पुस्तक: समकालीन भारत–2 (कक्षा 10, NCERT — भूगोल) पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 19 से 29 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ भी सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
कठिन शब्दों के अर्थ भाग 10 में, सभी आँकड़े भाग 11 में, और मानचित्र-कार्य फ़ाइल 05 (प्रश्न बैंक) के भाग च में दिया गया है।
★एक बात पहले जान लीजिए — यह पूरी पुस्तक का सबसे ‘राजस्थानी’ अध्याय है। खादीन, जोहड़, टाँका, पालर पानी, इंदिरा गांधी नहर, सरदार सरोवर, बाड़मेर, जालौर, जैसलमेर, बीकानेर, फलोदी — ये सब आपकी अपनी धरती के शब्द हैं और सब इसी अध्याय में हैं। RBSE की परीक्षा में इस अध्याय से सबसे ज़्यादा प्रश्न आते हैं। इसे सबसे ज़्यादा समय दीजिए।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
अध्याय की शुरुआत दो बच्चों की बातचीत से होती है — चिंटू और पिंकी की।
चिंटू: “पिंकी, क्या तुमने टी.वी. पर असम में आई बाढ़ पर दिल दहलाने वाली रिपोर्ट देखी? हे भगवान! उसने क्या प्रलय मचाई है…”
पिंकी: “हाँ चिंटू, मैंने देखा। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जल जीवन दे भी सकता है और ले भी सकता है। हम पानी के बिना क्या करेंगे?…”
★यही इस पूरे अध्याय की सूत्र-बात है — “जल जीवन दे भी सकता है और ले भी सकता है।” इसीलिए अध्याय में एक तरफ़ बाढ़ है और दूसरी तरफ़ सूखा; एक तरफ़ बड़े बाँध हैं और दूसरी तरफ़ छोटे टाँके।
पिंकी आगे बताती है कि जल कहाँ-कहाँ चाहिए —
- कारख़ाने में बहुत सारी चीज़ों के लिए
- मशीनों को ठंडा करने के लिए
- और कारख़ाना ख़ुद जल विद्युत संयंत्र से बनी बिजली से चलता है
और वह एक बहुत गहरी बात कहती है —
“अब मैं समझ सकती हूँ कि विभिन्न युगों में मानव, नदियों और अन्य जल स्रोतों जैसे — झरनों, झीलों, पोखरों और मरुद्यानों के आस-पास क्यों बसता था।”
0.1 पहला तथ्य — पानी बहुत है, फिर भी कम है
- “तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है, परंतु इसमें प्रयोग में लाने योग्य अलवणीय जल का अनुपात बहुत कम है।”
- “यह अलवणीय जल हमें सतही अपवाह और भौमजल स्रोत से प्राप्त होता है।”
- “जिनका लगातार नवीकरण और पुनर्भरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है।”
- “सारा जल जलीय चक्र में गतिशील रहता है जिससे जल नवीकरण सुनिश्चित होता है।”
और फिर पाठ्यपुस्तक वह सवाल पूछती है जिस पर पूरा अध्याय टिका है —
“आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि जब पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से घिरा है और जल एक नवीकरण योग्य संसाधन है, तब भी विश्व के अनेक देशों और क्षेत्रों में जल की कमी कैसे है? ऐसी भविष्यवाणी क्यों की जा रही है कि 2025 में 20 करोड़ लोग जल की नितांत कमी झेलेंगे?”
यह प्रश्न ही अध्याय का ढाँचा है। बाक़ी सब इसी का उत्तर है।
0.2 अध्याय को चार भागों में देखिए
| भाग | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| भाग 1 | जल दुर्लभता और संरक्षण की आवश्यकता | पानी की कमी सिर्फ़ कम वर्षा से नहीं, अतिशोषण और असमान वितरण से होती है |
| भाग 2 | बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाएँ | नेहरू ने बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था |
| भाग 3 | बाँधों की आलोचना | वही बाँध जो बाढ़ रोकने बने थे, कभी-कभी बाढ़ का कारण बन जाते हैं |
| भाग 4 | वर्षा जल संग्रहण | छोटे और पुराने तरीक़े — टाँका, खादीन, जोहड़, गुल, बाँस ड्रिप |
0.3 अध्याय की सबसे बड़ी बहस
बड़े बाँध बनाएँ या छोटे-छोटे टाँके?
पाठ्यपुस्तक दोनों पक्ष रखती है और किसी एक को ‘सही’ नहीं कहती —
- भाग 2 में वह बताती है कि बाँधों ने सिंचाई, बिजली और बाढ़ नियंत्रण दिया।
- भाग 3 में वह उनकी हर आलोचना ईमानदारी से गिनाती है।
- भाग 4 में वह कहती है कि वर्षाजल संग्रहण तंत्र “सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प हो सकते हैं।”
★इसलिए इस अध्याय के हर बड़े उत्तर में दोनों पक्ष लिखिए। केवल एक पक्ष लिखने पर आधे अंक कट जाते हैं।
1. जल दुर्लभता और जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता (पृष्ठ 19–21)
1.1 सबसे पहले वह ग़लतफ़हमी जिसे पाठ्यपुस्तक तोड़ती है
“जैसे ही हम जल की कमी की बात करते हैं तो हमें तत्काल ही कम वर्षा वाले क्षेत्रों या सूखाग्रस्त इलाकों का ध्यान आता है।”
- “हमारे मानस पटल पर तुरंत राजस्थान के मरुस्थल और जल से भरे मटके संतुलित करती हुई और जल भरने के लिए लंबा रास्ता तय करती पनिहारिनों के चित्र चित्रित हो जाते हैं।”
- “यह सच है कि वर्षा में वार्षिक और मौसमी परिवर्तन के कारण जल संसाधनों की उपलब्धता में समय और स्थान के अनुसार विभिन्नता है।”
पर असली कारण यह नहीं है —
★★“परंतु अधिकतया जल की कमी इसके अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और समाज के विभिन्न वर्गों में जल के असमान वितरण के कारण होती है।”
यह वाक्य पूरे भाग का सार है। इसे शब्दश: याद कीजिए — तीन कारण: अतिशोषण · अत्यधिक प्रयोग · असमान वितरण।
1.2 और फिर वह चौंकाने वाला सवाल
“क्या यह संभव है कि किसी क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में जल संसाधन होने के बावजूद भी वहाँ जल की दुर्लभता हो? हमारे कई शहर इसके उदाहरण हैं।”
- “अत: जल दुर्लभता अत्यधिक और बढ़ती जनसंख्या और उसके परिणामस्वरूप जल की बढ़ती माँग और उसके असमान वितरण का परिणाम हो सकता है।”
कक्षा में यह उदाहरण दीजिए — “कोलकाता में 180 मिलीमीटर बारिश हुई और पूरा शहर डूब गया, फिर भी एक लड़का सड़क पर खड़े गंदे पानी से पीने का पानी भर रहा है।” (यह चित्र 3.1 की असली तस्वीर है।) यही ‘प्रचुर जल के बावजूद दुर्लभता’ है।
1.3 जल सिर्फ़ पीने के लिए नहीं चाहिए
- “जल, अधिक जनसंख्या के लिए घरेलू उपयोग में ही नहीं बल्कि अधिक अनाज उगाने के लिए भी चाहिए।”
- “अत: अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए जल संसाधनों का अतिशोषण करके ही सिंचित क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है और शुष्क ऋतु में भी खेती की जा सकती है।”
- “सिंचित कृषि में जल का सबसे ज़्यादा उपयोग होता है।”
और इसका हल —
“शुष्क कृषि तकनीकों तथा सूखा प्रतिरोधी फसलों के विकास द्वारा अब कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने की आवश्यकता है।”
यह वाक्य 3-अंक के प्रश्न में बहुत अच्छा लगता है।
1.4 चित्र 3.1 — पानी की कमी/दुर्लभता (पृष्ठ 20)
पाठ्यपुस्तक ने चार असली तस्वीरें दी हैं —
| तस्वीर | विवरण |
|---|---|
| 1 | भारी वर्षा के बाद कोलकाता में एक लड़का पीने का पानी इकट्ठा कर रहा है; रातभर की लगातार बारिश ने 180 मिलीमीटर का रिकॉर्ड बनाया और शहर ठप हो गया। |
| 2 | भूकंप से बची एक कश्मीरी महिला बर्फ़ में पानी ले जाते हुए। |
| 3 | मटके लिए कतार में खड़ी महिलाएँ (पनिहारिनें)। |
1.5 इज़राइल और भारत की तुलना — यह बॉक्स सबसे ज़्यादा पूछा जाता है★★
चित्र 3.1 के साथ दिया गया बॉक्स ज्यों-का-त्यों याद कीजिए —
| देश | औसत वार्षिक वर्षा | जल की स्थिति |
|---|---|---|
| इज़राइल | 25 सेमी. | जल का कोई अभाव नहीं |
| भारत | 114 सेमी. | प्रति वर्ष किसी भाग में सूखा अवश्य पड़ता है |
कारण क्या है — यह पूरा लिखिए —
“देश में जल की उपलब्धता और उसके स्वरूप के अनुसार समुचित जलप्रबंधन न होने के कारण ही वर्षा का जल नदी-नालों में तेज़ी से बहकर समुद्र में चला जाता है, जिससे वर्षा के बाद के लगभग नौ महीने देश के लिए पानी की कमी के होते हैं।” “यही ही मूल कारण है देश में जलीय अभाव के, जिसे हम वांछित प्रबंधन के द्वारा ही नियंत्रित कर सकते हैं।”
★यह तुलना कक्षा में बहुत असर करती है। 25 सेमी. वाला देश सुखी है और 114 सेमी. वाला देश प्यासा — यानी समस्या पानी की नहीं, प्रबंधन की है। यही अध्याय का असली संदेश है।
1.6 भौमजल का गिरता स्तर
- “आपने टेलीविजन विज्ञापनों में देखा होगा कि बहुत से किसानों के खेतों पर अपने निजी कुएँ और नलकूप हैं जिनसे सिंचाई करके वे उत्पादन बढ़ा रहे हैं।”
- “परंतु आपने सोचा है कि इसका परिणाम क्या हो सकता है? इसके कारण भौम जलस्तर नीचे गिर सकता है और लोगों के लिए जल की उपलब्धता में कमी हो सकती है और भोजन सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है।”
1.7 औद्योगीकरण और शहरीकरण का दबाव
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | “स्वतंत्रता के बाद भारत में तेज़ी से औद्योगीकरण और शहरीकरण हुआ और विकास के अवसर प्राप्त हुए।” |
| 2 | “आजकल हर जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) बड़े औद्योगिक घरानों के रूप में फैली हुई हैं।” |
| 3 | “उद्योगों की बढ़ती हुई संख्या के कारण अलवणीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।” |
| 4 | “उद्योगों को अत्यधिक जल के अलावा उनको चलाने के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है और इसकी काफ़ी हद तक पूर्ति जल विद्युत से होती है।” |
| 5 | “इसके अलावा शहरों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या तथा शहरी जीवन शैली के कारण न केवल जल और ऊर्जा की आवश्यकता में बढ़ोतरी हुई है अपितु इनसे संबंधित समस्याएँ और भी गहरी हुई हैं।” |
| 6 | “यदि आप शहरी आवास समितियों या कालोनियों पर नज़र डालें तो आप पाएँगे कि उनके अंदर जल पूर्ति के लिए नलकूप स्थापित किए गए हैं।” |
“इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि शहरों में जल संसाधनों का अति शोषण हो रहा है और इनकी कमी होती जा रही है।”
1.8 जल की मात्रा नहीं,गुणवत्ता भी समस्या है
- “अब तक हमने जल दुर्लभता के मात्रात्मक पहलू की ही बात की है।”
- “आओ, हम ऐसी स्थिति के बारे में विचार करें जहाँ लोगों की आवश्यकता के लिए काफ़ी जल संसाधन हैं, परंतु फिर भी इन क्षेत्रों में जल की दुर्लभता है।”
- “यह दुर्लभता जल की ख़राब गुणवत्ता के कारण हो सकती है।”
- “पिछले कुछ वर्षों से यह चिंता का विषय बनता जा रहा है कि लोगों की आवश्यकता के लिए प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध होने के बावजूद यह घरेलू और औद्योगिक अपशिष्टों, रसायनों, कीटनाशकों और कृषि में प्रयुक्त उर्वरकों द्वारा प्रदूषित है और मानव उपयोग के लिए ख़तरनाक है।”
★इसे दो शब्दों में याद कीजिए — मात्रात्मक दुर्लभता (पानी कम है) और गुणात्मक दुर्लभता (पानी है, पर पीने लायक़ नहीं)। यह अंतर परीक्षा में पूछा जाता है।
1.9 जल जीवन मिशन (J.J.M.) — यह आँकड़ा अनिवार्य है
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| किसने घोषित किया | भारत सरकार ने |
| उद्देश्य | ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना और विशेष रूप से जीवनयापन को आसान बनाना |
| लक्ष्य | प्रत्येक ग्रामीण परिवार को लंबी अवधि के आधार पर नियमित रूप से प्रति व्यक्ति 55 लीटर के सेवा स्तर पर पीने योग्य पाइप के पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना |
| स्रोत | आर्थिक सर्वेक्षण 2020–21, पृष्ठ 357 |
★‘प्रति व्यक्ति 55 लीटर’ — यह संख्या ज़रूर याद रखिए।
1.10 अटल भूजल योजना (अटल जल) — बॉक्स, पृष्ठ 21
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कितने राज्यों में | सात राज्य |
| कौन-से राज्य | गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश |
| कहाँ लागू | 80 ज़िलों के 229 प्रशासनिक ब्लॉकों/तालुकाओं के 8220 जल की कमी वाले ग्राम पंचायतों में |
| कितना हिस्सा | चुने गए राज्यों में जल की कमी (अति-दोहित, गंभीर और अर्ध-गंभीर) ब्लॉकों की कुल संख्या का लगभग 37 प्रतिशत |
| प्रमुख पहलू | जलसंरक्षण और विवेकपूर्ण जल प्रबंधन के मौजूदा ढर्रे के प्रति जनता के व्यवहार में परिवर्तन लाना |
| स्रोत | वार्षिक रिपोर्ट, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार 2022–23 |
★राजस्थान इन सात राज्यों में है — RBSE के लिए यह ज़रूर लिखिए। और आख़िरी पंक्ति पर ध्यान दीजिए — योजना का मुख्य लक्ष्य कुआँ खोदना नहीं, लोगों का व्यवहार बदलना है। यह बहुत गहरी बात है।
1.11 संरक्षण क्यों ज़रूरी है — पाँच कारण
“आपने अनुभव कर लिया होगा कि समय की माँग है कि हम अपने जल संसाधनों का संरक्षण और प्रबंधन करें —”
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | स्वयं को स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों से बचाएँ |
| 2 | खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करें |
| 3 | अपनी आजीविका सुनिश्चित करें |
| 4 | उत्पादक क्रियाओं की निरंतरता सुनिश्चित करें |
| 5 | हमारे प्राकृतिक पारितंत्रों को निम्नीकृत (degradation) होने से बचाएँ |
- “जल संसाधनों के अतिशोषण और कुप्रबंधन से इन संसाधनों का ह्रास हो सकता है और पारिस्थितिकी संकट की समस्या पैदा हो सकती है जिसका हमारे जीवन पर गंभीर प्रभाव हो सकता है।”
क्रियाकलाप (पृष्ठ 21): “अपने दिन-प्रतिदिन के अनुभव के आधार पर जल संरक्षण के लिए एक संक्षिप्त प्रस्ताव लिखें।”
2. बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाएँ और समन्वित जल संसाधन प्रबंधन (पृष्ठ 21–22)
2.1 यह कोई नयी बात नहीं है
- “पुरातत्त्व वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अभिलेख/दस्तावेज़ (record) बताते हैं कि हमने प्राचीन काल से सिंचाई के लिए पत्थरों और मलबे से बाँध, जलाशय अथवा झीलों के तटबंध और नहरों जैसी उत्कृष्ट जलीय कृतियाँ बनाई हैं।”
- “इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हमने यह परिपाटी आधुनिक भारत में भी जारी रखी है और अधिकतर नदियों के बेसिनों में बाँध बनाए हैं।”
2.2 प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ (बॉक्स, पृष्ठ 22)★
यह बॉक्स पूरा याद कीजिए — इससे सीधे प्रश्न आते हैं।
| समय | कहाँ | क्या बना |
|---|---|---|
| ईसा से एक शताब्दी पहले | इलाहाबाद के नज़दीक श्रिंगवेरा | गंगा नदी की बाढ़ के जल को संरक्षित करने के लिए एक उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र |
| चन्द्रगुप्त मौर्य के समय | — | बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण |
| — | कलिंग (ओडिशा), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश), बेन्नूर (कर्नाटक) और कोल्हापुर (महाराष्ट्र) | उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र होने के सबूत |
| 11वीं शताब्दी | भोपाल झील | अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक |
| 14वीं शताब्दी | दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र | इल्तुतमिश ने जल की सप्लाई के लिए हौज़ खास (एक विशिष्ट तालाब) बनवाया |
स्रोत — डाईंग विज़डम, सी एस ई, 1997
2.3 बाँध क्या है — परिभाषा शब्दश: याद कीजिए★★
“बाँध बहते जल को रोकने, दिशा देने या बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय, झील अथवा जलभरण बनाती हैं।” ★“बाँध का अर्थ जलाशय से लिया जाता है न कि इसके ढाँचे से।”
- “अधिकतर बाँधों में एक ढलवाँ हिस्सा होता है जिसके ऊपर से या अन्दर से जल रुक-रुक कर या लगातार बहता है।”
बाँधों का वर्गीकरण —
| आधार | प्रकार |
|---|---|
| संरचना और प्रयुक्त पदार्थों के आधार पर | लकड़ी के बाँध · तटबंध बाँध · पक्का बाँध (और कई उपवर्ग) |
| ऊँचाई के अनुसार | बड़े बाँध और मुख्य बाँध या नीचे बाँध, मध्यम बाँध और उच्च बाँध |
2.4 बाँध ‘बहुउद्देशीय’ क्यों कहलाते हैं — यह सूची अनिवार्य है★★
- “परम्परागत बाँध, नदियों और वर्षा जल को इकट्ठा करके बाद में उसे खेतों की सिंचाई के लिए उपलब्ध करवाते थे।”
- “आजकल बाँध सिर्फ़ सिंचाई के लिए नहीं बनाए जाते।”
उनके उद्देश्य ये हैं —
| क्रम | उद्देश्य |
|---|---|
| 1 | सिंचाई |
| 2 | विद्युत उत्पादन |
| 3 | घरेलू और औद्योगिक उपयोग |
| 4 | जल आपूर्ति |
| 5 | बाढ़ नियंत्रण |
| 6 | मनोरंजन |
| 7 | आंतरिक नौचालन |
| 8 | मछली पालन |
★“इसलिए बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कहा जाता है जहाँ एकत्रित जल के अनेकों उपयोग समन्वित होते हैं।”
दो उदाहरण — इन्हें ज़रूर याद कीजिए —
| परियोजना | बेसिन | किन कामों के लिए |
|---|---|---|
| भाखड़ा-नांगल परियोजना | सतलुज-ब्यास बेसिन | जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई दोनों |
| हीराकुड परियोजना | महानदी बेसिन | जलसंरक्षण और बाढ़ नियंत्रण का समन्वय |
चित्र 3.2 — हीराकुड बाँध।
2.5 नेहरू का प्रसिद्ध कथन★
- “स्वतंत्रता के बाद शुरू की गई समन्वित जल संसाधन प्रबंधन उपागम पर आधारित बहुउद्देशीय परियोजनाओं को उपनिवेशन काल में बनी बाधाओं को पार करते हुए देश को विकास और समृद्धि के रास्ते पर ले जाने वाले वाहन के रूप में देखा गया।”
★★“जवाहरलाल नेहरू गर्व से बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा करते थे।”
- “उनका मानना था कि इन परियोजनाओं के चलते कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण और नगरीय अर्थव्यवस्था समन्वित रूप से विकास करेगी।”
यह वाक्य लगभग हर साल परीक्षा में आता है। इसे शब्दश: याद कीजिए।
क्रियाकलाप (पृष्ठ 22): “परंपरागत तरीक़ों से बाँध बनाने की कलाविधि और सिंचाई कार्यों के बारे में अधिक पता लगाएँ।”
2.6 दामोदर का लोकगीत (भादु गीत, पृष्ठ 22)
“हमने अषाढ़ में फसलें बोई हैं हम भद्रा में भादु लाएँगे बाढ़ से दामोदर फैल गई है नाव इसमें नहीं चलेगी ओह! दामोदर, हम आपके पैर पड़ते हैं बाढ़ का कहर कुछ कम करो भादु एक साल बाद आएगा अपनी सतह पर नाव चलने दो”
- “यह लोकप्रिय भादु गीत दामोदर घाटी क्षेत्र में गाया जाता है जो शोक की नदी कही जाने वाली दामोदर नदी में बाढ़ के दौरान आने वाली समस्याओं का वर्णन करता है।”
★‘शोक की नदी’ — यह शब्द याद रखिए। और ध्यान दीजिए कि गीत में लोग नदी से लड़ नहीं रहे, विनती कर रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा अध्याय 2 का लेपचा लोकगीत था।
3. बहुउद्देशीय परियोजनाओं की आलोचना (पृष्ठ 23)
“पिछले कुछ वर्षों में बहुउद्देशीय परियोजनाएँ और बड़े बाँध कई कारणों से परिनिरीक्षण और विरोध के विषय बन गए हैं।”
3.1 पारिस्थितिक आलोचनाएँ — यह पूरी सूची याद कीजिए★★
| क्रम | आलोचना |
|---|---|
| 1 | “नदियों पर बाँध बनाने और उनका बहाव नियंत्रित करने से उनका प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध होता है, जिसके कारण तलछट बहाव कम हो जाता है।” |
| 2 | “और अत्यधिक तलछट जलाशय की तली पर जमा होता रहता है जिससे नदी का तल अधिक चट्टानी हो जाता है और नदी जलीय जीव-आवासों में भोजन की कमी हो जाती है।” |
| 3 | “बाँध नदियों को टुकड़ों में बाँट देते हैं जिससे विशेषकर अंडे देने की ऋतु में जलीय जीवों का नदियों में स्थानांतरण अवरुद्ध हो जाता है।” |
| 4 | “बाढ़ के मैदान में बनाए जाने वाले जलाशयों द्वारा वहाँ मौजूद वनस्पति और मिट्टियाँ जल में डूब जाती हैं जो कालांतर में अपघटित हो जाती हैं।” |
3.2 सामाजिक और कृषि-संबंधी आलोचनाएँ★
- “सिंचाई ने कई क्षेत्रों में फसल प्रारूप परिवर्तित कर दिया है जहाँ किसान जलगहन और वाणिज्य फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।”
- “इससे मृदाओं के लवणीकरण जैसे गंभीर पारिस्थितिकीय परिणाम हो सकते हैं।”
3.3 सबसे बड़ी विडंबना — यह वाक्य ज़रूर लिखिए★★
“नदी परियोजनाओं पर उठी अधिकतर आपत्तियाँ उनके उद्देश्यों में विफल हो जाने पर हैं।” ★★“यह एक विडंबना ही है कि जो बाँध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं उनके जलाशयों में तलछट जमा होने से वे बाढ़ आने के कारण बन जाते हैं।” “अत्यधिक वर्षा होने की दशा में तो बड़े बाँध भी कई बार बाढ़ नियंत्रण में असफल रहते हैं।”
और बाढ़ का दोहरा नुक़सान —
- “इन बाढ़ों से न केवल जान और माल का नुक़सान हुआ अपितु बृहत् स्तर पर मृदा अपरदन भी हुआ।”
- “बाँध के जलाशय पर तलछट जमा होने का अर्थ यह भी है कि यह तलछट जो कि एक प्राकृतिक उर्वरक है, बाढ़ के मैदानों तक नहीं पहुँचती, जिसके कारण भूमि निम्नीकरण की समस्याएँ बढ़ती हैं।”
दो और गंभीर आरोप —
- “यह भी माना जाता है कि बहुउद्देशीय योजनाओं के कारण भूकंप आने की संभावना भी बढ़ जाती है।”
- “और अत्यधिक जल के उपयोग से जल-जनित बीमारियाँ, फसलों में कीटाणु-जनित बीमारियाँ और प्रदूषण फैलते हैं।”
3.4 सरदार सरोवर परियोजना (बॉक्स, पृष्ठ 23) — राजस्थान के लिए अनिवार्य★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | गुजरात में नर्मदा नदी पर |
| क्या है | भारत की एक बड़ी जल संसाधन परियोजना |
| कितने राज्य शामिल | चार राज्य — महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान |
| उद्देश्य | सूखा ग्रस्त तथा मरुस्थलीय भागों की जल आवश्यकता पूरी करना |
| गुजरात में | 15 ज़िलों के 3112 गाँवों की 18.45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा |
| राजस्थान में | सामरिक महत्व के रेगिस्तानी ज़िलों बाड़मेर और जालौर के 2,46,000 हेक्टेयर की सिंचाई |
| महाराष्ट्र में | आदिवासी पहाड़ी इलाक़े में लिफ्ट के माध्यम से 37,500 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई |
| सूखा प्रवण क्षेत्र | गुजरात में लगभग 75 प्रतिशत कमांड क्षेत्र सूखा प्रवण; राजस्थान में संपूर्ण कमांड क्षेत्र सूखा प्रवण |
स्रोत — sardarsarovardam.org ★राजस्थान वाली दोनों पंक्तियाँ ज़रूर याद कीजिए — बाड़मेर और जालौर, 2,46,000 हेक्टेयर, और संपूर्ण कमांड क्षेत्र सूखा प्रवण।
3.5 कृष्णा-गोदावरी विवाद (बॉक्स, पृष्ठ 23)★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कैसे शुरू हुआ | महाराष्ट्र सरकार द्वारा कोयना पर जल विद्युत परियोजना के लिए बाँध बनाकर जल की दिशा परिवर्तन करने से |
| किसने आपत्ति जताई | कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सरकारों ने |
| उनका तर्क | “इससे इन राज्यों में पड़ने वाले नदी के निचले हिस्सों में जल प्रवाह कम हो जाएगा और कृषि और उद्योग पर विपरीत असर पड़ेगा।” |
क्रियाकलाप (पृष्ठ 23): “अंतर्राज्यीय जल विवादों की एक सूची तैयार करें।”
3.6 प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (बॉक्स, पृष्ठ 23)
“इस कार्यक्रम के कुछ व्यापक उद्देश्य हैं, जैसे —”
| क्रम | उद्देश्य |
|---|---|
| 1 | खेत में पानी की वास्तविक उपलब्धता को बढ़ाना |
| 2 | सुनिश्चित सिंचाई (हर खेत को पानी) के तहत बुवाई योग्य क्षेत्र का विस्तार करना |
| 3 | अपव्यय को कम करने और अवधि तथा सीमा दोनों में उपलब्धता बढ़ाने के लिए खेत में पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करना |
| 4 | सिंचाई और अन्य जल बचत प्रौद्योगिकियाँ (प्रति बूंद अधिक फसल) और सतत जल संरक्षण प्रणालियों को अपनाना |
★‘प्रति बूंद अधिक फसल’ (Per Drop More Crop) — यह नारा याद रखिए, यह सीधे पूछा जाता है।
- “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना देश के सभी कृषि खेतों के लिए सुरक्षात्मक सिंचाई के कुछ साधनों तक पहुँच सुनिश्चित करती है, जिससे वांछित ग्रामीण समृद्धि आती है।”
क्रियाकलाप (पृष्ठ 23): “हाल के समय में भारत के विभिन्न भागों में भारी वर्षा के कारण आई बाढ़ के बारे में सूचनाएँ एकत्र करें।”
3.7 भारत — मुख्य नदियाँ और बाँध (मानचित्र, पृष्ठ 24)
यह मानचित्र-कार्य के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण पृष्ठ है। इसमें ये बाँध दिखाए गए हैं —
| क्षेत्र | बाँध |
|---|---|
| उत्तर | सलाल प्रोजेक्ट · भाखड़ा नांगल · टिहरी · नरोरा |
| मध्य / पश्चिम | राणा प्रताप सागर · गांधी सागर · कोटा बैराज · सरदार सरोवर |
| पूर्व | रिहन्द · तिलैया · कोनार · मेथॉन · पंचेत · हीराकुड |
| दक्षिण | प्रवारा · कोयना · नागार्जुन सागर · तुंगभद्रा · मेट्टूर · पेरियार |
★राजस्थान के तीन बाँध ज़रूर याद कीजिए — राणा प्रताप सागर, गांधी सागर और कोटा बैराज (तीनों चंबल नदी पर)।
4. वर्षा जल संग्रहण (पृष्ठ 25–28)
4.1 यह विकल्प क्यों?
“बहुत से लोगों का मानना है कि बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अलाभप्रद असर और उन पर उठे विवादों के चलते वर्षाजल संग्रहण तंत्र इनके सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प हो सकते हैं।”
4.2 प्राचीन भारत का ज्ञान
- “प्राचीन भारत में उत्कृष्ट जलीय निर्माणों के साथ-साथ जल संग्रहण ढाँचे भी पाए जाते थे।”
- “लोगों को वर्षा पद्धति और मृदा के गुणों के बारे में गहरा ज्ञान था।”
- “उन्होंने स्थानीय पारिस्थितिकीय परिस्थितियों और उनकी जल आवश्यकतानुसार वर्षाजल, भौमजल, नदी जल और बाढ़ जल संग्रहण के अनेक तरीके विकसित कर लिए थे।”
4.3 पारंपरिक तरीक़ों की तालिका — यह सबसे ज़्यादा पूछी जाती है★★
| क्षेत्र | तरीक़ा | क्या करता था |
|---|---|---|
| पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र (पश्चिमी हिमालय) | ‘गुल’ अथवा ‘कुल’ | वाहिकाएँ जो नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों में सिंचाई के लिए बनाई जाती थीं |
| पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान | ‘छत वर्षा जल संग्रहण’ | पीने का जल एकत्रित करने के लिए |
| पश्चिम बंगाल | बाढ़ जल वाहिकाएँ | बाढ़ के मैदान में लोग अपने खेतों की सिंचाई के लिए बनाते थे |
| शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्र | गड्ढे | खेतों में वर्षा जल एकत्रित करने के लिए, ताकि मृदा को सिंचित किया जा सके और संरक्षित जल खेती में काम आए |
| राजस्थान का जैसलमेर ज़िला | ‘खादीन’ | उपरोक्त गड्ढों का ही उदाहरण |
| अन्य क्षेत्र | ‘जोहड़’ | उपरोक्त गड्ढों का ही उदाहरण |
★इन छह को इस तरह याद कीजिए — पहाड़ = गुल/कुल · राजस्थान = छत संग्रहण और खादीन · बंगाल = बाढ़ जल वाहिकाएँ · अन्य = जोहड़।
4.4 टाँका — यह पूरा भाग अभ्यास प्रश्न 3(i) का उत्तर है★★
कहाँ और क्यों —
- “राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में, लगभग हर घर में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा ‘टाँका’ हुआ करते थे।”
आकार —
- “इसका आकार एक बड़े कमरे जितना हो सकता है।”
- “फलोदी में एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लंबा और 2.44 मीटर चौड़ा टाँका था।”
★ये तीनों माप ज़रूर याद कीजिए — यह सीधे पूछा जाता है।
टाँका कैसे काम करता था — यह प्रक्रिया क्रम से लिखिए —
| क्रम | प्रक्रिया |
|---|---|
| 1 | “टाँका यहाँ सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तंत्र का अभिन्न हिस्सा होता था जिसे मुख्य घर या आँगन में बनाया जाता था।” |
| 2 | “वे घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़े हुए थे।” |
| 3 | “छत से वर्षा का पानी इन नलों से होकर भूमिगत टाँका तक पहुँचता था जहाँ इसे एकत्रित किया जाता था।” |
| 4 | ★“वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ़ करने में प्रयोग होता था और उसे संग्रहित नहीं किया जाता था। इसके बाद होने वाली वर्षा का जल संग्रह किया जाता था।” |
चौथा बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है और अकसर छूट जाता है — पहली बारिश का पानी फेंक दिया जाता था। यह हमारे पूर्वजों की समझदारी दिखाता है।
टाँके का फ़ायदा —
- “टाँका में वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक संग्रहित किया जा सकता है।”
- “यह इसे जल की कमी वाली ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल उपलब्ध करवाने वाला जल स्रोत बनाता है।”
★पालर पानी —
“वर्षाजल अथवा ‘पालर पानी’ जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है।”
और एक अनोखा फ़ायदा —
- “कुछ घरों में तो टाँकों के साथ भूमिगत कमरे भी बनाए जाते हैं क्योंकि जल का यह स्रोत इन कमरों को भी ठंडा रखता था जिससे ग्रीष्म ऋतु में गर्मी से राहत मिलती है।”
यह आख़िरी बात कक्षा में ज़रूर बताइए — एक ही ढाँचे से दो काम: पानी भी और ठंडक भी। यह पारंपरिक ज्ञान की सुंदरता दिखाता है।
4.5 आज की स्थिति — इंदिरा गांधी नहर का असर★
“यह दुख की बात है कि आज पश्चिमी राजस्थान में छत वर्षाजल संग्रहण की रीति इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण कम होती जा रही है।” “हालाँकि कुछ घरों में टाँकों की सुविधा अभी भी है क्योंकि उन्हें नल के पानी का स्वाद पसंद नहीं है।”
★यह हिस्सा बहुत दिलचस्प है और परीक्षा में पूछा जाता है। कक्षा में यह सवाल कीजिए — “नहर आ जाने से टाँके बंद हो रहे हैं। क्या यह अच्छी बात है या बुरी?” दोनों तरफ़ के तर्क निकलेंगे, और वही इस अध्याय की असली बहस है।
4.6 चित्र 3.4 — छत वर्षाजल संग्रहण की प्रक्रिया (पृष्ठ 26)
दो तरीक़े दिखाए गए हैं — (अ) हैंडपंप के माध्यम से पुनर्भरण, (ब) बेकार पड़े कुएँ के माध्यम से पुनर्भरण।
पूरी प्रक्रिया क्रम से —
| क्रम | चरण |
|---|---|
| 1 | पी.वी.सी. पाइप का इस्तेमाल करके छत का वर्षाजल एकत्रित किया जाता है। |
| 2 | रेत और ईंट प्रयोग करके जल का छनन (filter) किया जाता है। |
| 3 | भूमिगत पाइप के द्वारा जल हौज़ तक ले जाया जाता है जहाँ से इसे तुरंत प्रयोग किया जा सकता है। |
| 4 | हौज़ से अतिरिक्त जल कुएँ तक ले जाया जाता है। |
| 5 | कुएँ का जल भूमिगत जल का पुनर्भरण करता है। |
| 6 | बाद में इस जल का उपयोग किया जा सकता है। |
यह छह-चरणीय प्रक्रिया 3-अंक के प्रश्न का पूरा उत्तर है।
4.7 चित्र 3.5 और 3.6
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| चित्र 3.5 | वर्षाजल संग्रहण की पारंपरिक विधि — एक कुल से वर्तुल ग्रामीण तालाब बनता है (काज़ा गाँव), जिससे ज़रूरत पड़ने पर पानी छोड़ सकते हैं। |
| चित्र 3.6 | छतजल संग्रहण थार के सभी शहरों और ग्रामों में प्रचलित था। वर्षा जल जो घरों की ढालू छतों पर गिरता है, उसे पाइप द्वारा भूमिगत टाँका के अंदर ले जाते हैं (भूमि में गोल छिद्र), जो मुख्य घर अथवा आँगन में बना होता है। चित्र में दिखाया गया है कि जल पड़ोसी की छत से एक लम्बे पाइप के द्वारा लाया जाता है। |
4.8 शिलांग का रोचक तथ्य (बॉक्स, पृष्ठ 27)★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | मेघालय की राजधानी शिलांग |
| क्या | छत वर्षाजल संग्रहण प्रचलित है |
| यह रोचक क्यों | क्योंकि चेरापूँजी और मॉसिनराम — जहाँ विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है — शिलांग से केवल 55 किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है |
| फिर भी | “यह शहर पीने के जल की कमी की गंभीर समस्या का सामना करता है” |
| समाधान | “शहर के लगभग हर घर में छत वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था है” |
| कितनी पूर्ति | “घरेलू जल आवश्यकता की कुल माँग के लगभग 15–25 प्रतिशत हिस्से की पूर्ति छत जल संग्रहण व्यवस्था से ही होती है” |
★यह उदाहरण इज़राइल-भारत वाली तुलना को दोहराता है — सबसे ज़्यादा बारिश वाली जगह के पास ही पानी की कमी। फिर वही निष्कर्ष: समस्या पानी की नहीं, प्रबंधन की है।
4.9 गंडाथूर गाँव, कर्नाटक (पृष्ठ 27–28)★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | कर्नाटक के मैसूर ज़िले में स्थित एक सूदूर गाँव गंडाथूर |
| क्या किया | ग्रामीणों ने अपने घर में जल आवश्यकता पूर्ति छत वर्षाजल संग्रहण की व्यवस्था की |
| कितने घरों में | गाँव के लगभग 200 घरों में |
| ख्याति | इस गाँव ने ‘वर्षा जल संपन्न गाँव’ की ख्याति अर्जित की है |
| वार्षिक वर्षा | हर वर्ष लगभग 1,000 मिलीमीटर |
| संग्रहण दक्षता | 10 भराई के साथ 80 प्रतिशत |
| प्रति घर संग्रह | हर घर लगभग प्रत्येक वर्ष 50,000 लीटर जल का संग्रह और उपयोग कर सकता है |
| कुल संग्रह | 200 घरों द्वारा हर वर्ष लगभग 10,00,000 लीटर जल एकत्रित किया जाता है |
! एक छपाई की बात जान लीजिए — पाठ्यपुस्तक में लिखा है “हर घर लगभग प्रत्येक वर्ष 50,000 मीटर जल का संग्रह” — यहाँ ‘मीटर’ की जगह ‘लीटर’ होना चाहिए, क्योंकि अगली ही पंक्ति में 200 घरों का कुल संग्रह लीटर में दिया है (50,000 × 200 = 10,00,000)। बोर्ड में पाठ्यपुस्तक का ही अनुसरण कीजिए, पर सच्चाई जान लेना ज़रूरी है। (विस्तार से फ़ाइल 07 में।)
4.10 बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली (चित्र 3.7, पृष्ठ 28)★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | मेघालय में |
| कितनी पुरानी | 200 वर्ष पुरानी विधि |
| क्या करती है | नदियों व झरनों के जल को बाँस द्वारा बने पाइप द्वारा एकत्रित करके ले जाना |
| कितना पानी | लगभग 18 से 20 लीटर सिंचाई पानी बाँस पाइप में आता है |
| कितनी दूर | उसे सैकड़ों मीटर की दूरी तक ले जाया जाता है |
| अंत में | पानी का बहाव 20 से 80 बूँद प्रति मिनट तक घटाकर पौधे पर छोड़ दिया जाता है |
चित्रों का विवरण —
- चित्र 1 — पहाड़ी शिखरों पर सदानीरा झरनों की दिशा परिवर्तित करने के लिए बाँस के पाइपों का उपयोग; गुरुत्वाकर्षण द्वारा जल पहाड़ के निचले स्थानों तक पहुँचाया जाता है।
- चित्र 2 और 3 — बाँस से निर्मित चैनल से पौधे के स्थान तक जल का बहाव परिवर्तित किया जाता है।
- चित्र 4 — यदि पाइपों को सड़क पार ले जाना हो तो उन्हें भूमि पर ऊँचाई से ले जाया जाता है।
- चित्र 5 व 6 — संकुचित किए हुए चैनल सेक्शन और पथांतरण इकाई जल सिंचाई के अंतिम चरण में प्रयुक्त की जाती है; अंतिम चैनल सेक्शन से पौधे की जड़ों के निकट जल गिराया जाता है।
★यह सबसे शानदार तथ्य है — 200 साल पहले बिना बिजली, बिना प्लास्टिक के, सिर्फ़ बाँस और गुरुत्वाकर्षण से ड्रिप सिंचाई। आज की आधुनिक ड्रिप सिंचाई भी यही काम करती है।
4.11 तमिलनाडु का रोचक तथ्य (बॉक्स, पृष्ठ 28)★
“तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहाँ पूरे राज्य में हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण ढाँचों का बनाना आवश्यक कर दिया गया है।” “इस संदर्भ में दोषी व्यक्तियों पर क़ानूनी कार्यवाही हो सकती है।”
यानी तमिलनाडु ने वर्षाजल संग्रहण को सलाह नहीं, क़ानून बना दिया। यह 1-अंक का पक्का प्रश्न है।
क्रियाकलाप (पृष्ठ 27): “अपने क्षेत्र में पाए जाने वाले अन्य वर्षाजल संग्रहण तंत्रों के बारे में पता लगाएँ।”
क्रियाकलाप (पृष्ठ 29):
- “सूचना एकत्रित करें कि उद्योग किस प्रकार हमारे जल संसाधनों को प्रदूषित कर रहे हैं?”
- “अपने सहपाठियों के साथ मिलकर अपने मोहल्ले में जल विवाद पर एक नाटिका प्रस्तुत करें।”
5. पूरे अध्याय की एक तालिका (आख़िरी दिन के लिए)
| भाग | मुख्य बात एक वाक्य में |
|---|---|
| जल दुर्लभता | कमी सिर्फ़ कम वर्षा से नहीं — अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और असमान वितरण से होती है। |
| इज़राइल बनाम भारत | 25 सेमी. वाला देश सुखी, 114 सेमी. वाला देश प्यासा — समस्या प्रबंधन की है। |
| गुणवत्ता | पानी होकर भी पीने लायक़ न हो, तो वह भी दुर्लभता है। |
| सरकारी योजनाएँ | जल जीवन मिशन (55 लीटर प्रति व्यक्ति) · अटल भूजल योजना (7 राज्य, 37%) · प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (प्रति बूंद अधिक फसल)। |
| प्राचीन जलीय कृतियाँ | श्रिंगवेरा · चन्द्रगुप्त मौर्य · भोपाल झील (11वीं सदी) · हौज़ खास (14वीं सदी, इल्तुतमिश)। |
| बहुउद्देशीय परियोजनाएँ | आठ उद्देश्य; भाखड़ा-नांगल और हीराकुड; नेहरू ने इन्हें ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा। |
| आलोचना | प्राकृतिक बहाव रुका · तलछट जमा · नदी टुकड़ों में बँटी · लवणीकरण · और सबसे बड़ी विडंबना — बाढ़ रोकने वाले बाँध ही बाढ़ का कारण बन जाते हैं। |
| विवाद | कृष्णा-गोदावरी (महाराष्ट्र बनाम कर्नाटक-आंध्र); सरदार सरोवर (चार राज्य)। |
| वर्षाजल संग्रहण | गुल/कुल · खादीन · जोहड़ · टाँका · पालर पानी · बाँस ड्रिप। |
| आज की स्थिति | राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर से टाँके घट रहे हैं; तमिलनाडु ने इसे अनिवार्य कर दिया है। |
6. NCERT अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 29)
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
(i) नीचे दी गई सूचना के आधार पर स्थितियों को ‘जल की कमी से प्रभावित’ या ‘जल की कमी से अप्रभावित’ में वर्गीकृत कीजिए।
| स्थिति | वर्गीकरण | कारण |
|---|---|---|
| (क) अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र | अप्रभावित | वहाँ पर्याप्त वर्षा होती है |
| (ख) अधिक वर्षा और अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र | प्रभावित | अधिक जनसंख्या से जल की माँग बढ़ती है |
| (ग) अधिक वर्षा वाले परंतु अत्यधिक प्रदूषित जल क्षेत्र | प्रभावित | यह गुणात्मक दुर्लभता है — पानी है पर उपयोग लायक़ नहीं |
| (घ) कम वर्षा और कम जनसंख्या वाले क्षेत्र | अप्रभावित | वर्षा कम है पर माँग भी कम है |
(ii) निम्नलिखित में से कौन-सा वक्तव्य बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं के पक्ष में दिया गया तर्क नहीं है? उत्तर: (ग) बहुउद्देशीय परियोजनाओं से बृहत् स्तर पर विस्थापन होता है और आजीविका ख़त्म होती है।
कारण — बाक़ी तीनों विकल्प (जल लाना, बाढ़ पर क़ाबू, विद्युत उत्पादन) लाभ बताते हैं, जबकि यह विकल्प हानि बताता है।
(iii) यहाँ कुछ ग़लत वक्तव्य दिए गए हैं। इनमें ग़लती पहचाने और दोबारा लिखें।
| ग़लत वक्तव्य | सही वक्तव्य |
|---|---|
| (क) “शहरों की बढ़ती संख्या… ने जल संसाधनों के सही उपयोग में मदद की है।” | शहरों की बढ़ती संख्या, उनकी विशालता और सघन जनसंख्या तथा शहरी जीवन शैली ने जल संसाधनों के अति शोषण में योगदान दिया है। |
| (ख) “नदियों पर बाँध बनाने और उनको नियंत्रित करने से उनका प्राकृतिक बहाव और तलछट बहाव प्रभावित नहीं होता।” | नदियों पर बाँध बनाने और उनको नियंत्रित करने से उनका प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध होता है और तलछट बहाव कम हो जाता है। |
| (ग) “आज राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध पेयजल के बावजूद छत वर्षा जल संग्रहण लोकप्रिय हो रहा है।” | आज राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण छत वर्षा जल संग्रहण की रीति कम होती जा रही है। |
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) व्याख्या करें कि जल किस प्रकार नवीकरण योग्य संसाधन है? उत्तर: जल हमें सतही अपवाह और भौमजल स्रोत से प्राप्त होता है, जिनका लगातार नवीकरण और पुनर्भरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है। सारा जल जलीय चक्र में गतिशील रहता है, जिससे जल का नवीकरण सुनिश्चित होता है।
(ii) जल दुर्लभता क्या है और इसके मुख्य कारण क्या हैं? उत्तर: जल दुर्लभता का अर्थ है आवश्यकता के अनुसार उपयोग योग्य जल का उपलब्ध न होना। इसके मुख्य कारण हैं — जल का अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और समाज के विभिन्न वर्गों में जल का असमान वितरण; साथ ही बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, शहरीकरण और जल का प्रदूषित होना भी इसके कारण हैं।
(iii) बहुउद्देशीय परियोजनाओं से होने वाले लाभ और हानियों की तुलना करें।
| लाभ | हानियाँ |
|---|---|
| सिंचाई, विद्युत उत्पादन, घरेलू और औद्योगिक उपयोग, जल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण, मनोरंजन, आंतरिक नौचालन और मछली पालन | नदी का प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध होता है और तलछट जलाशय की तली पर जमा होता है |
| कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा औद्योगीकरण का समन्वित विकास | नदियाँ टुकड़ों में बँट जाती हैं, जिससे अंडे देने की ऋतु में जलीय जीवों का स्थानांतरण अवरुद्ध होता है |
| सूखा प्रवण क्षेत्रों तक जल पहुँचाना — जैसे सरदार सरोवर से बाड़मेर और जालौर तक | मृदाओं का लवणीकरण; बड़े स्तर पर विस्थापन; और भूकंप तथा जल-जनित बीमारियों की संभावना |
| — | सबसे बड़ी विडंबना — बाढ़ नियंत्रण के लिए बने बाँध तलछट जमा होने से ख़ुद बाढ़ का कारण बन जाते हैं |
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए
(i) राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण किस प्रकार किया जाता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर के मुख्य बिंदु —
- राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों, विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में लगभग हर घर में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा ‘टाँका’ हुआ करते थे।
- इसका आकार एक बड़े कमरे जितना हो सकता है; फलोदी में एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लंबा और 2.44 मीटर चौड़ा टाँका था।
- टाँका सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तंत्र का अभिन्न हिस्सा होता था, जिसे मुख्य घर या आँगन में बनाया जाता था और वह घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़ा होता था।
- वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ़ करने में प्रयोग होता था और उसे संग्रहित नहीं किया जाता था; इसके बाद होने वाली वर्षा का जल संग्रह किया जाता था।
- टाँके में वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक संग्रहित किया जा सकता है, जिससे यह ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल उपलब्ध कराने वाला स्रोत बन जाता है।
- वर्षाजल को इन क्षेत्रों में ‘पालर पानी’ कहा जाता है और इसे प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप माना जाता है।
- कुछ घरों में टाँकों के साथ भूमिगत कमरे भी बनाए जाते थे, क्योंकि यह जल स्रोत उन कमरों को ठंडा रखता था और ग्रीष्म ऋतु में गर्मी से राहत देता था।
- इसके अलावा जैसलमेर ज़िले में ‘खादीन’ और अन्य क्षेत्रों में ‘जोहड़’ जैसे गड्ढे बनाए जाते थे, ताकि मृदा सिंचित हो सके और संरक्षित जल खेती में काम आए।
निष्कर्ष — आज पश्चिमी राजस्थान में यह रीति इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण कम होती जा रही है, हालाँकि कुछ घरों में टाँके अभी भी हैं क्योंकि उन्हें नल के पानी का स्वाद पसंद नहीं है।
(ii) परंपरागत वर्षा जल संग्रहण की पद्धतियों को आधुनिक काल में अपना कर जल संरक्षण एवं भंडारण किस प्रकार किया जा रहा है?
उत्तर के मुख्य बिंदु —
- बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अलाभप्रद असर और विवादों के चलते वर्षाजल संग्रहण तंत्र सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प माने जा रहे हैं।
- छत वर्षाजल संग्रहण आज भी भारत के कई ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रयोग में लाया जा रहा है; इसमें पी.वी.सी. पाइप से छत का जल एकत्रित किया जाता है, रेत और ईंट से उसका छनन होता है, भूमिगत पाइप से जल हौज़ तक जाता है, और अतिरिक्त जल कुएँ तक ले जाकर भूमिगत जल का पुनर्भरण किया जाता है।
- कर्नाटक के मैसूर ज़िले के गंडाथूर गाँव में लगभग 200 घरों में यह व्यवस्था है और गाँव ने ‘वर्षा जल संपन्न गाँव’ की ख्याति अर्जित की है; यहाँ हर वर्ष लगभग 1,000 मिलीमीटर वर्षा होती है और संग्रहण दक्षता 80 प्रतिशत है, जिससे 200 घरों द्वारा हर वर्ष लगभग 10,00,000 लीटर जल एकत्रित होता है।
- मेघालय की राजधानी शिलांग में लगभग हर घर में छत वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था है, जिससे घरेलू जल आवश्यकता की कुल माँग के लगभग 15–25 प्रतिशत हिस्से की पूर्ति होती है।
- मेघालय में 200 वर्ष पुरानी बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली आज भी प्रचलित है, जिसमें 18 से 20 लीटर पानी बाँस पाइप से सैकड़ों मीटर दूर ले जाकर अंत में 20 से 80 बूँद प्रति मिनट की दर से पौधे पर छोड़ा जाता है।
- तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहाँ पूरे राज्य में हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण ढाँचों का बनाना आवश्यक कर दिया गया है और दोषी व्यक्तियों पर क़ानूनी कार्यवाही हो सकती है।
निष्कर्ष — इस प्रकार पुराने ज्ञान को नयी तकनीक और क़ानून के साथ जोड़कर जल संरक्षण किया जा रहा है।
7. महत्त्वपूर्ण नाम और स्थान — एक नज़र में
| नाम | पहचान |
|---|---|
| भाखड़ा-नांगल परियोजना | सतलुज-ब्यास बेसिन — जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई |
| हीराकुड परियोजना | महानदी बेसिन — जलसंरक्षण और बाढ़ नियंत्रण |
| सरदार सरोवर बाँध | गुजरात में नर्मदा नदी पर — चार राज्य शामिल |
| कोयना | महाराष्ट्र — कृष्णा-गोदावरी विवाद यहीं से शुरू हुआ |
| दामोदर | ‘शोक की नदी’; भादु लोकगीत इसी पर है |
| श्रिंगवेरा | इलाहाबाद के नज़दीक — ईसा से एक शताब्दी पहले का जल संग्रहण तंत्र |
| भोपाल झील | 11वीं शताब्दी — अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक |
| हौज़ खास | दिल्ली, सिरी फोर्ट — 14वीं शताब्दी में इल्तुतमिश ने बनवाया |
| जवाहरलाल नेहरू | बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहते थे |
| चन्द्रगुप्त मौर्य | इनके समय बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्र बने |
| इल्तुतमिश | हौज़ खास बनवाया |
| गंडाथूर | कर्नाटक के मैसूर ज़िले का ‘वर्षा जल संपन्न गाँव’ |
| शिलांग | मेघालय की राजधानी — हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण |
| चेरापूँजी और मॉसिनराम | विश्व की सबसे अधिक वर्षा; शिलांग से 55 किमी. दूर |
| तमिलनाडु | जहाँ छत वर्षाजल संग्रहण क़ानूनन अनिवार्य है |
| जैसलमेर | ‘खादीन’ के लिए प्रसिद्ध |
| बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर | ‘टाँका’ वाले राजस्थानी क्षेत्र |
| बाड़मेर और जालौर | सरदार सरोवर से सिंचाई पाने वाले राजस्थानी ज़िले |
| इंदिरा गांधी नहर | जिससे पश्चिमी राजस्थान में बारहमासी पेयजल मिला |
8. महत्त्वपूर्ण योजनाएँ — एक नज़र में
| योजना | मुख्य बात |
|---|---|
| जल जीवन मिशन (J.J.M.) | हर ग्रामीण परिवार को प्रति व्यक्ति 55 लीटर पीने योग्य पाइप का पानी |
| अटल भूजल योजना (अटल जल) | 7 राज्य, 80 ज़िले, 229 ब्लॉक, 8220 ग्राम पंचायत; कुल का लगभग 37 प्रतिशत; लक्ष्य — जनता के व्यवहार में परिवर्तन |
| प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना | हर खेत को पानी और प्रति बूंद अधिक फसल |
9. पारंपरिक जल संग्रहण के तरीक़े — एक नज़र में
| तरीक़ा | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| गुल / कुल | पश्चिमी हिमालय | नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों में सिंचाई |
| छत वर्षा जल संग्रहण | पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान | पीने का जल एकत्रित करना |
| बाढ़ जल वाहिकाएँ | पश्चिम बंगाल | बाढ़ के मैदान में खेतों की सिंचाई |
| खादीन | राजस्थान का जैसलमेर ज़िला | वर्षा जल एकत्रित करने के गड्ढे |
| जोहड़ | अन्य शुष्क क्षेत्र | वर्षा जल एकत्रित करने के गड्ढे |
| टाँका | बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर | भूमिगत पेयजल टैंक |
| बाँस ड्रिप सिंचाई | मेघालय | 200 वर्ष पुरानी बाँस-पाइप प्रणाली |
10. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अलवणीय जल | वह जल जिसमें नमक न हो, यानी पीने और खेती योग्य मीठा पानी। |
| सतही अपवाह | धरातल पर बहने वाला जल — नदियाँ, नाले, झीलें। |
| भौमजल | भूमि के नीचे जमा जल, जिसे कुएँ और नलकूप से निकाला जाता है। |
| जलीय चक्र | वह प्राकृतिक चक्र जिसमें जल वाष्प बनकर ऊपर जाता है, बादल बनते हैं, वर्षा होती है और जल फिर धरती पर लौट आता है — इसी से जल का नवीकरण होता है। |
| जल दुर्लभता | आवश्यकता के अनुसार उपयोग योग्य जल का उपलब्ध न होना। |
| अतिशोषण | किसी संसाधन का ज़रूरत से बहुत ज़्यादा दोहन। |
| पनिहारिन | जल भरने के लिए दूर तक जाने वाली स्त्री। |
| बाँध | बहते जल को रोकने, दिशा देने या बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा, जो जलाशय, झील अथवा जलभरण बनाती है। |
| जलाशय | बाँध के पीछे इकट्ठा हुआ जल; बाँध का अर्थ इसी से लिया जाता है, ढाँचे से नहीं। |
| बहुउद्देशीय परियोजना | वह परियोजना जिसमें एकत्रित जल के अनेकों उपयोग समन्वित होते हैं — सिंचाई, बिजली, जल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण आदि। |
| तलछट | बहते जल के साथ आने वाली महीन मिट्टी, जो एक प्राकृतिक उर्वरक है। |
| लवणीकरण | मृदा में नमक की मात्रा बढ़ जाना, जिससे वह खेती योग्य नहीं रहती। |
| जलगहन फसलें | वे फसलें जिन्हें बहुत अधिक पानी चाहिए, जैसे गन्ना और चावल। |
| आंतरिक नौचालन | नदियों और नहरों में नावों तथा जहाज़ों का चलना। |
| पालर पानी | राजस्थान में वर्षाजल का नाम, जिसे प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप माना जाता है। |
| टाँका | राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में पीने का पानी संग्रहित करने वाला भूमिगत टैंक। |
| खादीन | जैसलमेर ज़िले में वर्षा जल एकत्रित करने के लिए बनाए जाने वाले गड्ढे। |
| जोहड़ | शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल एकत्रित करने वाले गड्ढे/तालाब। |
| गुल / कुल | पश्चिमी हिमालय में नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों तक जल ले जाने वाली वाहिकाएँ। |
| पुनर्भरण (Recharge) | भूमिगत जल के स्तर को फिर से भरना। |
| छनन (Filter) | जल को साफ़ करने की प्रक्रिया; छत वर्षाजल संग्रहण में रेत और ईंट से किया जाता है। |
| हौज़ | जल इकट्ठा करने का टैंक या कुंड। |
| कमांड क्षेत्र | किसी सिंचाई परियोजना से जिस क्षेत्र को पानी मिलता है। |
| सूखा प्रवण | वह क्षेत्र जहाँ बार-बार सूखा पड़ता है। |
11. महत्त्वपूर्ण आँकड़े — एक नज़र में
| आँकड़ा | किससे जुड़ा |
|---|---|
| तीन-चौथाई | पृथ्वी का वह भाग जो जल से ढका है |
| 20 करोड़ | 2025 में जल की नितांत कमी झेलने वाले लोग (भविष्यवाणी) |
| 25 सेमी. | इज़राइल की औसत वार्षिक वर्षा — फिर भी जल का अभाव नहीं |
| 114 सेमी. | भारत की औसत वार्षिक वर्षा — फिर भी हर वर्ष कहीं न कहीं सूखा |
| लगभग नौ महीने | वर्षा के बाद वह अवधि जब देश में पानी की कमी रहती है |
| 180 मिलीमीटर | कोलकाता में रिकॉर्ड वर्षा (चित्र 3.1) |
| 55 लीटर | जल जीवन मिशन का प्रति व्यक्ति सेवा स्तर |
| 7 राज्य | अटल भूजल योजना — गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, म.प्र., महाराष्ट्र, राजस्थान, उ.प्र. |
| 80 ज़िले / 229 ब्लॉक / 8220 ग्राम पंचायत | अटल भूजल योजना का विस्तार |
| लगभग 37 प्रतिशत | चुने गए राज्यों में जल की कमी वाले ब्लॉकों का हिस्सा |
| 11वीं शताब्दी | भोपाल झील का निर्माण |
| 14वीं शताब्दी | इल्तुतमिश ने हौज़ खास बनवाया |
| 15 ज़िले / 3112 गाँव / 18.45 लाख हेक्टेयर | सरदार सरोवर से गुजरात में सिंचाई |
| 2,46,000 हेक्टेयर | सरदार सरोवर से राजस्थान (बाड़मेर और जालौर) में सिंचाई |
| 37,500 हेक्टेयर | सरदार सरोवर से महाराष्ट्र में लिफ्ट सिंचाई |
| लगभग 75 प्रतिशत | गुजरात का सूखा प्रवण कमांड क्षेत्र |
| 6.1 × 4.27 × 2.44 मीटर | फलोदी के एक घर के टाँके की गहराई, लंबाई और चौड़ाई |
| 55 किलोमीटर | शिलांग से चेरापूँजी और मॉसिनराम की दूरी |
| 15–25 प्रतिशत | शिलांग में छत जल संग्रहण से पूरी होने वाली घरेलू माँग |
| 200 घर | गंडाथूर गाँव में छत वर्षाजल संग्रहण वाले घर |
| 1,000 मिलीमीटर | गंडाथूर की वार्षिक वर्षा |
| 80 प्रतिशत | गंडाथूर में संग्रहण दक्षता (10 भराई के साथ) |
| 10,00,000 लीटर | गंडाथूर के 200 घरों द्वारा प्रति वर्ष एकत्रित जल |
| 200 वर्ष | मेघालय की बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली की आयु |
| 18–20 लीटर | बाँस पाइप में आने वाला सिंचाई पानी |
| 20–80 बूँद प्रति मिनट | बाँस ड्रिप में अंत में पौधे पर छोड़ा जाने वाला बहाव |
अंतिम बात। इस अध्याय को दो सवालों के बीच की बहस की तरह पढ़िए — “बड़े बाँध बनाएँ या छोटे टाँके?” और “पानी की कमी है, या प्रबंधन की?”
पाठ्यपुस्तक किसी एक का पक्ष नहीं लेती — वह नेहरू का ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ भी लिखती है और बाँधों की हर आलोचना भी। इसलिए आपके उत्तर में भी दोनों पक्ष होने चाहिए।
और अपने राजस्थान को कभी मत छोड़िए — टाँका, खादीन, जोहड़, पालर पानी, बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, इंदिरा गांधी नहर, राणा प्रताप सागर, गांधी सागर, कोटा बैराज, अटल भूजल योजना — ये सब इसी एक अध्याय में हैं, और RBSE की परीक्षा में यही सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं।