कक्षा 12 • राजनीति विज्ञान • स्वतंत्र भारत में राजनीति • अध्याय 6 — लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट
कक्षा — 12 · विषय — राजनीति विज्ञान (स्वतंत्र भारत में राजनीति) · पृष्ठ — 92 से 111
एक खाली जगह जो सबसे बड़ा विरोध बन गई
‘नई दुनिया’, 27 जून 1975
1 | अध्याय का नक्शा | चार सवाल
पाठ स्वयं क्या कहता है
पृ. 92 — ‘इस अध्याय में…’
- “हम देख चुके हैं कि 1971 के बाद कांग्रेस को नवजीवन मिला लेकिन इस पार्टी में अब पहले वाली बात नहीं रही।”
- ★“1973 से 1975 के बीच घटी घटनाओं से यह अंतर और भी ज्यादा स्पष्ट हो गया।”
- “आमतौर पर आपातकाल से हमारे मन में युद्ध और आक्रमण अथवा प्राकृतिक आपदा की तसवीर कौंधती है — लेकिन अपने देश में यह घोषणा अंदरूनी गड़बड़ियों की आशंका के मद्देनजर की गई थी।”
- ★★“आपातकाल की घोषणा के कारण 1977 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस हार गई।”
अध्याय के चार प्रश्न
| # | प्रश्न |
|---|---|
| 1 | आपातकाल क्यों लागू किया गया? क्या ऐसा करना जरूरी था? |
| 2 | आपातकाल लागू करने का व्यावहारिक अर्थ क्या था? |
| 3 | दलगत राजनीति के लिहाज से आपातकाल के क्या परिणाम हुए? |
| 4 | आपातकाल से भारतीय लोकतंत्र ने क्या सबक सीखे? |
अध्याय की धुरी
★★आपातकाल दो चीज़ें एक साथ सिद्ध करता है — कि लोकतंत्र ठप्प किया जा सकता है, और यह भी कि उसे विदा नहीं किया जा सकता।
2 | पृष्ठभूमि — 1 | आर्थिक संकट
पहले राजनीतिक तनाव
पृ. 93
- “इंदिरा गाँधी एक कद्दावर नेता के रूप में उभरी थीं और उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी।”
- “इस दौर में दलगत प्रतिस्पर्धा कहीं ज्यादा तीखी और ध्रुवीकृत हो चली थी।”
- ★“सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की कई पहलकदमियों को संविधान के विरुद्ध माना।”
- ! विपक्ष का आरोप: “सरकारी प्राधिकार को निजी प्राधिकार मानकर इस्तेमाल किया जा रहा है और राजनीति हद से ज्यादा व्यक्तिगत होती जा रही है।”
आर्थिक संकट के आठ कारक
| # | कारक | # | कारक |
|---|---|---|---|
| 1 | मानसून की असफलता (1972–73) | 5 | तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी |
| 2 | कृषि पैदावार में भारी गिरावट | 6 | ! 1973 में 23% और 1974 में 30% मूल्यवृद्धि |
| 3 | खाद्यान्न उत्पादन 8% कम | 7 | ! सरकारी कर्मचारियों का वेतन रोका गया |
| 4 | बांग्लादेश संकट — 80 लाख शरणार्थी | 8 | औद्योगिक विकास दर कम, बेरोज़गारी बहुत बढ़ी |
और यह भी
पृ. 93
- ! “युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया।”
- ★कारक 7 पर निशान लगाइए — सरकारी कर्मचारियों का असंतोष ही 1974 की रेल-हड़ताल की जड़ है।
- “आर्थिक स्थिति की बदहाली को लेकर पूरे देश में असंतोष का माहौल था।”
- “1960 के दशक से ही छात्रों के बीच विरोध के स्वर उठने लगे थे। ये स्वर इस अवधि में और ज्यादा प्रबल हो उठे।”
3 | पृष्ठभूमि — 2 | जन-आंदोलन
नक्सलवादी आंदोलन
पृ. 94 — यह अध्याय 5 के अग्रिम-संदर्भ का उत्तर है
- “संसदीय राजनीति में विश्वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी इस अवधि में बढ़ी।”
- इन समूहों ने “मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाया।”
- ★“ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए।”
- “ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सक्रिय थे।”
गुजरात का आंदोलन
- जन 1974खाद्यान्न, खाद्य तेल और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तथा उच्च पदों पर भ्रष्टाचार — छात्र-आंदोलन
- विस्तार“बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शरीक हो गईं और इस आंदोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया”
- परिणाम! गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया
- जून 1975★विधानसभा के चुनाव हुए — कांग्रेस इस चुनाव में हार गई
मोरारजी देसाई का दबाव★
पृ. 94
- “अगर राज्य में नए सिरे से चुनाव नहीं करवाए गए तो मैं अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठ जाऊँगा।”
- “मोरारजी अपने कांग्रेस के दिनों में इंदिरा गाँधी के मुख्य विरोधी रहे थे।”
बिहार का आंदोलन
- मार्च 1974बढ़ती कीमतें, खाद्यान्न का अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार — छात्रों का आंदोलन
- बुलावा★छात्रों ने जयप्रकाश नारायण को बुलावा भेजा — “जेपी तब सक्रिय राजनीति छोड़ चुके थे”
- दो शर्तें★★“आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा”
- आह्वान★★“सम्पूर्ण क्रांति” — ताकि “सच्चे लोकतंत्र” की स्थापना हो; बिहार सरकार को बर्खास्त करने की माँग
और रेलवे की हड़ताल
पृ. 94
- “जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के साथ ही साथ रेलवे के कर्मचारियों ने भी एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।”
- ! “इससे देश के रोज़मर्रा के कामकाज के ठप्प हो जाने का खतरा पैदा हो गया।”
दो नारे, दो राजनीतियाँ
| आंदोलन का नारा | सत्ता का नारा |
|---|---|
| ★“सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!” (बिहार आंदोलन, 1974) | !★★“इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” (कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ, 1974) |
और आलोचना भी — यह संतुलन ज़रूरी है
गुजरात और बिहार, दोनों ही राज्यों के आंदोलन को कांग्रेस विरोधी आंदोलन माना गया। कहा गया कि ये आंदोलन राज्य सरकार के खिलाफ़ नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व के खिलाफ़ चलाए गए हैं।
पाठ्यपुस्तक, पृ. 95 — “इंदिरा गाँधी का मानना था कि ये आंदोलन उनके प्रति व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित हैं।”
जयप्रकाश नारायण (1902–1979)
जीवनी-बॉक्स, पृ. 95
- युवावस्था में मार्क्सवादी; कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव।
- 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन के नायक; ★नेहरू के उत्तराधिकारी के रूप में देखे गए, पर मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार।
- 1955 के बाद सक्रिय राजनीति छोड़ी; भूदान आंदोलन में सक्रिय; नगा विद्रोहियों से सुलह; चंबल के डकैतों से आत्मसमर्पण कराया।
- ★★बिहार आंदोलन के नेता; आपातकाल के विरोध के प्रतीक; जनता पार्टी के गठन के प्रेरणास्रोत।
4 | पृष्ठभूमि — 3 | न्यायपालिका से संघर्ष
1974 की रेल हड़ताल
बॉक्स, पृ. 96
- “रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।”
- माँगें — बोनस और सेवा से जुड़ी शर्तें। हड़ताल मई 1974 में।
- ★★“यह सवाल भी उठा कि आवश्यक सेवाओं से जुड़े हुए कर्मचारी अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर सकते हैं या नहीं।”
- ! सरकार ने हड़ताल को अवैधानिक करार दिया, नेताओं को गिरफ्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना तैनात की।
- ! “20 दिन के बाद यह हड़ताल बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई।”
तीन संवैधानिक मसले — तीनों पर न्यायालय का ‘नहीं’
| # | मसला | सर्वोच्च न्यायालय |
|---|---|---|
| 1 | क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? | ! “संसद ऐसा नहीं कर सकती” |
| 2 | क्या संविधान संशोधन से संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट हो सकती है? | ! “इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए” |
| 3 | नीति-निर्देशक सिद्धांतों के लिए मौलिक अधिकारों में कमी? | ! “इस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया” |
केशवानंद भारती
★★“सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है।”
और दो बातें जिन्होंने तनाव बढ़ायाध्यान
पृ. 96–97
- 1973 में केशवानंद भारती के फ़ैसले के तुरंत बाद मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हुआ।
- !★“सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।”
- ! “जिन तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी की गई थी उन्होंने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फ़ैसला दिया।”
- ★★“इस संघर्ष का चरमबिंदु तब आया जब एक उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया।”
और वह शब्द जो इस दौर की पहचान बना
जो लोग प्रधानमंत्री के नज़दीकी थे वे एक ऐसी ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की ज़रूरत के बारे में बातें करने लगे जो विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण करे।
पाठ्यपुस्तक, पृ. 97 — और हाशिया पूछता है: “क्या इसका मतलब यह है कि न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी शासक दल के प्रति निष्ठावान हों?”
5 | 25 जून 1975 | घोषणा
12 जून से 25 जून तक
- 12 जून★★इलाहाबाद उच्च न्यायालय — न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गाँधी का निर्वाचन अवैधानिक करार दिया
- याचिकासमाजवादी नेता राजनारायण, जो 1971 में उनके विरुद्ध उम्मीदवार थे; आरोप — चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्तेमाल
- अर्थ★“कानूनन अब इंदिरा गाँधी सांसद नहीं रहीं” — छह महीने में दोबारा निर्वाचित न होने पर प्रधानमंत्री नहीं रह सकतीं
- 24 जूनसर्वोच्च न्यायालय का आंशिक स्थगनादेश — सांसद बनी रहेंगी, पर लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकतीं
- 25 जून★★रामलीला मैदान में विशाल प्रदर्शन; जेपी का राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह का आह्वान
जेपी का आह्वान — और उस पर पाठ का अपना प्रश्नध्यान
पृ. 97
- !★“जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आह्वान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें।”
- “इससे भी सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ।”
- ★★हाशिया-प्रश्न: “यह तो सेना से सरकार के खिलाफ़ बगावत करने को कहने जैसा जान पड़ता है! क्या यह बात लोकतांत्रिक है?”
अनुच्छेद 352
★★“सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया।”
और तकनीकी रूप से यह वैध था★
पृ. 97
- “इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।”
- ★“तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा करना सरकार की शक्तियों के दायरे में था” — क्योंकि संविधान में सरकार को आपातकाल में विशेष शक्तियाँ दी गई हैं।
25 जून की रातध्यान
पृ. 98
- “25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी।”
- ! “आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई।”
- ! “तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई।”
- ★★“26 जून की सुबह 6 बजे एक विशेष बैठक में मंत्रिमंडल को इन बातों की सूचना दी गई, लेकिन तब तक बहुत कुछ हो चुका था।”
6 | व्यावहारिक अर्थ | आपातकाल का मतलब क्या था
दो बड़े संवैधानिक बदलाव
| # | बदलाव |
|---|---|
| 1 | ★★“शक्तियों के बँटवारे का संघीय ढाँचा व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है और सारी शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथ में चली आती हैं।” |
| 2 | ★★“सरकार चाहे तो ऐसी स्थिति में किसी एक अथवा सभी मौलिक अधिकारों पर रोक लगा सकती है अथवा उनमें कटौती कर सकती है।” |
परिणाम — छह पंक्तियाँ
| # | परिणाम |
|---|---|
| 1 | “विरोध-आंदोलन एकबारगी रुक गया; हड़तालों पर रोक लगा दी गई” |
| 2 | “अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया; तनाव भरा एक गहरा सन्नाटा छा गया” |
| 3 | ★★प्रेस सेंसरशिप — “कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी” |
| 4 | ! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध |
| 5 | धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की अनुमति नहीं |
| 6 | ★★“मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए… अब यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ” |
निवारक नज़रबंदी — पाठ की अपनी परिभाषा
इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है, बल्कि इसके विपरीत, लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।
पाठ्यपुस्तक, पृ. 101
अप्रैल 1976 — अदालत के दरवाज़े बंदध्यान★
पृ. 101
- “अनेक उच्च न्यायालयों ने फ़ैसला दिया कि आपातकाल की घोषणा के बावजूद अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को विचार के लिए स्वीकार कर सकती है।”
- !★★“1976 के अप्रैल माह में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले को उलट दिया और सरकार की दलील मान ली।”
- ! “इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है।”
- ★★“इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया।”
प्रतिरोध के पाँच रूप
| # | रूप |
|---|---|
| 1 | गिरफ्तारी से बचे कार्यकर्ता “भूमिगत” हो गए और मुहिम चलायी |
| 2 | ★‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ — रोके गए समाचारों की जगह खाली छोड़ते थे |
| 3 | ★★‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ — “सेंसरशिप के आगे घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा” |
| 4 | गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर और लीफ़लेट्स निकले |
| 5 | ★★शिवराम कारंत (पद्मभूषण) और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (पद्मश्री) ने अपनी पदवी लौटा दी |
पर पाठ ईमानदार भी हैध्यान
पृ. 102
- ! “बहरहाल, मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए।”
- ★★और हाशिया-प्रश्न: “जिन चंद लोगों ने प्रतिरोध किया, उनकी बात छोड़ दें — बाकियों के बारे में सोचें कि उन्होंने क्या किया! क्या कर रहे थे बड़े-बड़े अधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक-धार्मिक नेता और नागरिक…?”
शाह आयोग का निष्कर्षध्यान
पृ. 103
- “आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ। ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं।”
- ★“इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया।”
- ! “शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।”
7 | 42वाँ संशोधन और तीन सबक
संविधान में हुए बदलाव
पृ. 102
- “संशोधन के द्वारा प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।”
- ★★“आपातकाल के दौरान ही संविधान का 42वाँ संशोधन पारित हुआ।”
- ★“देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल करना” — ! “यह व्यवस्था मात्र आपातकाल की अवधि भर के लिए नहीं की गई थी।”
- ! “अब आपातकाल के दौरान चुनाव को एक साल के लिए स्थगित किया जा सकता था।”
और उसका मतलब
!★“इस तरह देखें तो 1971 के बाद अब चुनाव 1976 के बदले 1978 में करवाए जा सकते थे।”
आपातकाल के तीन सबक
| # | सबक |
|---|---|
| 1 | ★★“थोड़े ही दिनों के अंदर कामकाज फिर से लोकतांत्रिक ढर्रे पर लौट आया… भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।” |
| 2 | ★★अर्थगत उलझाव सुधारे गए — “अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है… आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को लिखित में दे।” |
| 3 | ★“हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुआ”; अदालतें सक्रिय हुईं; “नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।” |
सबक 2 पर रुकिए★
यह पिछले खंड के हाशिया-प्रश्न का सीधा उत्तर है
- प्रश्न था: “क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर आपातकाल की घोषणा करनी चाहिए थी?”
- ★★उत्तर: नहीं। और इसीलिए अब वह सलाह लिखित में देना अनिवार्य है।
- ★यानी संविधान ने अपनी ही खामी से सीखा।
8 | 1977 | जनमत-संग्रह
जैसे ही आपातकाल खत्म हुआ
पृ. 103
- ★★“आपातकाल का सबसे ज़रूरी और कीमती सबक राजव्यवस्था ने सीख लिया।”
- “1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे।”
- “उत्तर भारत में तो खासतौर पर, क्योंकि यहाँ आपातकाल का असर सबसे ज्यादा महसूस किया गया था।”
- ★विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा। “जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध था।”
चुनाव तक का क्रम
- जन 197718 महीने के आपातकाल के बाद चुनाव कराने का फ़ैसला; सभी नेता और कार्यकर्ता जेल से रिहा
- गठन★★चुनाव के ऐन पहले विपक्षी पार्टियाँ एकजुट होकर ‘जनता पार्टी’ बनीं; जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार
- औरजगजीवन राम के नेतृत्व में ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ — बाद में वह भी जनता पार्टी में शामिल
- मार्च 1977★चुनाव — “विपक्ष को चुनावी तैयारी का बड़ा कम समय मिला, लेकिन राजनीतिक बदलाव की गति बड़ी तेज़ थी”
जनता पार्टी की असली ताक़त★★
पृ. 103
- “जनता पार्टी ने चुनाव-प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर ज़ोर दिया।”
- ★★“जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे।”
- ★यह अध्याय 5 के ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की तार्किक परिणति है — 1967 में जो रणनीति थी, 1977 में वह एक पार्टी बन गई।
1977 के परिणाम
| दल | सीटें | टिप्पणी |
|---|---|---|
| ! कांग्रेस | 154 | “उसे 35 प्रतिशत से भी कम वोट हासिल हुए” |
| ★★जनता पार्टी और साथी दल | 330 | कुल 542 सीटों में से |
| ★अकेले जनता पार्टी | 295 | “उसे स्पष्ट बहुमत मिला था” |
पहली बार
★★“आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई।”
उत्तर भारत में सफ़ायाध्यान
पृ. 104
- ★★“कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी।”
- “राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसे महज एक-एक सीट मिली।”
- !★“इंदिरा गाँधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गाँधी अमेठी से चुनाव हार गए।”
पर संतुलन ज़रूरी है★
पृ. 104
- “कांग्रेस देश में हर जगह चुनाव नहीं हारी थी।”
- “महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में उसने कई सीटों पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखा था और दक्षिण भारत के राज्यों में तो एक तरह से उसकी चुनावी विजय का चक्का बेरोक-टोक चला था।”
- कारण 1: “आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था” — ज़बरन विस्थापन और नसबंदी ज्यादातर उत्तर भारत में।
- ★★कारण 2: “उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और मध्यवर्ग के कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर इससे आ जुड़े।”
और इसीलिए
इस अर्थ में देखें, तो 1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते हैं, बल्कि इसके आगे की भी कुछ बातों का संकेत करते हैं।
पाठ्यपुस्तक, पृ. 104 — यह वाक्य अध्याय 7 और 8 का द्वार है
9 | जनता सरकार | जीत के बाद बिखराव
प्रधानमंत्री-पद की होड़
पृ. 105
- “1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था।”
- तीन दावेदार: मोरारजी देसाई (“1966–67 से ही इंदिरा गाँधी के प्रतिद्वंद्वी”), चरण सिंह (“भारतीय लोकदल के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के किसान नेता”), जगजीवन राम (“मंत्री पद पर रहने का विशाल अनुभव”)।
- ! “मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन इससे जनता पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान खत्म न हुई।”
पतन का क्रम
- एकता! “आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका”
- आलोचना“जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था”
- 28 माह★★मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 28 माह में ही अपना बहुमत खो दिया
- 4 महीनेचरण सिंह की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनी; समर्थन वापस लेने पर मात्र 4 महीने चली
- जन 1980★★मध्यावधि चुनाव — जनता पार्टी बुरी तरह परास्त; कांग्रेस को 353 सीटें
दूसरा सबक
★★“1977–79 के चुनावों ने लोकतांत्रिक राजनीति का एक और सबक सिखाया — सरकार अगर अस्थिर हो और उसके भीतर कलह हो, तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।”
दो सबक साथ रखिए★
यही अध्याय की सबसे सुंदर समरूपता है
- 1977 — मतदाता ने अलोकतांत्रिक सरकार को दंड दिया।
- 1980 — मतदाता ने अस्थिर सरकार को दंड दिया।
- ★★यानी लोकतंत्र दोनों को सज़ा देता है — तानाशाही को भी और अराजकता को भी।
कार्टून — जनता पार्टी की गुटबाज़ी
पृ. 107
- “I CAN’T HEAR YOU!!” — चारों ओर से चीखते भोंपू: ‘PARTY INFIGHTING’, ‘OPPOSITION DEMANDS’, ‘VIOLENCE’।
- ★★“I TOPPLED JANATA GOVERNMENT!” — और जवाब: “THAT’S A LIE. EVERYBODY KNOWS WE ALL WORKED FOR TWO YEARS AND BROUGHT IT DOWN!”
- “BY ALL MEANS, LET’S GET UNDER ONE UMBRELLA, BUT LET ME DO IT FIRST!”
- ★दूसरा कार्टून प्रश्न 4 का तैयार उत्तर है।
10 | विरासत और निष्कर्ष
दलगत प्रणाली में तीन दूरगामी बदलाव
पृ. 108
- 1. कांग्रेस का स्वभाव बदला — “1969 से पहले तक कांग्रेस विविध विचारधारात्मक गति-मति के नेताओं को एक में समेटकर चलती थी”; अब ★“उसने अपने को देश की एकमात्र समाजवादी और ग़रीबों की हिमायती पार्टी बताना शुरू किया।”
- 2. ★“यह पार्टी अब एक नेता यानी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता पर भी निर्भर हुई।”
- 3. विपक्ष ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की ओर मुड़ा — “चुनावों में गैर-कांग्रेसी वोट बिखरने नहीं चाहिए।”
और वह बदलाव जो सबसे दूरगामी था★★
पृ. 108–109
- “अप्रत्यक्ष रूप से 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ।”
- “1977 में कई राज्यों में विधानसभा के भी चुनाव हुए… इन सरकारों के बनने में पिछड़ी जाति के नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।”
- ★“बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचा। इसके बाद केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया।”
- “आपातकाल के बाद हुए चुनावों ने दलीय व्यवस्था के भीतर इस बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी।”
संवैधानिक संकट या राजनीतिक संकट?
| पक्ष | पाठ का कथन |
|---|---|
| संवैधानिक | “संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपातकाल के मूल में था” |
| ★★राजनीतिक | “सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। फिर भी, इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया।” |
पाठ का निर्णय
★★“यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था।”
और दो अपेक्षाएँ जो टूटींध्यान
पृ. 109
- 1. “भारतीय संविधान के निर्माताओं को विश्वास था कि सभी राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मानकों का पालन करेंगे।”
- 2. “उन्हें यह भी विश्वास था कि आपातकाल की स्थिति में भी सरकार अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल विधि के शासन के दायरे में रहते हुए ही करेगी।”
- !★“इसी उम्मीद में सरकार को… व्यापक और चहुँमुखी शक्तियाँ दे दी गईं। इन शक्तियों का आपातकाल के दौरान दुरुपयोग हुआ।”
और वह प्रश्न जो अनुत्तरित है
क्या नागरिकों को विरोध की कार्रवाई में शामिल होने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए अथवा उन्हें इसका कोई अधिकार ही नहीं होना चाहिए? ऐसे विरोध की सीमा क्या मानी जाए?
पाठ्यपुस्तक, पृ. 102 — पाठ्यपुस्तक इसका उत्तर नहीं देती, और यही उसकी ईमानदारी है
फ़िल्म — ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ (2005)
सिने-संसार, पृ. 109
- निर्देशक: सुधीर मिश्र। अभिनय: के.के. मेनन, शाइनी आहूजा, चित्रांगदा सिंह।
- “फ़िल्म की पृष्ठभूमि सत्तर के दशक की है। इस फ़िल्म के युवा चरित्र उस दौर की अपेक्षाओं और आदर्शवाद की उपज हैं।”
- ★“सिद्धार्थ क्रांति के अपने मकसद में सफल नहीं होता है, लेकिन वह गरीबों के दुख-दर्द इस तरह अपना चुका है कि उसे… थोड़ी बेहतरी ला पाना भी अच्छा लगने लगता है।”
- ★★यह उसी पीढ़ी की कहानी है जो 1974 में सड़कों पर थी — और अध्याय भी वहीं समाप्त होता है जहाँ आदर्शवाद थकता है।
11 | प्रश्नावली की कुंजी
प्रश्न 1 — सही या गलत
| कथन | उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| (क) घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की | ! आंशिक रूप से गलत | सिफ़ारिश प्रधानमंत्री की थी, पर उद्घोषणा राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने की |
| (ख) सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गए | ✓ सही | “नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए” |
| (ग) बिगड़ती आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र घोषणा | ❌ गलत | सरकार ने कारण “गड़बड़ी की आशंका” बताया, आर्थिक स्थिति नहीं |
| (घ) विपक्ष के अनेक नेता गिरफ्तार | ✓ सही | “तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर… गिरफ्तारी हुई” |
| (ङ) सी.पी.आई. ने घोषणा का समर्थन किया | ✓ सही | सीपीआई उस समय कांग्रेस की सहयोगी थी (अध्याय 5 — 1971 का गठजोड़) |
पृ. 110
- विकल्प: (क) ‘संपूर्ण क्रांति’ (ख) 1974 की रेल-हड़ताल (ग) नक्सलवादी आंदोलन (घ) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला (ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट
- ✓ उत्तर: (ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष।
- ★कारण: बाकी चारों आपातकाल की घोषणा से पहले की घटनाएँ हैं यानी उसकी पृष्ठभूमि; शाह आयोग तो आपातकाल के बाद, 1977 में, जनता पार्टी ने नियुक्त किया था।
प्रश्न 3 — मेल बैठाइए
| पद | ✓ मेल |
|---|---|
| (क) संपूर्ण क्रांति | (ii) जयप्रकाश नारायण |
| (ख) गरीबी हटाओ | (i) इंदिरा गाँधी |
| (ग) छात्र आंदोलन | (iii) बिहार आंदोलन |
| (घ) रेल हड़ताल | (iv) जॉर्ज फर्नान्डिस |
प्रश्न 4 — 1980 में मध्यावधि चुनाव क्यों
चार कड़ियाँ क्रम से
- जनता पार्टी में “किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था।”
- प्रधानमंत्री-पद की होड़ कभी खत्म नहीं हुई; “आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका।”
- ★मोरारजी सरकार ने 28 माह में बहुमत खोया।
- ★★चरण सिंह की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनी और समर्थन वापस लेते ही 4 महीने में गिर गई — इसलिए जनवरी 1980 में नए सिरे से चुनाव हुए।
प्रश्न 5 — शाह आयोग
क्यों और क्या निष्कर्ष
- क्यों: “जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था” — आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जाँच के लिए।
- ★★निष्कर्ष (पाठ के शब्दों में): “पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे।”
- ★और वह चेतावनी: “यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।”
- साथ ही पाठ का यह कथन जोड़िए: “आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ। ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं।”
प्रश्न 6 — सरकार ने क्या कारण बताए
पृ. 97
- ★★“25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है” — और इसी तर्क से अनुच्छेद 352 लागू किया।
- “सरकार का निर्णय था कि गंभीर संकट की घड़ी आन पड़ी है और इस वजह से आपातकाल की घोषणा जरूरी हो गई है।”
- ★तात्कालिक संदर्भ: जेपी का सत्याग्रह-आह्वान और सेना-पुलिस से आदेश न मानने की अपील, जिससे “सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ।”
प्रश्न 7 — पहली बार विपक्षी सरकार क्यों बनी
पाँच कारण
- ★★1977 के चुनाव “आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे”; जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध।
- ★जनता पार्टी का गठन — “गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे।”
- जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व और उनकी नैतिक प्रतिष्ठा।
- जगजीवन राम जैसे कांग्रेसी नेताओं का टूटकर आना (‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’)।
- ★ज्यादतियों की स्मृति — “हज़ारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था।”
प्रश्न 9 — दलीय प्रणाली पर असर
चार बिंदु
- कांग्रेस ने “स्वयं को विशेष विचारधारा से जोड़ा” और एक नेता की लोकप्रियता पर निर्भर हो गई।
- ★विपक्ष ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की ओर मुड़ा और 1977 में एक ही पार्टी बन गया।
- ! पर वह एकता टिकाऊ नहीं थी — जनता पार्टी 28 माह में बिखर गई।
- ★★और सबसे दूरगामी: “1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ” — मंडल आयोग की नियुक्ति।
12 | पुनरावृत्ति | तेरह तिथियाँ
पूरा अध्याय एक नज़र में
- 1973★23% मूल्यवृद्धि; केशवानंद भारती का ‘बुनियादी ढाँचा’ फ़ैसला; न्यायमूर्ति ए.एन. रे की नियुक्ति
- जन 1974गुजरात का छात्र-आंदोलन → राष्ट्रपति शासन
- मार्च 1974★★बिहार का आंदोलन; जेपी; ‘सम्पूर्ण क्रांति’
- मई 1974रेल हड़ताल — जॉर्ज फर्नान्डिस; 20 दिन बाद बिना समझौते वापस
- 197430% मूल्यवृद्धि; ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा
- जून 1975गुजरात विधानसभा चुनाव — कांग्रेस हारी
- 12 जून★★1975 — इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्वाचन अवैध ठहराया
- 25 जून★★1975 — रामलीला मैदान; रात में अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल
- अप्रैल! 1976 — सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले उलटे
- 1976★42वाँ संशोधन — कार्यकाल 5 से 6 साल
- मार्च 1977★★चुनाव — कांग्रेस 154; जनता पार्टी और साथी 330/542
- 1979! मोरारजी सरकार 28 माह में गिरी; चरण सिंह 4 महीने
- जन 1980★कांग्रेस को 353 सीटें — वापसी
अंतिम बात
★★आपातकाल ने दिखाया कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी लोकतंत्र ठप्प कर सकती है — और यह भी कि जनता उसे अठारह महीने से ज्यादा नहीं चलने देती।