अध्याय 3 — भूमंडलीकृत विश्व का बनना · भारत और समकालीन विश्व-2 · कक्षा 10
कक्षा — 10 · विषय — इतिहास (भारत और समकालीन विश्व–2) · पृष्ठ — 53 से 78
तुम्हारे बैग में कितने देश बैठे हैं?
पेंसिल · मोबाइल · जूते · कैलकुलेटर हर चीज़ पर देखिए — कहाँ बनी है? अगर तुम्हारी चीज़ किसी और देश में बनी है, तो तुम उस देश से जुड़े हुए हो
सबसे पहले एक ग़लतफ़हमी तोड़िए
भूमंडलीकृत विश्व के बनने की प्रक्रिया — व्यापार का, काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते लोगों का, पूँजी व बहुत सारी चीज़ों की वैश्विक आवाजाही का — एक लंबा इतिहास रहा है।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 53
वैश्वीकरण पिछले पचास साल की चीज़ नहीं है — यह हज़ारों साल पुराना है
दुनिया पहले से जुड़ी थी — तीन प्रमाण
पृष्ठ 53
- 3,000 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी की सभ्यता समुद्री व्यापार से पश्चिमी एशिया से जुड़ी हुई थी
- हज़ार साल से ज़्यादा समय से मालदीव की कौड़ियाँ चीन और पूर्वी अफ़्रीका तक पहुँचती रही हैं — इन्हें मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था
- बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं का इतिहास सातवीं सदी तक ढूँढा जा सकता है
- तेरहवीं सदी के बाद तो इनका प्रसार साफ़ देखा जा सकता है
यात्री केवल सामान नहीं — पैसा, मूल्य-मान्यताएँ, हुनर, विचार, आविष्कार और कीटाणु व बीमारियाँ भी साथ ले जाते थे
1 | आधुनिक युग से पहले | सिल्क मार्ग, भोजन और बीमारी
सिल्क मार्ग — दुनिया का सबसे पुराना जुड़ाव
पृष्ठ 54
- नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस मार्ग से पश्चिम को भेजा जाने वाला चीनी रेशम (सिल्क) बहुत महत्त्वपूर्ण था
- ये मार्ग ज़मीन या समुद्र से होकर गुज़रते थे
- ईसा पूर्व के समय से लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक अस्तित्व में रहे
- एशिया के विशाल क्षेत्रों को आपस में, और एशिया को यूरोप व उत्तरी अफ़्रीका से जोड़ते थे
- पश्चिम को गया — चीनी पॉटरी, तथा भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े और मसाले
- पूरब को आया — सोने-चाँदी जैसी क़ीमती धातुएँ
“व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान, दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती थीं”
इस रास्ते धर्म भी चले
पृष्ठ 54
| धर्म | किस दिशा में |
|---|---|
| ईसाई मत | शुरुआती काल के मिशनरी इसी मार्ग से एशिया में आए |
| इस्लाम | कुछ सदी बाद मुस्लिम धर्मोपदेशक इसी रास्ते दुनिया में फैले |
| बौद्ध धर्म | इससे भी बहुत पहले पूर्वी भारत में उपजा यह धर्म सिल्क मार्ग की शाखाओं से कई दिशाओं में फैल चुका था |
सड़क एक थी — सामान भी चला और विचार भी
भोजन की यात्रा
पृष्ठ 54–55
- जब भी व्यापारी और मुसाफ़िर किसी नए देश में जाते थे, जाने-अनजाने वहाँ नयी फ़सलों के बीज बो आते थे
- माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम पहुँचे और वहीं से स्पैघेत्ती का जन्म हुआ
- दूसरी संभावना — पास्ता अरब यात्रियों के साथ पाँचवीं सदी में सिसली पहुँचा
- आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च और शकरकंद लगभग पाँच सौ साल पहले हमारे पूर्वजों के पास नहीं थे
- ये तब आए जब क्रिस्टोफ़र कोलंबस ग़लती से अमेरिका पहुँच गया
ये सारे खाद्य पदार्थ अमेरिका के मूल निवासियों यानी अमेरिकन इंडियनों से हमारे पास आए हैं
आलू ने दो काम किए — एक भला, एक भयानक
साधारण से आलू ने यूरोप के ग़रीबों का भोजन बेहतर कर दिया और उनकी औसत उम्र बढ़ा दी। पर आयरलैंड के काश्तकार उस पर इतने निर्भर हो चुके थे कि 1840 के दशक के मध्य में फ़सल ख़राब होने पर लाखों लोग भुखमरी से मर गए
1845 से 1849 के बीच लगभग 10,00,000 लोग मारे गए और इससे दोगुने लोग घर-बार छोड़कर चले गए
विजय हथियारों से नहीं, बीमारी से हुई
यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताक़त के दम पर नहीं जीतती थीं। स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्तिशाली हथियारों में परंपरागत क़िस्म का सैनिक हथियार तो कोई था ही नहीं। यह हथियार तो चेचक जैसे कीटाणु थे।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 55
लाखों साल से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी
चेचक — जिसने एक महाद्वीप जीत लिया
पृष्ठ 55–56
- इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई
- एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई
- जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे
- इसने पूरे के पूरे समुदायों को ख़त्म कर डाला
- इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया
बंदूक़ को तो ख़रीद या छीन कर हमलावरों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता था — चेचक को नहीं
और उन्होंने इसे ‘वरदान’ कहा
देशी जनता … छोटी चेचक के कारण लगभग पूरी ख़त्म हो चुकी थी। इस तरह परमेश्वर ने हमारी मिल्कीयत पर हमें मालिकाना दे दिया।
जॉन विनथॉर्प, मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी के पहले गवर्नर, मई 1634 — बॉक्स 1
स्रोत — अल्फ़्रेड क्रॉस्बी, ‘इकोलॉजिकल इंपीरियलिज़्म’
व्यापार का केंद्र पश्चिम कैसे खिसका
पृष्ठ 56
- उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में ग़रीबी और भूख का ही साम्राज्य था
- शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और बीमारियों का बोलबाला था
- धार्मिक असंतुष्टों को कड़ा दंड दिया जाता था, इसलिए हज़ारों लोग भागकर अमेरिका जाने लगे
- अठारहवीं शताब्दी तक भी चीन और भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में गिने जाते थे
- पर पंद्रहवीं सदी से चीन दूसरे देशों से संबंध कम करके अलग-थलग पड़ने लगा
चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्त्व के चलते अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया
2 | उन्नीसवीं शताब्दी | 1815 से 1914
तीन प्रवाह — यह अध्याय की सबसे ज़रूरी परिभाषा है
पृष्ठ 57 — सामान · आदमी · पैसा
| प्रवाह | परिभाषा | भारत का उदाहरण |
|---|---|---|
| व्यापार | मुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा या गेहूँ) के व्यापार तक सीमित | ब्रिटेन को कच्चा कपास, चीन को अफ़ीम |
| श्रम | लोग काम या रोज़गार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं | त्रिनिदाद और फ़िजी गए गिरमिटिया मज़दूर |
| पूँजी | अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में निवेश | भारत में रेलवे और पंजाब की नहरें |
“वस्तुओं या पूँजी की आवाजाही के मुक़ाबले श्रमिकों की आवाजाही पर प्राय: ज़्यादा शर्तें और बंदिशें लगाई जाती थीं”
कॉर्न लॉ — एक क़ानून जिसने दुनिया बदल दी
पृष्ठ 57
- अठारहवीं सदी के आख़िरी दशकों में ब्रिटेन की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी थी
- भोजन की माँग बढ़ी और कृषि उत्पाद महँगे होने लगे
- बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी
- इन क़ानूनों को ‘कॉर्न लॉ’ कहा जाता था
- ऊँची क़ीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों ने सरकार को इसे फ़ौरन समाप्त करने पर मजबूर कर दिया
क़ानून से ज़मींदार को फ़ायदा था और शहर के मज़दूर को नुक़सान
कॉर्न लॉ हटने के बाद क्या हुआ
पृष्ठ 57 — यह सीधे 4 अंक का प्रश्न है
- 1बहुत कम क़ीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाने लगा
- 2आयातित खाद्य पदार्थों की लागत ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम थी
- 3ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे मुक़ाबला नहीं कर सकते थे
- 4विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई और हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए
- 5गाँवों से उजड़ कर वे या तो शहरों में या दूसरे देशों में जाने लगे
और उधर ब्रिटेन में उपभोग बढ़ा तो पूरी दुनिया में उसका पेट भरने के लिए ज़मीनें साफ़ करके खेती होने लगी
और लोग घर छोड़कर निकल पड़े
उन्नीसवीं सदी में यूरोप के लगभग पाँच करोड़ लोग अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जाकर बस गए। माना जाता है कि पूरी दुनिया में लगभग पंद्रह करोड़ लोग बेहतर भविष्य की चाह में अपने घर-बार छोड़कर दूर-दूर के देशों में जाकर काम करने लगे थे
1890 तक एक वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी
दुनिया कितनी बदल गई थी
अब भोजन किसी आसपास के गाँव या क़स्बे से नहीं बल्कि हज़ारों मील दूर से आने लगा था। अब यह काम ऐसे औद्योगिक मज़दूर करने लगे थे जो संभवत: हाल ही में वहाँ आए थे और ऐसे खेतों में काम कर रहे थे जहाँ महज़ एक पीढ़ी पहले संभवत: ठेठ जंगल रहे होंगे।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 59
1820 से 1914 के बीच विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृद्धि हुई; उसमें लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा प्राथमिक उत्पादों का था
भारत का अपना उदाहरण — पंजाब की नहर बस्ती
पृष्ठ 59
- ब्रिटिश भारतीय सरकार ने पंजाब की अर्द्ध-रेगिस्तानी परती ज़मीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया
- उद्देश्य था कि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास की खेती की जा सके
- नयी नहरों की सिंचाई वाले इलाक़ों में पंजाब के अन्य स्थानों के लोगों को लाकर बसाया गया
- उनकी बस्तियों को केनाल कॉलोनी (नहर बस्ती) कहा जाता था
भोजन तो सिर्फ़ एक उदाहरण है — कपास और रबड़ की कहानी भी यही है
तकनीक ने मांस को सस्ता कैसे किया
पृष्ठ 60 — यह अभ्यास प्रश्न 4 है
पहले (1870 के दशक तक)
- केवल जिंदा जानवर भेजे जाते थे
- वे बहुत ज़्यादा जगह घेरते थे
- बहुत सारे सफ़र में मर जाते या बीमार पड़ जाते थे
- मांस महँगा था और ग़रीबों की पहुँच से बाहर
बाद में (रेफ़्रिजरेशन के बाद)
- जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा
- अब जानवर नहीं, मांस भेजा जाने लगा
- समुद्री ख़र्च घटा और मांस के दाम गिर गए
- ग़रीबों के भोजन में मांसाहार, मक्खन और अंडे शामिल हो गए
और सबसे बड़ी बात — जीवनस्थिति सुधरी तो दूसरे देशों में साम्राज्यवादी मंसूबों को समर्थन मिलने लगा
3 | उपनिवेशवाद का स्याह पक्ष | अफ़्रीका
एटलस खोलिए और अफ़्रीका देखिए
आप पाएँगे कि वहाँ के कुछ देशों की सीमाएँ तो बिलकुल सीधी लकीर जैसी हैं मानो उन्हें फुट्टा (Scale) रखकर खींचा गया हो। दुर्भाग्यवश, यही हुआ भी था।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 61
1885 में यूरोप के ताक़तवर देशों की बर्लिन में एक बैठक हुई जिसमें अफ़्रीका के नक़्शे पर लकीरें खींचकर उसे आपस में बाँट लिया गया
अफ़्रीका की समस्या यूरोपीयों के लिए
पृष्ठ 62
- प्राचीन काल से ही अफ़्रीका में ज़मीन की कभी कोई कमी नहीं रही जबकि वहाँ की आबादी बहुत कम थी
- सदियों तक अफ़्रीकियों की ज़िंदगी और कामकाज ज़मीन तथा पालतू पशुओं के सहारे ही चलता रहा
- वहाँ पैसे या वेतन पर काम करने का चलन नहीं था
- यूरोपीय लोग बागानी खेती और खदानों का दोहन करना चाहते थे
- लेकिन वहाँ एक ऐसी समस्या पेश आई जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी — वहाँ के लोग तनख़्वाह पर काम नहीं करना चाहते थे
“अगर आपके पास ज़मीन और पालतू पशु होते तो शायद आपको भी यह बात समझ में नहीं आती कि वेतन के लिए काम करने की क्या ज़रूरत है”
मज़दूर पाने के तीन हथकंडे
पृष्ठ 62–63
| हथकंडा | उद्देश्य |
|---|---|
| उन पर भारी भरकम कर लाद दिए गए, जिनका भुगतान केवल तभी हो सकता था जब करदाता बागानों या खदानों में काम करता हो | लोगों को मज़दूरी करने पर मजबूर करना |
| उत्तराधिकार क़ानून बदल दिए गए — अब परिवार के केवल एक ही सदस्य को पैतृक संपत्ति मिलेगी | परिवार के बाक़ी लोगों को श्रम बाज़ार में ढकेलना |
| खानकर्मियों को बाड़ों में बंद कर दिया गया और उनके खुलेआम घूमने-फिरने पर पाबंदी लगा दी गई | मज़दूरों को भागने से रोकना |
“तभी वहाँ रिंडरपेस्ट नामक विनाशकारी पशु रोग फैल गया”
रिंडरपेस्ट का सफ़र
पृष्ठ 63
- 1880 के दशक के आख़िरी सालअफ़्रीका में यह बीमारी पहली बार दिखाई दी
- —एरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों के लिए एशियाई देशों से लाए गए जानवरों के ज़रिये पहुँची
- —पूर्वी हिस्से से ‘जंगल की आग’ की तरह पश्चिमी अफ़्रीका की तरफ़ बढ़ने लगी
- 1892अफ़्रीका के अटलांटिक तट तक जा पहुँची
- पाँच साल बादकेप यानी अफ़्रीका के धुर दक्षिणी हिस्से तक भी पहुँच गई
इसने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया
और अफ़्रीका ग़ुलाम बन गया
पशुओं के ख़त्म हो जाने से अफ़्रीकियों के रोज़ी-रोटी के साधन ही ख़त्म हो गए। बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे-खुचे पशु भी अपने क़ब्ज़े में ले लिए
इससे यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ़्रीका को जीतने व ग़ुलाम बना लेने का बेहतरीन मौक़ा हाथ लग गया
4 | गिरमिटिया मज़दूर | भारत से दुनिया तक
अनुबंध क्या था और लोग क्यों गए
पृष्ठ 63–64
- उन्नीसवीं सदी में भारत और चीन के लाखों मज़दूरों को बागानों, खदानों और रेलवे निर्माण के लिए दूर देशों में ले जाया जाता था
- अनुबंध की शर्त थी कि यदि मज़दूर मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लें तो वे स्वदेश लौट सकते हैं
- वे मौजूदा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाक़ों से जाते थे
- वहाँ कुटीर उद्योग ख़त्म हो रहे थे और ज़मीन का भाड़ा बढ़ गया था
- वे बँटाई पर ज़मीन तो ले लेते थे लेकिन भाड़ा नहीं चुका पाते थे, इसलिए उन पर क़र्ज़ा चढ़ने लगा
काम की तलाश में उन्हें अपने घर-बार छोड़ने पड़े
वे कहाँ भेजे जाते थे
पृष्ठ 64
| गंतव्य | विवरण |
|---|---|
| कैरीबियाई द्वीप समूह | मुख्यत: त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम |
| मॉरिशस और फ़िजी | बागानों में काम के लिए |
| सीलोन और मलाया | तमिल आप्रवासी यहाँ जाकर काम करते थे |
| असम | यहाँ के चाय बागानों में भी बहुत सारे अनुबंधित श्रमिक ले जाए जाते थे |
मज़दूर को यह तक नहीं बताया जाता था कि उसे लंबी समुद्री यात्रा पर जाना है
भर्ती में धोखा
पृष्ठ 64
- मज़दूरों की भर्ती का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे और उन्हें कमीशन मिलता था
- एजेंट भावी आप्रवासियों को फुसलाने के लिए झूठी जानकारियाँ देते थे
- कहाँ जाना है, क्या काम करना होगा और वहाँ जीवन के हालात कैसे होंगे — इस बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती थी
- बहुत सारे आप्रवासियों को यह भी नहीं बताया जाता था कि उन्हें लंबी समुद्री यात्रा पर जाना है
- अगर कोई मज़दूर अनुबंध के लिए राजी नहीं होता था तो एजेंट उसका अपहरण तक कर लेते थे
इसीलिए इस व्यवस्था को ‘नयी दास प्रथा’ का नाम दिया गया
एक गिरमिटिया मज़दूर की आपबीती
कुछ ही दिनों के भीतर मेरे हाथ सब जगह से छिल गए और मैं हफ़्ते भर तक काम पर नहीं जा पाया जिसके लिए मुझे सज़ा दी गई और 14 दिन जेल में काटने पड़े। … अगर काम संतोषजनक ढंग से पूरा न हुआ तो तनख़्वाह भी काट ली जाती थी।
राम नारायण तिवारी, डेमेरारा — स्रोत-क, 1916
नयी जगह की जीवन एवं कार्य स्थितियाँ कठोर थीं और मज़दूरों के पास क़ानूनी अधिकार कहने भर को भी नहीं थे
पर उन्होंने नयी संस्कृति भी रच दी
पृष्ठ 64 — मेला · धर्म · गाना
| रचना | कहाँ और क्या |
|---|---|
| होसे | त्रिनिदाद में मुहर्रम के जुलूस को विशाल उत्सवी मेले का रूप दिया गया; नाम इमाम हुसैन के नाम पर पड़ा और उसमें सभी धर्मों व नस्लों के मज़दूर हिस्सा लेते थे |
| रास्ताफ़ारियानवाद | यह विद्रोही धर्म, जिसे जमैका के रैगे गायक बॉब मार्ले ने ख्याति के शिखर पर पहुँचाया |
| चटनी म्यूज़िक | त्रिनिदाद और गुयाना का मशहूर संगीत, जो भारतीय आप्रवासियों के पहुँचने के बाद सामने आया |
“अलग-अलग स्थानों की चीज़ें आपस में घुल-मिल जाती थीं और बिलकुल नया रूप सामने आता था”
और आज उनके वंशज कौन हैं?
राष्ट्रवादी नेताओं के दबाव के कारण 1921 में अनुबंध प्रथा ख़त्म कर दी गई। उनकी राय में यह बहुत अपमानजनक और क्रूर व्यवस्था थी
आज उनके वंशज — नोबेल विजेता साहित्यकार वी. एस. नायपॉल और वेस्ट इंडीज़ के क्रिकेट खिलाड़ी शिवनरैन चंद्रपॉल तथा रामनरेश सरवन
5 | भारतीय व्यापार और उपनिवेशवाद | जो बदल गया
भारत तैयार माल से कच्चे माल पर आ गया
पृष्ठ 66–67 — आँकड़े याद रखिए
| वर्ष | निर्यात में सूती कपड़ा | निर्यात में कच्चा कपास |
|---|---|---|
| 1800 के आसपास | 30 प्रतिशत | — |
| 1812 | — | 5 प्रतिशत |
| 1815 | 15 प्रतिशत | — |
| 1870–71 | केवल 3 प्रतिशत | 35 प्रतिशत |
तैयार माल बेचने में मुनाफ़ा ज़्यादा है और कच्चा माल बेचने में कम — इसीलिए भारत ग़रीब होता चला गया
यह कैसे हुआ
पृष्ठ 65–67
- औद्योगीकरण के बाद ब्रिटेन में भी कपास का उत्पादन बढ़ने लगा था
- वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कपास के आयात पर रोक लगाए
- फलस्वरूप ब्रिटेन में आयातित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए
- ब्रिटिश बाज़ारों से बेदख़ल होने के बाद भारतीय कपड़ों को दूसरे बाज़ारों में भी भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा
- कपड़ों की रँगाई के लिए इस्तेमाल होने वाले नील का भी कई दशक तक बड़े पैमाने पर निर्यात होता रहा
- 1820 के दशक से चीन को बड़ी मात्रा में अफ़ीम का निर्यात किया जाने लगा
अफ़ीम का त्रिकोण — भारत (अफ़ीम) → चीन (पैसा) → ब्रिटेन (चाय)
व्यापार अधिशेष और होम चार्जेज
भारत के साथ ब्रिटेन हमेशा ‘व्यापार अधिशेष’ की अवस्था में रहता था। इसका मतलब है कि आपसी व्यापार में हमेशा ब्रिटेन को ही फ़ायदा रहता था।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 67
इसी अधिशेष से ‘होम चार्जेज’ चुकाए जाते थे — ब्रितानी अफ़सरों की घर भेजी गई निजी रकम, भारतीय क़र्ज़ों पर ब्याज और उनकी पेंशन। यानी भारत अपने ही शोषण का ख़र्च ख़ुद उठा रहा था
6 | महायुद्धों के बीच | 1914 से 1945
पहला विश्वयुद्ध — दो खेमे
पृष्ठ 68
| खेमा | देश |
|---|---|
| मित्र राष्ट्र | ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस |
| केंद्रीय शक्तियाँ | जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन तुर्की |
अगस्त 1914 में सरकारों को लगता था कि यह क्रिसमस तक ख़त्म हो जाएगा — पर यह चार साल से भी ज़्यादा चला
पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध
पृष्ठ 68–69
- दुनिया के सबसे अगुआ औद्योगिक राष्ट्र एक-दूसरे से जूझ रहे थे
- मशीनगनों, टैंकों, हवाई जहाज़ों और रासायनिक हथियारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल हुआ
- युद्ध में 90 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए
- मृतकों और घायलों में से ज़्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे
- परिवार के सदस्य घट जाने से युद्ध के बाद परिवारों की आय भी गिर गई
- मर्द मोर्चे पर जाने लगे तो घर की औरतों को वे काम सँभालने बाहर आना पड़ा जिन्हें अब तक केवल मर्दों का काम माना जाता था
इस युद्ध ने अमेरिका को क़र्ज़दार की बजाय कर्ज़दाता देश बना दिया
युद्ध के बाद का संकट
पृष्ठ 69
- युद्ध से पहले ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था; युद्ध के बाद सबसे लंबा संकट उसे ही झेलना पड़ा
- जिस समय ब्रिटेन युद्ध से जूझ रहा था उसी समय भारत और जापान में उद्योग विकसित होने लगे थे
- युद्ध ख़त्म होने तक ब्रिटेन भारी विदेशी क़र्ज़ों में दब चुका था
- 1921 में हर पाँच में से एक ब्रिटिश मज़दूर के पास काम नहीं था
- युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में गेहूँ की पैदावार सुधरी तो विश्व बाज़ारों में गेहूँ की अति हो गई
अनाज की क़ीमतें गिर गईं, ग्रामीण आय कम हो गई और किसान गहरे क़र्ज़ संकट में फँस गए
हेनरी फ़ोर्ड और असेंबली लाइन
पृष्ठ 70
- 1920 के दशक की अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ख़ासियत थी बृहत उत्पादन का चलन
- फ़ोर्ड ने शिकागो के एक बूचड़ख़ाने की असेंबली लाइन की तर्ज़ पर डेट्रॉयट में आधुनिक असेंबली लाइन स्थापित की
- मज़दूरों को एक ही काम मशीनी ढंग से बार-बार करते रहना होता था
- काम की रफ़्तार इस बात से तय होती थी कि कन्वेयर बेल्ट किस रफ़्तार से चलती है
- कोई मज़दूर ढील करने या कुछ पल का अवकाश लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था
- और तो और, इस व्यवस्था में मज़दूर अपने साथियों से बातचीत भी नहीं कर सकते थे
नतीजा — हर तीन मिनट में एक कार तैयार होकर निकलने लगी; टी-मॉडल बृहत उत्पादन से बनी पहली कार थी
मज़दूर भाग रहे थे, तो फ़ोर्ड ने क्या किया
असेंबली लाइन की थकान झेलना मुश्किल था और बहुत सारे मज़दूरों ने काम छोड़ दिया। इसलिए फ़ोर्ड ने हताश होकर जनवरी 1914 से वेतन दोगुना यानी 5 डॉलर प्रतिदिन कर दिया — और साथ ही ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर पाबंदी भी लगा दी
मुनाफ़े की भरपाई के लिए वे असेंबली लाइन की रफ़्तार बार-बार बढ़ाने लगे; मज़दूरों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता रहा
बीस के दशक की चमक — और उसकी असलियत
पृष्ठ 71
जो दिख रहा था
- 1919 में 20 लाख कारें, 1929 में 50 लाख से ऊपर
- लोग फ़्रिज, वॉशिंग मशीन, रेडियो और ग्रामोफ़ोन ख़रीदने लगे
- 1923 में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज़दाता देश बन गया
जो नहीं दिख रहा था
- ये सब चीज़ें ‘हायर-परचेज़’ के तहत क़र्ज़ पर ख़रीदी जाती थीं
- क़ीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाई जाती थी
- घरों का निर्माण या ख़रीदारी भी क़र्ज़ पर ही की जा रही थी
“लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक क़ायम नहीं रह पाई”
7 | महामंदी | 1929 से तीस के दशक के मध्य तक
महामंदी के तीन कारण
पृष्ठ 71–72 — यह अभ्यास प्रश्न 8 है
| कारण | विवरण |
|---|---|
| कृषि में अति उत्पादन | क़ीमतें गिरीं तो किसानों ने आय बनाए रखने के लिए और ज़्यादा उगाया; बाज़ार में आमद बढ़ी, क़ीमतें और गिरीं और उपज पड़ी-पड़ी सड़ने लगी |
| अमेरिकी क़र्ज़ों का खिंच जाना | 1928 के पहले छह माह विदेशों में अमेरिका का क़र्ज़ा एक अरब डॉलर था; साल भर में घटकर केवल चौथाई रह गया |
| बैंकों का धराशायी होना और सीमा शुल्क | यूरोप में बड़े बैंक डूबे, मुद्राओं की क़ीमत गिरी; अमेरिका ने आयात पर दो गुना सीमा शुल्क लगाकर विश्व व्यापार की कमर तोड़ दी |
जो बात एक किसान के लिए समझदारी है, वही सब किसानों के लिए एक साथ करने पर नुक़सान बन जाती है
अमेरिका में क्या हुआ
पृष्ठ 72
- बैंकों ने घरेलू क़र्ज़ें देना बंद कर दिया और जो दिए जा चुके थे उनकी वसूली तेज़ कर दी
- किसान उपज नहीं बेच पा रहे थे, परिवार तबाह हो गए और कारोबार ठप पड़ गए
- बहुत सारे परिवारों के मकान, कार और सारी ज़रूरी चीज़ें कुर्क कर ली गईं
- बीस के दशक की उपभोक्तावादी संपन्नता धूल के गुबार की तरह रातोंरात काफ़ूर हो गई
- 1933 तक 4,000 से ज़्यादा बैंक बंद हो चुके थे
- 1929 से 1932 के बीच तक़रीबन 1,10,000 कंपनियाँ चौपट हो चुकी थीं
1935 तक उबरने के संकेत तो दिखे, पर लोगों के दिलो-दिमाग़ पर पड़ी छाप जल्दी मिटने वाली नहीं थी
भारत और महामंदी
पृष्ठ 72–73 — यह 4 अंक का पक्का प्रश्न है
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1928 से 1934 | देश के आयात-निर्यात घटकर लगभग आधे रह गए |
| 1928 से 1934 | भारत में गेहूँ की क़ीमत 50 प्रतिशत गिर गई |
| कच्चा पटसन | टाट का निर्यात बंद होने पर क़ीमतों में 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरावट |
कृषि क़ीमतें गिरने के बावजूद सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साफ़ इनकार कर दिया
बंगाल के एक कवि ने लिखा
चलो भाइयों, नक़द की उम्मीद में और ज़्यादा पटसन तुम उगाओ / लागत और क़र्ज़ें में पिसकर नाउम्मीदी पाओ / सारी पूँजी लगा-फँसाकर फ़सल खड़ी कर जाओ / …घर पर बैठे बनिये देंगे पाँच रुपये मन भाव
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 73
मुनाफ़ा बिचौलिये का, नुक़सान किसान का
और उसी साल आंदोलन शुरू हुआ
मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था। उसी समय महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया
यही इस अध्याय का अध्याय 2 से सबसे बड़ा जोड़ है — विश्व अर्थव्यवस्था के संकट ने भारत की राजनीति बदल दी
8 | पुनर्निर्माण | ब्रेटन वुड्स से आज तक
दूसरा विश्वयुद्ध और दो सबक़
पृष्ठ 74–75
- छह साल चला यह युद्ध ज़मीन, हवा और पानी में असंख्य मोर्चों पर लड़ा गया
- क़रीब 6 करोड़ लोग मारे गए, जो 1939 की वैश्विक जनसंख्या का लगभग 3 प्रतिशत था
- अब तक के युद्धों में मोर्चे पर मरने वाले ज़्यादा होते थे; इस युद्ध में ऐसे लोग ज़्यादा मरे जो किसी मोर्चे पर लड़ नहीं रहे थे
- पहला सबक़ — बृहत उत्पादन वाले समाज को व्यापक उपभोग के बिना क़ायम नहीं रखा जा सकता; इसके लिए स्थिर आय और पूर्ण रोज़गार ज़रूरी हैं
- पर बाज़ार पूर्ण रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकता, इसलिए आर्थिक स्थिरता केवल सरकारी हस्तक्षेप से ही सुनिश्चित हो सकती थी
- दूसरा सबक़ — पूर्ण रोज़गार तभी संभव है जब सरकार के पास वस्तुओं, पूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रित करने की ताक़त हो
यही सोच ब्रेटन वुड्स व्यवस्था की नींव बनी
ब्रेटन वुड्स — पूरी तालिका एक जगह
पृष्ठ 75 — यह अभ्यास प्रश्न 5 है
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कब और कहाँ? | जुलाई 1944, अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर |
| नाम? | संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन |
| आई.एम.एफ़. का काम | सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटना |
| विश्व बैंक का काम | युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतज़ाम करना |
| कब से काम शुरू? | 1947 |
| नियंत्रण किसका? | पश्चिमी औद्योगिक देशों का; अमेरिका किसी भी फ़ैसले को वीटो कर सकता है |
याद रखने का सूत्र — “बैंक बनाता है, फंड सँभालता है”
ब्रेटन वुड्स का सुनहरा दौर
1950 से 1970 के बीच विश्व व्यापार की विकास दर सालाना 8 प्रतिशत से भी ज़्यादा रही और वैश्विक आय लगभग 5 प्रतिशत की दर से बढ़ी
इस दौरान अधिकांश औद्योगिक देशों में बेरोज़गारी औसतन 5 प्रतिशत से भी कम रही
पर आज़ादी का मतलब आर्थिक आज़ादी नहीं थी
विडंबना यह थी कि नवस्वाधीन राष्ट्रों के रूप में भी अपनी जनता को ग़रीबी और पिछड़ेपन की गर्त से बाहर निकालने के लिए उन्हें ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की मदद लेनी पड़ी जिन पर भूतपूर्व औपनिवेशिक शक्तियों का ही वर्चस्व था।
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 76
आई.एम.एफ़. और विश्व बैंक का गठन तो औद्योगिक देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही किया गया था
जी-77 की चार माँगें
पृष्ठ 76 — यह अभ्यास प्रश्न 9 है
- ज़्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज़ प्रगति से कोई लाभ नहीं हुआ
- इसलिए उन्होंने नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO) के लिए आवाज़ उठाई और समूह 77 (जी-77) के रूप में संगठित हो गए
- पहली माँग — अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण मिले
- दूसरी माँग — विकास के लिए अधिक सहायता मिले
- तीसरी माँग — कच्चे माल के सही दाम मिलें
- चौथी माँग — अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाज़ारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले
जी-77 को ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है
ब्रेटन वुड्स कैसे टूटी
पृष्ठ 77
- साठ के दशक से विदेशों में अपनी गतिविधियों की भारी लागत ने अमेरिका की वित्तीय और प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमज़ोर कर दिया
- सोने की तुलना में डॉलर की क़ीमत गिरने लगी थी
- अंतत: स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था विफल हो गई और अस्थिर विनिमय दर की व्यवस्था शुरू की गई
- विकासशील देशों को पश्चिम के व्यावसायिक बैंकों और निजी ऋणदाताओं से क़र्ज़ लेना पड़ने लगा, जिससे बार-बार क़र्ज़ संकट पैदा होने लगा
- अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में यह समस्या सबसे ज़्यादा दिखाई दी
- सत्तर के दशक के आख़िर से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ एशिया के ऐसे देशों में उत्पादन केंद्रित करने लगीं जहाँ वेतन कम थे
चीन 1949 की क्रांति के बाद अलग-थलग था, पर नयी आर्थिक नीतियों के बाद वह दोबारा विश्व अर्थव्यवस्था का अंग बन गया
और अंत में — तुम्हारे हाथ का फ़ोन
क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि हमारे ज़्यादातर टेलीविज़न, मोबाइल फ़ोन और खिलौने चीन में बने होते हैं या वहाँ के जैसे ही लगते हैं? यह चीनी अर्थव्यवस्था की अल्प लागत और ख़ास तौर से वहाँ के कम वेतनों का नतीजा है।
पाठ्यपुस्तक का अंतिम भाग, पृष्ठ 77
“पिछले दो दशक में भारत, चीन और ब्राज़ील आदि देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आए भारी बदलावों के कारण दुनिया का आर्थिक भूगोल पूरी तरह बदल चुका है”
पूरा अध्याय एक तालिका में
यह याद कर लीजिए — पूरा अध्याय इसी में है
| काल | जुड़ी या टूटी | कैसे |
|---|---|---|
| प्राचीन से 15वीं सदी | जुड़ी | सिल्क मार्ग, कौड़ियाँ, बौद्ध धर्म का प्रसार |
| 16वीं सदी | जुड़ी, पर हिंसक ढंग से | अमेरिका की ‘खोज’, चाँदी, नयी फ़सलें, चेचक |
| 1815 से 1914 | सबसे ज़्यादा जुड़ी | तीन प्रवाह; रेलवे, भाप जहाज़, टेलिग्राफ़ |
| 1914 से 1945 | टूटी | दो महायुद्ध, महामंदी, ऊँचे सीमा शुल्क |
| 1945 से 1970 | फिर जुड़ी | ब्रेटन वुड्स, स्थिर विनिमय दर, आई.एम.एफ़. |
| 1970 के बाद | नए ढंग से जुड़ी | अस्थिर दर, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, चीन का लौटना |
तीन बीमारियाँ, एक ही पैटर्न
चेचक (अमेरिका) — मूल निवासी ख़त्म, स्पेनिश विजय आसान · आलू की बीमारी (आयरलैंड) — 10 लाख मरे, दोगुने पलायन कर गए · रिंडरपेस्ट (अफ़्रीका) — 90% मवेशी मरे, अफ़्रीकी मज़दूर बने
तीनों में एक ही बात है — बीमारी उस समाज को तोड़ती है जो उसके लिए तैयार नहीं था, और उस तोड़-फोड़ का फ़ायदा हमलावर उठाता है
अध्याय का असली सबक़
दुनिया जुड़ती गई, पर इस जुड़ाव से सबको एक जैसा लाभ नहीं हुआ।
पूरे अध्याय का सार
असली सवाल यह नहीं कि जुड़ाव अच्छा है या बुरा — असली सवाल यह है कि जुड़ाव की शर्तें कौन तय कर रहा है
और चार तारीख़ें — बस इतना पक्का कर लीजिए
1885 बर्लिन बैठक · 1929 महामंदी · 1944 ब्रेटन वुड्स · 1947 विश्व बैंक और आई.एम.एफ़. ने काम शुरू किया
और पाँच आँकड़े — 90% (रिंडरपेस्ट) · 5 करोड़ (यूरोप से पलायन) · 3% (1870 में सूती कपड़ा) · 50% (गेहूँ की क़ीमत में गिरावट) · 6 करोड़ (द्वितीय विश्वयुद्ध)