यह फ़ाइल परीक्षा से एक दिन पहले पढ़ने के लिए है। इसमें केवल वही बातें हैं जो परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं। हर बात पूरे वाक्य में लिखी गई है, ताकि आप इसे सीधे उत्तर-पुस्तिका में उतार सकें।
पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में
दुनिया आज से नहीं, हज़ारों साल से आपस में जुड़ी हुई है। पहले यह जुड़ाव सिल्क मार्ग, समुद्री व्यापार और भोजन की यात्रा से हुआ। सोलहवीं सदी में यूरोपीय लोग अमेरिका पहुँचे और वहाँ चेचक जैसी बीमारियाँ ले गए, जिससे मूल निवासी ख़त्म हो गए और विजय आसान हो गई। उन्नीसवीं सदी में तीन प्रवाहों — व्यापार, श्रम और पूँजी — ने एक सचमुच की विश्व अर्थव्यवस्था बना दी। ब्रिटेन ने कॉर्न लॉ हटाकर सस्ता अनाज आयात करना शुरू किया, दुनिया भर में उसके लिए खेती होने लगी और करोड़ों लोग काम की तलाश में देश छोड़ने लगे। इसी दौर में अफ़्रीका को बाँट लिया गया, रिंडरपेस्ट ने अफ़्रीकियों को मज़दूर बना दिया और भारत से लाखों गिरमिटिया मज़दूर विदेश भेजे गए। फिर 1914 में पहला विश्वयुद्ध आया और यह पूरी व्यवस्था टूट गई। 1929 की महामंदी ने उसे और तोड़ा; भारत में किसान क़र्ज़ में डूब गए और उसी समय सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 1944 में ब्रेटन वुड्स में नयी व्यवस्था बनी, जिससे विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. जन्मे। 1970 के दशक में यह व्यवस्था भी टूट गई और आज का वैश्वीकरण शुरू हुआ।
भाग 1 — आधुनिक युग से पहले
याद रखने की पाँच बातें
- आमतौर पर लोग समझते हैं कि वैश्वीकरण पिछले पचास सालों की चीज़ है, लेकिन इसका एक लंबा इतिहास रहा है।
- 3,000 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी की सभ्यता समुद्री व्यापार के ज़रिये पश्चिमी एशिया से जुड़ी हुई थी।
- हज़ार साल से ज़्यादा समय से मालदीव की कौड़ियाँ चीन और पूर्वी अफ़्रीका तक पहुँचती रही हैं। इन्हें मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।
- यात्राओं में लोग केवल सामान नहीं, बल्कि पैसा, मूल्य-मान्यताएँ, हुनर, विचार, आविष्कार और कीटाणु व बीमारियाँ भी साथ लेकर चलते थे।
- बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं के दूर-दूर पहुँचने का इतिहास सातवीं सदी तक ढूँढा जा सकता है; तेरहवीं सदी के बाद इसे साफ़ देखा जा सकता है।
सिल्क मार्ग
‘सिल्क मार्ग’ नाम से पता चलता है कि इस मार्ग से पश्चिम को भेजे जाने वाले चीनी रेशम का कितना महत्त्व था।
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कब से कब तक? | ईसा पूर्व के समय से लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक |
| किन इलाक़ों को जोड़ता था? | एशिया के विशाल क्षेत्रों को आपस में, और एशिया को यूरोप व उत्तरी अफ़्रीका से |
| पश्चिम की ओर क्या गया? | चीनी रेशम, चीनी पॉटरी, तथा भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े और मसाले |
| पूरब की ओर क्या आया? | सोने-चाँदी जैसी क़ीमती धातुएँ |
| कौन-से धर्म फैले? | ईसाई मिशनरी इसी मार्ग से एशिया आए; कुछ सदी बाद मुस्लिम धर्मोपदेशक भी इसी रास्ते फैले; और इससे भी पहले पूर्वी भारत में उपजा बौद्ध धर्म इसकी विविध शाखाओं से कई दिशाओं में फैल चुका था |
भोजन की यात्रा
- जब भी व्यापारी और मुसाफ़िर किसी नए देश में जाते थे, जाने-अनजाने वहाँ नयी फ़सलों के बीज बो आते थे।
- माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम पहुँचे और वहीं से स्पैघेत्ती का जन्म हुआ। एक और संभावना यह है कि पास्ता अरब यात्रियों के साथ पाँचवीं सदी में सिसली पहुँचा।
- आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च और शकरकंद लगभग पाँच सौ साल पहले हमारे पूर्वजों के पास नहीं थे। ये तब आए जब क्रिस्टोफ़र कोलंबस ग़लती से अमेरिका पहुँच गया।
- आलू से यूरोप के ग़रीबों का भोजन बेहतर हो गया और उनकी औसत उम्र बढ़ने लगी।
आयरलैंड का आलू अकाल — दो अंक का पक्का प्रश्न:
आयरलैंड के ग़रीब काश्तकार आलू पर इस हद तक निर्भर हो चुके थे कि जब 1840 के दशक के मध्य में किसी बीमारी के कारण आलू की फ़सल ख़राब हो गई तो लाखों लोग भुखमरी के कारण मौत के मुँह में चले गए। 1845 से 1849 के बीच पड़े इस अकाल में लगभग 10,00,000 लोग मारे गए और इससे दोगुने लोग काम की तलाश में घर-बार छोड़कर चले गए।
विजय, बीमारी और व्यापार — सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा
सोलहवीं सदी में जब यूरोपीय जहाज़ियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता ढूँढ़ लिया और वे अमेरिका तक जा पहुँचे तो पूर्व-आधुनिक विश्व बहुत छोटा सा दिखाई देने लगा।
चेचक की भूमिका — यह पूरा उत्तर याद कीजिए:
- यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताक़त के दम पर नहीं जीतती थीं।
- स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियारों में परंपरागत क़िस्म का सैनिक हथियार तो कोई था ही नहीं। यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे।
- लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में इन बीमारियों से बचने की रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी।
- एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई। जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे।
- इसने पूरे के पूरे समुदायों को ख़त्म कर डाला और घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया।
- बंदूक़ों को तो ख़रीद कर या छीन कर हमलावरों के ख़िलाफ़ भी इस्तेमाल किया जा सकता था, पर चेचक के मामले में ऐसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमलावरों के पास बचाव का तरीक़ा भी था और रोग प्रतिरोधी क्षमता भी।
यूरोप से पलायन क्यों हुआ?
- उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में ग़रीबी और भूख का ही साम्राज्य था।
- शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और बीमारियों का बोलबाला था।
- धार्मिक टकराव आम थे और धार्मिक असंतुष्टों को कड़ा दंड दिया जाता था।
- इस वजह से हज़ारों लोग यूरोप से भागकर अमेरिका जाने लगे।
व्यापार का केंद्र कैसे बदला?
- अठारहवीं शताब्दी का काफ़ी समय बीत जाने के बाद भी चीन और भारत को दुनिया के सबसे धनी देशों में गिना जाता था।
- पंद्रहवीं सदी से चीन ने दूसरे देशों के साथ अपने संबंध कम कर दिए और वह दुनिया से अलग-थलग पड़ने लगा।
- चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्त्व के चलते विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम की ओर खिसकने लगा। अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।
भाग 2 — तीन प्रवाह (सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली परिभाषा)
अर्थशास्त्रियों ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह की गतियों या ‘प्रवाहों’ का उल्लेख किया है।
| प्रवाह | परिभाषा | भारत का उदाहरण |
|---|---|---|
| व्यापार का प्रवाह | यह मुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा या गेहूँ आदि) के व्यापार तक ही सीमित था | भारत से ब्रिटेन को कच्चे कपास और चीन को अफ़ीम का निर्यात |
| श्रम का प्रवाह | इसमें लोग काम या रोज़गार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं | भारत से गिरमिटिया मज़दूरों का त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम, मॉरिशस और फ़िजी जाना |
| पूँजी का प्रवाह | इसे अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में निवेश कर दिया जाता है | ब्रिटेन का भारत में रेलवे और पंजाब की नहरों में निवेश |
तीन और बातें ज़रूर लिखिए —
- ये तीनों प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और लोगों के जीवन को प्रभावित करते थे।
- कभी-कभी इन कारकों के बीच मौजूद संबंध टूट भी जाते थे।
- वस्तुओं या पूँजी की आवाजाही के मुक़ाबले श्रमिकों की आवाजाही पर प्राय: ज़्यादा शर्तें और बंदिशें लगाई जाती थीं।
भाग 3 — कॉर्न लॉ की कहानी (चार अंक का प्रश्न)
कारण: अठारहवीं सदी के आख़िरी दशकों में ब्रिटेन की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी थी, इसलिए भोजन की माँग बढ़ी और कृषि उत्पाद महँगे होने लगे। बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी। इन क़ानूनों को ‘कॉर्न लॉ’ कहा जाता था।
निरस्तीकरण: खाद्य पदार्थों की ऊँची क़ीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह कॉर्न लॉ को फ़ौरन समाप्त कर दे।
परिणाम (पाँच बिंदु, क्रम से लिखिए):
- बहुत कम क़ीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाने लगा।
- आयातित खाद्य पदार्थों की लागत ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम थी।
- ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित माल की क़ीमत का मुक़ाबला नहीं कर सकते थे।
- विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई और हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए।
- गाँवों से उजड़ कर वे या तो शहरों में या दूसरे देशों में जाने लगे।
और आगे का असर: ब्रिटेन में उपभोग बढ़ा तो पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, दुनिया के हर हिस्से में ब्रिटेन का पेट भरने के लिए ज़मीनों को साफ़ करके खेती की जाने लगी। इसके लिए रेलवे, नयी गोदियाँ, नयी बस्तियाँ, पूँजी और श्रम — सब चाहिए थे।
आँकड़े:
- उन्नीसवीं सदी में यूरोप के लगभग पाँच करोड़ लोग अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जाकर बस गए।
- पूरी दुनिया में लगभग पंद्रह करोड़ लोग बेहतर भविष्य की चाह में अपने घर-बार छोड़कर दूर-दूर के देशों में जाकर काम करने लगे थे।
- 1890 तक एक वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी।
- 1820 से 1914 के बीच विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृद्धि हुई, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा प्राथमिक उत्पादों का था।
भारत का उदाहरण: ब्रिटिश भारतीय सरकार ने पंजाब की अर्द्ध-रेगिस्तानी परती ज़मीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया ताकि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास की खेती की जा सके। इन इलाक़ों में बसाई गई बस्तियों को केनाल कॉलोनी (नहर बस्ती) कहा जाता था।
भाग 4 — तकनीक की भूमिका और मांस का व्यापार
“तकनीकी प्रगति अकसर चौतरफ़ा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों का परिणाम भी होती है।”
रेफ़्रिजरेशन से पहले की समस्या:
- 1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप को मांस का निर्यात नहीं किया जाता था; केवल जिंदा जानवर ही भेजे जाते थे जिन्हें यूरोप ले जाकर काटा जाता था।
- जिंदा जानवर बहुत ज़्यादा जगह घेरते थे। बहुत सारे लंबे सफ़र में मर जाते थे या बीमार पड़ जाते थे। बहुतों का वज़न गिर जाता था।
- इसी वजह से मांस खाना एक महँगा सौदा था और यूरोप के ग़रीबों की पहुँच से बाहर था।
रेफ़्रिजरेशन के बाद के पाँच परिणाम:
- जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा।
- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूज़ीलैंड, सब जगह से जानवरों की बजाय उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा।
- समुद्री यात्रा का ख़र्चा कम हो गया और यूरोप में मांस के दाम गिर गए।
- यूरोप के ग़रीबों को ज़्यादा विविधतापूर्ण ख़ुराक मिलने लगी। पहले उनके पास सिर्फ़ आलू और ब्रेड होते थे; अब भोजन में मांसाहार, मक्खन और अंडे भी शामिल हो गए।
- जीवनस्थिति सुधरी तो देश में शांति स्थापित होने लगी और दूसरे देशों में साम्राज्यवादी मंसूबों को समर्थन मिलने लगा।
भाग 5 — उपनिवेशवाद और अफ़्रीका
- यह केवल फैलते व्यापार और संपन्नता का ही दौर नहीं था; हमें इस प्रक्रिया के स्याह पक्ष को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
- व्यापार में इज़ाफ़े का एक परिणाम यह हुआ कि दुनिया के बहुत सारे भागों में स्वतंत्रता और आजीविका के साधन छिनने लगे।
- अफ़्रीका के मानचित्र में कई देशों की सीमाएँ सीधी लकीर जैसी हैं, मानो उन्हें फुट्टा रखकर खींचा गया हो। दुर्भाग्यवश, यही हुआ भी था।
- 1885 में यूरोप के ताक़तवर देशों की बर्लिन में एक बैठक हुई जिसमें अफ़्रीका के नक़्शे पर लकीरें खींचकर उसे आपस में बाँट लिया गया था।
- बेल्जियम और जर्मनी नयी औपनिवेशिक ताक़तों के रूप में सामने आए, और 1890 के दशक के आख़िरी वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका भी औपनिवेशिक ताक़त बन गया।
भाग 6 — रिंडरपेस्ट (चार अंक का पक्का प्रश्न)
पहले अफ़्रीका की स्थिति:
- अफ़्रीका में ज़मीन की कभी कोई कमी नहीं रही जबकि वहाँ की आबादी बहुत कम थी।
- सदियों तक अफ़्रीकियों की ज़िंदगी और कामकाज ज़मीन तथा पालतू पशुओं के सहारे ही चलता रहा।
- वहाँ पैसे या वेतन पर काम करने का चलन नहीं था।
यूरोपीयों की समस्या: वे बागानी खेती और खदानों का दोहन करना चाहते थे, लेकिन वहाँ के लोग तनख़्वाह पर काम नहीं करना चाहते थे।
मज़दूर पाने के तीन हथकंडे:
- उन पर भारी भरकम कर लाद दिए गए जिनका भुगतान केवल तभी किया जा सकता था जब करदाता बागानों या खदानों में काम करता हो।
- उत्तराधिकार क़ानून बदल दिए गए — अब परिवार के केवल एक ही सदस्य को पैतृक संपत्ति मिलेगी, ताकि बाक़ी लोगों को श्रम बाज़ार में ढकेला जा सके।
- खानकर्मियों को बाड़ों में बंद कर दिया गया और उनके खुलेआम घूमने-फिरने पर पाबंदी लगा दी गई।
रिंडरपेस्ट का सफ़र:
- यह बीमारी सबसे पहले 1880 के दशक के आख़िरी सालों में दिखाई दी।
- उस समय पूर्वी अफ़्रीका में एरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों का पेट भरने के लिए एशियाई देशों से जानवर लाए जाते थे; यह बीमारी उन्हीं जानवरों के ज़रिये यहाँ पहुँची।
- यह बीमारी ‘जंगल की आग’ की तरह पश्चिमी अफ़्रीका की तरफ़ बढ़ने लगी।
- 1892 में यह अटलांटिक तट तक जा पहुँची और पाँच साल बाद केप तक भी पहुँच गई।
- रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया।
परिणाम:
- पशुओं के ख़त्म हो जाने से अफ़्रीकियों के रोज़ी-रोटी के साधन ही ख़त्म हो गए।
- बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे-खुचे पशु भी अपने क़ब्ज़े में ले लिए।
- इससे यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ़्रीका को जीतने और ग़ुलाम बना लेने का बेहतरीन मौक़ा हाथ लग गया।
भाग 7 — गिरमिटिया मज़दूर (बहुत महत्त्वपूर्ण)
अनुबंध क्या था? भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को ख़ास तरह के अनुबंध या एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाता था। इनमें शर्त होती थी कि यदि मज़दूर अपने मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लेंगे तो वे स्वदेश लौट सकते हैं।
वे कहाँ से जाते थे? मौजूदा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाक़ों से।
वे क्यों जाते थे?
- कुटीर उद्योग ख़त्म हो रहे थे।
- ज़मीन का भाड़ा बढ़ गया था।
- खानों और बागानों के लिए ज़मीनों को साफ़ किया जा रहा था।
- वे बँटाई पर ज़मीन तो ले लेते थे लेकिन उसका भाड़ा नहीं चुका पाते थे, इसलिए उन पर क़र्ज़ा चढ़ने लगा।
- काम की तलाश में उन्हें अपने घर-बार छोड़ने पड़े।
वे कहाँ जाते थे? मुख्यत: कैरीबियाई द्वीप समूह (त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम), मॉरिशस और फ़िजी। तमिल आप्रवासी सीलोन और मलाया जाकर काम करते थे। बहुत सारे श्रमिकों को असम के चाय बागानों में भी ले जाया जाता था।
भर्ती में धोखा:
- मज़दूरों की भर्ती का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे और उन्हें कमीशन मिलता था।
- एजेंट भावी आप्रवासियों को फुसलाने के लिए झूठी जानकारियाँ देते थे।
- बहुत सारे आप्रवासियों को तो यह भी नहीं बताया जाता था कि उन्हें लंबी समुद्री यात्रा पर जाना है।
- अगर कोई मज़दूर अनुबंध के लिए राजी नहीं होता था तो एजेंट उसका अपहरण तक कर लेते थे।
‘नयी दास प्रथा’ क्यों कहा गया?
- बागानों में पहुँचने के बाद मज़दूरों को पता चलता था कि वे जैसी उम्मीद कर रहे थे वैसे हालात नहीं हैं।
- नयी जगह की जीवन एवं कार्य स्थितियाँ कठोर थीं और मज़दूरों के पास क़ानूनी अधिकार कहने भर को भी नहीं थे।
- बहुत सारे भाग कर जंगलों में चले जाते थे और पकड़े जाने पर उन्हें भारी सज़ा दी जाती थी।
पर उन्होंने अपनी संस्कृति भी बनाई — तीन उदाहरण:
| उदाहरण | विवरण |
|---|---|
| होसे | त्रिनिदाद में मुहर्रम के सालाना जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले का रूप दे दिया गया, जिसे इमाम हुसैन के नाम पर ‘होसे’ कहा गया। इसमें सभी धर्मों और नस्लों के मज़दूर हिस्सा लेते थे। |
| रास्ताफ़ारियानवाद | यह विद्रोही धर्म, जिसे जमैका के रैगे गायक बॉब मार्ले ने ख्याति के शिखर पर पहुँचाया, भारतीय आप्रवासियों और कैरीबियाई द्वीपसमूह के बीच संबंधों की झलक दिखाता है। |
| चटनी म्यूज़िक | त्रिनिदाद और गुयाना का यह मशहूर संगीत भारतीय आप्रवासियों के वहाँ पहुँचने के बाद सामने आई रचनात्मक अभिव्यक्तियों का उदाहरण है। |
अंत: बीसवीं सदी के शुरुआती सालों से राष्ट्रवादी नेता इस प्रथा का विरोध करने लगे थे। उनकी राय में यह बहुत अपमानजनक और क्रूर व्यवस्था थी। इसी दबाव के कारण 1921 में इसे ख़त्म कर दिया गया।
आज के वंशज: नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार वी. एस. नायपॉल तथा वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी शिवनरैन चंद्रपॉल और रामनरेश सरवन।
भाग 8 — भारतीय व्यापार और व्यापार अधिशेष
भारतीय कपड़ा उद्योग का पतन:
- औद्योगीकरण के बाद ब्रिटेन में कपास का उत्पादन बढ़ने लगा, इसलिए वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कपास के आयात पर रोक लगाए।
- फलस्वरूप ब्रिटेन में आयातित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए और महीन भारतीय कपास का आयात कम होने लगा।
- सीमा शुल्क की व्यवस्था के कारण ब्रिटिश बाज़ारों से बेदख़ल हो जाने के बाद भारतीय कपड़ों को दूसरे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
| निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा | निर्यात में कच्चे कपास का हिस्सा |
|---|---|
| 1800 के आसपास — 30 प्रतिशत | 1812 — 5 प्रतिशत |
| 1815 — 15 प्रतिशत | 1871 — 35 प्रतिशत |
| 1870 — केवल 3 प्रतिशत | — |
अफ़ीम का त्रिकोण: ब्रिटेन की सरकार भारत में अफ़ीम की खेती करवाती थी और उसे चीन को निर्यात कर देती थी। अफ़ीम के निर्यात से जो पैसा मिलता था उसके बदले चीन से ही चाय और दूसरे पदार्थों का आयात किया जाता था।
व्यापार अधिशेष — तीन वाक्य में:
- ब्रिटेन से जो माल भारत भेजा जाता था उसकी क़ीमत भारत से भेजे जाने वाले माल की क़ीमत से बहुत ज़्यादा होती थी।
- इसलिए भारत के साथ ब्रिटेन हमेशा ‘व्यापार अधिशेष’ की अवस्था में रहता था, यानी आपसी व्यापार में हमेशा ब्रिटेन को ही फ़ायदा रहता था।
- ब्रिटेन इस मुनाफ़े के सहारे दूसरे देशों के साथ होने वाले व्यापारिक घाटे की भरपाई कर लेता था — इसे बहुपक्षीय बंदोबस्त कहते हैं।
होम चार्जेज: इनमें ब्रितानी अफ़सरों और व्यापारियों द्वारा अपने घर में भेजी गई निजी रकम, भारतीय बाहरी क़र्ज़ों पर ब्याज और भारत में काम कर चुके ब्रितानी अफ़सरों की पेंशन शामिल थी।
भाग 9 — पहला विश्वयुद्ध और उसका असर
| पक्ष | देश |
|---|---|
| मित्र राष्ट्र | ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस |
| केंद्रीय शक्तियाँ | जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन तुर्की |
- अगस्त 1914 में जब युद्ध शुरू हुआ तो सरकारों को लगता था कि यह क्रिसमस तक ख़त्म हो जाएगा, पर यह चार साल से भी ज़्यादा चला।
- यह पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध था, जिसमें मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाज़ों और रासायनिक हथियारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।
- युद्ध में 90 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए।
- मृतकों और घायलों में से ज़्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे, इसलिए यूरोप में कामकाज के लायक़ लोगों की संख्या बहुत कम रह गई और परिवारों की आय भी गिर गई।
- मर्द मोर्चे पर जाने लगे तो उन कामों को सँभालने के लिए घर की औरतों को बाहर आना पड़ा जिन्हें अब तक केवल मर्दों का काम माना जाता था।
- ब्रिटेन को अमेरिकी बैंकों और अमेरिकी जनता से भारी क़र्ज़ा लेना पड़ा। फलस्वरूप इस युद्ध ने अमेरिका को क़र्ज़दार की बजाय कर्ज़दाता देश बना दिया।
युद्धोत्तर संकट:
- युद्ध के बाद सबसे लंबा संकट ब्रिटेन को ही झेलना पड़ा, क्योंकि जिस समय वह युद्ध से जूझ रहा था उसी समय भारत और जापान में उद्योग विकसित होने लगे थे।
- युद्ध ख़त्म होने तक ब्रिटेन भारी विदेशी क़र्ज़ों में दब चुका था।
- 1921 में हर पाँच में से एक ब्रिटिश मज़दूर के पास काम नहीं था।
- युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में गेहूँ की पैदावार सुधरने लगी और विश्व बाज़ारों में गेहूँ की अति की हालत पैदा हो गई। अनाज की क़ीमतें गिर गईं, ग्रामीण आय कम हो गई और किसान गहरे क़र्ज़ संकट में फँस गए।
भाग 10 — हेनरी फ़ोर्ड और बृहत उत्पादन
- 1920 के दशक की अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ख़ासियत थी बृहत उत्पादन (Mass Production) का चलन।
- कार निर्माता हेनरी फ़ोर्ड बृहत उत्पादन के विख्यात प्रणेता थे।
- उन्होंने शिकागो के एक बूचड़ख़ाने की असेंबली लाइन की तर्ज़ पर डेट्रॉयट के अपने कार कारख़ाने में आधुनिक असेंबली लाइन स्थापित की।
- असेंबली लाइन पर मज़दूरों को एक ही काम मशीनी ढंग से बार-बार करते रहना होता था और काम की रफ़्तार कन्वेयर बेल्ट से तय होती थी।
- कन्वेयर बेल्ट के साथ खड़े होने के बाद कोई मज़दूर अपने काम में ढील करने या कुछ पल के लिए भी अवकाश लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था। और तो और, मज़दूर अपने साथियों से बातचीत भी नहीं कर सकते थे।
- इसका नतीजा यह हुआ कि हर तीन मिनट में एक कार तैयार होकर निकलने लगी। टी-मॉडल नामक कार बृहत उत्पादन पद्धति से बनी पहली कार थी।
- बहुत सारे मज़दूरों ने काम छोड़ दिया, इसलिए फ़ोर्ड ने हताश होकर जनवरी 1914 से वेतन दोगुना यानी 5 डॉलर प्रतिदिन कर दिया। साथ ही उन्होंने अपने कारख़ानों में ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर भी पाबंदी लगा दी।
- तनख़्वाह बढ़ाने से हुए नुक़सान की भरपाई के लिए वे असेंबली लाइन की रफ़्तार बार-बार बढ़ाने लगे।
आँकड़े और उपभोग:
- 1919 में अमेरिका में 20 लाख कारों का उत्पादन होता था, जो 1929 में बढ़कर 50 लाख कार प्रतिवर्ष से भी ऊपर जा पहुँचा।
- लोग फ़्रिज, वॉशिंग मशीन, रेडियो और ग्रामोफ़ोन प्लेयर्स भी ख़रीदने लगे। ये सब चीज़ें ‘हायर-परचेज़’ व्यवस्था के तहत क़र्ज़ पर ख़रीदी जाती थीं और उनकी क़ीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाई जाती थी।
- 1923 में अमेरिका शेष विश्व को पूँजी का निर्यात दोबारा करने लगा और वह दुनिया में सबसे बड़ा कर्ज़दाता देश बन गया।
भाग 11 — महामंदी (सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला भाग)
परिचय: आर्थिक महामंदी की शुरुआत 1929 से हुई और यह संकट तीस के दशक के मध्य तक बना रहा। इस दौरान दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों के उत्पादन, रोज़गार, आय और व्यापार में भयानक गिरावट दर्ज की गई।
सबसे बुरा असर कृषि पर क्यों? औद्योगिक उत्पादों की तुलना में खेतिहर उत्पादों की क़ीमतों में ज़्यादा भारी और ज़्यादा समय तक कमी बनी रही।
तीन कारण:
| कारण | विवरण |
|---|---|
| 1. कृषि में अति उत्पादन | क़ीमतें गिरीं तो किसानों ने आय बनाए रखने के लिए और ज़्यादा उत्पादन किया। इससे बाज़ार में आमद और बढ़ गई और क़ीमतें और नीचे चली गईं। ख़रीदारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी-पड़ी सड़ने लगी। |
| 2. अमेरिकी क़र्ज़ों का खिंच जाना | 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से क़र्ज़ें लिए थे। संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए। 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का क़र्ज़ा एक अरब डॉलर था; साल भर के भीतर यह घटकर केवल चौथाई रह गया। |
| 3. बैंकों का धराशायी होना और सीमा शुल्क | यूरोप में कई बड़े बैंक धराशायी हो गए और कई देशों की मुद्रा की क़ीमत बुरी तरह गिर गई। अमेरिकी सरकार आयातित पदार्थों पर दो गुना सीमा शुल्क वसूल करने लगी, जिसने विश्व व्यापार की कमर ही तोड़ दी। |
अमेरिका में क्या हुआ:
- अमेरिकी बैंकों ने घरेलू क़र्ज़ें देना बंद कर दिया और जो क़र्ज़ें दिए जा चुके थे उनकी वसूली तेज़ कर दी गई।
- किसान उपज नहीं बेच पा रहे थे, परिवार तबाह हो गए और कारोबार ठप पड़ गए।
- बहुत सारे परिवार क़र्ज़ें चुकाने में नाकामयाब हो गए जिसके चलते उनके मकान, कार और सारी ज़रूरी चीज़ें कुर्क कर ली गईं।
- 1933 तक 4,000 से ज़्यादा बैंक बंद हो चुके थे और 1929 से 1932 के बीच तक़रीबन 1,10,000 कंपनियाँ चौपट हो चुकी थीं।
- यद्यपि 1935 तक ज़्यादातर औद्योगिक देशों में उबरने के संकेत दिखाई देने लगे थे, लेकिन समाजों, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और लोगों के दिलो-दिमाग़ पर उसकी छाप जल्दी मिटने वाली नहीं थी।
भाग 12 — भारत और महामंदी (चार अंक का पक्का प्रश्न)
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1928 से 1934 | देश के आयात-निर्यात घट कर लगभग आधे रह गए |
| 1928 से 1934 | भारत में गेहूँ की क़ीमत 50 प्रतिशत गिर गई |
| कच्चा पटसन | टाट का निर्यात बंद होने पर क़ीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरावट |
किसान पर सबसे बुरी मार:
- शहरी निवासियों के मुक़ाबले किसानों और काश्तकारों को ज़्यादा नुक़सान हुआ।
- यद्यपि कृषि उत्पादों की क़ीमत तेज़ी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ़ इनकार कर दिया।
- सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाज़ार के लिए उपज पैदा करते थे, जैसे बंगाल के जूट उत्पादक।
- काश्तकारों की बचत ख़त्म हो चुकी थी, ज़मीन सूदख़ोरों के पास गिरवी पड़ी थी और घर के गहने-ज़ेवर बिक चुके थे।
- मंदी के इन्हीं सालों में भारत क़ीमती धातुओं, ख़ासतौर से सोने का निर्यात करने लगा। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स का मानना था कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में काफ़ी मदद मिली। इस निर्यात ने ब्रिटेन की आर्थिक दशा सुधारने में मदद दी लेकिन भारतीय किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ।
राजनीति से जोड़: 1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था। उसी समय महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
शहरी भारत पर असर: यह मंदी शहरी भारत के लिए इतनी दुखदाई नहीं रही। क़ीमतें गिरने के बावजूद निश्चित आय वाले लोगों — जैसे शहर में रहने वाले ज़मींदार और मध्यवर्गीय वेतनभोगी कर्मचारी — की हालत ठीक रही। राष्ट्रवादी दबाव में उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ा दिए गए थे जिससे औद्योगिक निवेश में तेज़ी आई।
भाग 13 — दूसरा विश्वयुद्ध और ब्रेटन वुड्स
| पक्ष | देश |
|---|---|
| धुरी शक्तियाँ | मुख्य रूप से नात्सी जर्मनी, जापान और इटली |
| मित्र राष्ट्र | ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ़्रांस और अमेरिका |
- छह साल तक चला यह युद्ध ज़मीन, हवा और पानी में असंख्य मोर्चों पर लड़ा गया।
- इस जंग के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क़रीब 6 करोड़ लोग मारे गए, जो 1939 की वैश्विक जनसंख्या का लगभग 3 प्रतिशत था।
- अब तक के युद्धों में मोर्चे पर मरने वालों की संख्या ज़्यादा होती थी; इस युद्ध में ऐसे लोग ज़्यादा मरे जो किसी मोर्चे पर लड़ नहीं रहे थे।
दो सबक़:
- बृहत उत्पादन पर आधारित किसी औद्योगिक समाज को व्यापक उपभोग के बिना क़ायम नहीं रखा जा सकता। इसके लिए आय का ज़्यादा और स्थिर होना ज़रूरी है, और स्थिर आय के लिए पूर्ण रोज़गार ज़रूरी है। पर बाज़ार पूर्ण रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकता, इसलिए आर्थिक स्थिरता केवल सरकारी हस्तक्षेप के ज़रिये ही सुनिश्चित की जा सकती थी।
- पूर्ण रोज़गार का लक्ष्य केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब सरकार के पास वस्तुओं, पूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रित करने की ताक़त उपलब्ध हो।
ब्रेटन वुड्स समझौता:
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कब और कहाँ? | जुलाई 1944, अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर |
| किस नाम से? | संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन |
| कौन-सी संस्थाएँ बनीं? | अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ़.) और अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (विश्व बैंक) |
| आई.एम.एफ़. का काम | सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटना |
| विश्व बैंक का काम | युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतज़ाम करना |
| कब से काम शुरू? | 1947 |
| नियंत्रण किसका? | इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी औद्योगिक देशों का नियंत्रण रहता है; अमेरिका किसी भी फ़ैसले को वीटो कर सकता है |
| विनिमय दर | यह व्यवस्था निश्चित (स्थिर) विनिमय दरों पर आधारित थी और डॉलर का मूल्य सोने से बँधा हुआ था |
ब्रेटन वुड्स युग के आँकड़े:
- 1950 से 1970 के बीच विश्व व्यापार की विकास दर सालाना 8 प्रतिशत से भी ज़्यादा रही।
- इसी दौरान वैश्विक आय में लगभग 5 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही थी।
- इस दौरान ज़्यादातर समय अधिकांश औद्योगिक देशों में बेरोज़गारी औसतन 5 प्रतिशत से भी कम रही।
भाग 14 — अनौपनिवेशीकरण, जी-77 और आज का वैश्वीकरण
नवस्वाधीन देशों की समस्या:
- दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद भी दुनिया का एक बहुत बड़ा भाग यूरोपीय औपनिवेशिक शासन के अधीन था। अगले दो दशकों में एशिया और अफ़्रीका के ज़्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र राष्ट्र बन चुके थे।
- ये सभी देश ग़रीबी और संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे।
- आई.एम.एफ़. और विश्व बैंक का गठन औद्योगिक देशों की ज़रूरतों के लिए हुआ था, इसलिए ये संस्थान भूतपूर्व उपनिवेशों में ग़रीबी और विकास की कमी से निपटने में दक्ष नहीं थे।
- विडंबना यह थी कि नवस्वाधीन राष्ट्रों को भी अपनी जनता को ग़रीबी से बाहर निकालने के लिए ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की मदद लेनी पड़ी जिन पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही वर्चस्व था।
जी-77 और एन.आई.ई.ओ.: ज़्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज़ प्रगति से कोई लाभ नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO) के लिए आवाज़ उठाई और समूह 77 (जी-77) के रूप में संगठित हो गए।
एन.आई.ई.ओ. में वे चार चीज़ें चाहते थे —
- अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण
- विकास के लिए अधिक सहायता
- कच्चे माल के सही दाम
- अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाज़ारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच
ब्रेटन वुड्स का अंत — चार कारण:
- साठ के दशक से ही विदेशों में अपनी गतिविधियों की भारी लागत ने अमेरिका की वित्तीय और प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमज़ोर कर दिया था। सोने की तुलना में डॉलर की क़ीमत गिरने लगी और अंतत: स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था विफल हो गई; उसकी जगह प्रवाहमयी या अस्थिर विनिमय दर की व्यवस्था शुरू की गई।
- अब विकासशील देशों को पश्चिम के व्यावसायिक बैंकों और निजी ऋणदाता संस्थानों से क़र्ज़ लेना पड़ता था, जिससे समय-समय पर क़र्ज़ संकट पैदा होने लगा। अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में यह समस्या सबसे ज़्यादा दिखाई दी।
- औद्योगिक विश्व भी बेरोज़गारी की समस्या में फँसने लगा। सत्तर के दशक के आख़िरी सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ एशिया के ऐसे देशों में उत्पादन केंद्रित करने लगीं जहाँ वेतन कम थे।
- चीन 1949 की क्रांति के बाद विश्व अर्थव्यवस्था से अलग-थलग था, पर नयी आर्थिक नीतियों और सोवियत खेमे के बिखराव के बाद वह और बहुत सारे देश दोबारा विश्व अर्थव्यवस्था का अंग बन गए। चीन में वेतन कम थे, इसलिए विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ जमकर निवेश करना शुरू कर दिया।
अध्याय का अंतिम वाक्य: “पिछले दो दशक में भारत, चीन और ब्राज़ील आदि देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आए भारी बदलावों के कारण दुनिया का आर्थिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है।”
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
1. तीन प्रवाह याद रखने का तरीक़ा — ‘व्य-श्र-पूँ’ व्यापार (सामान) · श्रम (आदमी) · पूँजी (पैसा)। एक वाक्य बना लीजिए — “सामान, आदमी और पैसा, तीनों चलते रहे।”
2. तीन बीमारियाँ याद रखने का तरीक़ा
| बीमारी | जगह | परिणाम |
|---|---|---|
| चेचक | अमेरिका | मूल निवासी ख़त्म; स्पेनिश विजय आसान |
| आलू की बीमारी | आयरलैंड | 10 लाख मरे; दोगुने पलायन कर गए |
| रिंडरपेस्ट | अफ़्रीका | 90% मवेशी मरे; अफ़्रीकी मज़दूर बने |
3. चार तारीख़ें — बस इतना पक्का कर लीजिए 1885 बर्लिन बैठक · 1929 महामंदी · 1944 ब्रेटन वुड्स · 1947 विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. ने काम शुरू किया
4. तीन नाम जो हर साल पूछे जाते हैं हेनरी फ़ोर्ड (असेंबली लाइन) · कीन्स (भारतीय सोने का निर्यात) · वी. एस. नायपॉल (गिरमिटिया मज़दूरों के वंशज)
5. आँकड़े लिखने का नियम जिस उत्तर में आप एक भी सही आँकड़ा लिख देते हैं, परीक्षक को दिख जाता है कि आपने अध्याय पढ़ा है। कम से कम ये पाँच ज़रूर याद कर लीजिए — 90% (रिंडरपेस्ट), 5 करोड़ (यूरोप से पलायन), 3% (1870 में सूती कपड़े का निर्यात), 50% (भारत में गेहूँ की क़ीमत में गिरावट), 6 करोड़ (दूसरे विश्वयुद्ध में मौतें)।
6. सबसे ज़रूरी वाक्य, जो हर बड़े उत्तर के अंत में लिखा जा सकता है
“इस तरह दुनिया के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से जुड़ते चले गए, लेकिन इस जुड़ाव से सबको एक जैसा लाभ नहीं हुआ।”