अध्याय 4औद्योगीकरण का युग

पाठ्यपुस्तक से आगे13 मिनट

यह फ़ाइल शिक्षक के लिए है और उन विद्यार्थियों के लिए है जो अध्याय से आगे जानना चाहते हैं।

एक चेतावनी पहले पढ़ लीजिए। इस फ़ाइल में दी गई कुछ बातें पाठ्यपुस्तक से मेल नहीं खातीं। बोर्ड परीक्षा में हमेशा पाठ्यपुस्तक का ही उत्तर लिखिए। ये सुधार और अतिरिक्त जानकारियाँ कक्षा में समझाने के लिए हैं, उत्तर-पुस्तिका में लिखने के लिए नहीं।


1. एक ज़रूरी सुधार — जेम्स वॉट का पेटेंट 1871 में नहीं, 1781 में हुआ था

पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 84 पर लिखा है:

“जेम्स वॉट ने न्यूकोमेन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किए और 1871 में नए इंजन को पेटेंट करा लिया।”

यह वर्ष असंभव है, और बच्चे इसे ख़ुद पकड़ सकते हैं। तीन तर्क दीजिए —

तर्कविवरण
पहलाजेम्स वॉट का देहांत 1819 में हो चुका था। 1871 में वे 52 साल से इस दुनिया में नहीं थे — मरे हुए आदमी को पेटेंट कैसे मिलेगा?
दूसरापाठ्यपुस्तक ख़ुद अगली पंक्ति में लिखती है कि “उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे।” यानी इंजन 1800 से पहले ही बन चुका था — तो पेटेंट 1871 का कैसे हो सकता है?
तीसरापूरा अध्याय 1730 से 1870 के बीच की औद्योगिक क्रांति की बात कर रहा है; 1871 तो उस पूरे दौर के बाद का साल है।

असली तथ्य:

तिथिघटना
1769वॉट ने न्यूकोमेन के इंजन में सबसे बड़ा सुधार किया — अलग कंडेंसर (separate condenser) का पेटेंट, जिससे भाप की गर्मी बर्बाद होना बंद हुई और कार्यक्षमता बहुत बढ़ गई
1772रोबक ने अपना हिस्सा मैथ्यू बूल्टन को दे दिया; यहीं से वॉट-बूल्टन की साझेदारी बनी
25 अक्तूबर 1781घूर्णी गति (rotary motion) का पेटेंट — यही वह पेटेंट है जिसकी बात पाठ्यपुस्तक कर रही है
1782दोहरी क्रिया वाले इंजन (double-acting engine) का पेटेंट

1781 का पेटेंट इतना महत्त्वपूर्ण क्यों था? — क्योंकि घूर्णी गति के आने से ही भाप के इंजन को कपड़ा मिलों जैसी घूमने वाली मशीनों में इस्तेमाल किया जा सकने लगा। इससे पहले भाप का इंजन केवल पानी खींचने (पंप) के काम आता था। यानी 1781 का पेटेंट ही वह मोड़ था जिसने कारख़ानों को संभव बनाया।

कक्षा में कैसे कहिए: “किताब में यह वर्ष छपाई की ग़लती से 1781 की जगह 1871 हो गया है। दो अंक आपस में बदल गए हैं। परीक्षा में यह वर्ष पूछा नहीं जाता, इसलिए घबराने की ज़रूरत नहीं — पर तथ्य आपको मालूम होना चाहिए।”

स्रोत: Britannica — James Watt · ASME — Boulton and Watt Rotative Steam Engine

2. एक और छोटी बात — ‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द भी बाद का है

पाठ्यपुस्तक भाग 1 का शीर्षक ही रखती है — ‘औद्योगिक क्रांति से पहले’ — पर यह शब्द उस समय के लोगों ने नहीं गढ़ा था।

  • ‘Industrial Revolution’ शब्द उन्नीसवीं सदी के आख़िर में प्रचलित हुआ, यानी उस पूरी प्रक्रिया के लगभग सौ साल बाद।
  • आज बहुत सारे इतिहासकार इस शब्द से असहमत हैं, क्योंकि ‘क्रांति’ शब्द से लगता है कि सब कुछ अचानक और तेज़ी से बदल गया — जबकि पाठ्यपुस्तक ख़ुद सिद्ध करती है कि बदलाव धीमे थे।
  • यही कारण है कि NCERT ने इस अध्याय का नाम ‘औद्योगिक क्रांति’ नहीं, बल्कि ‘औद्योगीकरण का युग’ रखा है।

यह बात कक्षा में बताने लायक़ है, क्योंकि इससे बच्चों को समझ आता है कि इतिहास के शब्द भी बहस के विषय होते हैं।

3. ‘आदि-औद्योगीकरण’ शब्द कहाँ से आया

पाठ्यपुस्तक बस इतना कहती है कि “बहुत सारे इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को आदि-औद्योगीकरण का नाम देते हैं।” — पर यह नहीं बताती कि यह शब्द कब और क्यों आया।

तथ्यविवरण
कब1970 के दशक में यह अवधारणा इतिहास-लेखन में प्रमुख हुई
क्योंइतिहासकारों ने देखा कि यूरोप के जिन इलाक़ों में बाद में कारख़ाने लगे, वहाँ पहले से ही गाँवों में बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा था — यानी कारख़ाना शून्य से नहीं आया
इसका महत्त्वइस अवधारणा ने यह सिद्ध किया कि औद्योगीकरण अचानक हुई ‘क्रांति’ नहीं, बल्कि एक लंबी और धीमी प्रक्रिया थी

यह जानकारी बच्चों को देने की ज़रूरत नहीं है, पर शिक्षक को यह जानना चाहिए कि पाठ्यपुस्तक क्यों इस शब्द से अध्याय शुरू करती है — क्योंकि पूरा अध्याय इसी एक तर्क को सिद्ध करता है।

4. दो अध्यायों की एक ही कहानी — अध्याय 3 से जोड़िए

यह सबसे कीमती जोड़ है और कक्षा में ज़रूर बनाना चाहिए। अध्याय 3 और अध्याय 4, दोनों एक ही आँकड़े पर मिलते हैं।

अध्याय 3 (भूमंडलीकृत विश्व का बनना)अध्याय 4 (औद्योगीकरण का युग)
“भारत के निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 1800 में 30 प्रतिशत था, 1815 में 15 प्रतिशत और 1870 तक केवल 3 प्रतिशत”“1811-12 में सूती माल का हिस्सा कुल निर्यात में 33 प्रतिशत था; 1850-51 में यह मात्र 3 प्रतिशत रह गया”
“1812 से 1871 के बीच कच्चे कपास का निर्यात 5 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत”“1860 के दशक में अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा और कपास की क़ीमत आसमान छूने लगी”
अध्याय 3 बताता है कि भारत तैयार माल से कच्चे माल पर आ गयाअध्याय 4 बताता है कि उस बदलाव में बुनकर के साथ क्या हुआ

कक्षा में यह वाक्य कहिए: “अध्याय 3 आपको आँकड़ा देता है। अध्याय 4 आपको उस आँकड़े के पीछे का आदमी दिखाता है। तीन प्रतिशत सुनने में छोटा लगता है — पर उसके पीछे लाखों बुनकर परिवार थे जिनका रोज़गार चला गया।”

5. अध्याय 2 से भी जोड़िए — स्वदेशी और विज्ञापन

पाठ्यपुस्तक अंत में कहती है कि “जब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था… ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे।”

इसे अध्याय 2 से जोड़िए —

अध्याय 4अध्याय 2
स्वदेशी आंदोलन को गति मिलने से राष्ट्रवादियों ने लोगों को विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित कियाअसहयोग आंदोलन में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई; 1921–22 में विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया
औद्योगिक समूह संगठित हो गए और आयात शुल्क बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव डालाव्यवसायी वर्ग सविनय अवज्ञा में इसलिए शामिल हुआ क्योंकि वह औपनिवेशिक पाबंदियों के ख़िलाफ़ था
चित्र 28 — एक देवी अहमदाबाद के मिल में बना कपड़ा दान कर रही हैंभारत माता की छवि और स्वराज झंडे पर चरखा — स्वावलंबन का प्रतीक

यह जोड़ बच्चों को यह समझाता है कि राजनीति और व्यापार अलग-अलग चीज़ें नहीं थीं। स्वदेशी एक साथ आंदोलन भी था और भारतीय उद्योगपतियों के लिए बाज़ार भी।

6. एक और तथ्य जो पाठ्यपुस्तक नहीं देती — भारत के पहले इस्पात संयंत्र की तारीख़

पाठ्यपुस्तक चित्र 18 के विवरण में लिखती है कि “1912 में जे.एन. टाटा ने जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित किया।” और साथ में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात जोड़ती है —

“भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग, कपड़ा उद्योग के काफ़ी बाद शुरू हुआ। औपनिवेशिक भारत में औद्योगिक मशीनरी, रेलवे और लोकोमोटिव का ज़्यादातर आयात ही किया जाता था। इसलिए स्वतंत्रता मिलने तक भारी उद्योग कोई ख़ास आगे नहीं बढ़ सकता था।”

यह वाक्य बहुत गहरा है और कक्षा में ज़रूर समझाइए — किसी देश का असली औद्योगीकरण तब होता है जब वह मशीन बनाने वाली मशीनें ख़ुद बना सके। भारत में यह नहीं हो पाया, क्योंकि औपनिवेशिक नीति भारत को कच्चा माल देने वाला और तैयार माल ख़रीदने वाला देश बनाए रखना चाहती थी।

7. भारत-सेतु — इस अध्याय को अपने आसपास से जोड़िए

यह अध्याय राजस्थान और भारत के आज के जीवन से बहुत आसानी से जुड़ जाता है। कक्षा में ये पाँच जोड़ बनाइए —

  1. हाथ का काम आज भी है — “राजस्थान की बंधेज, कोटा डोरिया, ब्लू पॉटरी, या बाड़मेर की कढ़ाई — ये सब आज भी हाथ से बनते हैं, क्योंकि मिल इनकी नक़ल नहीं कर सकती। यही बात पाठ्यपुस्तक बनारसी साड़ी और मद्रास की लुंगी के बारे में कहती है।”
  2. जॉबर आज भी है — “आज भी ठेकेदार गाँव से मज़दूर लाता है, उन्हें शहर में जगह दिलाता है, और उसके बदले कमीशन लेता है। नाम बदल गया, काम वही है।”
  3. मौसमी काम — “आज भी बहुत सारे मज़दूर फ़सल कटाई के समय गाँव लौटते हैं और उसके बाद वापस शहर आते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा स्रोत-ङ में वसंत पारकर बता रहे हैं।”
  4. विज्ञापन में देवता — “आज भी दुकानों के कैलेंडर पर लक्ष्मी-गणेश छपते हैं और विज्ञापनों में क्रिकेट खिलाड़ी और फ़िल्मी सितारे आते हैं। यह वही तरीक़ा है जो सौ साल पहले मैनचेस्टर वाले इस्तेमाल करते थे।”
  5. छोटे उद्योग — “आज भी भारत में सबसे ज़्यादा रोज़गार बड़े कारख़ानों में नहीं, बल्कि छोटी दुकानों और घरेलू इकाइयों में है। यह 1911 वाली स्थिति से बहुत अलग नहीं है।”

8. प्रोजेक्ट कार्य के लिए सुझाव

पाठ्यपुस्तक का परियोजना कार्य (पृष्ठ 102): “अपने क्षेत्र में किसी एक उद्योग को चुनकर उसके इतिहास का पता लगाइए। उसकी प्रौद्योगिकी किस तरह बदली? उसमें मज़दूर कहाँ से आते हैं? उसके उत्पादों का विज्ञापन और मार्केटिंग किस तरह किया जाता है?”

इसके अलावा ये पाँच प्रोजेक्ट भी दिए जा सकते हैं —

  1. ‘मेरे घर का हाथ से बना सामान’ — घर की पाँच चीज़ें ढूँढ़िए जो आज भी हाथ से बनी हैं, उनकी तसवीर बनाइए और लिखिए कि मशीन उनकी नक़ल क्यों नहीं कर सकती।
  2. एक बुनकर से बातचीत — अगर आपके क़स्बे या पास के गाँव में कोई बुनकर या दस्तकार है, तो उससे पाँच सवाल पूछिए — काम कब से कर रहे हैं, कितना कमाते हैं, बच्चे यही काम करेंगे या नहीं, और सबसे बड़ी समस्या क्या है।
  3. पुराने विज्ञापनों का संग्रह — पुराने कैलेंडर, दियासलाई के लेबल या साबुन के रैपर इकट्ठे कीजिए और देखिए कि उन पर क्या-क्या छपा है।
  4. समय-रेखा चार्ट — 1730 से 1946 तक की एक बड़ी समय-रेखा बनाइए, जिसमें ब्रिटेन की घटनाएँ ऊपर और भारत की घटनाएँ नीचे लिखी हों। इससे दोनों देशों की उलटी कहानी एक नज़र में दिख जाती है।
  5. दो तसवीरों का विश्लेषण — चित्र 1 और चित्र 2 की तरह आज के दो विज्ञापन चुनिए और लिखिए कि वे किस चीज़ को ‘प्रगति’ के रूप में दिखा रहे हैं और क्या छिपा रहे हैं।

9. और पढ़ने के लिए

पुस्तक / स्रोतकिस विषय पर
एच.जे. डायोस एवं माइकल वुल्फ (सं.), ‘द विक्टोरियन सिटी: इमेजेज़ एंड रियेलिटीज़’ (1973)यही वह पुस्तक है जिससे पाठ्यपुस्तक ने स्रोत-क (बिल थोर्न) लिया है
जे.एल. हैमंड एवं बी. हैमंड, ‘द स्किल्ड लेबरर 1760–1832’स्रोत-ख का मूल स्रोत; ब्रिटेन के कुशल मज़दूरों का इतिहास
मीना मेनन एवं नीरा अदरकर, ‘वन हंड्रेड इयर्स: वन हंड्रेड वॉइसेज़’ (2004)स्रोत-ङ और स्रोत-च का स्रोत; बंबई के मिल मज़दूरों की अपनी ज़ुबानी
सुमित गुहा, ‘द हैंडलूम इंडस्ट्री इन सेंट्रल इंडिया, 1825–1950’स्रोत-घ का स्रोत; मध्य भारत के बुनकरों का विस्तृत अध्ययन
NCERT कक्षा 10, अध्याय 3 — ‘भूमंडलीकृत विश्व का बनना’इस अध्याय की पिछली कड़ी; दोनों को साथ पढ़ने से पूरी तस्वीर बनती है

10. शिक्षक के लिए एक अंतिम टिप्पणी

इस अध्याय का असली शैक्षिक मूल्य एक विचार में है —

“हर बड़ा बदलाव किसी न किसी की क़ीमत पर आता है। सवाल यह है कि क़ीमत कौन चुका रहा है और फ़ायदा किसे मिल रहा है।”

  • स्पिनिंग जेनी से उत्पादन बढ़ा — क़ीमत हाथ से कातने वाली औरतों ने चुकाई।
  • मैनचेस्टर का कपड़ा सस्ता था — क़ीमत भारतीय बुनकर ने चुकाई।
  • कंपनी को नियमित आपूर्ति मिली — क़ीमत उन बुनकरों ने चुकाई जिन पर कोड़े बरसाए गए।
  • कारख़ानों में उत्पादन बढ़ा — क़ीमत उन मज़दूरों ने चुकाई जिन्हें दस घंटे की शिफ़्ट में शाम पाँच से सुबह तीन बजे तक काम करना पड़ता था।

अगर विद्यार्थी यह एक बात समझ जाए, तो वह इस अध्याय को भी समझ जाएगा और आज की हर नयी तकनीक के बारे में यही सवाल पूछना सीख जाएगा — “इससे फ़ायदा किसे और नुक़सान किसे?”