Chapter 3स्थलरूप एवं जीवन

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NCERT — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, अध्याय 3, पृ. 41–58

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कक्षा 6 • सामाजिक विज्ञान • समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे • अध्याय 3 — स्थलरूप एवं जीवन

कक्षा — 6 · विषय — सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) · पृष्ठ — 41 से 58

एक बस लीजिए — झारखंड से उत्तराखंड तक। खिड़की से बाहर देखते रहिए।

छोटा नागपुर से चलिए, प्रयागराज होते हुए अल्मोड़ा पहुँचिए। रास्ते में भूमि तीन बार पूरी तरह बदल जाएगी • और उसके साथ खेत, घर, पेड़ और लोगों का काम भी

अध्याय का आरंभ — अथर्ववेद, ‘भूमि सूक्त’

मनुष्यों के भार से मुक्त; अनेक प्रकार की ऊँचाइयों, ढलानों तथा विशाल समतल भूमि से युक्त; अनेक प्रकार की शक्तियों से संपन्न पेड़-पौधों को आधार प्रदान करती हुई, हम सभी के लिए विस्तार को प्राप्त हो तथा अपनी संपन्नता को प्रदर्शित करे। पृथ्वी मेरी माता है तथा मैं उसकी संतान।

पृ. 41

अध्याय के दो महत्वपूर्ण प्रश्न

पृ. 41

  • स्थलरूपों के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं और जीवन तथा संस्कृति के लिए इनका क्या महत्व है?
  • प्रत्येक स्थलरूप के साथ संबंधित जीवन की क्या चुनौतियाँ एवं अवसर हैं?

इन दो प्रश्नों से बाहर की कोई बात इस अध्याय में नहीं है।

1 | स्थलरूप क्या है | परिभाषा; तीन श्रेणियाँ; तुंगता

भूमि एक जैसी नहीं होती

पृ. 42

  • अन्य स्तनधारी जीवों के समान, मानव भी पृथ्वी पर निवास करता है।
  • भूमि के अनेक रूप और विशेषताएँ हैं; एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में इसका स्वरूप बहुत बदल जाता है।
  • छोटा नागपुर → प्रयागराज → अल्मोड़ा की यात्रा में अलग-अलग दृश्यभूमि (लैंडस्केप) दिखाई देंगी।

रास्ते में तीन प्रकार के स्थलरूप दिखाई देंगे — और यही पूरा अध्याय है।

स्थलरूप — परिभाषा

पृ. 42

  • स्थलरूप पृथ्वी की सतह का एक भौतिक स्वरूप है।
  • स्थलरूप लाखों वर्षों में आकार लेते हैं।
  • पर्यावरण तथा जीवन के साथ इनका महत्वपूर्ण संबंध है।
  • इन्हें व्यापक रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है — पर्वत, पठार और मैदान।

दो माप-पद जो पूरे अध्याय में लौटेंगे

पदपरिभाषा
तुंगता (एल्टीट्यूड)समुद्र तल से किसी वस्तु/लक्ष्य की ऊँचाई
समुद्र तलसमुद्र की सतह का औसत स्तर; ‘माध्य समुद्र तल’ भी

एक ही पृथ्वी, अलग-अलग जीवन

पृ. 42

  • हर स्थलरूप में विभिन्न प्रकार की जलवायु होती है।
  • हर स्थलरूप में अलग-अलग पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु पाए जाते हैं।
  • मानव ने सभी स्थलरूपों के अनुसार स्वयं को ढाला है।
  • किंतु रहने वालों की संख्या विश्व-भर में भिन्न-भिन्न होती है।

2 | पर्वत | पहचान; शृंखलाएँ; नवीन और प्राचीन

पर्वत — तीन पहचान

पृ. 42

  • पर्वत वे स्थलरूप हैं जो आस-पास की भूमि से कुछ अधिक ऊँचे होते हैं।
  • चौड़ा आधार • खड़ी ढलान (चढ़ाई) • सँकरे शिखर (चोटियाँ)
  • कुछ पर्वत अपनी अधिक ऊँचाई के कारण हिम से ढँके होते हैं।

पर्वत बनाम पहाड़ी — यही सबसे बड़ा भ्रम है

पर्वतपहाड़ी
ऊँचाईअधिककम
चढ़ाईखड़ीकम खड़ी
शीर्षसँकरे शिखरगोल आकार

हिम कहाँ पिघलती है, कहाँ नहीं

पृ. 42–43

  • ग्रीष्म ऋतु में कम तुंगता पर हिम पिघल जाती है और जल बनकर नदियों में पहुँचती है।
  • बहुत अधिक ऊँचाइयों पर हिम कभी नहीं पिघलती — ये पर्वत स्थायी रूप से हिम से ढँके रहते हैं।
  • वर्षण = वायुमंडल से भूमि पर किसी भी रूप में जल का गिरना — वर्षा, हिमपात, ओले।

हिम और ओले का गिरना वास्तव में जल का ठोस रूप में गिरना है।

पर्वत शृंखलाएँ

पृ. 45

  • विश्व के अधिकांश पर्वत पर्वत शृंखलाओं के रूप में वर्गीकृत हैं।
  • एशिया में हिमालय • यूरोप में आल्प्स • दक्षिणी अमेरिका में एंडीज
  • कुछ शृंखलाएँ हजारों किलोमीटर तक फैली हुई हैं।

विश्व के छह पर्वत — चित्र 3.2 और 3.3

गिरिशृंगस्थितिविशेषता
एवरेस्टनेपाल–तिब्बत के बीचहिमालय की सबसे ऊँची चोटियों में
कंचनजुंगासिक्किम–नेपाल के बीचहिमालय की दूसरी सबसे ऊँची
अकोंकागुआदक्षिणी अमेरिकाएंडीज की सबसे ऊँची चोटी
किलिमंजारोपूर्वी अफ्रीकापृथक पर्वत — किसी शृंखला का नहीं
ब्लांकपश्चिमी यूरोपआल्प्स का सबसे ऊँचा शिखर
अनाईमुडीकेरलदक्षिण भारत का सबसे ऊँचा

छह में से एक अलग है

किलिमंजारो

यह किसी शृंखला का भाग नहीं — एक पृथक पर्वत है — पृ. 45

नवीन पर्वत और प्राचीन पर्वत

नवीन (युवा)प्राचीन
उदाहरणहिमालयअरावली शृंखला
चोटियाँनुकीलीगोलाकार
कारणहाल ही में निर्मितअपरदन से घिसकर गोल

पर्वत अब भी बन रहे हैं

पृ. 46

  • हिमालय अपेक्षाकृत नवीन है — फिर भी इसे बने लाखों वर्ष हो चुके हैं!
  • उन्नयन और अपरदन आज भी चल रहे हैं।
  • हिमालय की ऊँचाई आज भी बढ़ रही है।

पहाड़ कोई पूरी हो चुकी चीज़ नहीं है — वह अब भी बन रहा है।

3 | पर्वतीय परिवेश | वन; जीव-जंतु; कालिदास

पर्वतीय वन

पृ. 46

  • पर्वतों की ढलानों पर प्राय: पर्वतीय वन होते हैं।
  • यहाँ शंकुधारी वृक्ष मिलते हैं — पाइन (चीड़), फर, स्प्रूस, देवदार।
  • ये ऊँचे, शंकु के आकार के होते हैं; पत्तियाँ पतली, नोंकदार।
  • अधिक ऊँचाई पर पेड़ों की जगह घास, मॉस (काई) और लाइकेन उग जाते हैं।

मॉस और लाइकेन — एक नहीं हैं

पदक्या है
मॉस (काई)फूलों और वास्तविक जड़ों से रहित छोटा हरा पौधा; मखमली आवरण की तरह फैलता है
लाइकेनपौधे के समान जीव, जो चट्टानों, दीवारों या पेड़ों से चिपके होते हैं

पर्वतों में जीवन कहाँ-कहाँ पलता है

पृ. 48

  • घने वन, बहती नदियाँ, झीलें, घास के मैदान और कंदराएँ अनेक जीवों को आश्रय देते हैं।
  • गोल्डन ईगल (सुनहरा गरुड़) • पेरेग्रिन फाल्कन (घुमंतू बाज) • कैनेडियन लिंक्स • हिम तेंदुआ
  • आइबेक्स (जंगली भेड) • हिमालयन तहर • पर्वतीय खरगोश • याक • ग्रे फॉक्स • भालू

कालिदास, ‘कुमारसंभव’ — कम से कम 1500 वर्ष पूर्व

भारत के उत्तरी भाग में देवता सदृश पूजनीय हिमालय नाम का पर्वतों का राजा है, जो पश्चिमी से लेकर पूर्वी समुद्र तक फैला हुआ है। देखकर ऐसा लगता है कि मानो वह पृथ्वी को नापने का मापदंड है।

पृ. 46

कक्षा में सोचिए

पृ. 46

  • ‘पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक’ से क्या तात्पर्य है?
  • गंगा का उल्लेख क्यों किया गया है? (संकेत — इसके अनेक कारण हो सकते हैं)

हिमालय भारत की पूरी उत्तरी सीमा पर आड़ा फैला है — इसीलिए ‘मापदंड’।

4 | पर्वतीय जीवन | कृषि; पर्यटन; चुनौतियाँ

पर्वतों पर खेती कठिन क्यों है

पृ. 49

  • पर्वतीय भूभाग खड़े ढलानों के साथ ऊबड़-खाबड़ होते हैं।
  • इसलिए कुछ ही घाटियों में नियमित रूप से कृषि हो पाती है।
  • ढलानों पर वेदिका कृषि — ढलान को काटकर सीढ़ीनुमा खेत बनाना — प्रचलित प्रथा है।
  • विश्व-भर के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि की जगह पशुपालन को अधिक महत्व दिया जाता है।

पर्यटन — एक ही चीज़, दो पक्ष

अवसर

  • आय का महत्वपूर्ण साधन
  • स्वच्छ हवा और मनोरम दृश्य
  • स्कीइंग, हाइकिंग, पर्वतारोहण, पैरा ग्लाइडिंग
  • शताब्दियों से तीर्थयात्रा

चुनौती

  • बहुत सारे पर्यटक एक साथ आते हैं
  • पर्वतों के पर्यावरण पर दबाव
  • सही संतुलन बनाए रखना कठिन

पृ. 49

दो पर्वतारोही

पृ. 49

  • बछेंद्री पाल — 1984 में एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला; महिलाओं के अनेक अभियानों का नेतृत्व।
  • सम्मान — पद्मश्री (1984) और पद्मभूषण (2019)।
  • अरुणिमा सिन्हा — 22 वर्ष की आयु में दुर्घटना में एक पैर गया; 2013 में एवरेस्ट।
  • उन्होंने विंसन गिरिशृंग सहित सभी महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटियाँ चढ़ीं; 2015 में पद्मश्री।

अरुणिमा को प्रोत्साहन और प्रशिक्षण बछेंद्री पाल से मिला था।

पर्वतीय जीवन की चार आपदाएँ

आपदापुस्तक की परिभाषा
आकस्मिक बाढ़अकस्मात बाढ़ आना; बहुधा बादल फटने से
भूस्खलनचट्टान या भूखंड का अकस्मात टूटकर गिरना
हिमस्खलन (एवलांश)हिम का अकस्मात गिरना; प्राय: हिम पिघलना आरंभ होने पर
बादल फटनाअचानक प्रचंड तूफ़ान सहित वर्षा होना

सात चुनौतियाँ — छह प्राकृतिक, एक हमारी बनाई

पृ. 50

  • प्राकृतिक — आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, भारी हिमपात, बादल फटना, ठंडा मौसम।
  • मानव-निर्मित — पर्यटकों का अनियंत्रित रूप से आ जाना।

पुस्तक का प्रश्न: इतनी चुनौतियों के बाद भी लोग पर्वतों पर क्यों रहते हैं?

पर्वत पवित्र क्यों माने जाते हैं

पृ. 51

  • विश्व-भर के अनेक पारंपरिक समुदाय पर्वतों को पवित्र मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं।
  • एवरेस्ट — 8848 मीटर, विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर।
  • तिब्बती — ‘चोमोलुंगमा’ (जगत जननी) • नेपाली — ‘सागरमाथा’ (आकाश की देवी)
  • कैलाश पर्वत को हिंदू दर्शन, बौद्ध मत, जैन मत और बॉन के अनुयायी पवित्र मानते हैं।

5 | पठार | परिभाषा; खनिज; जल प्रपात

पठार — परिभाषा

पृ. 51

  • पठार आस-पास की भूमि से उठी हुई स्थलाकृति है, जिसकी सतह प्राय: चपटी होती है।
  • इसके कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले होते हैं।
  • पर्वतों के समान कुछ पठार नवीन और कुछ प्राचीन हो सकते हैं।
  • ऊँचाई — कुछ सौ मीटर से कई हजार मीटर तक।

तिब्बत का पठार

4500 मीटर औसत ऊँचाई

इसीलिए इसे ‘विश्व की छत’ कहा जाता है — पृ. 51

दो पठार, जो याद रखने हैं

पृ. 51

  • तिब्बत का पठार — विश्व का सबसे बड़ा और ऊँचा पठार। पूर्व से पश्चिम लगभग 2500 किलोमीटर — चंडीगढ़ से कन्याकुमारी की दूरी जितना।
  • दक्कन का पठार — मध्य और दक्षिण भारत में; विश्व के सबसे पुराने पठारों में से एक।
  • यह कई लाख वर्ष पहले ज्वालामुखी की सक्रियता के कारण बना था।

गंगा भी लगभग 2500 कि.मी. लंबी है — पर वह नदी की लंबाई है, पठार की नहीं।

पठार = खनिजों का भंडार-गृह

पृ. 51

  • पठारों में खनिजों का प्रचुर मात्रा में जमाव होता है।
  • इसीलिए इन्हें ‘खनिजों का भंडार-गृह’ कहा जाता है।
  • खनन पठारों की मुख्य गतिविधि है; विश्व की सबसे बड़ी खानें यहीं मिलती हैं।
  • पूर्वी अफ्रीका का पठार — सोना और हीरा • छोटा नागपुर का पठार — लौह, कोयला, मैंगनीज

पठार और कृषि — नियम और उसका अपवाद

मिट्टीकृषि
अधिकांश पठारचट्टानी मिट्टीकम अनुकूल
लावा पठारसमृद्ध काली मिट्टीउपजाऊ

चार जल प्रपात

जल प्रपातनदीस्थान
विक्टोरियाजम्बेजीअफ्रीका
हुंडरूसुवर्ण रेखाछोटा नागपुर पठार
जोगशरावतीपश्चिमी घाट
नहकालीकाई—चेरापूंजी (मेघालय) — 340 मीटर

6 | मैदान | निर्माण; जीवन; नदियाँ

मैदान — परिभाषा

पृ. 53

  • मैदान का धरातल विस्तृत सपाट अथवा हल्का तरंगित होता है।
  • इसमें कोई ऊँची पहाड़ियाँ अथवा गहरी घाटियाँ नहीं पाई जातीं।
  • सामान्यत: मैदान की ऊँचाई समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक नहीं होती।

मैदान कैसे बनता है — पूरी शृंखला

पृ. 53

  • पर्वत शृंखलाओं से नदियाँ निकलती हैं → उनकी बाढ़ से समतल भूमि बनती है।
  • नदियाँ रेत, चट्टानों के कण और गाद एकत्र करती हैं — इन्हें तलछट कहते हैं।
  • नदियाँ तलछट को बहाकर लाती हैं और जमा कर देती हैं → मिट्टी उपजाऊ बनती है।
  • फलस्वरूप मैदान सभी प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त होते हैं।

इसीलिए मैदानों में लोगों का मुख्य आर्थिक व्यवसाय कृषि होता है।

गंगा का मैदान

लगभग 40 करोड़ लोग

भारत की कुल जनसंख्या की एक-चौथाई से अधिक — पृ. 55

मैदानी जीवन

पृ. 54–55

  • हजारों वर्ष पहले आरंभिक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के आस-पास विकसित हुई थीं।
  • आज भी विश्व की अधिकांश जनसंख्या मैदानों में रहती है।
  • मुख्य व्यवसाय — मत्स्य पालन और कृषि।
  • खाद्य फसलें — चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी)।
  • रेशेदार फसलें — कपास, जूट और सन।

सिंचाई — फिर वही दो पक्ष

लाभ

  • परंपरागत कृषि वर्षा पर निर्भर थी
  • अब नहरों का जाल (नेटवर्क)
  • भूमिगत जल पंप से निकालकर सिंचाई
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि

कीमत

  • भूमिगत जलस्तर में गिरावट
  • कृषि के भविष्य पर चुनौती
  • बढ़ती हुई जनसंख्या
  • प्रदूषण

पृ. 55

नदियाँ केवल जल नहीं लातीं

पृ. 55

  • विश्व में बहने वाली नदियाँ बहुत से सांस्कृतिक मूल्यों का वहन करती हैं।
  • बहुत से समुदाय नदी के स्रोत और संगम स्थल को पवित्र मानते हैं।
  • भारत में इन स्थानों पर त्योहार, समारोह और धार्मिक कृत्य किए जाते हैं।
  • मैदान में हल्की ढलान होती है, अत: नौका-संचालन सुगम होता है।

आज भी गंगा के किनारे लोग आने-जाने के लिए नौकाओं का प्रयोग करते हैं।

गंगा और उसकी सहायक नदियाँ

नदीकहाँ से निकलती है
गंगाहिमालय — लगभग 2500 कि.मी., हिमालय की विशालतम भारतीय नदी
यमुनाहिमालय — गंगा की सहायक
घाघराहिमालय — गंगा की सहायक
सोनविंध्यांचल की शृंखलाएँ

7 | मरुस्थल एवं संस्कृति | चौथा स्थलरूप; तिणै; सार

पुस्तक स्वयं कहती है — तीन पर्याप्त नहीं

पृ. 56

  • स्थलरूपों का स्वरूप जटिल है; विशेषज्ञ कुछ और स्थलरूपों के बारे में भी बताते हैं।
  • इनमें से एक मरुस्थल है — यदा-कदा वर्षा, दूर-दूर तक शुष्कता का फैलाव।
  • मरुस्थलों का वनस्पति जगत और प्राणि जगत विलक्षण होता है।

गर्म और ठंडे मरुस्थल

प्रकारउदाहरण
गर्मसहारा (अफ्रीका) • थार (भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में)
ठंडागोबी (एशिया)
विशेषज्ञों का मतकुछ अंटार्कटिक महाद्वीप को भी मरुस्थल मानते हैं

मरुस्थल में भी जीवन है

पृ. 56

  • कठिन परिस्थितियों के बाद भी लोगों ने मरुस्थलों के पर्यावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लिया है।
  • थार मरुस्थल के समुदाय लोक गीतों और किंवदंतियों या दंत कथाओं जैसी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर सँजोकर रखते हैं।

मानव ने सभी स्थलाकृतियों में अपने घर बनाए हैं — यह हमारे अनुकूलन और लचीलेपन का साक्षी है।

तमिल संगम की पाँच तिणै

तिणैदृश्यभूमिमुख्य व्यवसाय
कुरिंजीपर्वतीय क्षेत्रआखेट और संग्रह करना
मुल्लाईघास के मैदान और वनपशु पालन
मरूदमउपजाऊ कृषि के मैदानकृषि
नेयदलतटीय क्षेत्रमत्स्य पालन और समुद्री यात्रा
पालैशुष्क, मरुस्थल जैसे प्रदेशघुमंतू और युद्धरत

तिणै हमें क्या सिखाते हैं

पृ. 57

  • ये अब तक देखे गए स्थलरूपों से भिन्न प्रकार का वर्गीकरण हैं।
  • ये विविधता वाले प्रदेशों और उनकी विशेषताओं के प्रति गहन जागरूकता दिखाते हैं।
  • ये हमारे और पर्यावरण के बीच गहन संबंध को दर्शाते हैं।

पुस्तक कहती है — तिणै का विवरण याद रखने की आवश्यकता नहीं है, अवधारणा समझने की है।

अध्याय एक स्लाइड में

पृ. 57

  • स्थलरूप तीन प्रकार के होते हैं — पर्वत, पठार और मैदान; उनकी भौतिक विशेषताएँ और पर्यावरण बहुत अलग-अलग हैं।
  • लोगों के क्रियाकलाप उस स्थलरूप से संबंधित होते हैं जिसमें वे निवास करते हैं; ये स्थलरूप विश्व की संस्कृति के अभिन्न भाग हैं।
  • प्रत्येक स्थलरूप, चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों को भी प्रस्तुत करता है।

छोटा नागपुर पठार • प्रयागराज मैदान • अल्मोड़ा पर्वत — बस वही यात्रा, जहाँ से हम चले थे।