यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में कहा गया — उस पाठक के लिए जो पूरी कहानी एक बार में पढ़ना चाहता है। इसमें से कुछ भी विद्यार्थी की परीक्षा-सामग्री में नहीं गया है।
एक तस्वीर, जिसमें कोई शब्द नहीं है
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 145 पर एक भी वाक्य नहीं है।
पूरा पृष्ठ छायाचित्रों का है, और उन पर केवल एक शब्द लिखा है — छोटे अक्षरों में, अंग्रेज़ी में: halma.
सबसे ऊपर का चित्र सबसे बड़ा है। उसमें एक सूखी, पीली पहाड़ी है। घास भूरी है। पेड़ नहीं हैं। और उस पूरी ढलान पर, पंक्तियों में, सैकड़ों गड्ढे खुदे हुए हैं — इतने कि वे किसी बुनाई के नमूने जैसे दिखते हैं। हर गड्ढे के पास मिट्टी का एक ढेर है। और उन ढेरों के बीच, रंग-बिरंगे कपड़ों में सैकड़ों लोग काम कर रहे हैं। इतने कि गिने नहीं जाते।
नीचे कुछ और चित्र हैं। एक में ढोल बजाते हुए लोगों का जुलूस है। एक में लोग पत्थर की ढलान पर काम कर रहे हैं। एक में वे औज़ार और गठरियाँ सिर पर उठाए कहीं जा रहे हैं।
और सबसे नीचे दाईं ओर, आख़िरी चित्र है — एक भरा हुआ तालाब, और उसके किनारे हरे-भरे खेत।
इन दो चित्रों के बीच जो हुआ, उसी का नाम ‘हलमा’ है।
पैसे नहीं मिले
मध्य प्रदेश के झाबुआ कस्बे के आस-पास का इलाक़ा कई वर्षों से गंभीर जल संकट झेल रहा है।
वहाँ भील समुदाय रहता है। और भीलों के बीच एक बहुत पुरानी प्रथा चली आती है — हलमा।
पाठ्यपुस्तक उसे इस तरह परिभाषित करती है:
“संकट के समय किसी व्यक्ति या परिवार को समर्थन देने के लिए साथ मिलकर काम करने की प्रथा।”
यानी जब किसी एक पर आफ़त आती है, तो पूरा समुदाय आकर उसका काम कर देता है।
पर झाबुआ में जो हुआ, वह इससे बड़ा था। वहाँ संकट किसी एक परिवार पर नहीं था — वह पूरी धरती पर था।
तो भील समुदाय ने तय किया कि सैकड़ों गाँवों में हजारों पेड़ लगाए जाएँगे। उन्होंने बारिश का पानी रोकने के लिए तालाब खोदे। उन्होंने वर्षा जल संचय की अनेक संरचनाएँ बनाईं। वे पहाड़ियों पर गए और वहाँ पंक्तियों में गड्ढे खोदे, ताकि जो पानी बहकर निकल जाता था, वह ज़मीन में उतर जाए।
और अब वह वाक्य, जिस पर यह पूरी कहानी टिकी है —
“उन्हें इस काम के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिला, बल्कि समुदाय और पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य के रूप में उन्होंने यह कार्य किया।”
किसी ने किसी को पैसे नहीं दिए।
पाठ्यपुस्तक आगे जोड़ती है कि इस परंपरा का उद्देश्य “धरती माँ की सेवा करना” है। और यह भी कि 2019 में शिवगंगा आंदोलन के महेश शर्मा को भील समुदाय के लिए किए गए कार्यों के लिए पद्मश्री सम्मान मिला।
यहाँ एक प्रश्न रुककर पूछने लायक़ है —
अगर उन्हें मज़दूरी मिलती, तो क्या वह भी हलमा होता?
नहीं होता। काम वही होता, गड्ढे वही खुदते, तालाब वैसे ही भरता। पर वह एक ठेका होता, प्रथा नहीं।
और यही अंतर इस पूरे अध्याय का विषय है।
चेन्नई, 2015
दस साल पहले चेन्नई में ऐसी बारिश हुई कि, पाठ्यपुस्तक के शब्दों में, “सड़कें मानों नदियाँ बन गईं”।
लोग घरों से निकल नहीं सके। लगभग सभी दुकानें बंद हो गईं। सेवाएँ ठप हो गईं।
और तब, बिना किसी के कहे, अनेक निजी समूह — विशेष रूप से आध्यात्मिक और धार्मिक संगठन — बड़ी मात्रा में भोजन बनाने लगे और उसे उन लोगों तक पहुँचाने लगे जिनके पास कुछ नहीं बचा था।
पाठ्यपुस्तक इस उदाहरण के बाद वह कसौटी लिख देती है जो हलमा पर भी लागू होती थी:
”…जब लोग बिना किसी लाभ की उम्मीद के समुदाय के हित के लिए एक साथ मिलकर आगे आए।”
दो अलग-अलग जगहें। दो अलग-अलग संकट। एक ही कसौटी।
पर यह सब शुरू कहाँ से होता है?
अध्याय हलमा से शुरू नहीं होता। वह उससे बहुत पहले, बहुत छोटी जगह से शुरू होता है — घर से।
और यह चुनाव बहुत सोचा-समझा है। यह अध्याय पाठ्यपुस्तक के एक नए खंड का पहला अध्याय है, और उस खंड का नाम है — ‘शासन और लोकतंत्र’।
यानी वह खंड जिसमें नियम, क़ानून, चुनाव और सरकार की बात आएगी।
और वह खंड संसद से शुरू नहीं होता। न्यायालय से नहीं। संविधान से भी नहीं।
वह परिवार से शुरू होता है।
‘कजिन’ के लिए कोई शब्द नहीं है
पाठ्यपुस्तक परिवार की बात एक बहुत सीधी परिभाषा से शुरू करती है:
“परिवार किसी भी समाज की मूलभूत और सबसे प्राचीन इकाई है।”
फिर वह दो प्रकार गिनाती है — संयुक्त परिवार, जिसमें अनेक पीढ़ियाँ एक साथ रहती हैं; और एकल परिवार, जिसमें एक दंपत्ति और उनकी संतान होती है। और वह यह जोड़ना नहीं भूलती कि “कई बार यह अकेली माता या पिता और उनके बच्चों तक सीमित होता है।”
पर इसके तुरंत बाद वह एक ऐसा मोड़ लेती है जिसकी उम्मीद नहीं होती। वह भाषा की बात करने लगती है।
पाठ्यपुस्तक कहती है कि अंग्रेज़ी में पारिवारिक संबंधों के लिए बहुत अधिक शब्द नहीं हैं। सोचकर देखिए — aunt कौन है? बुआ भी aunt, मौसी भी aunt, चाची भी, ताई भी, मामी भी। पाँच अलग-अलग रिश्ते, एक ही शब्द।
भारतीय भाषाओं में हर एक का अपना नाम है — बुआ, ताऊ, ताई, चाचा, मौसी, नाना, नानी। और तमिल में तो बड़े भाई-बहन और छोटे भाई-बहन के लिए भी अलग-अलग शब्द हैं।
यहाँ तक बात सीधी है — भारतीय भाषाओं में ज़्यादा शब्द हैं।
पर फिर पाठ्यपुस्तक एक प्रश्न पूछती है जो पूरी दिशा पलट देता है:
“क्या आप बता सकते हैं कि भारतीय भाषा में ‘कजिन’ के लिए कौन-सा शब्द है?”
अपने चाचा के बेटे को आप क्या कहते हैं?
भाई।
अपनी मौसी की बेटी को?
बहन।
तो ‘कजिन’ के लिए एक शब्द क्या हुआ?
कोई नहीं।
और पाठ्यपुस्तक स्वयं इसका कारण बताती है:
“ऐसा इसलिए क्योंकि कजिन का अर्थ केवल ‘भाई’ और ‘बहन’ होता है। इससे परिवार में सभी बच्चों के बीच गहरे संबंध का पता चलता है।”
यह बहुत सुंदर बात है, और इसका कारण यह है कि यह उल्टी दिशा में चलती है।
अंग्रेज़ी में शब्द कम हैं क्योंकि वहाँ रिश्तों में बारीक भेद नहीं किया जाता। भारतीय भाषाओं में ‘कजिन’ का शब्द नहीं है क्योंकि वह रिश्ता अलग माना ही नहीं जाता।
एक जगह शब्द की कमी दूरी दिखाती है। दूसरी जगह वही कमी नज़दीकी दिखाती है।
शालिनी, केरल
पाठ्यपुस्तक फिर दो कहानियाँ सुनाती है, और दोनों को भारत के दो छोरों से उठाती है।
पहली केरल से है।
शालिनी एक नगर में रहती है। उसके पिता छोटा-सा व्यापार करते हैं, माँ पास के विद्यालय में अध्यापिका हैं। एक छोटा भाई है। और साथ में रहते हैं अच्चम्मा — यानी पिता की माँ, चित्तप्पा — यानी पिता के भाई, चित्ती — यानी चाचा की पत्नी, और उनकी बेटी चिन्नी, जो शालिनी की चचेरी बहन है।
घर में ओणम की तैयारी चल रही थी।
पर एक कठिनाई थी — शालिनी के चाचा की नौकरी कुछ ही दिन पहले छूट गई थी, और चाची गृहिणी थीं।
अच्चम्मा ने शालिनी के पिता से कहा कि तुम्हारा भाई आर्थिक कठिनाई में है, वह त्योहार पर नए कपड़े नहीं ख़रीद पाएगा।
तो जब शालिनी के माता-पिता उसे और उसके भाई को ख़रीददारी के लिए ले गए, तो वे केवल अपने लिए कपड़े नहीं लाए। वे चित्तप्पा, चित्ती और चिन्नी के लिए भी लाए।
और इसका सीधा असर शालिनी पर पड़ा।
“इसका परिणाम यह हुआ कि शालिनी को अपनी उम्मीद के अनुसार रेशमी कपड़े नहीं, बल्कि सादे सूती कपड़े मिले।”
यहाँ कहानी रुक सकती थी। पर वह रुकती नहीं।
अच्चम्मा ने शालिनी को समझाया —
“परिवार में सभी एक-दूसरे की सहायता करते हैं और उनके पास जो कुछ भी है, उसे आपस में साझा करते हैं।”
“यह जानकर शालिनी को अब अपने मनपसंद कपड़े न मिलने के लिए बुरा नहीं लगा। उसे इस बात की खुशी थी कि सभी सदस्यों को नए कपड़े मिले।”
ध्यान दीजिए कि कहानी का असली मोड़ कहाँ है।
वह वहाँ नहीं है जहाँ शालिनी को सूती कपड़े मिले। वह वहाँ है जहाँ अच्चम्मा ने उसे समझाया।
त्याग तब तक बोझ है जब तक वह समझ में न आए। समझ में आते ही वह मूल्य बन जाता है।
तेनजिंग, मेघालय
दूसरी कहानी देश के बिल्कुल दूसरे छोर से है। पाठ्यपुस्तक स्वयं कहती है — “यह कहानी तो केरल की है। आइए, अब सुदूर पूर्वोत्तर में मेघालय के एक गाँव की ओर चलें।”
यह कहानी तेनजिंग स्वयं सुनाता है।
“मुझे उन पहाड़ों से प्यार है जहाँ मैं रहता हूँ, यद्यपि कभी-कभी वहाँ जीवन कठिन हो जाता है।”
उसके पिता किराने की एक छोटी दुकान चलाते हैं। उसकी माँ एक स्थानीय हस्तशिल्प सहकारी संगठन में काम करती हैं, जहाँ पर्यटकों के लिए पारंपरिक कपड़े और लकड़ी की नक्काशी बनती है।
और फिर एक वाक्य आता है जो इस कहानी को महत्वपूर्ण बना देता है:
माँ के काम पर जाने के कारण, पिता ने घर की सफ़ाई, सब्ज़ियों के बगीचे की देखभाल और घर के अन्य कामों में हाथ बँटाना शुरू किया। कभी-कभी वे सबके लिए भोजन पकाने में दादी की सहायता भी करते हैं।
यह पाठ्यपुस्तक का एक शांत, बिना शोर का वाक्य है — और वह बहुत कुछ कह देता है।
क्योंकि इसी पाठ्यपुस्तक ने कुछ पन्ने पहले बच्चों से पूछा था: “आपके घर में भोजन कौन पकाता है? फर्श की सफाई कौन करता है? बर्तन कौन साफ करता है?”
प्रश्न वहाँ पूछा गया था। उत्तर यहाँ रखा गया है।
दादी के पास हमेशा कहानियाँ रहती हैं — “जिनमें हँसी-मजाक और समझदारी की बातें होती हैं”। तेनजिंग कहता है कि लोगों को उनसे बेहतर समझने वाला शायद कोई और नहीं हो सकता।
और फिर दादा आते हैं — और उनके साथ यह अध्याय चुपचाप मुड़ जाता है।
दादा तेनजिंग की पढ़ाई में सहायता करते हैं और उसे बस स्टॉप तक छोड़ आते हैं। यह एक दादा का, यानी परिवार का काम है।
पर वे कॉलोनी के सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं।
एक बार बिजली चली गई — वे पास के कार्यालय गए और शिकायत दर्ज करा आए।
और एक बार तूफ़ान से पड़ोस के एक घर को नुकसान हुआ — तब उन्होंने आस-पास के सब परिवारों से धनराशि इकट्ठी की और मरम्मत कराने के लिए उस परिवार को दे दी।
पहला काम अपने घर के लिए था। दूसरा किसी और के घर के लिए।
और यहीं, इसी अनुच्छेद में, बिना कोई शीर्षक बदले, यह अध्याय ‘परिवार’ से ‘समुदाय’ में चला जाता है।
जो लिखा नहीं है, फिर भी सब मानते हैं
पाठ्यपुस्तक अब समुदाय की परिभाषा देती है, और वह जितनी सरल है उतनी ही सावधान भी:
“आपस में जुड़े लोगों के इस समूह को ‘समुदाय’ कहते हैं (विभिन्न संदर्भों में ‘समुदाय’ के अन्य अर्थ भी होते हैं)।”
कोष्ठक वाला हिस्सा छोड़िए मत। पाठ्यपुस्तक पहली ही पंक्ति में मान लेती है कि इस शब्द के कई अर्थ हैं — और आगे चलकर वह उसे “एक लचीली संकल्पना” कहती है।
लोग समुदाय में त्योहारों पर, मेलों में, विवाहों में जुटते हैं। कुछ गाँवों में वे फ़सल काटने और बुआई के लिए ज़मीन तैयार करने में एक-दूसरे की मदद करते हैं।
और फिर पाठ्यपुस्तक एक बहुत बड़ी बात, बहुत छोटी आवाज़ में कह देती है।
वह कहती है कि समय के साथ समुदायों ने पानी, चरागाहों और वन-उत्पाद जैसे संसाधनों के साझा उपयोग पर सहमति बना ली। और फिर:
“इस तरह के अभ्यास — जिन्हें अलिखित ‘नियम’ कह सकते हैं — से समुदायों को संसाधनों तक सुरक्षित पहुँच प्रदान होती है। परंतु इसका यह अर्थ भी है कि समुदाय के अंदर सभी परिवारों तथा व्यक्तियों के विशिष्ट कर्तव्य हैं, अन्यथा समुदाय सुचारु रूप से कार्य नहीं कर पाएँगे।”
इस एक वाक्य में तीन बातें हैं।
पहली — नियम कुछ देते हैं: संसाधनों तक सुरक्षित पहुँच। दूसरी — नियम कुछ माँगते हैं: विशिष्ट कर्तव्य। तीसरी — और अगर वे कर्तव्य न निभाए जाएँ, तो पूरी व्यवस्था ही ढह जाती है।
यह अधिकार और कर्तव्य का पूरा सिद्धांत है — और वह कक्षा 6 की किताब में, बिना उन भारी शब्दों का प्रयोग किए, एक गाँव के तालाब के उदाहरण से समझा दिया गया है।
और सबसे महत्वपूर्ण बात: ये नियम कहीं लिखे हुए नहीं हैं। कोई दंड तय नहीं है। कोई पुलिस नहीं है।
फिर भी वे चलते हैं।
यानी नियम, क़ानून बनने से बहुत पहले से मौजूद थे।
एक वर्कशॉप, और शाम के चार घंटे
पाठ्यपुस्तक यहाँ रुककर एक बात साफ़ कर देती है — कि समुदाय केवल गाँव की चीज़ नहीं है।
“शहरी क्षेत्रों में भी समुदाय होते हैं, यद्यपि यह कुछ अलग तरीके से कार्य करते हैं।”
और फिर वह तीसरी कहानी सुनाती है।
बीस साल से भी अधिक पहले, अहमदाबाद के एक इलाक़े में कमल परमार नाम के एक आदमी की छोटी-सी ऑटो फेब्रिकेशन वर्कशॉप थी। वे अध्यापक नहीं थे। समाजसेवी नहीं थे। वे धातु का काम करते थे।
उन्होंने देखा कि सड़क पर वंचित बच्चों का एक समूह है। कुछ ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी। “अन्य तो कभी विद्यालय गए ही नहीं थे।”
तो उन्होंने अपने नियमित काम के बाद, हर दिन शाम 5.30 बजे से रात 9.30 बजे तक उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया।
और उन्होंने बच्चों को रात में मुफ़्त भोजन भी कराया।
“जल्दी ही उनकी कक्षा में 150 बच्चे नियमित रूप से आने लगे और पढ़ाई में उनकी बहुत रुचि भी थी।”
यहाँ कहानी रुक सकती थी। पर यहाँ वह असल में शुरू होती है।
एक स्थानीय विद्यालय के कुछ अध्यापकों ने इन कक्षाओं के बारे में सुना — और वे भी वहाँ पढ़ाने आने लगे।
उनमें से एक ने कहा:
“इन बच्चों के पास बैठने के लिए समुचित बेंच नहीं हैं, कक्षाओं में पूरी तरह शांति नहीं है और गुजरते हुए वाहन काफी शोर करते हैं। फिर भी वे अध्यापकों की बातों पर अपना पूरा ध्यान लगाते हैं। इसने मेरा मन छू लिया। मुझे उनसे जो स्नेह और लगाव मिला, वह अविश्वसनीय है।”
और फिर तीसरा घेरा बना।
नियमित विद्यालय जाने वाले कुछ बड़े बच्चों ने भी वहाँ स्वेच्छा से पढ़ाना शुरू कर दिया।
उनमें से एक ने जो कहा, वह इस पूरे अध्याय का सबसे अच्छा वाक्य है:
“हम वहाँ पढ़ाने गए थे, किंतु हमने उनसे बहुत कुछ सीखा।”
पाठ्यपुस्तक ने बहुत पहले, पृष्ठ 139 पर, ‘सहयोग’ की परिभाषा दे दी थी — “एक साथ काम करना”।
यह वाक्य उस परिभाषा में एक बात और जोड़ देता है: उस काम में देने वाला और लेने वाला अलग नहीं रहते।
और अंत में, एक मोहल्ले की बैठक
अध्याय के अंत में पाठ्यपुस्तक एक ऐसी चीज़ पर आती है जो पहली नज़र में बहुत मामूली लगती है।
वह कहती है कि पिछले 30 या 40 वर्षों में नए प्रकार के समुदाय उभरे हैं — और उसका उदाहरण है आवासीय कल्याण समितियाँ। मोहल्ले या अपार्टमेंट के लोगों की अपनी समितियाँ, जो कूड़े, सफ़ाई और पालतू पशुओं जैसी बातों पर अपने नियम बनाती हैं।
हलमा के बाद, बाढ़ के बाद, 150 बच्चों की कक्षा के बाद — एक मोहल्ला समिति। यह उतार लगता है।
पर उसके तुरंत बाद जो वाक्य आता है, वह इस पूरे खंड का बीज है:
“इन समुदायों में रहने वाले लोग इन नियमों और कानूनों के निर्माण में भागीदार होते हैं।”
इसे धीरे-धीरे पढ़िए।
जो लोग नियम से बँधे हैं, वही लोग नियम बनाते हैं।
यही लोकतंत्र है — और वह यहाँ, कक्षा 6 की किताब में, एक मोहल्ले की समिति के उदाहरण से समझा दिया गया है।
और अगले ही वाक्य में पाठ्यपुस्तक दिखाती है कि कोई समिति अकेली नहीं चलती। वह किराने के लिए व्यापारी समुदाय पर निर्भर है, और कूड़े के लिए नगर निगम के कामगारों पर।
“हमारे जटिल समाजों में प्रत्येक व्यक्ति कई अन्य व्यक्तियों और समुदायों पर निर्भर होता है।”
अध्याय के पृष्ठ 147 पर एक चित्र है — एक मेज़ के चारों ओर बैठे अलग-अलग उम्र, वेश और पृष्ठभूमि के लोग, और सामने एक श्वेत-पट जिस पर कोई सूची लिखी है।
यह किसी संसद का चित्र नहीं है। यह एक मोहल्ले की बैठक है।
और अगली किताबों में जो कुछ आएगा — बैठक, बहस, नियम, चुनाव, भागीदारी — वह सब इस एक चित्र में पहले से मौजूद है।
अंतिम पंक्ति
अध्याय तीन वाक्यों पर ख़त्म होता है।
पहला कहता है कि परिवार मानव समाज का आधार है — और उसमें एक शब्द-युग्म ऐसा है जिसे लोग अक्सर छोड़ देते हैं: “आदर्श रूप में” परिवार के सदस्य एक-दूसरे को सहयोग देते हैं।
पाठ्यपुस्तक यह नहीं कह रही कि हर घर में ऐसा होता ही है। वह कह रही है कि ऐसा होना चाहिए। यह ईमानदारी है, और उसे बचाना चाहिए।
दूसरा कहता है कि समुदाय अपेक्षाकृत बड़ी इकाई है, और उसे अनेक प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है।
और तीसरा — पूरे अध्याय की अंतिम पंक्ति — केवल छह शब्दों की है:
“अंतत: समुदाय एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।”
यही बात पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 139 पर परिवार के बारे में कह चुकी थी — कि उसके सदस्यों के संबंध “प्रेम, देखभाल, सहयोग और अंतर्निर्भरता” पर टिके होते हैं।
छोटी इकाई में जो सच था, बड़ी इकाई में भी वही सच निकला।
एक घर में शालिनी के कपड़े। एक गाँव में तालाब। एक शहर में शाम की कक्षा। एक मोहल्ले में बैठक।
और सबसे नीचे, एक ही शब्द — अंतर्निर्भरता।
झाबुआ की उस पहाड़ी पर पंक्तियों में जो गड्ढे खुदे थे, वे किसी एक आदमी ने नहीं खोदे थे। और जो तालाब भरा, वह किसी एक आदमी का नहीं था।
जो सत्यापित नहीं हो सका
यह खंड जान-बूझकर है। जो जाँचा नहीं जा सका, उसे छिपाना नहीं चाहिए।
- तिरुवल्लुवर का “पुष्प और फल” — यह तिरुक्कुरल 45 का शब्दश: अनुवाद नहीं है। मूल तमिल जोड़ी ‘गुण और फल’ (पण्बु, पयन्) है। यह एक स्वीकृत काव्य-रूपांतर है, ग़लती नहीं — पर शब्दश: नहीं।
- पाठ्यपुस्तक “सात सदस्यों के इस परिवार” कहती है, जबकि शालिनी की कहानी में आठ लोग नाम या संबंध से आते हैं। यह विसंगति अंग्रेज़ी संस्करण में भी मिलती है, यानी अनुवाद की भूल नहीं है। इसका कारण कहीं नहीं मिला।
- “कजिन का अर्थ केवल ‘भाई’ और ‘बहन’ होता है” — यह उत्तर भारत के लिए सही है। द्रविड़ भाषाओं में कुछ प्रकार के कजिन के लिए अलग शब्द हैं, इसलिए यह कथन कुछ अधूरा है।
- हलमा में लगाए गए “हजारों पेड़” और “सैकड़ों गाँव” — इनकी कोई स्वतंत्र गणना नहीं मिली; केवल संगठन और समाचार-विवरणों के अनुमान हैं।
- कमल परमार के पढ़ाने का समय — पाठ्यपुस्तक चार घंटे (5.30–9.30) कहती है; कुछ प्रकाशित विवरणों में लगभग दो घंटे। कौन-सा विवरण किस वर्ष का है, तय नहीं हो सका।
- उनके नाम का रूप — प्रकाशित विवरणों में ‘कमल परमार’ और ‘कमलेश परमार’, दोनों मिलते हैं।
- ‘चित्ती’ का अर्थ — पाठ्यपुस्तक इसे “चाची या चाचा की पत्नी” बताती है; कुछ स्रोत मलयालम में इसका अर्थ ‘पिता की बहन’ भी बताते हैं, और तमिल में यह प्राय: ‘माँ की छोटी बहन’ है। यह क्षेत्रीय भिन्नता है।
- तेनजिंग किस समुदाय का है — पाठ्यपुस्तक ने कहीं नहीं बताया। मेघालय की प्रमुख जनजातियाँ मातृवंशीय परंपरा मानती हैं, पर कहानी में पिता के घर-काम का कारण पाठ्यपुस्तक ने स्वयं दे दिया है, और वह अलग है — “माँ के कार्यरत होने के कारण।” इससे आगे कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।