अध्याय 6लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

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चिह्न: 📖 = पाठ्यपुस्तक में स्पष्ट रूप से परिभाषित · 📄 = पाठ में प्रयुक्त, अर्थ निहित · ➕ = पाठ से बाहर, समझ के लिए जोड़ा गया (संवर्धन)


भाग क · आपातकाल से जुड़े संवैधानिक पद

1 📄 आपातकाल(Emergency) — अनुच्छेद 352★★

पाठ: “25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया। इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।”

★★व्यावहारिक अर्थ — दो बड़े बदलाव:

#बदलाव
1“शक्तियों के बँटवारे का संघीय ढाँचा व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है और सारी शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथ में चली आती हैं।”
2“सरकार चाहे तो… किसी एक अथवा सभी मौलिक अधिकारों पर रोक लगा सकती है अथवा उनमें कटौती कर सकती है।”

और संविधान की मूल भावना: “आपातकाल को वहाँ एक असाधारण स्थिति के रूप में देखा गया है जब सामान्य लोकतांत्रिक राजनीति के कामकाज नहीं किए जा सकते।”

➕ संवैधानिक स्पष्टीकरण: संविधान में आपातकाल के तीन प्रकार हैं —

प्रकारअनुच्छेदइस अध्याय में
★★राष्ट्रीय आपातकाल35225 जून 1975
★राष्ट्रपति शासन356गुजरात, 1974
➕ वित्तीय आपातकाल360➕ आज तक कभी लागू नहीं हुआ

! 352 और 356 का अंतर सबसे ज़्यादा गड्डमड्ड होता है — दोनों इसी अध्याय में हैं।


2 📖 निवारक नज़रबंदी(Preventive Detention)★★

पाठ की अपनी परिभाषा: “इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।” (पृ. 101)

! आपातकाल में: “सरकार ने… निवारक नज़रबंदी अधिनियमों का प्रयोग करके बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ कीं।” ➕ आँकड़ा: शाह आयोग के अनुसार लगभग एक लाख ग्यारह हज़ार लोग इन कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तार हुए।


3 📄 बंदी प्रत्यक्षीकरण(Habeas Corpus)★

📄 वह याचिका जिसके ज़रिए कोई व्यक्ति अपनी गिरफ़्तारी को अदालत में चुनौती दे सकता है। ! आपातकाल में: “जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, वे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती भी नहीं दे सकते थे।” !★★अप्रैल 1976: सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले उलट दिए — “इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है।” ➕ इसी कारण उस मुकदमे को ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण मुकदमा’ कहा जाता है।


4 📄 प्रेस सेंसरशिप(Press Censorship)★★

पाठ: “सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी। समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है। इसे प्रेस सेंसरशिप के नाम से जाना जाता है।”

★★और उसका सबसे तीखा उदाहरण — अध्याय का पहला पन्ना:

“‘संपादकीय’ की जगह खाली छोड़ दी गई थी… कई दफे ऐसा आपातकाल के प्रति विरोध जताने के लिए किया जाता था। ! बाद में खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।”


5 📄 ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ और ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’★★

पाठ: “जो लोग प्रधानमंत्री के नज़दीकी थे वे एक ऐसी ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की ज़रूरत के बारे में बातें करने लगे जो विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण करे।” ! और हाशिया-प्रश्न: “क्या इसका मतलब यह है कि न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी शासक दल के प्रति निष्ठावान हों?” ★महत्व: यह पद बताता है कि टकराव केवल एक मुकदमे का नहीं, संस्थाओं की स्वतंत्रता के सिद्धांत का था।


6 📄 42वाँ संविधान संशोधन(1976)★★

📄 आपातकाल के दौरान पारित संशोधन। पाठ जो बदलाव बताती है:

#बदलाव
1★“देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल करना” — ! “यह व्यवस्था मात्र आपातकाल की अवधि भर के लिए नहीं की गई थी”
2! “अब आपातकाल के दौरान चुनाव को एक साल के लिए स्थगित किया जा सकता था”
3प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती

★परिणाम: “1971 के बाद अब चुनाव 1976 के बदले 1978 में करवाए जा सकते थे।”

➕ और वह जो पाठ नहीं बताती: इसे ‘लघु संविधान’ कहा जाता है, क्योंकि उसी ने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े और अनुच्छेद 51A के मौलिक कर्तव्य दिए।


7 ➕ 44वाँ संविधान संशोधन(1978)

➕ पाठ जिन सुधारों की बात करती है (पृ. 102 का दूसरा सबक), वे इसी संशोधन से हुए:

#सुधार【पाठ】 में?
1★★‘आंतरिक अशांति’ की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’✓
2★★मंत्रिमंडल की लिखित सलाह अनिवार्य✓
3कार्यकाल वापस 5 वर्ष! नहीं
4★आपातकाल में भी अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं! नहीं

भाग ख · आंदोलन और नारे

8 📄 ‘सम्पूर्ण क्रांति’(Total Revolution)★★

पाठ: “जयप्रकाश नारायण ने… सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया ताकि उन्हीं के शब्दों में ‘सच्चे लोकतंत्र’ की स्थापना की जा सके।” ★साथ का नारा: “सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!” (1974 का बिहार आंदोलन)

9 “इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा”ध्यान★★

📄 कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ ने 1974 में यह नारा दिया था।

★★इसे ‘सम्पूर्ण क्रांति’ वाले नारे के आमने-सामने रखिए — यही उस दौर का पूरा टकराव है। ➕ और पृ. 98 के कार्टून से जोड़िए, जहाँ “कुर्सी को पीछे से सहारा देता हाथ कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ का है।”

10 📄 ‘लोकतंत्र बचाओ’

📄 1977 के चुनाव में विपक्ष का नारा। “विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा। जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध था।” ★और इसकी पहली झलक पृ. 95 के कार्टून में है — एक व्यक्ति की तख्ती पर लिखा है “लोकतंत्र बचाओ — जे.पी.”

11 📄 जनता पार्टी

📄 “चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया।” ★★इसका असली फ़ायदा: “जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे।”

12 📄 ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’

📄 “कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में एक नयी पार्टी बनाई… बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई।”

भाग ग · संस्थाएँ, आयोग और कानून

13 📄 शाह आयोग★

📄 “जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था।” — आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच के लिए। ★★निष्कर्ष: “शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।” ➕ अध्यक्ष — भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.सी. शाह; गठन 28 मई 1977; अंतिम रिपोर्ट 6 अगस्त 1978।

14 📄 मंडल आयोग★

📄 “बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचा। इसके बाद केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया।” ★पाठ स्वयं कहती है कि इसका विस्तार अंतिम अध्याय (अध्याय 8) में है।

15 ➕ ‘मीसा’(MISA)

➕ पूरा नाम — आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम, 1971(Maintenance of Internal Security Act)। निवारक नज़रबंदी का कानून, जिसके अंतर्गत आपातकाल में बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ हुईं। ★यह शब्द 【पाठ】 के पृ. 104 वाले कार्टून में दिखता है (जंजीर से बँधा काँटेदार गोला), पर मुख्य पाठ में उसकी व्याख्या नहीं है। ➕ 1978 में इसे निरस्त कर दिया गया।

16 📄 केशवानंद भारती का मुकदमा(1973)★★

पाठ: “इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है।” ★यह उस टकराव की परिणति थी जिसमें तीन संवैधानिक मसले उठे थे।

17 📄 राष्ट्रीय समन्वय समिति(रेल कर्मचारी)

📄 “रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों की एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।” — मई 1974; 20 दिन; “बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई।”

भाग घ · व्यक्ति

नामपरिचय
★★जयप्रकाश नारायण ‘जेपी’ (1902–1979)युवावस्था में मार्क्सवादी; कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव; 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन के नायक; ★नेहरू के उत्तराधिकारी के रूप में देखे गए पर मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार; 1955 के बाद सक्रिय राजनीति छोड़ी; भूदान आंदोलन; नगा विद्रोहियों से सुलह; चंबल के डकैतों से आत्मसमर्पण; ★★बिहार आंदोलन के नेता; आपातकाल के विरोध के प्रतीक; जनता पार्टी के प्रेरणास्रोत
★मोरारजी देसाई (1896–1995)स्वतंत्रता सेनानी, गाँधीवादी; खादी, प्राकृतिक चिकित्सा और निग्रह के प्रतिपादक; बॉम्बे प्रांत के मुख्यमंत्री; 1967–69 में उप-प्रधानमंत्री; कांग्रेस (ओ) में शामिल; ★★1977–1979 तक एक गैर-कांग्रेसी दल की तरफ़ से प्रधानमंत्री
★चौधरी चरण सिंह (1902–1987)जुलाई 1979 से जनवरी 1980 तक प्रधानमंत्री; स्वतंत्रता सेनानी; उ.प्र. की राजनीति में सक्रिय; ★ग्रामीण एवं कृषि विकास के समर्थक; 1967 में भारतीय क्रांति दल का गठन; उ.प्र. में दो बार मुख्यमंत्री; 1977 में जनता पार्टी के संस्थापकों में एक, उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री; लोकदल के संस्थापक
जगजीवन राम (1908–1986)स्वतंत्रता सेनानी एवं बिहार के कांग्रेसी नेता; 1977–79 में उप-प्रधानमंत्री; संविधान सभा के सदस्य; 1952 से मृत्युपर्यंत सांसद; ★स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री; ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ के संस्थापक
फखरुद्दीन अली अहमद★★तत्कालीन राष्ट्रपति, जिन्होंने 25 जून 1975 की रात आपातकाल की उद्घोषणा की
★न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हाइलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जिन्होंने 12 जून 1975 को इंदिरा गाँधी का निर्वाचन अवैधानिक ठहराया
★राजनारायणसमाजवादी नेता; 1971 में इंदिरा गाँधी के विरुद्ध उम्मीदवार; चुनाव-याचिका के याचिकाकर्ता
! न्यायमूर्ति ए.एन. रे1973 में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके मुख्य न्यायाधीश नियुक्त
➕ न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना➕ अप्रैल 1976 के 4:1 फ़ैसले में एकमात्र असहमत न्यायाधीश; इसकी कीमत मुख्य न्यायाधीश न बन पाने से चुकाई; 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि वही सही थे
जॉर्ज फर्नान्डिस1974 की रेल हड़ताल के नेता
डी.के. बरुआकांग्रेस अध्यक्ष; “इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” नारे के प्रवर्तक (1974)
शिवराम कारंतकन्नड़ लेखक, पद्मभूषण — जिन्होंने लोकतंत्र के दमन के विरोध में पदवी लौटा दी
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’हिंदी लेखक, पद्मश्री — इन्होंने भी पदवी लौटा दी
जे.बी. कृपलानी1977 के शपथ-ग्रहण समारोह के चित्र में उपस्थित वरिष्ठ नेता
संजय गाँधी1977 में अमेठी से चुनाव हारे

भाग ङ · ➕ संवर्धन-पद

➕ पदअर्थअध्याय से कड़ी
➕ ‘लघु संविधान’42वें संशोधन का प्रचलित नाम — क्योंकि उसने संविधान के अनेक भाग बदले★पाठ उसका एक ही पक्ष देती है
➕ ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण मुकदमा’अप्रैल 1976 के उस फ़ैसले का प्रचलित नाम (ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल)★★पाठ का “सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसला”
➕ बुनियादी ढाँचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)संविधान की कुछ मूल विशेषताएँ हैं जिन्हें संसद संशोधन से नहीं बदल सकतीकेशवानंद भारती, 1973
➕ न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)न्यायालय की वह शक्ति जिससे वह कानून या कार्रवाई को असंवैधानिक ठहरा सके! 42वें संशोधन ने इसकी परिधि सीमित की
➕ जनमत-संग्रह (Referendum)किसी एक प्रश्न पर जनता की सीधी राय★पाठ 1977 के चुनाव को “एक तरह से… जनमत-संग्रह” कहता है
➕ मध्यावधि चुनावनिर्धारित अवधि से पहले कराया गया चुनावजनवरी 1980

भाग च · ⚡ त्वरित पुनरावृत्ति — पंद्रह पद, पंद्रह पंक्तियाँ

#पदएक पंक्ति
1अनुच्छेद 352★★राष्ट्रीय आपातकाल — 25 जून 1975
2अनुच्छेद 356राष्ट्रपति शासन — गुजरात, 1974
3‘सम्पूर्ण क्रांति’जेपी का आह्वान, ‘सच्चे लोकतंत्र’ के लिए
4रेल हड़तालमई 1974 · जॉर्ज फर्नान्डिस · 20 दिन
5केशवानंद भारती1973 — “संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है”
6‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’! “विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण”
712 जून 1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय — निर्वाचन अवैध
8निवारक नज़रबंदी★“इस आशंका से… कि वे कोई अपराध कर सकते हैं”
9प्रेस सेंसरशिप“कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी”
10अप्रैल 1976! “सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक”
1142वाँ संशोधनकार्यकाल 5 से 6 साल; चुनाव एक साल टल सकते थे
12तीन सबकलोकतंत्र विदा करना कठिन · खामियाँ सुधरीं · नागरिक सचेत हुए
13शाह आयोग1977 · “पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में”
141977 का जनादेश★★कांग्रेस 154 · जनता पार्टी और साथी 330 / 542
15अंतिम निर्णय★★“राजनीतिक संकट… संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा संगीन था”