिक | 106 |
| वेद | विद् से — ‘ज्ञान’; चार वेद — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद | 106 |
| ऋचा | वेदों की कविता/गीत के रूप में प्रार्थना | 106 |
| ऋषि / ऋषिका | कवि / कवियत्री — ऋचाओं के रचनाकार | 107 |
| यूनेस्को | संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन | 107 |
| ब्रह्मांड | विश्व की सुव्यवस्थित और संतुलित संरचना | 107 |
| ऋत | सत्य और क्रम, जिसे देवों ने बनाए रखा | 107 |
| वैश्विक दर्शन | विश्व का एक निश्चित दर्शन या समझ, उसका उद्भव या कार्य प्रणाली | 107 |
| जन | लोगों का बड़ा समूह — ऋग्वेद में 30 से अधिक | 108 |
| सभा / समिति | वैदिक शब्द, जो सामूहिकता को इंगित करते हैं | 109 |
| आरोग्यकर्ता | पारंपरिक प्रथाओं से राहत देने या रोग ठीक करने वाला व्यक्ति | 109 |
| उपनिषद् | वैदिक संकल्पनाओं के आधार पर रचित ग्रंथ; पुनर्जन्म और कर्म की संकल्पनाएँ | 109 |
| पुनर्जन्म | बार-बार जन्म लेना | 109 |
| कर्म | हमारे कर्म और कर्म-फल | 109 |
| वेदांत | वह दर्शन जिसके अनुसार सब कुछ एक दैवी तत्व — ब्रह्म — है | 109 |
| ब्रह्म | वह एक दैवी तत्व; कभी-कभी केवल ‘तत्’ — ! ब्रह्मा देव से भिन्न | 109 |
| आत्मन् | स्व, जो प्रत्येक जीव में निवास करता है, पर ब्रह्म का ही स्वरूप | 110 |
| चेतना | जागृत होने का गुण या अवस्था | 110 |
| योग | वह दर्शन, जिसने चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध पाने की विधियाँ विकसित कीं | 110 |
| हिंदू दर्शन | इन सभी दर्शनों से मिलकर बने आधारभूत विचार | 110 |
| संन्यासी | वह व्यक्ति जो चेतना का उच्चतर स्तर पाने के लिए कठोर अनुशासन में रहता है | 110 |
| बुद्ध | ‘ज्ञानी’ या ‘जागृत’ व्यक्ति | 113 |
| अविद्या | अज्ञान — मानवीय कष्ट का एक स्रोत | 113 |
| मोह | किसी व्यक्ति या वस्तु से संबंध की स्थिति, भावना या आदत के माध्यम से | 113 |
| अहिंसा | मूल अर्थ — चोट नहीं पहुँचाना या नुकसान नहीं पहुँचाना | 113 |
| संघ | भिक्षुओं (और भिक्षुणियों) का समुदाय | 113 |
| भिक्षु / भिक्षुणी | सामान्य जीवन त्यागकर व्रत लेने वाला व्यक्ति / महिला भिक्षु | 113 |
| जिन | ‘विजेता’ — ‘जैन’ शब्द इसी से | 115 |
| महावीर | ‘महानायक’ | 115 |
| अनेकांतवाद | ‘केवल एक’ पक्ष या दृष्टिकोण नहीं — सत्य के अनेक पक्ष हैं | 115 |
| अपरिग्रह | ‘असंग्रह’ — केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना | 115 |
| जातक कथाएँ | बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ | 116 |
| विहार | भिक्षुओं के रहने का स्थान | 118 |
| चार्वाक / लोकायत | वह दर्शन जिसके अनुसार भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य है | 118 |
| जनजाति | समान उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा साझा करने वाले परिवारों/वंशों का समूह | 119 |
| वटवृक्ष | भारतीय सभ्यता का उत्कृष्ट प्रतीक — शाखाएँ नई जड़ें बनाती हैं | 123 |
मुख्य संख्याएँ — एक ही जगह
| संख्या | किसकी |
|---|---|
| चार | वेदों की संख्या — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद |
| पाँचवीं से दूसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. | ऋग्वेद की रचना का प्रस्तावित काल |
| 100 से 200 पीढ़ियाँ | वेदों का मौखिक संप्रेषण |
| 2008 | यूनेस्को की मान्यता |
| 30 से अधिक | ऋग्वेद में उल्लिखित जनों की संख्या |
| लगभग ढाई सहस्राब्दी पूर्व | बुद्ध का जन्म |
| 560 सा.सं.पू. | बुद्ध का अनुमानित जन्म वर्ष (अध्याय 4 से) |
| 29 वर्ष | बुद्ध की आयु, जब उन्होंने नगर में घूमने की इच्छा की और चार दृश्य देखे |
| छठी शताब्दी सा.सं.पू. का आरंभ | महावीर का जन्म |
| 30 वर्ष | महावीर की आयु, जब उन्होंने घर त्यागा |
| 12 वर्ष | महावीर को अनंत ज्ञान मिलने में लगा समय |
| 12 वर्ष | श्वेतकेतु का गुरुकुल में बिताया समय |
| लगभग 1800 वर्ष | बुद्ध के उपदेश वाली पत्थर की कृति की आयु |
| छठवीं से दसवीं शताब्दी सा.सं. | एलोरा की गुफाओं का काल |
| 2011 | जनजातीय आँकड़ों का वर्ष |
| 705 | भारत में जनजातियों की संख्या (2011) |
| लगभग 104 मिलियन | जनजातीय जनसंख्या (2011) |
| 30 से अधिक | नीलगिरि के वे शिखर जिन्हें टोडा जनजाति देवी-देवताओं का निवास मानती है |
| 19वीं शताब्दी | जब मानव वैज्ञानिकों ने जनजातियों को ‘आदिम’ कहा (अब नकारा गया) |
भ्रमित करने वाले युग्म — प्रश्न-पत्र के जाल यहीं से बनते हैंध्यान
| भ्रम | सही बात |
|---|---|
| ब्रह्म बनाम ब्रह्मा | ब्रह्म = वह एक दैवी तत्व (वेदांत)। ब्रह्मा देव = एक देवता। पुस्तक स्वयं कोष्ठक में यह भेद बताती है। |
| बुद्ध की 29 बनाम महावीर की 30 | बुद्ध — 29 वर्ष (नगर-भ्रमण और चार दृश्य)। महावीर — 30 वर्ष (गृह-त्याग)। |
| महावीर के 12 बनाम श्वेतकेतु के 12 | महावीर — 12 वर्ष बाद अनंत ज्ञान। श्वेतकेतु — 12 वर्ष गुरुकुल में। दोनों अलग। |
| लुंबिनी बनाम वैशाली | बुद्ध — लुंबिनी (वर्तमान नेपाल)। महावीर — वैशाली के समीप (वर्तमान बिहार)। |
| बोधगया बनाम वैशाली | बोधगया = बुद्ध को ज्ञान मिला (बिहार)। वैशाली = महावीर का जन्म (बिहार)। दोनों बिहार में — इसीलिए मिलते हैं। |
| जैन मत बौद्ध की शाखा? | नहीं। जैन मत स्वतंत्र है और उसे अधिक प्राचीन माना जाता है। |
| वेद लिखे गए थे? | नहीं। मौखिक पाठ किया जाता था; 100–200 पीढ़ियों तक स्मृतिबद्ध। |
| एकं सत् का अर्थ | “परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं” — न कि ‘ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता’। (अभ्यास प्रश्न 3 यहीं फँसाता है।) |
| ‘धर्म’ शब्द | पुस्तक जान-बूझकर ‘धर्म’ नहीं, ‘दर्शन’, ‘मत’, ‘विश्वास’ कहती है (पृ. 118)। |
| अनेकांतवाद बनाम अपरिग्रह | अनेकांतवाद = सत्य के अनेक पक्ष। अपरिग्रह = असंग्रह। |
| चार्वाक | भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य; मृत्यु के बाद जीवन असंभव; लोकप्रिय नहीं हुआ और विलुप्त हो गया। |
| जनजातीय विश्वास ‘छोटे देवों तक सीमित’? | नहीं। अनेक जनजातियों में उच्चतर देवत्व/परमात्मा की संकल्पना है — डोनीपोलो, सिंगबोंगा। |
| प्रभाव की दिशा | दोनों दिशाओं में। जगन्नाथ जनजातीय → प्रमुख; रामायण/महाभारत के जनजातीय रूप प्रमुख → जनजातीय। |
| 705 और 104 मिलियन | 705 = जनजातियों की संख्या। 104 मिलियन = जनसंख्या। दोनों 2011 के आँकड़े। |
शिक्षक के लिए — तीन बातें जो इस अध्याय को खोल देती हैं★
1. वृक्ष का रूपक शुरू में बनाइए और अंत में बंद कीजिए — बीच में मत छोड़िए। पृ. 106 पर जड़ें और शाखाएँ; पृ. 119 पर तना (“यह उस वृक्ष का तना है जिसके उदाहरण से हमने शुरुआत की थी”); पृ. 123 पर वटवृक्ष, जिसकी शाखाएँ स्वयं जड़ें बन जाती हैं। यह तीन-चरण का रूपक ही पूरा अध्याय है। यदि आप बोर्ड पर एक वृक्ष बनाकर कालांश-दर-कालांश उसमें नाम भरवाते जाएँ, तो अध्याय स्वयं पढ़ जाएगा।
2. पृष्ठ 118 का ‘धर्म’ वाला बॉक्स कक्षा से पहले पढ़ लीजिए, और पुस्तक की शब्दावली अपनाइए। पुस्तक ‘धर्म’ नहीं, ‘दर्शन’/‘मत’/‘विश्वास’ कहती है, और कारण भी लिख देती है — कि ‘रिलिजन’ शब्द इन परंपराओं के लिए बहुत सीमित है। यह शैली का नहीं, सोचा-समझा निर्णय है। कक्षा में इसी शब्दावली का पालन कीजिए; इससे चर्चा अपने-आप उस दिशा में नहीं जाती जिसमें नहीं जाना चाहिए।
3. ★तीनों उपनिषद्-कथाओं का असली विषय ‘प्रश्न पूछना’ है — और पुस्तक यह पहले ही बता देती है। “उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है। फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों।” श्वेतकेतु — एक बच्चा जो उत्तर नहीं दे सका और उसका अहंकार टूटा। नचिकेता — एक बच्चा जिसने यम से भी पीछा नहीं छोड़ा। गार्गी — एक ऋषिका, जिसे मना किया गया और उसने फिर भी पूछा — और तभी उत्तर मिला। तीनों को अलग-अलग सुनाने से यह सूत्र छूट जाता है। तीनों के बाद रुककर यह पूछिए: “इन तीनों में एक बात समान है — क्या?”
और कक्षा के अंत में यह कहने लायक है: “इस अध्याय में हर बड़ा विचार किसी के प्रश्न पूछने से आया — और उन प्रश्न पूछने वालों में एक स्त्री थी और दो बच्चे।”