यह प्रश्न रटने से हल नहीं होते — इनमें बच्चे को पहचानना, तय करना, तर्क देना और क़दम उठाना पड़ता है। NCF-2023 और PARAKH के प्रारूप पर आधारित।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — “दो सौ का सामान, रसीद नहीं”
रमेश ने मोहल्ले की दुकान से ₹200 का एक बिजली का प्लग ख़रीदा। दुकानदार ने रसीद नहीं दी और रमेश ने माँगी भी नहीं। तीन दिन बाद प्लग से चिंगारी निकली और रमेश का हाथ जल गया। दुकानदार ने कहा — “मुझे कैसे पता कि यह मेरी दुकान से गया है? और वैसे भी दो सौ रुपये की चीज़ के लिए इतना हल्ला क्यों?”
1यहाँ रमेश के किस अधिकार का उल्लंघन हुआ है? 1 अंक
उत्तर देखिए
सुरक्षा का अधिकार — क्योंकि किताब के अनुसार हमें वस्तुओं से “सुरक्षित रहने का अधिकार होता है, क्योंकि ये जीवन और संपत्ति के लिए ख़तरनाक होते हैं।”
2दुकानदार की दूसरी बात — “दो सौ रुपये की चीज़ के लिए इतना हल्ला क्यों” — क्या सही है? 2 अंक
उत्तर देखिए
नहीं। क्षति की रक़म चाहे छोटी हो, अधिकार तब भी उतना ही है। किताब का उदाहरण श्री प्रकाश का है, जिनका मामला केवल ₹6,000 का था और उन्होंने आयोग तक लड़ाई लड़ी। (यही अभ्यास 13(घ) का उत्तर भी है।)
3रमेश की सबसे बड़ी ग़लती क्या थी और उसका क्या नुक़सान हुआ? 3 अंक
उत्तर देखिए
सबसे बड़ी ग़लती थी — रसीद न माँगना।
किताब स्वयं इसे आंदोलन की एक बड़ी कमी बताती है — “अधिकांश ख़रीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं, ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता।”
नुक़सान यह हुआ कि अब रमेश यह साबित ही नहीं कर सकता कि प्लग उसी दुकान से आया। अधिकार तो है, पर सबूत नहीं — और रेजी के मामले में भी राज्य समिति ने यही कहकर दावा ख़ारिज किया था कि “सबूत पर्याप्त नहीं है।”
4प्लग ख़रीदते समय रमेश को क्या-क्या देखना चाहिए था? 2 अंक
उत्तर देखिए
ISI चिह्न — क्योंकि यह औद्योगिक उत्पाद है और बिजली का सामान सुरक्षा से जुड़ा है;
पैकेट पर निर्माता का पता, बैच संख्या और MRP;
और सबसे ज़रूरी — रसीद।
केस 2 — मोबाइल की स्क्रीन पर
सोनू ने एक ऐप से जूते मँगवाए। ऑर्डर करते समय स्क्रीन पर लिखा आया — “सिर्फ़ 2 बचे! 4 मिनट में ऑफ़र ख़त्म!” उसने जल्दी में ऑर्डर कर दिया। अंतिम पन्ने पर बिल ₹1,499 के बजाय ₹1,847 निकला, क्योंकि डिलीवरी शुल्क, हैंडलिंग शुल्क और एक ₹99 का बीमा अपने आप जुड़ा हुआ था, जो उसने चुना ही नहीं था।
1सोनू के साथ जो हुआ, उसे किताब की भाषा में क्या कहेंगे? 2 अंक
उत्तर देखिए
दो तरह का शोषण हुआ —
ऐसे शुल्क जोड़ देना जिनका वर्णन पहले न किया गया हो — किताब में यह शोषण के तरीक़ों में गिना गया है;
और बिना माँगे बीमा जोड़ देना — यह ठीक वैसा ही है जैसे “दंतमंजन तभी बेचेगा जब ब्रश भी ख़रीदोगे”, यानी चयन के अधिकार का उल्लंघन।
2“सिर्फ़ 2 बचे! 4 मिनट में ऑफ़र ख़त्म!” — यह क्या है? 2 अंक
उत्तर देखिए
यह भ्रामक सूचना है। किताब कहती है कि कंपनियाँ “उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए… समय-समय पर मीडिया और अन्य स्रोतों से ग़लत सूचना देते हैं।” इसका मक़सद यही है कि उपभोक्ता सोचने का समय न पाए।
3किताब के दंतमंजन-ब्रश वाले उदाहरण और सोनू के अपने आप जुड़े बीमा में क्या समानता और क्या अंतर है? 3 अंक
उत्तर देखिए
समानता दोनों में उपभोक्ता को वह चीज़ लेनी पड़ी जो वह लेना ही नहीं चाहता था, यानी दोनों चयन के अधिकार का उल्लंघन हैं।
अंतर दंतमंजन वाले मामले में दुकानदार सामने खड़ा होकर दबाव डालता है, इसलिए उपभोक्ता को पता चल जाता है; जबकि ऑनलाइन बीमा चुपचाप जुड़ जाता है और अक्सर पता ही नहीं चलता।
निष्कर्ष ★ शोषण के तरीक़े नहीं बदले, सिर्फ़ दुकान बदल गई है — और ऑनलाइन शोषण ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वह दिखाई नहीं देता।
4सोनू अब क्या कर सकता है? 2 अंक
उत्तर देखिए
पहले विक्रेता/ऐप की ग्राहक सेवा में शिकायत करे;
सुनवाई न हो तो उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह ले (जैसे प्रकाश ने ली थी);
फिर जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत — और यह अब इंटरनेट के माध्यम से भी की जा सकती है, क्योंकि COPRA में 2019 के संशोधन के बाद “अब इंटरनेट के माध्यम से ख़रीद भी शामिल है।”
केस 3 — रेजी और अबिरामी की तुलना
| रेजी मैथ्यू | अबिरामी | |
|---|---|---|
| किस सेवा में | चिकित्सा (निजी अस्पताल) | शिक्षा (कोचिंग संस्थान) |
| क्या हुआ | अनुचित बेहोशी → जीवन भर अपंग | पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं, पैसे नहीं लौटाए |
| पहला नतीजा | राज्य समिति ने ख़ारिज किया | जिला आयोग ने 28,000 लौटवाए |
| अंतिम नतीजा | राष्ट्रीय समिति — अस्पताल दोषी, हर्ज़ाना | राज्य आयोग — 25,000 दंड + 7,000 मुआवजा |
1दोनों मामलों में एक बात साझा है — वह क्या है? 2 अंक
उत्तर देखिए
दोनों “सेवा” के मामले हैं, “सामान” के नहीं। यह सिद्ध करता है कि COPRA केवल वस्तुओं पर नहीं, सेवाओं पर भी लागू होता है (अभ्यास 13(क) का सीधा उत्तर)।
2दोनों के रास्ते उल्टे क्यों दिखते हैं — एक ऊपर गया, दूसरे में संस्थान ऊपर गया? 2 अंक
उत्तर देखिए
रेजी के मामले में उपभोक्ता हारा था, इसलिए उसने ऊपर अपील की — जिला/राज्य में ख़ारिज होने पर उपभोक्ता राज्य और फिर राष्ट्रीय आयोग जा सकता है।
अबिरामी के मामले में उपभोक्ता जीता था, इसलिए दूसरे पक्ष (संस्थान) ने अपील की — और वह अपील बेकार निकली, इसीलिए राज्य आयोग ने उस पर 25,000 का दंड लगाया।
★यानी अपील का रास्ता दोनों पक्षों के लिए खुला है — पर उसका दुरुपयोग महँगा पड़ सकता है।
3★राज्य आयोग ने संस्थान पर जो 25,000 का दंड लगाया, वह अबिरामी को नहीं मिला। फिर वह क्यों लगाया गया? 3 अंक
उत्तर देखिए
क्योंकि उस दंड का मक़सद अबिरामी को मुआवजा देना नहीं, बल्कि आगे के लिए एक चेतावनी बनाना था — ताकि कोई संस्थान केवल छात्र को थकाने और लंबा खींचने के लिए बेकार की अपील न करे।
इसका प्रमाण यह है कि आयोग ने उसी फ़ैसले में सभी शिक्षा संस्थानों और व्यावसायिक संस्थाओं को “पूरे साल की फ़ीस को एडवांस में लेने से भी मना” कर दिया, और कहा कि उल्लंघन पर “दंड शुल्क भरना पड़ सकता है साथ ही जेल भी हो सकती है।”
★सबक़ — कुछ फ़ैसले एक आदमी के लिए नहीं, सबके लिए होते हैं।
केस 4 — “यही रेट है, MRP है”
मीना एक बिस्किट का पैकेट ख़रीदने गई जिस पर MRP ₹20 छपा था। दुकानदार ने ₹22 माँगे और कहा — “गाँव में लाने का ख़र्चा लगता है।” पास की दूसरी दुकान पर वही पैकेट ₹18 में मिल रहा था। मीना ने सोचा — “MRP तो सरकारी रेट है, कम कैसे हो सकता है? ज़रूर दूसरी दुकान वाला नक़ली माल बेच रहा है।”
1मीना की समझ में दो ग़लतियाँ हैं। दोनों बताइए। 2 अंक
उत्तर देखिए
“MRP सरकारी तय रेट है” — ग़लत। किताब कहती है — “उपभोक्ता, विक्रेता से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से कम दाम पर वस्तु देने के लिए मोल-भाव कर सकते हैं।” यानी MRP सबसे ऊँची क़ीमत है, तय क़ीमत नहीं।
“कम दाम माने नक़ली माल” — ग़लत। MRP से कम बेचना पूरी तरह जायज़ है; असलियत जाँचने का तरीक़ा दाम नहीं, पैकेट पर लिखी जानकारी और मानक चिह्न हैं।
2पहले दुकानदार ने जो किया, उसके बारे में किताब क्या कहती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
“यदि कोई व्यक्ति मुद्रित मूल्य से अधिक मूल्य पर वस्तु बेचता है तो कोई भी उसका विरोध और शिकायत कर सकता है।” यानी ₹20 MRP पर ₹22 माँगना ग़ैर-क़ानूनी है, चाहे कारण कुछ भी बताया जाए।
3मीना को अब क्या करना चाहिए और किन-किन तरीक़ों से? 3 अंक
उत्तर देखिए
पहले दुकानदार से ही विरोध करे और MRP दिखाए;
न माने तो रसीद माँगे — क्योंकि प्रमाण के बिना शिकायत आगे नहीं बढ़ती;
फिर उपभोक्ता संरक्षण परिषद् या जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत करे;
और यह भी याद रखे कि वह वकील के बिना, स्वयं शिकायत दर्ज करा सकती है — जैसे श्री प्रकाश ने किया था।
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1“अधिकार तो 1986 से हैं, फिर भी लोग ठगे जाते हैं।” — इसके कारण बताइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब स्वयं इसके कारण देती है —
“कोपरा के अधिनियम के 35 वर्ष बाद भी भारत में उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है” — यानी लोगों को अपने अधिकार का पता ही नहीं है;
प्रक्रिया “जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य” है, और कई बार वकील का सहारा लेना पड़ता है;
★“अधिकांश ख़रीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं, ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता”;
2000 से अधिक संगठनों में केवल 50-60 ही पूर्ण संगठित हैं;
और “बाज़ारों के कार्य करने के लिए नियमों और विनियमों का प्राय: पालन नहीं होता।”
2“दुकानदार ही सारे शोषण का ज़िम्मेदार है।” — क्या आप सहमत हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
पूरी तरह सहमत नहीं।
हाँ, कुछ हद तक सही है क्योंकि किताब कहती है कि “दुकानदार उचित वज़न से कम वज़न तौलते हैं”, बिना बताए शुल्क जोड़ते हैं और मिलावटी वस्तुएँ बेचते हैं।
पर पूरी बात यह नहीं है किताब का ज़्यादा ज़ोर बड़ी कंपनियों पर है: “जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली होते हैं और उपभोक्ता… बिखरे हुए होते हैं, तो बाज़ार उचित तरीक़े से कार्य नहीं करता”; और वे “चालाकीपूर्वक बाज़ार को प्रभावित” करती हैं तथा ग़लत सूचना देती हैं — जैसे शिशु दूध पाउडर और सिगरेट के मामलों में हुआ।
★साथ ही किताब यह भी मानती है कि “बाज़ार में अधिकांश ख़रीददारियाँ छोटे फुटकर दुकानों से होती हैं” — यानी छोटा दुकानदार भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए निशाना व्यक्ति नहीं, व्यवस्था और जागरूकता की कमी है।
3“उपभोक्ता आंदोलन सफल रहा है।” — पक्ष और विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए और निष्कर्ष लिखिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
पक्ष में
1986 में COPRA बना और 2019 में उसका संशोधन हुआ, जिसमें इंटरनेट से ख़रीद भी शामिल है और दोषी को जेल तक हो सकती है;
त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र बना — “भारत उन देशों में से एक है, जहाँ… विशिष्ट न्यायालय हैं”; और आज 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं।
विपक्ष में
“केवल 50-60 ही… पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं”, और प्रक्रिया “जटिल, ख़र्चीली और समय साध्य” है;
“35 वर्ष बाद भी… उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे-धीरे फैल रहा है”, और रसीद न मिलने से प्रमाण जुटाना कठिन रहता है।
निष्कर्ष ★ आंदोलन ने क़ानून और तंत्र दिला दिया, पर जागरूकता और आदत नहीं बदल पाई। इसीलिए किताब का अंतिम वाक्य यही है — “उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है। इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की ज़रूरत है।”
4★किताब कहती है कि पहले उपभोक्ता के पास एक ही रास्ता था — “उस ब्रांड को ख़रीदना बंद कर देना।” यह रास्ता काफ़ी क्यों नहीं था? 3 अंक
उत्तर देखिए
जो पैसा और नुक़सान हो चुका, वह वापस नहीं आता — ख़रीदना बंद करने से मुआवजा नहीं मिलता;
अकेले एक आदमी के बंद कर देने से कंपनी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि उपभोक्ता “बिखरे हुए” हैं;
और अगर पूरे बाज़ार में वही चीज़ मिलती हो या केवल एक ही विक्रेता हो, तो “कहीं और जाना” संभव ही नहीं — यही तो चयन के अधिकार का हनन है।
★इसीलिए आंदोलन ज़रूरी हुआ, जिसने “वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दी।”
भाग ग — निर्णय और वर्गीकरण
1नीचे दिए मामलों को सही अधिकार के सामने रखिए 4 अंक
| मामला | अधिकार |
|---|---|
| (क) दुकानदार बताता ही नहीं कि दवा की एक्सपायरी कब है | |
| (ख) गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा लेने का दबाव | |
| (ग) कूकर का सेफ़्टी वॉल्व ख़राब निकला | |
| (घ) ख़राब टी.वी. का पैसा वापस माँगने के लिए आयोग में शिकायत | |
| (च) निवासी कल्याण संघ ने अपने सदस्य की तरफ़ से मामला उठाया | |
| (छ) विद्यालय में उपभोक्ता जागरूकता सप्ताह मनाया गया |
उत्तर देखिए
| मामला | अधिकार |
|---|---|
| (क) दुकानदार बताता ही नहीं कि दवा की एक्सपायरी कब है | सूचना का अधिकार |
| (ख) गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा लेने का दबाव | चयन का अधिकार |
| (ग) कूकर का सेफ़्टी वॉल्व ख़राब निकला | सुरक्षा का अधिकार |
| (घ) ख़राब टी.वी. का पैसा वापस माँगने के लिए आयोग में शिकायत | क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार |
| (च) निवासी कल्याण संघ ने अपने सदस्य की तरफ़ से मामला उठाया | प्रतिनिधित्व का अधिकार |
| (छ) विद्यालय में उपभोक्ता जागरूकता सप्ताह मनाया गया | उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार |
2नीचे दी गई रक़मों के अनुसार बताइए कि मामला किस आयोग में जाएगा (किताब की सीमाओं के अनुसार) 3 अंक
उत्तर देखिए
| दावा | आयोग |
|---|---|
| ₹6,000 का मनीऑर्डर | जिला आयोग |
| ₹75 लाख का फ़्लैट | जिला आयोग |
| ₹4 करोड़ का बीमा दावा | राज्य आयोग |
| ₹25 करोड़ की परियोजना | राष्ट्रीय आयोग |
★और एक बात लिखवाइए — “अगर जिला आयोग में मामला ख़ारिज हो जाए, तो राज्य और फिर राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है।”
3नीचे दी वस्तुओं पर कौन-सा चिह्न देखेंगे? 3 अंक
उत्तर देखिए
| वस्तु | चिह्न | क्यों |
|---|---|---|
| सरसों का तेल | एगमार्क | यह कृषि उत्पाद है |
| बिजली का हीटर | ISI | यह औद्योगिक उत्पाद है और सुरक्षा से जुड़ा है |
| सोने की चूड़ी | हॉलमार्क | यह आभूषण है |
| फ़ोर्टिफ़ाइड आटा | +F (फूड फ़ोर्टिफ़िकेशन) | इसमें मुख्य पोषक तत्व मिलाए गए हैं |
4एक ही दुकान पर दो पैकेट रखे हैं — एक पर ISI चिह्न है, दूसरा ₹15 सस्ता है पर उस पर कोई चिह्न नहीं। तुम कौन-सा लोगे और क्यों? 2 अंक
उत्तर देखिए
ISI वाला — क्योंकि प्रमाणक चिह्न “अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित कराने में मदद” करते हैं, और बिजली/सुरक्षा से जुड़े सामान में बचाए हुए ₹15 से जान की क़ीमत ज़्यादा है। (★इसी को किताब “अच्छे और बुरे में फ़र्क करने तथा श्रेष्ठ चुनाव करने” की क्षमता कहती है।)
भाग घ — क्रम और प्रक्रिया
1नीचे के क़दमों को सही क्रम में लगाइए —
(अ) आयोग ने बिल और वारंटी माँगे · (ब) दुकानदार से शिकायत की, कुछ नहीं हुआ · (स) घड़ी ख़रीदी · (द) आयोग ने नई घड़ी देने का आदेश दिया · (य) जिला आयोग में मुक़दमा दायर किया · (र) घड़ी ख़राब निकली 4 अंक
उत्तर देखिए
सही क्रम — (स) → (र) → (ब) → (य) → (अ) → (द)
यानी — ख़रीद → ख़राबी → पहले विक्रेता से शिकायत → फिर आयोग में मुक़दमा → सबूत (बिल और वारंटी) → फ़ैसला।
★ध्यान दीजिए — आयोग सबसे पहले “बिल और वारंटी” ही माँगता है। इसीलिए रसीद सबसे ज़रूरी है।
2तुम्हारे मोहल्ले की दुकान से ख़रीदा वारंटी वाला पंखा दो महीने में ख़राब हो गया और दुकानदार सुन नहीं रहा। तीन क़दम क्रम से लिखो जो तुम उठाओगे। 3 अंक
उत्तर देखिए
पहले दुकानदार और कंपनी की सेवा-केंद्र में लिखित शिकायत करूँगा, और बिल तथा वारंटी कार्ड सुरक्षित रखूँगा;
सुनवाई न हो तो उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह लूँगा — जैसे श्री प्रकाश ने ली थी;
फिर जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करूँगा — जहाँ मैं वकील के बिना, स्वयं अपनी बात रख सकता हूँ।
भाग ङ — परियोजना और गतिविधि
1★★रसीद-डायरी (सबसे ज़रूरी)
दो सप्ताह तक हर ख़रीद पर रसीद माँगो और लिखो — तारीख़ · क्या ख़रीदा · रसीद मिली/नहीं। अंत में बताओ — कितनी बार मिली, और न देने वालों ने क्या कारण बताया।
2पैकेट-जाँच रिपोर्ट
घर के दस पैकेट लो और तालिका बनाओ — वस्तु का नाम · अवयव · MRP · निर्माण तिथि · अंतिम तिथि · निर्माता का पता · कोई मानक चिह्न। ★जो जानकारी न मिले उस पर ✘ लगाओ और बताओ कि किस पैकेट पर सबसे कम जानकारी थी।
3मोहल्ला सर्वेक्षण (किताब की अपनी परियोजना — पृष्ठ 89)
पृष्ठ 89 की 17 प्रश्नों वाली प्रश्नावली लेकर पाँच लोगों से भरवाओ। फिर किताब की टिप्पणी से हिसाब लगाओ कि कितने लोग पूरी तरह जागरूक निकले।
4पत्र-लेखन (किताब की परियोजना 2 — पृष्ठ 88)
श्रीमती कृष्णा ने 6 महीने की वारंटी वाला रंगीन टी.वी. ख़रीदा; तीन महीने बाद काम करना बंद कर दिया; दुकान ने इंजीनियर भेजा पर टी.वी. बार-बार ख़राब होता रहा और अब कोई जवाब नहीं मिलता। उनके लिए उपभोक्ता आयोग को पत्र लिखो।
★जाँच का नियम — पत्र में ये पाँच चीज़ें होनी ही चाहिए: ख़रीद की तारीख़ · बिल/वारंटी का ज़िक्र · समस्या का ब्योरा · पहले की गई शिकायतों का ब्योरा · स्पष्ट माँग (बदलो/पैसे लौटाओ/मुआवजा दो)।
5पोस्टर और नारे (किताब की परियोजना 1 और 4)
छह अधिकारों पर छह पोस्टर। नारे किताब से लीजिए — “सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है” · “ग्राहक, सावधान” · “सचेत उपभोक्ता” · “अपने अधिकारों को पहचानो” · “उपभोक्ता के रूप में, अपने अधिकारों की रक्षा करें” — और आख़िरी वाला ख़ुद पूरा करो: “उठो, जागो और तब तक मत रुको…”
6साक्षात्कार (किताब की परियोजना 5)
आसपास के चार-पाँच लोगों से पूछो कि वे कैसे शोषण का शिकार हुए और उन्होंने क्या किया — फिर कक्षा में बताओ कि कितनों ने शिकायत की और कितने चुप रह गए, और क्यों।
7विद्यालय उपभोक्ता क्लब (किताब की परियोजना 3)
विद्यालय की कैंटीन, पुस्तक केन्द्र और आसपास की दुकानों पर नज़र रखने वाली एक छोटी टोली। ★यह अध्याय ख़त्म होने के बाद भी चलती रहनी चाहिए — यही “सक्रिय भागीदारी” है।
मूल्यांकन रूब्रिक (शिक्षक के लिए)
| स्तर | पहचान |
|---|---|
| उत्कृष्ट | सही अधिकार पहचानता है, किताब का उदाहरण देता है, अगला क़दम क्रम से बताता है और अपना तर्क जोड़ता है |
| अच्छा | अधिकार सही पहचानता है और उदाहरण देता है, पर आगे क्या करना है यह अधूरा बताता है |
| सुधार चाहिए | अधिकारों के नाम रट लिए हैं, पर मामले से जोड़ नहीं पाता |
| बहुत कमज़ोर | ! रसीद और सबूत का महत्त्व नहीं समझ पाया — यही इस अध्याय की सबसे बड़ी चूक है |
★और सबसे असली मूल्यांकन कोई प्रश्नपत्र नहीं है — अध्याय के दो हफ़्ते बाद कक्षा से पूछिए: “किस-किसने पिछली ख़रीद पर रसीद माँगी?” जितने हाथ खड़े हों, उतना ही यह अध्याय सफल हुआ।