पढ़िए, छाँटिए, जोड़े बनाइए, क्रम लगाइए
किसान, ज़मींदार और राज्य
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने, और इन्हीं रिश्तों के ताने–बाने से गाँव का समाज बनता था।
किताब में: पृष्ठ 196–223, लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी।

मुग़ल काल के गाँव की बड़ी बातें (पृष्ठ 196)
- मुग़ल राज्य: गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था।
- राज्य के नुमाइंदे (राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूल करने वाले और हिसाब रखने वाले) चाहते थे कि खेतों की जुताई हो और राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए।
- बाज़ार गाँव तक: कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों में आ गए, और खेती वाले इलाके शहरों से जुड़ गए।
- हर जगह एक-सी खेती नहीं: सूखी ज़मीन के विशाल हिस्सों और पहाड़ियों वाले इलाकों में उपजाऊ ज़मीन जैसी खेती नहीं हो सकती थी, और भूखंड का बहुत बड़ा हिस्सा जंगलों से घिरा था।
इस अध्याय का सवाल
मुग़ल काल के गाँव में किसान, ज़मींदार और राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हमें किन स्रोतों से पता चलता है?
अध्याय का रास्ता
- 1किसान और कृषि उत्पादनमुग़ल काल का किसान कौन था, उसके पास कितनी ज़मीन थी, वह सिंचाई कैसे करता था और क्या उगाता था?पृष्ठ 196–201 · प्रश्न 2
- 2ग्रामीण समुदायमुग़ल काल के गाँव का समाज कैसे चलता था: जाति, पंचायत, मुखिया और दस्तकार?पृष्ठ 201–206 · प्रश्न 6, 9
- 3कृषि समाज में महिलाएँमुग़ल काल के खेतों और दस्तकारी में महिलाएँ क्या काम करती थीं, उन पर कौन सी पाबंदियाँ थीं, और ज़मीन पर उनका क्या हक़ था?पृष्ठ 206–208 · प्रश्न 3
- 4जंगल और कबीलेसोलहवीं–सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों का जीवन कैसा था, और राज्य, खेती और व्यापार ने उसे कैसे बदला?पृष्ठ 208–211 · प्रश्न 7
- 5ज़मींदारमुग़ल काल के ज़मींदार कौन थे, उनकी ताकत कहाँ से आती थी, और गाँव में उनकी क्या भूमिका थी?पृष्ठ 211–213 · प्रश्न 8
- 6भू–राजस्व प्रणालीमुग़ल राज्य ज़मीन से राजस्व कैसे तय करता और वसूलता था?पृष्ठ 213–215 · प्रश्न 5
- 7चाँदी का बहावसोलहवीं–सत्रहवीं सदी में चाँदी भारत में क्यों और कैसे आई, और उसका क्या असर हुआ?पृष्ठ 215–217 · प्रश्न 4
- 8अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरीअबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी कैसे बनी, उसमें क्या है, और इतिहासकार उसे सावधानी से क्यों पढ़ते हैं?पृष्ठ 217–221 · प्रश्न 1
- 9सार और काल रेखापूरा अध्याय एक साथ: मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा, बड़ी बातें, और प्रश्न 10 का मानचित्र।पृष्ठ 221–223 · प्रश्न 10, 11, 12
1किसान और कृषि उत्पादन
इस पड़ाव का सवाल
मुग़ल काल का किसान कौन था, उसके पास कितनी ज़मीन थी, वह सिंचाई कैसे करता था और क्या उगाता था?
पिछली बात से कड़ी सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में हिंदुस्तान के करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। अब उन गाँवों के किसान से मिलिए।
मुग़ल काल के खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई गाँव था। किसान साल भर ज़मीन की जुताई, बीज बोने और फ़सल की कटाई का काम करते थे, और शक्कर, तेल जैसी कृषि-आधारित वस्तुओं के उत्पादन में भी शरीक होते थे।
1.1स्रोतों की तलाशपृष्ठ 197
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के किसानों के बारे में हम कैसे जानते हैं? (पृष्ठ 197)
- किसान ख़ुद नहीं लिखते थे। इसलिए उस समय के कृषि इतिहास के मुख्य स्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे।
- आइन–ए–अकबरी: इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक, जिसे मुग़ल बादशाह अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने लिखा। इसमें खेतों की नियमित जुताई, करों की उगाही और राज्य और ज़मींदारों के रिश्तों के लिए राज्य के इंतज़ामों का लेखा-जोखा है।
- आइन का नज़रिया: किताब का निष्कर्ष है, "किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।"
- राजधानी से दूर के दस्तावेज़: सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं।
- ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़: ये पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका देते हैं।
- ये सभी स्रोत किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े दर्ज करते हैं, और बताते हैं कि किसान राज्य से कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे।
1.2किसान और उनकी ज़मीनपृष्ठ 197
मुग़ल काल के स्रोतों में किसान के नाम (पृष्ठ 197)
- मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए आम तौर पर रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान शब्द इस्तेमाल करते थे; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं।
स्रोत 1: किसान बस्तियों का बसना–उजड़ना (बाबरनामा, पृष्ठ 198)
मुग़ल बादशाह बाबर ने अपने संस्मरण बाबरनामा में हिंदुस्तानी कृषि समाज की यह ख़ासियत दर्ज की:
"हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।"
बरसों से आबाद बड़े शहर के लोग उसे छोड़ते हैं तो डेढ़ दिन के अंदर उनका हर नामोनिशान मिट जाता है। बसने के लिए वे एक सरोवर या कुआँ बना लेते हैं, झोंपड़ियाँ बनती हैं, "और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!"
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 198
यह प्रश्न स्रोत 1 के साथ है: बाबरनामा में मुग़ल बादशाह बाबर हिंदुस्तान की बस्तियों और गाँवों के बारे में लिखता है।
कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगी।
जवाब देखिए
बाबरनामा में बाबर को सबसे ज़्यादा यह बात चौंकाती है कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ बहुत जल्दी उजड़ती और बसती थीं।
- पल में उजड़ना: बरसों से बसे बड़े शहर के लोग भी चले जाएँ तो डेढ़ दिन में उनका हर नामोनिशान मिट जाता था।
- बसने में आसानी: पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी, क्योंकि सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं; लोग एक सरोवर या कुआँ बना लेते थे।
- न घर, न दीवार: खस की घास बहुत थी और जंगल अपार थे, इसलिए झोंपड़ियाँ बनाकर यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता था।
- बेशुमार आबादी: आबादी इतनी थी कि लोग उमड़ते चले आते थे।
किताब भी कहती है कि ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से खेती लगातार फैलती रही (पृष्ठ 198)।
मुग़ल काल में किसान के पास कितनी ज़मीन? (पृष्ठ 198)
- उत्तर भारत: एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा कुछ होता था; ज़्यादातर के पास इससे भी कम।
- गुजरात: 6 एकड़ के करीब ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे।
- बंगाल: औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी, और 10 एकड़ वाले आसामी को अमीर समझा जाता था।
- खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर आधारित थी, और किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।
1.3सिंचाई और तकनीकपृष्ठ 198
मुग़ल काल में बारिश के हिसाब से मुख्य फ़सल (पृष्ठ 198)
- प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिश: कमोबेश चावल की खेती।
- कम बारिश: गेहूँ की खेती ज़्यादा प्रचलित।
- और कम बारिश: ज्वार–बाजरे की खेती ज़्यादा प्रचलित।
- खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं। मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, पर कुछ फ़सलों को अतिरिक्त पानी चाहिए था, इसलिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े।
स्रोत 2: पेड़ों और खेतों की सिंचाई (बाबरनामा, पृष्ठ 199)
बाबर उत्तर भारत में देखे सिंचाई के उपकरण बताता है:
"शरद ऋतु की फ़सलें बारिश के पानी से ही पैदा हो जाती हैं; और ये हैरानगी की बात है कि बसंत ऋतु की फ़सलें तो तब भी पैदा हो जाती हैं जब बारिश बिलकुल ही नहीं होती। (फिर भी) छोटे पेड़ों तक बालटियों या रहट के ज़रिये पानी पहुँचाया जाता है…"
"लाहौर, दीपालपुर (दोनों ही आज के पाकिस्तान में) और ऐसी दूसरी जगहों पर लोग रहट के ज़रिये सिंचाई करते हैं।"
"आगरा, चाँदवर और बयाना … और ऐसे अन्य इलाकों में भी, लोगबाग बालटियों से सिंचाई करते हैं।"
आज आगरा और चाँदवर उत्तर प्रदेश में हैं, और बयाना राजस्थान में; किताब तीनों को उत्तर प्रदेश में बताती है।

तस्वीर: अमृतसर के पास एक रहट। बैल घूमकर पहिया चलाते हैं, और पहिये पर बँधे घड़े कुएँ से पानी ऊपर लाते हैं। यह चित्र बाबर के समय का नहीं, उन्नीसवीं सदी का है: विलियम सिम्पसन ने इसे 1865 के आसपास बनाया।
William Simpson, Persian wheel near Amritsar, c. 1865. Victoria and Albert Museum, 1170-1869. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 199
यह प्रश्न स्रोत 2 के साथ है: बाबरनामा में बाबर लाहौर, दीपालपुर, आगरा, चाँदवर और बयाना में सिंचाई के तरीक़े बताता है। विजयनगर की सिंचाई इसी किताब के अध्याय 7 में है।
सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई (अध्याय 7) व्यवस्था से कीजिए। सिंचाई की इन दोनों अलग–अलग प्रणालियों में किस–किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? इनमें से किन–किन प्रणालियों में कृषि तकनीक में सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी?
जवाब देखिए
बाबर कुओं से पानी उठाने के साधन बताता है, जबकि विजयनगर में बाँध, हौज़ और नहरें थीं।
- बाबर के साधन: लाहौर और दीपालपुर में रहट: रस्सी के फंदों पर लकड़ी के गुटके और घड़े, पहिये, और बैल से घूमने वाला दाँतों वाला पहिया; पानी एक संकरे नाले से खेत तक। आगरा, चाँदवर और बयाना में बालटी: लकड़ी के कन्ने, बेलन, रस्सी और बैल; एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा बालटी से पानी निकालता।
- विजयनगर (अध्याय 7): धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़; एक बड़े हौज़ (आज का कमलपुरम् जलाशय) से आस–पास के खेत सींचे जाते थे; तुंगभद्रा पर बने बाँध से हिरिया नहर पानी लाती थी।
- संसाधन: रहट और बालटी के लिए कुआँ, लकड़ी, रस्सी, घड़े, बैल और दो-एक आदमी काफ़ी थे; बाँध, बड़े हौज़ और नहरें बनाने में बहुत मज़दूर, सामान और शासकों की ताकत लगती होगी।
- किसानों की भागेदारी: रहट और बालटी एक कुएँ पर दो-एक आदमी और बैलों से चलते थे, इसलिए उनमें सुधार किसानों की भागेदारी से ही होता होगा; बड़ी नहरों और हौज़ों में शासकों की भूमिका बड़ी थी, हालाँकि उनके पानी का इस्तेमाल किसान ही करते थे।
मुग़ल काल के किसान के औज़ार (पृष्ठ 200)
- लकड़ी का हलका हल, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी। ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहरा नहीं खोदते थे, इसलिए तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी।
- बीज बोने के लिए बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा, पर बीज हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था।
- मिट्टी की गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार।
- राज्य की मदद: उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर।
1.4फ़सलों की भरमारपृष्ठ 200
मुग़ल काल में साल की फ़सलें (पृष्ठ 200)
- दो मुख्य चक्र: खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)। सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थीं; जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक़्त थे, वहाँ तीन भी।
- आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर मुग़ल प्रांत आगरा में 39 किस्म की और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें उगाई जाती थीं। बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में पैदा होती थीं।
जिन्स–ए–कामिल: सर्वोत्तम फ़सलें (पृष्ठ 200)
- मुग़ल राज्य इनकी खेती को बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था।
- कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे। कपास मध्य भारत और दक्कनी पठार में उगाई जाती थी, और बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था।
- तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ़सलों में आते थे।
- दैनिक आहार की खेती पर ज़्यादा ज़ोर था, पर खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए नहीं होती थी: एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।
मुग़ल भारत में तम्बाकू का प्रसार (बॉक्स, पृष्ठ 200)
- तम्बाकू सबसे पहले दक्कन पहुँचा, और सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया।
- आइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती। अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा।
- जहाँगीर ने धूम्रपान की इस आदत के फैलने से चिंतित होकर इस पर पाबंदी लगाई, पर पाबंदी बेअसर रही: सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था।
मुग़ल काल में आबादी की बढ़ोतरी (बॉक्स, पृष्ठ 200)
- खेती के विविध और लचीले तरीकों का एक बड़ा नतीजा यह था कि आबादी धीरे-धीरे बढ़ी।
- आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार, समय-समय की भुखमरी और महामारी के बावजूद, 1600 से 1800 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब–करीब 33 फ़ीसदी की बढ़ोतरी।
किताब में यहाँ "1600 से 1700" छपा है, पर उसी वाक्य में "200 वर्षों" लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 201
यह प्रश्न किताब के एक चित्र पर है: आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी के पंजाब के एक गाँव का चित्र। इसका पूरा उत्तर देने के लिए किताब का चित्र देखना होगा; उत्तर के मुख्य बिंदु नीचे हैं।
चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या–क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए।
जवाब देखिए
- महिलाएँ: सूत कातती और अनाज कूटती दिखती हैं, जो किताब की इस बात से मेल खाता है कि सूत कातना महिलाओं के श्रम पर टिका था।
- पुरुष: पगड़ी पहने एक आदमी भैंस के साथ है; आस–पास ऊँट, मवेशी और घड़े हैं।
- वास्तुकला: मिट्टी के घर, और उनके बीच किले जैसी एक मीनार।
किताब के अपने प्रश्न
2सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 196, 198–201, 205–206
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- सिर्फ़ कुछ हद तक। खेती का पहला उद्देश्य पेट भरना था, पर किताब कहती है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक–दूसरे से जुड़े थे।
- गुज़ारे का पक्ष: चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
- जिन्स–ए–कामिल: कपास और गन्ना जैसी सर्वोत्तम फ़सलों की खेती को मुग़ल राज्य बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे ज़्यादा कर मिलता था; तिलहन और दलहन भी नकदी फ़सलें थीं।
- विविधता और नयी फ़सलें: आगरा प्रांत में 39 और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें; मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती और व्यापार की मुख्य वस्तु।
- बाज़ार गाँव तक: बिक्री के लिए उगाई फ़सलों की वजह से व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में आए; कपास, रेशम या नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था।
Checkpoint✓ Stop complete
1सत्रहवीं सदी के स्रोतों में पाहि–काश्त किसान कौन थे?
पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे; खुद–काश्त अपने ही गाँव में रहते थे (पृष्ठ 197–198)।
2मुग़ल काल में जहाँ प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिश होती थी, वहाँ मुख्य फ़सल कौन-सी थी?
किताब के अनुसार 40 इंच या ज़्यादा बारिश वाले इलाकों में कमोबेश चावल की खेती होती थी (पृष्ठ 198)।
3मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल (सर्वोत्तम फ़सलों) की खेती को बढ़ावा क्यों देता था?
किताब के अनुसार इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था; कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे (पृष्ठ 200)।
2ग्रामीण समुदाय
इस पड़ाव का सवाल
मुग़ल काल के गाँव का समाज कैसे चलता था: जाति, पंचायत, मुखिया और दस्तकार?
पिछली बात से कड़ी मुग़ल काल के गाँव के समुदाय के तीन घटक थे: खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)। किसान के बाद अब बाकी दो, और गाँव के दस्तकार।
मुग़ल काल में किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह कई मायनों में एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था।
मुग़ल काल के ग्रामीण समुदाय के तीन घटक (पृष्ठ 201)
- खेतिहर किसान
- पंचायत
- गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)

तस्वीर: रानिया गाँव (आज के हरियाणा में) की एक गली, लगभग 1816–1820। कच्चे मकान, मवेशी, ऊँट और गली में बैठे लोग: उन्नीसवीं सदी की शुरुआत के एक गाँव की झलक।
Delhi artists, c. 1816–20 (commissioned by William and James Baillie Fraser). British Library, Add.Or.4057. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
2.1जाति और ग्रामीण माहौलपृष्ठ 201
मुग़ल काल के गाँव में जाति, किताब के शब्दों में (पृष्ठ 201–202)
- जाति और जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई समूहों में बँटे थे। जुताई करने वालों में बड़ी तादाद उन लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे या खेतों में मज़दूरी करते थे।
- खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे। उस समय जनगणना नहीं होती थी, पर जो थोड़े-बहुत आँकड़े हैं उनसे पता चलता है कि गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था।
- दूसरे संप्रदायों में भी ऐसे भेद थे: मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे "नीच" कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे; बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी।
- निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था; बीच के समूहों में ऐसा नहीं था।
सत्रहवीं सदी में बीच के समूहों की बदलती हैसियत (पृष्ठ 202)
- सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है; उसके अनुसार जाट भी किसान थे, पर जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों से नीची थी।
- सत्रहवीं सदी में वृंदावन (उत्तर प्रदेश) के इलाके में गौरव समुदाय ने भी राजपूत होने का दावा किया, जबकि वे ज़मीन की जुताई के काम में लगे थे।
- पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े की वजह से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं।
- पूर्वी इलाकों में पशुपालक और मछुआरी जातियाँ, जैसे सदगोप और कैवर्त, भी किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगीं।
2.2पंचायतें और मुखियापृष्ठ 202
मुग़ल काल की ग्राम पंचायत (पृष्ठ 202–203)
- किताब इसे ऐसा "अल्पतंत्र" कहती है जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी; फिर भी छोटे-मोटे और "नीच" काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें जगह होने की संभावना कम थी।
- आम ख़ज़ाना: पंचायत का खर्च गाँव के उस आम ख़ज़ाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति योगदान देता था। इससे गाँव का दौरा करने वाले कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी होती थी, बाढ़ जैसी विपदाओं से निपटा जाता था, और मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाने या नहर खोदने जैसे काम होते थे जो किसान अकेले नहीं कर सकते थे।
- जाति की हदें: पंचायत यह देखती थी कि गाँव के अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों में रहें। पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं, और "जाति की अवहेलना रोकने के लिए" लोगों के आचरण पर नज़र रखना मुखिया की ज़िम्मेदारी थी।
- दंड: पंचायत जुर्माना लगा सकती थी, और समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी। निष्कासन सीमित समय के लिए होता था; उतने समय दंडित व्यक्ति को गाँव छोड़ना पड़ता, और वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था।
मुग़ल काल की ग्राम पंचायत: मुखिया, पटवारी और आम ख़ज़ाना (पृष्ठ 202–203)
कौन चलाता था
पंचायत का पैसा: आम ख़ज़ाना
ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी होती थी।
भ्रष्ट मंडल (बॉक्स, पृष्ठ 202)
- मंडल अक्सर अपने ओहदे का ग़लत इस्तेमाल करते थे। उन पर आरोप था कि वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब-किताब में हेरा-फेरी करते थे, और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।
मुग़ल काल में पंचायत को अर्ज़ियाँ (पृष्ठ 203–204)
- पश्चिम भारत, ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र, के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई कई अर्ज़ियाँ हैं, जिनमें "ऊँची" जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत है।
- ये अर्ज़ियाँ आम तौर पर ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग देते थे, कभी अकेले, कभी किसी जाति या संप्रदाय के रूप में मिलकर।
- सबसे बड़ी शिकायत बहुत ज़्यादा कर की माँग थी, क्योंकि उससे किसानों का रोज़ का गुज़ारा, ख़ासकर सूखे जैसी विपदाओं में, जोखिम में पड़ जाता था। उनकी नज़र में ज़िंदा रहने के न्यूनतम साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक़ थे।
- ऐसे मामलों में पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती थी। समझौता न हो तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाते थे। जोतने लायक खाली ज़मीन आसानी से मिल जाती थी और श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी, इसलिए भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 203
यह प्रश्न किताब के एक चित्र पर है: आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का चित्र, जिसमें गाँव के बुज़ुर्ग कर अधिकारियों से मिल रहे हैं। इसका पूरा उत्तर देने के लिए किताब का चित्र देखना होगा; उत्तर के मुख्य बिंदु नीचे हैं।
चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है?
जवाब देखिए
- बुज़ुर्ग: बाईं ओर करीब चौदह आदमियों का झुंड, ज़्यादातर पगड़ी में, कई की दाढ़ी सफ़ेद; उम्र और संख्या से वे गाँव के बड़े–बूढ़े लगते हैं।
- अधिकारी: दाईं ओर सिर्फ़ दो आदमी: एक बही में लिख रहा है, दूसरा हरे कोट में है, और उनके पैरों के पास हिसाब की बहियाँ और कागज़ हैं; लिखा–पढ़ी और हिसाब उनकी पहचान है।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 204
यह प्रश्न किताब के एक चित्र पर है: कपड़ा उत्पादन दिखाने वाली सत्रहवीं शताब्दी की एक चित्रकारी। इसका पूरा उत्तर देने के लिए किताब का चित्र देखना होगा; उत्तर के मुख्य बिंदु नीचे हैं।
चित्र में दर्शाई गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए।
जवाब देखिए
- ऊपरी हिस्सा: चट्टानी पहाड़ी पर एक शासक बैठा है, साथ में सेवक और रंग–बिरंगे कपड़ों में लोग।
- निचला हिस्सा: घास–फूस के एक छप्पर के पास कारीगर कपड़ा बिछा रहे हैं, धो रहे हैं, और सूत कात रहे हैं या कपड़ा तैयार कर रहे हैं।
किताब बताती है कि गाँवों में बहुत से दस्तकार थे, और कई किसान खेती से फ़ुरसत के महीनों में रँगरेज़ी और कपड़े पर छपाई भी करते थे (पृष्ठ 204)।
2.3ग्रामीण दस्तकारपृष्ठ 204
मुग़ल काल के गाँव के दस्तकार (पृष्ठ 204–205)
- अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे।
- कई समूह खेती और दस्तकारी, दोनों करते थे: रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतन पकाना, खेती के औज़ार बनाना या उनकी मरम्मत। यह काम वे खेती से फ़ुरसत के महीनों में करते थे, जैसे बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच।
- कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार भी गाँव के लोगों को सेवाएँ देते थे। बदले में उन्हें आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा मिलता था, या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा। अदायगी कैसे होगी, यह शायद पंचायत तय करती थी।
- महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था।
जजमानी: सेवा के बदले अदायगी (पृष्ठ 205)
- कभी दस्तकार और हर खेतिहर परिवार आपस में बातचीत करके अदायगी तय करते थे, और आम तौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था।
- अठारहवीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले "रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।"
- इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालाँकि यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। नकद अदायगी का चलन भी बिलकुल नदारद नहीं था।
2.4एक "छोटा गणराज्य"?पृष्ठ 205
मुग़ल काल का गाँव: क्या एक "छोटा गणराज्य"? (पृष्ठ 205–206)
उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय
- उन्होंने भारतीय गाँवों को ऐसे "छोटे गणराज्य" के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे।
किताब की राय
- गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं।
- कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था।
- गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे: मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी; निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को और कपास, रेशम या नील जैसी फ़सलें पैदा करने वालों को भी भुगतान नकद मिलता था।
गाँव में मुद्रा: तैवर्नियर ने क्या देखा (बॉक्स, पृष्ठ 206)
- सत्रहवीं सदी के फ़्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि "भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।"
- उसके अनुसार सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे, और अपनी मर्ज़ी से पैसे के मुक़ाबले रुपये की कीमत और कौड़ियों के मुक़ाबले पैसे की कीमत बढ़ा देते थे।
किताब के अपने प्रश्न
6आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?
लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 201–205, 211–212
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि समाज में जाति एक बहुत बड़ा कारक थी, सबसे ज़्यादा निचले तबकों के लिए; पर बाज़ार और पैसे के साथ बीच के समूहों की हैसियत बदल भी सकती थी।
- काम और ग़रीबी: खेतिहर किसान जाति और जाति जैसे भेदभावों से कई समूहों में बँटे थे। खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे; उनकी हालत कमोबेश आधुनिक भारत के दलितों जैसी थी। मुसलमान समुदायों में भी हलालख़ोरान गाँव की हदों के बाहर रहते थे, और बिहार के मल्लाहज़ादाओं की तुलना दासों से की जा सकती थी।
- बीच के समूहों में ढील: निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और हैसियत का सीधा रिश्ता था, बीच के समूहों में नहीं। पशुपालन और बागबानी के मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली ऊपर उठे; पूर्व में सदगोप और कैवर्त किसानों जैसी स्थिति पाने लगे।
- पंचायत में जाति: पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; ज़रूरत पर जुर्माना या निष्कासन देती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें दीवानी झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं, और यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं। पंचायत में "नीच" काम करने वाले मज़दूरों के लिए जगह कम थी।
- ज़मींदारी में जाति: ज़मींदारों की ऊँची हैसियत का एक कारण जाति था; ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ग्रामीण समाज पर ठोस नियंत्रण था। पर ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी–बेची जाती थी, इसलिए "निचली" जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।
- निष्कर्ष: जाति काम, हैसियत, न्याय और ज़मीन पर पकड़ तय करती थी; फिर भी मुनाफ़ा, ज़मीन की ख़रीद–बिक्री और नकद के रिश्तों ने कुछ समूहों को ऊपर उठने का रास्ता दिया।
9पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।
लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 202–204, 207
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- मुग़ल काल के गाँव में पंचायत और उसका सरदार, मुखिया, मिलकर गाँव का हिसाब, जाति के नियम और झगड़े सँभालते थे।
- कौन: पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, आम तौर पर संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार वाले लोग; उसका फ़ैसला सबको मानना पड़ता था। मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता और ज़मींदार उसे मंज़ूरी देता था; भरोसा न रहे तो उसे हटाया जा सकता था।
- हिसाब और आम ख़ज़ाना: मुखिया पटवारी की मदद से गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब बनवाता था। आम ख़ज़ाने से कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी विपदाओं से निपटना, और छोटे बाँध या नहर जैसे सामुदायिक काम होते थे।
- जाति के नियम: पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; पूर्वी भारत में शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं। वह जुर्माना लगा सकती थी, और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी। हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी थी; फ़ौजदारी मामलों को छोड़कर राज्य उसके फ़ैसले मानता था।
- शिकायतों की सुनवाई: सबसे निचले तबकों के लोग ज़बरन कर उगाही या बेगार के ख़िलाफ़ पंचायत को अर्ज़ियाँ देते थे; महिलाएँ भी न्याय और मुआवज़े के लिए दरख़्वास्त भेजती थीं। पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती; न बने तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाते थे।
- सीमाएँ: पंचायत "अल्पतंत्र" थी, जिसमें छोटे–मोटे काम करने वाले मज़दूरों की जगह कम थी। मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी से मिलकर हिसाब में हेरा–फेरी करते और कर का बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।
- निष्कर्ष: पंचायत और मुखिया गाँव में व्यवस्था रखते थे, पर उनका नियमन जाति की ऊँच–नीच और ताकतवर लोगों के हितों से बँधा था।
Checkpoint✓ Stop complete
1मुग़ल काल के गाँव में पटवारी का काम क्या था?
पंचायत का पटवारी हिसाब-किताब बनाने में मुखिया की मदद करता था (पृष्ठ 202)।
2किताब के अनुसार अत्यधिक कर से परेशान किसानों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार क्या था?
जोतने लायक खाली ज़मीन आसानी से मिल जाती थी और श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी, इसलिए गाँव छोड़कर भाग जाना बड़ा प्रभावी हथियार था (पृष्ठ 204)।
3उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय गाँवों को "छोटे गणराज्य" कहा। किताब इससे सहमत क्यों नहीं है?
किताब के अनुसार संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी और जाति और जेंडर के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं (पृष्ठ 205–206)।
3कृषि समाज में महिलाएँ
इस पड़ाव का सवाल
मुग़ल काल के खेतों और दस्तकारी में महिलाएँ क्या काम करती थीं, उन पर कौन सी पाबंदियाँ थीं, और ज़मीन पर उनका क्या हक़ था?
पिछली बात से कड़ी मुग़ल काल की पंचायत तक महिलाएँ भी न्याय और मुआवज़े के लिए दरख़्वास्त भेजती थीं। अब खेत, घर और दस्तकारी में उनका काम देखिए।
मुग़ल काल के कृषि समाज में महिलाएँ और मर्द साथ-साथ खेतों में काम करते थे। मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं।
मुग़ल काल में महिलाओं का काम: खेत से बाज़ार तक (पृष्ठ 206–207)
- छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती के साथ घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद बने। इसलिए "घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द" जैसा फ़र्क यहाँ मुमकिन नहीं था।
- दस्तकारी: सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही बढ़ती।
- किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करने जाती थीं। मुग़ल चित्रों में फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती दिखती हैं।
- पूर्वाग्रह फिर भी बने रहे: पश्चिमी भारत में रजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी; बंगाल में मासिक धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।

तस्वीर: बुनाई और कताई: जुलाहा करघे पर बुन रहा है और महिला चरखे पर सूत कात रही है। पंजाब (शायद अमृतसर या लाहौर) में बना केहर सिंह का चित्र, लगभग 1860।
Kehar Singh, Weaving and Spinning, c. 1860. Cleveland Museum of Art, 1987.162, CC0. Image: Wikimedia Commons.

तस्वीर: अकबरनामा के दो चित्र, फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण। पहला चित्र: बनती इमारत पर काम करते मज़दूर। चित्रकार: तुलसी (बड़े) और भवानी; लगभग 1590–95।
Tulsi the Elder and Bhawani, Akbarnama, c. 1590–95. Victoria and Albert Museum, IS.2:86-1896. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

तस्वीर: दूसरा चित्र: अकबर फ़तेहपुर सीकरी (1571) में चल रहा निर्माण देख रहे हैं। काम में पुरुषों के साथ महिलाएँ भी लगी हैं। चित्रकार: तुलसी (बड़े), बंदी और माधव ख़ुर्द; लगभग 1590–95।
Tulsi the Elder, Bandi and Madhav Khord, Akbarnama, c. 1590–95. Victoria and Albert Museum, IS.2:91-1896. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
मुग़ल काल का ग्रामीण समाज: महिलाएँ संसाधन भी, काबू में भी (पृष्ठ 207)
- समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत के कारण महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता था।
- कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादीशुदा महिलाओं की कमी थी।
- इससे किसान और दस्तकार समाज में ऐसे रिवाज बने जो संभ्रांत समूहों से बहुत अलग थे: कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए दहेज नहीं, "दुलहन की कीमत" अदा करनी होती थी। तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं।
- प्रजनन शक्ति पर काबू खो देने का बड़ा डर था। घर का मुखिया मर्द होता था, और परिवार और समुदाय के मर्द महिला पर पुरज़ोर काबू रखते थे। बेवफ़ाई के शक पर ही महिलाओं को भयानक दंड दिए जा सकते थे।
मुग़ल काल में महिलाओं की पंचायत को दरख़्वास्तें (पृष्ठ 207)
- पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र) के दस्तावेज़ों में महिलाओं की वे दरख़्वास्तें मिलती हैं जो उन्होंने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजीं।
- पत्नियाँ पतियों की बेवफ़ाई का विरोध करती थीं, या घर के मर्द पर पत्नी और बच्चों की अनदेखी का आरोप लगाती थीं। मर्दों की बेवफ़ाई हमेशा दंडित नहीं होती थी, पर राज्य और "ऊँची" जाति के लोग अक्सर कोशिश करते थे कि परिवार के भरण-पोषण का इंतज़ाम हो जाए।
- ज़्यादातर दस्तावेज़ों में दरख़्वास्त देने वाली महिला का नाम दर्ज नहीं होता था; उसे घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में लिखा जाता था।
मुग़ल काल में ज़मीन और ज़मींदारी पर महिलाओं का हक़ (पृष्ठ 207–208)
- भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था।
- पंजाब में महिलाएँ (विधवाएँ भी) पुश्तैनी संपत्ति बेचने वाली के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय थीं।
- हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे वे बेचने या गिरवी रखने के लिए स्वतंत्र थीं।
- बंगाल में भी महिला ज़मींदार थीं: अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक, राजशाही की ज़मींदारी, की कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी।
किताब के अपने प्रश्न
3कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 206–207
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे।
- खेत में: मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं।
- घर ही उत्पादन की बुनियाद: किसान की व्यक्तिगत खेती में घर–परिवार का श्रम ही उत्पादन का आधार था, इसलिए "घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द" जैसा बँटवारा मुमकिन नहीं था।
- दस्तकारी: सूत कातना, बरतन के लिए मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर टिके थे; वाणिज्यीकरण बढ़ने के साथ इस श्रम की माँग बढ़ी।
- बाहर भी काम: किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करती थीं; फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती थीं।
- पाबंदियाँ: पश्चिमी भारत में रजस्वला महिलाएँ हल या कुम्हार का चाक नहीं छू सकती थीं; बंगाल में मासिक धर्म के समय पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।
Checkpoint✓ Stop complete
1मुग़ल काल के ग्रामीण समाज में शादीशुदा महिलाओं की कमी क्यों थी?
किताब यही कारण बताती है (पृष्ठ 207); विधवाएँ तो कानूनन शादी कर सकती थीं।
2मुग़ल काल के पश्चिमी भारत के दस्तावेज़ों में महिलाओं की दरख़्वास्तें किसके पास भेजी गई मिलती हैं?
महिलाओं ने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को दरख़्वास्तें भेजीं (पृष्ठ 207)।
4जंगल और कबीले
इस पड़ाव का सवाल
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों का जीवन कैसा था, और राज्य, खेती और व्यापार ने उसे कैसे बदला?
पिछली बात से कड़ी बसे हुए गाँवों के परे भी बड़ी दुनिया थी: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में अखिल भारतीय स्तर पर अंदाज़न लगभग 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था।
मुग़ल काल में उत्तर और उत्तर–पश्चिमी भारत के गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़ दें, तो ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे थे।
4.1बसे हुए गाँवों के परेपृष्ठ 208
मुग़ल काल में कितना जंगल था? (पृष्ठ 208)
- जंगल वाले इलाके: झारखंड सहित पूरा पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (भारत–नेपाल सीमा की तराई सहित), दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार।
- उस समय के स्रोतों के आधार पर अंदाज़न, अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों का औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी था।
मुग़ल काल की रचनाओं में "जंगली" का अर्थ (पृष्ठ 208)
- उस समय की रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए जंगली शब्द इस्तेमाल करती हैं।
- पर इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था, जैसा आजकल समझा जाता है। यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था।
- एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना जंगल के कबीलों की ख़ासियत थी।
4.2जंगलों में घुसपैठपृष्ठ 208
मुग़ल राज्य की नज़र में जंगल (पृष्ठ 208–209)
- राज्य के लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था: बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास)।
- मुग़ल बादशाह बाबर के अनुसार जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था "जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।" (परगना मुग़ल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल था।)
- राज्य को सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश (मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट) में अक्सर हाथी भी होते थे।
मुग़ल बादशाह का शिकार अभियान (पृष्ठ 209)
- मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान इस बात का एक लक्षण था कि राज्य ग़रीबों और अमीरों, सबकी परवाह करता है।
- दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार के नाम पर बादशाह विशाल साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और अलग-अलग इलाकों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था।
- दरबारी चित्रों में शिकार बार-बार आता है, और चित्रकार अक्सर उसमें एक छोटा-सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था। बादशाहनामा के एक चित्र (किताब का चित्र 8.9) में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है।

तस्वीर: शाहजहाँ के बेटे शाह शुजा का नीलगाय का शिकार। पयाग का माना जाने वाला चित्र, लगभग 1650–55।
Attributed to Payag, Shah Shuja Hunting Nilgai, c. 1650–55. RISD Museum, 58.068. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 208
यह प्रश्न किताब के चित्र 8.9 पर है: बादशाहनामा का एक लघु चित्र, जिसमें मुग़ल बादशाह शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है। इसका पूरा उत्तर देने के लिए किताब का चित्र देखना होगा; उत्तर के मुख्य बिंदु नीचे हैं।
आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?
जवाब देखिए
- दृश्य: पहाड़ी, जंगली इलाके में बादशाह (शाहजहाँ) बंदूक से नीलगाय का शिकार कर रहा है; उसके सिर के पीछे रोशनी का घेरा (प्रभामंडल) है; दाईं ओर दरबारी खड़े हैं।
- शिकार और न्याय: दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद गौर करता था।
- सांकेतिक तत्व: किताब बताती है कि ऐसे चित्रों में चित्रकार अक्सर एक छोटा–सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था।
स्रोत 3: कृषि बस्तियों के लिए जंगलों का सफ़ाया (पृष्ठ 209)
सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल का नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है। कविता के कुछ अंश:
"ख़बर मिलते ही, परदेसी आने लगे तमाम जगहों से।"
"उत्तर से आए दास / सैकड़ों उमड़ते हुए।"
"दक्खिन से आए फ़सल कटाई वाले / एक उद्यमी के साथ पाँच सौ।"
"पश्चिम से आया ज़फ़र मियाँ / साथ में बाईस हज़ार लोग।"
"जंगलों को हटाने के बाद / उन्होंने बसाए बाज़ार।"
"कुल्हाड़ियों की आवाज़ सुनकर / शेर डर गए और दहाड़ते हुए भाग निकले।"
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 209
यह प्रश्न स्रोत 3 के साथ है: सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल का एक अंश। चित्र 8.9 बादशाहनामा का वह लघु चित्र है जिसमें शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है।
यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें "बिदेसी" बताया गया है?
जवाब देखिए
चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है।
- घुसपैठ के रूप: हर दिशा से परदेसियों का आना; चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे बाँटना; उत्तर से "दास / सैकड़ों उमड़ते हुए", दक्खिन से फ़सल काटने वाले "एक उद्यमी के साथ पाँच सौ", पश्चिम से ज़फ़र मियाँ "साथ में बाईस हज़ार लोग"; जंगल काटकर बाज़ार बसाना; कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेरों का भाग जाना।
- चित्र से तुलना: चित्र में राज्य बादशाह के शिकार के रूप में जंगल में आता है, और उसे अच्छे शासन की तरह दिखाया गया है; कविता में जंगल खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होता है। दोनों में बाहरी ताकत जंगल तक पहुँचती है।
- "बिदेसी": जंगल वासियों की नज़र में वे सब लोग जो बाहर से आकर बसे: दास, फ़सल काटने वाले, ज़फ़र मियाँ के साथ आए लोग और बाज़ार बसाने वाले।
स्रोत 4: पहाड़ी कबीलों और मैदानों के बीच व्यापार, लगभग 1595 (पृष्ठ 210)
अबुल फ़ज़्ल ने अवध सूबे (आज के उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के मैदानी इलाकों और पहाड़ी कबीलों के लेन–देन का ब्योरा दिया है।
उत्तर के पहाड़ों से सामान "इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर" लाया जाता था।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 210
यह प्रश्न स्रोत 4 के साथ है: अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी में लगभग 1595 के अवध सूबे का ब्योरा, जिसमें पहाड़ी कबीलों और मैदानों का लेन–देन है।
इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।
जवाब देखिए
- परिवहन: इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर सामान लादकर।
- क्यों: पहाड़ के संकरे और ऊबड़–खाबड़ रास्तों पर गाड़ियाँ नहीं चल पाती होंगी, जबकि आदमी, मोटे–मोटे घोड़े और बकरे बोझ लेकर चढ़ सकते हैं।
- मैदानों से पहाड़ तक: सफ़ेद और रंगीन कपड़े (पहनने के लिए), कहरुबा (किताब के अनुसार, जिससे गहने बनाए जाते थे), नमक और हींग (खाने के लिए), गहने (सजने के लिए), और शीशे व मिट्टी के बरतन (घर के काम के लिए)।
मुग़ल काल में जंगल के उत्पादों का व्यापार (पृष्ठ 210)
- वाणिज्यिक खेती का असर बाहरी कारक के रूप में जंगलवासियों पर भी पड़ा। शहद, मधुमोम और लाक जैसे जंगल के उत्पादों की बहुत माँग थी; लाक तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में से था।
- हाथी पकड़े और बेचे जाते थे, और वस्तुओं की अदला–बदली भी होती थी।
- कुछ कबीले भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच के ज़मीनी व्यापार में लगे थे, जैसे पंजाब का लोहानी कबीला, जो पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच के व्यापार में भी शरीक था।
कबीले के सरदार से ज़मींदार और राजा तक (पृष्ठ 210–211)
- कबीलों के सरदार गाँव के "बड़े आदमियों" जैसे होते थे। कई सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी। सेना खड़ी करने के लिए उन्होंने अपने खानदान के लोगों को भर्ती किया या भाई–बंधुओं से सैन्य सेवा माँगी।
- सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे।
- अहोम राजा (असम): उनके अपने पायक थे, यानी वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपना एकाधिकार भी घोषित कर रखा था।
- कोच राजा (उत्तर–पूर्व): आइन बताती है कि सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध किए और उन पर कब्ज़ा जमा लिया।
- कबीलाई व्यवस्था से राजतंत्र की ओर बदलाव बहुत पहले शुरू हो चुका था, पर लगता है कि यह प्रक्रिया सोलहवीं सदी में आकर पूरी तरह विकसित हुई।
- कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे–धीरे इस्लाम अपनाया, उसमें सूफ़ी संतों (पीर) की बड़ी भूमिका थी।
किताब के अपने प्रश्न
7सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी किस तरह बदल गई?
लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 208–211
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- इन दो सदियों में राज्य, खेती और व्यापार, तीनों जंगलों तक पहुँचे, और जंगल वासियों की ज़िंदगी बदलने लगी।
- पहले कैसा जीवन: अखिल भारतीय स्तर पर अंदाज़न लगभग 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था। "जंगली" उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था। भीलों जैसे कबीले मौसम के हिसाब से काम बदलते और एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।
- राज्य की घुसपैठ: राज्य जंगल को बदमाशों का अड्डा (मवास) मानता था। सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए पेशकश में अक्सर हाथी लिए जाते थे। दरबारी इतिहासकारों के अनुसार, शिकार अभियानों के बहाने बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता था।
- खेती का फैलाव: मुकुंदराम चक्रवर्ती के चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल साफ़ करवाकर राज्य बसाता है; दूर–दूर से लोग आकर बाज़ार बसाते हैं।
- व्यापार: शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थी; लाक समुद्र पार निर्यात की मुख्य वस्तु था। हाथी पकड़े और बेचे जाते थे; पंजाब का लोहानी कबीला भारत–अफ़ग़ानिस्तान के ज़मीनी व्यापार में लगा था।
- सरदार से राजा: कई कबीलाई सरदार ज़मींदार, कुछ राजा भी बने; सिंध की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल थे; अहोम राजाओं के पायक थे। उत्तर–पूर्व में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों पर कब्ज़ा किया।
- नए सांस्कृतिक प्रभाव: कुछ इतिहासकारों के अनुसार नए बसे इलाकों में सूफ़ी संतों (पीर) ने इस्लाम के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई।
- निष्कर्ष: घूमते रहने वाली, आत्मनिर्भर ज़िंदगी पर राज्य की माँगों, बसती खेती और बाज़ार का दबाव बढ़ा, और कबीलाई व्यवस्था राजतंत्र की ओर बढ़ी।
Checkpoint✓ Stop complete
1मुग़ल काल की रचनाओं में "जंगली" शब्द किन लोगों के लिए था?
किताब साफ़ कहती है कि इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था (पृष्ठ 208)।
2असम में अहोम राजाओं के पायक कौन थे?
पायक ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देते थे; अहोम राजाओं का जंगली हाथी पकड़ने पर एकाधिकार भी था (पृष्ठ 210)।
3सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में जंगल का कौन-सा उत्पाद था?
किताब के अनुसार लाक सत्रहवीं सदी में समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में से था (पृष्ठ 210)।
5ज़मींदार
इस पड़ाव का सवाल
मुग़ल काल के ज़मींदार कौन थे, उनकी ताकत कहाँ से आती थी, और गाँव में उनकी क्या भूमिका थी?
पिछली बात से कड़ी सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कई कबीलाई सरदार ज़मींदार बने, और कुछ राजा भी। अब मुग़ल काल के ज़मींदारों को देखिए।
मुग़ल काल में ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। वे अपनी ज़मीन के मालिक थे, और ऊँची हैसियत की वजह से उन्हें ख़ास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली थीं।
मुग़ल काल के ज़मींदार कौन थे? (पृष्ठ 211–212)
- हैसियत के दो कारण: एक, जाति; दूसरा, वे राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे।
- मिल्कियत: ज़मींदारों की समृद्धि की वजह उनकी विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी, जिसे मिल्कियत (यानी संपत्ति) कहते थे। इस पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूरों से। ज़मींदार इसे अपनी मर्ज़ी से बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे।
- कर वसूली: ज़मींदार अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और बदले में उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था।
- सैनिक ताकत: ज़्यादातर ज़मींदारों के अपने किले और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ थीं, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे।
एक समांतर सैनिक बल! (बॉक्स, पृष्ठ 212)
आइन–ए–अकबरी के अनुसार मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति इस प्रकार थी:
| 384,558 | घुड़सवार |
| 4,277,057 | पैदल |
| 1,863 | हाथी |
| 4,260 | तोप |
| 4,500 | नाव |
मुग़ल गाँव का सामाजिक पिरामिड (पृष्ठ 212)
- मुग़ल गाँवों के सामाजिक संबंधों को पिरामिड मानें, तो ज़मींदार उसके संकरे शीर्ष पर थे।
- अबुल फ़ज़्ल इशारा करता है कि "ऊँची जाति" के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन ने ग्रामीण समाज पर पहले ही अपना ठोस नियंत्रण बना रखा था।
- ज़मींदारों में तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और कई मुसलमान ज़मींदार भी थे।
मुग़ल काल में ज़मींदारी कैसे बनी और पक्की हुई (पृष्ठ 212)
- जंग में जीत: उस समय के दस्तावेज़ों से लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का एक संभावित स्रोत रही होगी। पर इसकी संभावना कम है कि राज्य ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त देता, जब तक एक राज्यादेश (सनद) से इसकी पुष्टि पहले न हो चुकी हो।
- धीमी प्रक्रिया (ज़्यादा महत्त्वपूर्ण), चार तरीक़ों से: नयी ज़मीनें बसाकर (जंगल–बारी), अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
- इन्हीं प्रक्रियाओं से अपेक्षाकृत "निचली" जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे, क्योंकि उस काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी और बेची जाती थी।
- वंश पर आधारित ज़मींदारियाँ: राजपूतों और जाटों ने उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी–बड़ी पट्टियों पर नियंत्रण पक्का किया; मध्य और दक्षिण–पश्चिम बंगाल में किसान–पशुचारियों (जैसे सदगोप) ने ताकतवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं।
मुग़ल काल के गाँव में ज़मींदार की भूमिका (पृष्ठ 212)
खेती और बाज़ार
- ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को खेती का साजो–सामान और उधार देकर उन्हें बसने में मदद की।
- ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई।
- ज़मींदार अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते थे, और अक्सर बाज़ार (हाट) लगवाते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे।
शोषक, पर संरक्षक भी
- ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, पर किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था।
- भक्ति संतों ने जातिगत और दूसरे अत्याचारों की बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों को (और साहूकारों को भी) किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया।
- सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए, और उनमें राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।
किताब के अपने प्रश्न
8मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।
लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 211–213
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- ज़मींदार मुग़ल गाँवों के सामाजिक पिरामिड के संकरे शीर्ष पर थे: वे राज्य के सहायक भी थे, किसानों के शोषक भी, और कुछ हद तक संरक्षक भी।
- कौन थे: उनकी कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे। हैसियत के दो कारण थे: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)। उनकी व्यक्तिगत ज़मीन मिल्कियत कहलाती थी, जिसे वे बेच या गिरवी रख सकते थे।
- राज्य के लिए: वे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे। उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं; आइन के अनुसार उनकी मिली–जुली शक्ति 384,558 घुड़सवार और 4,277,057 पैदल थी।
- ज़मींदारी कैसे बनती: जंग में जीत एक संभावित स्रोत थी, पर राज्य आम तौर पर सनद के बिना ऐसी इजाज़त नहीं देता था। ज़्यादातर ज़मींदारी धीमी प्रक्रिया से बनती थी: नयी ज़मीनें बसाकर, अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
- गाँव की अर्थव्यवस्था में: उन्होंने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को साजो–सामान और उधार दिया। वे अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते और हाट लगवाते थे; ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ।
- शोषक, पर संरक्षक भी: भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनका निशाना राज्य का राजस्व अधिकारी था। सत्रहवीं सदी के कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।
- निष्कर्ष: ज़मींदार राज्य और किसान के बीच की कड़ी थे; उनके रिश्ते में शोषण के साथ पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था।
Checkpoint✓ Stop complete
1मुग़ल काल में ज़मींदार की मिल्कियत क्या थी?
मिल्कियत यानी संपत्ति: ज़मींदार की व्यक्तिगत ज़मीन, जिस पर उसके निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी (पृष्ठ 211–212)।
2आइन–ए–अकबरी के अनुसार मुग़ल भारत में ज़मींदारों के पास कितने हाथी थे?
बॉक्स "एक समांतर सैनिक बल!": 1,863 हाथी; 4,260 तोप; 4,500 नाव; 384,558 घुड़सवार (पृष्ठ 212)।
6भू–राजस्व प्रणाली
इस पड़ाव का सवाल
मुग़ल राज्य ज़मीन से राजस्व कैसे तय करता और वसूलता था?
पिछली बात से कड़ी मुग़ल काल के ज़मींदार अक्सर राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे। अब मुग़ल राज्य की अपनी राजस्व व्यवस्था देखिए।
ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था। इसलिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, ताकि कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रहे और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के सभी इलाकों में राजस्व का आकलन और वसूली हो सके।
मुग़ल राजस्व तंत्र: दीवान और अमीन (पृष्ठ 213–214)
- दीवान: इस तंत्र में दीवान शामिल था, जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी।
- इस तरह हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में दाखिल हुए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताकत बन गए।
- अमीन: एक मुलाज़िम, जिसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो रहा है।
- अमील–गुज़ार: राजस्व वसूली करने वाला अधिकारी।
मुग़ल भू–राजस्व के दो चरण: जमा से हासिल तक (पृष्ठ 213)
लोगों पर कर का बोझ तय करने से पहले मुग़ल राज्य ने ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में ख़ास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की। फिर भू–राजस्व का इंतज़ाम दो चरणों में होता था:
पहला चरण: कर निर्धारण
- जमा: निर्धारित रक़म, यानी राज्य ने जितना राजस्व तय किया।
- राजस्व तय करते समय राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था।
दूसरा चरण: वास्तविक वसूली
- हासिल: सचमुच वसूली गई रक़म।
- स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी उतनी वसूली सचमुच संभव नहीं हो पाती थी जितनी तय हुई थी।
नक़द भी, फ़सल भी: अकबर का हुक्म (पृष्ठ 213)
- अमील–गुज़ार के कामों की सूची में मुग़ल बादशाह अकबर ने हुक्म दिया कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें, पर फ़सल में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे।
मुग़ल भू–राजस्व: पहले जानकारी, फिर जमा, फिर हासिल (पृष्ठ 213–214)
इस तंत्र के दो और ओहदे
- दीवान
- उसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी।
- अमीन
- उसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो रहा है।
मुग़ल काल में ज़मीन की नपाई (पृष्ठ 213)
- हर प्रांत में जुती हुई और जोतने लायक, दोनों तरह की ज़मीन की नपाई हुई। अकबर के शासन काल में अबुल फ़ज़्ल ने आइन–ए–अकबरी में ऐसी ज़मीनों के सभी आँकड़े संकलित किए।
- बाद के बादशाहों के समय भी नपाई की कोशिशें जारी रहीं: 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए।
- फिर भी सभी इलाकों की नपाई नहीं हो सकी: उपमहाद्वीप के जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई।
स्रोत 5: अकबर के शासन में भूमि का वर्गीकरण (आइन–ए–अकबरी, पृष्ठ 214)
आइन–ए–अकबरी के अनुसार अकबर ने ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया। आइन के शब्दों में:
"पोलज वह ज़मीन है जिसमें एक के बाद एक हर फ़सल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता है।"
"चचर वह ज़मीन है जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है।"
पहले दो प्रकार की ज़मीन (पोलज और परौती) की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब। हर किस्म की ज़मीन का उत्पाद जोड़ा जाता, उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता था।
अकबर के शासन में ज़मीन के वर्ग और शाही शुल्क (स्रोत 5, पृष्ठ 214)
चार वर्ग: खेत कितने समय खाली रहता था
पोलज और परौती: शाही शुल्क कैसे निकलता था
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 214
यह प्रश्न स्रोत 5 के साथ है: आइन–ए–अकबरी में अकबर के समय ज़मीन के वर्गीकरण का ब्योरा।
अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?
जवाब देखिए
आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीन को इस आधार पर बाँटा कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है, और हर वर्ग का राजस्व अलग रखा।
- पोलज: हर साल खेती, कभी ख़ाली नहीं छोड़ी जाती।
- परौती: कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके।
- चचर: तीन या चार वर्षों तक ख़ाली।
- बंजर: पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं हुई।
- राजस्व: पहले दो वर्गों की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब। तीनों का उत्पाद जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और उसका एक–तिहाई शाही शुल्क।
मानचित्र 1 की जगहें: समरकंद से गोवा तक (पृष्ठ 214)
समरकंद का सिर्फ़ नाम है, बिंदु नहीं। बाकी हर नाम पर बिंदु है; नाम नीचे की पट्टी में भी हैं।
रेखाचित्र, पैमाना नहीं दिया गया है।
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.

तस्वीर: 1730–1744 के बीच छपा एक डच नक़्शा; शीर्षक का अर्थ है महान मुग़ल के साम्राज्य का नया नक़्शा। इसे याकोब काइज़र ने बनाया और एम्सटर्डम में इसाक तिरियोन ने छापा: उस समय के एक यूरोपीय नक़्शे में मुग़ल साम्राज्य ऐसा दिखता था।
Jacob Keyser (cartographer), Isaak Tirion (publisher), Nieuwe Kaart van ’t Keyzerryk van den Grooten Mogol, 1730–44. Rijksmuseum, NG-501-68, CC0. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 214
यह प्रश्न मुग़ल साम्राज्य के फैलाव के मानचित्र (मानचित्र 1) के साथ है, जिसमें 1530, 1605 और 1707 तक के इलाके दिखाए गए हैं।
भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?
जवाब देखिए
साम्राज्य 1530, 1605 और 1707 तक के चरणों में फैलता गया, और इसके साथ राजस्व का तंत्र भी बढ़ा।
- बड़ा प्रशासनिक तंत्र: तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में राजस्व आकलन और वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, जिसमें दीवान का दफ़्तर शामिल था।
- नए लोग, नयी ताकत: हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में आए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताकत बने।
- आँकड़े और जाँच: हर इलाके की ज़मीन और खेती की जानकारी जुटाई गई; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव, हर किसान की जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
- मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।
मुग़ल राज्य के मनसबदार कौन थे? (बॉक्स, पृष्ठ 214)
- मनसबदार मुग़ल राज्य के शाही अफ़सर थे। मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर इन्हीं का सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक, दोनों तरह के मामलों की ज़िम्मेदारी थी।
- वेतन कैसे मिलता था: कुछ मनसबदारों को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों के राजस्व का आबंटन देकर भुगतान किया जाता था।
- समय–समय पर मनसबदारों का तबादला होता था।
स्रोत 6: नक़द या जीन्स? (आइन–ए–अकबरी, पृष्ठ 215)
आइन–ए–अकबरी के इस अनुच्छेद में अमील–गुज़ार को सलाह है: "अमील-गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले बल्कि फ़सल भी लेने के लिए तैयार रहे।"
फ़सल में वसूली के चार तरीक़े बताए गए हैं। कणकुत के बारे में आइन कहती है: "अकसर अंदाज़ से किया गया ज़मीन का आकलन भी पर्याप्त रूप से सही नतीजा देता है।"
बटाई में कई समझदार निरीक्षकों की ज़रूरत पड़ती थी, वरना धोखेबाज़ी का डर रहता था।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 215
यह प्रश्न स्रोत 6 के साथ है: आइन–ए–अकबरी में नक़द और फ़सल के रूप में राजस्व वसूली के तरीक़े।
राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?
जवाब देखिए
आइन में नक़द और फ़सल, दोनों तरह की वसूली है; हर एक का किसान पर असर अलग रहा होगा।
- नक़द: किसान को फ़सल बेचकर पैसा जुटाना पड़ता होगा, इसलिए बाज़ार के भाव का असर उस पर पड़ता होगा।
- कणकुत (अंदाज़े से): फ़सल का अंदाज़ा लगाया जाता; शक हो तो फ़सल अच्छी, मध्यम और बदतर के तीन पुलिंदों में काटी जाती। ग़लत अंदाज़े से किसान को नुक़सान भी हो सकता था।
- बटाई या भाओली: फ़सल काटकर, सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा; पर इसमें कई समझदार निरीक्षक चाहिए थे, वरना धोखेबाज़ी का डर था।
- खेत बटाई: बुआई के बाद खेत ही बाँट लिए जाते, तो फ़सल अच्छी हो या ख़राब, दोनों का जोखिम बँट जाता होगा।
- लाँग बटाई: कटाई के बाद ढेर बाँटकर हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता और उससे मुनाफ़ा कमाता।
स्रोत 7: जमा (1665 ई. में औरंगज़ेब का हुक्म, पृष्ठ 215)
1665 ई. में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने अपने राजस्व अधिकारी को यह हुक्म दिया:
"वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें कि वे हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के बावत खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) पता करें, और बारीकी से उनकी जाँच करने के बाद सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें।"
यानी जमा तय करने से पहले हर गाँव और हर किसान की खेती की जाँच होनी थी, और उसमें राज्य के हित और किसानों का कल्याण, दोनों देखे जाने थे।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 215
यह प्रश्न स्रोत 7 के साथ है: 1665 ई. में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब का अपने राजस्व अधिकारियों को दिया हुक्म।
आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?
जवाब देखिए
1665 ई. के अपने हुक्म में औरंगज़ेब हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) जानना चाहता है।
- सही जमा: हर गाँव की ज़मीन और फ़सल अलग थी, इसलिए बारीक जाँच के बिना राजस्व ठीक से तय नहीं हो सकता था।
- दोनों हित: हुक्म कहता है कि जमा सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) और किसानों के कल्याण को ध्यान में रखकर तय हो।
- हर साल की गिनती: हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखने को भी कहा गया।
- बड़ी आमदनी: ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।
किताब के अपने प्रश्न
5उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुग़ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू–राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 200, 213–215, 218
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- किताब के अनुसार ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था। इसके सबूत:
- पूरा प्रशासनिक तंत्र: दीवान के दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख थी; हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी कृषि संबंधों की निर्णायक ताकत बन गए।
- नपाई और आँकड़े: हर प्रांत में जुती और जोतने लायक ज़मीन नपवाई गई; आइन हर प्रांत की मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) दर्ज करती है; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव के खेतिहरों का सालाना हिसाब और आसामीवार जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
- बारीक नियम: ज़मीन के चार वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर), मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई शाही शुल्क, और कणकुत, बटाई जैसे वसूली के तरीक़े।
- फ़सलों पर नज़र: राज्य जिन्स–ए–कामिल को बढ़ावा देता था क्योंकि उनसे ज़्यादा कर मिलता था।
- मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।
Checkpoint✓ Stop complete
1मुग़ल भू–राजस्व व्यवस्था में जमा और हासिल में क्या फ़र्क था?
भू–राजस्व के दो चरण थे: पहला कर निर्धारण (जमा), दूसरा वास्तविक वसूली (हासिल) (पृष्ठ 213)।
2अकबर के ज़मीन के वर्गीकरण में चचर ज़मीन कौन-सी थी?
स्रोत 5: चचर तीन या चार वर्षों तक खाली रहती थी; पाँच या ज़्यादा वर्ष वाली बंजर थी (पृष्ठ 214)।
31665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को क्या निर्देश दिया?
किताब के अनुसार 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखने का निर्देश दिया (पृष्ठ 213, स्रोत 7)।
7चाँदी का बहाव
इस पड़ाव का सवाल
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में चाँदी भारत में क्यों और कैसे आई, और उसका क्या असर हुआ?
पिछली बात से कड़ी अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया था कि वह खेतिहरों से नक़द भुगतान की कोशिश करे। चाँदी के बहाव से मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में था जो सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे। इसी दौर में भारत के व्यापार के साथ बाहर से भारी मात्रा में चाँदी भारत आई।
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में एशिया के चार बड़े साम्राज्य (पृष्ठ 215)
- मुग़ल साम्राज्य (भारत में)
- मिंग साम्राज्य (चीन में)
- सफ़ावी साम्राज्य (ईरान में)
- ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की में)
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी का व्यापार: ज़मीन से भी, समुद्र से भी (पृष्ठ 215)
- ज़मीनी व्यापार: इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की।
- समुद्री व्यापार: खोजी यात्राओं से और ‘नयी दुनिया’ के खुलने से यूरोप के साथ एशिया के, ख़ासकर भारत के, व्यापार में भारी विस्तार हुआ।
- इससे भारत के समुद्र-पार व्यापार में भौगोलिक विविधता आई, और कई नयी वस्तुओं का व्यापार भी शुरू हुआ।
मुग़ल भारत में चाँदी क्यों आई, और उसका क्या असर हुआ? (पृष्ठ 216)
चाँदी क्यों आई
- भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया।
- यह भारत के लिए अच्छा था, क्योंकि भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।
चाँदी का असर
- सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही।
- अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ।
- मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।

तस्वीर: औरंगज़ेब का चाँदी का रुपया: सूरत की टकसाल में हिजरी 1113 (सन् 1702) में, उसके शासन के 46वें साल में ढाला गया। वज़न लगभग 10.3 ग्राम। सिक्के पर कोई चित्र नहीं, फ़ारसी में लिखावट है।
“Aurangzeb Rupee (Taj Mahal Treasure)”, photo: Fred Cherrygarden, CC BY-SA 4.0 (creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0), resized. Image: Wikimedia Commons.
चाँदी भारत तक: किताब की कड़ियाँ (पृष्ठ 216)
इटली का मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी (पृष्ठ 216–217)
- जोवान्नी कारेरी इटली का एक मुसाफ़िर था, जो लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा।
- उसने बड़ा सजीव चित्र पेश किया कि चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत कैसे पहुँचती थी। उससे यह भी पता चलता है कि सत्रहवीं सदी के भारत में नकद और वस्तुओं का बहुत बड़ी मात्रा में आदान–प्रदान हो रहा था।
- स्रोत 8 में कारेरी का लेख, जो बर्नियर के लेख पर आधारित है, कहता है: "दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।"
स्रोत 8: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी (पृष्ठ 217)
- कारेरी के अनुसार भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी हर साल भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव के टापू, मोज़ाम्बीक़ और दूसरी जगहों पर ले जाते थे।
- इन्हीं जहाज़ों को इन देशों से बहुत सारा सोना–चाँदी लेकर हिंदुस्तान पहुँचाना पड़ता था।
- डच लोग जापान की खानों से जो कुछ हासिल करते थे, वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।
किताब के अपने प्रश्न
4विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 205–206, 212–213, 216–217
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में नकद का लेन–देन दरबार से गाँव तक फैल चुका था।
- चाँदी का बहाव: भारत के निर्यात का भुगतान करने के लिए चाँदी भारी मात्रा में भारत आई, जबकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
- कारेरी की गवाही: लगभग 1690 ई. में भारत आए जोवान्नी कारेरी के अनुसार यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं और नकद भारत में ही रह जाता था।
- राजस्व में नकद: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह खेतिहरों से नक़द भुगतान की कोशिश करे; मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी।
- गाँव में नकद: निर्यात के लिए काम करने वाले दस्तकारों और कपास, रेशम, नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था। फ़्रांसीसी यात्री तैवर्नियर के अनुसार वे गाँव बहुत छोटे माने जाते जिनमें सराफ़ न हों।
- ज़मींदार: ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ, और ज़मींदार हाट लगवाते थे।
Checkpoint✓ Stop complete
1सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में मुग़ल साम्राज्य के अलावा एशिया के कौन-से बड़े साम्राज्य सत्ता और संसाधनों पर पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे?
किताब इन्हीं तीन साम्राज्यों का नाम लेती है (पृष्ठ 215)। डच, अंग्रेज़ और पुर्तगाली व्यापारी थे, एशिया के साम्राज्य नहीं।
2मुग़ल काल में बाहर से चाँदी आना भारत के लिए अच्छा क्यों था?
किताब के अनुसार भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; चाँदी निर्यात के भुगतान के रूप में आती थी (पृष्ठ 216)।
3जोवान्नी कारेरी कौन था?
कारेरी इटली का मुसाफ़िर था; स्रोत 8 का उसका लेख बर्नियर के लेख पर आधारित है (पृष्ठ 216–217)।
8अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी
इस पड़ाव का सवाल
अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी कैसे बनी, उसमें क्या है, और इतिहासकार उसे सावधानी से क्यों पढ़ते हैं?
पिछली बात से कड़ी मुग़ल काल के ज़मींदारों की फ़ौज के आँकड़े और हर प्रांत की मापी गई ज़मीन और जमा, दोनों आइन–ए–अकबरी में दर्ज हैं। अब आइन–ए–अकबरी को एक स्रोत की तरह परखिए।
आइन–ए–अकबरी मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे ग्रंथों में सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक है। इसे मुग़ल बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने लिखा, और किसानों, ज़मीन और राजस्व के बारे में हमारी बहुत-सी जानकारी इसी से आती है।
आइन–ए–अकबरी कैसे बनी (पृष्ठ 217)
- एक बड़ी परियोजना: आइन–ए–अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी, जिसका ज़िम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया था।
- कब पूरी हुई: अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद।
- अकबरनामा का हिस्सा: अकबर की पहल पर इतिहास लिखने की परियोजना का परिणाम अकबरनामा था, जो तीन जिल्दों में रचा गया। पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है; तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है, जिसे शाही नियम–कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित किया गया।
- किन बातों पर: दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन; राजस्व के स्रोत और अकबर के साम्राज्य के प्रांतों का भूगोल; और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिवाज।

तस्वीर: अबुल फ़ज़्ल अकबर को अकबरनामा की दूसरी जिल्द पेश कर रहे हैं। गोवर्धन का बनाया चित्र (आगरा), लगभग 1603–1605।
Govardhan, c. 1603–05. Chester Beatty Library, Dublin, In 03.176. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
आइन–ए–अकबरी किसकी नज़र से लिखी गई? (पृष्ठ 218)
- सूचनाएँ इकट्ठा करके सिलसिलेवार संकलित करना एक महत्त्वपूर्ण शाही कवायद थी। इससे बादशाह अकबर को साम्राज्य के सभी इलाकों के रिवाजों और पेशों की जानकारी मिली।
- हमारे लिए आइन अकबर के शासन के मुग़ल साम्राज्य के बारे में सूचनाओं की खान है।
- पर इसका नज़रिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया है, या किताब के शब्दों में "समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर"।
अकबरनामा से आइन के पाँच भागों तक (पृष्ठ 217–218)
मुल्क–आबादी में आँकड़े, और सरकारों की तालिकाएँ (पृष्ठ 218)
- मुल्क–आबादी में सूबों और उनकी प्रशासनिक और वित्तीय इकाइयों (सरकार, परगना और महल) के भौगोलिक, स्थलाकृतिक और आर्थिक रेखाचित्र हैं, और हर प्रांत और उसकी इकाइयों की कुल मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) भी।
- सूबों के नीचे की इकाई सरकार की सूचनाएँ तालिकाओं में हैं। हर तालिका में आठ ख़ाने हैं:
- (1) परगनात/महल; (2) क़िला; (3) अराज़ी और जमीन–ए–पाईमूद (मापे गए इलाके); (4) नकदी (नक़द निर्धारित राजस्व);
- (5) सुयूरग़ाल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान); (6) ज़मींदार; (7 और 8) ज़मींदारों की जातियाँ, और घुड़सवार, पैदल सिपाही (प्यादा) और हाथी (फ़ील) सहित उनकी फ़ौज।
स्रोत 9: "खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई" (पृष्ठ 219)
इस अंश में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसे बादशाह अकबर से यह हुक्म मिला: "शानदार घटनाओं और राज्य–क्षेत्र अधीन करने वाली हमारी फ़तहों की दास्तान ईमानदारी के कलम से लिखो…"
सूबों को शाही हुक्म भेजा गया कि पुराने मुलाज़िमों में जिसे बीती घटनाएँ याद हों, वह अपने संस्मरण लिखकर दरबार भेजे। फिर एक और हुक्म हुआ कि जो सामग्री जमा की जाए, "उसे शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाया जाए"।
अबुल फ़ज़्ल अकबरनामा को "खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग" कहता है, और अपनी जुटाई सामग्री को उसे सींचने वाला हौज़।
अबुल फ़ज़्ल ने अपनी सूचनाएँ कहाँ से लीं? (स्रोत 9, पृष्ठ 219)
- बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़ इकट्ठे किए, और लंबे समय तक राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से सवाल-जवाब किए।
- सच बोलने वाले समझदार बुज़ुर्गों और फ़ुर्तीले दिमाग वाले जवानों, दोनों की बातें परखकर लिखित रूप में दर्ज कीं।
- पुराने मुलाज़िमों के लिखे संस्मरण मँगवाए।
- इलाही संवत के उन्नीसवें साल से, जब दस्तावेज़ दफ़्तर स्थापित हुआ, घटनाओं का इतिहासवृत्त लिया।
- राज्याभिषेक से तब तक सूबों को जारी सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल हासिल की।
- ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की भेजी रिपोर्टें शामिल कीं, जो साम्राज्य के मामलों या दूसरे देशों की घटनाओं के बारे में थीं।
- जानकार और दूरदर्शी लोगों के लिखे कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र भी हासिल किए।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 219
यह प्रश्न स्रोत 9 के साथ है: आइन–ए–अकबरी के आख़िर में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसने सूचनाएँ कैसे जुटाईं।
उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?
जवाब देखिए
- स्रोतों की सूची: बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ; समझदार बुज़ुर्गों और जवानों के बयान, लिखकर दर्ज; सूबों के पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण; इलाही संवत के उन्नीसवें साल से दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल; ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र।
- कृषि संबंधों के लिए: सूबों को भेजे हुक्म, अफ़सरों की रिपोर्टें और सूबों के संस्मरण सबसे काम के होते, क्योंकि उनमें ज़मीन, राजस्व और गाँवों की बातें होतीं।
- अकबर से रिश्ते का असर: किताब अकबर के हुक्म से लिखी गई; हुक्म था कि जुटाई सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए; अबुल फ़ज़्ल उसे "खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग" कहता है। इसलिए आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, "समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर"।
आइन–ए–अकबरी: सावधानी भी, सीमाएँ भी (पृष्ठ 220)
सही रखने की सावधानी
- अबुल फ़ज़्ल ने पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की।
- मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में शामिल करने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि की जाती थी।
- सांख्यिकी वाले खंडों में सभी आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी लिखे गए, ताकि बाद की प्रतियों में नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों।
सीमाएँ
- जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी-मोटी चूक, या नकल उतारते समय अबुल फ़ज़्ल के सहयोगियों की भूल। ये आम तौर पर मामूली हैं और बड़े स्तर पर आँकड़ों की सच्चाई कम नहीं करतीं।
- आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में इकट्ठे नहीं हुए। कई सूबों के ज़मींदारों की जाति की विस्तृत सूचना है, पर बंगाल और उड़ीसा के लिए नहीं।
- कीमतें और मज़दूरी: कीमतों और मज़दूरी की जो विस्तृत सूची है, वह राजधानी आगरा और उसके आस-पास के इलाकों की है, इसलिए देश के बाकी हिस्सों के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है।
आइन–ए–अकबरी का अनुवाद (बॉक्स, पृष्ठ 220)
- हेनरी ब्लॉकमेन ने आइन का संपादन किया, और कलकत्ता (आज का कोलकाता) की एशियाटिक सोसाइटी ने इसे अपनी बिब्लियोथिका शृंखला में छापा।
- इसका तीन खंडों में अंग्रेज़ी अनुवाद हुआ: पहले खंड का मानक अनुवाद ब्लॉकमेन का (कलकत्ता, 1873), बाकी दो खंडों के अनुवाद एच. एस. जैरेट के (कलकत्ता, 1891 और 1894)।

तस्वीर: हेनरी ब्लॉकमेन के अंग्रेज़ी अनुवाद के पहले खंड का मुखपृष्ठ: एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के लिए कलकत्ता में 1873 में छपा (यह फ़ोटो बाद में दोबारा छपी एक प्रति का है)।
Title page, The Ain i Akbari, vol. I, tr. H. Blochmann, Calcutta 1873 (later reprint). Photo: Rasrad, CC0. Image: Wikimedia Commons.
आइन–ए–अकबरी आज भी क्यों काम की है (पृष्ठ 220–221)
- इन सीमाओं के बावजूद आइन अपने समय के लिए एक असामान्य और अनोखा दस्तावेज़ है। साम्राज्य के गठन और संरचना की झलकियाँ और उसके बाशिंदों और उत्पादों के सांख्यिकीय आँकड़े देकर अबुल फ़ज़्ल मध्यकालीन इतिहासकारों की परंपराओं से कहीं आगे निकल गया।
- अबुल फ़ज़्ल से पहले के इतिहासकार ज़्यादातर राजनीतिक घटनाओं (जंग, फ़तह, सियासी साज़िशें, वंशीय उथल–पुथल) के बारे में लिखते थे; देश, उसके लोगों या उत्पादों का ज़िक्र कभी-कभार प्रसंगवश ही आता था।
- लोगों और साम्राज्य की विस्तृत सूचनाएँ दर्ज करके आइन सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु बन गई। कृषि संबंधों के लिए इसके सांख्यिकीय सबूतों की अहमियत चुनौतियों से परे है।
किताब के अपने प्रश्न
1कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 197, 218–220
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (1598 ई. में पूरी) अकबर के साम्राज्य के खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसकी सीमाएँ हैं।
- ऊपर से देखा नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में आइन से जो पता चलता है वह "सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है"; यह केंद्र की नज़र है, समाज के शीर्ष से देखी तसवीर। इसका उद्देश्य एक ऐसे साम्राज्य का खाका पेश करना था जहाँ मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल–जोल बनाए रखता था।
- जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी चूक या नकल उतारने वाले सहयोगियों की भूल; ये आम तौर पर मामूली हैं।
- आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे; जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है।
- कीमतें और मज़दूरी: सिर्फ़ राजधानी आगरा और उसके आस–पास की विस्तृत सूची है।
- इतिहासकार कैसे निपटते हैं: वे आइन को ध्यान से पढ़कर उसकी ग़लतियाँ पकड़ते हैं और उन्हें दूसरे स्रोतों से मिलाते हैं: सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़। ये किसानों, ज़मींदारों और राज्य के झगड़े और किसानों की नज़र भी दर्ज करते हैं।
Checkpoint✓ Stop complete
1आइन–ए–अकबरी कब पूरी हुई?
किताब के अनुसार 1598 ई., अकबर के शासन का बयालीसवाँ वर्ष, पाँच संशोधनों के बाद (पृष्ठ 217)। 1873 ब्लॉकमेन के अंग्रेज़ी अनुवाद का साल है।
2आइन–ए–अकबरी के किस भाग में "बारह प्रांतों का बयान" है?
मुल्क–आबादी वित्त और राजस्व की दरों के बाद "बारह प्रांतों का बयान" देती है (पृष्ठ 218)।
3आइन–ए–अकबरी में कीमतों और मज़दूरी की सूची की एक सीमा क्या है?
किताब के अनुसार कीमतें और मज़दूरी ज़्यादातर आगरा और आस-पास के इलाकों की दर्ज हैं (पृष्ठ 220)। बंगाल और उड़ीसा की कमी ज़मींदारों की जाति की सूचना में है।
सार और काल रेखा
इस पड़ाव का सवाल
पूरा अध्याय एक साथ: मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा, बड़ी बातें, और प्रश्न 10 का मानचित्र।
पिछली बात से कड़ी आइन–ए–अकबरी 1598 ई. में, अकबर के शासन (1556–1605) में पूरी हुई। काल रेखा में देखिए कि अकबर का शासन मुग़ल इतिहास में कहाँ आता है।
अध्याय एक नज़र में
- सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे, और मुग़ल राज्य अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था (पृष्ठ 196)।
- मुग़ल काल में खेती का पहला उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, पर एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक–दूसरे से जुड़े थे (पृष्ठ 200)।
- मुग़ल काल के गाँव में पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, और उसका सरदार मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) कहलाता था (पृष्ठ 201–202)।
- मुग़ल काल के ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; गाँव के सामाजिक पिरामिड में वे संकरे शीर्ष पर थे (पृष्ठ 211–212)।
- ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था। जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म (पृष्ठ 213)।
- सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में भारत की वस्तुओं के भुगतान के लिए बाहर से भारी मात्रा में चाँदी भारत आई, जबकि भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे (पृष्ठ 216)।
- अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (1598 ई. में पूरी) अकबर के साम्राज्य की खेती, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसका नज़रिया केंद्र का, समाज के शीर्ष से देखा हुआ नज़रिया है (पृष्ठ 217–218)।
काल रेखा: मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव (पृष्ठ 221)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1526 | दिल्ली के सुलतान, इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बनता है |
| 1530–40 | हुमायूँ के शासन का पहला चरण |
| 1540–55 | शेरशाह से हार कर हुमायूँ सफ़ावी दरबार में प्रवासी बन कर रहता है |
| 1555–56 | हुमायूँ खोये हुए राज्य को फिर से हासिल करता है |
| 1556–1605 | अकबर का शासन काल |
| 1605–27 | जहाँगीर का शासन काल |
| 1628–58 | शाहजहाँ का शासन काल |
| 1658–1707 | औरंगज़ेब का शासन काल |
| 1739 | नादिरशाह भारत पर आक्रमण करता है और दिल्ली को लूटता है |
| 1761 | अहमद शाह अब्दाली पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को हराता है |
| 1765 | बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिये जाते हैं |
| 1857 | अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ गद्दी से हटा देते हैं और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार में) भेज देते हैं |
⚠️ ये ग़लतियाँ मत कीजिए
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| "1600 से 1700 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ गई" | 1600 से 1800 के बीच (200 वर्षों में) लगभग 5 करोड़, करीब–करीब 33 फ़ीसदी | पृष्ठ 200 |
| जमा और हासिल को एक मानना | जमा निर्धारित रक़म थी, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म | पृष्ठ 213 |
| खुद–काश्त और पाहि–काश्त को उलट देना | खुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे | पृष्ठ 197–198 |
| परौती को ऐसी ज़मीन समझना जिस पर बरसों से खेती नहीं हुई | परौती पर कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती थी, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके; पाँच या ज़्यादा वर्ष से खाली ज़मीन बंजर थी | पृष्ठ 214 |
| "जंगली" का मतलब असभ्य समझना | मुग़ल काल में यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था | पृष्ठ 208 |
| यह मानना कि मुग़ल काल में खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी | दैनिक आहार पर ज़्यादा ज़ोर था, पर एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन जुड़े हुए थे | पृष्ठ 200 |
| भारतीय गाँव को बराबरी वाला "छोटा गणराज्य" मान लेना | यह उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी; गाँव में संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत और जाति और जेंडर की गहरी विषमताएँ थीं | पृष्ठ 205 |
| यह मानना कि मुग़ल काल के ज़मींदार खुद खेती करते थे | ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; मिल्कियत पर अक्सर दिहाड़ी या पराधीन मज़दूर काम करते थे | पृष्ठ 211 |
| भक्ति संतों को ज़मींदारों का विरोधी मान लेना | भक्ति संतों के गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था, ज़मींदार नहीं | पृष्ठ 212–213 |
| यह मानना कि मुग़ल भारत में चाँदी की अपनी खानें थीं | भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; चाँदी निर्यात के भुगतान के रूप में बाहर से आती थी | पृष्ठ 216 |
| आइन–ए–अकबरी को अकबरनामा से अलग किताब मानना | आइन अकबरनामा की तीसरी जिल्द है; पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है | पृष्ठ 217 |
| आइन को आम किसान का नज़रिया मानना | आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, "समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर" | पृष्ठ 218 |
| कीमतों और मज़दूरी की आइन की सूची को पूरे देश पर लागू करना | वह सूची राजधानी आगरा और उसके आस–पास की है, इसलिए बाकी देश के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है | पृष्ठ 220 |
मानचित्र: मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क वाले इलाके (प्रश्न 10, पृष्ठ 223)
सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में चाँदी, कॉफ़ी और भारत की वस्तुएँ इन इलाकों के बीच आती–जाती थीं। ऊपर के बटन से एक–एक चीज़ चुनिए: उसके तीर और जगहों के नाम दिखेंगे। हर तीर की बात नीचे की कुंजी में है।
तीर सिर्फ़ यह दिखाते हैं कि क्या कहाँ से कहाँ गया; वे किसी जहाज़ या कारवाँ का असली रास्ता नहीं हैं।
अमेरिका इस रेखाचित्र से बाहर, बाईं ओर है; उसका तीर बाएँ किनारे से आता है।
तीरों और बिंदुओं की कुंजी (पृष्ठ 210, 215–217)
- चाँदी (कारेरी, स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप के कई राज्यों से होते हुए; थोड़ा हिस्सा तुर्की, और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस। फ़ारस, अरबिया और तुर्की के लोग मुद्रा मोचा (लाल सागर पर) और बसरा (फ़ारस की खाड़ी पर) भेजते थे, और वहाँ से वह जहाज़ों से हिंदुस्तान पहुँचती थी।
- कॉफ़ी (स्रोत 8): ओमान और अरबिया से तुर्की।
- भारत की वस्तुएँ (स्रोत 8): भारतीय, डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते थे, और वहाँ से सोना–चाँदी भारत लाते थे।
- जापान (स्रोत 8): डच लोग जापान की खानों से जो कुछ हासिल करते थे, वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।
- यूरोप (स्रोत 8): फ़्रांस, इंग्लैंड या पुर्तगाल जाने वाली भारत की सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं, और वह नकद हिंदुस्तान में ही रह जाता था।
- ज़मीनी व्यापार (टूटी रेखा, तीर नहीं): मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता से चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जाल बिछा (पृष्ठ 215); कुछ कबीले भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ज़मीनी व्यापार में लगे थे, जैसे पंजाब का लोहानी कबीला (पृष्ठ 210)।
रेखाचित्र, पैमाना नहीं दिया गया है।
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.
किताब के अपने प्रश्न
10विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात–मार्गों को भी दिखाएँ।
मानचित्र कार्य · पृष्ठ 210, 215–217
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- पहले एटलस की मदद से नीचे के इलाके अंकित कीजिए, फिर किताब में बताए रास्ते तीर से दिखाइए।
- ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार (मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों से होकर); भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार।
- चाँदी का रास्ता (स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप के राज्यों होकर; थोड़ा तुर्की और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से भारत।
- कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की।
- भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते और सोना–चाँदी लाते थे; जापान की खानों की चाँदी भी डचों के ज़रिये भारत आती थी।
- यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल, जहाँ भेजी जाने वाली भारतीय वस्तुएँ (जैसे यूरोपीय बाज़ार के लिए बने वस्त्र) नकद में ख़रीदी जाती थीं।
- किताब इन रास्तों पर भारत के बंदरगाहों के नाम नहीं देती; भारत की ओर तीर बनाते समय बंदरगाह चुनने के लिए एटलस देखिए या अपने शिक्षक से पूछिए।
11पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।
परियोजना कार्य · पृष्ठ 200–207
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- यह परियोजना आपको स्वयं करनी है। नीचे उसका तरीका है।
- साथ में जाइए: अकेले मत जाइए। अपने समूह के साथ, शिक्षक या माता–पिता को साथ लेकर जाइए, और पहले गाँव के बड़ों से पूछ लीजिए कि वे बात करना चाहेंगे या नहीं।
- तैयारी: प्रश्न की छह बातों की एक प्रश्नावली बनाइए, और जानकारी सरपंच, पटवारी, बुज़ुर्गों, किसानों, दस्तकारों और महिलाओं से अलग–अलग पूछिए।
- क्या लिखें: सिर्फ़ गिनती और किस्में लिखिए, जैसे कितने घर हैं, कौन सी फ़सलें, कौन से जानवर और कौन से दस्तकारी के काम। किसी का नाम या जाति मत लिखिए, और किसी की फ़ोटो मत लीजिए।
- तालिका बनाइए: चार ख़ाने रखिए: पहलू | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी (किताब से) | आज का गाँव (आपकी जानकारी) | बदलाव या निरंतरता।
- किताब वाले ख़ाने के लिए: खरीफ़–रबी की फ़सलें और जिन्स–ए–कामिल; कहीं–कहीं 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के; पंजाब में ज़मीन बेचती महिलाएँ और ज़मींदारी पाने वाली महिलाएँ; बुज़ुर्गों की पंचायत, मुखिया, पटवारी और जाति पंचायत।
- व्याख्या: हर बदलाव की वजह लिखिए, और जो चीज़ें आज भी वैसी हैं (जैसे फ़सलों के मौसम) उन्हें निरंतरता के रूप में दिखाइए।
- आँकड़े वही लिखिए जो आपको गाँव में मिलें; अंदाज़ा हो तो उसे अंदाज़ा ही लिखिए।
12आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?
परियोजना कार्य · पृष्ठ 197, 217–220, 223
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- यह परियोजना आपको स्वयं करनी है। नीचे उसका तरीका है।
- अंश कहाँ मिले: किताब आइन पढ़ने के लिए एक वेबसाइट का पता देती है; अंश की प्रति के लिए अपने स्कूल के पुस्तकालय या शिक्षक की मदद लीजिए (अंग्रेज़ी अनुवाद ब्लॉकमेन और एच. एस. जैरेट के हैं)।
- अंश किस भाग से: पाँच दफ़्तरों में से कौन सा (जैसे मुल्क–आबादी, जिसमें सूबों, सरकारों और परगनों के आँकड़े हैं)।
- क्या सूचना मिलती है: मापी गई ज़मीन, जमा, सुयूरग़ाल, ज़मींदारों की जातियाँ और फ़ौज, फ़सलें या रीति–रिवाज।
- किसका नज़रिया: केंद्र का, समाज के शीर्ष से देखा हुआ।
- सावधानी: जोड़ की ग़लतियाँ, सूबों के आँकड़ों में विषमता, और आगरा तक सीमित कीमतें–मज़दूरी।
- इतिहासकार का इस्तेमाल: इन आँकड़ों को गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के दस्तावेज़ों या ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से मिलाकर उस समय के समाज की तसवीर बनाना।
परियोजना कार्य (कोई एक)
और जानकारी चाहें तो इन्हें पढ़िए (पृष्ठ 223)
- सुमित गुहा, एनवायरनमेंट एंड एथिनीसिटी इन इंडिया; कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज (1999)।
- इरफान हबीब, द अग्रेरियन सिस्टम ऑफ मुग़ल इंडिया 1556–1707 (सेकंड एडिशन); ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू दिल्ली (1999)।
- डब्ल्यू.एच. मोरलेंड, इंडिया एट द डेथ ऑफ अकबर: एन इकोनॉमिक स्टडी; ओरियंटल, न्यू दिल्ली (1983, पुनर्मुद्रण)।
- तपन रायचौधरी एंड इरफान हबीब (संपा.), द कैम्ब्रिज इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया, वोल्यूम 1; ओरियंट लोंगमैन, न्यू दिल्ली (2004)।
- डीटमर रोथरमंड, एन इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया–फ्रॉम प्री-कोलोनियल टाइम्स टू 1991; राउटलेज, लंदन (1993)।
- संजय सुब्रह्मण्यम (संपा.), मनी एंड दि मार्केट इन इंडिया 1100-1700; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू दिल्ली (1994)।
आख़िरी जाँच✓ Stop complete
1पृष्ठ 221 की काल रेखा के अनुसार 1526 में पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराकर पहला मुग़ल बादशाह कौन बना?
1526 में दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बना। शेरशाह से हारकर हुमायूँ 1540–55 में सफ़ावी दरबार में प्रवासी बनकर रहा (पृष्ठ 221)।
2मुग़ल काल के राजस्व के दस्तावेज़ों में जमा और हासिल में क्या फ़र्क़ था?
जमा निर्धारित रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म, इसलिए दोनों को एक मत मानिए (पृष्ठ 213)।
3पृष्ठ 221 की काल रेखा के अनुसार 1765 में क्या हुआ?
1765 में बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपे गए। नादिरशाह का आक्रमण 1739 में हुआ, पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 में, और बहादुर शाह ज़फ़र 1857 में गद्दी से हटाए गए (पृष्ठ 221)।
शाबाश! आपने पूरा अध्याय पढ़ लिया और हर जाँच कर ली।