यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं। आँकड़े किताब के हैं; परीक्षा में यही लिखिए।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (प्रश्न 1–24) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
यह अध्याय आर्थिक गतिविधियों को तीन अलग कसौटियों से बाँटता है, और हर बँटवारे से एक अलग सवाल का जवाब मिलता है।
एक ही अर्थव्यवस्था, बाँटने के तीन तरीके
अध्याय की तीन बड़ी बातें:
- उत्पादन बदला, रोज़गार नहीं: 1977–78 से 2017–18 के बीच तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ा उत्पादक बन गया, पर सबसे ज़्यादा लोग अब भी प्राथमिक क्षेत्रक में काम करते हैं। इससे कृषि में अल्प (छिपी हुई) बेरोज़गारी है।
- ज़्यादातर लोग असंगठित क्षेत्रक में हैं, जहाँ वेतन कम है, काम पक्का नहीं है और संरक्षण नहीं है।
- कुछ काम सरकार को ही करने पड़ते हैं: महँगी सुविधाएँ, उद्योगों और किसानों को समर्थन, और सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा।
2. ज़रूरी शब्द★
किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 2, 9, 10, 11, 15 (इन्हीं शब्दों से उत्तर बनते हैं)
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| क्षेत्रक | किसी कसौटी के आधार पर बनाया गया आर्थिक गतिविधियों का एक समूह। | 19 |
| प्राथमिक क्षेत्रक | प्राकृतिक संसाधनों के सीधे उपयोग से वस्तुएँ बनाना, जैसे कपास की खेती, डेयरी, मछली पकड़ना, खनिज निकालना। इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहते हैं। | 20 |
| द्वितीयक क्षेत्रक | प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण से दूसरे रूप में बदलना, जैसे रेशे से कपड़ा, गन्ने से चीनी, मिट्टी से ईंट। इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहते हैं। | 20 |
| तृतीयक क्षेत्रक | वे गतिविधियाँ जो ख़ुद वस्तुएँ नहीं बनातीं, बल्कि उत्पादन में मदद करती हैं या सेवाएँ देती हैं, जैसे परिवहन, भण्डारण, संचार, बैंक, व्यापार। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं। | 20 |
| अंतिम वस्तुएँ और सेवाएँ | वे वस्तुएँ जो उपभोक्ता तक पहुँचती हैं, जैसे बिस्कुट। | 22 |
| मध्यवर्ती वस्तुएँ | वे वस्तुएँ जो अंतिम वस्तु बनाने में इस्तेमाल होती हैं, जैसे बिस्कुट के लिए गेहूँ और आटा। | 22 |
| सकल घरेलू उत्पाद (स.घ.उ.) | किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य; यानी तीनों क्षेत्रकों के उत्पादन का जोड़। | 23 |
| सकल मूल्य वर्धित (जी.वी.ए.) | करों और सब्सिडी का समायोजन करके तीनों क्षेत्रकों का योगदान। सरकार अब क्षेत्रकों के लिए इसी का प्रयोग करती है। | 23 |
| बुनियादी सेवाएँ | अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक, थाना, कचहरी, रक्षा, परिवहन, बैंक जैसी सेवाएँ जिनकी हर देश को ज़रूरत है। | 24 |
| अल्प बेरोज़गारी | लोग काम तो कर रहे हैं, पर सब अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं; किसी को पूरा काम नहीं मिला। | 26 |
| छिपी हुई (प्रच्छन्न) बेरोज़गारी | ऐसी अल्प बेरोज़गारी जिसमें हर व्यक्ति काम करता दिखता है, इसलिए बेरोज़गारी दिखती नहीं; कुछ लोगों को हटा दें तो भी उत्पादन नहीं घटता। | 26 |
| खुली बेरोज़गारी | जिनके पास कोई काम नहीं है और जो बेकार बैठे हैं। | 26 |
| काम का अधिकार | काम माँगने वाले को काम देने की कानूनी गारंटी; म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005 इसी के लिए बना था। | 29 |
| संगठित क्षेत्रक | सरकार से पंजीकृत उद्यम और कार्य-स्थान, जहाँ रोज़गार नियमित है और सरकारी नियमों का पालन होता है। | 30 |
| असंगठित क्षेत्रक | छोटी-छोटी, बिखरी इकाइयाँ, जो ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं; नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता। | 31 |
| सार्वजनिक क्षेत्रक | जहाँ ज़्यादातर परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व है और सरकार ही सेवाएँ देती है, जैसे रेलवे, डाकघर। | 33 |
| निजी क्षेत्रक | जहाँ परिसंपत्तियों का स्वामित्व और सेवाएँ देने की ज़िम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या कंपनी की है, जैसे टिस्को, रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड। | 33 |
3. तीन क्षेत्रक: प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक★★
पृष्ठ 19–21 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1 (ख, ङ, च), 2 (ब), 4 (क), 6, 8, 9
पहली कसौटी है कार्य का स्वभाव: गतिविधि प्रकृति से सीधे कुछ लेती है, कुछ बनाती है, या सेवा देती है?
तीन क्षेत्रक और उनका आपसी रिश्ता
- प्राथमिक क्यों? क्योंकि यह उन सभी उत्पादों का आधार है जो हम आगे बनाते हैं। कपास की फसल के लिए हम मुख्यतः, न कि पूरी तरह, वर्षा, धूप और जलवायु पर निर्भर हैं; इसलिए कपास प्राकृतिक उत्पाद है। दूध भी प्राकृतिक उत्पाद है।
- द्वितीयक: यहाँ वस्तुएँ प्रकृति से सीधे नहीं आतीं, बनाई जाती हैं। विनिर्माण कारखाने, कार्यशाला या घर में भी हो सकता है।
- तृतीयक: ये गतिविधियाँ वस्तुएँ नहीं, सेवाएँ बनाती हैं। कुछ सेवाएँ उत्पादन में सीधे मदद नहीं करतीं, फिर भी ज़रूरी हैं: शिक्षक, डॉक्टर, धोबी, नाई, मोची, वकील, और प्रशासन और लेखा का काम करने वाले लोग।
तीनों क्षेत्रक परस्पर-निर्भर हैं (तालिका 2.1, पृष्ठ 21):
| उदाहरण | यह क्या दिखाता है |
|---|---|
| किसान चीनी मिल को गन्ना बेचने से मना कर दें, तो मिल बंद हो जाएगी | द्वितीयक क्षेत्रक प्राथमिक पर निर्भर है |
| कंपनियाँ भारत से कपास न ख़रीदकर बाहर से मँगाएँ, तो कपास की खेती कम लाभकारी रह जाएगी | प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक (कपड़ा उद्योग) पर निर्भर है |
| उर्वरक और पम्पसेट महँगे हों, तो खेती की लागत बढ़ेगी और किसान का लाभ घटेगा | प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक (उर्वरक, पम्पसेट बनाने वाले उद्योग) पर निर्भर है |
| ट्रांसपोर्टर हड़ताल कर दें, तो शहरों में भोजन की कमी होगी और किसान उपज नहीं बेच पाएँगे | प्राथमिक क्षेत्रक तृतीयक (परिवहन) पर निर्भर है, और उद्योग व सेवा क्षेत्रक में काम करने वाले लोग भोजन के लिए प्राथमिक पर |
पहली पंक्ति का उत्तर किताब में छपा है; बाकी तीन आपको भरनी हैं, ऊपर भरी हुई दी गई हैं।
4. कुल उत्पादन कैसे गिनें: अंतिम वस्तुएँ, स.घ.उ. और जी.वी.ए.★★
पृष्ठ 22–23 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2 (स), 7, 24
कारों, कम्प्यूटरों, कीलों और फ़र्नीचर की संख्या आपस में नहीं जोड़ी जा सकती। इसलिए अर्थशास्त्री संख्या नहीं, मूल्य जोड़ते हैं:
- 10,000 कि.ग्रा. गेहूँ ₹20 प्रति कि.ग्रा. पर बिके, तो मूल्य ₹2,00,000।
- 5000 नारियल ₹15 प्रति नारियल पर बिकें, तो मूल्य ₹75,000।
सावधानी: सिर्फ़ अंतिम वस्तुएँ गिनी जाती हैं।
गेहूँ से बिस्कुट तक: कौन-सा मूल्य गिना जाए?
- स.घ.उ. की परिभाषा: अलग-अलग क्षेत्रकों के उत्पादन का जोड़ देश का सकल घरेलू उत्पाद है। किताब के शब्दों में: “यह किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है।”
- “स. घ. उ. अर्थव्यवस्था की विशालता प्रदर्शित करता है।”
- भारत में स.घ.उ. मापने का कठिन काम केन्द्र सरकार का एक मंत्रालय करता है, राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों के सरकारी विभागों की मदद से।
- जी.वी.ए.: हाल में सरकार ने, वैश्विक प्रथाओं की तरह, क्षेत्रकों के लिए स.घ.उ. की जगह सकल मूल्य वर्धित का प्रयोग शुरू किया है। “जी.वी.ए. करों तथा सब्सिडी के लिए समायोजन के बाद अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों के योगदान को मापता है।” दोनों का पूरा अंतर आप ऊँची कक्षाओं में पढ़ेंगे।
5. क्षेत्रकों में ऐतिहासिक परिवर्तन★
पृष्ठ 23 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 12 (तुलना के लिए); गतिविधि पृष्ठ 23 और 27
ज़्यादातर विकसित देशों का इतिहास तीन चरण दिखाता है:
- शुरुआत में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण था। खेती सुधरी, तो ज़्यादा उत्पादन होने लगा, शिल्पी और व्यापारी बढ़े, लोग परिवहन, प्रशासन और सेना में भी जाने लगे। फिर भी ज़्यादातर वस्तुएँ प्राकृतिक थीं और ज़्यादातर लोग इसी क्षेत्रक में थे।
- फिर द्वितीयक क्षेत्रक: लंबे समय (सौ वर्षों से ज़्यादा) बाद, विनिर्माण की नई प्रणाली से कारखाने फैले। खेतों के बहुत से लोग कारखानों में काम करने लगे; किताब बताती है कि उन्हें इसके लिए मजबूर भी किया गया। कुल उत्पादन और रोज़गार, दोनों में द्वितीयक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया।
- फिर तृतीयक क्षेत्रक: पिछले 100 वर्षों में विकसित देशों में द्वितीयक से तृतीयक की ओर बदलाव हुआ। कुल उत्पादन में सेवा क्षेत्रक का महत्त्व बढ़ा और ज़्यादातर श्रमजीवी लोग इसी में नियोजित हैं।
याद रखिए: विकसित देशों में उत्पादन और रोज़गार, दोनों साथ-साथ बदले। भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ, यह आगे के दो हिस्सों में है।
6. भारत में उत्पादन: तृतीयक क्षेत्रक सबसे आगे★★
पृष्ठ 24–25 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2 (द), 12, 13
आलेख 1 (पृष्ठ 24) 1977–78 और 2017–18 में तीनों क्षेत्रकों का जी.वी.ए. रुपये (करोड़) में दिखाता है; आलेख 2 (पृष्ठ 25) उसी जी.वी.ए. में तीनों की प्रतिशत हिस्सेदारी। दोनों के दंडों पर मान नहीं लिखे हैं, इसलिए इनसे बात शब्दों में कहिए:
- चालीस वर्षों में सभी क्षेत्रकों का उत्पादन बढ़ा, पर सबसे ज़्यादा वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई।
- 2017–18 में तृतीयक क्षेत्रक ने प्राथमिक की जगह ले ली और सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन गया।
- 2017–18 में जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का योगदान लगभग एक-छठा है (पृष्ठ 26); बाकी हिस्सा द्वितीयक और तृतीयक का है।
तृतीयक क्षेत्रक इतना महत्त्वपूर्ण क्यों हुआ? किताब के चार कारण:
- बुनियादी सेवाएँ: हर देश को अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक एवं तार, थाना, कचहरी, ग्रामीण प्रशासनिक कार्यालय, नगर निगम, रक्षा, परिवहन, बैंक, बीमा कंपनी चाहिए। विकासशील देश में इनकी ज़िम्मेदारी सरकार उठाती है।
- कृषि और उद्योग का विकास: इनसे परिवहन, व्यापार, भण्डारण जैसी सेवाओं की माँग बढ़ती है। प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक जितना बढ़ेंगे, ऐसी सेवाओं की माँग उतनी बढ़ेगी।
- आय बढ़ने पर: कुछ लोग रेस्तरां, पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, निजी विद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी सेवाएँ माँगने लगते हैं; बड़े नगरों में यह बदलाव तेज़ी से दिखता है।
- सूचना और संचार प्रौद्योगिकी: इन पर आधारित नई सेवाएँ ज़रूरी हो गई हैं और इनका उत्पादन तेज़ी से बढ़ रहा है।
पर सभी सेवाएँ बराबर नहीं बढ़ रहीं (पृष्ठ 25). सेवा क्षेत्रक दो तरह के लोगों को काम देता है:
| एक ओर | दूसरी ओर |
|---|---|
| सीमित संख्या में ऐसी सेवाएँ, जिनमें बहुत कुशल और शिक्षित श्रमिकों को रोज़गार मिलता है | बहुत बड़ी संख्या में लोग छोटी दुकानों, मरम्मत, परिवहन जैसी सेवाओं में, जो मुश्किल से गुज़ारा कर पाते हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा अवसर नहीं |
इसलिए सेवा क्षेत्रक के कुछ ही भागों का महत्त्व बढ़ रहा है।
7. रोज़गार नहीं बदला: अल्प बेरोज़गारी★★
पृष्ठ 25–27 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1 (क), 10, 11
स.घ.उ. में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी बदली, पर रोज़गार में वैसा बदलाव नहीं हुआ। आलेख 3 (पृष्ठ 25), रोज़गार में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी (%):
| वर्ष | प्राथमिक | द्वितीयक | तृतीयक |
|---|---|---|---|
| 1977–78 | 71 | 11 | 18 |
| 2017–18 | 44 | 25 | 31 |
- प्राथमिक क्षेत्रक आज भी सबसे बड़ा नियोक्ता है।
- कारण: द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में रोज़गार के पर्याप्त अवसर नहीं बने। उत्पादन रोज़गार से बहुत तेज़ बढ़ा: सेवा क्षेत्रक में उत्पादन 14 गुना बढ़ा, पर रोज़गार 5 गुना से भी कम; उद्योग में भी रोज़गार लगभग 3 गुना ही बढ़ा।
- नतीजा: प्राथमिक क्षेत्रक में सबसे ज़्यादा श्रमिक हैं, पर जी.वी.ए. में उसका योगदान लगभग एक-छठा ही है। पृष्ठ 26 के पाठ में यहाँ “आधे से अधिक श्रमिक” छपा है, पर आलेख 3 में 2017–18 का आँकड़ा 44 प्रतिशत है।
लक्ष्मी का उदाहरण (पृष्ठ 26):
लक्ष्मी का खेत: सब काम पर, फिर भी बेरोज़गारी
किताब के शब्द: “इस प्रकार की अल्प बेरोज़गारी को छिपी हुई बेरोज़गारी कहते हैं”, क्योंकि यह उन लोगों की बेरोज़गारी से अलग है जिनके पास कोई काम नहीं है और जो बेकार बैठे हैं (खुली बेरोज़गारी)। इसे प्रच्छन्न बेरोज़गारी भी कहते हैं। भारत में लक्ष्मी जैसे लाखों किसान हैं।
शहरों में भी अल्प बेरोज़गारी: सेवा क्षेत्रक में हज़ारों अनियत श्रमिक रोज़ काम खोजते हैं, जैसे प्लम्बर, पेन्टर, मरम्मत करने वाले; कई को रोज़ काम नहीं मिलता। सड़कों पर ठेला खींचने या चीज़ें बेचने वाले लोग, “जहाँ वे पूरा दिन बिता देते हैं, परन्तु बहुत कम कमा पाते हैं।”
| खुली बेरोज़गारी | छिपी हुई (प्रच्छन्न) बेरोज़गारी | |
|---|---|---|
| काम | कोई काम नहीं, बेकार बैठे हैं | काम करते दिखते हैं, पर क्षमता से कम |
| दिखती है? | साफ़ दिखती है | छिपी रहती है, क्योंकि सब काम पर हैं |
| कुछ लोग हटें तो | सवाल ही नहीं, वे काम पर नहीं हैं | उत्पादन नहीं घटता |
| उदाहरण | काम खोजता बेरोज़गार व्यक्ति | लक्ष्मी का परिवार; शहर के अनियत श्रमिक |
8. अतिरिक्त रोज़गार कैसे बने★★
पृष्ठ 27–29 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 17, 23
रोज़गार बढ़ाने के किताब के तरीके
- लक्ष्मी की ज़रूरत सिर्फ़ पानी नहीं (पृष्ठ 28): बीज, उर्वरक, उपकरण और पम्पसेट के लिए उसे साहूकार से ऊँचे ब्याज पर उधार लेना पड़ता है। इसलिए पानी के साथ किसानों को सस्ता कृषि साख भी चाहिए। इसके बारे में आप इसी किताब के अध्याय 3, मुद्रा और साख, में पढ़ेंगे। पृष्ठ 28 पर “अध्याय–4 मुद्रा एवं साख” छपा है, पर इस किताब में मुद्रा और साख अध्याय 3 है।
- शीत भण्डारण: किसान आलू और प्याज़ रख सकेंगे और अच्छी कीमत मिलने पर बेच सकेंगे।
- स्कूल न जाने वाले बच्चे (पृष्ठ 28–29): भारत में 60 प्रतिशत जनसंख्या 5–29 वर्ष की है, और इनमें से लगभग 51 प्रतिशत ही विद्यालय जाते हैं। ये बच्चे भी स्कूल जाएँ, तो और भवन, अध्यापक और कर्मचारी चाहिए। योजना आयोग (अब नीति आयोग) के एक अध्ययन के अनुसार अकेले शिक्षा क्षेत्र में लगभग 20 लाख रोज़गार बन सकते हैं।
म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005 (पृष्ठ 29): ऊपर चर्चा किए गए कुछ सुझावों के अमल में लंबा समय लगेगा, इसलिए छोटी अवधि के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 625 जिलों में काम का अधिकार लागू करने का कानून बनाया।
- काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले सभी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में साल में 100 दिन के रोज़गार की गारंटी।
- सरकार काम न दे पाए, तो बेरोज़गारी भत्ता।
- ऐसे कामों को वरीयता, जिनसे भूमि से उत्पादन बढ़े।
किताब के अनुसार 2025 में इस अधिनियम का स्थान विकसित भारत-रोज़गार गारंटी और आजीविका मिशन (विकसित भारत - जी राम जी 2025) ने ले लिया।
9. संगठित और असंगठित क्षेत्रक★★
पृष्ठ 30–31 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1 (ग, घ), 5, 15, 16
दूसरी कसौटी है रोज़गार की परिस्थितियाँ: काम की शर्तें क्या हैं, और क्या कोई नियम माने जाते हैं?
कान्ता और कमल: दो पड़ोसी, दो तरह का रोज़गार
- सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक
- हर माह के अंत में नियमित वेतन
- भविष्य निधि, चिकित्सीय और अन्य भत्ते
- रविवार को सवेतन अवकाश
- नियुक्ति-पत्र, जिसमें शर्तें लिखी हैं
- सुबह 7.30 से शाम 8 बजे तक
- दैनिक मज़दूरी; जिस दिन काम नहीं, उस दिन पैसा नहीं
- मज़दूरी के सिवा कोई भत्ता नहीं
- कोई छुट्टी या सवेतन अवकाश नहीं
- कोई औपचारिक पत्र नहीं; कभी भी हटाया जा सकता है
| संगठित क्षेत्रक | असंगठित क्षेत्रक | |
|---|---|---|
| पंजीकरण | सरकार से पंजीकृत; औपचारिक प्रक्रिया और कार्यविधि | छोटी, बिखरी इकाइयाँ, ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर |
| नियम | कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, सेवानुदान अधिनियम, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम जैसे कानूनों का पालन | नियम हैं, पर पालन नहीं होता |
| काम | नियमित, सुनिश्चित; रोज़गार-सुरक्षा | कम वेतन, प्रायः अनियमित; बिना कारण हटाया जा सकता है; कुछ मौसमों में छुट्टी दे दी जाती है |
| समय | निश्चित समय; ज़्यादा काम पर अतिरिक्त वेतन | अतिरिक्त समय के काम का कोई प्रावधान नहीं |
| लाभ | सवेतन छुट्टी, भविष्य निधि, सेवानुदान, चिकित्सीय लाभ, पेयजल और सुरक्षित कार्य-पर्यावरण, सेवानिवृत्ति पर पेंशन | सवेतन छुट्टी, बीमारी की छुट्टी जैसा कुछ नहीं |
- अपना काम करने वाले लोग भी संगठित क्षेत्रक में हो सकते हैं, अगर वे सरकार के पास पंजीकृत हैं और नियमों का पालन करते हैं।
- असंगठित क्षेत्रक में बहुत से लोग अपना छोटा काम करते हैं, जैसे सड़क पर बेचना या मरम्मत। किसान भी अपने खेत पर काम करते हैं और ज़रूरत पर मज़दूर लगाते हैं।
पृष्ठ 31 की तालिका “विभिन्न क्षेत्रकों में श्रमिकों की संख्या (दस लाख में)”, 1990 के अंत के अनुमान, खाली खाने भरकर:
| क्षेत्रक | संगठित | असंगठित | कुल |
|---|---|---|---|
| प्राथमिक | 1 | 231 | 232 |
| द्वितीयक | 41 | 74 | 115 |
| तृतीयक | 40 | 88 | 128 |
| कुल | 82 | 393 | 475 |
| कुल प्रतिशत में | लगभग 17% | लगभग 83% | 100% |
हिसाब: 232 − 1 = 231; 231 + 74 + 88 = 393; 82 + 393 = 475; 82 ÷ 475 × 100 = 17.3; 393 ÷ 475 × 100 = 82.7।
10. असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण★★
पृष्ठ 32 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 14, 22, 23
समस्या क्यों बढ़ी:
- संगठित क्षेत्रक में रोज़गार बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है।
- कई संगठित उद्यम असंगठित की तरह काम करते हैं, ताकि कर से बच सकें और श्रमिकों की रक्षा करने वाले कानूनों का पालन न करना पड़े।
- सन् 1990 से संगठित क्षेत्रक के बहुत से श्रमिक रोज़गार खो रहे हैं और कम वेतन पर असंगठित क्षेत्रक में काम करने को विवश हैं।
इसलिए असंगठित क्षेत्रक में ज़्यादा रोज़गार के साथ संरक्षण और सहायता भी चाहिए।
| किसे संरक्षण चाहिए | किस चीज़ की ज़रूरत |
|---|---|
| ग्रामीण: भूमिहीन कृषि श्रमिक, छोटे और सीमांत किसान, फसल बँटाईदार, कारीगर (बुनकर, लुहार, बढ़ई, सुनार) | लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवार छोटे और सीमांत किसान हैं; इन्हें समय पर बीज, उपकरण, साख, भण्डारण और विपणन की सुविधा चाहिए |
| शहरी: लघु उद्योगों के श्रमिक; निर्माण, व्यापार और परिवहन के आकस्मिक श्रमिक; सड़क के विक्रेता, सिर पर बोझा ढोने वाले, वस्त्र बनाने वाले, कबाड़ उठाने वाले | लघु उद्योगों को कच्चा माल पाने और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद; आकस्मिक श्रमिकों को गाँव और शहर, दोनों जगह संरक्षण |
| अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के श्रमिक | असंगठित क्षेत्रक के बहुत से श्रमिक इन्हीं वर्गों से हैं; कम और अनियमित मज़दूरी के साथ वे सामाजिक भेदभाव भी झेलते हैं |
किताब का निष्कर्ष: आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को संरक्षण और सहायता अनिवार्य है।
11. सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक★★
पृष्ठ 33–34 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2 (अ), 4 (ग, घ), 18, 19, 20, 21
तीसरी कसौटी है स्वामित्व: परिसंपत्तियों का मालिक कौन है और सेवाएँ देने की ज़िम्मेदारी किसकी है?
| सार्वजनिक क्षेत्रक | निजी क्षेत्रक | |
|---|---|---|
| मालिक | ज़्यादातर परिसंपत्तियों पर सरकार | एक व्यक्ति या कंपनी |
| उदाहरण | रेलवे, डाकघर | टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (टिस्को), रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड |
| ध्येय | सिर्फ़ लाभ कमाना नहीं | लाभ कमाना |
| ख़र्च की भरपाई | करों या दूसरे तरीकों से | सेवा लेने वाले भुगतान करते हैं |
सरकार इन कामों पर ख़र्च क्यों करती है? (पृष्ठ 33–34)
- बहुत महँगी सुविधाएँ: सड़कें, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली, बाँध से सिंचाई। इन पर इतना ख़र्च होता है कि निजी क्षेत्रक की क्षमता से बाहर है; हज़ारों उपयोगकर्ताओं से पैसा इकट्ठा करना भी आसान नहीं; और निजी क्षेत्रक दे भी, तो ऊँची कीमत लेगा।
- जिन्हें सरकारी समर्थन चाहिए: लागत पर बिजली बेचने से कई उद्योगों, ख़ासकर छोटी इकाइयों की लागत बढ़ेगी और वे बंद हो सकती हैं; इसलिए सरकार ऐसी दर पर बिजली देती है जिस पर ये उद्योग ख़रीद सकें, और लागत का कुछ अंश ख़ुद उठाती है। इसी तरह सरकार किसानों से उचित मूल्य पर गेहूँ और चावल ख़रीदती है, गोदामों में रखती है और राशन की दुकानों से उपभोक्ताओं को कम मूल्य पर बेचती है। इससे किसान और उपभोक्ता, दोनों को सहायता मिलती है।
- जिनकी पहली ज़िम्मेदारी सरकार की है: सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा। किताब कहती है: “इन पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है।” विद्यालय ठीक से चलाना और ख़ासकर प्राथमिक शिक्षा देना सरकार का कर्त्तव्य है।
किताब के तथ्य जो उत्तर में काम आते हैं (पृष्ठ 34):
- भारत में निरक्षरों की संख्या विश्व में सबसे ज़्यादा है।
- भारत के लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और उनमें से एक-चौथाई गंभीर रूप से बीमार हैं।
- ओडिशा (36) और मध्य प्रदेश (43) की शिशु मृत्यु दर विश्व के कुछ सबसे निर्धन भागों से भी ज़्यादा है।
- सरकार को सुरक्षित पेयजल, निर्धनों के लिए आवास, और भोजन और पोषण पर भी ध्यान देना है, और बजट बढ़ाकर सबसे निर्धन लोगों और देश के उपेक्षित भागों की देखभाल करनी है।
12. आँकड़े और साल एक जगह★
| आँकड़ा या साल | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ₹2,00,000 · ₹75,000 | 10,000 कि.ग्रा. गेहूँ × ₹20 · 5000 नारियल × ₹15 | 22 |
| ₹20 → ₹25 → ₹80 | गेहूँ (प्रति कि.ग्रा.) → आटा (प्रति कि.ग्रा.) → बिस्कुट के 4 पैकेट (₹20 प्रति पैकेट) | 22 |
| 100 वर्ष | विकसित देशों में द्वितीयक से तृतीयक की ओर बदलाव की अवधि | 23 |
| 1977–78 और 2017–18 (40 वर्ष) | आलेख 1, 2 और 3 के दो साल; 2017–18 तुलनीय आँकड़ों वाला नवीनतम वर्ष | 24 |
| 71 · 11 · 18 | रोज़गार में हिस्सेदारी %, 1977–78: प्राथमिक · द्वितीयक · तृतीयक | 25 |
| 44 · 25 · 31 | रोज़गार में हिस्सेदारी %, 2017–18: प्राथमिक · द्वितीयक · तृतीयक | 25 |
| 14 गुना · 5 गुना से कम | सेवा क्षेत्रक में उत्पादन की वृद्धि · रोज़गार की वृद्धि | 26 |
| लगभग 3 गुना | औद्योगिक रोज़गार की वृद्धि | 26 |
| लगभग एक-छठा | 2017–18 में जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का योगदान | 26 |
| 2 हेक्टेयर · 5 सदस्य | लक्ष्मी की असिंचित भूमि · उसका परिवार | 26 |
| 1 हेक्टेयर · 2 लोग · 50 दिन | गेहूँ की फसल से रोज़गार | 27 |
| 60% · लगभग 51% | 5–29 वर्ष की जनसंख्या · इनमें से विद्यालय जाने वाले | 28 |
| लगभग 20 लाख | अकेले शिक्षा क्षेत्र में बन सकने वाले रोज़गार | 29 |
| 35 लाख से ज़्यादा, हर साल | पर्यटन सुधरने पर अतिरिक्त रोज़गार | 29 |
| लगभग 625 जिले · 100 दिन | काम का अधिकार कानून · ग्रामीण रोज़गार की गारंटी (म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005) | 29 |
| 2025 | म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. का स्थान विकसित भारत - जी राम जी 2025 ने लिया | 29 |
| 9.30–5.30 · 7.30–8 | कान्ता के कार्यालय का समय · कमल के काम का समय | 30 |
| 82 · 393 · 475 (दस लाख) | पृष्ठ 31 की तालिका: संगठित · असंगठित · कुल श्रमिक (393 और 475 भरकर निकलते हैं) | 31 |
| सन् 1990 से | संगठित क्षेत्रक के श्रमिक रोज़गार खो रहे हैं | 32 |
| लगभग 80% | ग्रामीण परिवार जो छोटे और सीमांत किसान हैं | 32 |
| लगभग आधे · एक-चौथाई | कुपोषित बच्चे · उनमें गंभीर रूप से बीमार | 34 |
| 36 · 43 | शिशु मृत्यु दर: ओडिशा · मध्य प्रदेश | 34 |
13. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| स.घ.उ. में हर बनी और बिकी वस्तु गिनी जाती है | सिर्फ़ अंतिम वस्तुएँ और सेवाएँ; मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य उनमें पहले से शामिल है | 22 |
| स.घ.उ. में वस्तुओं की संख्या जोड़ते हैं | संख्या नहीं, उनका मूल्य जोड़ते हैं, और एक विशेष वर्ष का | 22–23 |
| तृतीयक क्षेत्रक भी वस्तुएँ बनाता है | वह सेवाएँ बनाता है और उत्पादन में मदद करता है | 20 |
| भारत में रोज़गार भी उत्पादन की तरह तृतीयक की ओर चला गया | उत्पादन में तृतीयक सबसे आगे है, पर प्राथमिक क्षेत्रक अब भी सबसे बड़ा नियोक्ता है | 24–25 |
| सेवा क्षेत्रक की हर सेवा तेज़ी से बढ़ रही है | कुछ ही भाग बढ़ रहे हैं; बहुत से लोग छोटी दुकानों, मरम्मत और परिवहन में मुश्किल से गुज़ारा करते हैं | 25 |
| छिपी हुई बेरोज़गारी में लोगों के पास काम नहीं होता | काम होता है, पर सब क्षमता से कम काम करते हैं; वह खुली बेरोज़गारी है जिसमें काम नहीं होता | 26 |
| अल्प बेरोज़गारी सिर्फ़ खेती में है | शहरों के सेवा क्षेत्रक में भी है: अनियत श्रमिक, ठेला खींचने वाले | 26 |
| असंगठित क्षेत्रक के लिए कोई नियम ही नहीं | नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता | 31 |
| अपना काम करने वाला हमेशा असंगठित क्षेत्रक में | पंजीकृत हो और नियम माने, तो वह संगठित क्षेत्रक में है | 30 |
| सार्वजनिक क्षेत्रक भी लाभ के लिए चलता है | उसका ध्येय सिर्फ़ लाभ कमाना नहीं; ख़र्च करों या दूसरे तरीकों से पूरा होता है | 33 |
| संगठित-असंगठित का बँटवारा स्वामित्व से होता है | स्वामित्व से सार्वजनिक-निजी बँटते हैं; संगठित-असंगठित रोज़गार की परिस्थितियों से | 30, 33 |
14. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
हर उत्तर पहले ख़ुद सोचिए, फिर खोलकर मिलाइए। प्रश्नावली किताब के पृष्ठ 35–37 पर है।
प्रश्न 1. कोष्ठक में दिए गए सही विकल्प का प्रयोग कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:
- (क) सेवा क्षेत्रक में रोज़गार में उत्पादन के समान अनुपात में वृद्धि ……। (हुई है/नहीं हुई है)
- (ख) …… क्षेत्रक के श्रमिक वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं। (तृतीयक/कृषि)
- (ग) …… क्षेत्रक के अधिकांश श्रमिकों को रोज़गार-सुरक्षा प्राप्त होती है। (संगठित/असंगठित)
- (घ) भारत में …… अनुपात में श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में काम कर रहे हैं। (बड़े/छोटे)
- (ङ) कपास एक …… उत्पाद है और कपड़ा एक …… उत्पाद है। (प्राकृतिक/विनिर्मित)
- (च) प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों की गतिविधियाँ …… हैं। (स्वतंत्र/परस्पर निर्भर)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) नहीं हुई है। सेवा क्षेत्रक में उत्पादन 14 गुना बढ़ा, पर रोज़गार 5 गुना से भी कम (पृष्ठ 26)।
- (ख) तृतीयक। यह सेवाएँ देता है, वस्तुएँ नहीं बनाता।
- (ग) संगठित।
- (घ) बड़े। पृष्ठ 31 की तालिका में लगभग 83 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं।
- (ङ) कपास एक प्राकृतिक उत्पाद है और कपड़ा एक विनिर्मित उत्पाद है।
- (च) परस्पर निर्भर।
प्रश्न 2. सही उत्तर का चयन करें:
(अ) सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक …… आधार पर विभाजित हैं:
- (क) रोज़गार की शर्तों
- (ख) आर्थिक गतिविधि के स्वभाव
- (ग) उद्यमों के स्वामित्व
- (घ) उद्यम में नियोजित श्रमिकों की संख्या
(ब) एक वस्तु का अधिकांशतः प्राकृतिक प्रक्रिया से उत्पादन …… क्षेत्रक की गतिविधि है।
- (क) प्राथमिक
- (ख) द्वितीयक
- (ग) तृतीयक
- (घ) सूचना प्रौद्योगिकी
(स) किसी वर्ष में उत्पादित …… कुल मूल्य को स.घ.उ. कहते हैं।
- (क) सभी वस्तुओं और सेवाओं
- (ख) सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं
- (ग) सभी मध्यवर्ती वस्तुओं और सेवाओं
- (घ) सभी मध्यवर्ती एवं अंतिम वस्तुओं और सेवाओं
(द) जी.वी.ए. के पदों में वर्ष 2017–18 के बीच तृतीयक क्षेत्रक की हिस्सेदारी …… प्रतिशत है।
- (क) 20 से 30
- (ख) 30 से 40
- (ग) 50 से 60
- (घ) 60 से 70
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (अ) (ग) उद्यमों के स्वामित्व। रोज़गार की शर्तों से संगठित-असंगठित बँटते हैं, और कार्य के स्वभाव से प्राथमिक-द्वितीयक-तृतीयक।
- (ब) (क) प्राथमिक।
- (स) (ख) सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं। मध्यवर्ती वस्तुएँ गिनें, तो एक ही मूल्य कई बार गिना जाएगा।
- (द) (ग) 50 से 60। आलेख 2 में 2017–18 वाले दंड का आधे से ज़्यादा हिस्सा तृतीयक क्षेत्रक का है। प्राथमिक का हिस्सा लगभग एक-छठा है (पृष्ठ 26), और तृतीयक सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक है।
प्रश्न 3. निम्नलिखित का मेल कीजिए:
| कृषि क्षेत्रक की समस्याएँ | कुछ संभावित उपाय |
|---|---|
| 1. असिंचित भूमि | (अ) कृषि-आधारित मिलों की स्थापना |
| 2. फसलों का कम मूल्य | (ब) सहकारी विपणन समितियाँ |
| 3. कर्ज भार | (स) सरकार द्वारा खाद्यान्नों की वसूली |
| 4. मंदी काल में रोज़गार का अभाव | (द) सरकार द्वारा नहरों का निर्माण |
| 5. कटाई के तुरन्त बाद स्थानीय व्यापारियों को अपना अनाज बेचने की विवशता | (य) कम ब्याज पर बैंकों द्वारा साख उपलब्ध कराना |
उत्तर देखिए
उत्तर:
समस्या उपाय किताब में आधार 1. असिंचित भूमि (द) सरकार द्वारा नहरों का निर्माण नया बाँध या नहर हो, तो कई खेतों की सिंचाई होगी (पृष्ठ 27) 2. फसलों का कम मूल्य (स) सरकार द्वारा खाद्यान्नों की वसूली सरकार किसानों से उचित मूल्य पर गेहूँ और चावल ख़रीदती है (पृष्ठ 34) 3. कर्ज भार (य) कम ब्याज पर बैंकों द्वारा साख साहूकार के ऊँचे ब्याज की जगह बैंक उचित ब्याज पर साख दे (पृष्ठ 28) 4. मंदी काल में रोज़गार का अभाव (अ) कृषि-आधारित मिलों की स्थापना दाल मिल और प्रसंस्करण उद्योग अर्द्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार देंगे (पृष्ठ 28) 5. कटाई के बाद तुरंत बेचने की विवशता (ब) सहकारी विपणन समितियाँ छोटे किसानों को भण्डारण और विपणन की सुविधा चाहिए, ताकि अच्छी कीमत पर बेच सकें (पृष्ठ 28, 32)
प्रश्न 4. विषम की पहचान करें और बताइए क्यों?
- (क) पर्यटन-निर्देशक, धोबी, दर्जी, कुम्हार, कृषक
- (ख) शिक्षक, डॉक्टर, सब्जी विक्रेता, वकील
- (ग) डाकिया, मोची, सैनिक, पुलिस कांस्टेबल
- (घ) एम.टी.एन.एल., भारतीय रेल, एयर इण्डिया, ऑल इण्डिया रेडियो
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) कृषक। वह प्राकृतिक संसाधनों (भूमि, वर्षा) के सीधे उपयोग से उत्पादन करता है, इसलिए अकेला वही प्राथमिक क्षेत्रक में है। पर्यटन-निर्देशक और धोबी सेवा देते हैं (तृतीयक); दर्जी और कुम्हार कपड़े और मिट्टी से वस्तुएँ बनाते हैं (द्वितीयक)।
- (ख) सब्जी विक्रेता। शिक्षक, डॉक्टर और वकील पढ़-लिखकर और प्रशिक्षण लेकर व्यक्तिगत सेवाएँ देते हैं (पृष्ठ 20, 25)। सब्जी विक्रेता सड़क पर बेचने वाला, अपना काम करने वाला व्यक्ति है, जो आमतौर पर असंगठित क्षेत्रक में आता है (पृष्ठ 31)।
- (ग) मोची। डाकिया, सैनिक और पुलिस कांस्टेबल सरकार के कर्मचारी हैं, यानी सार्वजनिक क्षेत्रक में काम करते हैं। मोची अपना काम करता है; वह निजी और असंगठित क्षेत्रक में है।
- (घ) एयर इण्डिया। यहाँ कसौटी स्वामित्व है (पृष्ठ 33): जिस उद्यम की परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व है, वह सार्वजनिक क्षेत्रक में है, और जिसका स्वामित्व किसी व्यक्ति या कंपनी के हाथ में है, वह निजी क्षेत्रक में। एम.टी.एन.एल., भारतीय रेल और ऑल इण्डिया रेडियो सरकार के हैं। एयर इण्डिया को सरकार ने जनवरी 2022 में टाटा समूह की एक कंपनी को सौंप दिया (भारत सरकार की प्रेस विज्ञप्ति), इसलिए अब वह निजी क्षेत्रक में है।
प्रश्न 5. एक शोध छात्र ने सूरत शहर में काम करने वाले लोगों का अध्ययन करके निम्न आँकड़े जुटाए। तालिका को पूरा कीजिए। इस शहर में असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों की प्रतिशतता क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
कार्य स्थान रोज़गार की प्रकृति श्रमिकों का प्रतिशत सरकार द्वारा पंजीकृत कार्यालयों और कारखानों में संगठित 15 औपचारिक अधिकार-पत्र सहित बाज़ारों में अपनी दुकान, कार्यालय और क्लिनिक संगठित 15 सड़कों पर काम करते लोग, निर्माण श्रमिक, घरेलू श्रमिक असंगठित 20 छोटी कार्यशालाओं में काम करते लोग, जो प्रायः सरकार द्वारा पंजीकृत नहीं हैं असंगठित 50
- चौथी पंक्ति: 100 − (15 + 15 + 20) = 50 प्रतिशत।
- दूसरी पंक्ति संगठित है, क्योंकि दुकान, कार्यालय और क्लिनिक के पास औपचारिक अधिकार-पत्र है; अपना काम करने वाले भी पंजीकृत हों, तो संगठित क्षेत्रक में आते हैं (पृष्ठ 30)।
- असंगठित क्षेत्रक: 20 + 50 = 70 प्रतिशत। संगठित: 15 + 15 = 30 प्रतिशत।
प्रश्न 6. क्या आप मानते हैं कि आर्थिक गतिविधियों का प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र में विभाजन की उपयोगिता है? व्याख्या कीजिए कि कैसे?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ। हमारे चारों ओर इतनी गतिविधियाँ हैं कि उन्हें समूहों में बाँटे बिना तर्कसंगत ढंग से नहीं समझा जा सकता (पृष्ठ 33)।
- हर क्षेत्रक का आकार पता चलता है: कितना उत्पादन किस क्षेत्रक से आता है और कितने लोग उसमें काम करते हैं।
- बदलाव दिखता है: 1977–78 से 2017–18 के बीच तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ा उत्पादक बन गया।
- समस्या पकड़ में आती है: रोज़गार में प्राथमिक क्षेत्रक का हिस्सा अब भी 44 प्रतिशत है, जबकि जी.वी.ए. में उसका योगदान लगभग एक-छठा। इसी से कृषि में अल्प बेरोज़गारी का पता चला।
- उपाय सूझते हैं: इससे पता चलता है कि किन उपायों की ज़रूरत है, जैसे सिंचाई, सस्ता कृषि साख, अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग और म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. (पृष्ठ 28, 29)।
इसलिए यह विभाजन अर्थव्यवस्था की हालत परखने और सुधार के रास्ते खोजने में काम आता है।
प्रश्न 7. इस अध्याय में आए प्रत्येक क्षेत्रक को रोज़गार और जी.वी.ए. पर ही क्यों केन्द्रित करना चाहिए? क्या अन्य वाद-पदों का परीक्षण किया जा सकता है? चर्चा करें।
उत्तर देखिए
उत्तर: जी.वी.ए. बताता है कि कोई क्षेत्रक कितना उत्पादन करता है, और रोज़गार बताता है कि कितने लोगों की रोज़ी उस पर टिकी है। दोनों को साथ देखने से ही वह बात दिखी जो अकेले किसी एक से नहीं दिखती: प्राथमिक क्षेत्रक में सबसे ज़्यादा लोग हैं, पर उत्पादन में उसका हिस्सा छोटा है।
हाँ, दूसरे पदों से भी परखा जा सकता है। यह अध्याय ख़ुद दो और कसौटियाँ लेता है: रोज़गार की परिस्थितियाँ (संगठित-असंगठित) और स्वामित्व (सार्वजनिक-निजी)। इनसे काम की सुरक्षा, वेतन और सरकार की भूमिका जैसे सवाल परखे जाते हैं। जिस बात की जाँच करनी हो, कसौटी उसी के हिसाब से चुनी जाती है।
प्रश्न 8. जीविका के लिए काम करने वाले अपने आसपास के वयस्कों के सभी कार्यों की लंबी सूची बनाइए। उन्हें आप किस तरीके से वर्गीकृत कर सकते हैं? अपने चयन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: सूची आपके आसपास से बनेगी; हर काम को अध्याय की तीनों कसौटियों पर रखिए। एक नमूना:
काम कार्य का स्वभाव रोज़गार की परिस्थिति स्वामित्व अपने खेत पर किसान प्राथमिक असंगठित निजी सब्ज़ी बेचने वाला तृतीयक असंगठित निजी बड़े कारखाने का नियमित श्रमिक द्वितीयक संगठित निजी सरकारी स्कूल का शिक्षक तृतीयक संगठित सार्वजनिक घर में काम करने वाला घरेलू श्रमिक तृतीयक असंगठित निजी चयन का कारण: कार्य के स्वभाव से पता चलता है कि उत्पादन और रोज़गार किस क्षेत्रक में हैं; रोज़गार की परिस्थिति से काम की सुरक्षा का; और स्वामित्व से यह कि सेवा कौन देता है और किस ध्येय से।
प्रश्न 9. तृतीयक क्षेत्रक अन्य क्षेत्रकों से कैसे भिन्न है? सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: प्राथमिक क्षेत्रक प्रकृति से सीधे वस्तुएँ लेता है (कपास, दूध, खनिज) और द्वितीयक उन्हें विनिर्माण से नई वस्तुओं में बदलता है (कपड़ा, चीनी, ईंट)। तृतीयक क्षेत्रक कोई वस्तु नहीं बनाता; वह सेवाएँ देता है।
- उत्पादन में मदद: बनी वस्तुओं को ट्रक और ट्रेन से थोक और खुदरा विक्रेताओं तक पहुँचाना, गोदामों में भण्डारण, टेलीफ़ोन और पत्राचार से बातचीत, बैंकों से कर्ज़।
- ऐसी सेवाएँ जो उत्पादन में सीधे मदद नहीं करतीं, फिर भी ज़रूरी हैं: शिक्षक, डॉक्टर, धोबी, नाई, मोची, वकील, प्रशासन और लेखा।
- सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित नई सेवाएँ: इंटरनेट कैफे, ए.टी.एम. बूथ, कॉल सेंटर, सॉफ़्टवेयर कंपनी।
इसलिए तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक कहते हैं; यह बाकी दोनों क्षेत्रकों के विकास में मदद करता है।
प्रश्न 10. प्रच्छन्न बेरोज़गारी से आप क्या समझते हैं? शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों से उदाहरण देकर व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: जब लोग काम करते दिखते हैं, पर सब अपनी क्षमता से कम काम करते हैं और किसी को पूरा रोज़गार नहीं मिलता, तो यह अल्प बेरोज़गारी है। यह छिपी रहती है, क्योंकि कोई बेकार बैठा नहीं दिखता; इसलिए इसे छिपी हुई या प्रच्छन्न बेरोज़गारी कहते हैं। पहचान: कुछ लोगों को हटा दें, तो भी उत्पादन नहीं घटता।
- ग्रामीण उदाहरण: लक्ष्मी के पास दो हेक्टेयर असिंचित भूमि है और परिवार के पाँचों सदस्य साल भर उसी पर काम करते हैं, क्योंकि कहीं और काम नहीं। भूस्वामी सुखराम एक या दो सदस्यों को अपनी ज़मीन पर काम के लिए ले जाए, तो खेत का उत्पादन नहीं घटता और परिवार की आय बढ़ती है।
- शहरी उदाहरण: शहरों में हज़ारों अनियत श्रमिक, जैसे प्लम्बर, पेन्टर और मरम्मत करने वाले, रोज़ काम खोजते हैं और कई को रोज़ नहीं मिलता। ठेला खींचने या सड़क पर चीज़ें बेचने वाले पूरा दिन लगाते हैं, पर बहुत कम कमा पाते हैं।
प्रश्न 11. खुली बेरोज़गारी और प्रच्छन्न बेरोज़गारी के बीच विभेद कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
आधार खुली बेरोज़गारी प्रच्छन्न बेरोज़गारी हालत व्यक्ति के पास कोई काम नहीं, वह बेकार बैठा है व्यक्ति काम करता दिखता है, पर अपनी क्षमता से कम पहचान साफ़ दिखती है छिपी रहती है, क्योंकि सब काम पर लगे दिखते हैं उत्पादन पर असर ये लोग उत्पादन में शामिल ही नहीं कुछ लोग हटा दें, तो भी उत्पादन नहीं घटता उदाहरण काम की तलाश में बेकार बैठा व्यक्ति लक्ष्मी के छोटे खेत पर पूरा परिवार; शहर के अनियत श्रमिक
प्रश्न 12. “भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में तृतीयक क्षेत्रक कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा रहा है।” क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: नहीं, मैं सहमत नहीं हूँ।
- सबसे बड़ा उत्पादक: 1977–78 से 2017–18 के बीच सबसे ज़्यादा वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई, और 2017–18 में यह प्राथमिक क्षेत्रक की जगह सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन गया।
- बुनियादी सेवाएँ: अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक, थाना, कचहरी, परिवहन, बैंक, बीमा जैसी सेवाओं के बिना कोई देश नहीं चल सकता।
- बाकी क्षेत्रकों का सहारा: कृषि और उद्योग की उपज परिवहन, भण्डारण और व्यापार से ही बाज़ार तक पहुँचती है।
- बढ़ती आय और नई सेवाएँ: आय बढ़ने पर रेस्तरां, पर्यटन, निजी विद्यालय जैसी सेवाओं की माँग बढ़ती है; सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की सेवाएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं।
- रोज़गार में हिस्सा बढ़ा: रोज़गार में तृतीयक का हिस्सा 18 से बढ़कर 31 प्रतिशत हुआ।
हाँ, यह भी सच है कि सेवा क्षेत्रक की सभी सेवाएँ बराबर नहीं बढ़ रहीं, और बहुत से लोग छोटी दुकानों और मरम्मत जैसे कामों में मुश्किल से गुज़ारा करते हैं। फिर भी अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है।
प्रश्न 13. भारत में सेवा क्षेत्रक दो विभिन्न प्रकार के लोग नियोजित करता है। ये लोग कौन हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- बहुत कुशल और शिक्षित श्रमिक: ऐसी सेवाओं की संख्या सीमित है जिनमें इन्हें रोज़गार मिलता है।
- बहुत बड़ी संख्या में दूसरे लोग: जो छोटी दुकानों, मरम्मत के काम और परिवहन जैसी सेवाओं में लगे हैं। वे मुश्किल से गुज़ारा कर पाते हैं और इन कामों में इसलिए हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा अवसर नहीं।
इसीलिए सेवा क्षेत्रक के कुछ ही भागों का महत्त्व बढ़ रहा है (पृष्ठ 25)।
प्रश्न 14. “असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों का शोषण किया जाता है।” क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, मैं सहमत हूँ।
- कम और अनियमित आय: वेतन कम है और प्रायः नियमित नहीं; श्रमिकों को अक्सर उचित मज़दूरी नहीं दी जाती।
- कोई सुरक्षा नहीं: उन्हें बिना कारण काम से हटाया जा सकता है; कुछ मौसमों में काम कम हो, तो छुट्टी दे दी जाती है। बहुत से लोग नियोक्ता की पसंद पर निर्भर हैं।
- कोई लाभ नहीं: अतिरिक्त समय के काम, सवेतन छुट्टी या बीमारी की छुट्टी का प्रावधान नहीं। कमल का उदाहरण: सुबह 7.30 से शाम 8 बजे तक काम, मज़दूरी के सिवा कुछ नहीं, जिस दिन काम नहीं उस दिन पैसा नहीं।
- नियम कागज़ पर: नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता।
- सामाजिक भेदभाव: बहुत से श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से हैं, जो कम मज़दूरी के साथ भेदभाव भी झेलते हैं।
इसलिए किताब कहती है कि इन श्रमिकों को संरक्षण और सहायता अनिवार्य है।
प्रश्न 15. अर्थव्यवस्था में गतिविधियाँ रोज़गार की परिस्थितियों के आधार पर कैसे वर्गीकृत की जाती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: रोज़गार की परिस्थितियों (काम की शर्तें, नियम, सुरक्षा) के आधार पर गतिविधियाँ दो क्षेत्रकों में बँटती हैं:
- संगठित क्षेत्रक: सरकार से पंजीकृत उद्यम और कार्य-स्थान, जहाँ रोज़गार नियमित है और काम सुनिश्चित। कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, सेवानुदान अधिनियम, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम जैसे कानूनों का पालन होता है। इसकी कुछ औपचारिक प्रक्रिया और कार्यविधि है, इसलिए इसे संगठित कहते हैं। उदाहरण: कान्ता।
- असंगठित क्षेत्रक: छोटी और बिखरी इकाइयाँ, जो ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं; नियम हैं, पर पालन नहीं होता। काम कम वेतन वाला और प्रायः अनियमित है। उदाहरण: कमल, सड़क पर बेचने वाले, अपने खेत पर किसान।
प्रश्न 16. संगठित और असंगठित क्षेत्रकों में विद्यमान रोज़गार-परिस्थितियों की तुलना करें।
उत्तर देखिए
उत्तर:
आधार संगठित क्षेत्रक असंगठित क्षेत्रक काम नियमित और सुनिश्चित प्रायः अनियमित वेतन नियमित वेतन; ज़्यादा काम पर अतिरिक्त वेतन कम वेतन; अतिरिक्त समय के काम का प्रावधान नहीं सुरक्षा रोज़गार-सुरक्षा बिना कारण हटाया जा सकता है छुट्टी सवेतन छुट्टी, अवकाश काल में भुगतान न सवेतन छुट्टी, न बीमारी की छुट्टी दूसरे लाभ भविष्य निधि, सेवानुदान, चिकित्सीय लाभ, पेयजल और सुरक्षित कार्य-पर्यावरण, पेंशन कोई लाभ नहीं नियम सरकार से पंजीकृत; कानूनों का पालन नियम हैं, पर पालन नहीं होता उदाहरण कान्ता: कार्यालय, 9.30 से 5.30, नियुक्ति-पत्र कमल: किराना दुकान, 7.30 से 8, कोई पत्र नहीं
प्रश्न 17. मनरेगा 2005 (MGNREGA 2005) या विकसित भारत – जी राम जी 2025 (Viksit Bharat - G RAM G 2025) के उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005 के उद्देश्य बताती है, इसलिए उत्तर उसी पर लिखिए (पृष्ठ 29)। चर्चा किए गए कुछ सुझावों के अमल में लंबा समय लगेगा, इसलिए छोटी अवधि के द्रुत उपाय के रूप में केंद्र सरकार ने लगभग 625 जिलों में काम का अधिकार लागू करने का कानून बनाया।
- रोज़गार की गारंटी: काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले सभी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में साल में 100 दिन का रोज़गार।
- बेरोज़गारी भत्ता: सरकार काम न दे पाए, तो वह लोगों को बेरोज़गारी भत्ता देगी।
- भूमि का उत्पादन बढ़ाना: ऐसे कामों को वरीयता, जिनसे भूमि से उत्पादन बढ़े।
2025 में इस अधिनियम का स्थान विकसित भारत-रोज़गार गारंटी और आजीविका मिशन (विकसित भारत - जी राम जी 2025) ने ले लिया।
प्रश्न 18. अपने क्षेत्र से उदाहरण लेकर सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक की गतिविधियों एवं कार्यों की तुलना तथा वैषम्य कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: अपने क्षेत्र के एक सरकारी और एक निजी विद्यालय (या अस्पताल) को लेकर इन बिंदुओं पर तुलना कीजिए:
आधार सार्वजनिक क्षेत्रक (जैसे सरकारी विद्यालय, डाकघर, रेलवे) निजी क्षेत्रक (जैसे निजी विद्यालय, निजी अस्पताल) मालिक सरकार कोई व्यक्ति या कंपनी ध्येय सिर्फ़ लाभ नहीं; सबको सेवा लाभ कमाना ख़र्च सरकार करों या दूसरे तरीकों से उठाती है सेवा लेने वाला भुगतान करता है किसके लिए सभी लोगों के लिए, ग़रीबों के लिए भी जो कीमत चुका सकें समानता: दोनों सेवाएँ देते हैं और रोज़गार देते हैं। अंतर: सरकार वे काम भी करती है जिनमें लाभ नहीं, पर जो समाज के लिए ज़रूरी हैं।
प्रश्न 19. अपने क्षेत्र से एक-एक उदाहरण देकर निम्न तालिका को पूरा कीजिए और चर्चा कीजिए:
| सुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन | कुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन | |
|---|---|---|
| सार्वजनिक क्षेत्रक | ||
| निजी क्षेत्रक |
उत्तर देखिए
उत्तर: उदाहरण आपके अपने अनुभव से आएँगे; भरने का तरीका यह है:
सुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन कुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन सार्वजनिक क्षेत्रक आपके क्षेत्र का कोई सरकारी स्कूल या अस्पताल, जो समय पर खुलता है और ठीक सेवा देता है कोई सरकारी दफ़्तर, जहाँ काम में देर होती है निजी क्षेत्रक कोई निजी दुकान या कंपनी, जो ग्राहकों को अच्छी सेवा देती है कोई निजी इकाई, जहाँ श्रमिकों को नियमों के लाभ नहीं मिलते चर्चा: इस तालिका से दिखता है कि अच्छा या बुरा प्रबंध स्वामित्व से तय नहीं होता; दोनों क्षेत्रकों में दोनों तरह के संगठन मिल सकते हैं।
प्रश्न 20. सार्वजनिक क्षेत्रक की गतिविधियों के कुछ उदाहरण दीजिए और व्याख्या कीजिए कि सरकार द्वारा इन गतिविधियों का कार्यान्वयन क्यों किया जाता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: उदाहरण: सड़कें, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली, बाँध से सिंचाई; उद्योगों को सस्ती बिजली; किसानों से गेहूँ-चावल की ख़रीद और राशन की दुकानें; सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा।
- ख़र्च बहुत बड़ा: सड़क, पुल, रेलवे, बाँध जैसे काम निजी क्षेत्रक की क्षमता से बाहर हैं; हज़ारों उपयोगकर्ताओं से पैसा इकट्ठा करना भी आसान नहीं, और निजी क्षेत्रक दे, तो ऊँची कीमत लेगा।
- समर्थन की ज़रूरत: लागत पर बिजली बिकने से छोटी इकाइयाँ बंद हो सकती हैं, इसलिए सरकार ऐसी दर पर बिजली देती है जिस पर उद्योग ख़रीद सकें। किसानों से उचित मूल्य पर ख़रीद और राशन की दुकानों पर कम मूल्य पर बिक्री से किसान और उपभोक्ता, दोनों को सहायता मिलती है; लागत का कुछ भाग सरकार उठाती है।
- सरकार की ज़िम्मेदारी: स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है। भारत में निरक्षर विश्व में सबसे ज़्यादा हैं, लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं, और ओडिशा (36) और मध्य प्रदेश (43) की शिशु मृत्यु दर विश्व के कुछ सबसे निर्धन भागों से भी ज़्यादा है।
प्रश्न 21. व्याख्या कीजिए कि एक देश के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक कैसे योगदान करता है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- ढाँचा खड़ा करता है: सड़कें, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली और सिंचाई के बाँध, जिनके बिना खेती और उद्योग नहीं बढ़ सकते।
- उद्योगों को सहारा देता है: छोटी इकाइयों को ऐसी दर पर बिजली, जिस पर वे चल सकें।
- किसानों और उपभोक्ताओं की मदद करता है: उचित मूल्य पर अनाज की ख़रीद और राशन की दुकानों पर कम मूल्य पर बिक्री।
- बुनियादी सेवाएँ देता है: अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक, थाना, कचहरी, रक्षा जैसी सेवाओं का प्रबंध विकासशील देश में सरकार करती है।
- मानव विकास: सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा, सुरक्षित पेयजल, निर्धनों के लिए आवास, और भोजन और पोषण।
- रोज़गार: शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ बढ़ें, तो अध्यापकों, डॉक्टरों, नर्सों के रोज़गार बनते हैं; अकेले शिक्षा में लगभग 20 लाख। म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. ने गाँवों में काम की गारंटी दी।
- उपेक्षित लोगों और भागों की देखभाल: बजट बढ़ाकर सबसे निर्धन लोगों और देश के उपेक्षित भागों तक पहुँचना।
प्रश्न 22. असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को निम्नलिखित मुद्दों पर संरक्षण की आवश्यकता है: मज़दूरी, सुरक्षा और स्वास्थ्य। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- मज़दूरी: इनकी आय कम है और नियमित नहीं; उचित मज़दूरी अक्सर नहीं मिलती। कमल को दैनिक मज़दूरी के सिवा कुछ नहीं मिलता, और जिस दिन काम नहीं, उस दिन पैसा नहीं। न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम जैसे कानून हैं, पर असंगठित क्षेत्रक में उनका पालन नहीं होता।
- सुरक्षा: रोज़गार सुरक्षित नहीं; श्रमिक बिना कारण हटाए जा सकते हैं, और मौसम में काम घटे तो छुट्टी दे दी जाती है। कमल का नियोक्ता उसे कभी भी हटा सकता है। संगठित क्षेत्रक में नियम के अनुसार कारखाना मालिक को सुरक्षित कार्य-पर्यावरण देना होता है; निर्माण श्रमिक और सिर पर बोझा ढोने वाले श्रमिक ऐसे संरक्षण के बिना काम करते हैं।
- स्वास्थ्य: बीमारी की छुट्टी या चिकित्सीय लाभ नहीं, जबकि संगठित क्षेत्रक के कर्मचारी चिकित्सीय लाभ के हक़दार हैं और उन्हें पेयजल जैसी सुविधा मिलती है।
इसलिए किताब कहती है कि आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए इन श्रमिकों को संरक्षण और सहायता अनिवार्य है।
प्रश्न 23. अहमदाबाद में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि नगर के 15,00,000 श्रमिकों में से 11,00,000 श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में काम करते थे। वर्ष 1997–98 में नगर की कुल आय 600 करोड़ रुपए थी, इसमें से 320 करोड़ रुपए संगठित क्षेत्रक से प्राप्त होती थी। इस आँकड़े को तालिका में प्रदर्शित कीजिए। नगर में और अधिक रोज़गार-सृजन के लिए किन तरीकों पर विचार किया जाना चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर:
क्षेत्रक श्रमिक श्रमिकों में हिस्सा आय, 1997–98 (करोड़ रुपए) आय में हिस्सा संगठित 4,00,000 26.7% 320 53.3% असंगठित 11,00,000 73.3% 280 46.7% कुल 15,00,000 100% 600 100% हिसाब: 15,00,000 − 11,00,000 = 4,00,000; 600 − 320 = 280।
क्या दिखता है: लगभग तीन-चौथाई श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं, पर नगर की आय का आधे से कम हिस्सा उनसे आता है; यानी वहाँ प्रति श्रमिक आय बहुत कम है।
रोज़गार बढ़ाने के तरीके (किताब से):
- लघु उद्योगों को कच्चा माल पाने और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद (पृष्ठ 32)।
- किसानों को स्थानीय बैंक से उचित ब्याज दर पर साख, ताकि वे समय पर बीज, उर्वरक और उपकरण ख़रीद सकें (पृष्ठ 28)।
- पर्यटन, क्षेत्रीय शिल्प उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी जैसी नई सेवाओं को बढ़ावा (पृष्ठ 29)।
- शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, जिनमें अध्यापक, डॉक्टर और नर्स चाहिए (पृष्ठ 29)।
- असंगठित श्रमिकों को संरक्षण, ताकि उनकी आय बढ़े और काम सुरक्षित हो (पृष्ठ 32)।
प्रश्न 24. निम्नलिखित तालिका में तीनों क्षेत्रकों का जी.वी.ए. रुपए (करोड़) में दिया गया है:
| वर्ष | प्राथमिक | द्वितीयक | तृतीयक |
|---|---|---|---|
| 2001–02 | 13,23,000 | 10,40,000 | 19,31,000 |
| 2021–22 | 24,79,400 | 40,73,000 | 73,25,000 |
- (क) वर्ष 2000 एवं 2013 के लिए जी.वी.ए. में तीनों क्षेत्रकों की हिस्सेदारी की गणना कीजिए।
- (ख) इन आँकड़ों को अध्याय में दिए आलेख-2 के समान एक दण्ड-आलेख के रूप में प्रदर्शित कीजिए।
- (ग) दण्ड-आलेख से हम क्या निष्कर्ष प्राप्त करते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्रश्न में “वर्ष 2000 एवं 2013” छपा है, पर तालिका 2001–02 और 2021–22 की है; गणना तालिका के सालों के लिए कीजिए।
(क) हिस्सेदारी = क्षेत्रक का जी.वी.ए. ÷ कुल जी.वी.ए. × 100
- 2001–02 का कुल: 13,23,000 + 10,40,000 + 19,31,000 = 42,94,000 करोड़
- 2021–22 का कुल: 24,79,400 + 40,73,000 + 73,25,000 = 1,38,77,400 करोड़
वर्ष प्राथमिक द्वितीयक तृतीयक 2001–02 13,23,000 ÷ 42,94,000 = 30.8% 10,40,000 ÷ 42,94,000 = 24.2% 19,31,000 ÷ 42,94,000 = 45.0% 2021–22 24,79,400 ÷ 1,38,77,400 = 17.9% 40,73,000 ÷ 1,38,77,400 = 29.3% 73,25,000 ÷ 1,38,77,400 = 52.8% हर पंक्ति का जोड़ 100 है, इससे हिसाब जाँच लीजिए।
(ख) आलेख 2 की तरह दो दंड बनाइए, एक 2001–02 का और एक 2021–22 का, दोनों 100 तक ऊँचे। हर दंड को तीन हिस्सों में बाँटिए: नीचे प्राथमिक, बीच में द्वितीयक, ऊपर तृतीयक। खड़े अक्ष पर 0 से 100 तक प्रतिशत, हर 10 पर निशान। ऊपर की गणना वाले प्रतिशत से हिस्सों की ऊँचाई तय कीजिए और हर हिस्से पर उसका प्रतिशत लिखिए।
(ग) निष्कर्ष:
- जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का हिस्सा घटा (30.8 से 17.9 प्रतिशत), हालाँकि उसका जी.वी.ए. रकम में बढ़ा।
- द्वितीयक का हिस्सा बढ़ा (24.2 से 29.3 प्रतिशत)।
- तृतीयक क्षेत्रक दोनों सालों में सबसे बड़ा है, और उसका हिस्सा 45.0 से बढ़कर 52.8 प्रतिशत, यानी आधे से ज़्यादा हो गया।
यह वही रुझान है जो आलेख 2 दिखाता है: उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का महत्त्व बढ़ रहा है और प्राथमिक का घट रहा है।
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 21), 1. विभिन्न क्षेत्रकों की परस्पर-निर्भरता दिखाते हुए तालिका 2.1 को भरिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: भरी हुई तालिका ऊपर हिस्सा 3 में है। सार: कपास वाली पंक्ति दिखाती है कि प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक (कपड़ा कंपनियों) पर निर्भर है; उर्वरक और पम्पसेट वाली पंक्ति भी प्राथमिक की द्वितीयक पर निर्भरता दिखाती है; और ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल वाली पंक्ति दिखाती है कि प्राथमिक क्षेत्रक तृतीयक (परिवहन) पर निर्भर है और उद्योग व सेवा क्षेत्रक में काम करने वाले लोग भोजन के लिए प्राथमिक पर।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 21), 2. किताब से अलग उदाहरण लेकर प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों का अंतर समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: एक ही चीज़ की यात्रा देखिए: भेड़ पालकर ऊन उतारना प्राथमिक है (पशुओं पर, यानी प्रकृति पर निर्भर); ऊन से कंबल या दरी बुनना द्वितीयक है (विनिर्माण); और कंबल को ट्रक से बाज़ार तक ले जाना और दुकानदार का बेचना तृतीयक है (सेवा)। इसी तरह मछली पकड़ना प्राथमिक, मछली को डिब्बे में पैक करने का कारखाना द्वितीयक, और उसे बेचने वाला व्यापारी तृतीयक।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 21), 3. इन व्यवसायों को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों में बाँटिए: दर्जी, टोकरी बुनकर, फूल की खेती करने वाला, दूध-विक्रेता, मछुआरा, पुजारी, कूरियर पहुँचाने वाला, दियासलाई कारखाना में श्रमिक, महाजन, माली, कुम्हार, मधुमक्खी पालक, अंतरिक्ष-यात्री, कॉल सेंटर का कर्मचारी।
उत्तर देखिए
उत्तर:
प्राथमिक द्वितीयक तृतीयक फूल की खेती करने वाला, मछुआरा, मधुमक्खी पालक दर्जी, टोकरी बुनकर, दियासलाई कारखाना में श्रमिक, कुम्हार दूध-विक्रेता, पुजारी, कूरियर पहुँचाने वाला, महाजन, माली, अंतरिक्ष-यात्री, कॉल सेंटर का कर्मचारी कसौटी: प्रकृति से सीधे उत्पादन प्राथमिक, किसी चीज़ से नई वस्तु बनाना द्वितीयक, और सेवा देना तृतीयक। दूध-विक्रेता दूध बेचने का काम (व्यापार) करता है, इसलिए तृतीयक; अगर वह ख़ुद पशु पालकर दूध निकालता है, तो वह डेयरी, यानी प्राथमिक है। माली दूसरों के बगीचे की देखभाल की सेवा देता है; अगर वह पौधे उगाकर बेचे, तो प्राथमिक।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 21), 4. विद्यालय में छात्रों को प्रायः प्राथमिक और द्वितीयक, या वरिष्ठ और कनिष्ठ वर्ग में बाँटा जाता है। इस बँटवारे की कसौटी क्या है? क्या यह बँटवारा उपयुक्त है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कसौटी कक्षा या पढ़ाई का स्तर है, जो लगभग आयु के साथ चलता है। यह उपयुक्त है, क्योंकि एक स्तर के छात्रों की पढ़ाई, किताबें और ज़रूरतें मिलती-जुलती होती हैं, इसलिए उन्हें साथ पढ़ाना आसान है। यह भी दिखता है कि कसौटी उद्देश्य के हिसाब से चुनी जाती है, जैसे अर्थशास्त्र में क्षेत्रकों के लिए।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 23), 1. विकसित देशों का इतिहास क्षेत्रकों में हुए परिवर्तन के बारे में क्या संकेत करता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: शुरुआत में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण था; कारखाने फैलने पर कुल उत्पादन और रोज़गार में द्वितीयक क्षेत्रक सबसे आगे हो गया; और पिछले 100 वर्षों में बदलाव द्वितीयक से तृतीयक की ओर हुआ। अब कुल उत्पादन में सेवा क्षेत्रक का महत्त्व बढ़ गया है और ज़्यादातर श्रमजीवी लोग इसी में काम करते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 23), 2. इस गड़बड़ वाक्यांश को स.घ.उ. की गणना के लिए सही कीजिए: “उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की गणना करने के लिए हम उनकी संख्याओं को जोड़ देते हैं। हम विगत पाँच वर्षों में उत्पादित सभी वस्तुओं की गणना करते हैं। चूँकि हमें किसी चीज़ को छोड़ना नहीं चाहिए इसलिए हम इन वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का योगफल प्राप्त करते हैं।”
उत्तर देखिए
उत्तर: सही रूप: उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की गणना के लिए हम उनकी संख्याएँ नहीं, उनका मूल्य जोड़ते हैं। हम किसी एक विशेष वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की गणना करते हैं, पाँच वर्षों की नहीं। और हम सभी वस्तुओं का नहीं, सिर्फ़ अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य जोड़ते हैं, ताकि किसी मूल्य की गणना दो बार न हो।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 23), 3. मूल्य की विधि से हर चरण में जोड़े गए मूल्य की गणना कैसे करेंगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: हर चरण में जोड़ा गया मूल्य = उस चरण का बिक्री मूल्य − उसमें लगी मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य। पृष्ठ 22 के उदाहरण में मान लीजिए चारों पैकेट 1 कि.ग्रा. आटे से बने और चीनी-तेल को अभी छोड़ दें: किसान ₹20 जोड़ता है (गेहूँ), मिल ₹25 − ₹20 = ₹5, और बिस्कुट कंपनी ₹80 − ₹25 = ₹55। कुल ₹20 + ₹5 + ₹55 = ₹80, यानी ठीक अंतिम वस्तु का मूल्य। इसीलिए सिर्फ़ अंतिम वस्तु गिनना काफ़ी है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 24). आलेख 1 देखकर उत्तर दीजिए:
- 11977-78 में सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक कौन था?
- 22017-18 में सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक कौन था?
- 3तीस वर्षों में किस क्षेत्रक में सबसे ज़्यादा संवृद्धि हुई?
- 42017-18 में भारत का जी.डी.पी. क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: (1) प्राथमिक क्षेत्रक। (2) तृतीयक क्षेत्रक; उसने प्राथमिक की जगह ली। (3) तृतीयक क्षेत्रक। आलेख 1977–78 से 2017–18 तक का है, यानी चालीस वर्ष, जैसा पृष्ठ 24 का पाठ कहता है; प्रश्न में “तीस वर्षों” छपा है। (4) आलेख पढ़कर लगभग 1,20,00,000 करोड़ रुपये: 2017–18 वाले दंड का सिरा बाएँ अक्ष (रुपये करोड़) की 12000000 वाली रेखा पर है। दंडों पर मान नहीं लिखे हैं, इसलिए यह आलेख से पढ़ा गया अनुमान है। ध्यान रहे, आलेख 1 तीनों क्षेत्रकों का जोड़, यानी जी.वी.ए., दिखाता है (पृष्ठ 23)।
हाशिये का प्रश्न (पृष्ठ 24). 1977-78 और 2017-18 की तुलना क्या दिखाती है? इससे क्या निष्कर्ष निकलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कुल उत्पादन बहुत बढ़ा और तीनों क्षेत्रकों का उत्पादन बढ़ा, पर सबसे ज़्यादा तृतीयक का। निष्कर्ष: भारत में उत्पादन के हिसाब से तृतीयक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 27), 1. आलेख 2 और 3 से “जी.वी.ए. और रोज़गार में प्राथमिक क्षेत्रक की हिस्सेदारी” वाली तालिका (पृष्ठ 27) भरिए। 40 वर्षों में प्राथमिक क्षेत्रक में क्या परिवर्तन दिखता है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
1977–78 2017–18 सकल मूल्य वर्धित (जी.वी.ए.) आधे से थोड़ा कम (आलेख 2 में नीला हिस्सा) लगभग एक-छठा (पृष्ठ 26) रोज़गार में हिस्सेदारी 71% 44% आलेख 2 के दंडों पर मान नहीं लिखे हैं, इसलिए जी.वी.ए. वाली पंक्ति शब्दों में भरी गई है; रोज़गार के आँकड़े आलेख 3 पर छपे हैं।
परिवर्तन: जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का हिस्सा बहुत तेज़ी से घटा, पर रोज़गार में उसका हिस्सा उतना नहीं घटा। आज भी सबसे ज़्यादा लोग इसी क्षेत्रक में हैं, जबकि उत्पादन में इसका हिस्सा छोटा है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 27), 2. सही उत्तर चुनिए: अल्प बेरोज़गारी तब होती है जब लोग
- अकाम करना नहीं चाहते हैं;
- बसुस्त ढंग से काम कर रहे हैं;
- सअपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं;
- दउनके काम के लिए भुगतान नहीं किया जाता है।
उत्तर देखिए
उत्तर: (स) अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 27), 3. विकसित देशों में देखे गए लक्षण की भारत के परिवर्तनों से तुलना कीजिए। भारत में क्षेत्रकों के बीच कौन-से परिवर्तन वांछित थे, जो नहीं हुए?
उत्तर देखिए
उत्तर: विकसित देशों में उत्पादन और रोज़गार, दोनों प्राथमिक से द्वितीयक और फिर तृतीयक की ओर गए। भारत में उत्पादन तो तृतीयक की ओर गया (2017–18 में वह सबसे बड़ा उत्पादक), पर रोज़गार नहीं: 2017–18 में भी 44 प्रतिशत लोग प्राथमिक क्षेत्रक में थे और वही सबसे बड़ा नियोक्ता है। वांछित था कि द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में इतने रोज़गार बनते कि खेती से लोग वहाँ जा सकते; ऐसा नहीं हुआ।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 27), 4. हमें अल्प बेरोज़गारी के बारे में क्यों सोचना चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि यह दिखती नहीं: सब काम पर लगे लगते हैं, पर किसी को पूरा काम और पूरी आय नहीं मिलती। लक्ष्मी जैसे लाखों किसान हैं। अगर ऐसे कुछ लोगों को कहीं और ठीक रोज़गार मिले, तो खेती का उत्पादन नहीं घटेगा और परिवार की कुल आय बढ़ेगी। यानी इस पर ध्यान देने से आय और उत्पादन, दोनों बढ़ सकते हैं।
हाशिये का प्रश्न (पृष्ठ 28). आपके क्षेत्र में किस समूह के लोग बेरोज़गार या अल्प बेरोज़गार हैं? क्या आप कुछ उपाय सुझा सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: अपने क्षेत्र को देखिए। किताब के उदाहरण मदद करेंगे: वर्षा पर निर्भर छोटे किसान परिवार, शहर के अनियत श्रमिक, सड़क पर बेचने वाले। उपाय भी किताब से: सिंचाई (कुआँ, बाँध, नहर), ग्रामीण सड़कें और भण्डारण, बैंक से सस्ता साख, दाल मिल, शीत भण्डारण और प्रसंस्करण जैसे अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग, और पर्यटन या क्षेत्रीय शिल्प।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 29), 1. आपके विचार से म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. या विकसित भारत – जी राम जी 2025 को ‘काम का अधिकार’ क्यों कहा गया है?
उत्तर देखिए
उत्तर: म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. ने काम को लोगों का हक़ बना दिया: काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले हर व्यक्ति को ग्रामीण क्षेत्र में साल में 100 दिन के काम की गारंटी दी गई, और सरकार काम न दे पाए, तो उसे बेरोज़गारी भत्ता देना था। काम माँगने पर काम या भत्ता मिलना ही काम का अधिकार है। 2025 में इसका स्थान विकसित भारत - जी राम जी 2025 ने लिया।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 29), 2. मान लीजिए आप ग्राम प्रधान हैं। ऐसे काम सुझाइए जिनसे लोगों की आय बढ़े और जिन्हें इस अधिनियम में शामिल किया जाना चाहिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: अधिनियम में उन कामों को वरीयता थी जिनसे भूमि से उत्पादन बढ़े। इसलिए: सिंचाई के लिए कुएँ, तालाब और नहरें; खेतों तक पक्की ग्रामीण सड़कें, ताकि उपज बाज़ार पहुँचे; और गाँव में अनाज के भण्डारण की जगह। इनसे काम करने वालों को मज़दूरी मिलेगी, और बाद में खेती का उत्पादन और आय भी बढ़ेगी।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 29), 3. अगर किसानों को सिंचाई और विपणन सुविधाएँ मिलें, तो रोज़गार और आय कैसे बढ़ेगी?
उत्तर देखिए
उत्तर: सिंचाई से रबी में दूसरी फसल हो सकेगी; एक हेक्टेयर गेहूँ दो लोगों को 50 दिन काम देता है, यानी परिवार के खाली बैठे सदस्यों को अपने खेत पर काम मिलेगा। विपणन (सड़क, परिवहन, भण्डारण) से किसान उपज शहर तक ले जाकर बेच सकेंगे और परिवहन और व्यापार में लगे लोगों को भी रोज़गार मिलेगा। ज़्यादा उपज और बेहतर बिक्री से आय बढ़ेगी।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 29), 4. शहरी क्षेत्रों में रोज़गार कैसे बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब के सुझाव: लघु उद्योगों को कच्चा माल और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद; पर्यटन, क्षेत्रीय शिल्प और सूचना प्रौद्योगिकी जैसी नई सेवाएँ; और शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार, जिसमें अध्यापक, डॉक्टर और नर्स चाहिए। साथ में आकस्मिक श्रमिकों को संरक्षण, ताकि काम पक्का हो।
बॉक्स (पृष्ठ 30). क्या आप कान्ता और कमल के रोज़गार की परिस्थितियों में अंतर देखते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ। कान्ता के काम के घंटे तय हैं (9.30 से 5.30), उसे हर माह नियमित वेतन, भविष्य निधि, चिकित्सीय भत्ते, रविवार का सवेतन अवकाश और नियुक्ति-पत्र मिलता है। कमल 7.30 से 8 बजे तक काम करता है, उसे सिर्फ़ दैनिक मज़दूरी मिलती है, कोई छुट्टी या भत्ता नहीं, कोई पत्र नहीं, और उसे कभी भी हटाया जा सकता है। कान्ता संगठित क्षेत्रक में है, कमल असंगठित में।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 31), 1. इनमें से कौन असंगठित क्षेत्रक की गतिविधियाँ हैं? विद्यालय में पढ़ाता शिक्षक; बाज़ार में पीठ पर सीमेन्ट की बोरी ढोता श्रमिक; अपने खेत की सिंचाई करता किसान; अस्पताल में मरीज़ का इलाज करता डॉक्टर; ठेकेदार के अधीन काम करता दैनिक मज़दूर; बड़े कारखाने में काम करने जाता कारखाना श्रमिक; अपने घर में काम करता करघा बुनकर।
उत्तर देखिए
उत्तर: असंगठित: सीमेन्ट की बोरी ढोता श्रमिक, अपने खेत पर किसान, ठेकेदार के अधीन दैनिक मज़दूर, और घर में काम करता करघा बुनकर। शिक्षक, डॉक्टर और बड़े कारखाने का श्रमिक संगठित क्षेत्रक में गिने जाएँगे, अगर उनकी नियुक्ति नियमित है और नियमों के लाभ मिलते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 31), 2. संगठित क्षेत्रक के एक नियमित कर्मचारी और असंगठित क्षेत्रक के एक व्यक्ति से बात करके उनकी कार्य-स्थितियों की तुलना कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: बातचीत में ये बातें पूछिए: काम के घंटे, वेतन कब और कैसे मिलता है, छुट्टी और सवेतन अवकाश, भविष्य निधि और चिकित्सीय लाभ, नियुक्ति-पत्र, और काम से हटाए जाने का डर। उत्तरों को हिस्सा 9 की संगठित-असंगठित तालिका के खानों में लिखकर तुलना कीजिए।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 31), 3. संगठित और असंगठित क्षेत्रक में भेद अपने शब्दों में समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: संगठित क्षेत्रक में काम पक्का होता है: उद्यम सरकार से पंजीकृत है, कानून माने जाते हैं, वेतन नियमित है, और छुट्टी, भविष्य निधि, चिकित्सा जैसे लाभ मिलते हैं। असंगठित क्षेत्रक में काम कच्चा होता है: छोटी, बिखरी इकाइयाँ, नियमों का पालन नहीं, कम और अनियमित मज़दूरी, और कभी भी काम से हटाए जाने का डर।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 31), 4. 1990 के अंत में संगठित और असंगठित क्षेत्रक में भारत के श्रमिकों की अनुमानित संख्या वाली सारणी के खाली खाने भरिए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: भरी हुई तालिका ऊपर हिस्सा 9 में है (असंगठित प्राथमिक 231, कुल असंगठित 393, कुल 475; संगठित लगभग 17%, असंगठित लगभग 83%)।
- असंगठित क्षेत्रक में कृषि में लगे लोगों का प्रतिशत: 231 ÷ 393 × 100 = लगभग 59 प्रतिशत। यानी असंगठित क्षेत्रक के आधे से ज़्यादा श्रमिक कृषि (प्राथमिक क्षेत्रक) में हैं।
- क्या कृषि असंगठित क्षेत्रक की गतिविधि है? हाँ। प्राथमिक क्षेत्रक के 232 में से 231 श्रमिक असंगठित हैं, संगठित सिर्फ़ 1। ज़्यादातर किसान अपने खेत पर काम करते हैं और ज़रूरत पर मज़दूर लगाते हैं; न नियमित वेतन है, न पंजीकरण, न नियमों के लाभ।
- रिक्त स्थान: भारत में लगभग 83 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं। भारत में लगभग 17 प्रतिशत श्रमिकों को ही संगठित क्षेत्रक में रोज़गार उपलब्ध है।
स्मरण कीजिए (पृष्ठ 33). तालिका 2.4 “आर्थिक क्रियाकलापों का वर्गीकरण” भरिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
क्षेत्रक इस्तेमाल की गई कसौटी सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष इंगित समस्याएँ और उनका समाधान प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक कार्य का स्वभाव उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक सबसे आगे हो गया, पर रोज़गार अब भी सबसे ज़्यादा प्राथमिक में है कृषि में अल्प बेरोज़गारी; समाधान: सिंचाई, सड़क और भण्डारण, सस्ता साख, अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन में रोज़गार, म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. संगठित, असंगठित रोज़गार की परिस्थितियाँ ज़्यादातर श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं कम, अनियमित मज़दूरी, कोई सुरक्षा नहीं, शोषण; समाधान: ज़्यादा रोज़गार के साथ संरक्षण और सहायता, छोटे किसानों और लघु उद्योगों को मदद
ज्ञात करें (पृष्ठ 33). आधुनिक दिनों में सरकार किन गतिविधियों पर व्यय करती है, और क्यों?
उत्तर देखिए
उत्तर: जवाब किताब के अगले पृष्ठ पर है, और ऊपर हिस्सा 11 में: बहुत महँगी सुविधाएँ (सड़क, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली, बाँध), सरकारी समर्थन वाले काम (उद्योगों को सस्ती बिजली, अनाज की ख़रीद और राशन की दुकानें), और सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा। कारण: निजी क्षेत्रक ये चीज़ें उचित कीमत पर नहीं देता, और कुछ की ज़िम्मेदारी सरकार की ही है।
झटपट दोहराइए
1. तीनों क्षेत्रकों के दूसरे नाम क्या हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्राथमिक: कृषि एवं सहायक क्षेत्रक; द्वितीयक: औद्योगिक क्षेत्रक; तृतीयक: सेवा क्षेत्रक।
2. स.घ.उ. में मध्यवर्ती वस्तुएँ क्यों नहीं गिनी जातीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि उनका मूल्य अंतिम वस्तु के मूल्य में पहले से शामिल है; बिस्कुट के ₹80 में आटे के ₹25 शामिल हैं।
3. भारत में स.घ.उ. कौन मापता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: केन्द्र सरकार का एक मंत्रालय, राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों के सरकारी विभागों की मदद से।
4. 2017–18 में सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक और सबसे बड़ा नियोक्ता कौन था?
उत्तर देखिए
उत्तर: सबसे बड़ा उत्पादक तृतीयक क्षेत्रक; सबसे बड़ा नियोक्ता प्राथमिक क्षेत्रक (रोज़गार में 44 प्रतिशत)।
5. रोज़गार में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी 1977–78 और 2017–18 में कितनी थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1977–78: प्राथमिक 71, द्वितीयक 11, तृतीयक 18 प्रतिशत; 2017–18: 44, 25, 31 प्रतिशत (आलेख 3)।
6. प्राथमिक क्षेत्रक से रोज़गार दूसरे क्षेत्रकों में क्यों नहीं गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में रोज़गार के पर्याप्त अवसर नहीं बने; सेवा क्षेत्रक में उत्पादन 14 गुना बढ़ा, पर रोज़गार 5 गुना से भी कम।
7. छिपी हुई बेरोज़गारी की पहचान क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: लोग काम करते दिखते हैं, पर कुछ लोगों को हटा दें तो भी उत्पादन नहीं घटता; जैसे लक्ष्मी के खेत से दो सदस्यों का जाना।
8. म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005 में क्या गारंटी थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले सभी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में साल में 100 दिन का रोज़गार; काम न मिले तो बेरोज़गारी भत्ता।
9. संगठित क्षेत्रक का नाम “संगठित” क्यों है?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि इसकी कुछ औपचारिक प्रक्रिया और कार्यविधि है: पंजीकरण और सरकारी नियमों का पालन।
10. भारत में कितने प्रतिशत ग्रामीण परिवार छोटे और सीमांत किसान हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग 80 प्रतिशत।
11. सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक किस आधार पर बँटते हैं? एक-एक उदाहरण।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्वामित्व के आधार पर। सार्वजनिक: रेलवे या डाकघर; निजी: टिस्को या रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड।
12. सरकार स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च क्यों करती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि इन पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है: सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा, ख़ासकर प्राथमिक शिक्षा, सरकार का कर्त्तव्य है।