Chapter 2भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

Teaching notes30 minSources checked

NCERT, आर्थिक विकास की समझ (कक्षा 10), अध्याय 2

This note is written in Hindi.Read in Hindi →

कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 19 से 37

यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।

किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना

पृष्ठ 19–21 — आर्थिक गतिविधियाँ और तीन क्षेत्रक

कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. तीन क्षेत्रक

किताब कहाँ से शुरू करती है। चित्रों से। किताब कहती है कि चित्रों में लोग अलग-अलग आर्थिक गतिविधियों में लगे हैं: कुछ गतिविधियाँ वस्तुएँ बनाती हैं, कुछ सेवाएँ, और ये हमारे चारों ओर हर समय चलती रहती हैं। इन्हें समझने का एक तरीका है कि कुछ ज़रूरी मानदंडों पर इन्हें समूहों में बाँटा जाए: “इन समूहों को क्षेत्रक भी कहते हैं।” (पृष्ठ 19)

हमारी ओर से — पाँच चित्र, एक सवाल। पृष्ठ 19 के पाँचों चित्र खोलिए: ईंटें पाथते लोग, सिर पर सामान ढोता कुली, कपास चुनती महिलाएँ, कपड़े की दुकान, और साइकिल पर काग़ज़ों का बंडल लेकर आया व्यक्ति। हर चित्र पर पूछिए: यह व्यक्ति प्रकृति से कुछ ले रहा है, कुछ बना रहा है, या कोई सेवा दे रहा है? उत्तर इस दिशा में आएँ: कपास चुनना प्रकृति से लेना है; ईंट पाथना मिट्टी से कुछ बनाना है; कुली, दुकान और काग़ज़ पहुँचाने वाला सेवा दे रहे हैं। अभी क्षेत्रकों के नाम मत बताइए; बोर्ड पर बस तीन खाने बनाइए और चित्र उनमें रखवाइए।

फिर किताब के तीन नाम (पृष्ठ 20)।

  • प्राथमिक क्षेत्रक: प्राकृतिक संसाधनों के सीधे उपयोग वाली गतिविधियाँ। कपास के पौधों के लिए हम मुख्य रूप से, पर पूरी तरह नहीं, वर्षा, धूप और जलवायु पर निर्भर हैं; इसलिए कपास प्राकृतिक उत्पाद है। दूध भी प्राकृतिक उत्पाद है।
  • द्वितीयक क्षेत्रक: प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण से दूसरे रूप में बदलना: कपास से सूत और कपड़ा, गन्ने से चीनी और गुड़, मिट्टी से ईंट। इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहते हैं।
  • तृतीयक क्षेत्रक: सेवाएँ, जो पहले दोनों क्षेत्रकों के विकास में मदद करती हैं: परिवहन, भण्डारण, संचार, बैंक, व्यापार। शिक्षक, डॉक्टर, धोबी, नाई, मोची और वकील की सेवाएँ भी इसी में हैं। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं।

यहीं रुकिए। “मुख्यत:, न कि पूर्णतया” पर पूछिए: कपास के लिए किसान प्रकृति के अलावा किन चीज़ों पर निर्भर है? किताब अगले ही पन्ने पर, तालिका 2.1 में, ट्रैक्टर, पम्पसेट, बिजली, कीटनाशक और उर्वरक का नाम लेती है; यही उत्तर है। यहीं से अगली बात खुलती है कि तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर टिके हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। पृष्ठ 21 की सूची के दर्जी को तृतीयक लिख देना, क्योंकि वह घर या छोटी दुकान पर काम करता है। किताब कहती है कि विनिर्माण कारखाने में ही नहीं, कार्यशाला या घर में भी हो सकता है। दर्जी कपड़े से कमीज़ बनाता है, यानी नई वस्तु; इसलिए यह द्वितीयक है। बाक़ी भूलें संदर्शिका की आठ आम भूलें में हैं।

इसी हिस्से में। तालिका 2.1 के आपसी रिश्ते और पृष्ठ 21 के “आओ–इन पर विचार करें” के चार सवाल संदर्शिका के पृष्ठ 21 के कार्यकलाप में हैं। दोहराने के लिए फ़्लैशकार्ड 1–15।

पृष्ठ 22–23 — तीन क्षेत्रकों की तुलना: कुल उत्पादन की गणना

कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. कुल उत्पादन की गणना

किताब कहाँ से शुरू करती है। कारें, कम्प्यूटर, कीलें और फ़र्नीचर गिनती में आपस में नहीं जुड़ते, इसलिए अर्थशास्त्री संख्या नहीं, मूल्य जोड़ते हैं (पृष्ठ 22)। किताब के दो हिसाब: 10,000 कि.ग्रा. गेहूँ ₹20 प्रति कि.ग्रा. पर बिके, तो मूल्य ₹2,00,000; 5000 नारियल ₹15 प्रति नारियल पर बिकें, तो ₹75,000।

हमारी ओर से — बिस्कुट वाला सवाल, उत्तर से पहले। बोर्ड पर किताब की कड़ी लिखिए: किसान ने गेहूँ ₹20 प्रति कि.ग्रा. पर आटा-मिल को बेचा; मिल ने आटा ₹25 प्रति कि.ग्रा. पर बिस्कुट कंपनी को बेचा; कंपनी ने बिस्कुट के 4 पैकेट ₹80 में बेचे, ₹20 प्रति पैकेट। अब पूछिए: तो कुल उत्पादन 20 + 25 + 80 = 125 रुपये हुआ? कई बच्चे हाँ कहेंगे। फिर पूछिए कि ₹80 के बिस्कुट में आटा कहाँ है। उत्तर: ₹80 में आटे के ₹25 पहले से शामिल हैं, और आटे में गेहूँ के ₹20; तीनों जोड़ें, तो गेहूँ का मूल्य तीन बार और आटे का दो बार गिना जाएगा। इसलिए सिर्फ़ अंतिम वस्तु, ₹80 का बिस्कुट, गिना जाता है।

स.घ.उ. और जी.वी.ए. (पृष्ठ 23)। हर क्षेत्रक की अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य जोड़ें, तो देश का सकल घरेलू उत्पाद बनता है। बच्चे कॉपी में यह पंक्ति लिखें: “स. घ. उ. अर्थव्यवस्था की विशालता प्रदर्शित करता है।” (पृष्ठ 23) भारत में इसे मापने का कठिन काम केन्द्र सरकार का एक मंत्रालय करता है, राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों के सरकारी विभागों की मदद से। हाल में सरकार ने, वैश्विक प्रथाओं की तरह, क्षेत्रकों के लिए सकल मूल्य वर्धित (जी.वी.ए.) का प्रयोग शुरू किया है; दोनों का पूरा अंतर किताब ऊँची कक्षाओं के लिए छोड़ती है। किताब के शब्दों में दोनों परिभाषाएँ संदर्शिका के मुख्य शब्दों में हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बीच की, यानी मध्यवर्ती, वस्तुओं को भी जोड़ देना; और यह मान लेना कि स.घ.उ. वस्तुओं की गिनती है, उनका मूल्य नहीं।

इसी हिस्से में। फ़्लैशकार्ड 16–25।

पृष्ठ 23–24 — क्षेत्रकों में ऐतिहासिक परिवर्तन

कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. ऐतिहासिक परिवर्तन

किताब कहाँ से शुरू करती है। ज़्यादातर विकसित देशों के इतिहास से, तीन चरणों में (पृष्ठ 23):

  1. शुरुआत में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण था। खेती सुधरी तो उत्पादन बढ़ा, शिल्पी और व्यापारी बढ़े, और लोग परिवहन, प्रशासन और सेना में भी जाने लगे; फिर भी ज़्यादातर लोग इसी क्षेत्रक में थे।
  2. सौ वर्षों से ज़्यादा समय बाद विनिर्माण की नई प्रणाली से कारखाने फैले। खेतों के बहुत से लोग कारखानों में काम करने लगे; किताब बताती है कि उन्हें इसके लिए मजबूर भी किया गया। उत्पादन और रोज़गार, दोनों में द्वितीयक क्षेत्रक सबसे आगे हो गया।
  3. पिछले 100 वर्षों में विकसित देशों में द्वितीयक से तृतीयक की ओर बदलाव हुआ। कुल उत्पादन में सेवा क्षेत्रक का महत्त्व बढ़ा, और ज़्यादातर श्रमजीवी लोग इसी में काम करते हैं।

हमारी ओर से — एक पट्टी, जो कालांश 10 तक रहे। चार्ट पेपर की एक पट्टी पर लिखिए: प्राथमिक → द्वितीयक → तृतीयक: उत्पादन भी बदला, रोज़गार भी। इसे दीवार पर लगा दीजिए। भारत की कहानी ठीक इसी जगह अलग होती है, और कालांश 10 में यह पट्टी फिर काम आएगी।

यह सवाल पूछिए (हमारी ओर से)। आपके दादा-दादी या नाना-नानी के समय गाँव के ज़्यादातर लोग क्या काम करते थे, और अब क्या करते हैं? बच्चे घर से पूछकर आएँ। उत्तर हर घर का अलग होगा; उन्हें बोर्ड के तीन खानों में रखिए, पर किसी एक घर के उत्तर को पूरे देश की बात मत बनाइए।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 23 के “आओ–इन पर विचार करें” के उत्तर संदर्शिका के पृष्ठ 23 के कार्यकलाप में हैं।

पृष्ठ 24–25 — उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्त्व

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्त्व

किताब कहाँ से शुरू करती है। भारत के दो आलेखों से। आलेख 1 (पृष्ठ 24) 1977–78 और 2017–18 में तीनों क्षेत्रकों का जी.वी.ए. रुपये (करोड़) में दिखाता है, और आलेख 2 (पृष्ठ 25) उसी जी.वी.ए. में तीनों की प्रतिशत हिस्सेदारी। दंडों पर मान नहीं छपे हैं, इसलिए बच्चे बात शब्दों में कहें: चालीस वर्षों में सभी क्षेत्रकों का उत्पादन बढ़ा, सबसे ज़्यादा तृतीयक का; और 2017–18 में तृतीयक क्षेत्रक प्राथमिक की जगह लेकर सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन गया।

हमारी ओर से — आलेख पढ़ना सिखाइए। पहले तीन चीज़ें पढ़वाइए: शीर्षक, नीचे लिखे दोनों वर्ष, और खड़े अक्ष की इकाई, रुपये (करोड़)। फिर बस इतना पूछिए कि किस वर्ष का दंड ऊँचा है और किस क्षेत्रक का हिस्सा सबसे ज़्यादा बढ़ा। सटीक संख्या मत माँगिए। पृष्ठ 24 के कार्यकलाप के तीसरे सवाल में “तीस वर्षों में” छपा है, पर आलेख 1977–78 से 2017–18 तक, यानी चालीस वर्षों का है; बच्चों को चालीस वर्ष ही बताइए।

तृतीयक क्षेत्रक क्यों बढ़ा: किताब के चार कारण।

  1. बुनियादी सेवाएँ, जैसे अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक एवं तार, थाना, कचहरी, परिवहन, बैंक, बीमा कंपनी; विकासशील देश में इनकी ज़िम्मेदारी सरकार उठाती है।
  2. कृषि और उद्योग जितना बढ़ेंगे, परिवहन, व्यापार और भण्डारण जैसी सेवाओं की माँग उतनी बढ़ेगी।
  3. आय बढ़ने पर कुछ लोग रेस्तरां, पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, निजी विद्यालय और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी सेवाएँ माँगने लगते हैं।
  4. सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित नई सेवाएँ ज़रूरी हो गई हैं और इनका उत्पादन तेज़ी से बढ़ रहा है।

यहीं रुकिए। किताब की अगली बात ज़रूरी है: सेवा क्षेत्रक दो तरह के लोगों को काम देता है (पृष्ठ 25)। एक ओर सीमित संख्या में ऐसी सेवाएँ, जिनमें बहुत कुशल और शिक्षित श्रमिक हैं; दूसरी ओर बहुत बड़ी संख्या में छोटी दुकानों, मरम्मत और परिवहन जैसी सेवाओं के लोग, जो मुश्किल से गुज़ारा कर पाते हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा अवसर नहीं। इसलिए सेवा क्षेत्रक के कुछ ही भागों का महत्त्व बढ़ रहा है।

यह सवाल पूछिए (हमारी ओर से)। अपने कस्बे या गाँव की कोई तीन सेवाएँ बताइए। हर एक इन दो तरह के लोगों में से किसकी है? जैसे मोबाइल मरम्मत की छोटी दुकान दूसरी तरह में आएगी, और अस्पताल का डॉक्टर पहली तरह में।

इसी हिस्से में। आलेख 1 वाले सवाल संदर्शिका के पृष्ठ 24 के कार्यकलाप में हैं, और पृष्ठ 24 के हाशिये का सवाल किताब के अपने सवाल में। पिछले और इस कार्ड के लिए फ़्लैशकार्ड 26–37।

पृष्ठ 25–27 — अधिकांश लोग कहाँ नियोजित हैं: अल्प बेरोज़गारी

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. लोग कहाँ काम करते हैं

किताब कहाँ से शुरू करती है। उत्पादन में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी बदली, पर रोज़गार में वैसा बदलाव नहीं हुआ। आलेख 3 (पृष्ठ 25) के अनुसार 1977–78 में 71 प्रतिशत श्रमिक प्राथमिक क्षेत्रक में थे, और 2017–18 में 44 प्रतिशत; आज भी यही सबसे बड़ा नियोक्ता है। तीनों क्षेत्रकों के पूरे आँकड़े संदर्शिका के तथ्य एक नज़र में में हैं।

कारण। द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में रोज़गार के पर्याप्त अवसर नहीं बने। सेवा क्षेत्रक में उत्पादन 14 गुना बढ़ा, पर रोज़गार 5 गुना से भी कम; उद्योग में भी रोज़गार लगभग 3 गुना ही बढ़ा। नतीजा: सबसे ज़्यादा श्रमिक प्राथमिक क्षेत्रक में हैं, पर जी.वी.ए. में उसका योगदान लगभग एक-छठा ही है। पृष्ठ 26 के पाठ में यहाँ “आधे से अधिक श्रमिक” छपा है, पर आलेख 3 में 2017–18 का आँकड़ा 44 प्रतिशत है।

उत्पादन में आगे कौन, रोज़गार में आगे कौन

उत्पादन में2017–18 में तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ाआलेख 1 और 2
रोज़गार में2017–18 में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे बड़ाआलेख 3: 44 प्रतिशत श्रमिक
वजहउत्पादन जितना बढ़ा, रोज़गार उतना नहीं
  • सेवाएँ: उत्पादन 14 गुना, रोज़गार 5 गुना से भी कम
  • उद्योग: रोज़गार लगभग 3 गुना ही
नतीजाप्राथमिक में सबसे ज़्यादा श्रमिकपर जी.वी.ए. में हिस्सा लगभग एक-छठा
NCERT, पृष्ठ 25–26

हमारी ओर से — लक्ष्मी की कहानी धीरे पढ़िए। लक्ष्मी छोटी किसान है: दो हेक्टेयर असिंचित भूमि, जो सिर्फ़ वर्षा पर निर्भर है, और उस पर ज्वार और अरहर। परिवार के पाँचों सदस्य साल भर उसी खेत पर काम करते हैं। भूस्वामी सुखराम एक-दो सदस्यों को भाड़े पर ले जाता है, फिर भी खेत का उत्पादन नहीं घटता, और परिवार की आय बढ़ जाती है (पृष्ठ 26)। कहानी पढ़ते हुए बीच में मत रुकिए; सवाल अंत में।

यहीं रुकिए। पूछिए: लक्ष्मी के परिवार में कोई बेकार बैठा है? बच्चे कहेंगे नहीं, सब काम पर हैं। फिर पूछिए: दो लोग सुखराम के यहाँ गए, तो खेत का उत्पादन कितना घटा? उत्तर: बिलकुल नहीं घटा; यानी वे दो लोग खेत पर ज़रूरी नहीं थे, हर किसी को पूरा काम नहीं था। अब किताब की पंक्ति लिखवाइए: “इस प्रकार की अल्प बेरोज़गारी को छिपी हुई बेरोज़गारी कहते हैं” (पृष्ठ 26)। इसे प्रच्छन्न बेरोज़गारी भी कहते हैं।

शहर में भी। प्लम्बर, पेन्टर और मरम्मत करने वाले जैसे हज़ारों अनियत श्रमिक रोज़ काम खोजते हैं, और कई को रोज़ काम नहीं मिलता। सड़कों पर ठेला खींचने या चीज़ें बेचने वाले लोगों के बारे में किताब कहती है: “जहाँ वे पूरा दिन बिता देते हैं, परन्तु बहुत कम कमा पाते हैं।” (पृष्ठ 26)

बच्चे यहाँ अटकते हैं। छिपी हुई बेरोज़गारी को “कोई काम नहीं” समझ लेना; जिसके पास कोई काम नहीं और जो बेकार बैठा है, वह खुली बेरोज़गारी है। दोनों का भेद संदर्शिका के प्रश्न 9 से 13 में प्रश्न 11 के उत्तर में है।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 27 का कार्यकलाप संदर्शिका के पृष्ठ 27 के कार्यकलाप में है। फ़्लैशकार्ड 38–50।

पृष्ठ 27–29 — अतिरिक्त रोज़गार का सृजन

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. अतिरिक्त रोज़गार

किताब कहाँ से शुरू करती है। फिर लक्ष्मी से (पृष्ठ 27)। सरकार कुछ पैसा ख़र्च करे या बैंक कर्ज़ दे, और उसके खेत की सिंचाई के लिए कुआँ बने, तो वह रबी में दूसरी फसल, गेहूँ, उगा सकेगी। किताब मान लेती है कि एक हेक्टेयर गेहूँ दो लोगों को 50 दिन काम देता है; यानी परिवार के दो और सदस्यों को अपनी ही ज़मीन पर काम मिल जाएगा। और कई खेतों की सिंचाई के लिए नया बाँध बने या नहर खुदे, तो खेती में रोज़गार के बहुत से अवसर बनेंगे।

किताब के बाक़ी रास्ते।

  • गाँवों में सड़कें, परिवहन और भण्डारण बेहतर हों, तो किसान उपज बेच सकें, और परिवहन और व्यापार में भी काम बने।
  • लक्ष्मी को बीज, उर्वरक, उपकरण और पम्पसेट के लिए साहूकार से ऊँचे ब्याज पर उधार लेना पड़ता है। स्थानीय बैंक उचित ब्याज पर कर्ज़ दें, तो यह बोझ हटे। साख के बारे में बच्चे इसी किताब के अध्याय 3, मुद्रा और साख, में पढ़ेंगे। पृष्ठ 28 पर “अध्याय–4 मुद्रा एवं साख” छपा है, पर इस किताब में मुद्रा और साख अध्याय 3 है।
  • अर्द्ध-ग्रामीण इलाक़ों में दाल मिल, शीत भण्डारण, वन क्षेत्रों के पास के गाँवों में शहद संग्रह केन्द्र, और सब्ज़ियों और कृषिगत उत्पादों का प्रसंस्करण। शीत भण्डारण में किसान आलू और प्याज़ रखकर अच्छी कीमत मिलने पर बेच सकेंगे।
  • शिक्षा: भारत में 60 प्रतिशत जनसंख्या 5–29 वर्ष की है, और इनमें से लगभग 51 प्रतिशत ही विद्यालय जाते हैं। योजना आयोग (अब नीति आयोग) के एक अध्ययन के अनुसार अकेले शिक्षा में लगभग 20 लाख रोज़गार बन सकते हैं। स्वास्थ्य के लिए गाँवों में और डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य कर्मचारी चाहिए।
  • हर प्रदेश की अपनी संभावना: पर्यटन, क्षेत्रीय शिल्प, सूचना प्रौद्योगिकी। पर्यटन सुधरे, तो हर साल 35 लाख से ज़्यादा लोगों को काम मिल सकता है।

काम का अधिकार (पृष्ठ 29)। किताब कहती है कि चर्चा किए गए कुछ सुझावों के अमल में लंबा समय लगेगा। इसलिए छोटी अवधि के लिए केन्द्र सरकार ने लगभग 625 जिलों में काम का अधिकार लागू करने का कानून बनाया, म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005। इसमें काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले सभी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में साल में 100 दिन के रोज़गार की गारंटी थी; सरकार काम न दे पाए, तो बेरोज़गारी भत्ता; और ऐसे कामों को वरीयता, जिनसे भूमि से उत्पादन बढ़े। किताब के अनुसार 2025 में इस अधिनियम का स्थान विकसित भारत-रोज़गार गारंटी और आजीविका मिशन (विकसित भारत - जी राम जी 2025) ने ले लिया।

हमारी ओर से — अपने इलाक़े का चार्ट। चार्ट पेपर पर किताब के रास्ते एक-एक पंक्ति में लिखिए। चार-पाँच बच्चों के समूह तय करें कि हमारे इलाक़े में इनमें से कौन-सा रास्ता सबसे पहले काम आएगा, और क्यों। हर उत्तर किताब के किसी एक रास्ते से जुड़ा हो; इलाक़े की अपनी जानकारी, जैसे पास में कौन-सी नहर या कौन-सा काम-धंधा है, बच्चे घर के बड़ों से पूछकर लाएँ।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। 100 दिन को साल भर का काम समझ लेना; गारंटी साल में 100 दिन के रोज़गार की है, और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए है।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 28 के हाशिये का सवाल संदर्शिका के किताब के अपने सवाल में है, और पृष्ठ 29 का कार्यकलाप पृष्ठ 29 के कार्यकलाप में। फ़्लैशकार्ड 51–62।

पृष्ठ 30–31 — संगठित और असंगठित क्षेत्रक

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. संगठित और असंगठित

किताब कहाँ से शुरू करती है। दो पड़ोसियों, कान्ता और कमल, से (पृष्ठ 30)। यहीं से दूसरी कसौटी खुलती है: रोज़गार की परिस्थितियाँ। दोनों को दो बच्चों से पढ़वाने का तरीका नीचे कक्षा की गतिविधियों में है।

किताब का बँटवारा। संगठित क्षेत्रक में वे उद्यम आते हैं जो सरकार से पंजीकृत हैं और जहाँ कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, सेवानुदान अधिनियम, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम जैसे कानून माने जाते हैं। वहाँ काम नियमित और सुनिश्चित है, समय तय है, ज़्यादा काम पर अतिरिक्त वेतन है, और सवेतन छुट्टी, भविष्य निधि, सेवानुदान, चिकित्सीय लाभ और सेवानिवृत्ति पर पेंशन मिलती है। असंगठित क्षेत्रक छोटी और बिखरी इकाइयों का है, जो ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं: वेतन कम, काम प्रायः अनियमित, और बिना कारण हटाया जा सकता है। किताब के शब्दों में परिभाषाएँ संदर्शिका के मुख्य शब्दों में हैं।

यहीं रुकिए। पूछिए: असंगठित क्षेत्रक में कानून हैं ही नहीं, या हैं पर माने नहीं जाते? किताब के हिसाब से उत्तर दूसरा है: नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। संगठित को सरकारी समझ लेना। बड़े निजी कारखाने का नियमित श्रमिक भी संगठित क्षेत्रक में है (उदाहरण हमारी ओर से)। और किताब कहती है कि अपना काम करने वाले लोग भी संगठित क्षेत्रक में हो सकते हैं, अगर वे सरकार के पास पंजीकृत हों और नियम मानें।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 31 के “आओ–इन पर विचार करें” में असंगठित गतिविधियों की पहचान और श्रमिकों की संख्या वाली तालिका है। हमारी ओर से: तालिका बोर्ड पर ख़ाली खानों के साथ लिखिए और बच्चे ख़ुद जोड़-घटाकर भरें; पहला ख़ाली खाना प्राथमिक क्षेत्रक के असंगठित श्रमिकों का है, जो कुल में से संगठित घटाकर निकलता है। भरे हुए खाने और प्रतिशत संदर्शिका के पृष्ठ 31 के कार्यकलाप में हैं। फ़्लैशकार्ड 63–77।

पृष्ठ 31–32 — असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण

कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. असंगठित श्रमिकों का संरक्षण

किताब कहाँ से शुरू करती है। समस्या क्यों बढ़ी (पृष्ठ 32): संगठित क्षेत्रक में रोज़गार बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है; कई संगठित उद्यम असंगठित की तरह काम करते हैं, ताकि कर से बच सकें और श्रमिकों की रक्षा करने वाले कानून न मानने पड़ें; और सन् 1990 से संगठित क्षेत्रक के बहुत से श्रमिक रोज़गार खोकर कम वेतन पर असंगठित क्षेत्रक में काम करने को विवश हैं। इसलिए असंगठित क्षेत्रक में ज़्यादा रोज़गार के साथ संरक्षण और सहायता भी चाहिए।

किसे संरक्षण चाहिए।

कौनकिताब के उदाहरण और ज़रूरतपृष्ठ
गाँव के श्रमिकभूमिहीन कृषि श्रमिक, छोटे और सीमांत किसान, फसल बँटाईदार, कारीगर (बुनकर, लुहार, बढ़ई, सुनार); लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवार छोटे और सीमांत किसान हैं, जिन्हें समय पर बीज, उपकरण, साख, भण्डारण और विपणन की सुविधा चाहिए32
शहर के श्रमिकलघु उद्योगों के श्रमिक; निर्माण, व्यापार और परिवहन के आकस्मिक श्रमिक; सड़क के विक्रेता, सिर पर बोझा ढोने वाले, वस्त्र बनाने वाले, कबाड़ उठाने वाले; लघु उद्योगों को कच्चा माल पाने और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद चाहिए32
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के श्रमिकअसंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले ज़्यादातर श्रमिक इन्हीं वर्गों से हैं32

हमारी ओर से — यह पंक्ति धीरे पढ़िए। किताब कहती है कि ये श्रमिक कम और अनियमित मज़दूरी के साथ सामाजिक भेदभाव भी झेलते हैं। इसे तथ्य की तरह, शांत स्वर में पढ़िए। कक्षा में किसी बच्चे या परिवार की जाति लेकर उदाहरण मत बनवाइए; बात श्रमिकों की हालत पर रखिए।

यह सवाल पूछिए (हमारी ओर से)। ऊपर की सूची के कौन-से लोग आपके आसपास काम करते हैं, और उन्हें सबसे पहले किस चीज़ की ज़रूरत है? उत्तर किताब की ज़रूरतों से जोड़िए: छोटे किसान के लिए समय पर बीज, साख और भण्डारण; सड़क के विक्रेता या निर्माण के आकस्मिक श्रमिक के लिए संरक्षण।

इसी हिस्से में। किताब का निष्कर्ष है कि आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को संरक्षण और सहायता अनिवार्य है। यही प्रश्न 14 और 22 के उत्तरों का आधार है: संदर्शिका के प्रश्न 14 से 18 और प्रश्न 19 से 24। फ़्लैशकार्ड 78–84।

पृष्ठ 33–34 — सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 9. सार्वजनिक और निजी

किताब कहाँ से शुरू करती है। तीसरी कसौटी, स्वामित्व से: परिसंपत्तियों का मालिक कौन है और सेवाएँ देने की ज़िम्मेदारी किसकी है (पृष्ठ 33)। सार्वजनिक क्षेत्रक में ज़्यादातर परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व है, जैसे रेलवे और डाकघर; निजी क्षेत्रक में एक व्यक्ति या कंपनी का, जैसे टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (टिस्को) और रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड। निजी क्षेत्रक का ध्येय लाभ कमाना है; सार्वजनिक क्षेत्रक का ध्येय सिर्फ़ लाभ कमाना नहीं, और उसका ख़र्च करों या दूसरे तरीकों से पूरा होता है।

सरकार ख़र्च क्यों करती है। तीन तरह की बातें: बहुत महँगी सुविधाएँ, जैसे सड़कें, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली और बाँध से सिंचाई; जिन कामों को सरकारी समर्थन चाहिए, जैसे उद्योगों के लिए ऐसी दर पर बिजली जिस पर वे ख़रीद सकें, क्योंकि उत्पादन-मूल्य पर बिजली बिके तो अनेक इकाइयाँ, ख़ासकर छोटी इकाइयाँ, बंद हो सकती हैं; और किसानों से उचित मूल्य पर गेहूँ और चावल ख़रीदकर राशन की दुकानों से उपभोक्ताओं को कम मूल्य पर बेचना; और सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा: “इन पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है।” (पृष्ठ 34) पूरा उत्तर संदर्शिका के प्रश्न 19 से 24 में प्रश्न 20 के नीचे है।

यहीं रुकिए। पृष्ठ 34 के तथ्य एक-एक करके बोलिए: भारत में निरक्षरों की संख्या विश्व में सबसे ज़्यादा है; भारत के लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और उनमें से एक-चौथाई गंभीर रूप से बीमार हैं; ओडिशा (36) और मध्य प्रदेश (43) की शिशु मृत्यु दर विश्व के कुछ सबसे निर्धन भागों से भी ज़्यादा है। फिर पूछिए: ये काम कौन करेगा, जिसका ध्येय सिर्फ़ लाभ है, या जिसका नहीं? उत्तर सार्वजनिक क्षेत्रक की ओर ले जाए। किताब यहाँ पहले अध्याय की याद भी दिलाती है; विकास वाले अध्याय की सार्वजनिक सुविधाओं वाली बात यहीं जुड़ती है (विकास: शिक्षण टिप्पणियाँ)।

हमारी ओर से — एक काम, तीन सवाल। अब तीनों कसौटियाँ पूरी हो गईं। एक ही काम को तीनों पर रखकर दिखाइए:

एक काम, तीन सवाल

सरकारी स्कूल का शिक्षकसेवा देता हैकार्य का स्वभाव: तृतीयक
काम की शर्तेंनियमित काम, नियम माने जाते हैंरोज़गार: संगठित
मालिकसरकारस्वामित्व: सार्वजनिक
सब्ज़ी बेचने वालासेवा देता हैकार्य का स्वभाव: तृतीयक
काम की शर्तेंसड़क पर अपना छोटा कामरोज़गार: असंगठित
मालिकवह ख़ुदस्वामित्व: निजी
NCERT, पृष्ठ 20, 30–31, 33

दोनों का पहला उत्तर एक है, बाक़ी दो अलग। यही दिखाता है कि तीनों कसौटियाँ अलग-अलग सवाल पूछती हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। निजी को असंगठित समझ लेना। स्वामित्व और रोज़गार की परिस्थितियाँ दो अलग कसौटियाँ हैं; बड़े निजी कारखाने का नियमित श्रमिक निजी भी है और संगठित भी (उदाहरण हमारी ओर से)।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 33 का “स्मरण कीजिए” और “ज्ञात करें” संदर्शिका के पृष्ठ 33 के कार्यकलाप में हैं। फ़्लैशकार्ड 85–93।

पृष्ठ 34 — सारांश और समापन

कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 10. सार

किताब का सारांश। किताब अध्याय को तीन बँटवारों में समेटती है (पृष्ठ 34)। पहला: गतिविधि प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयक में से किस क्षेत्रक की है; भारत के आँकड़े दिखाते हैं कि जी.डी.पी. में सबसे ज़्यादा योगदान तृतीयक क्षेत्रक का है, पर रोज़गार ज़्यादातर प्राथमिक क्षेत्रक में ही मिलता है; और रोज़गार बढ़ाने के लिए क्या किया जा सकता है। दूसरा: संगठित या असंगठित; ज़्यादातर लोग असंगठित क्षेत्रक में काम करते हैं, और उनके लिए संरक्षण अनिवार्य है। तीसरा: सार्वजनिक और निजी; सार्वजनिक गतिविधियों को कुछ निश्चित क्षेत्रों पर केन्द्रित करना क्यों अनिवार्य है।

हमारी ओर से — तीन सवाल, बच्चे बोलें। बोर्ड पर लिखिए: काम किस तरह का है? काम की शर्तें कैसी हैं? मालिक कौन है? हर सवाल के आगे बच्चे क्षेत्रकों के नाम बोलें: पहले के आगे प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक; दूसरे के आगे संगठित, असंगठित; तीसरे के आगे सार्वजनिक, निजी। फिर कालांश 3 वाली पट्टी (उत्पादन भी बदला, रोज़गार भी) दीवार से उतारिए और पूछिए कि भारत के लिए इसमें क्या बदलना होगा। उत्तर: भारत में उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक आगे निकला, रोज़गार में नहीं; सबसे ज़्यादा लोग अब भी प्राथमिक क्षेत्रक में हैं।

इसी हिस्से में। समय कम पड़े, तो संदर्शिका की छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें देखिए।

कक्षा की गतिविधियाँ

पृष्ठ 30 की गतिविधि — कान्ता और कमल, दो आवाज़ों में

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश

किताब के पृष्ठ 30 के बॉक्स में दो पड़ोसी हैं। कान्ता एक कार्यालय में सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक काम करती है; उसे हर माह के अंत में नियमित वेतन, भविष्य निधि, चिकित्सीय और अन्य भत्ते और रविवार को सवेतन अवकाश मिलता है, और उसके पास नियुक्ति-पत्र है जिसमें काम की शर्तें लिखी हैं। कमल किराने की दुकान पर सुबह 7.30 से शाम 8 बजे तक काम करता है; उसे दैनिक मज़दूरी मिलती है, और जिस दिन वह काम नहीं करता, उस दिन की मज़दूरी नहीं मिलती; मज़दूरी के सिवा कोई भत्ता नहीं, कोई छुट्टी या सवेतन अवकाश नहीं, और कोई औपचारिक पत्र नहीं; उसे कभी भी काम से हटाया जा सकता है।

हमारी ओर से। दो बच्चे सामने आएँ: एक कान्ता बनकर, एक कमल बनकर, और अपने दिन का हाल अपनी ज़ुबान में बोलें, जैसे मैं सुबह साढ़े नौ बजे दफ़्तर पहुँचती हूँ…। बाक़ी कक्षा कॉपी में दो कॉलम बनाए और सुनते हुए हर फ़र्क़ लिखे: समय, वेतन, छुट्टी, भत्ते, पत्र। फिर पूछिए: कमल किसी दिन बीमार पड़ जाए, तो उस दिन क्या होगा? उत्तर किताब के बॉक्स में ही है: उस दिन की मज़दूरी नहीं मिलेगी, और कोई भत्ता भी नहीं। कान्ता को चिकित्सीय भत्ता मिलता है। आख़िर में बच्चे दोनों कॉलमों के ऊपर नाम लिखें: संगठित और असंगठित।

पृष्ठ 36 की गतिविधि — आसपास के कामों का चार्ट

कालांश 9 के बाद · पाठ योजना · इंटरैक्टिव: परियोजना

किताब की प्रश्नावली का आठवाँ प्रश्न कहता है कि जीविका के लिए काम करने वाले अपने आसपास के वयस्कों के सभी कामों की लंबी सूची बनाइए, उन्हें वर्गीकृत कीजिए और अपने चयन की व्याख्या कीजिए। किताब के पृष्ठ 18 पर शिक्षकों के लिए निर्देश भी यही कहता है: बच्चों को आसपास के कामकाजी लोगों, जैसे दुकान के मालिक, अनियत श्रमिक, सब्ज़ी विक्रेता, कार्यशाला मैकेनिक और घरेलू काम करने वालों, से बात करने को प्रोत्साहित कीजिए, कि वे कैसे रहते और काम करते हैं, और फिर बच्चे ख़ुद गतिविधियों का वर्गीकरण करें।

हमारी ओर से। हर बच्चा घर या पड़ोस से दो काम लाए। चार्ट पेपर पर चार कॉलम बनाइए: काम, कार्य का स्वभाव, रोज़गार की परिस्थिति, स्वामित्व। हर बच्चा अपनी पर्ची पढ़े, और कक्षा मिलकर तीनों कॉलम भरे; जहाँ असहमति हो, वहाँ दोनों पक्ष कारण बोलें। चार्ट दीवार पर रहे और अध्याय भर उसमें काम जुड़ते रहें; पृष्ठ 18 का निर्देश अख़बार की कतरनें लाने को भी कहता है; किसी कतरन में कोई काम आए, तो वह भी। नमूने की पंक्तियाँ संदर्शिका में प्रश्न 8 के उत्तर में हैं। किसी के माता-पिता के काम पर टिप्पणी नहीं; काम लिखिए, नाम नहीं।

पृष्ठ 35–37 — प्रश्नावली

कालांश 10 · कालांश 10 का कार्ड · इंटरैक्टिव: अभ्यास

इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:

अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड दीजिए।