अध्याय 3भूमंडलीकृत विश्व का बनना

पाठ्यपुस्तक से आगे13 मिनट

यह फ़ाइल शिक्षक के लिए है और उन विद्यार्थियों के लिए है जो अध्याय से आगे जानना चाहते हैं।

एक चेतावनी पहले पढ़ लीजिए। इस फ़ाइल में दी गई कुछ बातें पाठ्यपुस्तक से मेल नहीं खातीं। बोर्ड परीक्षा में हमेशा पाठ्यपुस्तक का ही उत्तर लिखिए। ये सुधार और अतिरिक्त जानकारियाँ कक्षा में समझाने के लिए हैं, उत्तर-पुस्तिका में लिखने के लिए नहीं।


1. एक ज़रूरी सुधार — सोने और डॉलर वाला वाक्य उलटा छपा है

पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 75 पर लिखा है:

“डॉलर का मूल्य भी सोने से बँधा हुआ था। एक डॉलर की क़ीमत 35 औंस सोने के बराबर निर्धारित की गई थी।”

यह वाक्य उलट गया है। असली तथ्य इसका ठीक विपरीत है —

एक औंस सोने की क़ीमत 35 डॉलर निर्धारित की गई थी।

यह ग़लती क्यों पकड़ में आनी चाहिए? — बच्चों से केवल यह पूछिए कि 35 औंस सोना कितने का होगा? एक औंस लगभग 28 ग्राम होता है, इसलिए 35 औंस लगभग एक किलो सोना है। क्या एक डॉलर में एक किलो सोना मिल सकता है? यह असंभव है। इसी सरल तर्क से बच्चे ख़ुद इस ग़लती को पकड़ लेते हैं।

अंग्रेज़ी मूल पाठ्यपुस्तक में यही वाक्य इस प्रकार है — “The dollar was anchored to gold at a fixed price of $35 per ounce of gold.” यानी यह हिंदी अनुवाद की चूक है, NCERT के तथ्य की नहीं।

कक्षा में कैसे कहिए: “किताब में यह वाक्य छपाई में उलट गया है। असल में एक औंस सोना 35 डॉलर का था। परीक्षा में किताब वाला वाक्य ही लिखिए, पर सही बात आपको मालूम होनी चाहिए।”

स्रोत: World Gold Council — The Bretton Woods System · Federal Reserve History — Creation of the Bretton Woods System

2. दूसरा सुधार — अध्याय में दो बार ‘2.4’ छपा है

पाठ्यपुस्तक में उपशीर्षकों की संख्या में ग़लती है —

पृष्ठउपशीर्षकजो छपा हैजो होना चाहिए था
62रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग2.42.4 (सही)
63भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना2.42.5
65विदेश में भारतीय उद्यमी2.52.6
65भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्विक व्यवस्था2.62.7

इससे कोई तथ्यात्मक नुक़सान नहीं होता, पर जब बच्चे नोट्स बनाते हैं तो भ्रम में पड़ जाते हैं। कक्षा में एक बार बता देना काफ़ी है। हमारी 00-मास्टर फ़ाइल में सही क्रम (2.4 से 2.7) दिया गया है।

3. आयरिश आलू अकाल — पाठ्यपुस्तक के आँकड़े और इतिहासकारों की राय

पाठ्यपुस्तक कहती है (चित्र 4 का विवरण): 1845 से 1849 के बीच लगभग 10,00,000 लोग भुखमरी से मारे गए और इससे दोगुने लोग पलायन कर गए।

यह आँकड़ा सही है, पर पूरा नहीं। इतिहासकारों की राय में —

पक्षआँकड़ा
सबसे आम स्वीकृत अनुमानलगभग 10 लाख मौतें
अनुमानों की पूरी सीमा5 लाख से 20 लाख तक
पलायन10 लाख से अधिक लोग तुरंत अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया गए; कुछ स्रोतों के अनुसार आगे चलकर लगभग 20 लाख और लोग देश छोड़ गए
कालकई इतिहासकार इसे 1845 से 1851 या 1852 तक मानते हैं, केवल 1849 तक नहीं
कारणआलू की फ़सल में फैलने वाला फफूँद (blight / phytophthora)

एक और बात जो पाठ्यपुस्तक नहीं कहती, पर कक्षा में बतानी चाहिए — अकाल के उन्हीं वर्षों में आयरलैंड से अनाज और मवेशी ब्रिटेन को निर्यात होते रहे। यानी यह केवल फ़सल की बीमारी का नतीजा नहीं था, यह नीति का भी नतीजा था। यह वही तर्क है जो आगे चलकर आपको महामंदी के दौरान भारत से सोने के निर्यात में भी दिखाई देगा — जब देश भूखा था, तब भी माल बाहर जा रहा था।

स्रोत: Britannica — Great Famine · Great Famine (Ireland) — Wikipedia

4. रिंडरपेस्ट — 90 प्रतिशत का आँकड़ा और उसके पीछे की मानवीय क़ीमत

पाठ्यपुस्तक कहती है कि रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मार डाला। यह आँकड़ा शोध से मेल खाता है, पर तस्वीर इससे भी भयानक थी —

तथ्यविवरण
मरने वाले पशुकेवल मवेशी नहीं — भैंस, जिराफ़, वाइल्डबीस्ट, कुडू और हिरण भी 80 से 90 प्रतिशत तक मारे गए
दक्षिणी अफ़्रीका1896 से 1898 के बीच वहाँ के 95 प्रतिशत से भी ज़्यादा पशुधन का सफ़ाया हो गया
मनुष्यों पर असरइससे फैले अकाल में इथियोपिया की लगभग एक-तिहाई आबादी और तंज़ानिया के मसाई लोगों की लगभग दो-तिहाई आबादी मारी गई

यह आख़िरी पंक्ति कक्षा में ज़रूर बताइए। पाठ्यपुस्तक केवल पशुओं की बात करती है, पर असली कहानी यह है कि पशु मरे तो इंसान भी मरे। इससे बच्चों को समझ आता है कि “रोज़ी-रोटी के साधन ख़त्म हो गए” वाक्य का अर्थ केवल बेरोज़गारी नहीं, भुखमरी और मौत भी था।

स्रोत: 1890s African rinderpest epizootic — Wikipedia · Reactions to Rinderpest in Southern Africa 1896–97 — Journal of African History, Cambridge

5. ब्रेटन वुड्स — वह बात जो पाठ्यपुस्तक अधूरी छोड़ देती है

पाठ्यपुस्तक कहती है कि “अंतत: स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था विफल हो गई।” पर यह नहीं बताती कि यह कब और कैसे हुआ।

तथ्यविवरण
कितने देशों ने भाग लियाजुलाई 1944 में 44 देशों के प्रतिनिधि ब्रेटन वुड्स में जुटे थे
कब टूटीयह व्यवस्था 1971 तक चली
कैसे टूटी1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने डॉलर की सोने में परिवर्तनीयता समाप्त कर दी
छूट कितनी थीमुद्राओं को डॉलर के मुक़ाबले 1 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे होने की छूट थी

बच्चों को यह जोड़ ज़रूर बताइए — पाठ्यपुस्तक जब कहती है कि “स्थिर विनिमय दर विफल हो गई”, तो वह 1971 की उसी घटना की बात कर रही है।

स्रोत: Federal Reserve History — Nixon Ends Convertibility of U.S. Dollars to Gold

6. अध्याय 2 से जोड़िए — महामंदी और सविनय अवज्ञा

यह सबसे कीमती जोड़ है और इसे कक्षा में ज़रूर बनाना चाहिए।

पाठ्यपुस्तक ख़ुद कहती है — “1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था। उसी समय महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।”

अब इसे अध्याय 2 के साथ मिलाकर देखिए —

अध्याय 3 (अर्थव्यवस्था)अध्याय 2 (राजनीति)
1926 से कृषि उत्पादों की क़ीमतें गिरने लगीं और 1930 के बाद धराशायी हो गईंइसी कारण संपन्न किसान (पटीदार, जाट) सविनय अवज्ञा में शामिल हुए
किसानों को उपज बेचना और लगान चुकाना भारी पड़ने लगाउनकी माँग थी कि भारी लगान कम किया जाए
सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ़ इनकार कर दियाइसीलिए किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया
राष्ट्रवादी दबाव में उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ाए गएइसीलिए भारतीय व्यवसायी वर्ग कांग्रेस का समर्थन कर रहा था

कक्षा में यह वाक्य कहिए: “अध्याय 2 आपको बताता है कि किसान आंदोलन में क्यों कूदा। अध्याय 3 आपको बताता है कि उसकी जेब ख़ाली क्यों थी। दोनों को साथ पढ़िए, तभी पूरी बात समझ में आएगी।”

7. एक अतिरिक्त संदर्भ — ‘नयी दास प्रथा’ शब्द कहाँ से आया

पाठ्यपुस्तक कहती है कि “उन्नीसवीं सदी की इस अनुबंध व्यवस्था को बहुत सारे लोगों ने ‘नयी दास प्रथा’ का भी नाम दिया है।”

यह तुलना केवल भावनात्मक नहीं थी, इसके ठोस कारण थे —

दास प्रथा से समानताअंतर
मज़दूर अपनी मर्ज़ी से काम नहीं छोड़ सकता थाअनुबंध की अवधि तय थी (आमतौर पर पाँच साल)
भागने पर सज़ा और जेलकाग़ज़ पर उसे लौटने का अधिकार था
मालिक तय करता था कि वह कहाँ रहेगावह क़ानूनी रूप से ‘ग़ुलाम’ नहीं, ‘मज़दूर’ था
वेतन काट लेना, कोड़े, बाड़ों में बंद रखनाउसे वेतन मिलता था, चाहे कितना ही कम हो

संदर्भ यह है कि ब्रिटिश साम्राज्य में दास प्रथा 1833–34 में समाप्त कर दी गई थी। बागान मालिकों को मज़दूर चाहिए थे, इसलिए दास प्रथा की समाप्ति के तुरंत बाद ही अनुबंध व्यवस्था शुरू हुई। यही कारण है कि इतिहासकार इसे दास प्रथा का ही दूसरा रूप मानते हैं।

यह बात पाठ्यपुस्तक में नहीं है, पर कक्षा में बताने पर बच्चों को समझ आता है कि यह प्रथा अचानक क्यों शुरू हुई।

8. भारत-सेतु — इस अध्याय को अपने आसपास से जोड़िए

यह अध्याय राजस्थान और भारत के आज के जीवन से बहुत आसानी से जुड़ जाता है। कक्षा में ये पाँच जोड़ बनाइए —

  1. आलू और मिर्च — “जिस मिर्च के बिना हमारी सब्ज़ी नहीं बनती, वह पाँच सौ साल पहले भारत में थी ही नहीं। वह अमेरिका से आई है।” बच्चे इस बात पर हैरान रह जाते हैं।
  2. गिरमिटिया मज़दूर और आज का प्रवासी मज़दूर — “आज भी राजस्थान से लोग गुजरात, दिल्ली और खाड़ी देशों में काम के लिए जाते हैं। एजेंट आज भी झूठे वादे करते हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज उन्हें क़ानूनी अधिकार मिले हुए हैं।”
  3. मोबाइल फ़ोन — “तुम्हारे हाथ में जो फ़ोन है, उसका डिज़ाइन शायद अमेरिका में बना, पुर्ज़े कोरिया या ताइवान में बने, जोड़ा चीन में गया और बिका भारत में। यही आज का वैश्वीकरण है।”
  4. किसान और अंतर्राष्ट्रीय क़ीमतें — “आज भी जब विदेश में सरसों या कपास का दाम गिरता है तो हमारे यहाँ का किसान प्रभावित होता है। यही 1930 में हुआ था।”
  5. महामंदी और 2008 का संकट — “2008 में अमेरिका के बैंक फिर डूबे थे और उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा था। इतिहास ख़ुद को दोहराता है, इसीलिए हम उसे पढ़ते हैं।”

9. प्रोजेक्ट कार्य के लिए सुझाव

पाठ्यपुस्तक का परियोजना कार्य (पृष्ठ 78): “उन्नीसवीं सदी के दौरान दक्षिण अफ़्रीका में स्वर्ण हीरा खनन के बारे में और जानकारियाँ इकट्ठी करें। सोना और हीरा कंपनियों पर किसका नियंत्रण था? खनिक कौन लोग थे और उनका जीवन कैसा था?”

इसके अलावा ये पाँच प्रोजेक्ट भी दिए जा सकते हैं —

  1. ‘मेरी थाली में दुनिया’ — घर के खाने की दस चीज़ें चुनकर पता कीजिए कि उनमें से कौन-सी मूल रूप से भारत की नहीं है। (आलू, टमाटर, मिर्च, मूँगफली, मक्का — ये पाँच तो निश्चित मिलेंगे।)
  2. ‘मेरे घर की चीज़ें कहाँ बनीं’ — घर की बीस चीज़ों पर ‘Made in’ पढ़कर एक तालिका बनाइए और देखिए कि कौन-सा देश सबसे ज़्यादा बार आता है।
  3. गिरमिटिया मज़दूर की डायरी — पाँच पन्नों की एक काल्पनिक डायरी लिखिए — घर छोड़ने का दिन, जहाज़ की यात्रा, बागान में पहला दिन, एक सज़ा का दिन, और पाँच साल पूरे होने का दिन।
  4. समय-रेखा पोस्टर — 3,000 ईसा पूर्व से 1971 तक की एक बड़ी समय-रेखा चार्ट पेपर पर बनाइए और उस पर इस अध्याय की सभी तिथियाँ लगाइए।
  5. दो देशों की तुलना — आयरलैंड (1845) और अफ़्रीका (1890) — दोनों जगह एक बीमारी आई। दोनों के बाद क्या हुआ, इसकी तुलना करते हुए एक पृष्ठ लिखिए।

10. और पढ़ने के लिए

पुस्तक / स्रोतकिस विषय पर
अल्फ़्रेड क्रॉस्बी, ‘इकोलॉजिकल इंपीरियलिज़्म’यही वह पुस्तक है जिससे पाठ्यपुस्तक ने बॉक्स 1 लिया है; बीमारियों और उपनिवेशवाद के संबंध पर सबसे प्रसिद्ध काम
वी. एस. नायपॉल के प्रारंभिक उपन्यासकैरीबियाई द्वीपों में भारतीय मूल के लोगों का विछोह और परायापन
डॉरोथी लेंग की महामंदी की तस्वीरें (Library of Congress)1936 और 1938 की वे तस्वीरें जो पाठ्यपुस्तक में चित्र 22 और 23 के रूप में दी गई हैं
NCERT कक्षा 10, अध्याय 4 — ‘औद्योगीकरण का युग’यह अध्याय इसी अध्याय की सीधी अगली कड़ी है; भारतीय कपड़ा उद्योग की कहानी वहाँ पूरी होती है

11. शिक्षक के लिए एक अंतिम टिप्पणी

इस अध्याय का असली शैक्षिक मूल्य आँकड़ों में नहीं, एक विचार में है —

“जुड़ाव अपने आप में न अच्छा है न बुरा। सवाल यह है कि जुड़ाव की शर्तें कौन तय कर रहा है।”

  • आलू यूरोप गया तो वहाँ के ग़रीबों का भोजन सुधरा — यह अच्छा जुड़ाव था।
  • चेचक अमेरिका गई तो पूरे समुदाय मिट गए — यह विनाशकारी जुड़ाव था।
  • भारत का कपड़ा यूरोप जाता था, तब भारत समृद्ध था। जब शर्तें ब्रिटेन ने तय कीं तो भारत केवल कच्चा माल भेजने वाला देश रह गया।
  • गिरमिटिया मज़दूर विदेश गया — यह भी जुड़ाव था, पर उसकी शर्तें उसने नहीं, बागान मालिक ने तय की थीं।

अगर विद्यार्थी यह एक बात समझ जाए, तो वह इस अध्याय को भी समझ जाएगा और आज के अख़बार को भी।