Chapter 2भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

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NCERT, आर्थिक विकास की समझ (कक्षा 10), अध्याय 2

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अध्याय 2 — भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक · आर्थिक विकास की समझ · कक्षा 10

कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 19 से 37

यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के नीचे एक हैं। उद्धरण-चिह्नों के भीतर सिर्फ़ किताब के शब्द हैं, और स्लाइड के ऊपर किताब का पृष्ठ लिखा है। जो बात हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है।

बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।

कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:

  • कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर आर्थिक गतिविधियाँ और तीन क्षेत्रक
  • कालांश 2 — तीन क्षेत्रकों की तुलना: कुल उत्पादन की गणना
  • कालांश 3 — क्षेत्रकों में ऐतिहासिक परिवर्तन (आलेख 1 समेत)
  • कालांश 4 — उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्त्व
  • कालांश 5 — अधिकांश लोग कहाँ नियोजित हैं: अल्प बेरोज़गारी
  • कालांश 6 — अतिरिक्त रोज़गार का सृजन
  • कालांश 7 — संगठित और असंगठित क्षेत्रक
  • कालांश 8 — असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण (प्रश्न 23 समेत)
  • कालांश 9 — सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक
  • कालांश 10 — सारांश, प्रश्नावली और समापन

पहले यह पढ़िए — किताब का पहला सवाल

पृष्ठ 19

?

हमारे चारों ओर हर समय आर्थिक गतिविधियाँ चलती हैं। कुछ वस्तुएँ बनाती हैं, कुछ सेवाएँ। इन्हें समझें कैसे?

किताब का रास्ता: इन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण मानदंडों के आधार पर समूहों में बाँट दीजिए। इन समूहों को क्षेत्रक कहते हैं।

आपके घर या मोहल्ले का कोई एक बड़ा व्यक्ति रोज़ी के लिए क्या काम करता है? पर्ची पर लिखिए, नाम मत लिखिए।

अध्याय का नक्शा

तीन वर्गीकरण, पृष्ठ 18 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से

  • पहले कार्य के स्वभाव से तीन क्षेत्रक: प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक
  • फिर भारत: उत्पादन में कौन आगे निकला, और लोग कहाँ काम करते हैं
  • फिर रोज़गार की परिस्थितियों से: संगठित और असंगठित
  • आख़िर में स्वामित्व से: सार्वजनिक और निजी

हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ सँभालकर रखिए। आख़िरी कालांश में वे फिर काम आएँगी।

1 | आर्थिक गतिविधियाँ और तीन क्षेत्रक

किताब के पहले पृष्ठ के चित्र देखिए। हर व्यक्ति क्या कर रहा है: कुछ उगा रहा है, कुछ बना रहा है, या कोई सेवा दे रहा है?

कार्य के स्वभाव से तीन क्षेत्रक

पृष्ठ 20

क्षेत्रकदूसरा नामक्या करता हैउदाहरण
प्राथमिककृषि एवं सहायक क्षेत्रकप्राकृतिक संसाधनों के सीधे उपयोग से वस्तुएँकपास, दूध, खनिज और अयस्क
द्वितीयकऔद्योगिक क्षेत्रकप्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण से दूसरे रूप में बदलता हैकपास से सूत और कपड़ा, गन्ने से चीनी और गुड़, मिट्टी से ईंट
तृतीयकसेवा क्षेत्रकवस्तुएँ नहीं, सेवाएँ; बाक़ी दोनों के विकास में मददपरिवहन, भण्डारण, संचार, बैंक सेवाएँ, व्यापार

प्राथमिक क्यों कहते हैं?

पृष्ठ 20

  • यह उन सभी उत्पादों का आधार है, जो हम आगे बनाते हैं
  • कपास के लिए हम मुख्यतः, न कि पूरी तरह, वर्षा, धूप और जलवायु पर निर्भर हैं; इसलिए कपास प्राकृतिक उत्पाद है
  • ज़्यादातर प्राकृतिक उत्पाद कृषि, डेयरी, मत्स्य और वनों से आते हैं

हमारी ओर से: बीज, पानी और मेहनत किसान लगाता है, फिर भी फसल मुख्यतः प्रकृति पर टिकी है। इसी बात पर रुकिए।

वे सेवाएँ जो उत्पादन में सीधे मदद नहीं करतीं

पृष्ठ 20

  • शिक्षक, डॉक्टर, धोबी, नाई, मोची और वकील की व्यक्तिगत सेवाएँ
  • प्रशासन और लेखा का काम करने वाले लोग

ये सब भी तृतीयक क्षेत्रक में आती हैं। किताब अलग से यह भी कहती है कि सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित कुछ नई सेवाएँ, जैसे इंटरनेट कैफे, ए.टी.एम. बूथ, कॉल सेंटर और सॉफ्टवेयर कंपनी, भी महत्त्वपूर्ण हो गई हैं।

ट्रक वाले हड़ताल कर दें, तो शहर में क्या होगा? और गाँव के किसान का क्या होगा?

तालिका 2.1: एक क्षेत्रक दूसरे पर टिका है

पृष्ठ 21 · पहली पंक्ति का निष्कर्ष किताब में छपा है, बाक़ी तीन हमारी ओर से

उदाहरणयह क्या दिखाता है
किसान चीनी मिल को गन्ना बेचने से मना कर दें, तो मिल बंद हो जाएगीद्वितीयक क्षेत्रक प्राथमिक पर निर्भर है
कंपनियाँ भारत से कपास न ख़रीदकर बाहर से मँगाएँ, तो कपास की खेती कम लाभकारी रह जाएगीप्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक (कपड़ा उद्योग) पर निर्भर है
उर्वरक और पम्पसेट महँगे हों, तो खेती की लागत बढ़ेगी और किसान का लाभ घटेगाप्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक (उर्वरक, पम्पसेट बनाने वाले उद्योग) पर निर्भर है
ट्रांसपोर्टर हड़ताल कर दें, तो शहरों में भोजन की कमी होगी और किसान उपज नहीं बेच पाएँगेप्राथमिक क्षेत्रक तृतीयक (परिवहन) पर निर्भर है, और उद्योग व सेवा क्षेत्रक में काम करने वाले लोग भोजन के लिए प्राथमिक पर

पृष्ठ 21 के चौदह काम

पृष्ठ 21 की गतिविधि, प्रश्न 3 · उत्तर हमारी ओर से

प्राथमिकद्वितीयकतृतीयक
फूल की खेती करने वाला, मछुआरा, मधुमक्खी पालकदर्जी, टोकरी बुनकर, दियासलाई कारखाना में श्रमिक, कुम्हारदूध-विक्रेता, पुजारी, कूरियर पहुँचाने वाला, महाजन, माली, अंतरिक्ष-यात्री, कॉल सेंटर का कर्मचारी

दो काम, दो उत्तर

पृष्ठ 21 की गतिविधि, प्रश्न 3 · हमारी ओर से

  • दूध-विक्रेता दूध बेचता है, यानी व्यापार: तृतीयक। ख़ुद पशु पालकर दूध निकाले, तो डेयरी: प्राथमिक
  • माली दूसरों के बगीचे की देखभाल की सेवा देता है: तृतीयक। पौधे उगाकर बेचे, तो प्राथमिक

कसौटी एक ही है: व्यक्ति असल में कौन-सा काम कर रहा है।

2 | तीन क्षेत्रकों की तुलना: कुल उत्पादन की गणना

कारें, कम्प्यूटर, कीलें और फ़र्नीचर: इन्हें गिनकर एक संख्या कैसे बनाएँ?

संख्या नहीं, मूल्य

पृष्ठ 22

  • 10,000 कि.ग्रा. गेहूँ ₹20 प्रति कि.ग्रा. पर बिके, तो मूल्य ₹2,00,000
  • 5000 नारियल ₹15 प्रति नारियल पर बिकें, तो मूल्य ₹75,000
  • इसी तरह तीनों क्षेत्रकों की वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य निकालकर जोड़ते हैं

हमारी ओर से: अलग-अलग चीज़ों की संख्या नहीं जुड़ती, रुपये जुड़ जाते हैं।

किसान, आटा-मिल और बिस्कुट कंपनी: तीनों की बिक्री जोड़ दें, तो क्या ग़लत होगा?

गेहूँ से बिस्कुट तक

पृष्ठ 22

किसने बेचाकिसेक्या, किस दाम परकैसी वस्तु
किसानआटा-मिलगेहूँ, ₹20 प्रति कि.ग्रा.मध्यवर्ती
आटा-मिलबिस्कुट कंपनीआटा, ₹25 प्रति कि.ग्रा.मध्यवर्ती
बिस्कुट कंपनीउपभोक्ताबिस्कुट के 4 पैकेट, ₹80 (₹20 प्रति पैकेट)अंतिम

सिर्फ़ अंतिम वस्तु गिनिए

पृष्ठ 22

₹80

बिस्कुट के ₹80 में आटे के ₹25 पहले से शामिल हैं

गेहूँ और आटा अलग से गिनें, तो एक ही मूल्य कई बार गिना जाएगा।

हर चरण में कितना जुड़ा

पृष्ठ 23 की गतिविधि, प्रश्न 3 · हमारी ओर से

₹80

किसान ₹20 · मिल ₹25 − ₹20 = ₹5 · बिस्कुट कंपनी ₹80 − ₹25 = ₹55

मान लीजिए चारों पैकेट 1 कि.ग्रा. आटे से बने और चीनी-तेल अभी छोड़ दें। तीनों जोड़िए: ₹20 + ₹5 + ₹55 = ₹80, ठीक अंतिम वस्तु का मूल्य। इसीलिए अंतिम वस्तु गिनना काफ़ी है।

सकल घरेलू उत्पाद (स.घ.उ.)

“यह किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 23

स.घ.उ. और जी.वी.ए.

पृष्ठ 23

  • “स. घ. उ. अर्थव्यवस्था की विशालता प्रदर्शित करता है।”
  • भारत में इसे केन्द्र सरकार का एक मंत्रालय मापता है, राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों के सरकारी विभागों की मदद से
  • हाल ही में सरकार ने, वैश्विक प्रथाओं की तरह, क्षेत्रकों के लिए स.घ.उ. की जगह सकल मूल्य वर्धित (जी.वी.ए.) लिया है: “जी.वी.ए. करों तथा सब्सिडी के लिए समायोजन के बाद अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों के योगदान को मापता है।”

दोनों का पूरा अंतर बच्चे ऊँची कक्षाओं में पढ़ेंगे।

3 | क्षेत्रकों में ऐतिहासिक परिवर्तन

सौ-दो सौ साल पहले ज़्यादातर लोग कौन-सा काम करते होंगे? और आज के विकसित देशों में?

विकसित देशों की तीन अवस्थाएँ

पृष्ठ 23

अवस्थासबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रकक्या हुआ
शुरुआतप्राथमिकखेती सुधरी, शिल्पी और व्यापारी बढ़े, फिर भी ज़्यादातर वस्तुएँ प्राकृतिक और ज़्यादातर लोग इसी क्षेत्रक में
सौ वर्षों से ज़्यादा बादद्वितीयकविनिर्माण की नई प्रणाली से कारखाने फैले; खेतों के बहुत से लोग कारखानों में, किताब के अनुसार मजबूर भी किए गए
पिछले 100 वर्षतृतीयककुल उत्पादन में सेवा क्षेत्रक का महत्त्व बढ़ा, और ज़्यादातर श्रमजीवी लोग इसी में नियोजित

उत्पादन और रोज़गार, दोनों साथ

पृष्ठ 23

100

विगत 100 वर्षों में विकसित देशों में कुल उत्पादन में भी सेवा क्षेत्रक आगे, और ज़्यादातर श्रमजीवी लोग भी इसी में

हमारी ओर से: वहाँ उत्पादन और रोज़गार एक ही दिशा में बदले। भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ, यह कालांश 5 में देखेंगे।

क्या भारत में भी उत्पादन इसी तरह बदला? आलेख 1 देखिए।

आलेख 1 कैसे पढ़ें

पृष्ठ 24

  • दो वर्ष: 1977–78 और 2017–18, यानी चालीस वर्ष
  • तीनों क्षेत्रकों का जी.वी.ए., रुपये (करोड़) में
  • दंडों के सिरों पर मान नहीं छपे, बाएँ अक्ष पर सिर्फ़ पैमाना है; इसलिए बात शब्दों में कहिए: कौन बड़ा, कौन छोटा

हमारी ओर से: 2017–18 का जी.डी.पी. बोर्ड पर लिखें, तो “लगभग 1,20,00,000 करोड़ रुपये, आलेख पढ़कर” लिखिए; यह छपी संख्या नहीं है।

आलेख 1 के उत्तर

पृष्ठ 24 की गतिविधि, प्रश्न 1 से 3 · उत्तर हमारी ओर से

1977–78

  • सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक: प्राथमिक

2017–18

  • सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक: तृतीयक
  • इसी में सबसे ज़्यादा वृद्धि हुई

तृतीयक क्षेत्रक ने प्राथमिक की जगह ले ली।

4 | उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्त्व

सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक

पृष्ठ 24

2017–18

प्राथमिक क्षेत्रक की जगह लेकर तृतीयक क्षेत्रक भारत का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बना

चालीस वर्षों में सभी क्षेत्रकों का उत्पादन बढ़ा, पर सबसे ज़्यादा वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई।

तृतीयक क्षेत्रक इतना आगे क्यों निकल गया? हर समूह दो कारण सोचे।

किताब के चार कारण

पृष्ठ 24–25

कारणकिताब क्या बताती है
बुनियादी सेवाएँअस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक एवं तार, थाना, कचहरी, नगर निगम, रक्षा, परिवहन, बैंक, बीमा; विकासशील देश में इनकी ज़िम्मेदारी सरकार उठाती है
कृषि और उद्योग का विकासपरिवहन, व्यापार, भण्डारण जैसी सेवाओं की माँग बढ़ती है
आय बढ़ने पररेस्तरां, पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, निजी विद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण की माँग
सूचना और संचार प्रौद्योगिकीइन पर आधारित नई सेवाएँ ज़रूरी हो गई हैं, और इनका उत्पादन तेज़ी से बढ़ रहा है

पर एक सावधानी

“सेवा क्षेत्रक की सभी सेवाओं में समान रूप से संवृद्धि नहीं हो रही है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 25

सेवा क्षेत्रक के दो तरह के लोग

पृष्ठ 25

एक ओर

  • सीमित संख्या में ऐसी सेवाएँ
  • जिनमें बहुत कुशल और शिक्षित श्रमिकों को रोज़गार मिलता है

दूसरी ओर

  • बहुत बड़ी संख्या में लोग छोटी दुकानों, मरम्मत, परिवहन जैसी सेवाओं में
  • मुश्किल से गुज़ारा, क्योंकि कोई दूसरा अवसर नहीं

इसलिए सेवा क्षेत्रक के कुछ ही भागों का महत्त्व बढ़ रहा है।

उत्पादन बदल गया। क्या लोगों का काम भी उतना बदला? अनुमान लिखिए: 2017–18 में सौ में से कितने लोग प्राथमिक क्षेत्रक में काम करते थे?

5 | अधिकांश लोग कहाँ नियोजित हैं: अल्प बेरोज़गारी

आलेख 3: रोज़गार में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी (%)

पृष्ठ 25 · ये आँकड़े आलेख पर छपे हैं

वर्षप्राथमिकद्वितीयकतृतीयक
1977–78711118
2017–18442531

आज भी सबसे बड़ा नियोक्ता

पृष्ठ 25–26 · आलेख 3, 2017–18

44%

सौ में से 44 श्रमिक प्राथमिक क्षेत्रक में, जो तीनों में सबसे ज़्यादा है

पर जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का योगदान लगभग एक-छठा ही है।

रोज़गार उतना क्यों नहीं बदला

पृष्ठ 25–26

  • द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में रोज़गार के पर्याप्त अवसर नहीं बने
  • “सेवा क्षेत्रक में उत्पादन में 14 गुना वृद्धि हुई, परन्तु रोज़गार में 5 गुना से भी कम”
  • उद्योग में भी रोज़गार लगभग 3 गुना ही बढ़ा

नतीजा: खेती में ज़रूरत से ज़्यादा लोग लगे हैं।

लक्ष्मी के परिवार के पाँचों लोग साल भर अपने खेत पर काम करते हैं। क्या इस परिवार में कोई बेरोज़गार है?

लक्ष्मी का खेत

पृष्ठ 26

पहले

  • दो हेक्टेयर असिंचित भूमि, सिर्फ़ वर्षा पर निर्भर
  • ज्वार और अरहर की फसल
  • परिवार के पाँचों सदस्य साल भर उसी खेत पर
  • हर कोई कुछ काम कर रहा है, पर किसी को पूरा रोज़गार नहीं

सुखराम के आने पर

  • भूस्वामी सुखराम एक या दो सदस्यों को भाड़े पर ले जाता है
  • मज़दूरी से परिवार की आय बढ़ती है
  • खेत का उत्पादन नहीं घटता

यानी वे दो लोग खेत पर ज़रूरी नहीं थे। भारत में लक्ष्मी जैसे लाखों किसान हैं।

इसका नाम

“इस प्रकार की अल्प बेरोज़गारी को छिपी हुई बेरोज़गारी कहते हैं”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 26

खुली और छिपी बेरोज़गारी

पृष्ठ 26 · परिभाषाएँ किताब की, बाक़ी खाने हमारी ओर से

खुली बेरोज़गारीछिपी हुई (प्रच्छन्न) बेरोज़गारी
कामकोई काम नहीं, बेकार बैठे हैंकाम करते दिखते हैं, पर क्षमता से कम
दिखती है?साफ़ दिखती हैछिपी रहती है, क्योंकि सब काम पर हैं
कुछ लोग हटें तोसवाल ही नहीं, वे काम पर नहीं हैंउत्पादन नहीं घटता
उदाहरणकाम खोजता बेरोज़गार व्यक्तिलक्ष्मी का परिवार

शहर में भी अल्प बेरोज़गारी

पृष्ठ 26

  • सेवा क्षेत्रक के हज़ारों अनियत श्रमिक, जैसे प्लम्बर, पेन्टर, मरम्मत करने वाले, रोज़ काम खोजते हैं
  • उनमें से कई को रोज़ काम नहीं मिलता
  • सड़कों पर ठेला खींचने या चीज़ें बेचने वाले लोग, “जहाँ वे पूरा दिन बिता देते हैं, परन्तु बहुत कम कमा पाते हैं।”

वे यह काम इसलिए करते हैं कि उनके पास कोई बेहतर अवसर नहीं है।

6 | अतिरिक्त रोज़गार का सृजन

लक्ष्मी के परिवार के जो हाथ खेत पर ज़रूरी नहीं, उन्हें काम कैसे मिले?

पहले खेत पर ही काम

पृष्ठ 27–28

सिंचाई

  • कोई कुआँ खुदे, या सरकार नया बाँध या नहर बनाए
  • कई खेतों की सिंचाई होगी, और रबी में दूसरी फसल हो सकेगी
  • एक हेक्टेयर गेहूँ दो लोगों को 50 दिन काम देता है

सड़क, भण्डारण और साख

  • बेहतर ग्रामीण सड़कें, परिवहन और भण्डारण, ताकि किसान उपज बेच सकें
  • इनसे परिवहन और व्यापार में लगे लोगों को भी काम
  • बीज, उर्वरक, उपकरण और पम्पसेट के लिए साहूकार से ऊँचे ब्याज पर उधार की जगह, स्थानीय बैंक से उचित ब्याज पर सस्ता कृषि साख

पृष्ठ 28 पर “अध्याय–4 मुद्रा एवं साख” छपा है, पर इस किताब में मुद्रा और साख अध्याय 3 है; साख की पूरी बात वहीं है।

गाँव के पास नए काम

पृष्ठ 28

  • अर्द्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग: दाल मिल, शहद संग्रह केन्द्र
  • शीत भण्डारण, जहाँ किसान आलू और प्याज़ रखकर अच्छी कीमत पर बेच सकें
  • सब्ज़ियों और फलों का प्रसंस्करण

हमारी ओर से: कामों वाले चार्ट पर इनमें से एक काम सही खाने में जोड़िए।

शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन

पृष्ठ 28–29

क्षेत्रकिताब क्या बताती है
शिक्षा60 प्रतिशत जनसंख्या 5–29 वर्ष की है, और इनमें से लगभग 51 प्रतिशत ही विद्यालय जाते हैं
शिक्षा में रोज़गारयोजना आयोग (अब नीति आयोग) के एक अध्ययन के अनुसार अकेले शिक्षा में लगभग 20 लाख रोज़गार बन सकते हैं
स्वास्थ्यगाँवों में डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य कर्मचारी चाहिए
पर्यटनपर्यटन सुधरे, तो हर साल 35 लाख से ज़्यादा लोगों को काम मिल सकता है

काम का अधिकार

पृष्ठ 29 · म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005, लगभग 625 जिलों में

100

काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले सभी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में साल में 100 दिन के रोज़गार की गारंटी दी गई थी

सरकार काम न दे पाए, तो बेरोज़गारी भत्ता; और वरीयता उन कामों को, जिनसे भूमि से उत्पादन बढ़े।

2025 का बदलाव

पृष्ठ 29

  • चर्चा किए गए कुछ सुझावों के अमल में लंबा समय लगेगा, इसलिए छोटी अवधि के लिए यह कानून बना
  • 2025 में इस अधिनियम का स्थान विकसित भारत-रोज़गार गारंटी और आजीविका मिशन (विकसित भारत - जी राम जी 2025) ने ले लिया

हमारी ओर से: किताब नए अधिनियम की शर्तें नहीं देती; प्रश्न 17 और पृष्ठ 29 का प्रश्न 1 दोनों अधिनियमों का नाम लेते हैं, उत्तर किताब में दिए 2005 वाले अधिनियम पर लिखवाइए।

मान लीजिए आप ग्राम प्रधान हैं। ऐसे कौन-से काम सुझाएँगे जिनसे लोगों की आय बढ़े और जो इस अधिनियम में शामिल हों?

ग्राम प्रधान की सूची

पृष्ठ 29 की गतिविधि, प्रश्न 2 · नमूना उत्तर हमारी ओर से

  • सिंचाई के लिए कुएँ, तालाब और नहरें
  • खेतों तक पक्की ग्रामीण सड़कें
  • गाँव में अनाज के भण्डारण की जगह

इन कामों से अभी मज़दूरी मिलती है, और बाद में भूमि से उत्पादन बढ़ता है।

7 | संगठित और असंगठित क्षेत्रक

कान्ता एक कार्यालय में काम करती है, कमल एक किराना दुकान पर। दोनों में किसका काम ज़्यादा पक्का है, और क्यों?

कान्ता और कमल

पृष्ठ 30

कान्ता, कार्यालय में

  • सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक
  • हर माह के अंत में नियमित वेतन
  • भविष्य निधि, चिकित्सीय और अन्य भत्ते
  • रविवार को सवेतन अवकाश, और शर्तों वाला नियुक्ति-पत्र

कमल, किराना दुकान पर

  • सुबह 7.30 से शाम 8 बजे तक
  • दैनिक मज़दूरी, कोई भत्ता या छुट्टी नहीं
  • कोई औपचारिक पत्र नहीं
  • कभी भी हटाया जा सकता है

हमारी ओर से: आज बाँटने का दूसरा आधार है, रोज़गार की परिस्थितियाँ।

संगठित क्यों कहते हैं

“इसे संगठित क्षेत्रक कहते हैं क्योंकि इसकी कुछ औपचारिक प्रक्रिया एवं कार्यविधि है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 30

दो क्षेत्रक, रोज़गार की परिस्थितियों से

पृष्ठ 30–31

संगठित

  • सरकार से पंजीकृत उद्यम और कार्य-स्थान
  • रोज़गार नियमित, काम सुनिश्चित
  • कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, सेवानुदान अधिनियम, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम जैसे कानून माने जाते हैं

असंगठित

  • छोटी और बिखरी इकाइयाँ
  • ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर
  • नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता

अपना काम करने वाले भी संगठित क्षेत्रक में हो सकते हैं, अगर वे सरकार के पास पंजीकृत हैं और नियमों का पालन करते हैं।

भारत में सौ में से कितने श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में होंगे? पहले हर समूह अपना अनुमान लिखे।

पृष्ठ 31 की तालिका, दस लाख में

पृष्ठ 31 · 1990 के अंत के अनुमान; मोटे अंक हिसाब से निकलते हैं

क्षेत्रकसंगठितअसंगठितकुल
प्राथमिक1231232
द्वितीयक4174115
तृतीयक4088128
कुल82393475
कुल प्रतिशत मेंलगभग 17%लगभग 83%100%

सौ में से लगभग 83

पृष्ठ 31 की तालिका से हिसाब

83

393 ÷ 475 × 100 = लगभग 83 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में

प्राथमिक (कृषि एवं सहायक) क्षेत्रक के 232 में से 231 असंगठित हैं; असंगठित क्षेत्रक में प्राथमिक वाले 231 ÷ 393, यानी लगभग 59 प्रतिशत।

कौन असंगठित है?

पृष्ठ 31 की गतिविधि, प्रश्न 1 · उत्तर हमारी ओर से

  • असंगठित: बाज़ार में पीठ पर सीमेन्ट की बोरी ढोता श्रमिक
  • असंगठित: अपने खेत की सिंचाई करता किसान, ठेकेदार के अधीन काम करता दैनिक मज़दूर, अपने घर में काम करता करघा बुनकर
  • शिक्षक, डॉक्टर और बड़े कारखाने का श्रमिक संगठित, अगर उनकी नियुक्ति नियमित है और नियमों के लाभ मिलते हैं

हमारी ओर से: एक ही व्यक्ति कार्य के स्वभाव से किसी एक क्षेत्रक में होता है, और रोज़गार की परिस्थितियों से संगठित या असंगठित में। ये दो अलग सवाल हैं।

8 | असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण

अगर ज़्यादातर श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं, तो उनके लिए क्या किया जाए?

समस्या क्यों बढ़ी

पृष्ठ 32

  • संगठित क्षेत्रक में रोज़गार बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है
  • संगठित क्षेत्रक के उद्यम अक्सर असंगठित की तरह काम करते हैं, ताकि कर से बच सकें और श्रमिकों की रक्षा करने वाले कानूनों का पालन न करना पड़े
  • सन् 1990 से संगठित क्षेत्रक के बहुत से श्रमिक रोज़गार खो रहे हैं, और कम वेतन पर असंगठित क्षेत्रक में काम करने को विवश हैं

इसलिए असंगठित क्षेत्रक में ज़्यादा रोज़गार के साथ संरक्षण और सहायता भी चाहिए।

किसे संरक्षण चाहिए

पृष्ठ 32

गाँव में

  • भूमिहीन कृषि श्रमिक, छोटे और सीमांत किसान, फसल बँटाईदार
  • कारीगर: बुनकर, लुहार, बढ़ई, सुनार
  • लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवार छोटे और सीमांत किसान हैं
  • चाहिए: समय पर बीज, उपकरण, साख, भण्डारण और विपणन की सुविधा

शहर में

  • लघु उद्योगों के श्रमिक; निर्माण, व्यापार और परिवहन के आकस्मिक श्रमिक
  • सड़क के विक्रेता, सिर पर बोझा ढोने वाले, वस्त्र बनाने वाले, कबाड़ उठाने वाले
  • लघु उद्योगों को कच्चा माल पाने और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद चाहिए
  • आकस्मिक श्रमिकों को गाँव और शहर, दोनों जगह संरक्षण

किताब बताती है कि असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले बहुसंख्यक श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से हैं; वे कम और अनियमित मज़दूरी के साथ सामाजिक भेदभाव भी झेलते हैं।

किताब का प्रश्न 23: अहमदाबाद के 15,00,000 श्रमिकों में से 11,00,000 असंगठित क्षेत्रक में थे। 1997–98 में नगर की कुल आय 600 करोड़ रुपए थी, जिसमें से 320 करोड़ संगठित क्षेत्रक से। तालिका कैसे बनेगी?

किताब के प्रश्न 23 की तालिका

पृष्ठ 37 · मोटे अंक घटाकर निकलते हैं

क्षेत्रकश्रमिकश्रमिकों में हिस्साआय (करोड़ रुपए)आय में हिस्सा
संगठित4,00,00026.7%32053.3%
असंगठित11,00,00073.3%28046.7%
कुल15,00,000100%600100%

तीन-चौथाई श्रमिक, आधे से कम आय

प्रश्न 23 का निष्कर्ष, हमारी ओर से

73.3%

लगभग तीन-चौथाई श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में, पर नगर की आय का आधे से कम हिस्सा उनसे

संगठित क्षेत्रक के 4,00,000 श्रमिकों से 320 करोड़ आते हैं, और असंगठित के 11,00,000 से सिर्फ़ 280 करोड़।

9 | सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक

रेलवे और टिस्को: इनका मालिक कौन है?

स्वामित्व से दो क्षेत्रक

पृष्ठ 33

सार्वजनिक क्षेत्रकनिजी क्षेत्रक
मालिकज़्यादातर परिसंपत्तियों पर सरकारएक व्यक्ति या कंपनी
उदाहरणरेलवे, डाकघरटाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (टिस्को), रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड
ध्येयसिर्फ़ लाभ कमाना नहींलाभ कमाना
ख़र्च की भरपाईकरों या दूसरे तरीकों सेसेवा लेने वाले भुगतान करते हैं

किताब पूछती है: आधुनिक दिनों में सरकार किन गतिविधियों पर व्यय करती है, और क्यों?

सरकार ख़र्च क्यों करती है

पृष्ठ 33–34

किस तरह की चीज़किताब क्या बताती है
बहुत महँगी सुविधाएँसड़कें, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली, बाँध से सिंचाई; ख़र्च निजी क्षेत्रक की क्षमता से बाहर, और वह दे भी, तो ऊँची कीमत लेगा
जिन्हें सरकारी समर्थन चाहिएछोटी इकाइयों को ऐसी दर पर बिजली जिस पर वे ख़रीद सकें; किसानों से उचित मूल्य पर गेहूँ और चावल, राशन की दुकानों से उपभोक्ताओं को कम मूल्य पर
सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षाविद्यालय ठीक से चलाना और ख़ासकर प्राथमिक शिक्षा देना सरकार का कर्त्तव्य

स्वास्थ्य और शिक्षा

“इन पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 34

पृष्ठ 34 के तथ्य

पृष्ठ 34

  • भारत में निरक्षरों की संख्या विश्व में सबसे ज़्यादा है
  • भारत के लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और उनमें से एक-चौथाई गंभीर रूप से बीमार हैं
  • ओडिशा (36) और मध्य प्रदेश (43) की शिशु मृत्यु दर विश्व के कुछ सबसे निर्धन भागों से भी ज़्यादा है

सरकार को सुरक्षित पेयजल, निर्धनों के लिए आवास, और भोजन और पोषण पर भी ध्यान देना है।

10 | सारांश, प्रश्नावली और समापन

तालिका 2.4: आर्थिक क्रियाकलापों का वर्गीकरण

पृष्ठ 33 · खाने हमारी ओर से भरे गए हैं; तीसरी पंक्ति भी हमारी ओर से

क्षेत्रकइस्तेमाल की गई कसौटीसबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्षइंगित समस्याएँ और उनका समाधान
प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयककार्य का स्वभावउत्पादन में तृतीयक आगे, रोज़गार में प्राथमिक सबसे बड़ाकृषि में अल्प बेरोज़गारी; सिंचाई, साख, गाँव के पास उद्योग, काम का अधिकार
संगठित, असंगठितरोज़गार की परिस्थितियाँज़्यादातर श्रमिक असंगठित क्षेत्रक मेंकम, अनियमित मज़दूरी, कोई सुरक्षा नहीं; संरक्षण और सहायता
सार्वजनिक, निजीस्वामित्वसरकार वे काम भी करती है जिनसे लाभ नहीं, पर जो सबके लिए ज़रूरी हैंनिरक्षरता, कुपोषण, शिशु मृत्यु; स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, आवास पर सरकारी ख़र्च

पूरा अध्याय, दस पंक्तियों में

हमारी ओर से

कालांशएक बात
1आर्थिक गतिविधियाँ कार्य के स्वभाव से तीन क्षेत्रकों में बँटती हैं, और तीनों एक-दूसरे पर टिके हैं
2कुल उत्पादन में सिर्फ़ अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य गिना जाता है
3विकसित देशों में महत्त्व पहले प्राथमिक, फिर द्वितीयक, फिर तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ा
42017–18 में उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक सबसे आगे, पर सारी सेवाएँ बराबर नहीं बढ़ीं
5रोज़गार में प्राथमिक क्षेत्रक अब भी सबसे बड़ा, 44 प्रतिशत; खेती में छिपी हुई बेरोज़गारी
6सिंचाई, सड़क, साख, गाँव के पास उद्योग, और छोटी अवधि के लिए काम का अधिकार
7रोज़गार की परिस्थितियों से संगठित और असंगठित; लगभग 83 प्रतिशत श्रमिक असंगठित
8असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को रोज़गार के साथ संरक्षण और सहायता चाहिए
9स्वामित्व से सार्वजनिक और निजी; सरकार वे काम भी करती है जिनसे लाभ नहीं
10एक ही काम को तीनों आधारों पर बाँटा जा सकता है

किताब का प्रश्न 5: सूरत के श्रमिकों के चार समूहों में से तीन के प्रतिशत दिए हैं, 15, 15 और 20। चौथा समूह, छोटी कार्यशालाओं के लोग, कितने प्रतिशत हैं, और शहर में असंगठित क्षेत्रक में कुल कितने?

हल

पृष्ठ 36 · हल हमारी ओर से

=

चौथी पंक्ति: 100 − (15 + 15 + 20) = 50 · असंगठित: 20 + 50 = 70 प्रतिशत

पंजीकृत कार्यालय और कारखाने, और औपचारिक अधिकार-पत्र वाली दुकानें और क्लिनिक संगठित हैं: 15 + 15 = 30 प्रतिशत।

और अब पहले दिन की पर्चियाँ

पहले कालांश की पर्चियाँ, अध्याय के बाद

?

हमारी ओर से: हर पर्ची का काम किस तरह का है, किन शर्तों पर होता है, और उसका मालिक कौन है?

जहाँ शर्तें या मालिक पता न हों, वहाँ लिखिए: पता करना होगा। प्रश्न 8 यही करवाता है।

जहाँ से अध्याय शुरू हुआ

“इन्हें समझने का एक तरीका यह है कि कुछ महत्त्वपूर्ण मानदंडों के आधार पर इन्हें विभिन्न समूहों में वर्गीकृत कर दिया जाए।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 19