कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 19 से 37
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
अध्याय एक ही अर्थव्यवस्था को तीन बार, तीन अलग कसौटियों से बाँटता है, और हर बँटवारे से एक नया सवाल खुलता है। पहली कसौटी कार्य का स्वभाव है: प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक (पृष्ठ 19–21)। फिर किताब बताती है कि हर क्षेत्रक का उत्पादन कैसे गिनें: संख्या नहीं, अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य (पृष्ठ 22–23)। इसके बाद समय के साथ बदलाव: विकसित देशों में उत्पादन और रोज़गार, दोनों प्राथमिक से द्वितीयक और फिर तृतीयक की ओर गए (पृष्ठ 23); भारत में उत्पादन तृतीयक की ओर गया, पर रोज़गार नहीं (पृष्ठ 24–26)। यहीं से अल्प बेरोज़गारी और नए रोज़गार बनाने के उपाय आते हैं (पृष्ठ 26–29)। दूसरी कसौटी रोज़गार की परिस्थितियाँ हैं: संगठित और असंगठित (पृष्ठ 30–32)। तीसरी कसौटी स्वामित्व है: सार्वजनिक और निजी, और यह कि कुछ काम सरकार को ही करने पड़ते हैं (पृष्ठ 33–34)।
अध्याय के चार सवाल
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “यह किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है।” (सकल घरेलू उत्पाद के बारे में, पृष्ठ 23)
- “इस प्रकार की अल्प बेरोज़गारी को छिपी हुई बेरोज़गारी कहते हैं” (पृष्ठ 26)
हमारी ओर से — पहला वाक्य गिनती का नियम है: इसके तीन शब्द तीन भूलें रोकते हैं। “मूल्य”, यानी संख्या नहीं; “विशेष वर्ष”, यानी कई वर्षों का जोड़ नहीं; “अंतिम”, यानी गेहूँ, आटा और बिस्कुट तीनों नहीं, सिर्फ़ बिस्कुट। पृष्ठ 23 का गड़बड़ वाक्यांश वाला कार्यकलाप इन्हीं तीन शब्दों की जाँच है।
हमारी ओर से — दूसरा वाक्य अध्याय की असली चिंता है: उत्पादन और रोज़गार को साथ रखे बिना यह बेरोज़गारी दिखती ही नहीं। जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का योगदान लगभग एक-छठा रह गया (पृष्ठ 26), पर रोज़गार में उसका हिस्सा 2017–18 में भी 44 प्रतिशत है (आलेख 3, पृष्ठ 25)। इतने लोग इतने कम उत्पादन पर टिके हैं, इसीलिए लक्ष्मी के खेत पर पाँचों सदस्य काम करते दिखते हैं। अध्याय के बाक़ी हिस्से, नए रोज़गार, असंगठित श्रमिकों का संरक्षण और सरकार की भूमिका, इसी चिंता के जवाब हैं।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
आलेख 3: रोज़गार में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी (प्रतिशत)
| वर्ष | प्राथमिक | द्वितीयक | तृतीयक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| 1977–78 | 71 | 11 | 18 | 25 |
| 2017–18 | 44 | 25 | 31 | 25 |
आलेख 1 (पृष्ठ 24, जी.वी.ए. रुपये करोड़ में) और आलेख 2 (पृष्ठ 25, जी.वी.ए. में हिस्सेदारी) के दंडों पर मान नहीं छपे हैं। इनसे जो भी पढ़ें, “लगभग” कहकर पढ़िए। किताब के शब्दों में बात इतनी है: चालीस वर्षों में सबसे ज़्यादा वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई, और 2017–18 में वह प्राथमिक की जगह सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन गया (पृष्ठ 24)।
पृष्ठ 31 की तालिका: विभिन्न क्षेत्रकों में श्रमिकों की संख्या (दस लाख में), 1990 के अंत के अनुमान
| क्षेत्रक | संगठित | असंगठित | कुल | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| प्राथमिक | 1 | 231 | 232 | 31 |
| द्वितीयक | 41 | 74 | 115 | 31 |
| तृतीयक | 40 | 88 | 128 | 31 |
| कुल | 82 | 393 | 475 | 31 |
| कुल प्रतिशत में | लगभग 17% | लगभग 83% | 100% | 31 |
किताब में 231, 393 और 475 के खाने ख़ाली हैं; बच्चे इन्हें भरते हैं (232 − 1; 231 + 74 + 88; 82 + 393)। प्रतिशत वाली पंक्ति में किताब सिर्फ़ 100% छापती है; लगभग 17 और 83 प्रतिशत गणना से निकलते हैं (82 ÷ 475, 393 ÷ 475)।
बाक़ी आँकड़े
| बात | आँकड़ा | पृष्ठ |
|---|---|---|
| मूल्य से गिनती | 10,000 कि.ग्रा. गेहूँ × ₹20 = ₹2,00,000; 5000 नारियल × ₹15 = ₹75,000 | 22 |
| गेहूँ से बिस्कुट तक | गेहूँ ₹20 प्रति कि.ग्रा. → आटा ₹25 प्रति कि.ग्रा. → बिस्कुट के 4 पैकेट ₹80 (₹20 प्रति पैकेट) | 22 |
| विकसित देशों में द्वितीयक से तृतीयक की ओर बदलाव | पिछले 100 वर्षों में | 23 |
| आलेखों के दो साल | 1977–78 और 2017–18 (चालीस वर्ष); 2017–18 तुलनीय आँकड़ों वाला नवीनतम वर्ष | 24 |
| सेवा क्षेत्रक: उत्पादन और रोज़गार | उत्पादन 14 गुना, रोज़गार 5 गुना से भी कम | 26 |
| औद्योगिक रोज़गार | लगभग 3 गुना | 26 |
| 2017–18 में जी.वी.ए. में प्राथमिक का योगदान | लगभग एक-छठा | 26 |
| लक्ष्मी | 2 हेक्टेयर असिंचित भूमि, परिवार के 5 सदस्य, ज्वार और अरहर | 26 |
| सिंचाई से रोज़गार | 1 हेक्टेयर गेहूँ, 2 लोगों को 50 दिन | 27 |
| 5–29 वर्ष की जनसंख्या | 60 प्रतिशत; इनमें से लगभग 51 प्रतिशत ही विद्यालय जाते हैं | 28 |
| अकेले शिक्षा क्षेत्र में संभावित रोज़गार | लगभग 20 लाख (योजना आयोग, अब नीति आयोग) | 29 |
| पर्यटन सुधरे तो | हर साल 35 लाख से ज़्यादा को अतिरिक्त रोज़गार | 29 |
| काम का अधिकार (म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005) | लगभग 625 जिले; ग्रामीण क्षेत्र में साल में 100 दिन | 29 |
| 2025 | इस अधिनियम का स्थान विकसित भारत - जी राम जी 2025 ने लिया | 29 |
| कान्ता और कमल | 9.30 से 5.30; 7.30 से 8 | 30 |
| संगठित क्षेत्रक के श्रमिक रोज़गार खो रहे हैं | सन् 1990 से | 32 |
| छोटे और सीमांत किसान | लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवार | 32 |
| कुपोषित बच्चे | लगभग आधे; उनमें से एक-चौथाई गंभीर रूप से बीमार | 34 |
| शिशु मृत्यु दर | ओडिशा (36), मध्य प्रदेश (43) | 34 |
आँकड़े तस्वीर बनाने के लिए हैं, रटवाने के लिए नहीं। बच्चे से यह पूछिए कि उत्पादन और रोज़गार में कौन-सा क्षेत्रक आगे है और क्यों, यह नहीं कि 1977–78 में तृतीयक का आँकड़ा ठीक-ठीक कितना था।
ध्यान दीजिए: किताब में कुछ जगह बात आपस में मेल नहीं खाती; बच्चे इन पर अटकें, तो एक पंक्ति में बात साफ़ कर दीजिए।
- पृष्ठ 26 के पाठ में “आधे से अधिक श्रमिक” प्राथमिक क्षेत्रक में बताए गए हैं, पर आलेख 3 में 2017–18 का आँकड़ा 44 प्रतिशत है। उत्तर में 44 लिखवाइए।
- पृष्ठ 24 के कार्यकलाप में “तीस वर्षों” छपा है, पर आलेख 1977–78 से 2017–18 तक का है, यानी चालीस वर्ष।
- प्रश्न 24 (क) में “वर्ष 2000 एवं 2013” छपा है, पर तालिका 2001–02 और 2021–22 की है। गणना तालिका के सालों की कराइए।
- पृष्ठ 23 पर “(माध्यमिक, द्वितीयक और तृतीयक)” छपा है; पहला क्षेत्रक प्राथमिक है।
- पृष्ठ 25 के पाठ में आलेख 3 के लिए “वर्ष 2003” भी लिखा है, पर आलेख में सिर्फ़ 1977–78 और 2017–18 के आँकड़े हैं।
- पृष्ठ 28 पर “अध्याय–4 मुद्रा एवं साख” छपा है, पर इस किताब में मुद्रा और साख अध्याय 3 है।
- आलेख 1 और 2 पर मान नहीं छपे, इसलिए उनसे पढ़ी कोई भी संख्या अनुमान है, किताब का आँकड़ा नहीं।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| क्षेत्रक | किसी कसौटी के आधार पर बनाया गया आर्थिक गतिविधियों का समूह | 19 |
| प्राथमिक क्षेत्रक | प्राकृतिक संसाधनों के प्रत्यक्ष उपयोग से वस्तुओं का उत्पादन, जैसे कपास की खेती, डेयरी उत्पादन, खनिज और अयस्क; इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहते हैं | 20 |
| द्वितीयक क्षेत्रक | प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण से दूसरे रूप में बदलना, जैसे रेशे से कपड़ा, गन्ने से चीनी, मिट्टी से ईंट; इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहते हैं | 20 |
| तृतीयक क्षेत्रक | वे गतिविधियाँ जो ख़ुद वस्तु नहीं बनातीं, बल्कि उत्पादन में मदद करती हैं या सेवाएँ देती हैं, जैसे परिवहन, भण्डारण, संचार, बैंक, व्यापार; इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं | 20 |
| अंतिम और मध्यवर्ती वस्तुएँ | उपभोक्ता तक पहुँचने वाली वस्तु अंतिम है (बिस्कुट); उसे बनाने में लगी वस्तुएँ मध्यवर्ती हैं (गेहूँ, आटा) | 22 |
| सकल घरेलू उत्पाद (स.घ.उ.) | “यह किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है।” | 23 |
| सकल मूल्य वर्धित (जी.वी.ए.) | “जी.वी.ए. करों तथा सब्सिडी के लिए समायोजन के बाद अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों के योगदान को मापता है।” सरकार अब क्षेत्रकों के लिए इसी का प्रयोग करती है | 23 |
| बुनियादी सेवाएँ | अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक, थाना, कचहरी, रक्षा, परिवहन, बैंक जैसी सेवाएँ, जिनकी हर देश को ज़रूरत है | 24 |
| अल्प बेरोज़गारी | लोग काम कर रहे हैं, पर सभी अपनी क्षमता से कम; किसी को पूर्ण रोज़गार नहीं | 26 |
| छिपी हुई (प्रच्छन्न) बेरोज़गारी | “इस प्रकार की अल्प बेरोज़गारी को छिपी हुई बेरोज़गारी कहते हैं”; कुछ लोगों को हटा दें, तो भी उत्पादन नहीं घटता | 26 |
| खुली बेरोज़गारी | जिनके पास कोई काम नहीं और जो बेकार बैठे हैं | 26 |
| काम का अधिकार | काम चाहने वाले को काम की कानूनी गारंटी; म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005 इसी के लिए बना | 29 |
| संगठित क्षेत्रक | सरकार से पंजीकृत उद्यम और कार्य-स्थान, जहाँ रोज़गार नियमित है और सरकारी नियमों का पालन होता है | 30 |
| असंगठित क्षेत्रक | छोटी और बिखरी इकाइयाँ, जो ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं; नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता | 31 |
| सार्वजनिक क्षेत्रक | ज़्यादातर परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व, और सेवाएँ सरकार देती है, जैसे रेलवे, डाकघर | 33 |
| निजी क्षेत्रक | परिसंपत्तियों का स्वामित्व और सेवाएँ देने की ज़िम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या कंपनी की, जैसे टिस्को, रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड | 33 |
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- पिछला अध्याय, विकास। पृष्ठ 34 पर किताब ख़ुद याद दिलाती है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी गतिविधियों पर पहले अध्याय में विचार हुआ है। सार्वजनिक सुविधाओं वाली बात वहीं से आगे बढ़ती है; विकास की शिक्षक संदर्शिका देखिए।
- अगला अध्याय, मुद्रा और साख। लक्ष्मी को साहूकार से ऊँचे ब्याज पर उधार लेना पड़ता है, और किसानों को सस्ता कृषि साख चाहिए (पृष्ठ 28)। यह बात इसी किताब के अध्याय 3 में खुलती है। पृष्ठ 28 पर “अध्याय–4 मुद्रा एवं साख” छपा है, पर इस किताब में मुद्रा और साख अध्याय 3 है।
- आगे की कक्षाएँ। स.घ.उ. और जी.वी.ए. का पूरा अंतर किताब ऊँची कक्षाओं के लिए छोड़ती है (पृष्ठ 23)। अभी बच्चों को इतना काफ़ी है कि दोनों तीनों क्षेत्रकों का योगदान दिखाते हैं।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
पृष्ठ 21 का कार्यकलाप — क्षेत्रकों का आपसी रिश्ता और व्यवसायों का बँटवारा
किताब की बात (पृष्ठ 20–21): प्राथमिक क्षेत्रक प्रकृति से सीधे वस्तुएँ लेता है, द्वितीयक उन्हें विनिर्माण से बदलता है, तृतीयक सेवाएँ देता है; और तीनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। तालिका 2.1 में केवल पहली पंक्ति का उत्तर छपा है: किसान चीनी मिल को गन्ना न बेचें, तो मिल बंद हो जाएगी।
1. तालिका 2.1 भरिए। नमूना उत्तर — कपास बाहर से मँगाई जाए, तो कपास की खेती कम लाभकारी रह जाएगी: प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक (कपड़ा उद्योग) पर निर्भर है। उर्वरक और पम्पसेट महँगे हों, तो किसान का लाभ घटेगा: प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक पर निर्भर है। ट्रांसपोर्टर हड़ताल करें, तो शहरों में भोजन की कमी होगी और किसान उपज नहीं बेच पाएँगे: प्राथमिक क्षेत्रक तृतीयक पर निर्भर है, और उद्योग और सेवा में काम करने वाले भोजन के लिए प्राथमिक पर।
2. किताब से अलग उदाहरण लेकर तीनों क्षेत्रकों का अंतर समझाइए। नमूना उत्तर — एक चीज़ की यात्रा लीजिए: खेत में मूँगफली उगाना प्राथमिक है, मूँगफली से तेल निकालने वाली मिल द्वितीयक, और तेल को ट्रक से दुकान तक पहुँचाना और बेचना तृतीयक।
3. चौदह व्यवसायों को बाँटिए।
| प्राथमिक | द्वितीयक | तृतीयक |
|---|---|---|
| फूल की खेती करने वाला, मछुआरा, मधुमक्खी पालक | दर्जी, टोकरी बुनकर, दियासलाई कारखाना में श्रमिक, कुम्हार | दूध-विक्रेता, पुजारी, कूरियर पहुँचाने वाला, महाजन, माली, अंतरिक्ष-यात्री, कॉल सेंटर का कर्मचारी |
हमारी ओर से — दो नाम बहस छेड़ते हैं: दूध-विक्रेता बेचने का काम करता है, इसलिए तृतीयक; वही पशु पालकर दूध निकाले, तो डेयरी, यानी प्राथमिक। माली दूसरे के बगीचे की देखभाल की सेवा देता है; पौधे उगाकर बेचे, तो प्राथमिक। बच्चे जिस भी खाने में रखें, कारण पूछिए; कारण ठीक है, तो उत्तर ठीक है।
4. विद्यालय में छात्रों का बँटवारा किस कसौटी से होता है, और क्या वह उपयुक्त है? नमूना उत्तर — कसौटी कक्षा या पढ़ाई का स्तर है। यह उपयुक्त है, क्योंकि एक स्तर के छात्रों की पढ़ाई और ज़रूरतें मिलती-जुलती हैं। बात यह निकलती है कि कसौटी उद्देश्य देखकर चुनी जाती है, जैसे क्षेत्रकों के लिए।
पृष्ठ 23 का कार्यकलाप — इतिहास और स.घ.उ. की गणना
किताब की बात (पृष्ठ 22–23): वस्तुओं की संख्या नहीं, मूल्य जोड़ा जाता है; सिर्फ़ अंतिम वस्तुएँ और सेवाएँ गिनी जाती हैं; और गिनती एक विशेष वर्ष की होती है। विकसित देशों में पहले प्राथमिक, फिर द्वितीयक, और पिछले 100 वर्षों में तृतीयक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण हुआ।
1. विकसित देशों का इतिहास क्षेत्रकों के बदलाव के बारे में क्या बताता है? नमूना उत्तर — शुरुआत में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण था; कारखाने फैले, तो उत्पादन और रोज़गार दोनों में द्वितीयक आगे हुआ; और पिछले 100 वर्षों में बदलाव द्वितीयक से तृतीयक की ओर हुआ। आज वहाँ ज़्यादातर श्रमजीवी लोग सेवा क्षेत्रक में हैं।
2. गड़बड़ वाक्यांश सही कीजिए। नमूना उत्तर — उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की गणना के लिए हम उनकी संख्या नहीं, उनका मूल्य जोड़ते हैं। गणना किसी एक विशेष वर्ष की होती है, पाँच वर्षों की नहीं। और सभी वस्तुओं का नहीं, सिर्फ़ अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य जोड़ते हैं, ताकि कोई मूल्य दो बार न गिना जाए।
3. हर चरण में जोड़े गए मूल्य की गणना कैसे करेंगे? नमूना उत्तर — हर चरण में जोड़ा गया मूल्य = उस चरण का बिक्री मूल्य − उसमें लगी मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य। मान लीजिए चारों पैकेट 1 कि.ग्रा. आटे से बने और चीनी-तेल अभी छोड़ दें: किसान ₹20 जोड़ता है, आटा-मिल ₹25 − ₹20 = ₹5, बिस्कुट कंपनी ₹80 − ₹25 = ₹55। जोड़ ₹20 + ₹5 + ₹55 = ₹80, ठीक अंतिम वस्तु का मूल्य।
पृष्ठ 24 का कार्यकलाप — आलेख 1 पढ़ना
किताब की बात (पृष्ठ 24): आलेख 1 वर्ष 1977–78 और 2017–18 में तीनों क्षेत्रकों का जी.वी.ए. रुपये (करोड़) में दिखाता है। दंडों पर मान नहीं छपे हैं।
नमूना उत्तर —
- 11977–78 में सबसे बड़ा उत्पादक प्राथमिक क्षेत्रक था।
- 22017–18 में तृतीयक; उसने प्राथमिक की जगह ली।
- 3सबसे ज़्यादा संवृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई; अवधि चालीस वर्ष की है।
- 4आलेख पढ़कर लगभग 1,20,00,000 करोड़ रुपये: 2017–18 वाले दंड का सिरा बाएँ अक्ष की 12000000 वाली रेखा पर है। यह अनुमान है, छपा हुआ आँकड़ा नहीं।
जाँचते समय: (4) में “लगभग” वाला कोई भी उचित अनुमान स्वीकार कीजिए; ठीक-ठीक संख्या माँगिए मत।
पृष्ठ 27 का कार्यकलाप — प्राथमिक क्षेत्रक: उत्पादन और रोज़गार
किताब की बात (पृष्ठ 25–27): आलेख 2 जी.वी.ए. में हिस्सेदारी दिखाता है (मान नहीं छपे), आलेख 3 रोज़गार में (1977–78 में 71, 11, 18; 2017–18 में 44, 25, 31 प्रतिशत)। 2017–18 में जी.वी.ए. में प्राथमिक का योगदान लगभग एक-छठा है (पृष्ठ 26)। लक्ष्मी के परिवार में पाँचों सदस्य दो हेक्टेयर असिंचित भूमि पर काम करते हैं, पर किसी को पूरा काम नहीं।
1. पृष्ठ 27 की तालिका भरिए और प्राथमिक क्षेत्रक में बदलाव बताइए।
| 1977–78 | 2017–18 | |
|---|---|---|
| जी.वी.ए. में हिस्सा | आलेख 2 पढ़कर, आधे से थोड़ा कम | लगभग एक-छठा (पृष्ठ 26) |
| रोज़गार में हिस्सा | 71% | 44% |
नमूना उत्तर — जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का हिस्सा बहुत तेज़ी से घटा, पर रोज़गार में उतना नहीं घटा। आज भी सबसे ज़्यादा लोग इसी क्षेत्रक में हैं, जबकि उत्पादन में इसका हिस्सा छोटा है।
2. अल्प बेरोज़गारी तब होती है जब लोग … नमूना उत्तर — (स) अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं।
3. विकसित देशों से भारत की तुलना: कौन-सा वांछित परिवर्तन नहीं हुआ? नमूना उत्तर — विकसित देशों में उत्पादन और रोज़गार, दोनों तृतीयक की ओर गए। भारत में उत्पादन गया, रोज़गार नहीं: 2017–18 में भी 44 प्रतिशत लोग प्राथमिक क्षेत्रक में थे। वांछित था कि द्वितीयक और तृतीयक में इतने रोज़गार बनते कि खेती से लोग वहाँ जा पाते।
4. हमें अल्प बेरोज़गारी के बारे में क्यों सोचना चाहिए? नमूना उत्तर — क्योंकि यह दिखती नहीं, फिर भी किसी को पूरा काम और पूरी आय नहीं मिलती। लक्ष्मी जैसे लाखों किसान हैं। ऐसे कुछ लोगों को कहीं और ठीक काम मिले, तो खेत का उत्पादन नहीं घटेगा और परिवार की आय बढ़ेगी।
पृष्ठ 29 का कार्यकलाप — काम का अधिकार और नए रोज़गार
किताब की बात (पृष्ठ 27–29): सिंचाई, ग्रामीण सड़कें और भण्डारण, बैंक से सस्ता साख, दाल मिल और शीत भण्डारण जैसे अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन से रोज़गार बढ़ सकते हैं। म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005 ने लगभग 625 जिलों में काम का अधिकार दिया: ग्रामीण क्षेत्र में साल में 100 दिन के काम की गारंटी, काम न मिले तो बेरोज़गारी भत्ता, और भूमि से उत्पादन बढ़ाने वाले कामों को वरीयता। 2025 में इसका स्थान विकसित भारत-रोज़गार गारंटी और आजीविका मिशन (विकसित भारत - जी राम जी 2025) ने लिया।
1. इसे ‘काम का अधिकार’ क्यों कहा गया? नमूना उत्तर — क्योंकि काम लोगों का हक़ बन गया: काम चाहने वाले हर सक्षम व्यक्ति को ग्रामीण क्षेत्र में साल में 100 दिन के काम की गारंटी थी, और सरकार काम न दे पाए, तो उसे बेरोज़गारी भत्ता देना था।
2. ग्राम प्रधान के रूप में ऐसे काम सुझाइए जिनसे आय बढ़े। नमूना उत्तर — अधिनियम भूमि से उत्पादन बढ़ाने वाले कामों को वरीयता देता था, इसलिए: सिंचाई के कुएँ, तालाब और नहरें; खेतों तक ग्रामीण सड़कें; और अनाज के भण्डारण की जगह। काम करने वालों को मज़दूरी मिलेगी, और बाद में खेती का उत्पादन भी बढ़ेगा।
3. सिंचाई और विपणन सुविधाएँ मिलें, तो रोज़गार और आय कैसे बढ़ेंगे? नमूना उत्तर — सिंचाई से रबी में दूसरी फसल हो सकेगी; एक हेक्टेयर गेहूँ दो लोगों को 50 दिन काम देता है। सड़क, परिवहन और भण्डारण से किसान उपज शहर तक बेच सकेंगे, और परिवहन और व्यापार में भी लोगों को काम मिलेगा।
4. शहरों में रोज़गार कैसे बढ़े? नमूना उत्तर — लघु उद्योगों को कच्चा माल पाने और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद; पर्यटन, क्षेत्रीय शिल्प और सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सेवाएँ; और शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार, जिसमें अध्यापक, डॉक्टर और नर्स चाहिए।
पृष्ठ 31 का कार्यकलाप — असंगठित क्षेत्रक की पहचान और श्रमिकों की तालिका
किताब की बात (पृष्ठ 30–31): संगठित क्षेत्रक के उद्यम सरकार से पंजीकृत होते हैं और नियम मानते हैं; असंगठित क्षेत्रक की इकाइयाँ छोटी और बिखरी हैं, जहाँ नियमों का पालन नहीं होता। पृष्ठ 31 की तालिका ऊपर “अध्याय के आँकड़े” में भरी हुई है।
1. इनमें असंगठित गतिविधियाँ कौन-सी हैं? नमूना उत्तर — सीमेन्ट की बोरी ढोता श्रमिक, अपने खेत की सिंचाई करता किसान, ठेकेदार के अधीन दैनिक मज़दूर, और अपने घर में काम करता करघा बुनकर। शिक्षक, डॉक्टर और बड़े कारखाने का श्रमिक संगठित क्षेत्रक में गिने जाएँगे, अगर उनकी नियुक्ति नियमित है और नियमों के लाभ मिलते हैं।
2. एक संगठित और एक असंगठित श्रमिक से बात करके तुलना कीजिए। नमूना उत्तर — बच्चे ये बातें पूछें: काम के घंटे, वेतन कब और कैसे, छुट्टी, भविष्य निधि और चिकित्सा लाभ, नियुक्ति-पत्र, और काम से हटाए जाने का डर। उत्तर कान्ता और कमल वाली तुलना के खानों में लिखें।
3. संगठित और असंगठित का भेद अपने शब्दों में। नमूना उत्तर — संगठित क्षेत्रक में काम पक्का है: पंजीकरण, नियमित वेतन, छुट्टी और भविष्य निधि जैसे लाभ। असंगठित में काम कच्चा है: कम और अनियमित मज़दूरी, कोई लाभ नहीं, और कभी भी हटाए जाने का डर।
4. तालिका भरिए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए। नमूना उत्तर — असंगठित क्षेत्रक में कृषि में लगे लोग: 231 ÷ 393 × 100 = लगभग 59 प्रतिशत। कृषि असंगठित क्षेत्रक की गतिविधि है, क्योंकि प्राथमिक क्षेत्रक के 232 में से 231 श्रमिक असंगठित हैं। भारत में लगभग 83 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं, और लगभग 17 प्रतिशत को ही संगठित क्षेत्रक में रोज़गार मिला है।
पृष्ठ 33 का कार्यकलाप — स्मरण कीजिए और ज्ञात करें
किताब की बात (पृष्ठ 33): अब तक दो कसौटियाँ आ चुकी हैं, कार्य का स्वभाव और रोज़गार की परिस्थितियाँ। तालिका 2.4 इन दोनों का सार माँगती है।
स्मरण कीजिए: तालिका 2.4 भरिए।
| क्षेत्रक | कसौटी | सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष | समस्या और समाधान |
|---|---|---|---|
| प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक | कार्य का स्वभाव | उत्पादन में तृतीयक सबसे आगे, पर रोज़गार अब भी सबसे ज़्यादा प्राथमिक में | कृषि में अल्प बेरोज़गारी; सिंचाई, सड़क और भण्डारण, सस्ता साख, अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन में रोज़गार, म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. |
| संगठित, असंगठित | रोज़गार की परिस्थितियाँ | ज़्यादातर श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में | कम और अनियमित मज़दूरी, कोई सुरक्षा नहीं; ज़्यादा रोज़गार के साथ संरक्षण और सहायता |
ज्ञात करें: आज सरकार किन गतिविधियों पर व्यय करती है, और क्यों? नमूना उत्तर — बहुत महँगी सुविधाओं पर (सड़क, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली, बाँध), उन कामों पर जिन्हें समर्थन चाहिए (छोटे उद्योगों को सस्ती बिजली, किसानों से अनाज की ख़रीद और राशन की दुकानें), और सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर। कारण: निजी क्षेत्रक ये चीज़ें उचित कीमत पर नहीं देता, और कुछ की ज़िम्मेदारी सरकार की ही है (पृष्ठ 33–34)।
1 से 3 तक के प्रश्न — कुंजी और कारण
| प्रश्न | सही उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| 1 (क) सेवा क्षेत्रक में रोज़गार उत्पादन के अनुपात में बढ़ा? | नहीं हुई है | उत्पादन 14 गुना, रोज़गार 5 गुना से भी कम (पृष्ठ 26) |
| 1 (ख) कौन वस्तुएँ नहीं बनाता | तृतीयक | वह सेवाएँ देता है (पृष्ठ 20) |
| 1 (ग) रोज़गार-सुरक्षा किसे | संगठित | नियमित काम और नियमों का पालन (पृष्ठ 30) |
| 1 (घ) असंगठित में श्रमिक | बड़े | लगभग 83 प्रतिशत (पृष्ठ 31 की तालिका से गणना) |
| 1 (ङ) कपास और कपड़ा | प्राकृतिक, विनिर्मित | कपास खेत से, कपड़ा विनिर्माण से (पृष्ठ 20) |
| 1 (च) तीनों क्षेत्रकों की गतिविधियाँ | परस्पर निर्भर | तालिका 2.1 (पृष्ठ 21) |
| 2 (अ) सार्वजनिक और निजी का आधार | (ग) उद्यमों का स्वामित्व | रोज़गार की शर्तों से संगठित-असंगठित बँटते हैं (पृष्ठ 30, 33) |
| 2 (ब) प्राकृतिक प्रक्रिया से उत्पादन | (क) प्राथमिक | पृष्ठ 20 |
| 2 (स) स.घ.उ. किसका मूल्य | (ख) सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं | मध्यवर्ती गिनें, तो एक मूल्य कई बार गिना जाएगा (पृष्ठ 22–23) |
| 2 (द) 2017–18 में जी.वी.ए. में तृतीयक | (ग) 50 से 60 | आलेख 2 पढ़कर: 2017–18 के दंड का आधे से ज़्यादा हिस्सा तृतीयक का; प्राथमिक लगभग एक-छठा (पृष्ठ 25–26) |
| 3 मेल | 1-द, 2-स, 3-य, 4-अ, 5-ब | नीचे देखिए |
प्रश्न 3 के मेल का आधार। असिंचित भूमि के लिए नहर (पृष्ठ 27); कम मूल्य के लिए सरकार की उचित मूल्य पर ख़रीद (पृष्ठ 34); कर्ज़ के भार के लिए कम ब्याज पर बैंक का साख (पृष्ठ 28); मंदी में काम के अभाव के लिए दाल मिल जैसी कृषि-आधारित इकाइयाँ (पृष्ठ 28); और कटाई के तुरंत बाद बेचने की विवशता के लिए सहकारी विपणन समितियाँ, क्योंकि किताब छोटे किसानों के लिए भण्डारण सुविधा और विपणन केन्द्र की ज़रूरत बताती है (पृष्ठ 28, 32)।
प्रश्न 2 (द) पर बच्चे अटकते हैं, क्योंकि आलेख 2 पर संख्या नहीं छपी। उन्हें दंड देखकर बस इतना तय करना है कि तृतीयक का हिस्सा आधे से ज़्यादा है, पर बहुत ज़्यादा नहीं।
4 से 8 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
प्रश्न 4 — विषम की पहचान (पृष्ठ 20, 31, 33)
- (क) कृषक: अकेला वही प्राथमिक क्षेत्रक में है; पर्यटन-निर्देशक और धोबी सेवा देते हैं, दर्जी और कुम्हार वस्तुएँ बनाते हैं।
- (ख) सब्जी विक्रेता: शिक्षक, डॉक्टर और वकील प्रशिक्षण लेकर व्यक्तिगत सेवाएँ देते हैं; सब्जी विक्रेता सड़क पर बेचने वाला, अपना काम करने वाला व्यक्ति है, जो आमतौर पर असंगठित क्षेत्रक में आता है।
- (ग) मोची: बाक़ी तीनों सरकार के कर्मचारी हैं, यानी सार्वजनिक क्षेत्रक में; मोची अपना काम करता है।
- (घ) एयर इण्डिया: कसौटी स्वामित्व है। एम.टी.एन.एल., भारतीय रेल और ऑल इण्डिया रेडियो सरकार के हैं; एयर इण्डिया को सरकार ने जनवरी 2022 में टाटा समूह की एक कंपनी को सौंप दिया (भारत सरकार की प्रेस विज्ञप्ति)।
जाँचते समय: हर भाग में विषम नाम के साथ कसौटी भी लिखी हो। जो बच्चा कसौटी सही लगाकर दूसरा तर्क दे, उसे सुनिए। (घ) का उत्तर एयर इण्डिया का मालिक बदलने पर टिका है।
नमूना उत्तर — (क) कृषक, क्योंकि वह प्रकृति से सीधे उत्पादन करता है, बाक़ी सेवा देते हैं या वस्तुएँ बनाते हैं। (ख) सब्जी विक्रेता, क्योंकि बाक़ी तीनों पढ़-लिखकर और प्रशिक्षण लेकर पेशेवर सेवा देते हैं। (ग) मोची, क्योंकि बाक़ी तीनों सरकारी कर्मचारी हैं। (घ) एयर इण्डिया, क्योंकि बाक़ी तीनों सार्वजनिक क्षेत्रक में हैं और एयर इण्डिया अब निजी स्वामित्व में है। (आधार: पृष्ठ 20, 31, 33)
प्रश्न 5 — सूरत की तालिका (पृष्ठ 30, 36)
| कार्य स्थान | रोज़गार की प्रकृति | श्रमिकों का प्रतिशत |
|---|---|---|
| सरकार द्वारा पंजीकृत कार्यालय और कारखाने | संगठित | 15 |
| औपचारिक अधिकार-पत्र सहित अपनी दुकान, कार्यालय, क्लिनिक | संगठित | 15 |
| सड़कों पर काम करते लोग, निर्माण श्रमिक, घरेलू श्रमिक | असंगठित | 20 |
| छोटी कार्यशालाएँ, जो प्रायः पंजीकृत नहीं | असंगठित | 50 |
जाँचते समय: चौथी पंक्ति 100 − (15 + 15 + 20) = 50; दूसरी पंक्ति संगठित, क्योंकि अधिकार-पत्र है; असंगठित का जोड़ 20 + 50।
नमूना उत्तर — इस शहर में असंगठित क्षेत्रक में 70 प्रतिशत श्रमिक हैं (20 + 50), और संगठित में 30 प्रतिशत। अपनी दुकान वाले भी पंजीकृत हों और नियम मानें, तो संगठित क्षेत्रक में गिने जाते हैं। (आधार: पृष्ठ 30)
प्रश्न 6 — तीन क्षेत्रकों में बँटवारे की उपयोगिता (पृष्ठ 24–29)
- हर क्षेत्रक का उत्पादन और रोज़गार अलग-अलग दिखता है।
- बदलाव दिखता है: 2017–18 तक तृतीयक सबसे बड़ा उत्पादक बना।
- समस्या पकड़ में आती है: रोज़गार में प्राथमिक 44 प्रतिशत, जी.वी.ए. में लगभग एक-छठा; यानी अल्प बेरोज़गारी।
- उपाय सूझते हैं: सिंचाई, सस्ता साख, अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग, काम का अधिकार।
जाँचते समय: “हाँ” के साथ कम से कम दो उपयोग, और एक में अध्याय के आँकड़े।
नमूना उत्तर — हाँ, यह बँटवारा उपयोगी है। इससे पता चलता है कि देश का कितना उत्पादन किस क्षेत्रक से आता है और कितने लोग किसमें काम करते हैं। इसी से दिखा कि 2017–18 में तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ा उत्पादक है, पर 44 प्रतिशत लोग अब भी प्राथमिक क्षेत्रक में हैं, जिसका जी.वी.ए. में योगदान लगभग एक-छठा है। यानी खेती में अल्प बेरोज़गारी है, और उपाय भी इसी से सूझते हैं: सिंचाई, सस्ता साख, अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग और काम का अधिकार। (आधार: पृष्ठ 25, 26, 28, 29)
प्रश्न 7 — रोज़गार और जी.वी.ए. ही क्यों? और कौन-से पद? (पृष्ठ 23–26, 30, 33)
- जी.वी.ए. बताता है कि क्षेत्रक कितना उत्पादन करता है; रोज़गार बताता है कि कितने लोगों की रोज़ी उस पर टिकी है।
- दोनों साथ देखने पर ही अल्प बेरोज़गारी दिखी।
- दूसरे पद भी हैं, और अध्याय ख़ुद दो लेता है: रोज़गार की परिस्थितियाँ और स्वामित्व।
जाँचते समय: प्रश्न खुला है; अच्छा उत्तर बताता है कि कसौटी उस बात से तय होती है जिसकी जाँच करनी है।
नमूना उत्तर — जी.वी.ए. और रोज़गार को साथ रखने से वह बात दिखती है जो अकेले किसी एक से नहीं दिखती: प्राथमिक क्षेत्रक में सबसे ज़्यादा लोग हैं, पर उत्पादन में उसका हिस्सा छोटा है। दूसरे पदों से भी परखा जा सकता है; यह अध्याय ही रोज़गार की परिस्थितियों (संगठित-असंगठित) और स्वामित्व (सार्वजनिक-निजी) से काम की सुरक्षा और सरकार की भूमिका परखता है। जिस बात की जाँच करनी हो, कसौटी उसी के हिसाब से चुनी जाती है। (आधार: पृष्ठ 23, 26, 30, 33)
प्रश्न 8 — आसपास के वयस्कों के कामों की सूची और वर्गीकरण (पृष्ठ 20, 30, 33)
यह प्रश्न बच्चे के अपने आसपास से बनेगा। तीनों कसौटियों पर एक साथ रखवाइए; एक ही व्यक्ति तीनों बँटवारों में एक साथ आता है।
| काम | कार्य का स्वभाव | रोज़गार की परिस्थिति | स्वामित्व |
|---|---|---|---|
| अपने खेत पर किसान | प्राथमिक | असंगठित | निजी |
| सब्ज़ी बेचने वाला | तृतीयक | असंगठित | निजी |
| बड़े कारखाने का नियमित श्रमिक | द्वितीयक | संगठित | निजी |
| सरकारी स्कूल का शिक्षक | तृतीयक | संगठित | सार्वजनिक |
जाँचते समय: सूची बच्चे की अपनी हो, और हर काम के आगे कम से कम एक कसौटी का कारण।
नमूना उत्तर (हमारी ओर से) — मेरे आसपास किसान, दूध बेचने वाले, दर्जी, बस चालक, सरकारी स्कूल के शिक्षक और दुकानदार हैं। मैंने इन्हें तीन तरह से बाँटा: कार्य के स्वभाव से (किसान प्राथमिक, दर्जी द्वितीयक, बाक़ी तृतीयक), रोज़गार की परिस्थिति से (शिक्षक संगठित, बाक़ी ज़्यादातर असंगठित), और स्वामित्व से (शिक्षक सार्वजनिक, बाक़ी निजी)। पहले बँटवारे से उत्पादन और रोज़गार का पता चलता है, दूसरे से काम की सुरक्षा का, और तीसरे से यह कि सेवा कौन देता है।
9 से 13 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
प्रश्न 9 — तृतीयक क्षेत्रक दूसरों से कैसे भिन्न (पृष्ठ 20, 25)
- प्राथमिक प्रकृति से सीधे वस्तुएँ लेता है, द्वितीयक उन्हें बदलता है; तृतीयक कोई वस्तु नहीं बनाता, सेवा देता है।
- उत्पादन में मदद: परिवहन, भण्डारण, संचार, बैंक, व्यापार।
- सीधे उत्पादन में मदद न करने वाली सेवाएँ भी: शिक्षक, डॉक्टर, धोबी, नाई, मोची, वकील।
- सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित नई सेवाएँ: इंटरनेट कैफे, ए.टी.एम. बूथ, कॉल सेंटर।
जाँचते समय: “सेवा देता है, वस्तु नहीं बनाता” और कम से कम दो उदाहरण।
नमूना उत्तर — प्राथमिक क्षेत्रक कपास, दूध, खनिज जैसी वस्तुएँ प्रकृति से लेता है और द्वितीयक उनसे कपड़ा, चीनी, ईंट बनाता है। तृतीयक क्षेत्रक कोई वस्तु नहीं बनाता; वह सेवाएँ देता है। ट्रक से माल पहुँचाना, गोदाम में रखना, बैंक से कर्ज़ देना उत्पादन में मदद करते हैं; शिक्षक, डॉक्टर और वकील की सेवाएँ सीधे उत्पादन में न लगकर भी ज़रूरी हैं। इसीलिए इसे सेवा क्षेत्रक कहते हैं। (आधार: पृष्ठ 20, 25)
प्रश्न 10 — प्रच्छन्न बेरोज़गारी: गाँव और शहर के उदाहरण (पृष्ठ 26)
- लोग काम करते दिखते हैं, पर सब क्षमता से कम; कुछ को हटा दें, तो भी उत्पादन नहीं घटता।
- गाँव: लक्ष्मी के दो हेक्टेयर असिंचित खेत पर परिवार के पाँचों सदस्य; सुखराम एक-दो को काम पर ले जाए, तो उत्पादन नहीं घटता और आय बढ़ती है।
- शहर: प्लम्बर, पेन्टर जैसे अनियत श्रमिक जिन्हें रोज़ काम नहीं मिलता; ठेला खींचने वाले, “जहाँ वे पूरा दिन बिता देते हैं, परन्तु बहुत कम कमा पाते हैं।”
जाँचते समय: परिभाषा में “क्षमता से कम” और “हटाने पर उत्पादन नहीं घटता”, और दोनों क्षेत्रों का एक-एक उदाहरण।
नमूना उत्तर — जब लोग काम करते दिखते हैं, पर सब अपनी क्षमता से कम काम करते हैं, तो यह अल्प बेरोज़गारी है; यह दिखती नहीं, इसलिए इसे छिपी हुई या प्रच्छन्न बेरोज़गारी कहते हैं। गाँव में लक्ष्मी के छोटे खेत पर पूरा परिवार साल भर काम करता है, पर इनमें से दो लोग कहीं और काम करें, तो भी खेत का उत्पादन नहीं घटेगा। शहर में अनियत श्रमिक रोज़ काम खोजते हैं, और सड़क पर सामान बेचने वाले पूरा दिन लगाकर भी बहुत कम कमा पाते हैं। (आधार: पृष्ठ 26)
प्रश्न 11 — खुली और प्रच्छन्न बेरोज़गारी में भेद (पृष्ठ 26)
| आधार | खुली बेरोज़गारी | प्रच्छन्न बेरोज़गारी |
|---|---|---|
| हालत | कोई काम नहीं, बेकार बैठे | काम करते दिखते हैं, पर क्षमता से कम |
| पहचान | साफ़ दिखती है | छिपी रहती है |
| कुछ लोग हटें तो | वे उत्पादन में हैं ही नहीं | उत्पादन नहीं घटता |
| उदाहरण | काम की तलाश में बैठा व्यक्ति | लक्ष्मी का परिवार; शहर के अनियत श्रमिक |
जाँचते समय: कम से कम तीन आधार, और प्रच्छन्न वाले खाने में उदाहरण।
प्रश्न 12 — “तृतीयक क्षेत्रक कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा रहा”: सहमत? (पृष्ठ 24–25)
- 2017–18 में तृतीयक सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक; चालीस वर्षों में सबसे ज़्यादा वृद्धि इसी में।
- बुनियादी सेवाओं के बिना देश नहीं चलता।
- कृषि और उद्योग की उपज परिवहन, भण्डारण और व्यापार से ही बाज़ार पहुँचती है।
- रोज़गार में इसका हिस्सा 18 से बढ़कर 31 प्रतिशत हुआ।
जाँचते समय: “सहमत नहीं” के साथ कम से कम तीन कारण; जो बच्चा यह भी लिखे कि सभी सेवाएँ बराबर नहीं बढ़ रहीं, उसका उत्तर संतुलित है।
नमूना उत्तर — मैं सहमत नहीं हूँ। 1977–78 से 2017–18 के बीच सबसे ज़्यादा वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक में हुई, और 2017–18 में यह सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन गया। अस्पताल, स्कूल, डाक, बैंक, परिवहन जैसी बुनियादी सेवाओं के बिना कोई देश नहीं चल सकता, और खेती और उद्योग की उपज भी परिवहन और व्यापार से ही बाज़ार पहुँचती है। रोज़गार में भी इसका हिस्सा 18 से 31 प्रतिशत हुआ। हाँ, सेवा क्षेत्रक के सभी भाग बराबर नहीं बढ़ रहे, फिर भी उसकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। (आधार: पृष्ठ 24, 25)
प्रश्न 13 — सेवा क्षेत्रक के दो तरह के लोग (पृष्ठ 25)
- सीमित संख्या की सेवाएँ, जिनमें बहुत कुशल और शिक्षित श्रमिकों को रोज़गार मिलता है।
- बहुत बड़ी संख्या में लोग छोटी दुकानों, मरम्मत और परिवहन जैसी सेवाओं में, जो मुश्किल से गुज़ारा करते हैं, क्योंकि उनके पास दूसरा अवसर नहीं।
जाँचते समय: दोनों वर्ग, और दूसरे वर्ग के साथ “कोई दूसरा अवसर नहीं”।
नमूना उत्तर — भारत में सेवा क्षेत्रक एक ओर थोड़ी-सी ऐसी सेवाओं में बहुत कुशल और शिक्षित लोगों को काम देता है, और दूसरी ओर बहुत बड़ी संख्या में लोगों को छोटी दुकानों, मरम्मत और परिवहन जैसे कामों में, जो मुश्किल से गुज़ारा कर पाते हैं। ये लोग इन कामों में इसलिए हैं कि उनके पास कोई दूसरा अवसर नहीं। इसीलिए सेवा क्षेत्रक के कुछ ही भागों का महत्त्व बढ़ रहा है। (आधार: पृष्ठ 25)
14 से 18 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
प्रश्न 14 — “असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों का शोषण किया जाता है”: सहमत? (पृष्ठ 30–32)
- कम और अनियमित वेतन; उचित मज़दूरी अक्सर नहीं।
- बिना कारण हटाया जा सकता है; मौसम में काम घटे, तो छुट्टी।
- अतिरिक्त समय, सवेतन छुट्टी या बीमारी की छुट्टी का प्रावधान नहीं।
- नियम हैं, पर पालन नहीं।
- बहुत से श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से, जो सामाजिक भेदभाव भी झेलते हैं।
जाँचते समय: “सहमत” के साथ कम से कम तीन कारण, एक उदाहरण (कमल) सहित।
नमूना उत्तर — हाँ, मैं सहमत हूँ। असंगठित क्षेत्रक में वेतन कम और अनियमित है, और श्रमिक को बिना कारण काम से हटाया जा सकता है। कमल सुबह 7.30 से शाम 8 बजे तक काम करता है, पर उसे दैनिक मज़दूरी के सिवा कुछ नहीं मिलता, न छुट्टी, न भत्ता। नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता। इनमें बहुत से श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से हैं, जो कम मज़दूरी के साथ सामाजिक भेदभाव भी झेलते हैं। इसलिए इन्हें संरक्षण और सहायता चाहिए। (आधार: पृष्ठ 30, 31, 32)
प्रश्न 15 — रोज़गार की परिस्थितियों से वर्गीकरण (पृष्ठ 30–31)
- संगठित: पंजीकृत उद्यम, नियमित काम, कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, सेवानुदान अधिनियम, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम जैसे कानूनों का पालन; औपचारिक प्रक्रिया और कार्यविधि, इसीलिए “संगठित”।
- असंगठित: छोटी, बिखरी इकाइयाँ, ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर; नियमों का पालन नहीं।
जाँचते समय: दोनों क्षेत्रकों का नाम, और “संगठित” नाम का कारण।
नमूना उत्तर — रोज़गार की परिस्थितियों के आधार पर गतिविधियाँ संगठित और असंगठित क्षेत्रक में बँटती हैं। संगठित क्षेत्रक में सरकार से पंजीकृत उद्यम आते हैं, जहाँ रोज़गार नियमित है और कानूनों का पालन होता है; इसकी औपचारिक प्रक्रिया है, इसलिए इसे संगठित कहते हैं, जैसे कान्ता का कार्यालय। असंगठित क्षेत्रक छोटी और बिखरी इकाइयों से बना है, जो ज़्यादातर सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं, जैसे कमल की किराना दुकान। (आधार: पृष्ठ 30, 31)
प्रश्न 16 — दोनों क्षेत्रकों की रोज़गार-परिस्थितियों की तुलना (पृष्ठ 30–31)
| आधार | संगठित | असंगठित |
|---|---|---|
| काम | नियमित, सुनिश्चित | प्रायः अनियमित |
| वेतन | नियमित; ज़्यादा काम पर अतिरिक्त वेतन | कम; अतिरिक्त समय का प्रावधान नहीं |
| सुरक्षा | रोज़गार-सुरक्षा | बिना कारण हटाया जा सकता है |
| छुट्टी और लाभ | सवेतन छुट्टी, भविष्य निधि, सेवानुदान, चिकित्सीय लाभ, पेंशन | कुछ नहीं |
| उदाहरण | कान्ता: 9.30 से 5.30, नियुक्ति-पत्र | कमल: 7.30 से 8, कोई पत्र नहीं |
जाँचते समय: कम से कम चार आधार, और कान्ता-कमल का उदाहरण।
प्रश्न 17 — म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. 2005 या विकसित भारत - जी राम जी 2025 के उद्देश्य (पृष्ठ 29)
- ग्रामीण क्षेत्र में काम चाहने वाले हर सक्षम व्यक्ति को साल में 100 दिन के रोज़गार की गारंटी।
- काम न मिले, तो बेरोज़गारी भत्ता।
- भूमि से उत्पादन बढ़ाने वाले कामों को वरीयता।
जाँचते समय: किताब 2005 वाले अधिनियम के उद्देश्य बताती है; नए मिशन के बारे में उसकी एक ही पंक्ति है कि 2025 में उसने इसका स्थान लिया। उत्तर उतने पर ही रखवाइए।
नमूना उत्तर — चर्चा किए गए कुछ सुझावों के अमल में लंबा समय लगेगा, इसलिए छोटी अवधि के उपाय के रूप में केंद्र सरकार ने लगभग 625 जिलों में काम का अधिकार लागू करने का कानून बनाया, म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ.–2005। इसके उद्देश्य थे: काम करने में सक्षम और काम चाहने वाले सभी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में साल में 100 दिन का रोज़गार; सरकार काम न दे पाए, तो बेरोज़गारी भत्ता; और उन कामों को वरीयता जिनसे भूमि से उत्पादन बढ़े। 2025 में इसका स्थान विकसित भारत-रोज़गार गारंटी और आजीविका मिशन (विकसित भारत - जी राम जी 2025) ने ले लिया। (आधार: पृष्ठ 29)
प्रश्न 18 — अपने क्षेत्र से सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक की तुलना (पृष्ठ 33)
- मालिक: सरकार, या कोई व्यक्ति या कंपनी।
- ध्येय: सिर्फ़ लाभ नहीं, या लाभ कमाना।
- ख़र्च: करों या दूसरे तरीकों से, या सेवा लेने वाले से।
जाँचते समय: उदाहरण बच्चे के अपने इलाक़े के हों (सरकारी और निजी स्कूल या अस्पताल), और हर अंतर एक आधार पर टिका हो।
नमूना उत्तर (हमारी ओर से) — हमारे कस्बे में एक सरकारी स्कूल है और एक निजी स्कूल। सरकारी स्कूल का मालिक सरकार है; उसका ध्येय लाभ कमाना नहीं, सबको पढ़ाना है, और उसका ख़र्च करों से चलता है। निजी स्कूल किसी व्यक्ति या संस्था का है; वह फ़ीस से चलता है, और उसका एक ध्येय लाभ भी है। दोनों सेवा देते हैं और लोगों को रोज़गार भी देते हैं; अंतर स्वामित्व और ध्येय का है।
19 से 24 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
प्रश्न 19 — सुव्यवस्थित और कुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन (पृष्ठ 33)
यह प्रश्न बच्चों के अपने अनुभव से भरेगा; किताब कोई उदाहरण नहीं देती। चारों खानों में एक-एक उदाहरण लिखवाइए: सार्वजनिक और निजी, दोनों में अच्छे और ख़राब प्रबंध वाले संगठन।
जाँचते समय: चारों खाने भरे हों, और चर्चा में यह बात आए कि अच्छा या बुरा प्रबंध स्वामित्व से तय नहीं होता। किसी नामित दफ़्तर या व्यक्ति पर टिप्पणी न लिखवाइए; संगठन का प्रकार काफ़ी है।
नमूना उत्तर (हमारी ओर से) — सार्वजनिक, सुव्यवस्थित: समय पर खुलने वाला गाँव का सरकारी स्कूल। सार्वजनिक, कुव्यवस्थित: कोई सरकारी दफ़्तर जहाँ काम में देर होती है। निजी, सुव्यवस्थित: ग्राहकों को ठीक सेवा देने वाली दुकान। निजी, कुव्यवस्थित: कोई निजी इकाई जहाँ श्रमिकों को नियमों के लाभ नहीं मिलते। इससे दिखता है कि दोनों क्षेत्रकों में दोनों तरह के संगठन मिल सकते हैं।
प्रश्न 20 — सार्वजनिक क्षेत्रक की गतिविधियाँ और सरकार उन्हें क्यों करती है (पृष्ठ 33–34)
- बहुत महँगी सुविधाएँ: सड़क, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली, बाँध से सिंचाई; निजी क्षेत्रक की क्षमता से बाहर, या वह ऊँची कीमत लेगा।
- समर्थन वाले काम: छोटी इकाइयों को ऐसी दर पर बिजली जिस पर वे ख़रीद सकें; किसानों से उचित मूल्य पर गेहूँ-चावल, राशन की दुकानों पर कम मूल्य पर बिक्री।
- सरकार की ज़िम्मेदारी: सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा; “इन पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है।”
जाँचते समय: उदाहरण और कारण, दोनों; तीसरे बिंदु के साथ पृष्ठ 34 का कोई एक तथ्य।
नमूना उत्तर — सरकार सड़कें, पुल, रेलवे, पत्तन, बिजली और सिंचाई के बाँध बनाती है, क्योंकि इन पर इतना ख़र्च होता है कि यह निजी क्षेत्रक की क्षमता से बाहर है, और वह बनाए भी, तो ऊँची कीमत लेगा। सरकार छोटे उद्योगों को ऐसी दर पर बिजली देती है जिस पर वे चल सकें, और किसानों से उचित मूल्य पर अनाज ख़रीदकर राशन की दुकानों पर कम मूल्य पर बेचती है; इससे किसान और उपभोक्ता, दोनों को सहारा मिलता है। स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है: भारत में निरक्षरों की संख्या विश्व में सबसे ज़्यादा है, और लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं। (आधार: पृष्ठ 33, 34)
प्रश्न 21 — आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक का योगदान (पृष्ठ 24, 29, 33–34)
- ढाँचा: सड़क, पुल, रेलवे, बिजली, सिंचाई, जिनके बिना खेती और उद्योग नहीं बढ़ते।
- उद्योगों और किसानों को सहारा: सस्ती बिजली, उचित मूल्य पर ख़रीद।
- बुनियादी सेवाएँ: विकासशील देश में इनका प्रबंध सरकार करती है।
- मानव विकास: स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, आवास, भोजन और पोषण।
- रोज़गार: अकेले शिक्षा में लगभग 20 लाख; गाँवों में काम का अधिकार देने वाला कानून (पृष्ठ 29)।
जाँचते समय: कम से कम चार बिंदु, हर एक के साथ उदाहरण।
नमूना उत्तर — सार्वजनिक क्षेत्रक सड़क, पुल, रेलवे, बिजली और सिंचाई जैसा ढाँचा खड़ा करता है, जिसके बिना खेती और उद्योग नहीं बढ़ सकते। वह छोटे उद्योगों को सस्ती बिजली देता है और किसानों से उचित मूल्य पर अनाज ख़रीदता है। अस्पताल, स्कूल, डाक, थाना जैसी बुनियादी सेवाएँ देता है। सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च से लोगों की क्षमता बढ़ती है, और शिक्षा-स्वास्थ्य के विस्तार से रोज़गार भी बनते हैं; अकेले शिक्षा में लगभग 20 लाख। बजट बढ़ाकर वह सबसे निर्धन लोगों और देश के उपेक्षित भागों तक पहुँचता है। (आधार: पृष्ठ 24, 29, 33, 34)
प्रश्न 22 — मज़दूरी, सुरक्षा और स्वास्थ्य पर संरक्षण (पृष्ठ 30–32)
- मज़दूरी: कम और अनियमित; कमल को दैनिक मज़दूरी के सिवा कुछ नहीं; नियम और विनियम तो हैं, पर उनका पालन नहीं होता।
- सुरक्षा: बिना कारण हटाया जा सकता है; संगठित क्षेत्रक में सुरक्षित कार्य-पर्यावरण का नियम है, निर्माण श्रमिक और सिर पर बोझा ढोने वाले इसके बिना काम करते हैं।
- स्वास्थ्य: बीमारी की छुट्टी या चिकित्सीय लाभ नहीं।
जाँचते समय: तीनों मुद्दे, हर एक के साथ उदाहरण।
नमूना उत्तर — मज़दूरी: असंगठित श्रमिकों की आय कम और अनियमित है; कमल को दैनिक मज़दूरी के सिवा कुछ नहीं मिलता, और जिस दिन काम नहीं, उस दिन पैसा नहीं। सुरक्षा: उन्हें कभी भी काम से हटाया जा सकता है, और निर्माण श्रमिक या सिर पर बोझा ढोने वाले बिना किसी सुरक्षित कार्य-पर्यावरण के काम करते हैं। स्वास्थ्य: उन्हें न बीमारी की छुट्टी मिलती है, न चिकित्सीय लाभ, जबकि संगठित क्षेत्रक में ये हक़ हैं। इसलिए आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए इनका संरक्षण और सहायता अनिवार्य है। (आधार: पृष्ठ 30, 31, 32)
प्रश्न 23 — अहमदाबाद का अध्ययन (पृष्ठ 28–32, 37)
| क्षेत्रक | श्रमिक | श्रमिकों में हिस्सा | आय, 1997–98 (करोड़ रुपए) | आय में हिस्सा |
|---|---|---|---|---|
| संगठित | 4,00,000 | 26.7% | 320 | 53.3% |
| असंगठित | 11,00,000 | 73.3% | 280 | 46.7% |
| कुल | 15,00,000 | 100% | 600 | 100% |
- घटाना: 15,00,000 − 11,00,000 = 4,00,000; 600 − 320 = 280।
- लगभग तीन-चौथाई श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में, पर आय का आधे से कम हिस्सा उनसे।
- रोज़गार के तरीके: लघु उद्योगों को सरकारी मदद, पर्यटन और क्षेत्रीय शिल्प, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार, असंगठित श्रमिकों का संरक्षण।
जाँचते समय: तालिका में दोनों घटाव; प्रतिशत न भी निकालें तो चलेगा, पर “ज़्यादा श्रमिक, कम आय” वाली बात आनी चाहिए।
नमूना उत्तर — नगर के 15,00,000 श्रमिकों में से 11,00,000 असंगठित और 4,00,000 संगठित क्षेत्रक में हैं, जबकि 600 करोड़ रुपए की आय में से 320 करोड़ संगठित से और 280 करोड़ असंगठित से आते हैं। यानी लगभग तीन-चौथाई श्रमिक आधे से कम आय कमा रहे हैं। रोज़गार बढ़ाने के लिए लघु उद्योगों को कच्चा माल पाने और उत्पाद बेचने में सरकारी मदद, पर्यटन, क्षेत्रीय शिल्प और सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सेवाएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार, और असंगठित श्रमिकों का संरक्षण ज़रूरी है। (आधार: पृष्ठ 29, 32, 37)
प्रश्न 24 — जी.वी.ए. की तालिका से हिस्सेदारी और दंड-आलेख (पृष्ठ 25, 37)
तालिका (रुपए करोड़): 2001–02 में प्राथमिक 13,23,000, द्वितीयक 10,40,000, तृतीयक 19,31,000; 2021–22 में 24,79,400, 40,73,000, 73,25,000।
| वर्ष | कुल जी.वी.ए. | प्राथमिक | द्वितीयक | तृतीयक |
|---|---|---|---|---|
| 2001–02 | 42,94,000 | 30.8% | 24.2% | 45.0% |
| 2021–22 | 1,38,77,400 | 17.9% | 29.3% | 52.8% |
- (क) हिस्सेदारी = क्षेत्रक का जी.वी.ए. ÷ कुल × 100; हर पंक्ति का जोड़ 100।
- (ख) आलेख 2 की तरह दो दंड, दोनों 100 तक; नीचे प्राथमिक, बीच में द्वितीयक, ऊपर तृतीयक; हर हिस्से पर प्रतिशत।
- (ग) प्राथमिक का हिस्सा घटा, द्वितीयक का बढ़ा, तृतीयक सबसे बड़ा और आधे से ज़्यादा।
जाँचते समय: पहले कुल; फिर हर क्षेत्रक का भाग। दशमलव के बाद एक अंक तक पर्याप्त है। वर्ष तालिका वाले लिखवाइए, प्रश्न में छपे नहीं।
नमूना उत्तर — (ग) 2001–02 से 2021–22 के बीच जी.वी.ए. में प्राथमिक क्षेत्रक का हिस्सा 30.8 से घटकर 17.9 प्रतिशत रह गया, हालाँकि रकम में उसका जी.वी.ए. बढ़ा। द्वितीयक का हिस्सा 24.2 से बढ़कर 29.3 प्रतिशत हुआ। तृतीयक क्षेत्रक दोनों वर्षों में सबसे बड़ा है, और उसका हिस्सा 45.0 से बढ़कर 52.8 प्रतिशत, यानी आधे से ज़्यादा हो गया। यह वही रुझान है जो आलेख 2 दिखाता है। (आधार: पृष्ठ 25, 37)
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — आठ आम भूलें
1. “दर्जी और कुम्हार सेवा देते हैं, इसलिए तृतीयक।” दोनों कपड़े और मिट्टी से नई वस्तु बनाते हैं, इसलिए द्वितीयक हैं; कसौटी यह है कि गतिविधि वस्तु बनाती है या सेवा देती है (पृष्ठ 20)।
2. “स.घ.उ. में हर बनी और बिकी वस्तु गिनी जाती है।” सिर्फ़ अंतिम वस्तुएँ और सेवाएँ, और एक विशेष वर्ष की; मध्यवर्ती का मूल्य अंतिम में पहले से शामिल है (पृष्ठ 22–23)।
3. “भारत में रोज़गार भी उत्पादन की तरह तृतीयक में चला गया।” उत्पादन में तृतीयक सबसे आगे है, पर 2017–18 में भी 44 प्रतिशत लोग प्राथमिक क्षेत्रक में हैं, और वही सबसे बड़ा नियोक्ता है (पृष्ठ 25)।
4. “आलेख 2 और आलेख 3 एक ही बात दिखाते हैं।” आलेख 2 जी.वी.ए. (उत्पादन) में हिस्सेदारी दिखाता है, आलेख 3 रोज़गार में; अध्याय की पूरी बात इन दोनों के अंतर से निकलती है (पृष्ठ 25)।
5. “छिपी हुई बेरोज़गारी में लोगों के पास काम नहीं होता।” काम होता है, पर सब क्षमता से कम करते हैं; जिनके पास काम ही नहीं, वह खुली बेरोज़गारी है (पृष्ठ 26)।
6. “संगठित मतलब सरकारी।” संगठित-असंगठित रोज़गार की परिस्थितियों से बँटते हैं, सार्वजनिक-निजी स्वामित्व से। बड़े निजी कारखाने का नियमित श्रमिक संगठित क्षेत्रक में है (पृष्ठ 30, 33)।
7. “असंगठित क्षेत्रक के लिए कोई नियम ही नहीं।” नियम हैं, पर उनका पालन नहीं होता (पृष्ठ 31)।
8. “अपना काम करने वाला हमेशा असंगठित।” वह सरकार के पास पंजीकृत हो और नियम माने, तो संगठित क्षेत्रक में है; सूरत वाली तालिका की दूसरी पंक्ति यही है (पृष्ठ 30, 36)।
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
ये पंक्तियाँ रटवाने के लिए नहीं हैं। पहले बात समझाइए, फिर उत्तर में यह पंक्ति लिखवाइए; किताब के अपने शब्द उत्तर को सधा हुआ बनाते हैं।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “यह किसी देश के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है।” (स.घ.उ. के बारे में) | 23 | प्रश्न 2 (स); स.घ.उ. की परिभाषा |
| “स. घ. उ. अर्थव्यवस्था की विशालता प्रदर्शित करता है।” | 23 | स.घ.उ. क्यों मापा जाता है |
| “जी.वी.ए. करों तथा सब्सिडी के लिए समायोजन के बाद अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों के योगदान को मापता है।” | 23 | प्रश्न 7, 24 |
| “इस प्रकार की अल्प बेरोज़गारी को छिपी हुई बेरोज़गारी कहते हैं” | 26 | प्रश्न 10, 11 |
| “जहाँ वे पूरा दिन बिता देते हैं, परन्तु बहुत कम कमा पाते हैं।” (सड़क पर बेचने वालों के बारे में) | 26 | प्रश्न 10 का शहरी उदाहरण; प्रश्न 13 |
| “इन पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है।” (स्वास्थ्य और शिक्षा के बारे में) | 34 | प्रश्न 20, 21 |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
ये सवाल किताब में ही पूछे गए हैं, और कक्षा में भी यही उठते हैं। उत्तर किताब से ही निकालिए।
पृष्ठ 24 — 1977–78 और 2017–18 की तुलना क्या दिखाती है? इससे क्या निष्कर्ष निकलता है? नमूना उत्तर — कुल उत्पादन बहुत बढ़ा, और तीनों क्षेत्रकों का उत्पादन बढ़ा, पर सबसे ज़्यादा तृतीयक का। निष्कर्ष: भारत में उत्पादन के हिसाब से तृतीयक क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया है (पृष्ठ 24)।
पृष्ठ 28 — आपके क्षेत्र में किस समूह के लोग बेरोज़गार या अल्प बेरोज़गार हैं? क्या आप कुछ उपाय सुझा सकते हैं? नमूना उत्तर — बच्चे अपने इलाक़े से बताएँ; किताब के समूह मदद करेंगे: वर्षा पर निर्भर छोटे किसान परिवार, शहर के अनियत श्रमिक, सड़क पर बेचने वाले (पृष्ठ 26)। उपाय भी किताब से: सिंचाई, ग्रामीण सड़कें और भण्डारण, बैंक से सस्ता साख, दाल मिल और शीत भण्डारण जैसे अर्द्ध-ग्रामीण उद्योग, पर्यटन और क्षेत्रीय शिल्प (पृष्ठ 27–29)।
पृष्ठ 30 — क्या आप कान्ता और कमल के रोज़गार की परिस्थितियों में अंतर देखते हैं? नमूना उत्तर — हाँ। कान्ता के घंटे तय हैं (9.30 से 5.30), उसे हर माह नियमित वेतन, भविष्य निधि, चिकित्सीय भत्ते, रविवार का सवेतन अवकाश और नियुक्ति-पत्र मिलता है। कमल 7.30 से 8 बजे तक काम करता है, उसे केवल दैनिक मज़दूरी मिलती है, न छुट्टी, न भत्ता, न पत्र, और उसे कभी भी हटाया जा सकता है। कान्ता संगठित क्षेत्रक में है, कमल असंगठित में (पृष्ठ 30)।
सावधानी
- सामाजिक भेदभाव वाली पंक्ति (पृष्ठ 32)। किताब बताती है कि असंगठित क्षेत्रक के बहुत से श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से हैं और सामाजिक भेदभाव भी झेलते हैं। इसे काम की परिस्थितियों की बात की तरह शांत ढंग से पढ़िए; किसी बच्चे या उसके परिवार की ओर इशारा न हो।
- घर का काम और आय। प्रश्न 8 और पृष्ठ 31 की बातचीत वाले कार्यकलाप में कोई बच्चा अपने घर की आय या काम बताने को मजबूर न हो। लक्ष्मी या कमल जैसे उदाहरण के लिए कक्षा के किसी परिवार को नहीं, काल्पनिक परिवार को लीजिए।
- विकसित भारत - जी राम जी 2025। किताब इसके बारे में एक ही बात कहती है: 2025 में इसने म.गाँ.रा.ग्रा.रो.गा.अ. का स्थान लिया (पृष्ठ 29)। इससे आगे की बातें, जैसे काम के दिन या मज़दूरी, कक्षा में तथ्य की तरह न रखिए।
- आलेख 1 और 2 से पढ़ी संख्याएँ। इन पर मान नहीं छपे; बच्चों की कॉपी में ऐसी संख्या “लगभग” के साथ ही जाए।
- प्रश्न 19 और 18 में नाम। किसी नामित दफ़्तर, स्कूल या व्यक्ति पर टिप्पणी न लिखवाइए; संगठन का प्रकार लिखना काफ़ी है।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- कार्य के स्वभाव से तीन क्षेत्रक हैं: प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक, और तीनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं (पृष्ठ 20–21)।
- स.घ.उ. एक विशेष वर्ष में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है; मध्यवर्ती वस्तुएँ नहीं गिनी जातीं (पृष्ठ 22–23)।
- 2017–18 में तृतीयक सबसे बड़ा उत्पादक है, पर 44 प्रतिशत लोग अब भी प्राथमिक क्षेत्रक में हैं (पृष्ठ 24–25)।
- इसीलिए खेती में छिपी हुई बेरोज़गारी है: लक्ष्मी के खेत से दो लोग हट जाएँ, तो भी उत्पादन नहीं घटता (पृष्ठ 26)।
- लगभग 83 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं, जहाँ काम कच्चा है और नियमों का पालन नहीं होता (पृष्ठ 30–31)।
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक स्वामित्व से बँटते हैं; स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है (पृष्ठ 33–34)।
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड।