अध्याय 1यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

पाठ्यपुस्तक से आगे9 मिनट

यह फ़ाइल किसके लिए है: यह उन विद्यार्थियों के लिए है जो अध्याय को और गहराई से समझना चाहते हैं, तथा शिक्षक के लिए जो कक्षा में कुछ रोचक जोड़ना चाहते हैं।

ज़रूरी सूचना: यहाँ दी गई बातें पाठ्यपुस्तक में नहीं हैं। इसलिए बोर्ड परीक्षा के उत्तर में केवल NCERT की बातें लिखिए। यह सामग्री समझ बढ़ाने, प्रोजेक्ट कार्य और कक्षा-चर्चा के लिए है।

हर बिंदु के साथ स्रोत का लिंक दिया गया है ताकि आप स्वयं जाँच सकें।


1. लाल टोपी की कहानी — वह प्रतीक जो दो हज़ार साल पुराना है

पाठ्यपुस्तक बताती है कि मारीआन के चिह्नों में लाल टोपी शामिल थी, जो स्वतंत्रता का प्रतीक थी। लेकिन वह यह नहीं बताती कि यह टोपी लाल क्यों है और स्वतंत्रता का प्रतीक क्यों बनी।

इसकी कहानी बहुत पुरानी और बहुत सुंदर है।

इस टोपी को फ़्रीजियन कैप (Phrygian cap) कहा जाता है। प्राचीन रोम में यह टोपी उन दासों को पहनाई जाती थी जिन्हें आज़ाद कर दिया गया हो — यानी यह टोपी इस बात का सार्वजनिक चिह्न थी कि “यह व्यक्ति अब दास नहीं है, यह आज़ाद है।”

1789 में जब फ़्रांसीसी क्रांति शुरू हुई, तो क्रांतिकारियों ने प्राचीन रोम की इसी परंपरा को अपनाया और लाल टोपी को अपनी क्रांति का प्रतीक बना लिया। मारीआन का नाम और रूप 1792 और क्रांति के दौर तक जाता है।

इसका अर्थ समझिए। फ़्रांसीसी क्रांतिकारी कह रहे थे कि “हम अब तक राजा के दास थे, अब हम आज़ाद हैं।” और यह बात कहने के लिए उन्होंने दो हज़ार साल पुराना एक प्रतीक उठा लिया।

यह पूरे अध्याय की एक बड़ी बात सिखाता है — नए विचारों को समझाने के लिए लोग अकसर पुराने प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि पुराने प्रतीक लोगों को जल्दी समझ आते हैं।

स्रोत: Wikipedia — Marianne · The Local France — Marianne: 5 things to know · Élysée (फ़्रांस के राष्ट्रपति भवन का आधिकारिक पृष्ठ) — Marianne

2. जर्मेनिया का वह चित्र जो सचमुच फ़्रैंकफ़र्ट संसद में टँगा था

पाठ्यपुस्तक के चित्र 17 का शीर्षक है — “जर्मेनिया, चित्रकार फ़िलिप वेट, 1848”, और उसके नीचे लिखा है कि “चित्रकार ने जर्मेनिया के इस चित्र को सूती झंडे पर बनाया चूँकि इसे सेंट पॉल चर्च की छत से लटकना था और जहाँ मार्च 1848 में फ़्रैंकफ़र्ट संसद बुलाई गई।”

यह जानकारी सही है, और उसका पूरा संदर्भ और भी दिलचस्प है।

  • यह चित्र मार्च 1848 के अंत में, यानी 1848 की क्रांतियों के ठीक बीच बनाया गया था।
  • यह फ़्रैंकफ़र्ट के पॉल्सकिर्शे (सेंट पॉल चर्च) में नेशनल असेंबली के ऊपर टाँगा गया था।
  • इसका उद्देश्य एक संयुक्त और जनतांत्रिक जर्मनी का प्रतीक बनना था।
  • फ़िलिप वेट ने 1836 में भी जर्मेनिया का एक चित्र बना रखा था, और 1848 वाला चित्र उसी की शैली पर आधारित माना जाता है।

यहाँ पाठ्यपुस्तक की एक गतिविधि का उत्तर छिपा है। पाठ्यपुस्तक पूछती है (चित्र 17 के पास वाली गतिविधि) कि “1836 की एक पुरानी रूपकात्मक तसवीर में वेइत ने काइज़र के मुकुट को उस जगह चित्रित किया था जहाँ अब उन्होंने टूटी हुई बेड़ियाँ दिखायी हैं। इस बदलाव का महत्त्व स्पष्ट करें।”

उत्तर की दिशा यह है: 1836 में जर्मनी का सपना एक सम्राट के नेतृत्व वाला जर्मनी था, इसलिए वहाँ मुकुट था। 1848 में सपना जनता की आज़ादी का हो गया, इसलिए वहाँ टूटी हुई बेड़ियाँ आ गईं। यानी बारह साल में सपना बदल गया — राजा से जनता की ओर।

स्रोत: Wikipedia — Germania (St. Paul’s Church, Frankfurt am Main) · Facing History — Philipp Veit, Germania (1848) · Google Arts & Culture — Germania, Philipp Veit

3. भारत से जोड़कर देखिए — ‘भारत माता’ और ‘जर्मेनिया’

यह हिस्सा सबसे दिलचस्प है, और यह आपको अगले अध्याय की तैयारी भी करा देगा।

इस अध्याय में आपने पढ़ा कि यूरोप में कलाकारों ने राष्ट्र को एक नारी के रूप में चित्रित किया — फ़्रांस में मारीआन और जर्मनी में जर्मेनिया।

अब सोचिए — भारत में भी ठीक ऐसा ही हुआ। भारत में राष्ट्र का रूपक ‘भारत माता’ बनी।

अगले अध्याय (भारत में राष्ट्रवाद) में आप पढ़ेंगे कि:

  • बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ लिखा।
  • अबनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता का प्रसिद्ध चित्र बनाया।

कक्षा में यह तुलना ज़रूर कीजिए।

जर्मेनिया के हाथ में तलवार है और सिर पर बलूत का मुकुट — यानी वह बहादुरी और मुक़ाबले का प्रतीक है। मारीआन के सिर पर लाल टोपी है — यानी वह आज़ादी और गणतंत्र का प्रतीक है।

तीनों देशों में एक ही तरीक़ा अपनाया गया — राष्ट्र जैसे अमूर्त विचार को नारी के रूप में ठोस बनाया गया। पर हर देश ने उसे अपने-अपने प्रतीक दिए।

यही बात अध्याय के आख़िरी वाक्य में कही गई है — “राष्ट्रवाद के यूरोपीय विचार कहीं और नहीं दोहराए गए, क्योंकि हर जगह लोगों ने अपनी तरह का विशिष्ट राष्ट्रवाद विकसित किया।”

4. एक ज़रूरी सावधानी — ‘राष्ट्रवाद’ के दो चेहरे

यह अध्याय की सबसे गंभीर बात है और इसे ठीक से समझना ज़रूरी है।

पाठ्यपुस्तक ख़ुद बताती है कि राष्ट्रवाद का चेहरा समय के साथ बदल गया।

समयराष्ट्रवाद का रूप
उन्नीसवीं सदी का पहला भागआदर्शवादी, उदारवादी और जनतांत्रिक — यानी “हम आज़ाद होना चाहते हैं”
उन्नीसवीं सदी की अंतिम चौथाई“सीमित लक्ष्यों वाला संकीर्ण सिद्धांत” — यानी “हम दूसरों से बड़े हैं”

दूसरे रूप का नतीजा क्या हुआ? पाठ्यपुस्तक साफ़ लिखती है — “साम्राज्यवाद से जुड़ कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया।” यानी प्रथम विश्व युद्ध।

इससे क्या सीखना चाहिए?

राष्ट्रवाद तब अच्छा होता है जब वह कहता है “हमें भी आज़ादी चाहिए।” वह ख़तरनाक तब बन जाता है जब वह कहने लगे “हम दूसरों से ऊँचे हैं।”

यही कारण है कि अर्न्स्ट रेनन का 1882 वाला वाक्य आज भी इतना क़ीमती है — कि राष्ट्रों का होना स्वतंत्रता की गारंटी है, क्योंकि अगर दुनिया में केवल एक क़ानून और उसका केवल एक मालिक होता तो स्वतंत्रता ही ख़त्म हो जाती। रेनन राष्ट्रों के पक्ष में थे, पर किसी एक राष्ट्र के वर्चस्व के ख़िलाफ़ थे।

5. प्रोजेक्ट कार्य के लिए सुझाव

पाठ्यपुस्तक का परियोजना कार्य कहता है — “यूरोप से बाहर के देशों में राष्ट्रवादी प्रतीकों के बारे में और जानकारियाँ इकट्ठा करें। एक या दो देशों के विषय में ऐसी तसवीरें, पोस्टर्स और संगीत इकट्ठा करें जो राष्ट्रवाद के प्रतीक थे। वे यूरोपीय राष्ट्रों के प्रतीकों से भिन्न कैसे हैं?”

इसे आसानी से करने के लिए यह तरीक़ा अपनाइए:

पहला चरण — अपने देश से शुरू कीजिए। भारत के राष्ट्रीय प्रतीक इकट्ठा कीजिए — राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), अशोक चक्र, राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय पशु और पक्षी, तथा भारत माता का चित्र। हर एक के बारे में लिखिए कि वह किस भाव को दर्शाता है।

दूसरा चरण — अपने राज्य से जोड़िए। राजस्थान के प्रतीकों को भी देखिए — राज्य पशु (चिंकारा और ऊँट), राज्य पक्षी (गोडावण), राज्य वृक्ष (खेजड़ी) और राज्य पुष्प (रोहिड़ा)। पूछिए कि ये प्रतीक क्यों चुने गए — इनका उत्तर प्रायः वहाँ के भूगोल और जीवन में मिलता है।

तीसरा चरण — तुलना कीजिए। एक तालिका बनाइए —

प्रतीकयूरोपभारत
राष्ट्र का नारी रूपमारीआन, जर्मेनियाभारत माता
आज़ादी का चिह्नलाल टोपी, टूटी बेड़ियाँ? (आप खोजिए)
बहादुरी का चिह्नबलूत का मुकुट? (आप खोजिए)

चौथा चरण — एक निष्कर्ष लिखिए। इस प्रश्न का उत्तर दीजिए: “अलग-अलग देशों ने अलग-अलग प्रतीक क्यों चुने?” (संकेत: हर देश अपने आसपास की चीज़ों से प्रतीक चुनता है — जर्मनी में बलूत का पेड़ आम था, इसलिए वह बहादुरी का प्रतीक बना।)

6. और पढ़ने के लिए

स्रोतक्या मिलेगा
Wikipedia — Marianneमारीआन का पूरा इतिहास और उसके अलग-अलग रूप
Élysée — Marianneफ़्रांस की सरकार का आधिकारिक पृष्ठ
Wikipedia — Frankfurt National Assemblyफ़्रैंकफ़र्ट संसद के बारे में विस्तार से
Facing History — Philipp Veit, Germaniaजर्मेनिया के चित्र की व्याख्या
Google Arts & Cultureइस अध्याय के लगभग सभी चित्र बड़े आकार में देखे जा सकते हैं — देलाक्रोआ का द मसैकर ऐट किआॅस, वेट की जर्मेनिया, और वर्साय की जर्मन साम्राज्य की घोषणा

एक अंतिम सुझाव। इस अध्याय में बीस चित्र हैं। इन्हें केवल सजावट मत समझिए — हर चित्र एक स्रोत है। अगर आप हर चित्र के नीचे लिखा विवरण ध्यान से पढ़ लें, तो आधा अध्याय अपने आप याद हो जाएगा। परीक्षा में स्रोत-आधारित प्रश्न प्रायः इन्हीं चित्रों और उनके विवरणों से बनते हैं।