यह पाठ्यपुस्तक का सारांश नहीं है। यह वही विषय है, पर अपने क्रम में कहा गया — उस पाठक के लिए जो पूरी कहानी एक बार में पढ़ना चाहता है। इसमें से कुछ भी विद्यार्थी की परीक्षा-सामग्री में नहीं गया है।
एक वाक्य जो 1949 में कहा गया था
संविधान अभी बना नहीं था। बनने में डेढ़ महीना और था।
13 अक्तूबर 1949 को संविधान सभा में एक सदस्य खड़े हुए — रूस्तम के. सिधवा — और उन्होंने एक ऐसी बात कही जो आज भी उतनी ही ताज़ा है:
“मैं चाहता हूँ … एक पूर्ण विकसित स्थानीय निकाय का शीघ्र गठन किया जाना चाहिए … ताकि लोग यह सचमुच जान सकें कि एक छोटे क्षेत्र में, उनके अपने नगरों में, उनके अपने गाँवों में प्रशासन क्या है, मताधिकार क्या है, शक्तियाँ क्या हैं, अधिकार क्या हैं और विशेषाधिकार क्या हैं।”
यह वाक्य ध्यान से पढ़िए। इसमें एक अजीब बात है।
सिधवा यह नहीं कह रहे कि स्थानीय निकाय इसलिए चाहिए कि सड़कें बनें और नालियाँ साफ़ हों। वे यह कह रहे हैं कि स्थानीय निकाय इसलिए चाहिए कि लोग सीख सकें।
यानी उनके लिए नगरपालिका एक सेवा-केंद्र नहीं, एक कक्षा थी।
और उसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि जो लोग नगरपालिकाओं में काम कर चुके हैं, उन्हें अच्छा प्रशिक्षण मिला है — क्योंकि नगरपालिका ही एक नागरिक का बुनियादी प्रशासन सँभालने का पहला प्रशिक्षण है।
इस अध्याय का शीर्षक है ‘आधारभूत लोकतंत्र’। सिधवा का यह वाक्य उस शीर्षक की सबसे अच्छी व्याख्या है।
तीन अध्याय, एक ही ढाँचा
यह अध्याय अकेला खड़ा नहीं है। यह एक तीन-भाग वाली शृंखला का अंत है।
पहले अध्याय में हमने पढ़ा था कि शासन के तीन अंग होते हैं और तीन स्तर। वहाँ एक पिरामिड बना था — केंद्र, राज्य और स्थानीय — और किताब ने कहा था कि स्थानीय सरकार उसका आधार है, और उसे आगे के दो अध्यायों में समझाया जाएगा।
दूसरे अध्याय ने उस आधार का आधा हिस्सा खोला — गाँवों वाला हिस्सा। वहाँ भी एक पिरामिड बना, पर वह अलग था: जिला, खंड और ग्राम।
और अब यह तीसरा अध्याय बाकी आधा हिस्सा खोलता है।
पर वह उससे थोड़ा और करता है — वह दोनों हिस्सों को एक ही चित्र में रख देता है।
एक पिरामिड, जिसके दो पैर हैं
पृष्ठ 175 पर जो चित्र है, वह इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण पन्ना है।
ऊपर से नीचे तीन खाने हैं — सबसे ऊपर राष्ट्रीय स्तर पर संघ सरकार, उसके नीचे राज्य सरकार, और सबसे नीचे ‘स्वशासन के लिए स्थानीय सरकार’।
यहाँ तक तो वही पुराना पिरामिड है।
पर फिर वह सबसे नीचे वाला खाना बीच से बँट जाता है।
बाईं ओर लिखा है — ‘ग्रामीण: पंचायती राज संस्थाएँ’। और उसके नीचे चार खाने हैं: जिला पंचायत, पंचायत समिति, ग्राम पंचायत, ग्राम सभा।
दाईं ओर लिखा है — ‘नगरीय: नगरीय स्थानीय निकाय’। और उसके नीचे तीन खाने हैं: नगर निगम या नगर परिषद (नगर पंचायत), वार्ड समिति, वार्ड के लोग।
बीच में भारत का नक़्शा बना है, और नीचे किताब लिखती है — “मानचित्र पैमाने पर आधारित नहीं है।”
अब यह समझ लीजिए, क्योंकि यहीं सबसे बड़ी भूल होती है:
यह चित्र यह नहीं कह रहा कि स्थानीय सरकार के दो स्तर हैं। स्तर एक ही है — स्थानीय। बस वह कहाँ है, इससे उसका रूप बदल जाता है। गाँव में उसका नाम पंचायत है; नगर में उसका नाम निगम, नगरपालिका या नगर पंचायत है।
दूसरे शब्दों में — यह वही सरकार है, दो अलग-अलग वेशों में।
और नगर की अपनी मुश्किल
किताब एक बात बड़ी ईमानदारी से कहती है।
“चूँकि ग्रामीण परिवेश की तुलना में नगरीय परिदृश्य सामान्यतः अधिक जटिल और विविध होता है, इसलिए यह समझा जा सकता है कि नगरीय शासन भी अधिक जटिल होगा। लेकिन हम यहाँ उसके मूल सिद्धांतों तक सीमित रहेंगे।”
यानी किताब कह रही है — यह विषय इतना बड़ा है कि हम आज केवल उसकी जड़ पढ़ेंगे।
पर ‘जटिल’ क्यों? इसका उत्तर किताब सीधे नहीं देती, वह एक सवाल पूछ लेती है: कोलकाता, चेन्नई या मुंबई जैसे नगर एक गाँव की तुलना में क्यों अधिक जटिल और विविध हैं?
उत्तर सीधे हैं — लाखों लोग एक ही जगह; सैकड़ों तरह के काम; पूरे देश से आए समुदाय; और जल, बिजली, परिवहन, कूड़ा, नाली — सब एक साथ, बहुत बड़े पैमाने पर।
पर एक उत्तर ऐसा है जो किताब बाद में देती है, और वही सबसे महत्वपूर्ण है।
हम उस पर लौटेंगे।
वह शब्द जिसे किताब दो बार कहती है
‘सहभागी लोकतंत्र’ — यह शब्द इस अध्याय में दो बार आता है, और दोनों बार बहुत सोच-समझकर रखा गया है।
पहली बार, परिचय के अंत में: ”…चाहे यह ग्रामीण, क्षेत्रीय, नगरीय, राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर हो। यह सहभागी लोकतंत्र की वृहत धारणा है।”
दूसरी बार, नागरिकों के कर्तव्यों के बीच में: “याद रहे कि यह एक सहभागी लोकतंत्र है।”
दोनों बार अर्थ एक ही है। पर दिशा उलटी है।
पहली बार यह सरकार से कहा गया है — तुम्हारा काम लोगों को सशक्त बनाना है। दूसरी बार यह नागरिक से कहा गया है — तुम्हारा काम भाग लेना है।
और अध्याय का असली विषय यही दूसरा वाला है।
नगरीय स्थानीय निकाय — और एक शब्द जो सब बदल देता है
किताब परिभाषा देती है:
“नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय सरकार की संरचनाओं को ‘नगरीय स्थानीय निकाय’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि ये शीर्ष प्राधिकरण के अंतर्गत कार्य नहीं करते हैं।”
यह दूसरा वाक्य ज़रा असामान्य है। यह परिभाषा बताने के बजाय बताता है कि यह चीज़ क्या नहीं है।
और फिर वह शब्द आता है — स्वायत्तता।
“इन स्थानीय समुदायों को अपने क्षेत्रों के प्रबंधन या अपने सामने उपस्थित मुद्दों या समस्याओं का हल ढूँढ़ने की स्वायत्तता रहती है। यह एक क्षेत्र में रह रहे नागरिकों के साथ आने और उनके लिए सर्वोत्तम क्या है, इस पर निर्णय लेने का एक तंत्र है।”
पिछले अध्याय का केंद्रीय शब्द ‘स्व-शासन’ था। इस अध्याय का ‘स्वायत्तता’ है।
दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं — स्व-शासन लक्ष्य है, और स्वायत्तता वह छूट है जो उसे संभव बनाती है।
पर एक बात ध्यान रखने की है: स्वायत्तता का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है। उसी चित्र 12.2 में देखिए — नगरीय स्थानीय निकाय राज्य सरकार के नीचे बना है, ऊपर नहीं। उसे अपने क्षेत्र के अपने कामों में निर्णय की छूट है, बस।
नगर के टुकड़े
नगर बहुत बड़ा है। तो उसे सँभाला कैसे जाए?
किताब का उत्तर एक वाक्य में है: “नगरों एवं कस्बों को छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित किया जाता है, जिन्हें ‘वार्ड’ कहते हैं।”
और हर वार्ड की अपनी वार्ड समिति होती है।
वह क्या करती है? किताब दो सूचियाँ देती है।
पहली — कुछ काम, जिनमें वह सहायता करती है: स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन, और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक के विरुद्ध अभियान।
दूसरी — कुछ समस्याएँ, जिन पर वह दृष्टि रखती है: जल रिसाव, नाली का जाम होना, किसी सड़क का टूट जाना।
और अब वह क्रिया, जो सब कुछ तय कर देती है — इन समस्याओं के बारे में वह “अधिकारियों को अवगत कराती है।”
यानी वह इन्हें ठीक नहीं करती। वह इन्हें देखती और बताती है।
यह छोटी-सी बात नहीं है। वार्ड समिति नगर की आँख है, हाथ नहीं। और यही उसकी पूरी भूमिका है — समस्या को उस तक पहुँचाना जो उसे हल कर सकता है।
किताब यह भी जोड़ देती है कि वार्डों की कार्यप्रणाली हर राज्य में अलग है, क्योंकि वह हर राज्य के अपने नियमों पर निर्भर है। यह वही बात है जो पिछले अध्याय ने पंचायतों के बारे में कही थी — ढाँचा पूरे देश का एक है, ब्योरा हर राज्य का अपना।
पाँच काम, और उनमें से एक अजीब
फिर किताब निकायों के कामों की सूची देती है — और स्वयं कहती है कि यह “एक लंबी सूची” है:
आधारभूत ढाँचे की देखभाल पर ध्यान रखना। कब्रगाहों का रख-रखाव। अपशिष्ट संग्रहण एवं निपटान। सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन पर ध्यान रखना। स्थानीय कर एवं अर्थदंड प्राप्त करना।
और फिर वह ‘आदि’ लिख देती है।
इस सूची में एक प्रविष्टि चौंकाती है — कब्रगाहों का रख-रखाव।
नगर निगम इतने बड़े काम करता है, और उसकी सूची में कब्रगाह? क्यों?
इसका उत्तर तीन पन्ने बाद अपने आप मिल जाता है — और वह इतना सुंदर है कि किताब उसे कहती भी नहीं, बस दिखा देती है। हम भी उसे अभी नहीं कहेंगे।
अब सबसे महत्वपूर्ण पन्ना
पृष्ठ 177 पर अध्याय अपना विषय बदल देता है।
अब तक बात संस्थाओं की थी। अब बात हमारी है।
”…कार्यों को कुशलतापूर्वक करने में सक्षम होने के लिए, नागरिकों को भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, अर्थात नागरिकों को अपने क्षेत्र की देखभाल एवं रख-रखाव का ध्यान रखना चाहिए। याद रहे कि यह एक सहभागी लोकतंत्र है।”
और फिर दो उदाहरण — बहुत छोटे, बहुत रोज़ के।
पहला: अगर लोग कूड़े के पृथक्करण के निर्देशों का सावधानी से पालन करें, तो कूड़े का एकत्रीकरण और निस्तारण आसान हो जाता है।
दूसरा: अगर वे किसी गली में जल-रिसाव देखें और तुरंत सूचना दें, तो बहुमूल्य जल का अपव्यय रुकेगा।
दोनों उदाहरणों का आकार एक ही है — एक छोटा-सा काम, जो एक बड़े लाभ में बदल जाता है।
और यहीं वह भूल टूटती है जो अधिकांश लोगों की होती है — कि नागरिक का कर्तव्य वोट देना है।
वोट पाँच वर्ष में एक बार पड़ता है। कूड़ा हर दिन निकलता है।
लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन नहीं चलता।
दो तारीख़ें, और उनके बीच का सौ साल
पृष्ठ 177 पर एक इमारत की तस्वीर है, जिस पर लिखा है — Corporation of Chennai। और उसके नीचे एक छोटा-सा बॉक्स, जिसमें बहुत कुछ है।
29 सितंबर 1688 को मद्रास कॉरपोरेशन स्थापित हुआ — भारत की सबसे प्राचीन नगर निगम संस्था। उससे एक वर्ष पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक चार्टर जारी कर फोर्ट सेंट जॉर्ज नगर और उससे 16 किलोमीटर के भीतर के सारे क्षेत्रों को एक कॉरपोरेशन में गठित कर दिया था।
और फिर वह वाक्य, जिस पर सब टिका है:
“1792 के एक संसदीय अधिनियम ने मद्रास कॉरपोरेशन को नगर में स्थानीय कर लगाने की शक्ति प्रदान की जिससे स्थानीय नगरीय स्वशासन सुचारु रूप से आरंभ हुआ।”
अब गिनिए। 1688 में संस्था बनी। 1792 में उसे कर लगाने की शक्ति मिली। बीच में सौ साल से भी ज़्यादा।
और किताब स्वशासन का आरंभ 1688 से नहीं, 1792 से मानती है।
इससे एक बात निकलती है, जो इस पूरे अध्याय पर लागू होती है:
जिस निकाय के पास अपना पैसा जुटाने की शक्ति न हो, वह अभी पूरा स्वशासन नहीं है। नाम होने से शासन नहीं होता; साधन होने से होता है।
एक तालिका, जो चुपचाप एक बात कह जाती है
पृष्ठ 178 पूरा एक तालिका है — इंदौर नगर निगम की सेवाओं की। और किताब लिखती है कि यह सूची भी “संक्षेप में” दी गई है।
उसमें संपत्ति कर है, जल शुल्क है, सूखा कूड़ा प्रबंधन है, व्यापार लाइसेंस है। सी.आर.एम. के अंतर्गत विवाह प्रमाणपत्र है, अग्निशमन सेवाएँ हैं, जल टैंकर है, मलबा हटाना है, शिकायतें हैं। और ‘सेवा के लिए अनुरोध’ की पंक्ति में — जल टैंकर, सेप्टिक टैंकर, सभागार, अंत्येष्टि क्रिया संबंधी वाहन, चल शौचालय, एंबुलेंस।
‘सी.आर.एम.’ का अर्थ किताब नीचे बता देती है — सिटिजन रिलेशनशिप मैनेजमेंट, यानी नागरिक संबंध प्रबंधन। यह इस अध्याय का सबसे आधुनिक शब्द है, और सबसे सरल विचार भी: नगर निगम के पास एक ऐसा रास्ता है जिससे नागरिक सीधे सेवा माँग सकता है या शिकायत कर सकता है।
पर इस तालिका में एक जोड़ी ऐसी है जिस पर ध्यान जाना चाहिए।
इसी एक तालिका में विवाह प्रमाणपत्र भी है, और अंत्येष्टि क्रिया संबंधी वाहन भी।
अब उस पुराने सवाल पर लौटिए — नगर निगम कब्रगाह क्यों सँभालता है?
क्योंकि उसका काम नागरिक के जीवन के हर पड़ाव से जुड़ा है। जन्म से लेकर अंत तक। यह वह सरकार है जो हमारे सबसे पास रहती है — इतने पास कि हम उसे प्रायः देखते भी नहीं।
जितना बड़ा नगर, उतना बड़ा नाम
पृष्ठ 179 पर किताब एक साफ़ तालिका दे देती है।
10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में सर्वोच्च निकाय नगर निगम होता है — जिसे महानगर निगम भी कहा जाता है। 1 से 10 लाख के बीच नगरपालिका होती है — जिसे म्यूनिसिपल कांउसिल भी कहते हैं। और 1 लाख से कम जनसंख्या वाले नगरों और कस्बों में नगर पंचायत होती है।
चेन्नई और इंदौर, दोनों में नगर निगम हैं।
यहाँ एक शब्द जाल बिछा देता है — ‘नगर पंचायत’।
‘पंचायत’ सुनते ही मन गाँव की ओर चला जाता है। पर नगर पंचायत गाँव की संस्था नहीं है। वह छोटे नगरों और कस्बों की है। चित्र 12.2 में उसे देखिए — वह दाईं ओर लिखी है, बाईं ओर नहीं।
याद रखने का सबसे आसान तरीका एक सीढ़ी है:
नगर पंचायत → नगरपालिका → नगर निगम।
जितना बड़ा नगर, उतना बड़ा नाम।
और अब वह उत्तर, जो हमने टाल रखा था
पृष्ठ 179 से एक बातचीत शुरू होती है। दो बच्चे — समीर, जो गाँव में रहता है, और अनीता, जो नगर से अपने दादा-दादी से मिलने आई है।
अनीता नगर का वर्णन करती है: व्यस्त, भीड़-भाड़ वाला, ऊँचे भवनों से भरा, लोग हर समय इधर-उधर आते-जाते। गाँव के शांत वातावरण की तुलना में कोलाहल से भरा। और फिर वह एक बात कहती है जो साधारण लगती है, पर नहीं है:
“वहाँ लोग अधिक आत्मनिर्भर होते हैं। वे प्रायः अपने पड़ोसियों के बारे में भी नहीं जानते।”
समीर गाँव का चित्र खींचता है: हर व्यक्ति एक-दूसरे को जानता है और सहायता के लिए तत्पर रहता है; लोग मिल-जुल कर खेतों में काम करते हैं, साथ में त्योहार मनाते हैं, और सामूहिक निर्णय भी लेते हैं।
पर अनीता हार नहीं मानती। वह कहती है कि नगर में भी कुछ सामुदायिक भावना है, और एक घटना सुनाती है: भारी वर्षा से दो गली दूर एक मकान ढह गया, और आस-पास से दर्जनों लोग मलबा हटाने आ गए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई अंदर फँसा न रह जाए।
समीर पूछता है — क्या ऐसे मामलों में स्थानीय सरकार सहायता नहीं करती?
और अनीता कहती है — “हाँ, करती है।”
यह दो शब्दों का उत्तर बहुत ज़रूरी है। किताब यह नहीं कह रही कि लोग सरकार की जगह ले लेते हैं। वह कह रही है कि दोनों साथ काम करते हैं। पड़ोसी पहले पहुँचते हैं; निकाय भी आता है। यही सहभागी लोकतंत्र है।
फिर समीर एक कहानी सुनाता है, और वही इस पूरे अध्याय की सबसे बड़ी बात है।
एक दिन कुछ बच्चों ने देखा कि बिजली का एक तार खतरनाक तरीके से नीचे लटका हुआ है, और एक भवन को लगभग छू रहा है।
उन्होंने क्या किया?
उन्होंने इसकी रिपोर्ट की। यह पहला काम था।
पर उन्होंने एक दूसरा काम भी किया — उन्होंने अपनी ग्राम सभा के एक सदस्य को सुझाव दिया कि बिजली का खंभा कुछ दूरी पर स्थानांतरित कर दिया जाए।
और किताब का अगला वाक्य यह है: “और, ऐसा किया गया!”
समस्या बताना पहला कदम है। समाधान सुझाना दूसरा — और वही लोकतंत्र है।
और फिर समीर एक बात कह देता है, जिसका उसे अंदाज़ा भी नहीं
अनीता के नगरीय निकाय के बारे में सुनकर समीर कहता है कि यह तो ग्राम पंचायत जैसी ही लगती है, बस उससे बड़ी। और फिर वह जोड़ता है:
“हमारे यहाँ भी सदस्य निर्वाचित होते हैं। लेकिन चूँकि वे एक-दूसरे को जानते भी हैं, इसलिए अधिक लोग उसमें भाग लेते हैं और गाँव से संबंधित हर प्रकार के विषयों पर चर्चा करते हैं। कभी-कभी हम बच्चों की बात भी सुनी जाती है।”
यह वाक्य दोबारा पढ़िए।
समीर यह नहीं कह रहा कि गाँव बेहतर है। वह एक तथ्य बता रहा है — छोटे समुदाय में भागीदारी अपने आप हो जाती है, क्योंकि लोग एक-दूसरे को जानते हैं।
तो नगर में, जहाँ अनीता के अपने शब्दों में लोग पड़ोसियों को भी नहीं जानते, भागीदारी कैसे होगी?
और यहीं वह उत्तर आता है जो हमने शुरू में टाल दिया था।
इसीलिए नगर को छोटे-छोटे वार्डों में बाँटा जाता है।
वार्ड कोई प्रशासनिक सुविधा नहीं है। वह नगर के भीतर एक छोटा समुदाय बनाने की कोशिश है — इतना छोटा कि लोग फिर से एक-दूसरे को जान सकें, और इसलिए भाग ले सकें।
किताब यह वाक्य कहीं नहीं लिखती। पर पृष्ठ 176 और पृष्ठ 180 को साथ रखिए, और वह अपने आप निकल आता है।
तीन पंक्तियाँ, और एक वाक्य
अध्याय अपने सारांश में तीन बातें कहता है।
पहली — नगरीय क्षेत्रों में विभिन्न नगरीय स्थानीय निकायों के माध्यम से विकेंद्रित शासन चलता है।
दूसरी — जैसे ग्रामीण संदर्भ में होता है, यहाँ भी सदस्य निर्वाचित होते हैं।
तीसरी — यह सुनिश्चित करना नागरिकों का कर्तव्य है कि निकाय कुशल तरीके से काम कर सकें।
इन तीनों का क्रम ही पूरा अध्याय है: पहले ढाँचा, फिर गाँव से समानता, और अंत में हम।
पर अध्याय का असली अंत यह सारांश नहीं है। वह उससे दो पन्ने पहले है, जहाँ अनीता समीर से विदा लेने से पहले कहती है:
“यह शहर में अधिक जटिल प्रतीत होता है, लेकिन मूल विचार वही है कि प्रत्येक व्यक्ति का मत महत्व रखता है।”
तीन अध्याय, तीन पिरामिड, दर्जनों नाम और संस्थाएँ — और अंत में सब कुछ इस एक वाक्य पर आ जाता है।
1949 में सिधवा ने यही चाहा था। इस अध्याय ने वही दिखा दिया।