पुस्तक: समकालीन भारत–2 (कक्षा 10, NCERT — भूगोल) पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 13 से 18 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ भी सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
कठिन शब्दों के अर्थ भाग 9 में, सभी आँकड़े भाग 10 में, और मानचित्र-कार्य फ़ाइल 05 (प्रश्न बैंक) के भाग च में दिया गया है।
यह पूरी पुस्तक का सबसे छोटा अध्याय है — केवल छह पृष्ठ। पर छोटा होने का मतलब आसान होना नहीं है। इसमें नाम बहुत हैं — जानवर, आंदोलन, अधिनियम, राज्य और उद्यान। और परीक्षा में इन्हीं नामों की जोड़ियाँ पूछी जाती हैं।
इसलिए इस अध्याय में तारीख़ और नाम सबसे ज़्यादा अंक दिलाते हैं — जैसे 1972 का अधिनियम, 1973 की बाघ परियोजना, 1988 का संयुक्त वन प्रबंधन।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
अध्याय की शुरुआत एक लोकगीत से होती है — यह पूरी पुस्तक में अकेला ऐसा अध्याय है।
“नारक! मेरे ईश्वर, लेपचाओं की दुनिया में आप संगीत के जनक हैं… मुझे आप अपना संगीत झरनों, नदियों, पर्वतों, वनों, कीटों और जानवरों से ग्रहण करने दें…” — स्रोत: लेपचा लोकसंगीत
पाठ्यपुस्तक ने यह गीत बिना कारण नहीं दिया। यह पूरे अध्याय का स्वर तय करता है — कि प्रकृति के साथ रिश्ता सिर्फ़ ‘उपयोग’ का नहीं, ‘सम्मान’ का भी होता है। कक्षा में यह गीत ज़रूर पढ़वाइए।
0.1 अध्याय का पहला विचार — हम अकेले नहीं हैं
- “इस ग्रह पर हम सूक्ष्म-जीवाणुओं और बैक्टीरिया, जोंक से लेकर वटवृक्ष, हाथी और ब्लू व्हेल तक करोड़ों दूसरे जीवधारियों के साथ रहते हैं।”
- “यह पूरा आवासीय स्थल जिस पर हम रहते हैं, अत्यधिक जैव-विविधताओं से भरा हुआ है।”
- “मानव और दूसरे जीवधारी एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं, जिसका हम मात्र एक हिस्सा हैं और अपने अस्तित्व के लिए इसके विभिन्न तत्त्वों पर निर्भर करते हैं।”
पाठ्यपुस्तक तीन उदाहरण देती है —
| हमें क्या चाहिए | कहाँ से मिलता है |
|---|---|
| वायु | जिसमें हम साँस लेते हैं |
| जल | जिसे हम पीते हैं |
| मृदा | जो अनाज पैदा करती है |
- “जिसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते; पौधे, पशु और सूक्ष्मजीवी इनका पुन: सृजन करते हैं।”
और वनों की भूमिका —
“वन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि ये प्राथमिक उत्पादक हैं जिन पर दूसरे सभी जीव निर्भर करते हैं।”
‘प्राथमिक उत्पादक’ शब्द ध्यान से समझिए। इसका अर्थ है कि पेड़-पौधे सूरज की रोशनी से अपना भोजन ख़ुद बनाते हैं, और बाक़ी सारे जीव — शाकाहारी, माँसाहारी, इनसान — सीधे या घुमाकर उन्हीं पर निर्भर हैं। इसीलिए वन को ‘पहली कड़ी’ कहा जाता है।
0.2 एक ज़रूरी वाक्य (साइड-नोट, पृष्ठ 13)
“वन्य जीवन और कृषि फसल उपजातियों में अत्यधिक जैव विविधताएँ पाई जाती हैं। यह आकार और कार्य में विभिन्न हैं परंतु अंतर्निर्भरताओं के जटिल जाल द्वारा एक तंत्र में गुँथी हुई हैं।”
यह वाक्य 3-अंक के प्रश्न में बहुत अच्छा लगता है। इसे ऐसे याद कीजिए — “आकार अलग, काम अलग — पर सब एक ही जाल में बँधे हैं।”
0.3 इस अध्याय की सूत्र-बात
वन और वन्य जीवन को केवल क़ानून नहीं बचा सकता — उसे बचाने के लिए समुदाय चाहिए।
पाठ्यपुस्तक यह बात दो हिस्सों में सिद्ध करती है —
- पहले वह सरकारी प्रयास गिनाती है — 1972 का अधिनियम, बाघ परियोजना, राष्ट्रीय उद्यान।
- फिर वह समुदाय के प्रयास गिनाती है — सरिस्का के गाँव, भैरोंदेव डाकव सोंचुरी, बिश्नोई, चिपको, बीज बचाओ, संयुक्त वन प्रबंधन।
- और अंत में वह साफ़ कहती है — “स्थानीय समुदायों को हर जगह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में शामिल करना चाहिए।”
इसीलिए अभ्यास का पहला प्रश्न ही यह पूछता है — “इनमें से कौन-सा संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता?”
0.4 अध्याय को चार भागों में देखिए
| भाग | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| भाग 1 | भारत में वनस्पतिजात और प्राणिजात | भारत जैव विविधता में दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है |
| भाग 2 | वन और वन्य जीवन का संरक्षण | 1972 का अधिनियम, बाघ परियोजना और अन्य सरकारी प्रयास |
| भाग 3 | वनों के प्रकार और वितरण | आरक्षित, रक्षित और अवर्गीकृत — तीन प्रकार |
| भाग 4 | समुदाय और वन संरक्षण | बिश्नोई से चिपको तक — और संयुक्त वन प्रबंधन |
1. भारत में वनस्पतिजात और प्राणिजात (पृष्ठ 13)
1.1 भारत की जैव विविधता — यह आँकड़ा अनिवार्य है
- “यदि आप आस पास नज़र दौड़ाते हैं, तो आप पाएँगे कि कुछ ऐसे प्राणी और पौधे हैं जो आपके क्षेत्र में ही पाए जाते हैं।”
- “वास्तव में भारत, जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है।”
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| विश्व की सारी जैव उपजातियों की कितनी संख्या भारत में पाई जाती है | 8 प्रतिशत |
| यह कितनी उपजातियाँ हैं | लगभग 16 लाख |
| और अभी कितनी खोजी जानी बाक़ी हैं | “ये अभी खोजी जाने वाली उपजातियों से दो या तीन गुना हैं” |
! इस आख़िरी वाक्य को ध्यान से पढ़िए। पाठ्यपुस्तक कह रही है कि जितनी उपजातियाँ हम जानते हैं, उससे दो-तीन गुना ज़्यादा अभी खोजी जानी बाक़ी हैं। यानी हमें अपनी ही धरती के बारे में बहुत कम पता है।
1.2 और फिर पाठ्यपुस्तक एक चेतावनी देती है
- “आपने सोचा होगा कि इन संसाधनों का आपके दैनिक जीवन में क्या महत्त्व है?”
- “ये विविध वनस्पतिजात और प्राणिजात हमारे हर रोज़ के जीवन में इतने गुँथे हुए हैं कि हम इसकी क़द्र नहीं करते।”
- “परंतु पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदना के कारण पिछले कुछ समय से इन संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ा है।”
‘असंवेदना’ शब्द पर रुकिए — यह पाठ्यपुस्तक का अपना चुना हुआ शब्द है। वह नहीं कह रही कि लोग बुरे हैं; वह कह रही है कि लोग महसूस नहीं करते। और यही सबसे बड़ी समस्या है।
1.3 क्रियाकलाप (पृष्ठ 13)
“अपने क्षेत्र में मानव और प्रकृति के समन्वयी संबंधों पर प्रचलित कहानियों के बारे में पता लगाएँ।”
2. भारत में वन और वन्य जीवन का संरक्षण (पृष्ठ 13–15)
2.1 संरक्षण क्यों आवश्यक है — चार कारण
“वन्य जीवन और वनों में तेज गति से हो रहे ह्रास के कारण इनका संरक्षण बहुत आवश्यक हो गया है। परंतु हमें वनों और वन्य जीवन का संरक्षण करना आवश्यक क्यों है?”
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | संरक्षण से पारिस्थितिकी विविधता बनी रहती है। |
| 2 | हमारे जीवन साध्य संसाधन — जल, वायु और मृदा — बने रहते हैं। |
| 3 | यह विभिन्न जातियों में बेहतर जनन के लिए वनस्पति और पशुओं में जीन (genetic) विविधता को भी संरक्षित करती है। |
| 4 | उदाहरण के तौर पर हम कृषि में अभी भी पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं; और जलीय जैव विविधता मोटे तौर पर मछली पालन बनाए रखने पर निर्भर है। |
तीसरा कारण सबसे गहरा है और अकसर छूट जाता है। ‘जीन विविधता’ का मतलब है कि एक ही फ़सल की कई किस्में बची रहें। अगर सिर्फ़ एक ही किस्म का गेहूँ बचे और उसे कोई बीमारी लग जाए, तो पूरी फ़सल ख़त्म हो सकती है। इसीलिए विविधता ही सुरक्षा है।
2.2 चित्र 2.1 — चार तस्वीरें (पृष्ठ 14)
| तस्वीर | विवरण |
|---|---|
| 1 | शांत घाटी के मुखली नर्सरी में आदिवासी युवतियाँ बाँस की पौध लगाते हुए। |
| 2 | छोटे-छोटे जंगली उत्पादों को बेचती आदिवासी महिलाएँ। |
| 3 | सूखी पत्तियों को एकत्रित करती हुई आदिवासी महिलाएँ। |
इन तीनों तस्वीरों में एक ही बात है — आदिवासी महिलाएँ। पाठ्यपुस्तक यह दिखाना चाहती है कि वन सिर्फ़ पेड़ नहीं हैं; वे लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी हैं। इसी बात पर पूरा भाग 4 खड़ा है।
2.3 भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम, 1972 — यह सबसे पक्का प्रश्न है
“1960 और 1970 के दशकों के दौरान, पर्यावरण संरक्षकों ने राष्ट्रीय वन्यजीवन सुरक्षा कार्यक्रम की पुरजोर माँग की।”
| क्रम | अधिनियम ने क्या किया |
|---|---|
| 1 | भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम 1972 में लागू किया गया। |
| 2 | इसमें वन्य-जीवों के आवास रक्षण के अनेक प्रावधान थे। |
| 3 | सारे भारत में रक्षित जातियों की सूची भी प्रकाशित की गई। |
| 4 | इस कार्यक्रम के तहत बची हुई संकटग्रस्त जातियों के बचाव पर ज़ोर दिया गया। |
| 5 | शिकार प्रतिबंधन पर ज़ोर दिया गया। |
| 6 | वन्यजीव आवासों का क़ानूनी रक्षण किया गया। |
| 7 | तथा जंगली जीवों के व्यापार पर रोक लगाने पर प्रबल ज़ोर दिया गया। |
इसके बाद क्या हुआ —
- “तत्पश्चात् केंद्रीय सरकार व कई राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव पशुविहार (sanctuary) स्थापित किए।”
2.4 विशेष परियोजनाएँ — किन प्राणियों के लिए
“केंद्रीय सरकार ने कई परियोजनाओं की भी घोषणा की जिनका उद्देश्य गंभीर खतरे में पड़े कुछ विशेष वन प्राणियों को रक्षण प्रदान करना था।”
इन प्राणियों की सूची पूरी याद कीजिए —
| # | प्राणी |
|---|---|
| 1 | बाघ |
| 2 | एक सींग वाला गैंडा |
| 3 | कश्मीरी हिरण अथवा हंगुल (hangul) |
| 4 | तीन प्रकार के मगरमच्छ — स्वच्छ जल मगरमच्छ, लवणीय जल मगरमच्छ और घड़ियाल |
| 5 | एशियाई शेर |
| 6 | और अन्य प्राणी |
और जिन पर शिकार-व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया —
- “इसके अतिरिक्त कुछ समय पहले भारतीय हाथी, काला हिरण, चिंकारा, भारतीय गोडावन (bustard) और हिम तेंदुओं आदि के शिकार और व्यापार पर संपूर्ण अथवा आंशिक प्रतिबंध लगाकर क़ानूनी रक्षण दिया है।”
दोनों सूचियाँ अलग-अलग याद कीजिए — पहली सूची = जिनके लिए परियोजनाएँ बनीं। दूसरी सूची = जिनके शिकार और व्यापार पर प्रतिबंध लगा। परीक्षा में यही अंतर पूछा जाता है।
2.5 बाघ परियोजना (बॉक्स, पृष्ठ 14) — यह पूरा बॉक्स याद कीजिए
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण बॉक्स है और इससे 4–5 अंक का प्रश्न बनता है।
बाघों की संख्या —
| समय | बाघों की संख्या |
|---|---|
| 20वीं शताब्दी के आरंभ में (अनुमानित) | 55,000 |
| 1973 में | मात्र 1,827 |
- “वन्यजीवन संरचना में बाघ (टाईगर) एक महत्त्वपूर्ण जंगली जाति है।”
- “1973 में अधिकारियों ने पाया कि देश में 20वीं शताब्दी के आरंभ में बाघों की संख्या अनुमानित 55,000 से घटकर मात्र 1,827 रह गई।”
★बाघों की घटती संख्या के मुख्य कारण — यह चार-बिंदु सूची अनिवार्य है —
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | बाघों को मारकर उनको व्यापार के लिए चोरी करना। |
| 2 | आवासीय स्थलों का सिकुड़ना। |
| 3 | भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की संख्या कम होना। |
| 4 | जनसंख्या में वृद्धि। |
और दो और कारण —
- “बाघों की खाल का व्यापार, और उनकी हड्डियों का एशियाई देशों में परंपरागत औषधियों में प्रयोग के कारण यह जाति विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है।”
भारत और नेपाल की ख़ास स्थिति —
- “चूँकि भारत और नेपाल दुनिया की दो-तिहाई बाघों को आवास उपलब्ध करवाते हैं, अत: ये देश ही शिकार, चोरी और गैर-क़ानूनी व्यापार करने वालों के मुख्य निशाने पर हैं।”
प्रोजेक्ट टाईगर —
- “‘प्रोजेक्ट टाईगर’ विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियोजनाओं में से एक है और इसकी शुरुआत 1973 में हुई।”
- “बाघ संरक्षण मात्र एक संकटग्रस्त जाति को बचाने का प्रयास नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य बहुत बड़े आकार के जैवजाति को भी बचाना है।”
यह आख़िरी वाक्य बहुत ज़रूरी है। बाघ को बचाने का मतलब सिर्फ़ बाघ बचाना नहीं है — जब आप बाघ के लिए जंगल बचाते हैं, तो उसी जंगल में रहने वाले हिरण, पक्षी, कीड़े, पेड़ और नदियाँ भी बच जाती हैं। इसी विचार को अंग्रेज़ी में ‘umbrella species’ कहते हैं — बाघ एक छाते की तरह है, जिसके नीचे पूरा जंगल बचता है।
2.6 बाघ रिज़र्व और उद्यानों की सूची — यह मानचित्र-कार्य के लिए अनिवार्य है
“भारत में बाघ संरक्षण परियोजनाओं के उदाहरण हैं —”
| # | उद्यान / रिज़र्व | राज्य |
|---|---|---|
| 1 | कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान | उत्तराखण्ड |
| 2 | सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान | पश्चिम बंगाल |
| 3 | बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश |
| 4 | सरिस्का वन्य जीव पशुविहार (sanctuary) | राजस्थान |
| 5 | मानस बाघ रिज़र्व (reserve) | असम |
| 6 | पेरियार बाघ रिज़र्व (reserve) | केरल |
★इन छह जोड़ियों को रटिए मत — नक़्शे पर देखिए। छह अलग-अलग राज्य, छह अलग-अलग दिशाएँ — उत्तर, पूर्व, मध्य, पश्चिम, पूर्वोत्तर और दक्षिण। यानी बाघ पूरे भारत में हैं। और सरिस्का राजस्थान का है — यह RBSE की परीक्षा में ज़रूर आता है।
2.7 चित्र 2.2 (पृष्ठ 15)
“काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में गैंडा और हिरन।” (काज़ीरंगा असम में है और एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध है — यह जानकारी उत्तर में जोड़ने लायक़ है।)
2.8 अब संरक्षण किस दिशा में जा रहा है — यह बदलाव ज़रूर लिखिए
- “आजकल संरक्षण परियोजनाएँ जैव विविधताओं पर केंद्रित होती हैं न कि इसके विभिन्न घटकों पर।”
- “संरक्षण के विभिन्न तरीक़ों की गहनता से खोज की जा रही है।”
- “संरक्षण नियोजन में कीटों को भी महत्त्व मिल रहा है।”
कब क्या जोड़ा गया — यह तालिका याद कीजिए —
| वर्ष / अधिनियम | क्या जोड़ा गया |
|---|---|
| वन्य जीव अधिनियम 1980 और 1986 | सैकड़ों तितलियों, पतंगों, भृंगों और एक ड्रैगनफ्लाई को भी संरक्षित जातियों में शामिल किया गया। |
| 1991 | पौधों की भी 6 जातियाँ पहली बार इस सूची में रखी गईं। |
यह बदलाव समझिए — पहले सिर्फ़ बड़े और सुंदर जानवर बचाए जाते थे (बाघ, शेर, गैंडा)। अब तितली, भृंग और यहाँ तक कि पौधे भी सूची में हैं। यानी सोच बदली — ‘जानवर बचाओ’ से ‘पूरा तंत्र बचाओ’।
2.9 क्रियाकलाप (पृष्ठ 15)
“भारत में वन्य जीव पशुविहार और राष्ट्रीय उद्यानों के बारे में और जानकारी प्राप्त करें और उनकी स्थिति मानचित्र पर अंकित करें।”
3. वन और वन्य जीव संसाधनों के प्रकार और वितरण (पृष्ठ 15–16)
3.1 पहले यह समझिए कि प्रबंधन कठिन क्यों है
- “यदि हम वन और वन्य जीव संसाधनों को संरक्षित करना चाहें, तो उनका प्रबंधन, नियंत्रण और विनियमन अपेक्षाकृत कठिन है।”
- “भारत में अधिकतर वन और वन्य जीवन या तो प्रत्यक्ष रूप में सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं या वन विभाग अथवा अन्य विभागों के जरिये सरकार के प्रबंधन में हैं।”
3.2 तीन प्रकार के वन — यह अभ्यास प्रश्न 2 है★★
| प्रकार | परिभाषा | कितना क्षेत्र |
|---|---|---|
| (क) आरक्षित वन (Reserved forests) | “जहाँ तक वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण की बात है, आरक्षित वनों को सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है।” | देश में आधे से अधिक वन क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किए गए हैं। |
| (ख) रक्षित वन (Protected forests) | “इन वनों को और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए इनकी सुरक्षा की जाती है।” | वन विभाग के अनुसार देश के कुल वन क्षेत्र का एक-तिहाई हिस्सा रक्षित है। |
| (ग) अवर्गीकृत वन (Unclassed forests) | “अन्य सभी प्रकार के वन और बंजरभूमि जो सरकार, व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं, अवर्गीकृत वन कहे जाते हैं।” | — |
★याद रखने का आसान तरीक़ा — आरक्षित = सबसे मूल्यवान · रक्षित = और नष्ट होने से बचाना · अवर्गीकृत = बाक़ी सब
3.3 स्थायी वन क्षेत्र क्या है
- “आरक्षित और रक्षित वन ऐसे स्थायी वन क्षेत्र हैं जिनका रख-रखाव इमारती लकड़ी, अन्य वन पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है।”
यानी ‘स्थायी वन क्षेत्र’ = आरक्षित वन + रक्षित वन। अवर्गीकृत वन इसमें नहीं आते। यह एक अंक का पक्का प्रश्न है।
3.4 राज्यवार वितरण — यह तालिका परीक्षा में सीधे आती है★★
| श्रेणी | राज्य |
|---|---|
| स्थायी वनों के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र | मध्य प्रदेश — कुल वन क्षेत्र का भी 75 प्रतिशत |
| कुल वनों में आरक्षित वनों का बड़ा अनुपात | जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखण्ड, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र |
| कुल वनों में रक्षित वनों का बड़ा अनुपात | बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान |
| अधिकतर वन क्षेत्र अवर्गीकृत वन, स्थानीय समुदायों के प्रबंधन में | पूर्वोत्तर के सभी राज्य और गुजरात |
★राजस्थान रक्षित वनों वाली सूची में है — यह याद रखिए, RBSE में पूछा जाता है। और यह भी ध्यान दीजिए — पूर्वोत्तर के राज्यों में वन सरकार के नहीं, समुदायों के प्रबंधन में हैं। यह तथ्य भाग 4 (समुदाय और वन संरक्षण) से सीधे जुड़ता है।
3.5 समाचार-पत्र बॉक्स (पृष्ठ 16)
पाठ्यपुस्तक ने दो असली अख़बारी कतरनें दी हैं —
| कतरन | विषय |
|---|---|
| “Gharial on the brink” (घड़ियाल कगार पर) | लेखक — रोमुलस व्हिटेकर और जानकी लेनिन। घड़ियाल की संख्या 1970 के दशक के बाद से सबसे कम है। |
| “Bird deaths blamed on dirty Yamuna” (पक्षियों की मौत का कारण गंदी यमुना) | दिल्ली सरकार की रिपोर्ट में ठहरे हुए पानी में विषैले तत्त्वों की ओर इशारा। |
और पाठ्यपुस्तक का प्रश्न —
“क्या आप उपर्युक्त समस्याओं के निदान के कारण ज्ञात कर सकते हैं?”
इन दो कतरनों का मक़सद यही है कि विद्यार्थी समझें — वन्य जीवन को ख़तरा सिर्फ़ शिकार से नहीं, प्रदूषण और आवास के बिगड़ने से भी है।
4. समुदाय और वन संरक्षण (पृष्ठ 16–17)
यह अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है — और अभ्यास के दोनों बड़े प्रश्न (4-i और 4-ii) इसी से हैं।
4.1 पहला विचार — वन संरक्षण कोई नयी बात नहीं है
- “वन संरक्षण की नीतियाँ हमारे देश में कोई नई बात नहीं है।”
- “हम आमतौर पर इस बात से अनजान हैं कि वन हमारे देश में कुछ मानव प्रजातियों के आवास भी हैं।”
- “भारत के कुछ क्षेत्रों में तो स्थानीय समुदाय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर अपने आवास स्थलों के संरक्षण में जुटे हैं, क्योंकि इसी से ही दीर्घकाल में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।”
यह पंक्ति पूरे भाग की कुंजी है — समुदाय वन इसलिए बचाते हैं क्योंकि वह उनका घर और रोज़गार है, सिर्फ़ भावना के कारण नहीं।
4.2 राजस्थान के दो उदाहरण — ये आपके अपने राज्य के हैं★
(क) सरिस्का बाघ रिज़र्व —
- “सरिस्का बाघ रिज़र्व में राजस्थान के गाँवों के लोग वन्य जीव रक्षण अधिनियम के तहत वहाँ से खनन कार्य बन्द करवाने के लिए संघर्षरत हैं।”
(ख) भैरोंदेव डाकव ‘सोंचुरी’ — यह उदाहरण पूरा याद कीजिए —
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | राजस्थान के अलवर ज़िले में |
| कितने गाँव | 5 गाँवों के लोगों ने |
| कितनी भूमि | 1,200 हेक्टेयर वन भूमि |
| क्या किया | उसे ‘भैरोंदेव डाकव सोंचुरी’ घोषित कर दिया |
| नियम किसके | “जिसके अपने ही नियम क़ानून हैं” |
| वे नियम क्या करते हैं | “जो शिकार वर्जित करते हैं तथा बाहरी लोगों की घुसपैठ से यहाँ के वन्य जीवन को बचाते हैं” |
- और एक सामान्य बात — “कई क्षेत्रों में तो लोग स्वयं वन्य जीव आवासों की रक्षा कर रहे हैं और सरकार की ओर से हस्तक्षेप भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं।”
★यह उदाहरण RBSE की परीक्षा के लिए सोने जैसा है। पाँच गाँव, 1,200 हेक्टेयर, अलवर ज़िला — तीनों तथ्य एक साथ लिखिए। और वह वाक्य ज़रूर जोड़िए कि उन्होंने सरकारी हस्तक्षेप भी स्वीकार नहीं किया — यह दिखाता है कि समुदाय सिर्फ़ ‘मददगार’ नहीं, ख़ुद ‘मालिक’ बन सकता है।
4.3 पवित्र पेड़ों के झुरमट (बॉक्स, पृष्ठ 16) — विविध और दुर्लभ जातियों की संपत्ति★
यह बॉक्स अभ्यास प्रश्न 4(ii) का सीधा उत्तर है।
- “प्रकृति की पूजा सदियों पुराना जनजातीय विश्वास है, जिसका आधार प्रकृति के हर रूप की रक्षा करना है।”
- “इन्हीं विश्वासों ने विभिन्न वनों को मूल एवं कौमार्य रूप में बचाकर रखा है, जिन्हें पवित्र पेड़ों के झुरमट (देवी-देवताओं के वन) कहते हैं।”
- “वनों के इन बड़े भागों में स्थानीय लोग ही घुसते हैं तथा न ही किसी और को छेड़छाड़ करने देते।”
★कौन-सी जनजाति किस पेड़ की पूजा करती है — यह तालिका अनिवार्य है —
| कौन | कहाँ | किस पेड़ की पूजा |
|---|---|---|
| मुंडा और संथाल जनजातियाँ | छोटानागपुर क्षेत्र | महुआ और कदंब के पेड़ों की |
| ओडिशा और बिहार की जनजातियाँ | ओडिशा और बिहार | शादी के दौरान इमली और आम के पेड़ की |
| हममें से बहुत से व्यक्ति | पूरे भारत में | पीपल और वटवृक्ष को पवित्र मानते हैं |
इस तालिका को याद रखने का तरीक़ा — मुंडा-संथाल = महुआ-कदंब · ओडिशा-बिहार = इमली-आम · हम सब = पीपल-वटवृक्ष।
4.4 भारतीय समाज के अन्य पारंपरिक तरीक़े
- “भारतीय समाज में अनेकों संस्कृतियाँ हैं और प्रत्येक संस्कृति में प्रकृति और इसकी कृतियों को संरक्षित करने के अपने पारंपरिक तरीक़े हैं।”
- “आमतौर पर झरनों, पहाड़ी चोटियों, पेड़ों और पशुओं को पवित्र मानकर उनका संरक्षण किया जाता है।”
- “आप अनेक मंदिरों के आस पास बंदर और लंगूर पाएँगी। उपासक उन्हें खिलाते-पिलाते हैं और मंदिर के भक्तों में गिनते हैं।”
★और बिश्नोई समाज का उदाहरण — यह राजस्थान का है —
“राजस्थान में बिश्नोई गाँवों के आस पास आप काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोरों के झुंड देख सकते हैं जो वहाँ के समुदाय का अभिन्न हिस्सा हैं और कोई उनको नुकसान नहीं पहुँचाता।”
★यह वाक्य RBSE की परीक्षा में ज़रूर लिखिए। चारों जानवरों के नाम याद कीजिए — काला हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोर। और ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक ने यह नहीं कहा कि सरकार ने उन्हें बचाया। उसने कहा कि समुदाय ने उन्हें अपना ‘अभिन्न हिस्सा’ मान लिया। यही इस अध्याय का पूरा तर्क है।
4.5 क्रियाकलाप (पृष्ठ 17)
“आप अपने आस पास के किसी ऐसे रीति-रिवाज के बारे में एक लेख लिखें जो पर्यावरण बचाव और संरक्षण में मदद करते हैं।”
4.6 तीन जन-आंदोलन★
(क) चिपको आंदोलन —
- “हिमालय में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन कई क्षेत्रों में वन कटाई रोकने में ही कामयाब नहीं रहा…”
- ”…अपितु यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों की जातियों को प्रयोग करके सामुदायिक वनीकरण अभियान को सफल बनाया जा सकता है।”
चिपको की दो उपलब्धियाँ अलग-अलग लिखिए — (1) वन कटाई रुकी, (2) स्थानीय प्रजातियों से वनीकरण सफल हुआ। दूसरी बात अकसर छूट जाती है और उसी पर अंक कटते हैं।
(ख) बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय —
-
“टिहरी में किसानों का बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय ने दिखा दिया कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक रूप से व्यवहार्य कृषि उत्पादन संभव है।”
-
“पारंपरिक संरक्षण तरीक़ों को पुनर्जीवित अथवा परिस्थिकी कृषि के नए तरीक़ों का विकास अब व्यापक हो गया है।”
4.7 संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) — यह पूरा भाग याद कीजिए★★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| क्या है | “भारत में संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम क्षरित वनों के प्रबंध और पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका के महत्त्व को उजागर करते हैं।” |
| औपचारिक शुरुआत कब | 1988 में |
| किस राज्य ने की | ओडिशा राज्य ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया |
| कैसे काम करता है | “वन विभाग के अंतर्गत ‘संयुक्त वन प्रबंधन’ क्षरित वनों के बचाव के लिए कार्य करता है” |
| संस्थाएँ कहाँ बनती हैं | “इसमें गाँव के स्तर पर संस्थाएँ बनाई जाती हैं जिसमें ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से कार्य करते हैं” |
| समुदाय को क्या मिलता है | “इसके बदले ये समुदाय मध्य स्तरीय लाभ जैसे गैर-इमारती वन उत्पादों के हक़दार होते हैं तथा सफल संरक्षण से प्राप्त इमारती लकड़ी लाभ में भी भागीदार होते हैं” |
★JFM का पूरा विचार एक वाक्य में — “जंगल बचाओ, और उसका फ़ायदा भी लो।” यही इसे ‘सिर्फ़ क़ानून’ से अलग बनाता है — इसमें समुदाय को हिस्सा मिलता है, इसलिए उसे जंगल बचाने में अपना फ़ायदा दिखता है।
4.8 अध्याय का निष्कर्ष — यह पूरा अनुच्छेद हर बड़े उत्तर में लिखिए★★
“भारत में पर्यावरण के विनाश और पुनर्निर्माण की क्रियाशीलताओं से सीख मिलती है कि स्थानीय समुदायों को हर जगह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में शामिल करना चाहिए।”
“परंतु स्थानीय समुदायों को फैसले लेने की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका में आने में अभी देर है।”
“अत: वे ही विकास क्रियाएँ मान्य होनी चाहिए जो जनमानस पर केंद्रित हों, पर्यावरण हितैषी हो और आर्थिक रूप से प्रतिफलित हों।”
आख़िरी वाक्य की तीन शर्तें अलग-अलग लिखिए — जनमानस पर केंद्रित · पर्यावरण हितैषी · आर्थिक रूप से प्रतिफलित। यह तीन-बिंदु वाला निष्कर्ष 5-अंक के हर प्रश्न में लिखा जा सकता है।
4.9 गौतम बुद्ध का उद्धरण (पृष्ठ 17)
“पेड़ एक विशेष असीमित दयालु और उदारपूर्ण जीवधारी हैं जो अपने सतत् पोषण के लिए कोई माँग नहीं करता और दानशीलतापूर्वक अपने जीवन की क्रियाओं को भेंट करता है। यह सभी की रक्षा करता है और स्वयं पर कुल्हाड़ी चलाने वाले विनाशक को भी छाया प्रदान करता है।” — गौतम बुद्ध (487 ई.पू.)
अध्याय जिस लोकगीत से शुरू हुआ था, उसी भाव पर ख़त्म होता है। कक्षा में यह उद्धरण अंत में ज़रूर पढ़वाइए — यह पूरे अध्याय को एक साथ बाँध देता है।
5. पूरे अध्याय की एक तालिका (आख़िरी दिन के लिए)
| भाग | मुख्य बात एक वाक्य में |
|---|---|
| जैव विविधता | भारत में विश्व की सारी जैव उपजातियों की 8 प्रतिशत (लगभग 16 लाख) पाई जाती हैं। |
| संरक्षण क्यों | पारिस्थितिकी विविधता, जीवन साध्य संसाधन (जल-वायु-मृदा) और जीन विविधता बनी रहती है। |
| 1972 का अधिनियम | भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम — आवास रक्षण, रक्षित जातियों की सूची, शिकार प्रतिबंधन, व्यापार पर रोक। |
| बाघ परियोजना | 1973 में शुरू; बाघ 55,000 से घटकर 1,827 रह गए थे; भारत और नेपाल में दुनिया के दो-तिहाई बाघ। |
| वनों के तीन प्रकार | आरक्षित (सर्वाधिक मूल्यवान) · रक्षित (और नष्ट होने से बचाना) · अवर्गीकृत (बाक़ी सब)। |
| राज्यवार वितरण | म.प्र. में स्थायी वन सबसे अधिक (75%); राजस्थान रक्षित वनों वाली सूची में; पूर्वोत्तर और गुजरात में अवर्गीकृत। |
| समुदाय के प्रयास | सरिस्का · भैरोंदेव डाकव सोंचुरी (अलवर, 5 गाँव, 1,200 हेक्टेयर) · बिश्नोई · पवित्र झुरमट। |
| जन-आंदोलन | चिपको (हिमालय) · बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय (टिहरी)। |
| संयुक्त वन प्रबंधन | 1988 में ओडिशा ने पहला प्रस्ताव पास किया; गाँव स्तर पर संस्थाएँ; समुदाय को लाभ में हिस्सा। |
| निष्कर्ष | वही विकास मान्य हो जो जनमानस पर केंद्रित, पर्यावरण हितैषी और आर्थिक रूप से प्रतिफलित हो। |
6. NCERT अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 17–18)
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
(i) इनमें से कौन-सा संरक्षण तरीका समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं करता? (क) संयुक्त वन प्रबंधन · (ख) चिपको आंदोलन · (ग) बीज बचाओ आंदोलन · (घ) वन्य जीव पशुविहार (sanctuary) का परिसीमन
उत्तर: (घ) वन्य जीव पशुविहार का परिसीमन।
कारण — बाक़ी तीनों में समुदाय ख़ुद हिस्सा लेता है, जबकि पशुविहार की सीमा तय करना सरकारी काम है जिसमें समुदाय की सीधी भागीदारी नहीं होती।
2. निम्नलिखित का मेल करें
| वन का प्रकार | सही परिभाषा |
|---|---|
| आरक्षित वन | वन और वन्य जीव संसाधन संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान वन। |
| रक्षित वन | वन भूमि जो और अधिक क्षरण से बचाई जाती है। |
| अवर्गीकृत वन | सरकार, व्यक्तियों के निजी और समुदायों के अधीन अन्य वन और बंजर भूमि। |
! ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक में यह मेल जान-बूझकर उलट-पुलट कर छापा गया है, ताकि विद्यार्थी मिलान करे। ऊपर की तालिका सही मिलान दिखाती है।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) जैव विविधता क्या है? यह मानव जीवन के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है? उत्तर: जैव विविधता का अर्थ है पृथ्वी पर पाए जाने वाले पौधों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों की विविधता, जो आकार और कार्य में अलग-अलग होते हुए भी अंतर्निर्भरताओं के जटिल जाल द्वारा एक तंत्र में गुँथी हुई है। यह मानव जीवन के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी से पारिस्थितिकी विविधता बनी रहती है, हमारे जीवन साध्य संसाधन — जल, वायु और मृदा — बने रहते हैं, और वनस्पति तथा पशुओं में जीन विविधता संरक्षित रहती है।
(ii) विस्तारपूर्वक बताएँ कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास के कारक हैं? उत्तर के मुख्य बिंदु —
- पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदना के कारण पिछले कुछ समय से इन संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ा है।
- व्यापार के लिए शिकार और चोरी — जैसे बाघों को उनकी खाल के लिए मारा गया और उनकी हड्डियाँ एशियाई देशों में परंपरागत औषधियों में इस्तेमाल हुईं।
- आवासीय स्थलों का सिकुड़ना — बढ़ती जनसंख्या के कारण वन्य जीवों के रहने की जगह कम होती गई।
- भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की संख्या कम होना।
- प्रदूषण — जैसे यमुना के गंदे पानी से पक्षियों की मौत, और घड़ियाल की संख्या का 1970 के दशक के बाद सबसे कम स्तर पर पहुँचना।
- खनन जैसी गतिविधियाँ — जिसके विरुद्ध सरिस्का बाघ रिज़र्व में राजस्थान के गाँवों के लोग संघर्षरत हैं।
! शिक्षक के लिए एक ज़रूरी नोट — यह प्रश्न पुराने संस्करण के उस भाग से आया था जो इस पुनर्संयोजित संस्करण में हटा दिया गया है। इसलिए इसका उत्तर अब बाघ परियोजना वाले बॉक्स, समाचार-पत्र की कतरनों और सरिस्का वाले उदाहरण से बनाना पड़ता है। ऊपर के बिंदु उसी आधार पर बने हैं। (विस्तार से फ़ाइल 09 में।)
4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए
(i) भारत में विभिन्न समुदायों ने किस प्रकार वनों और वन्य जीव संरक्षण और रक्षण में योगदान किया है? विस्तारपूर्वक विवेचना करें।
उत्तर के मुख्य बिंदु —
- भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर अपने आवास स्थलों के संरक्षण में जुटे हैं, क्योंकि इसी से दीर्घकाल में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।
- सरिस्का बाघ रिज़र्व में राजस्थान के गाँवों के लोग वन्य जीव रक्षण अधिनियम के तहत वहाँ से खनन कार्य बन्द करवाने के लिए संघर्षरत हैं।
- राजस्थान के अलवर ज़िले में 5 गाँवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन भूमि को ‘भैरोंदेव डाकव सोंचुरी’ घोषित कर दिया, जिसके अपने ही नियम-क़ानून हैं जो शिकार वर्जित करते हैं और बाहरी लोगों की घुसपैठ से वन्य जीवन को बचाते हैं।
- हिमालय में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन कई क्षेत्रों में वन कटाई रोकने में कामयाब रहा और उसने यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों की जातियों को प्रयोग करके सामुदायिक वनीकरण अभियान सफल बनाया जा सकता है।
- टिहरी में किसानों के बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय ने दिखाया कि रासायनिक उर्वरकों के बिना भी विविध फसल उत्पादन से आर्थिक रूप से व्यवहार्य कृषि संभव है।
- 1988 में ओडिशा ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया; इसमें गाँव के स्तर पर संस्थाएँ बनती हैं जहाँ ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी साथ काम करते हैं, और बदले में समुदाय गैर-इमारती वन उत्पादों के हक़दार तथा इमारती लकड़ी के लाभ में भागीदार होते हैं।
निष्कर्ष — इससे सीख मिलती है कि स्थानीय समुदायों को हर जगह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में शामिल करना चाहिए, और वही विकास क्रियाएँ मान्य होनी चाहिए जो जनमानस पर केंद्रित हों, पर्यावरण हितैषी हों और आर्थिक रूप से प्रतिफलित हों।
(ii) वन और वन्य जीव संरक्षण में सहयोगी रीति-रिवाजों पर एक निबन्ध लिखिए।
उत्तर के मुख्य बिंदु —
- प्रकृति की पूजा सदियों पुराना जनजातीय विश्वास है, जिसका आधार प्रकृति के हर रूप की रक्षा करना है।
- इन्हीं विश्वासों ने विभिन्न वनों को मूल एवं कौमार्य रूप में बचाकर रखा है, जिन्हें पवित्र पेड़ों के झुरमट या देवी-देवताओं के वन कहते हैं; इन भागों में स्थानीय लोग ही घुसते हैं और किसी और को छेड़छाड़ नहीं करने देते।
- छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा और संथाल जनजातियाँ महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा करती हैं; ओडिशा और बिहार की जनजातियाँ शादी के दौरान इमली और आम के पेड़ की पूजा करती हैं; और हममें से बहुत से व्यक्ति पीपल तथा वटवृक्ष को पवित्र मानते हैं।
- आमतौर पर झरनों, पहाड़ी चोटियों, पेड़ों और पशुओं को पवित्र मानकर उनका संरक्षण किया जाता है; अनेक मंदिरों के आस पास बंदर और लंगूर पाए जाते हैं जिन्हें उपासक खिलाते-पिलाते हैं।
- राजस्थान में बिश्नोई गाँवों के आस पास काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोरों के झुंड देखे जा सकते हैं, जो वहाँ के समुदाय का अभिन्न हिस्सा हैं और कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाता।
निष्कर्ष — इन रीति-रिवाजों ने बिना किसी क़ानून के सदियों तक वनों और वन्य जीवन को बचाए रखा, और आज भी संरक्षण की सबसे टिकाऊ व्यवस्था यही सिद्ध होती है।
7. महत्त्वपूर्ण नाम — एक नज़र में
| नाम | पहचान |
|---|---|
| भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम, 1972 | वन्य-जीवों के आवास रक्षण, रक्षित जातियों की सूची, शिकार प्रतिबंधन और व्यापार पर रोक |
| प्रोजेक्ट टाईगर (बाघ परियोजना) | 1973 में शुरू; विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियोजनाओं में से एक |
| हंगुल (hangul) | कश्मीरी हिरण |
| घड़ियाल | तीन प्रकार के मगरमच्छों में से एक (बाक़ी दो — स्वच्छ जल और लवणीय जल मगरमच्छ) |
| गोडावन (bustard) | भारतीय पक्षी, जिसके शिकार-व्यापार पर प्रतिबंध लगा |
| कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान | उत्तराखण्ड |
| सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान | पश्चिम बंगाल |
| बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश |
| सरिस्का वन्य जीव पशुविहार | राजस्थान |
| मानस बाघ रिज़र्व | असम |
| पेरियार बाघ रिज़र्व | केरल |
| काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान | असम (गैंडा और हिरन — चित्र 2.2) |
| भैरोंदेव डाकव सोंचुरी | अलवर ज़िला, राजस्थान — 5 गाँव, 1,200 हेक्टेयर |
| बिश्नोई | राजस्थान का समुदाय — काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोर |
| मुंडा और संथाल | छोटानागपुर — महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा |
| चिपको आंदोलन | हिमालय — वन कटाई रोकी और सामुदायिक वनीकरण सफल किया |
| बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय | टिहरी — रासायनिक उर्वरकों के बिना कृषि |
| संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) | 1988 में ओडिशा ने पहला प्रस्ताव पास किया |
| रोमुलस व्हिटेकर और जानकी लेनिन | “Gharial on the brink” लेख के लेखक |
| गौतम बुद्ध (487 ई.पू.) | पेड़ों पर प्रसिद्ध उद्धरण |
8. महत्त्वपूर्ण वर्ष — एक नज़र में
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1960 और 1970 के दशक | पर्यावरण संरक्षकों ने राष्ट्रीय वन्यजीवन सुरक्षा कार्यक्रम की पुरजोर माँग की |
| 1972 | भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम लागू हुआ |
| 1973 | बाघों की संख्या घटकर 1,827 पाई गई; ‘प्रोजेक्ट टाईगर’ की शुरुआत हुई |
| 1980 और 1986 | वन्य जीव अधिनियम के तहत तितलियों, पतंगों, भृंगों और एक ड्रैगनफ्लाई को संरक्षित सूची में जोड़ा गया |
| 1988 | ओडिशा ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया |
| 1991 | पौधों की 6 जातियाँ पहली बार संरक्षित सूची में रखी गईं |
9. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जैव विविधता | पृथ्वी पर पाए जाने वाले पौधों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों की विविधता, जो अंतर्निर्भरताओं के जटिल जाल द्वारा एक तंत्र में गुँथी हुई है। |
| पारिस्थितिकी तंत्र | किसी क्षेत्र के सभी जीवों और उनके भौतिक पर्यावरण का वह तंत्र जिसमें वे एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। |
| प्राथमिक उत्पादक | वे जीव (मुख्यत: पौधे और वन) जो अपना भोजन ख़ुद बनाते हैं और जिन पर बाक़ी सभी जीव निर्भर करते हैं। |
| वनस्पतिजात (Flora) | किसी क्षेत्र के सभी पौधों का समूह। |
| प्राणिजात (Fauna) | किसी क्षेत्र के सभी प्राणियों का समूह। |
| जीन (genetic) विविधता | एक ही जाति के भीतर पाई जाने वाली विविधता, जो बेहतर जनन के लिए आवश्यक है। |
| संकटग्रस्त जाति | वह जाति जिसके विलुप्त होने का ख़तरा हो। |
| राष्ट्रीय उद्यान | सरकार द्वारा घोषित वह संरक्षित क्षेत्र जहाँ वन्य जीवन और उसके आवास की पूरी सुरक्षा की जाती है। |
| वन्य जीव पशुविहार (Sanctuary) | वह संरक्षित क्षेत्र जो विशेष रूप से वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है। |
| आरक्षित वन (Reserved forests) | वे वन जिन्हें वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है; देश में आधे से अधिक वन क्षेत्र इसी श्रेणी में है। |
| रक्षित वन (Protected forests) | वे वन जिन्हें और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए सुरक्षा दी जाती है; देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई। |
| अवर्गीकृत वन (Unclassed forests) | अन्य सभी प्रकार के वन और बंजरभूमि, जो सरकार, व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं। |
| स्थायी वन क्षेत्र | आरक्षित और रक्षित वन, जिनका रख-रखाव इमारती लकड़ी, अन्य वन पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है। |
| पवित्र पेड़ों के झुरमट | देवी-देवताओं के वन — वे वन-भाग जिन्हें जनजातीय विश्वासों ने मूल और अछूते रूप में बचाकर रखा है। |
| संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) | वह व्यवस्था जिसमें गाँव के स्तर पर बनी संस्थाओं में ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी मिलकर क्षरित वनों का बचाव करते हैं और समुदाय को वन उत्पादों तथा लाभ में हिस्सा मिलता है। |
| गैर-इमारती वन उत्पाद | लकड़ी के अलावा वन से मिलने वाली चीज़ें — जैसे फल, गोंद, शहद, औषधीय पौधे और पत्ते। |
| क्षरित वन | वे वन जो कट-छँटकर या नष्ट होकर कमज़ोर पड़ चुके हैं। |
| सोंचुरी | ‘सैंक्चुअरी’ (sanctuary) का स्थानीय उच्चारण; अलवर के गाँवों ने अपनी वन भूमि को यही नाम दिया। |
10. महत्त्वपूर्ण आँकड़े — एक नज़र में
| आँकड़ा | किससे जुड़ा |
|---|---|
| 8 प्रतिशत | विश्व की जैव उपजातियों का वह हिस्सा जो भारत में पाया जाता है |
| लगभग 16 लाख | भारत में पाई जाने वाली जैव उपजातियों की संख्या |
| दो या तीन गुना | अभी खोजी जाने वाली उपजातियाँ, ज्ञात उपजातियों की तुलना में |
| 55,000 | 20वीं शताब्दी के आरंभ में बाघों की अनुमानित संख्या |
| 1,827 | 1973 में बची हुई बाघों की संख्या |
| दो-तिहाई | दुनिया के वे बाघ जिन्हें भारत और नेपाल आवास देते हैं |
| आधे से अधिक | देश का वह वन क्षेत्र जो आरक्षित वन घोषित है |
| एक-तिहाई | देश के कुल वन क्षेत्र का वह हिस्सा जो रक्षित है |
| 75 प्रतिशत | मध्य प्रदेश के कुल वन क्षेत्र का वह हिस्सा जो स्थायी वन है |
| 5 गाँव | अलवर ज़िले के वे गाँव जिन्होंने भैरोंदेव डाकव सोंचुरी बनाई |
| 1,200 हेक्टेयर | उन गाँवों द्वारा संरक्षित वन भूमि |
| 6 जातियाँ | 1991 में पहली बार संरक्षित सूची में रखे गए पौधे |
अंतिम बात। यह अध्याय छोटा है, पर इसमें नाम बहुत हैं। इन्हें अलग-अलग रटने की जगह जोड़ियों में याद कीजिए — उद्यान + राज्य · जनजाति + पेड़ · आंदोलन + जगह · वर्ष + घटना। और सबसे ज़रूरी — राजस्थान इस अध्याय में चार बार आता है: सरिस्का, भैरोंदेव डाकव सोंचुरी, बिश्नोई, और रक्षित वनों वाली राज्य-सूची। ये चारों RBSE की परीक्षा में पूछे जाते हैं।