Chapter 6लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

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★उत्तर लिखने का नियम: पहले पाठ्यपुस्तक का तथ्य, फिर तिथि या आँकड़ा, फिर एक पंक्ति का निष्कर्ष। ! इस अध्याय में तिथियों का क्रम ही सबसे ज़्यादा अंक दिलाता है।


प्रश्न 1 · सही या गलत(पृ. 110)

(क)“आपातकाल की घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की।”

! तकनीकी रूप से गलत — पर इसे सावधानी से लिखिए। कारण: “25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी।” (पृ. 98) ★यानी सिफ़ारिश प्रधानमंत्री की थी, पर औपचारिक उद्घोषणा राष्ट्रपति की। ★★लिखने का सर्वोत्तम तरीका: “यह कथन आंशिक रूप से ही सही है — पहल प्रधानमंत्री की थी, परंतु संवैधानिक रूप से आपातकाल की उद्घोषणा राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने की।”

(ख)“आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गए।”

✓ सही। प्रमाण: “नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए। उनके पास अब यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ।” (पृ. 101) ★और अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान लिया कि “सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है।”

(ग)“बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र आपातकाल की घोषणा की गई थी।”

❌ गलत। कारण: सरकार ने जो कारण बताया वह आर्थिक नहीं था — “25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया।” ★आर्थिक संकट आपातकाल की पृष्ठभूमि अवश्य था, पर घोषणा का घोषित आधार नहीं। ! यही इस प्रश्न का जाल है — ‘पृष्ठभूमि’ और ‘घोषित कारण’ को अलग रखिए।

(घ)“आपातकाल के दौरान विपक्ष के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।”

✓ सही। प्रमाण: “तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई” (पृ. 98); और “अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया” (पृ. 101)।

(ङ)“सी.पी.आई. ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया।”

✓ सही। ★संदर्भ: अध्याय 5 में हमने पढ़ा कि 1971 में कांग्रेस (आर) ने सीपीआई के साथ चुनावी गठजोड़ किया था और टूट के बाद सरकार को उसका मुद्दा-आधारित समर्थन मिला था। वही निकटता आपातकाल के समय भी बनी रही। ! ध्यान दीजिए — यह सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) है, माकपा नहीं।

प्रश्न 2 ·कौन-सा आपातकाल की घोषणा के संदर्भ से मेल नहीं खाता?(पृ. 110)

✓ उत्तर: (ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष।

विकल्पघोषणा से पहले या बाद?
(क) ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वानपहले — मार्च 1974, बिहार आंदोलन ✓ पृष्ठभूमि
(ख) 1974 की रेल-हड़तालपहले — मई 1974 ✓ पृष्ठभूमि
(ग) नक्सलवादी आंदोलनपहले — इसी अवधि की बढ़ती सक्रियता ✓ पृष्ठभूमि
(घ) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसलापहले — 12 जून 1975 ✓ तात्कालिक कारण
★★(ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट! बाद — “जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था”

★तर्क एक पंक्ति में: “पहले चार आपातकाल की पृष्ठभूमि हैं; शाह आयोग तो आपातकाल की जाँच के लिए उसके बाद बना — इसलिए वही मेल नहीं खाता।”

प्रश्न 3 · मेल बैठाइए(पृ. 110)

पद✓ मेलप्रमाण
(क) संपूर्ण क्रांति(ii) जयप्रकाश नारायण“जेपी ने… ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया ताकि… ‘सच्चे लोकतंत्र’ की स्थापना की जा सके” (पृ. 94)
(ख) गरीबी हटाओ(i) इंदिरा गाँधी“1971 के चुनाव में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था” (पृ. 93)
(ग) छात्र आंदोलन(iii) बिहार आंदोलन“1974 के मार्च माह में… बिहार में छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया” (पृ. 94)
(घ) रेल हड़ताल(iv) जॉर्ज फर्नान्डिस“राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में… हड़ताल का आह्वान किया” (पृ. 96)

प्रश्न 4 ·किन कारणों से 1980 में मध्यावधि चुनाव करवाने पड़े?

★उत्तर को चार कड़ियों में क्रम से लिखिए।

कड़ी 1 — जनता पार्टी की एकता केवल नकारात्मक थी

“आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका।” (पृ. 105) ★यानी वह एक साझे कार्यक्रम पर नहीं, एक साझे विरोध पर बनी थी — और विरोध का कारण समाप्त होते ही एकता समाप्त हो गई।

कड़ी 2 — नेतृत्व की होड़

“चुनाव के बाद नेताओं के बीच प्रधानमंत्री के पद के लिए होड़ मची। इस होड़ में मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम शामिल थे।” ! “मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन इससे जनता पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान खत्म न हुई।”

कड़ी 3 — दिशा और कार्यक्रम का अभाव

! “इस पार्टी के आलोचकों ने कहा कि जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था।” ! “जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी।”

कड़ी 4 — दो सरकारों का गिरना

सरकारअवधिकैसे गिरी
★मोरारजी देसाई28 माह“जनता पार्टी बिखर गई और… सरकार ने 28 माह में ही अपना बहुमत खो दिया।”
★चरण सिंहमात्र 4 महीने“कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर बनी… लेकिन बाद में कांग्रेस ने समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया।”

★★निष्कर्ष: “इसीलिए 1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव हुए — और उसमें जनता पार्टी बुरी तरह परास्त हुई जबकि कांग्रेस को 353 सीटें मिलीं। पाठ इससे एक सबक निकालता है — ‘सरकार अगर अस्थिर हो और उसके भीतर कलह हो, तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।’”

प्रश्न 5 ·शाह आयोग क्यों नियुक्त हुआ और उसके क्या निष्कर्ष थे?

क्यों नियुक्त हुआ

“जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था” — आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों, दुरुपयोग और अनियमितताओं की जाँच के लिए। ★संदर्भ: 1977 के चुनाव स्वयं “आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह” थे; इसलिए नई सरकार के लिए यह जाँच राजनीतिक और नैतिक — दोनों दृष्टियों से आवश्यक थी।

निष्कर्ष(पाठ के शब्दों में)★★

“आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ। ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं। इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया। ★★शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे।” (पृ. 103)

और वह चेतावनी जो सबसे महत्वपूर्ण हैध्यान★

“यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।” ★★इसे उत्तर में ज़रूर लिखिए — यह आयोग का सबसे स्थायी निष्कर्ष है। आपातकाल समाप्त हो गया, पर संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव का प्रश्न बना रहा।

प्रश्न 6 ·1975 में आपातकाल की घोषणा करते हुए सरकार ने क्या कारण बताए थे?

घोषित कारण★★

“25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया। इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।” “सरकार का निर्णय था कि गंभीर संकट की घड़ी आन पड़ी है और इस वजह से आपातकाल की घोषणा जरूरी हो गई है।”

तात्कालिक संदर्भ जो सरकार ने दिया★

#आधार
125 जून 1975 को रामलीला मैदान की विशाल रैली और जेपी की राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा
★★2“जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आह्वान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें। इससे भी सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ।”
3“देश का राजनीतिक मिजाज़ अब पहले से कहीं ज्यादा कांग्रेस के खिलाफ़ हो गया।”

और यह भी लिखिए — यह उत्तर को संतुलित बनाता है★

“तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा करना सरकार की शक्तियों के दायरे में था क्योंकि हमारे संविधान में सरकार को आपातकाल की स्थिति में विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।” (पृ. 97) ! पर पाठ का अंतिम निर्णय भी जोड़िए: “सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। फिर भी, इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया।” (पृ. 109)

प्रश्न 7 ·1977 में पहली दफ़ा केंद्र में विपक्षी दल की सरकार क्यों बन सकी?

#कारणप्रमाण
1★★चुनाव आपातकाल पर जनमत-संग्रह थे“1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे… जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध था।”
2★★विपक्ष का एकजुट होना“चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया।” ★“जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे।”
3★जेपी का नैतिक नेतृत्व“नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया।”
4कांग्रेस से टूट“कांग्रेस के कुछ नेता भी, जो आपातकाल के खिलाफ़ थे, इस पार्टी में शामिल हुए”; जगजीवन राम की ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ भी बाद में जनता पार्टी में मिल गई
5! ज्यादतियों की स्मृति“हज़ारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था।”
6★प्रचार की दिशा“जनता पार्टी ने चुनाव-प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर ज़ोर दिया।” नारा — ‘लोकतंत्र बचाओ’
7★★उत्तर भारत का सामाजिक बदलाव“उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और मध्यवर्ग के कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर इससे आ जुड़े।”

!★और एक संतुलन ज़रूर जोड़िए: “पर यह जनादेश पूरे देश का नहीं था — महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में कांग्रेस की पकड़ बनी रही और दक्षिण भारत में उसकी ‘चुनावी विजय का चक्का बेरोक-टोक चला’। क्योंकि ‘आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था।’”

प्रश्न 8 ·राजव्यवस्था के चार पक्षों पर आपातकाल का क्या असर हुआ?

8.1 नागरिक अधिकारों की दशा और नागरिकों पर असर★★

  • “नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए।”
  • ★★“उनके पास अब यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ।”
  • ! निवारक नज़रबंदी का बड़े पैमाने पर प्रयोग — “लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है बल्कि… इस आशंका से कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।”
  • “धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी।”
  • ! “लोगों को ज़बरन उजाड़ने और विस्थापित करने अथवा ज़बरन नसबंदी करने का काम ज्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था।” (पृ. 104)
  • ✓ दीर्घकालीन सकारात्मक असर: “आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुआ… नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।”

8.2 कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंध★★

  • पहले से ही तनाव था — तीन संवैधानिक मसलों पर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के विरुद्ध फ़ैसला दिया; और केशवानंद भारती (1973) में ‘बुनियादी ढाँचे’ का सिद्धांत आया।
  • ! “सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।”
  • ! ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ और ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ की माँग उठी — यानी ऐसी संस्थाएँ जो “विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण करें।”
  • !★★अप्रैल 1976 — सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले उलट दिए; “इस फ़ैसले से नागरिकों के लिए अदालत के दरवाज़े बंद हो गए” और वह “सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया।”
  • ★42वें संशोधन से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को अदालत में चुनौती देना ही असंभव कर दिया गया।
  • ✓ बाद में: “आपातकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई।”

8.3 जनसंचार माध्यमों का कामकाज★★

  • “सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी। समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है। इसे प्रेस सेंसरशिप के नाम से जाना जाता है।”
  • ! “आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई।”
  • ★★प्रतिरोध: ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ ने रोके गए समाचारों की जगह खाली छोड़ दी; ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ ने “सेंसरशिप के आगे घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा”; और गुपचुप न्यूज़लेटर तथा लीफ़लेट्स निकले।
  • ! और अंत में — “खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।” (पृ. 92)

8.4 पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयाँ★★

  • “आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ।”
  • ! “ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं। इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया।”
  • ★★“शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। ! यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।”

प्रश्न 9 ·भारत की दलीय प्रणाली पर आपातकाल का किस तरह असर हुआ?

#असरउदाहरण
1★★कांग्रेस के स्वभाव में बदलाव“1969 से पहले तक कांग्रेस विविध विचारधारात्मक गति-मति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी। अपने बदले हुए स्वभाव में कांग्रेस ने स्वयं को विशेष विचारधारा से जोड़ा — ‘देश की एकमात्र समाजवादी और ग़रीबों की हिमायती पार्टी’।”
2★नेता-केंद्रित होना“यह पार्टी अब एक नेता यानी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता पर भी निर्भर हुई।”
3★★विपक्ष का एकजुट होना“अन्य विपक्षी दल ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति की तरफ़ मुड़े… ‘चुनावों में गैर-कांग्रेसी वोट बिखरने नहीं चाहिए।’ इस चीज़ ने 1977 के चुनावों में एक बड़ी भूमिका निभाई।” — परिणाम: जनता पार्टी
4! पर वह एकता टिकाऊ नहीं थी“आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका”; 28 माह में सरकार गिरी
5★★सबसे दूरगामी — पिछड़े वर्गों की राजनीति“अप्रत्यक्ष रूप से 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ।” बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण पर शोर → केंद्र की जनता पार्टी सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया।
6★क्षेत्रीय भिन्नता उजागर हुईउत्तर भारत में कांग्रेस का सफ़ाया, दक्षिण भारत में उसकी जीत — “1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते हैं, बल्कि इसके आगे की भी कुछ बातों का संकेत करते हैं।”

★★निष्कर्ष: “आपातकाल ने भारत की दलीय प्रणाली को दो-दलीय प्रतिस्पर्धा के सबसे निकट पहुँचा दिया — पर वह क्षण अल्पकालिक निकला, क्योंकि दोनों ही पक्ष (कांग्रेस 1969 में और जनता पार्टी 1979 में) भीतर से टूटे।”

प्रश्न 10 · अवतरण-आधारित — पार्थ चटर्जी(पृ. 111)

अवतरण: “1977 के चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र, दो-दलीय व्यवस्था के जितना नज़दीक आ गया था उतना पहले कभी नहीं आया। बहरहाल अगले कुछ सालों में मामला पूरी तरह बदल गया। हारने के तुरंत बाद कांग्रेस दो टुकड़ों में बँट गई…. जनता पार्टी में भी बड़ी अफरा-तफरी मची…”

(क)किन वज़हों से 1977 में भारत की राजनीति दो-दलीय प्रणाली के समान जान पड़ रही थी?

1★★विपक्ष एक ही दल बन गया — “चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया।” इससे मैदान में मूलतः दो ही पक्ष बचे: कांग्रेस और जनता पार्टी।

2★वोटों का ध्रुवीकरण — “जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे।”

3मुद्दा भी एक ही था — चुनाव “आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह” थे। ★जब चुनाव हाँ/ना का प्रश्न बन जाए, तो व्यवस्था स्वाभाविक रूप से दो-दलीय दिखने लगती है।

4परिणाम भी दो-ध्रुवीय थे

उत्तर देखिए

जनता पार्टी और साथी 330; कांग्रेस 154। बाकी सबके लिए बहुत कम जगह बची।

(ख)1977 में दो से ज्यादा पार्टियाँ थीं। फिर लेखक इसे दो-दलीय प्रणाली के नज़दीक क्यों बता रहे हैं?

★★मुख्य तर्क: दो-दलीय प्रणाली का माप दलों की गिनती नहीं, वास्तविक प्रतिस्पर्धा की संरचना है।

1जनता पार्टी स्वयं कई दलों का विलय थी — भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी
और ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’। वे अलग-अलग रहे होते तो वोट बँट जाते; एक होकर उन्होंने एक ध्रुव बना दिया।

2★मतदाता के सामने वास्तविक विकल्प दो ही थे

उत्तर देखिए

आपातकाल के पक्ष में या उसके विरुद्ध।

3छोटी पार्टियाँ अस्तित्व में थीं, पर सत्ता की दौड़ में नहीं थीं।

! और यही क्षणभंगुर निकला — “अगले कुछ सालों में मामला पूरी तरह बदल गया।”

(ग)कांग्रेस और जनता पार्टी में किन कारणों से टूट पैदा हुई?

कांग्रेस की टूट:

  • ★1977 की हार के तुरंत बाद पार्टी बँटी (अवतरण का अपना कथन)।
  • कारण वही थे जो अध्याय 5 में बताए गए — पार्टी “पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित” हो चुकी थी, उसका सांगठनिक ढाँचा कमज़ोर था, और उसमें “हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता” नहीं बची थी।
  • ★★इसलिए जैसे ही चुनावी सफलता गई, पार्टी को जोड़े रखने वाला एकमात्र सूत्र भी टूट गया।

जनता पार्टी की टूट:

  • ! “जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था।”
  • ! प्रधानमंत्री-पद की होड़ — मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम।
  • ★“आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका।”
  • परिणाम: मोरारजी सरकार 28 माह में, चरण सिंह सरकार 4 महीने में।

★★साझा कारण एक ही है — दोनों दल किसी सकारात्मक साझे कार्यक्रम पर नहीं, बल्कि एक नकारात्मक धुरी पर टिके थे: कांग्रेस एक नेता पर, जनता पार्टी एक विरोध पर। धुरी हटते ही दोनों बिखर गए।”

खंड ख · अतिरिक्त अभ्यास

ख.1 · वस्तुनिष्ठ प्रश्न(1 अंक)

#प्रश्नउत्तर
1आपातकाल की उद्घोषणा किस अनुच्छेद के तहत हुई?अनुच्छेद 352
2उद्घोषणा किस राष्ट्रपति ने की?फखरुद्दीन अली अहमद
3आपातकाल की तिथि?25 जून 1975
4इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला किस तिथि को और किस न्यायाधीश ने?12 जून 1975; न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा
5याचिका किसने दायर की थी?राजनारायण
6सर्वोच्च न्यायालय का आंशिक स्थगनादेश कब?24 जून 1975
7‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किसने किया?जयप्रकाश नारायण
81974 की रेल हड़ताल का नेतृत्व? कितने दिन चली?जॉर्ज फर्नान्डिस; 20 दिन
9“इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा” नारा किसने दिया?कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ (1974)
10‘बुनियादी ढाँचे’ का सिद्धांत किस मुकदमे में आया?केशवानंद भारती (1973)
111973 में किसे मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया?न्यायमूर्ति ए.एन. रे (तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके)
12आपातकाल में किन दो संगठनों पर प्रतिबंध लगा?राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी
1342वें संशोधन ने विधायिका का कार्यकाल कितना किया?5 से बढ़ाकर 6 साल
14किन दो लेखकों ने अपनी पदवी लौटाई?शिवराम कारंत (कन्नड़, पद्मभूषण) और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (हिंदी, पद्मश्री)
15किन दो अख़बारों ने खाली जगह छोड़कर विरोध किया?‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’
16कौन-सी दो पत्रिकाएँ बंद हो गईं?‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’
171977 में कांग्रेस को कितनी सीटें और कितने वोट?154 सीटें; 35 प्रतिशत से कम वोट
18जनता पार्टी और साथी दलों को कितनी सीटें?330 (कुल 542 में से); अकेले जनता पार्टी 295
19इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी कहाँ से हारे?रायबरेली और अमेठी
20मोरारजी सरकार कितने माह चली? चरण सिंह की?28 माह; 4 महीने
211980 में कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं?353
22शाह आयोग कब और किसने नियुक्त किया?1977 में जनता पार्टी की सरकार ने
23मंडल आयोग किसने नियुक्त किया?केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने
24‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ — वर्ष और निर्देशक?2005; सुधीर मिश्र

ख.2 · लघु उत्तरीय(2 अंक)

11974 की रेल हड़ताल के कारण और परिणाम बताइए।

2‘निवारक नज़रबंदी’ क्या है? आपातकाल में उसका क्या प्रयोग हुआ?

3‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ से क्या तात्पर्य है? यह माँग क्यों उठी?

4केशवानंद भारती के मुकदमे का महत्व बताइए।

5आपातकाल में प्रेस पर क्या असर पड़ा? दो प्रतिरोध के उदाहरण दीजिए।

642वें संविधान संशोधन के दो प्रमुख बदलाव लिखिए।

7आपातकाल से मिले तीन सबक बताइए।

8जेपी ने बिहार आंदोलन का नेतृत्व किन दो शर्तों पर स्वीकार किया?

91977 के चुनाव में कांग्रेस दक्षिण भारत में क्यों नहीं हारी?

10‘सम्पूर्ण क्रांति’ से जेपी का क्या आशय था?

ख.3 · दीर्घ उत्तरीय(4 अंक)

1आपातकाल की पृष्ठभूमि को तीन धाराओं में समझाइए — आर्थिक संकट, जन-आंदोलन और न्यायपालिका से संघर्ष।

212 जून 1975 से 25 जून 1975 तक की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण दीजिए।

3आपातकाल का व्यावहारिक अर्थ क्या था? छह परिणाम लिखिए।

4जनता सरकार क्यों विफल रही? चार कारण दीजिए।

5“1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते।” — इस कथन की व्याख्या कीजिए।

ख.4 · निबंधात्मक(6 अंक)★

1★★“आपातकाल संवैधानिक संकट से कहीं ज्यादा एक राजनीतिक संकट था।” — पाठ के आधार पर इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।

2★“भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।” — आपातकाल के अनुभव से इस निष्कर्ष को सिद्ध कीजिए।

3★★1977 और 1980 — दो जनादेश, दो अलग सबक। तुलनात्मक विवेचना कीजिए।

ख.5 · स्रोत-आधारित अभ्यास(5 अंक)

पाठ का अंश पढ़िए: “27 जून, 1975 के ‘नई दुनिया’ अखबार का संपादकीय भी बाकी दिनों की ही तरह बदस्तूर मौजूद था। बस अंतर यह था कि ‘संपादकीय’ की जगह खाली छोड़ दी गई थी। संपादकीय को आपातकालीन अधिकारों के अंतर्गत ‘सेंसर’ कर दिया गया था। कई अन्य अखबारों में भी जगह-जगह रिक्त स्थान छोड़े जाते थे। कई दफे ऐसा आपातकाल के प्रति विरोध जताने के लिए किया जाता था। बाद में खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।”

(क) इस अंश में वर्णित व्यवस्था का नाम क्या है? (1)

प्रेस सेंसरशिप — “समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है।”

(ख) खाली जगह छोड़ना विरोध कैसे बन जाता है? (2)

★क्योंकि खाली जगह पाठक को यह बता देती है कि यहाँ कुछ था जो हटा दिया गया। सेंसरशिप का उद्देश्य यह है कि पाठक को पता ही न चले; खाली जगह उस उद्देश्य को ही उलट देती है। यानी अख़बार बिना एक शब्द छापे सेंसरशिप का अस्तित्व घोषित कर देता है।

(ग) ★अंतिम वाक्य से सेंसरशिप के बारे में क्या पता चलता है? (2)

★★कि सेंसरशिप को अपनी उपस्थिति का संकेत तक बर्दाश्त नहीं था — इसीलिए “खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।” यह दिखाता है कि नियंत्रण केवल सामग्री पर नहीं, उसकी अनुपस्थिति की स्वीकृति पर भी थोपा गया। ★और यह भी कि प्रतिरोध रुका नहीं — ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ ने यही रास्ता अपनाया, और ‘सेमिनार’ तथा ‘मेनस्ट्रीम’ ने झुकने की जगह बंद हो जाना चुना।