Chapter 4विचारक, विश्वास और इमारतें

Lesson plan17 min

This note is written in Hindi.Read in Hindi →

कक्षा: XII (RBSE) | विषय: इतिहास | कुल कालांश: 10 (40 मिनट प्रत्येक)

सामान्य उद्देश्य

  1. विद्यार्थियों को यह समझाना कि दृश्य साक्ष्य (स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला) से इतिहास कैसे लिखा जाता है — और उनकी व्याख्या की कठिनाइयाँ क्या हैं।
  2. छठी सदी ई.पू. की वैचारिक क्रांति तथा उससे उपजी परंपराओं (उपनिषद, जैन, बौद्ध, आजीविक, लोकायत) का परिचय देना।
  3. स्तूप, मंदिर और मूर्तिकला के विकास तथा उनके संरक्षण के इतिहास की समझ विकसित करना।
  4. परंपराओं के बीच संवाद (बौद्ध ↔ लोक ↔ ब्राह्मणीय) की प्रक्रिया को पहचानने की दृष्टि देना।

विशिष्ट अधिगम प्रतिफल (Learning Outcomes)

पाठ के अंत में विद्यार्थी —

  • साँची के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका बता सकेंगे।
  • यज्ञ-परंपरा, उपनिषद, नियतिवाद व भौतिकवाद का तुलनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • त्रिपिटक की संरचना तथा बौद्ध ग्रंथों के संरक्षण की प्रक्रिया समझा सकेंगे।
  • जैन धर्म के पाँच व्रत व केंद्रीय सिद्धांत लिख सकेंगे।
  • बुद्ध की शिक्षाओं तथा संघ की संरचना का वर्णन कर सकेंगे।
  • स्तूप की संरचना (अंड, हर्मिका, यष्टि, वेदिका, तोरणद्वार) तथा निर्माण-प्रक्रिया बता सकेंगे।
  • अमरावती और साँची की भिन्न नियति के कारणों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • प्रतीक-आधारित मूर्तिकला तथा लोक परंपराओं के योगदान को पहचान सकेंगे।
  • महायान, वैष्णववाद, शैववाद तथा मंदिर-स्थापत्य के विकास की विवेचना कर सकेंगे।
  • दृश्य साक्ष्य की व्याख्या की सीमाओं पर आलोचनात्मक टिप्पणी कर सकेंगे।

शिक्षण सामग्री

NCERT पुस्तक, मानचित्र 1, चित्र 4.1–4.33 (यह अध्याय चित्र-प्रधान है — चित्रों का अधिकतम उपयोग अनिवार्य), PPT (02-Presentation), श्यामपट्ट, फ्लैश कार्ड्स (06)।

कालांश-विभाजन (Period-wise Plan)

कालांश 1 — प्रस्तावना तथा साँची की एक झलक

  • प्रस्तावना-प्रश्न (Hook): “एक पत्थर की मूर्ति को देखकर हम कैसे जानें कि उसे बनाने वाले क्या कहना चाहते थे?” (उत्तर अंतिम कालांश में लौटेगा।)
  • मुख्य बिंदु: एक हज़ार साल लंबी यात्रा; दार्शनिक, उनके विचार, मौखिक व लिखित परंपराएँ, स्थापत्य व मूर्तिकला में अभिव्यक्ति।
  • ★केंद्रीय सावधानी: “बौद्ध परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई। दूसरी कई परंपराएँ थीं जो एक-दूसरे के साथ लगातार वाद-विवाद और संवाद चला रही थीं।”
  • स्रोत: बौद्ध, जैन व ब्राह्मण ग्रंथ + इमारतें और अभिलेख; साँची का स्तूप = अध्याय का केंद्र-बिंदु।
  • §1 साँची: शाहजहाँ बेगम का विवरण (ताज-उल-इक़बाल तारीख़ भोपाल; 1876 में एच.डी. बार्स्टो का अनुवाद); मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम का निरीक्षण।
  • ★यूरोप ले जाने के प्रयास: फ़्रांसीसियों व अंग्रेज़ों ने पूर्वी तोरणद्वार माँगा → प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट → मूल कृति यहीं रही।
  • ★भोपाल की बेगमें: शाहजहाँ बेगम व सुल्तानजहाँ बेगम का अनुदान; जॉन मार्शल ने अपने ग्रंथ सुल्तानजहाँ को समर्पित किए; संग्रहालय व अतिथिशाला; प्रकाशन में अनुदान।
  • मूल्यांकन: साँची के संरक्षण में बेगमों की तीन भूमिकाएँ लिखिए। (NCERT प्र. 3)

कालांश 2 — पृष्ठभूमि : यज्ञ और नए प्रश्न

  • ★विश्व-संदर्भ: ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि = विश्व इतिहास का महत्त्वपूर्ण मोड़ — ज़रथुस्त्र (ईरान), खुंगत्सी (चीन), सुकरात-प्लेटो-अरस्तु (यूनान), महावीर-बुद्ध (भारत)।
    • यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे (अध्याय 2 व 3 से जोड़)।
  • §2.1 यज्ञों की परंपरा: ऋग्वेद (1500-1000 ई.पू. में संकलित) — अग्नि, इंद्र, सोम की स्तुति; प्रार्थनाएँ (मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु)।
    • ★परिवर्तन: शुरू में सामूहिक यज्ञ → बाद में (1000-500 ई.पू.) घरों के मालिकों द्वारा → राजसूय व अश्वमेध सरदार-राजा द्वारा, ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भरता।
  • स्रोत-कार्य: स्रोत 1 (अग्नि की प्रार्थना) — वैदिक संस्कृत; मौखिक रूप में सिखाए जाते थे। चर्चा: यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए।
  • §2.2 नए प्रश्न: उपनिषद (छठी सदी ई.पू. से) — जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन, पुनर्जन्म; “सत्य एक होता है या अनेक?”
  • स्रोत-कार्य: स्रोत 2 (छांदोग्य उपनिषद) — आत्मा की प्रकृति (बीज से छोटी, पर स्वर्ग से बड़ी); सच्चा यज्ञ (पवन)।
    • ★शिक्षण-बिंदु: दूसरा श्लोक यज्ञ की पुनर्परिभाषा है — कर्मकांड की जगह आंतरिक/प्राकृतिक प्रक्रिया।
  • मूल्यांकन: यज्ञों की परंपरा में क्या परिवर्तन आए? उपनिषदों में कौन-से नए प्रश्न उठे?

कालांश 3 — वाद-विवाद, नियतिवाद-भौतिकवाद तथा बौद्ध ग्रंथ★

  • §2.3 वाद-विवाद: बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों का उल्लेख; कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में चर्चाएँ; तर्क से जीतने पर प्रतिद्वंद्वी शिष्य बन जाता था।
    • ★महावीर व बुद्ध ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए; माना कि दुःखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है — यह ब्राह्मणवाद से बिलकुल भिन्न था (जो जाति व लिंग से अस्तित्व निर्धारित मानता था)।
  • स्रोत-कार्य: ★स्रोत 3 — मक्खलि गोसाल (आजीविक/नियतिवाद) व अजित केसकंबलिन् (लोकायत/भौतिकवाद)।
    • ! महत्त्वपूर्ण: “इन दार्शनिक परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हमें अन्य परंपराओं से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है।”
    • चर्चा: जब लिखित सामग्री बच न पाई हो तो विचारों के इतिहास के पुनर्निर्माण में क्या समस्याएँ आती हैं?
  • ★बॉक्स-पठन (बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार व संरक्षित हुए): बुद्ध ने मौखिक शिक्षा दी; जीवनकाल में कुछ नहीं लिखा गया; मृत्यु के बाद वेसली (वैशाली) की सभा; त्रिपिटक = तीन टोकरियाँ।
    • तालिका बनवाएँ: विनय पिटक (संघ के नियम) • सुत्त पिटक (बुद्ध की शिक्षाएँ) • अभिधम्म पिटक (दर्शन)।
    • दीपवंश व महावंश (श्रीलंका); फ़ा-शिएन व श्वैन त्सांग ग्रंथों की खोज में आए; पालि, संस्कृत, चीनी, तिब्बती में संरक्षित।
  • मूल्यांकन: त्रिपिटक के तीन भाग व उनकी विषय-वस्तु लिखिए। (NCERT प्र. 1 की तैयारी)

कालांश 4 — जैन धर्म : महावीर का संदेश

  • मुख्य बिंदु: जैन सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले ही प्रचलित थे; 23 तीर्थंकर — “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।”
  • ★जैन दर्शन की केंद्रीय अवधारणाएँ:
    • संपूर्ण विश्व प्राणवान है — पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन
    • अहिंसा = जैन दर्शन का केंद्र बिंदु; “जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है”
    • कर्म से जन्म-पुनर्जन्म का चक्र; मुक्ति हेतु त्याग व तपस्या; विहारों में निवास अनिवार्य नियम
  • ★पाँच व्रत: हत्या न करना • चोरी नहीं करना • झूठ न बोलना • ब्रह्मचर्य (अमृषा) • धन संग्रह न करना।
  • स्रोत-कार्य: स्रोत 4 (महल के बाहर की दुनिया) — उत्तराध्ययन सूत्र; महारानी कमलावती का तर्क। चर्चा: कौन-सा तर्क सबसे युक्तियुक्त लगता है?
  • §3.1 विस्तार: प्राकृत, संस्कृत, तमिल में साहित्य; मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में पांडुलिपियाँ; जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ = सबसे प्राचीन धार्मिक मूर्तियों में।
  • चर्चा: क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?
  • मूल्यांकन: जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ संक्षेप में लिखिए। (NCERT प्र. 2)

कालांश 5 — बुद्ध, उनकी शिक्षाएँ तथा संघ★

  • §4 बुद्ध और ज्ञान की खोज: विस्तार — मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया, जापान; श्रीलंका से म्याँमार, थाइलैंड, इंडोनेशिया।
    • ! स्रोत की सीमा: चरित ग्रंथ बुद्ध के जीवनकाल से लगभग सौ वर्षों बाद लिखे गए।
    • बॉक्स: संतचरित — “संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह सही नहीं होते”।
    • जीवन-कथा: सिद्धार्थ, शाक्य सरदार के बेटे; वृद्ध, बीमार, लाश और संन्यासी का दर्शन; अतिवादी तपस्या का त्याग; ज्ञान प्राप्ति।
  • §5 बुद्ध की शिक्षाएँ:
    • ★अलौकिक शक्तियों की बजाय विवेक और तर्क — मरे बच्चे की माँ का उदाहरण
    • विश्व अनित्य है • आत्माविहीन (अनात्मा) • दुख अंतर्निहित तत्व • मध्यम मार्ग
    • ★प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था
    • ★समाज का निर्माण इनसानों ने किया, न कि ईश्वर ने → “व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश बदला जा सकता था”
    • अंतिम निर्देश: “तुम सब अपने लिए ख़ुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें ख़ुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”
  • स्रोत-कार्य: स्रोत 5 (व्यवहार में बौद्ध धर्म — सिगल को सलाह)। ★तुलना कराएँ: असोक की प्रजा को दी गई सलाह (अध्याय 2) से।
  • मूल्यांकन: बौद्ध दर्शन के चार मूल सिद्धांत लिखिए।

कालांश 6 — बुद्ध के अनुयायी : संघ, भिक्खुनी और थेरीगाथा★

  • §6 संघ: भिक्खु = दान पर निर्भर; सादा जीवन; एक कटोरा।
  • ★महिलाओं का प्रवेश: शुरू में केवल पुरुष → आनंद ने बुद्ध को समझाया → महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी → कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ → थेरी = ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।
  • ★सामाजिक संरचना: राजा, धनवान, गृहपति, कर्मकार, दास, शिल्पी — सभी; संघ में आने पर सभी बराबर क्योंकि पुरानी पहचान त्यागनी पड़ती थी।
  • संचालन पद्धति गणों और संघों की परंपरा पर — बातचीत से एकमत, अन्यथा मतदान। (अध्याय 2 के गण/संघ से जोड़ें)
  • स्रोत-कार्य: ★स्रोत 6 — थेरीगाथा (दासी पुन्ना और ब्राह्मण का संवाद)।
    • चर्चा: बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं? पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
  • स्रोत-कार्य: स्रोत 7 (विनय पिटक के नियम) — कंबल, भोजन, बिस्तर। चर्चा: ये नियम क्यों बने?
  • ★बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला — चार कारण: समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतोष • तेज़ सामाजिक बदलाव की उलझनें • जन्म की बजाय अच्छे आचरण व मूल्यों को महत्त्व • मित्रता और करुणा के आदर्श।
  • मूल्यांकन: आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे? (NCERT प्र. 5)

कालांश 7 — स्तूप : क्यों, कैसे और संरचना★

  • §7 पवित्र स्थल: ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानें, विस्मयकारी सौंदर्य → चैत्य।
    • बॉक्स: चैत्य = शवदाह के बाद अवशेष रखे टीले।
    • बुद्ध से जुड़े चार स्थल: लुम्बिनी (जन्म) • बोधगया (ज्ञान) • सारनाथ (प्रथम उपदेश) • कुशीनगर (निब्बान)।
    • असोक ने लुम्बिनी की यात्रा की याद में स्तंभ बनवाया (अध्याय 2 से जोड़ — रुम्मिनदेई)।
  • §7.1 स्तूप क्यों? बुद्ध के अवशेष (अस्थियाँ/प्रयुक्त सामान) गाड़े गए → समूचा स्तूप बुद्ध व बौद्ध धर्म का प्रतीक।
    • ★असोकावदान: असोक ने अवशेषों के हिस्से हर महत्त्वपूर्ण शहर में बाँट कर स्तूप बनाने का आदेश दिया।
    • ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची, सारनाथ में स्तूप बन चुके थे।
  • स्रोत-कार्य: स्रोत 8 (महापरिनिब्बान सुत्त) — आनंद का प्रश्न; बुद्ध का उत्तर — “धर्मोत्साही बनो”; फिर चार महापथों के चौक पर थूप।
  • §7.2 निर्माण कैसे? ★दान के अभिलेख — राजा (सातवाहन), शिल्पकारों व व्यापारियों की श्रेणियाँ, हाथी दाँत के शिल्पकारों का दान (साँची का एक तोरणद्वार); सैकड़ों महिलाओं-पुरुषों के नाम; भिक्खु-भिक्खुनियों ने भी दान दिया।
  • §7.3 संरचना — तालिका बनवाएँ: अंड • हर्मिका • यष्टि (+छत्री) • वेदिका • तोरणद्वार।
    • ★प्रदक्षिणा: पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश, टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा — मानो सूर्य के पथ का अनुकरण।
  • चित्र-कार्य: चित्र 4.10 (क) व (ख) तथा चित्र 4.3 की तुलना।
  • मूल्यांकन: स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? (NCERT प्र. 9)

कालांश 8 — स्तूपों की ‘खोज’ तथा मूर्तिकला★

  • §8 अमरावती की नियति: 1796 — स्थानीय राजा को अवशेष मिले, पत्थरों के इस्तेमाल का निश्चय; कॉलिन मेकेंज़ी की रिपोर्ट कभी छपी नहीं; 1854 — गुंटूर के कमिश्नर ने मूर्तियाँ मद्रास ले गए (एलियट संगमरमर); 1850 के दशक में पत्थर कलकत्ता, मद्रास, लंदन तक।
    • ! “हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया।”
    • ★एच.एच. कोल: “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” — प्लास्टर प्रतिकृतियाँ संग्रहालय में, असली कृतियाँ खोज की जगह पर।
    • ★साँची क्यों बचा? अमरावती की खोज थोड़ी पहले हुई (तब महत्त्व नहीं समझा गया); 1818 में साँची की खोज — तीन तोरणद्वार खड़े, टीला अच्छी हालत में; खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई।
    • चर्चा: खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया।
  • §9.1 पत्थर में गढ़ी कथाएँ: चित्र 4.13 — पहली नज़र में ग्रामीण दृश्य, वस्तुतः वेसान्तर जातक।
    • ★“अक्सर इतिहासकार किसी मूर्तिकला की व्याख्या लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना के द्वारा करते हैं।”
  • §9.2 उपासना के प्रतीक: रिक्त स्थान (ध्यान) • स्तूप (महापरिनिब्बान) • चक्र (सारनाथ का प्रथम उपदेश)।
    • ★“पेड़ का तात्पर्य केवल एक पेड़ नहीं था वरन् वह बुद्ध के जीवन की एक घटना का प्रतीक था।”
  • §9.3 लोक परंपराएँ: शालभंजिका (छूने से वृक्षों में फूल-फल); जानवर (हाथी = शक्ति व ज्ञान); गजलक्ष्मी (माया या गजलक्ष्मी — दोनों व्याख्याएँ); सर्प।
    • ★जेम्स फ़र्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना — क्योंकि वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे।
  • बॉक्स: अतीत से प्राप्त चित्र — अजंता (जातक कथाएँ, आभाभेद तकनीक)।
  • मूल्यांकन: साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है? (NCERT प्र. 6)

कालांश 9 — नयी धार्मिक परंपराएँ : महायान, पुराण, मंदिर★

  • §10.1 महायान: प्रारंभिक बौद्ध मत — व्यक्तिगत प्रयास, बुद्ध एक मनुष्य → मुक्तिदाता की कल्पना; बोधिसत्त = परम करुणामय, पुण्य का प्रयोग दूसरों की सहायता के लिए; मूर्ति-पूजा महत्त्वपूर्ण अंग।
    • ★बॉक्स — हीनयान या थेरवाद? ‘हीनयान’ महायानियों द्वारा दिया नाम; पुरातन परंपरा के अनुयायी स्वयं को थेरवादी कहते थे (थेर = प्रतिष्ठित शिक्षक)। — नामकरण की राजनीति समझाइए।
  • §10.2 पौराणिक हिंदू धर्म: वैष्णव (विष्णु) व शैव (शिव); भक्ति = प्रेम और समर्पण का रिश्ता।
    • दस अवतार; “इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण तरीका था”।
    • शिव — लिंग के रूप में, कभी मनुष्य रूप में; शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध, बैठने की शैली से पहचान।
    • ★पुराण: प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों द्वारा रचित; संस्कृत श्लोकों में; ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे; महिलाएँ और शूद्र — जिन्हें वैदिक साहित्य की अनुमति नहीं थी — पुराण सुन सकते थे।
    • वासुदेव-कृष्ण मथुरा के देवता → पूजा देश के अन्य इलाकों में फैली।
  • §10.3 मंदिर: गर्भगृह → शिखर → भित्ति चित्र → विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण, जल आपूर्ति।
    • ★कृत्रिम गुफाएँ: सबसे प्राचीन — ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संतों के लिए; विकसित रूप — आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा) — पूरी पहाड़ी काटकर।
    • ★ताम्रपत्र अभिलेख: “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”
  • मूल्यांकन: वैष्णववाद व शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला व मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए। (NCERT प्र. 8)

कालांश 10 — क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं? तथा पुनरावृत्ति★

  • §11.1 अनजाने को समझने की कोशिश: यूरोपीय विद्वान कई सिरों-हाथों वाली मूर्तियों को विकृत मानते थे; यूनानी कला परंपरा से तुलना; गांधार की बुद्ध-बोधिसत्त मूर्तियों से उत्साहित (तक्षशिला व पेशावर; भारतीय-यूनानी शासक)।
    • ★“परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना तैयार करना” — यह प्रवृत्ति हम सब अपनाते हैं।
  • §11.2 यदि लिखित और दृश्य का मेल न हो: महाबलीपुरम् की विशाल चट्टान (चित्र 4.30) — दो व्याख्याएँ: (1) गंगावतरण (प्राकृतिक दरार = नदी) (2) अर्जुन की तपस्या (केंद्र में साधु)।
  • ★अध्याय का निष्कर्ष (नीला अनुच्छेद): “बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार… स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज नहीं किए गए… हमने इस अध्याय में जिन शानदार उदाहरणों को चुना है वे एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”
  • पुनरावृत्ति: कालरेखा 1 व 2; फ्लैश कार्ड क्विज़; गृहकार्य आवंटन।
  • समापन: कालांश 1 के हुक-प्रश्न पर लौटिए — “मूर्ति को समझने के लिए चाहिए: (1) निर्माताओं की परंपरा का ज्ञान (2) लिखित साक्ष्य से तुलना (3) और यह स्वीकार कि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहेंगे।”

गृहकार्य / प्रायोजना

  • NCERT प्रश्न 1–5 (100–150 शब्द) लिखित; प्रश्न 6–9 में से कोई दो (500 शब्द)।
  • मानचित्र कार्य (प्रश्न 10): विश्व मानचित्र पर बौद्ध धर्म के प्रसार-क्षेत्र तथा जल-स्थल मार्ग।
  • परियोजना (कोई एक): प्रश्न 11 (अपने अड़ोस-पड़ोस की धार्मिक परंपरा का अध्ययन) अथवा प्रश्न 12 (पाँच मूर्तियों/चित्रों की तसवीरें, दो लोगों को दिखाकर वर्णनों की तुलना) — यह प्रोजेक्ट §11 की संकल्पना का सीधा अभ्यास है, अत्यंत प्रभावी।

समावेशी शिक्षण संकेत

  • ★यह अध्याय चित्र-प्रधान है (33 चित्र!)। प्रत्येक कालांश में कम-से-कम तीन चित्र दिखाएँ और ‘चर्चा कीजिए’ प्रॉम्प्ट कराएँ। दृश्य-अधिगम वाले विद्यार्थियों के लिए यह अध्याय सबसे सुलभ है।
  • संवेदनशीलता-सूचना: इस अध्याय में अनेक धर्मों (वैदिक, जैन, बौद्ध, आजीविक, लोकायत, वैष्णव, शैव) की चर्चा है। सभी को समान गंभीरता व सम्मान के साथ, ऐतिहासिक विकास के रूप में प्रस्तुत करें। NCERT की सटीक भाषा दोहराएँ; तुलनात्मक मूल्य-निर्णय से बचें।
  • कमज़ोर विद्यार्थी: 04-Revision-Notes व 06-Flashcards; स्तूप की संरचना व त्रिपिटक के आरेख-अभ्यास पर बल।
  • प्रतिभाशाली विद्यार्थी: 05-Question-Bank का खंड ‘च’ तथा 08-PARAKH का ‘सृजनात्मकता’ भाग; §11 (व्याख्या की सीमा) पर लघु शोध।
  • RBSE-दृष्टि: कालरेखा 2 से वस्तुनिष्ठ प्रश्न प्रायः आते हैं (वर्ष-व्यक्ति-कृति का मिलान); स्तूप की संरचना के पाँच भाग तथा जैन धर्म के पाँच व्रत अत्यंत संभावित।