Chapter 1पृथ्वी पर स्थानों की स्थिति

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NCERT, समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 6), अध्याय 1

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यह पूरा अध्याय यहाँ एक कहानी की तरह, किताब के ही क्रम में, सरल शब्दों में फिर से कहा गया है। उद्धरण-चिह्नों में लिखी पंक्तियाँ किताब की अपनी हैं, उसी वर्तनी में; जहाँ कोई हिसाब या बात हमारी अपनी है, वहाँ हमारा लिखा है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ दिए हैं (2026-27 में छपी किताब), ताकि आप किताब खोलकर साथ-साथ पढ़ सकें। बीच-बीच में रुककर सोचिए आएगा: पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर नीचे दिया उत्तर पढ़िए।


1. किसी जगह तक कैसे पहुँचें

(पृष्ठ 7–8)

अध्याय के पहले पन्ने पर आर्यभट्ट का एक कथन छपा है, जिसमें पृथ्वी को अंतरिक्ष में स्थित और गोलाकार बताया गया है। उसके बाद किताब तीन महत्वपूर्ण प्रश्न रखती है। पूरा अध्याय इन्हीं के उत्तर खोजता है:

  1. “मानचित्र क्या है और हम इसका उपयोग कैसे करते हैं? इसके मुख्य घटक क्या हैं?”
  2. “निर्देशांक क्या हैं? पृथ्वी पर किसी स्थान को अंकित करने के लिए अक्षांश और देशांतर का उपयोग कैसे किया जा सकता है?”
  3. “देशांतर से स्थानीय समय और मानक समय कैसे संबंधित हैं?”

मान लीजिए आप किसी नए नगर में पहुँचे हैं और आपको किसी ख़ास जगह जाना है। या तो वहाँ रहने वाले किसी व्यक्ति से रास्ता पूछिए, या मानचित्र देखिए। किताब कहती है: “मानचित्र स्थानों का पता लगाने के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है जो यह दर्शाता है कि किसी स्थान की स्थिति कहाँ है और वहाँ तक कैसे पहुँचा जा सकता है।”

2. मानचित्र और उसके तीन घटक

(पृष्ठ 9–11)

“मानचित्र किसी भी क्षेत्र का एक प्रतीकात्मक चित्रण या रेखांकन है”। उसमें हम ज़मीन को ऊपर से देखते हैं: “मानचित्र में आप सतह को ऐसे देखते हैं, जैसे आप उसे ऊपर से देखते हैं।” बहुत सारे मानचित्र एक साथ एक किताब में हों, तो वह एटलस है: “एटलस (मानचित्रावली) मानचित्रों की एक पुस्तक या संग्रह है।”

किताब मानचित्र के अनेक प्रकारों में से तीन बताती है:

  • भौतिक मानचित्र: “भौतिक मानचित्र मुख्य रूप से प्राकृतिक आकृतियों, जैसे– पर्वतों, महासागरों और नदियों को दर्शाते हैं।”
  • राजनैतिक मानचित्र: “राजनैतिक मानचित्र देशों या राज्यों, सीमाओं, नगरों आदि को दर्शाते हैं।”
  • थिमैटिक मानचित्र: “थिमैटिक मानचित्र विशिष्ट प्रकार की सूचना प्रदान करते हैं।”

हर मानचित्र किन चीज़ों से बनता है? “किसी भी मानचित्र के तीन मुख्य घटक होते हैं— दूरी, दिशा और प्रतीक चिह्न।”

दूरी: एक बड़ा इलाका छोटे-से कागज़ पर कैसे आता है? “यह मानचित्र के स्केल की सहायता से किया जाता है।” स्केल का अर्थ है: “मानचित्र का प्रत्येक सेंटीमीटर धरातल पर एक निश्चित दूरी का प्रतिनिधित्व करता है।” अगर मानचित्र का 1 सेंटीमीटर धरती पर 500 मीटर के बराबर हो, तो किताब के शब्दों में “स्केल 1 सेंटीमीटर = 500 मीटर है”। इसीलिए “मानचित्र पर चिह्नित किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की वास्तविक दूरी उस स्केल पर निर्भर है, जिसका मानचित्र उपयोग करता है।”

हमारा हिसाब: स्केल 1 सेंटीमीटर = 500 मीटर हो और मानचित्र पर दो जगहों के बीच 3 सेंटीमीटर हों, तो असली दूरी 3 × 500 = 1500 मीटर, यानी डेढ़ किलोमीटर।

दिशा: चार मुख्य दिशाएँ हैं: “शीर्ष पर उत्तर और घड़ी के काँटे की दिशा में घूमते हुए पूर्व, दक्षिण तथा पश्चिम। इन्हें चतुर्दिश या प्रधान बिंदु भी कहा जाता है।” इनके बीच की चार दिशाएँ भी काम आती हैं: “मध्यवर्ती दिशाओं— उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम का भी उपयोग किया जाता है।” उत्तर किधर है, यह कैसे पता चले? “अधिकतर मानचित्रों में ‘उ.’ अक्षर से अंकित एक तीर होता है, जो उत्तर दिशा को इंगित करता है।”

प्रतीक चिह्न: “प्रतीक चिह्न मानचित्रों का एक और महत्वपूर्ण घटक है।” किताब के छोटे नगर वाले मानचित्र में भवनों के “लघु आरेख (ड्राइंग्स)” बने हैं, पर किसी बड़े नगर या पूरे देश के मानचित्र पर इन सबको बनाने की जगह नहीं होती। इसलिए उनकी जगह चिह्न बनाए जाते हैं। “विभिन्न उपयोगकर्ता मानचित्र को अधिक सरलता से समझें, इसके लिए मानचित्र निर्माता विशिष्ट प्रतीक चिह्नों का उपयोग करते हैं।” पर हर जगह एक जैसे चिह्न नहीं चलते: “विभिन्न देश प्रतीक चिह्नों के अलग-अलग समुच्चय का उपयोग करते हैं।” हमारे देश में “सरकारी निकाय भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने भारत (या भारत के भागों) के मानचित्रों के लिए प्रतीक चिह्नों का एक संकलन निर्धारित किया है।”

रुककर सोचिए: मानचित्र पर हर इमारत, पेड़ और पुल को उसके पूरे रूप में बनाने की जगह छोटे प्रतीक चिह्न क्यों बनाए जाते हैं?

उत्तर (किताब से): “इस तरीके से मानचित्र पर उपलब्ध सीमित स्थान पर अनेक विवरण दर्शाए जा सकते हैं।”

3. पृथ्वी गोल है, कागज़ चपटा

(पृष्ठ 12)

पृथ्वी की आकृति लगभग गोलाकार है। “लगभग” इसलिए, क्योंकि वह पूरी गोल नहीं, “ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है”; फिर भी किताब कहती है, “हम इसे व्यावहारिक दृष्टि से गोलाकार मानेंगे”।

अब मुश्किल यह है: “कागज के एक समतल पृष्ठ पर एक गोलाकार वस्तु को यथावत चित्रित करना संभव नहीं है।” किताब इसे एक संतरे से समझाती है। संतरे का छिलका केवल तीन या चार टुकड़ों में उतारिए और उसे मेज़ पर सपाट बिछाने की कोशिश कीजिए। “आप पाएँगे कि किनारों को तोड़े बिना आप यह नहीं कर सकते।” गोल पृथ्वी का मानचित्र समतल कागज़ पर बनाने में भी यही दिक्कत आती है।

अब किताब ग्लोब की बात करती है। ग्लोब “एक गोल आकृति जैसा है और उस पर एक मानचित्र बनाया गया है।” यह आम तौर पर धातु, प्लास्टिक या कार्डबोर्ड का बना होता है। ग्लोब सिर्फ़ पृथ्वी का नहीं होता: “यह पृथ्वी, चंद्रमा, मंगल ग्रह, तारों और तारा-मंडल आदि का भी एक मानचित्र हो सकता है।” पृथ्वी के लिए ग्लोब बेहतर क्यों है? “चूँकि ग्लोब और पृथ्वी का आकार एक समान (गोलाकार) होता है, इसलिए एक ग्लोब, किसी समतल मानचित्र की तुलना में पृथ्वी के भूगोल का बेहतर प्रतिनिधित्व करता है।”

4. दो संख्याएँ, एक जगह

(पृष्ठ 12–13)

किताब एक बाज़ार की बात करती है, जहाँ “सीधी पंक्तियों में समान आकार की दुकानें” हैं। आप एक स्टेशनरी की दुकान पर अपने मित्र से मिलना चाहते हैं, पर मित्र को दुकान का पता नहीं। तो आप उसे बताते हैं: “प्रवेश द्वार से 5वीं पंक्ति की 7वीं दुकान पर सायं 6 बजे मुझसे मिलें।” बस दो बातें, पंक्ति और दुकान, और मित्र ठीक उसी दुकान पर पहुँच जाता है।

शतरंज की बिसात भी ऐसे ही काम करती है। खानों के स्तंभों पर अक्षर ‘क’ से ‘ज’ तक और पंक्तियों पर अंक 1 से 8 तक लिखे होते हैं। एक अक्षर और एक अंक मिलकर एक खाना बताते हैं। किताब के उदाहरण में प्यादा ‘घ’ 2 से ‘घ’ 4 पर आगे बढ़ा है।

ककखखगगघघङङचचछछजज1122334455667788
शतरंज की बिसात: हर खाने का पता एक अक्षर और एक संख्याकिताब के पृष्ठ 12 के चित्र के आधार पर हमारा बनाया चित्र; बाकी मोहरे नहीं दिखाए; बिंदुदार प्यादा और तीर हमने जोड़े हैं, ताकि प्यादे की चाल दिखे

बाज़ार और शतरंज, दोनों में जगह बताने के इस तरीके को किताब निर्देशांक प्रणाली कहती है। और “मानचित्र पर किसी स्थान की स्थिति के निर्धारण के लिए निर्देशांकों की इसी प्रणाली का प्रयोग किया जाता है।” पृथ्वी पर ये दो संख्याएँ हैं अक्षांश और देशांतर। आगे पृष्ठ 15 पर किताब कहती है: “अक्षांश और देशांतर मिलकर एक स्थान के दो निर्देशांक होते हैं।”

5. अक्षांश: भूमध्य रेखा से दूरी

(पृष्ठ 13–14)

ग्लोब को घुमाइए। “जब यह घुमाया जाता है तो ऊपरी और निचले स्तर पर स्थित बिंदु दो ध्रुव हैं। इनके मध्य में भूमध्य रेखा (विषुवत वृत्त) होती है।”

कोई जगह भूमध्य रेखा से कितनी उत्तर या कितनी दक्षिण है, यही उसका अक्षांश है: “अक्षांश, भूमध्य रेखा से इसी दूरी को मापता है।” किसी जगह से होकर भूमध्य रेखा के समानांतर, पूर्व से पश्चिम एक काल्पनिक रेखा खींचिए। “इस प्रकार की रेखा को अक्षांश (समानांतर) कहा जाता है और यह पृथ्वी के चारों ओर एक वृत्त बनाती है।”

ये वृत्त सब बराबर नहीं हैं: “सबसे बड़ा वृत्त, विषुवत वृत्त है, जबकि हम जैसे ही उत्तर की ओर या दक्षिण की ओर आगे बढ़ते हैं तो अक्षांश द्वारा अंकित किए गए वृत्त छोटे होते जाते हैं (चित्र 1.3)।”

“अक्षांशों को अंशों (डिग्री) में व्यक्त किया जाता है।” भूमध्य रेखा 0° है। ध्रुवों के लिए किताब कहती है: “इसे 90° उ. और 90° द. के रूप में लिखा जाता है।”

“अक्षांश और जलवायु के बीच एक संबंध है।” किताब के अनुसार:

कहाँजलवायु
भूमध्य रेखा के चारों ओरसामान्यतः गरम, जिसे उष्ण भी कहते हैं
ध्रुवों की ओर बढ़ते हुएशीतोष्ण
उत्तर या दक्षिण ध्रुव के निकटशीत (ठंडी)

रुककर सोचिए: किताब के प्रश्न 7 में यह कथन है: “अक्षांशों के सभी समानांतरों की लंबाई समान होती है।” यह सही है या गलत?

उत्तर: गलत। किताब कहती है कि सबसे बड़ा वृत्त विषुवत वृत्त है और ध्रुवों की ओर बढ़ने पर अक्षांश के वृत्त “छोटे होते जाते हैं”।

6. देशांतर और ग्रिनिच

(पृष्ठ 14–16)

अब ध्रुव से ध्रुव तक जाने वाली रेखाएँ देखिए। किताब का उदाहरण है कि एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक आप यूरोप और अफ्रीका से होकर जाइए या एशिया से होकर, दूरी एक समान होगी। “इन रेखाओं को देशांतरीय याम्योत्तर (मेरिडियन ऑफ लाँगिट्यूड) (चित्र 1.3) कहा जाता है। ये अर्धवृत्त हैं, जो एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक जाते हैं।”

गिनती कहीं से तो शुरू करनी होगी। किताब बताती है कि 0° वाली याम्योत्तर, यानी प्रमुख याम्योत्तर, ग्रिनिच से गुजरती है: “इसे ग्रिनिच याम्योत्तर भी कहते हैं क्योंकि वर्ष 1884 में कुछ देशों ने तय किया कि इंग्लैंड में लंदन के एक क्षेत्र ग्रिनिच से गुजरने वाली याम्योत्तर, प्रमुख याम्योत्तर के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक मानी जाएगी। इसे 0° देशांतर के रूप में अंकित किया जाता है।”

“देशांतर प्रमुख याम्योत्तर से दूरी का एक माप है।” “पश्चिम हो या पूर्व, इसका मान 0° से 180° तक बढ़ता है तथा इसमें पश्चिम के लिए ‘प.’ तथा पूर्व के लिए ‘पू.’ वर्णों को जोड़ा जाता है।” किताब के उदाहरण: “न्यूयॉर्क का देशांतर 74° प. है, जबकि दिल्ली का 77° पू. और टोक्यो का 140° पू. है।”

किसी जगह का पूरा पता दो संख्याओं से बनता है: “अक्षांश और देशांतर मिलकर एक स्थान के दो निर्देशांक होते हैं।” किताब का उदाहरण: दिल्ली 29° उ. अक्षांश और 77° पू. देशांतर पर स्थित है। किताब यह भी बताती है कि ये पूरे अंक लगभग सही हैं, एकदम सटीक नहीं। अक्षांश और देशांतर की रेखाएँ मिलकर एक जाल बनाती हैं: “यह सभी रेखाएँ मिलकर ग्लोब पर एक ग्रिड बनाती है जिन्हें ग्रिड रेखाएँ भी कहा जाता है।”

ये दो ख़ास रेखाएँ पृथ्वी को आधा-आधा बाँटती हैं (चित्र 1.4): प्रमुख याम्योत्तर पश्चिमी और पूर्वी गोलार्ध में, और भूमध्य रेखा उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में।

रुककर सोचिए: 180° देशांतर के साथ प. या पू. क्यों नहीं लिखा जाता?

उत्तर (किताब से): “180° प. और 180° पू. एक ही देशांतर हैं। इसलिए इस देशांतर को प. या पू. न लिखकर 180° ही लिखा जाता है।”

7. उज्जयिनी की मध्य रेखा

(पृष्ठ 16–18)

क्या ग्रिनिच ही पहली प्रमुख याम्योत्तर थी? नहीं। “वास्तव में ग्रिनिच याम्योत्तर, पहली ज्ञात प्रमुख याम्योत्तर रेखा नहीं है। अतीत में अन्य प्रकार के याम्योत्तर भी थे।” किताब आगे कहती है: “वास्तव में यूरोप से अनेक शताब्दियों पूर्व भारत की स्वयं की एक प्रमुख याम्योत्तर थी (चित्र 1.5), जिसे मध्य रेखा कहा जाता था और यह उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के मध्य से गुजरती थी।”

उज्जैन ही क्यों? “उज्जैन अनेक शताब्दियों तक खगोल विद्या का एक प्रतिष्ठित केंद्र रहा है। लगभग 1500 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध खगोलविद वराहमिहिर भी यहाँ रहे और अपना कार्य किया।” किताब यह भी बताती है: “भारतीय खगोलविद शून्य और प्रमुख याम्योत्तर सहित अक्षांश और देशांतर से परिचित थे। उज्जयिनी याम्योत्तर सभी भारतीय खगोलीय ग्रंथों में गणनाओं के लिए एक प्रमुख संदर्भ बन गया था।”

75.8° पू.कुरूक्षेत्ररोहितक/रोहतकदिल्लीमालवंगरा/नगरउज्जयिनी/उज्जैनमाहिष्मति/महेश्वरमुंबईकोलकाताबेंगलुरुचेन्नईकुमारी/कन्या कुमारीप्राचीन नगरआधुनिक नगर
चित्र 1.5 — उज्जयिनी की मध्य रेखा (75.8° पू.), उसके पास के प्राचीन नगर और आज के पाँच शहरकिताब के पृष्ठ 17 के चित्र 1.5 के आधार पर हमारा बनाया चित्र; शहर उनकी असली जगह पर, मालवंगरा/नगर किताब के चित्र के अनुसार; उभार: Natural Earth (public domain); आज की सीमाएँ नहीं दिखाई गई हैं

चित्र 1.5 में यह रेखा 75.8° पू. पर दिखाई गई है। इसमें वे पुराने नगर भी हैं जिनका उल्लेख खगोलीय ग्रंथों में मिलता है। उत्तर से दक्षिण (कोष्ठक में आज के नाम): कुरूक्षेत्र, रोहितक (रोहतक), मालवंगरा (नगर), उज्जयिनी (उज्जैन), माहिष्मति (महेश्वर) और कुमारी (कन्या कुमारी)। किताब कहती है: “कुछ शहर इसके अत्यधिक निकट हैं, जबकि अन्य कुछ दूरी पर हैं। ऐसा इसलिए है कि देशांतर को मापने के लिए सही-सही समय रखना आवश्यक है और यह वर्तमान की तुलना में तब उतना सटीक नहीं था।”

और भारत ख़ुद ग्रिड पर कहाँ है? चित्र 1.6 के अनुसार: “भारत का अक्षांश लगभग 8° उ. से 37° उ. तक फैला हुआ है और देशांतर लगभग 68° पू. से 97° पू. तक फैला हुआ है”।

8. देशांतर से समय

(पृष्ठ 15, 19)

पृथ्वी घूमती है, इसलिए एक ही पल में अलग-अलग देशांतर पर अलग-अलग समय होता है। इसी कारण किताब कहती है कि “एक स्थान के देशांतर के माप द्वारा हम उस स्थान के समय को भी मापेंगे।”

हमारा ग्रह अपनी धुरी पर घूमता है और “प्रत्येक 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करता है”। एक चक्कर 360° का होता है, यानी “प्रति घंटा 15°(15×24 = 360)”। इसलिए देशांतर 15°-15° के क़दमों में गिने जाते हैं: “मुख्य याम्योत्तर से पूर्व की ओर जाते हुए हम 0°, 15° पू., 30° पू., 45° पू. प्राप्त करते हैं और इसी प्रकार 15° जोड़ते हुए 180° पू. तक पहुँचते हैं।”

अब समय देखिए: “यदि ग्रिनिच पर दोपहर के 12 बजे मध्याह्न है, तो प्रत्येक 15° याम्योत्तर पर स्थानीय समय का एक घंटा जुड़ता जाता है।” पूर्व की ओर: “यदि 15° पू. पर दोपहर 1:00 बजे का स्थानीय समय है, तो 30° पू. पर दोपहर 2 बजे होंगे तथा इसी क्रम में समय आगे बढ़ता है।” पश्चिम की ओर उल्टा होता है: 15° प. पर सुबह 11 बजे हों, तो 30° प. पर सुबह 10 बजे होंगे, और समय घटता जाता है।

9पूर्वाह्न45° प.10पूर्वाह्न30° प.11पूर्वाह्न15° प.12मध्याह्न0°1अपराह्न15° पू.2अपराह्न30° पू.3अपराह्न45° पू.15°
चित्र 1.7 — प्रमुख याम्योत्तर के दोनों ओर स्थानीय समय: नीचे देशांतर, ऊपर समय; हर रंग एक याम्योत्तर पर केंद्रित 15° का क्षेत्रकिताब के पृष्ठ 19 के चित्र 1.7 के आधार पर हमारा बनाया चित्र

हमारी ओर से: किताब के चित्र 1.7 के शीर्षक में नीचे की पंक्ति को “अक्षांश” कहा गया है; पर 45° प. से 45° पू. तक की ये संख्याएँ देशांतर हैं, क्योंकि ये प्रमुख याम्योत्तर से पूर्व या पश्चिम की दूरी बताती हैं।

हमारा हिसाब: 15° में 1 घंटा, यानी 60 मिनट लगते हैं। तो 1° में 60 ÷ 15 = 4 मिनट।

रुककर सोचिए: ग्रिनिच पर दोपहर 12 बजे हों, तो 45° पू. पर स्थानीय समय क्या होगा?

उत्तर (किताब के चित्र 1.7 से): 3 अपराह्न। पूर्व की ओर हर 15° पर एक घंटा जुड़ता है, और 45° में तीन बार 15° है।

9. स्थानीय समय और मानक समय

(पृष्ठ 20–21)

किताब एक कहानी सुनाती है। ढलती दोपहर में दो मित्र फ़ोन पर बात कर रहे हैं, एक पोरबंदर (गुजरात) में और दूसरा तिनसुकिया (असम) में। तिनसुकिया वाला कहता है कि वहाँ सूरज डूब गया है और अँधेरा है। पोरबंदर वाला चकित होकर कहता है: “लेकिन यहाँ तो अभी भी दिन का प्रकाश है!” किताब संकेत देती है: “पोरबंदर और तिनसुकिया के बीच देशांतर में 30° के अंतर पर विचार कीजिए”।

हमारा हिसाब: 30° ÷ 15° = 2। तिनसुकिया पूर्व में है, इसलिए वहाँ का स्थानीय समय पोरबंदर से लगभग 2 घंटे आगे है।

हर जगह का अपना स्थानीय समय निकाला जा सकता है, पर अगर हर शहर की घड़ी अपने-अपने स्थानीय समय पर चले, तो क्या होगा? (यह सवाल हमारी ओर से है।) किताब कहती है: “लेकिन यह विधि किसी देश के अंदर अनेक स्थानीय समयों के उपयोग के संदर्भ में उचित नहीं होगी। इसी कारण अधिकतर देश उनके मध्य से गुजरने वाले याम्योत्तर पर आधारित एक मानक समय को अपनाते हैं।” हमारे देश का मानक समय: “भारतीय मानक समय (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम या आई.एस.टी.) ग्रिनिच (जिसे ग्रिनिच मीन टाइम या जी.एम.टी. भी कहा जाता है) पर स्थानीय समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।”

दुनिया के मानक समय समय क्षेत्रों में बँटे हैं: “यह सभी मानक समय, समय क्षेत्र में गठित किए गए हैं, जो ग्राफ में 15° के क्षेत्र (चित्र 1.7) का व्यापक रूप से पालन करते हैं।” इन क्षेत्रों की रेखाएँ “पूर्णतया सीधी नहीं होती हैं। ऐसा इसलिए है कि इन्हें अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं का पालन करते हुए प्रत्येक देश के मानक समय का ध्यान रखना पड़ता है।”

चित्र 1.8 में देशों पर + या − वाली संख्याएँ लिखी हैं। उन्हें पढ़ने का नियम: “मानचित्र में कुछ देशों के भीतर लिखित संख्याओं को उनका मानक समय प्राप्त करने के लिए जी.एम.टी. में जोड़ें (यदि उनका एक धनात्मक चिह्न है) अथवा घटाएँ (यदि उनका ऋणात्मक चिह्न है)।” भारत पर +5½ लिखा है।

कुछ देश इतने बड़े हैं कि एक मानक समय काफ़ी नहीं: “रूस, कनाडा या संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश एकल समय क्षेत्र की दृष्टि से अत्यधिक विशाल हैं।” किताब बताती है कि “संयुक्त राज्य अमेरिका में 6 समय क्षेत्र और रूस में 11 समय क्षेत्र हैं”। रूस में पूर्व से पश्चिम की यात्रा करें, तो घड़ी 10 बार बदलनी पड़ेगी।

रुककर सोचिए: किताब का प्रश्न 2 है: “जब लंदन में दोपहर 12 बजे का समय होता है, तो उसी समय भारत में सायं के 5:30 बजते हैं, क्यों?”

उत्तर: लंदन का ग्रिनिच 0° देशांतर पर है, और किताब के अनुसार भारतीय मानक समय ग्रिनिच के स्थानीय समय से “5 घंटे 30 मिनट आगे है”। दोपहर 12 बजे में 5 घंटे 30 मिनट जोड़िए, तो शाम के 5:30 बजते हैं।

10. अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा

(पृष्ठ 21–22)

ग्रिनिच से पृथ्वी की दूसरी ओर एक और ख़ास रेखा है: “ग्रिनिच पर स्थिर मुख्य याम्योत्तर, जिसके विपरीत की रेखा लगभग 180° देशांतर पर है, उसे अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है।” चित्र 1.8 में +12 और −12 वाले समय क्षेत्र इसी रेखा पर एक-दूसरे को छूते हैं। जहाज़ या विमान से इसे पार करें, तो घड़ी में तिथि बदलनी पड़ती है:

किस ओर यात्रा करते हुए पार कियादिन का क्या करेंकिताब का उदाहरण
पूर्व की ओर यात्रा करते हुएएक दिन घटाइएसोमवार से रविवार
पश्चिम की ओर यात्रा करते हुएएक दिन जोड़िएरविवार से सोमवार

यह रेखा भी पूरी सीधी नहीं है: “हमने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा लगभग 180° के देशांतर पर है, लेकिन यह कुछ देशों में एक ही दिन का विभाजन होने से बचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी होकर गुजरती है।”

11. पूरी बात थोड़े में

(पृष्ठ 22–23)

अध्याय के अंत में किताब ख़ुद चार बातों में पूरा अध्याय समेटती है:

  1. “मानचित्र पृथ्वी के क्षेत्र, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, को दर्शाने के लिए एक अत्यधिक उपयोगी साधन है। मानचित्रों के मुख्य घटक दूरी, दिशा और प्रतीक चिह्न हैं।”
  2. “पृथ्वी के प्रत्येक स्थान की एक स्थिति है जिसको अक्षांशों और देशांतरों के एक ग्रिड — पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली (भूमध्य रेखा के समानांतर) और उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाली (एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक) काल्पनिक रेखाओं की सहायता से सही-सही परिभाषित किया जा सकता है।”
  3. “देशांतर से समय निर्धारित किया जाता है और समय क्षेत्र को भी परिभाषित किया जाता है।”
  4. “अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा मुख्य याम्योत्तर के विपरीत लगभग 180° के देशांतर पर अवस्थित है। अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार करने पर तिथि में एक दिन का परिवर्तन होता है।”

अध्याय के अभ्यास, क्रियाकलाप और वर्ग पहेली किताब के पृष्ठ 23–25 पर हैं। दोहराने के लिए रिवीजन नोट्स देखिए, और अभ्यास के लिए प्रश्न बैंक खोलिए।