कक्षा 6 • सामाजिक विज्ञान • समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे • अध्याय 10 — आधारभूत लोकतंत्र, भाग 1: शासन
कक्षा — 6 · विषय — सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) · पृष्ठ — 149 से 162
दो सड़कें
एक पर यातायात संकेतक हैं, ज़ेब्रा क्रॉसिंग है, गाड़ियाँ अपनी लेन में हैं। दूसरी पर सब कुछ एक साथ है — कारें, ऑटो, साइकिलें, पैदल लोग। दोनों में फ़र्क़ क्या है? सिर्फ़ एक चीज़ — नियम।
इस अध्याय का पूरा ढाँचा — तीन और तीन★
सरकार के तीन अंग · सरकार के तीन स्तर
और यही इस अध्याय का सबसे बड़ा जाल हैध्यान
- तीन अंग
- कौन क्या करता है
- (चित्र 10.3 — एक पहिया)
- तीन स्तर
- कौन कहाँ तक
- (चित्र 10.4 — एक पिरामिड)
और यह वाक्य याद रखिए
- अंग = काम का बँटवारा।
- स्तर = क्षेत्र का बँटवारा।
- और तीनों अंग तीनों स्तरों पर होते हैं।
पुस्तक ने दोनों के लिए अलग-अलग चित्र दिए हैं — एक पहिया, एक पिरामिड। यह संयोग नहीं है।
1 | अध्याय का आरंभ | दो उद्धरण, तीन प्रश्न
पहला उद्धरण — महाभारत
“राजानां धर्मगोप्तारं धर्मो रक्षति रक्षितः” शासक धर्म की रक्षा करता है और जो धर्म की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी रक्षा करता है।
पृ. 149
दूसरा उद्धरण — रिगोबर्टा मेन्चु तुम
न्याय के बिना शांति नहीं; समानता के बिना न्याय नहीं; विकास के बिना समानता नहीं; संस्कृति और लोगों की पहचान और सम्मान के बिना लोकतंत्र नहीं।
पृ. 149
दोनों एक ही बात कहते हैं
पृ. 149
- एक संस्कृत में है, दूसरा ग्वाटेमाला से आया है।
- पहला ‘धर्म’ की बात करता है, दूसरा ‘पहचान और सम्मान’ की।
- और दोनों कहते हैं — शासन तभी टिकता है जब वह किसी बड़े मूल्य की रक्षा करता हो।
! ‘धर्म’ का अर्थ यहाँ भी ‘कर्तव्य’ है, religion नहीं — ठीक वैसे ही जैसे अध्याय 9 में था।
अध्याय के तीन महत्वपूर्ण प्रश्न
पृ. 149
- ‘शासन’ का अर्थ क्या है?
- हमें सरकार की आवश्यकता क्यों होती है?
- ‘लोकतंत्र’ का अर्थ क्या है? यह क्यों महत्वपूर्ण है?
आवरण-पृष्ठ पर एक शब्द-मेघ है — लोकतंत्र · शासन · सभा · कानून · संसद · लोक सभा · विधायिका · कार्यपालिका · न्यायपालिका · प्रतिनिधि।
2 | नियम | और तीन परिभाषाएँ
नियम क्यों चाहिए
पृ. 150
- “दीर्घकाल से मनुष्य समाज में रहता आ रहा है।”
- “जब बहुत से लोग एक साथ रहते हैं, तब असहमति और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।”
- “ऐसे में, समाज में व्यवस्था और सद्भाव बनाए रखने के लिए नियम अनिवार्य हो जाते हैं।”
और नियम हर जगह हैं
| कहाँ | कौन-से नियम |
|---|---|
| घर | कुछ सामान्य नियम, जिनके पालन की अपेक्षा आपसे होती है |
| विद्यालय | कुछ विद्यार्थियों के लिए, तो कुछ शिक्षकों के लिए |
| परीक्षा | बड़ी कक्षाओं में अनिवार्य नियम |
| सड़क | यातायात के नियम |
| नौकरी | नियोक्ता द्वारा बनाए गए नियम |
पृ. 150
और अब वह पंक्ति जो सबसे ज़्यादा छूट जाती है★
”…जबकि नियोक्ता को भी उन सभी नियमों का पालन करना पड़ता है जो उन्होंने अपने अधीन काम करने वाले लोगों के लिए बनाए हैं।”
पृ. 150
यानी नियम बनाने वाला भी नियम से बँधा होता है
- यही आगे चलकर ‘शक्तियों का पृथक्करण’ बनता है।
- और यही ‘कानून का शासन’ का अर्थ है।
और यदि कोई नियम न माने? पुस्तक का सीधा उत्तर — “समाज अपनी व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं हो पाएगा।”
तीन परिभाषाएँ — तीनों पुस्तक की अपनी★★
| पद | परिभाषा |
|---|---|
| शासन | “निर्णयों को लेने की प्रक्रिया, नियमों के विभिन्न समूहों से सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करना और उनका पालन सुनिश्चित करना” |
| सरकार | “उन व्यक्तियों के समूह या तंत्र को कहते हैं जो नियम बनाते और इन नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करते हैं” |
| कानून | “कुछ अधिक महत्वपूर्ण नियमों को कानून कहा जाता है” |
पृ. 150
तीनों का अंतर एक वाक्य में
- शासन एक प्रक्रिया है।
- सरकार एक तंत्र है।
- कानून एक अधिक महत्वपूर्ण नियम है।
तो क्या शासन और सरकार एक ही चीज़ हैं? — नहीं। सरकार शासन करती है; शासन वह काम है।
और नियम बदले भी जा सकते हैं★
पृ. 150–151
- “इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि जो नियम और कानून एक बार बन गए, वे सदा के लिए बन गए।”
- घर में — माता-पिता से किसी विशेष नियम पर चर्चा
- विद्यालय में — विद्यार्थी संघ या प्रबंधन से बदलाव के लिए कहना
- और समाज में — “कानूनों और नियमों में नागरिक भी अपनी बात रख सकते हैं।”
और पुस्तक यहीं एक वादा करती है★
“हम जानेंगे कि ऐसा किस प्रकार होता है।”
पृ. 151
इस वादे को याद रखिए
- यह वादा अध्याय के अंतिम पृष्ठों में पूरा होता है।
- और उसका नाम है — आधारभूत लोकतंत्र।
हम इस पर लौटेंगे।
3 | दो चित्र | व्यवस्था और अव्यवस्था
चित्र 10.1 — दो सड़कें
| ऊपर वाला चित्र | नीचे वाला चित्र | |
|---|---|---|
| क्या है | चौराहा, यातायात संकेतक, ज़ेब्रा क्रॉसिंग, चौड़े फ़ुटपाथ | खचाखच भरी सड़क |
| वाहन | अपनी-अपनी लेन में, संकेतक पर रुके हुए | हर दिशा में, कोई लेन नहीं |
| पैदल यात्री | ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर | वाहनों के बीच से |
| भाव | व्यवस्था | अव्यवस्था |
पृ. 151
और अब असली प्रश्न
- दूसरे चित्र में लोग नियम तोड़ रहे हैं —
- या वहाँ नियम हैं ही नहीं?
यह प्रश्न पूरे अध्याय का द्वार है।
चित्र 10.2 — सरकार क्या-क्या करती है
पृ. 152
- पूरे पृष्ठ पर दस चित्र, और एक भी वाक्य नहीं।
- सड़क निर्माण · रेल · सेना और सीमा · अस्पताल · अग्निशमन और बचाव
- यातायात पुलिस · सर्वोच्च न्यायालय · विद्यालय · डाक सेवा · सरकारी कार्यालय
ये सब ‘लोक सेवाएँ’ हैं। और अब अध्याय का दूसरा प्रश्न अपने आप उत्तर पा लेता है — हमें सरकार क्यों चाहिए।
4 | सरकार के तीन अंग | कौन क्या करता है
पहले एक कहानी — तीस साल पहले
पृ. 153
- लोग डाकघर की पंक्ति में लगकर, फॉर्म भरकर मनी ऑर्डर भिजवाते थे।
- या बैंक की पंक्ति में लगकर डिमांड ड्राफ्ट बनवाते और उसे डाक से भेजते थे।
- “आपने शायद इन शब्दों को कभी न भी सुना हो” — क्योंकि अब डिजिटल संसाधन हैं।
पर उसी तकनीक ने एक नई समस्या भी बनाई
पृ. 153
- “डिजिटल तकनीक ने विशेष प्रकार के अपराधियों को भी जन्म दिया है
- जो अपने स्थान पर बैठे-बैठे डिजिटल माध्यमों से लोगों की धनराशि चुराने के तरीके ढूँढ़ते हैं।”
- इसे साइबर क्राइम कहते हैं।
और अब देखिए — तीन काम, तीन अलग अंग★★
| क्या हुआ | कौन-सा अंग |
|---|---|
| “अनेक सरकारों ने नए कानून बनाए हैं” | विधायिका |
| साइबर पुलिस ने अपराधियों को गिरफ़्तार किया | कार्यपालिका |
| “न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया” — आर्थिक दंड और जेल | न्यायपालिका |
पृ. 153
विधायिका
पृ. 153
- “वह अंग है जो नए कानून बनाती है
- और कभी-कभी पुराने कानूनों में संशोधन तथा वर्तमान कानून को निरस्त भी करती है।”
- “यह कार्य जनता के प्रतिनिधियों की सभा द्वारा किया जाता है।”
! तीन क्रियाएँ हैं, एक नहीं — बनाना · संशोधन करना · निरस्त करना।
कार्यपालिका
पृ. 153–154
- “वह अंग है जो कानूनों को लागू करती है।”
- इसके अंतर्गत आते हैं — राष्ट्र-राज्य के प्रमुख (राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री), मंत्रीगण,
- और ऐसे अभिकरण (एजेंसी) जिनका दायित्व कानून को लागू करवाना होता है।
- “(यहाँ दिए गए उदाहरण में साइबर पुलिस ऐसी ही एजेंसी है।)”
न्यायपालिका
पृ. 154
- “न्यायालयों की प्रणाली है जो इस बात का निर्णय करती है कि क्या किसी ने कानून तोड़ा है
- और यदि तोड़ा है, तो उस पर क्या कार्रवाई की जाए? या फिर, यदि आवश्यक हो, तो उसे क्या दंड दिया जाए?”
पर न्यायपालिका का काम यहीं ख़त्म नहीं होता★★
वह बाक़ी दो अंगों को भी परखती है
पृ. 154
पुस्तक के अपने शब्द
पृ. 154
- “कभी-कभी यह इस बात की भी जाँच करती है कि क्या कार्यपालिका द्वारा लिया गया कोई निर्णय ठीक है या नहीं;
- अथवा विधायिका द्वारा पारित किया गया कोई कानून भली-भाँति परखा गया है और सभी के हित में है या नहीं।”
यही ‘नियंत्रण और संतुलन’ का असली अर्थ है — और यह वाक्य लगभग हमेशा जल्दी में पढ़ लिया जाता है।
5 | शक्तियों का पृथक्करण | और उसका उद्देश्य
पुस्तक की परिभाषा
पृ. 154
- “सुशासन के किसी भी तंत्र में इन तीनों अंगों को निश्चित रूप से पृथक रखा जाता है,
- जबकि ये तीनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और कार्य भी एक साथ करते हैं।
- यह विभाजन ‘शक्तियों का पृथक्करण’ कहलाता है।”
यह विरोधाभास नहीं है — यही पूरी बात हैध्यान
- ‘पृथक’ का अर्थ है — अलग-अलग काम।
- ‘पृथक’ का अर्थ यह नहीं है — एक-दूसरे से कटे हुए।
एक ही टीम में गेंदबाज़, बल्लेबाज़ और विकेटकीपर — काम अलग-अलग, पर टीम एक ही।
और उद्देश्य क्या है?★
“पूरी प्रणाली को नियंत्रित करना एवं संतुलन बनाए रखना”
पृ. 154
पुस्तक इसे और खोलती है
पृ. 154
- ”…अर्थात सरकार का प्रत्येक अंग दूसरे अंग के कार्यों की निगरानी कर सकता है
- तथा यदि कोई अंग अपनी अपेक्षित भूमिका से परे जाकर कार्य कर रहा है,
- तो उसे नियंत्रित कर पुन: संतुलन स्थापित कर सकता है।”
चित्र 10.3 — एक पहिया
पृ. 154
- बीच में एक गोला — शासन
- चारों ओर तीन खंड — विधायिका · कार्यपालिका · न्यायपालिका
- और तीनों के बीच दोनों दिशाओं वाले तीर
★तीर एक तरफ़ क्यों नहीं हैं? — क्योंकि हर अंग दूसरे की निगरानी करता है। कोई ऊपर नहीं है।
और अब एक प्रश्न, जो पुस्तक स्वयं पूछती है★
“यदि शासन के तीनों अंगों की शक्तियाँ किसी एक ही समूह के नियंत्रण में आ जाएँ, तो किस प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न होगी?”
पृ. 155
इसे इस तरह सोचिए
- एक ही खिलाड़ी नियम बनाए,
- स्वयं खेले,
- और स्वयं ही अंपायर हो जाए।
खेल कैसा होगा?
6 | सरकार के तीन स्तर | कौन कहाँ तक
पुस्तक का कथन
पृ. 155
- “अनेक देशों में कोई भी सरकार कई स्तरों पर कार्य करती है।
- भारत सहित अनेक देशों में यह तीन स्तरों पर कार्य करती है —
- स्थानीय स्तर, राज्य या प्रादेशिक स्तर और राष्ट्रीय स्तर।
- प्रत्येक स्तर भिन्न विषयों पर कार्य करता है।”
पहली उपमा — घर का बल्ब
पृ. 155
- पहले — बल्ब, स्विच, फ्यूज़ स्वयं जाँचेंगे
- फिर — बिजली मिस्त्री को बुलाएँगे
- और यदि समस्या घर पर नहीं है — बिजली विभाग जाकर शिकायत दर्ज कराएँगे
“यहाँ भी समस्या के समाधान के तीन स्तर हैं।”
चित्र 10.4 — एक पिरामिड
पृ. 155
- सबसे ऊपर — केंद्र सरकार (राष्ट्रीय स्तर पर)
- बीच में — राज्य सरकार (राज्य स्तर पर)
- सबसे नीचे — स्थानीय सरकार (नगर अथवा ग्राम स्तर पर)
★ध्यान दीजिए — स्थानीय सरकार सबसे नीचे है, और वह पिरामिड का आधार है। यह बात अंत में काम आएगी।
दूसरी उपमा — बाढ़★★
| बाढ़ कितनी बड़ी | कौन-सा स्तर | क्या करता है |
|---|---|---|
| “ज्यादा भीषण नहीं” | स्थानीय प्राधिकारी | स्थिति स्वयं सँभाल लेते हैं |
| अनेक नगर और बहुत से गाँव प्रभावित | राज्य सरकार | जिम्मेदारी उठाती है, बचाव दल भेजती है |
| “भयानक रूप” और “विशाल क्षेत्र” | केंद्र सरकार | राहत सामग्री और सेना भेजती है |
पृ. 155–156
और यही पूरा सिद्धांत है
- ऊपर का स्तर तभी आता है जब नीचे का स्तर सँभाल न सके।
- “इस उदाहरण में आप सरकार के तीनों स्तर के काम देख सकते हैं।”
7 | ध्यान रखें | दो आदर्श वाक्य
प्राचीन ग्रंथों से आए दो आदर्श वाक्य
| संस्था | आदर्श वाक्य | अर्थ |
|---|---|---|
| भारत सरकार | ‘सत्यमेव जयते’ | “सत्य की ही विजय होती है” |
| सर्वोच्च न्यायालय | ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ | “जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है” |
पृ. 156
और यह अध्याय के पहले उद्धरण से जुड़ता है
- अध्याय के आरंभ में महाभारत का श्लोक था — वहाँ भी ‘धर्म’ था।
- और सर्वोच्च न्यायालय के आदर्श वाक्य में भी ‘धर्म’ है।
“हमारे अनेक संस्थानों के आदर्श वाक्य हमारे प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान से प्रेरित हैं।”
और एक सूचना जो पुस्तक स्वयं देती हैध्यान
पृ. 156
- अगले पृष्ठ की तालिका में केवल राष्ट्रीय और राज्य स्तर है।
- “स्थानीय सरकारों का यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है क्योंकि हम आगे के दो अध्यायों में इसे विस्तार से समझेंगे।”
- और विधान सभाओं की निश्चित भूमिका — कक्षा 7 में।
तालिका अधूरी नहीं है। वह हिस्सा अभी आया नहीं है।
8 | चित्र 10.5 | तीनों अंग, दो स्तरों पर
न्यायपालिका
| अखिल भारत | राज्य स्तर | |
|---|---|---|
| न्यायपालिका | भारत का सर्वोच्च न्यायालय | उच्च न्यायालय |
पृ. 157
विधायिका
| राष्ट्रीय स्तर | राज्य स्तर | |
|---|---|---|
| विधायिका | दो सदन — लोकसभा और राज्य सभा | विधान सभा (कुछ राज्यों में विधान परिषद भी) |
पृ. 157
‘सदन’ किसे कहते हैं
पृ. 157
- “ऐसी सभा जहाँ कानूनों पर चर्चा की जाती है अथवा उन्हें पारित किया जाता है।”
कार्यपालिका — और यही सबसे ज़्यादा उलटती है★★
| संघ सरकार | राज्य सरकार | |
|---|---|---|
| औपचारिक प्रमुख | राष्ट्रपति — और तीनों सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर | राज्यपाल |
| कार्यपालिका के प्रमुख | प्रधानमंत्री | मुख्यमंत्री |
पृ. 157
‘औपचारिक’ का क्या अर्थ है
पृ. 157
- “हमारे यहाँ राष्ट्रपति और राज्यपाल वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख नहीं होते हैं।
- विशेष परिस्थितियों में उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं,
- पर वे सामान्यत: केंद्र या राज्य सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं।”
! ‘औपचारिक’ का अर्थ ‘प्रभावहीन’ नहीं होता। दोनों हेज ध्यान से पढ़िए — “विशेष परिस्थितियों में” और “सामान्यत:”।
कार्यपालिका के कार्य —(पुस्तक कहती है, “यह विस्तृत सूची नहीं है”)
| संघ सरकार | राज्य सरकार |
|---|---|
| रक्षा · विदेशी मामले | पुलिस, कानून व्यवस्था |
| परमाणु ऊर्जा · संचार · मुद्रा | केंद्र के कानूनों को अपनाना और कार्यान्वयन |
| अंतर्राज्यीय वाणिज्य | जन-स्वास्थ्य · कृषि · सिंचाई |
| शिक्षा · राष्ट्रीय नीतियों का प्रतिपादन | शिक्षा · स्थानीय सरकार |
पृ. 157
तालिका में एक शब्द दोनों तरफ़ है — कौन-सा?★
शिक्षा
और यह छपाई की भूल नहीं है
- कुछ विषयों पर केंद्र और राज्य, दोनों काम करते हैं।
- यही कारण है कि शिक्षा दोनों सूचियों में मिलती है।
यह इस तालिका का सबसे शिक्षाप्रद बिंदु है।
9 | डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम | ‘औपचारिक’ का अर्थ ‘प्रभावहीन’ नहीं
तथ्य एक जगह
| क्या | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 1931, रामेश्वरम, तमिलनाडु — एक सामान्य परिवार में |
| पहचान | सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक · ‘मिसाइल मैन’ |
| किसलिए | अंतरिक्ष कार्यक्रम, मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु क्षमताओं के विकास में भूमिका |
| पद | भारत के 11वें राष्ट्रपति |
| कब | 2002 से 2007 तक |
पृ. 158
और यह बॉक्स ठीक यहाँ क्यों है?★★
पिछले ही पृष्ठ पर लिखा था कि राष्ट्रपति ‘औपचारिक’ प्रमुख होते हैं
पृ. 157–158
पुस्तक का उत्तर
पृ. 158
- “डॉ. कलाम ने यह दिखाया कि भले ही राष्ट्रपति के रूप में उनकी स्थिति सांकेतिक है,
- फिर भी वे असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।”
यह जोड़ पुस्तक कहीं नहीं समझाती। पर वह जान-बूझकर बनाया गया है।
और उनका सबसे प्रसिद्ध विचार
यदि आप असफल होते हैं, तो भी हार नहीं मानिए। एफ.ए.आई.एल. का अर्थ है — ‘फर्स्ट एटेम्प्ट इन लर्निंग’, यानी सीखने की दिशा में पहला प्रयास। अंत, अंत (द एंड) नहीं है। ई.एन.डी. का अर्थ है — ‘एफर्ट नेवर डाइज़’। यदि आपको उत्तर में ‘ना’ (एन.ओ.) मिलता है, तो इसका अर्थ है — ‘नेक्स्ट अपॉरचुनिटी’। अत: सकारात्मक रहें।
पृ. 158
तीन संक्षेप — याद रखने योग्य
| संक्षेप | अर्थ |
|---|---|
| FAIL | First Attempt In Learning — सीखने की दिशा में पहला प्रयास |
| END | Effort Never Dies — प्रयास कभी निरर्थक नहीं होते |
| NO | Next Opportunity — अगले अवसर के लिए तैयार रहें |
और एक और
स्वप्न का अर्थ सोते समय स्वप्न देखना नहीं है, बल्कि स्वप्न वे हैं जो आपको सोने न दें।
पृ. 158
10 | लोकतंत्र | शब्द से लेकर 97 करोड़ तक
शब्द कहाँ से आया★
डेमोस + क्रेटोस = डेमोक्रेसी
पृ. 159
दोनों ग्रीक शब्द
| ग्रीक शब्द | अर्थ |
|---|---|
| डेमोस | लोग |
| क्रेटोस | शासन प्रणाली या तंत्र या शक्ति |
पृ. 159
तो शाब्दिक अर्थ हुआ
- लोक-शासन — या गणतंत्र
- यानी लोगों का शासन।
पर अब पुस्तक असली प्रश्न पूछती है★
पृ. 159
- “परंतु क्या सभी लोग एक साथ शासन कर सकते हैं?
- स्पष्ट है कि यह संभव नहीं है।”
और उसका उत्तर वह कक्षा से देती है
पृ. 159
- मान लीजिए कक्षा की कोई बात प्रधानाचार्य तक ले जानी है।
- “इस स्थिति में क्या पूरी कक्षा प्रधानाचार्य के पास जाएगी?
- स्पष्ट है कि यह व्यावहारिक नहीं होगा।”
- इसलिए कक्षा मॉनीटर या कक्षा-प्रतिनिधि का चयन करती है।
“यही सिद्धांत राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू होता है।”
प्रतिनिधि — और उनके दो नाम★
| स्तर | क्या कहलाते हैं | कहाँ बैठते हैं |
|---|---|---|
| राज्य | विधायक | विधान सभा |
| राष्ट्र | सांसद | लोक सभा |
पृ. 159
और वे वहाँ क्या करते हैं
पृ. 159
- “ये सभी चयनित सदस्य विधान सभा/लोक सभा में कानूनों पर चर्चा करते हैं।
- समस्याओं और समाधानों पर विचार-विमर्श करते हैं।
- मतभेद की स्थिति में एक-दूसरे से संवाद और तर्क-वितर्क द्वारा समस्या का हल करने का प्रयास करते हैं।”
★लोकतंत्र मतभेद को मिटाता नहीं — वह उसे बातचीत में बदल देता है।
भारत — कुछ आँकड़े
| क्या | विवरण |
|---|---|
| कैसा लोकतंत्र | ‘जन प्रतिनिधि’ आधारित |
| किस वर्ष के परिप्रेक्ष्य में | 2024 |
| मतदाता | लगभग 97 करोड़ |
| विश्व में | “भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी है” |
| मतदान की आयु | 18 वर्ष से ऊपर |
पृ. 160
11 | दो प्रकार का लोकतंत्र | और अध्याय का समापन
पिकनिक वाला उदाहरण
पृ. 160
- कक्षा को पिकनिक पर जाना है। दो स्थान — ‘क’ और ‘ख’।
- कक्षा लाभ-हानि पर विचार-विमर्श करती है — दूरी, समय, खर्च, मूलभूत आवश्यकताएँ।
- पर सबकी सहमति नहीं बनती।
- तो शिक्षक कहते हैं — हाथ उठाकर मतदान कीजिए।
- “जिस विकल्प के लिए सबसे ज्यादा विद्यार्थियों ने हाथ उठाए, उसे चुन लिया जाता है।”
और यही प्रत्यक्ष लोकतंत्र है★
“जहाँ स्थान निश्चित करने में प्रत्येक विद्यार्थी की राय ली गई”
पृ. 160
दोनों प्रकार साथ-साथ
- प्रत्यक्ष लोकतंत्र
- हर व्यक्ति स्वयं निर्णय में भाग लेता है
- उदाहरण — पिकनिक का मतदान
- प्रतिनिधि लोकतंत्र
- चुने हुए प्रतिनिधि निर्णय लेते हैं
- उदाहरण — मॉनीटर, विधायक, सांसद
और अब अध्याय का शीर्षक-शब्द★★
पृ. 160
- “आधारभूत/धरातलीय लोकतंत्र उस तंत्र की ओर इशारा करता है,
- जिसमें सामान्य नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित और सुनिश्चित किया जाता है,
- जैसे कि पृष्ठ 155 पर चित्र 10.4 में दिखाए गए पिरामिड का आधार है।
- इस प्रकार के तंत्र में नागरिक स्वयं को प्रभावित करने वाले निर्णयों पर अपनी बात रख सकते हैं।”
याद है, अध्याय के शुरू में क्या वादा किया था?★
“कानूनों और नियमों में नागरिक भी अपनी बात रख सकते हैं। हम जानेंगे कि ऐसा किस प्रकार होता है।”
पृ. 151
अब हम जान गए
- वादा पृष्ठ 151 पर था।
- उत्तर पृष्ठ 160 पर है।
- अध्याय जहाँ से शुरू हुआ था, वहीं आकर पूरा होता है।
आगे बढ़ने से पहले… — चारों बिंदु
पृ. 160
- “सरकार और शासन के बिना कोई भी देश नहीं चल सकता।”
- “आधुनिक सरकार के तीन अंग हैं — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — जिन्हें एक साथ कार्य करने की आवश्यकता होती है।”
- “भारत सरकार तीन स्तरों पर कार्य करती है — संघीय अथवा राष्ट्रीय स्तर, राज्य स्तर और स्थानीय स्तर।”
- “लोकतंत्र इस प्रणाली की पूरी रूपरेखा है। यह राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तर पर चयनित प्रतिनिधियों के माध्यम से कार्य करती है।”
पूरा अध्याय दो चित्रों में
- एक पहिया — तीन अंग
- विधायिका · कार्यपालिका · न्यायपालिका
- कौन क्या करता है
- एक पिरामिड — तीन स्तर
- स्थानीय · राज्य · केंद्र
- कौन कहाँ तक
और दोनों के चारों ओर एक घेरा
लोकतंत्र — “इस प्रणाली की पूरी रूपरेखा”
पृ. 160
और आगे क्या
पृ. 160
- “भारतीय लोकतंत्र की अन्य विशेषताओं का अध्ययन हम आगे के दो अध्यायों और अगली कक्षाओं में भी करेंगे।”
अगले दो अध्यायों में हम पिरामिड के सबसे नीचे वाले हिस्से को पढ़ेंगे — स्थानीय सरकार।