Chapter 10विद्रोही और राज

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NCERT — भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग III (कक्षा 12), अध्याय 10 (पृ. 258–285)।

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पढ़िए, क्रम लगाइए, नक्शे पर जोड़िए, सवाल पूछिए

शुरुआत

10 मई 1857 की दोपहर बाद मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया, और 11 मई को तड़के उनका एक जत्था दिल्ली में लाल क़िले के फाटक पर पहुँचा (पृ. 258)। अध्याय का नाम ही दो सवाल रखता है: "1857 का आंदोलन" कैसा था, और "उसके व्याख्यान", यानी किसने उसे किस नज़र से बयान किया (पृ. 258)। यह पेज किताब के हिस्सों के क्रम में चलता है: हर हिस्सा एक पड़ाव है, और हर पड़ाव के आख़िर में किताब के अंत वाले प्रश्नों में से वे हैं जो उसी पड़ाव से जुड़े हैं।

ब्रिटिश शासन "ताश के क़िले की तरह बिखर गया।"

— एक ब्रिटिश अफ़सर, मई-जून 1857 के बारे में — पृ. 260

अध्याय का रास्ता

  1. पहला सवाल, नाम के पहले हिस्से से: 1857 का आंदोलन कैसे फैला, कहाँ सबसे गहरा था, विद्रोही क्या चाहते थे, और उसे कैसे कुचला गया? (पड़ाव 1 से 4)
  2. दूसरा सवाल, नाम के दूसरे हिस्से से: उसके "व्याख्यान", यानी उस समय और बाद में उसे किसने, किस नज़र से दिखाया? (पड़ाव 3 की शुरुआत और पड़ाव 5)
  1. 1विद्रोह का ढर्राविद्रोह एक छावनी से दूसरी छावनी तक कैसे फैला, और उसके नेता कौन बने?पृ. 259–266
  2. 2अवध में विद्रोहअवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था?पृ. 266–270
  3. 3विद्रोही क्या चाहते थे?विद्रोहियों की अपनी आवाज़ कम क्यों बची, और जो बची, वह क्या कहती है?पृ. 270–275
  4. 4दमनअंग्रेज़ों ने विद्रोह को कैसे कुचला?पृ. 275–277
  5. 5विद्रोह की छवियाँहम 1857 के बारे में कैसे जानते हैं, और तसवीरें किसकी नज़र दिखाती हैं?पृ. 277–283

10 मई 1857, दोपहर बाद

"आगे" दबाइए और देखिए कि एक छावनी की हलचल दिल्ली के लाल क़िले तक कैसे पहुँची।

टेलीग्राफ़ लाइनयमुनागंगामेरठदिल्लीगंगा घाटी की ओरपश्चिम की ओरलाल क़िलानावों का पुलशहरयमुनादोपहर बादरात भरतड़केदिनरेखाचित्र
  1. 110 मई, दोपहर बाद

    मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। हलचल भारतीय सैनिकों की पैदल सेना से शुरू हुई, जल्द ही घुड़सवार फ़ौज और फिर शहर तक फैल गई (पृ. 258)।

  2. 210 मई

    शहर और आसपास के देहात के लोग सिपाहियों के साथ जुड़ गए। सिपाहियों ने शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा कर लिया, जहाँ हथियार और गोला-बारूद रखे थे (पृ. 258)।

  3. 310 मई

    इसके बाद उन्होंने गोरों पर निशाना साधा और उनके बंगले, साज़ो-सामान जलाने-फूँकने लगे। रिकॉर्ड दफ़्तर, जेल, अदालत, डाकखाने, सरकारी ख़ज़ाने — सरकारी इमारतें लूटकर तबाह की जाने लगीं (पृ. 258)।

  4. 410 मई

    शहर को दिल्ली से जोड़ने वाली टेलीग्राफ़ लाइन काट दी गई (पृ. 258)।

  5. 510 मई, अँधेरा होते ही

    सिपाहियों का एक जत्था घोड़ों पर सवार होकर दिल्ली की तरफ़ चल पड़ा (पृ. 258)।

  6. 611 मई, तड़के

    जत्था लाल क़िले के फाटक पर पहुँचा। रमज़ान का महीना था; बादशाह बहादुर शाह नमाज़ पढ़कर और सहरी खाकर उठे थे। उन्हें फाटक पर हो-हल्ला सुनाई दिया (पृ. 258)।

  7. 711 मई

    बाहर खड़े सिपाहियों ने बताया कि वे मेरठ के अंग्रेज़ पुरुषों को मारकर आए हैं, क्योंकि उन्हें गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूस दाँतों से खींचने के लिए मजबूर किया जा रहा था — "इससे हिंदू और मुसलमान, सबका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा" (पृ. 258)।

  8. 811 मई

    सिपाहियों का एक और जत्था दिल्ली में आ चुका था, शहर के आम लोग भी जुड़ने लगे। बहुत सारे यूरोपियन लोग मारे गए, दिल्ली के अमीरों पर हमले और लूटपाट हुई। दिल्ली अंग्रेज़ों के नियंत्रण से बाहर हो गई (पृ. 258)।

  9. 911 मई

    कुछ सिपाही दरबार का शिष्टाचार तोड़कर क़िले में घुस गए और बादशाह से आशीर्वाद माँगा। सिपाहियों से घिरे बहादुर शाह के पास बात मानने के सिवा कोई चारा नहीं था (पृ. 258)।

  10. 1012–13 मई और फिर

    12 और 13 मई को उत्तर भारत में शांति रही। पर जैसे ही ख़बर फैली कि दिल्ली पर विद्रोहियों का क़ब्ज़ा है और बहादुर शाह साथ हैं, गंगा घाटी की छावनियों और दिल्ली के पश्चिम की कुछ छावनियों में विद्रोह के स्वर तेज़ होने लगे (पृ. 259)।

अब विद्रोह को एक वैधता मिल गई, क्योंकि उसे मुग़ल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था (पृ. 258)।

सोचिए: सिपाही सबसे पहले दिल्ली ही क्यों गए?

जवाब देखिए

मेरठ के सिपाही फ़ौरन दिल्ली गए और उन्होंने बूढ़े मुग़ल बादशाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख़्वास्त की (पृ. 262)। विद्रोही ऐसे लोगों को नेता बनाना चाहते थे जो अंग्रेज़ों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे, और मुग़ल बादशाह दिल्ली के लाल क़िले में ही थे (पृ. 258, 262)। बादशाह के नाम पर चलने से विद्रोह को वैधता मिली (पृ. 258), और यह ख़बर फैलते ही कि दिल्ली पर विद्रोहियों का क़ब्ज़ा हो चुका है और बहादुर शाह ने समर्थन दे दिया है, गंगा घाटी की छावनियाँ भी उठ खड़ी हुईं (पृ. 259)।

किताब (पृ. 258) रास्ता नहीं बताती, इसलिए नक्शे पर सड़क और तार की लाइन अंदाज़े से खींची गई हैं। मेरठ के घुड़सवार सिपाही रात भर चले और 11 मई की सुबह यमुना पर बने नावों के पुल से होकर दिल्ली पहुँचे। दिल्ली का पास से दिखाया गया नक्शा रेखाचित्र है: शहर की दीवार, क़िला और पुल मोटे तौर पर बनाए गए हैं।

मेरठ से दिल्ली: सीधी रेखा में लगभग 60 किलोमीटर

Relief map, rivers and town points: Natural Earth (public domain); seven town points from Wikipedia coordinates.

नक्शे के लिए और पढ़िए
  • William Dalrymple, The Last Mughal: The Fall of a Dynasty, Delhi, 1857 (2006)
और जानिए टेलीग्राफ़ क्या था, और कैसे चलता था?

टेलीग्राफ़ यानी तार: तार में विद्युत धारा भेजकर दूर के शहर तक ख़बर पहुँचाने का तरीक़ा। 10 मई को मेरठ को दिल्ली से जोड़ने वाली टेलीग्राफ़ लाइन काट दी गई (पृ. 258), और विद्रोहियों ने टेलीग्राफ़ दफ़्तरों पर भी हमला किया (पृ. 259)।

तीन बातों में समझिए

  1. धारा सुई को मोड़ती हैजिस तार में धारा बहती है, वह पास रखी चुंबकीय सुई को मोड़ देता है। तार को कुंडली में लपेटने से यह असर बढ़ जाता है।
  2. धारा उलटी, तो सुई उलटीभेजने वाला हत्था एक या दूसरी ओर घुमाता। इससे धारा की दिशा बदलती, और दूसरे शहर में सुई बाएँ या दाएँ मुड़ती।
  3. बाएँ-दाएँ से अक्षरहर अक्षर के लिए इशारों का एक तय क्रम था, जैसे W: बायाँ, दायाँ, बायाँ, दायाँ।

दोहराइए: कक्षा 10 विज्ञान (NCERT), अध्याय "विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव"

अब ख़ुद चलाकर देखिए: दिल्ली से अंबाला तक तार

धरती: धारा यहीं से लौटती हैदिल्लीएक ही तारअंबालाबैटरीहत्थासुई

अंबाला की सुई के इशारे:

हत्था सीधा है: परिपथ अधूरा है, इसलिए धारा नहीं बहती और अंबाला की सुई बीच में रहती है।

अब आप भेजिए: W के लिए बायाँ, दायाँ, बायाँ, दायाँ।

असली मशीन

बाईं ओर मशीन सामने से, दाईं ओर पीछे से। हर नंबर नीचे की सूची से मिलाइए।

लकड़ी के बक्से में लगी सुई वाली टेलीग्राफ़ मशीन का पुराना चित्र। बाईं ओर मशीन सामने से: बीच में खड़ी सुई, नीचे हत्था। दाईं ओर वही मशीन पीछे से: तार की कुंडली, नीचे पेंचों की कतार, और धरती में जाता तार।
  1. हत्था (H) घुमाने पर ख़बर जाती है; सीधा रहे, तो मशीन ख़बर पाने के लिए तैयार रहती है।
  2. बैटरी के पेंच (N −, P +) बैटरी के दोनों सिरे यहाँ जुड़ते हैं।
  3. लाइन का पेंच (L) दूसरे शहर से आया तार यहाँ जुड़ता है।
  4. कुंडली (C) धारा इसमें चुंबकीय क्षेत्र बनाती है, जिससे सुई मुड़ती है।
  5. सुई बाएँ-दाएँ मुड़कर अक्षर बताती है।
  6. धरती का पेंच (E) यहाँ से एक तार ज़मीन में जाता है। धारा धरती के रास्ते लौटती है, और परिपथ पूरा होता है।

यह इंग्लैंड की मशीन है; कलकत्ता की लाइनों पर इससे भी सीधी-सादी सुई वाली मशीन चलती थी।

Engraving: Popular Science Monthly, vol. 3 (1873), public domain, via Wikimedia Commons.

भारत में तार

  1. 1851कलकत्ता से डायमंड हार्बर तक लाइन खुली
  2. 1854कलकत्ता से आगरा तक, लगभग 800 मील (लगभग 1,300 किलोमीटर), लाइन चालू
  3. 1856लाइनें लगभग 4,000 मील (लगभग 6,400 किलोमीटर) तक फैल चुकी थीं
  4. 1857विद्रोह में तार की लाइनें और टेलीग्राफ़ दफ़्तर निशाने पर आए (पृ. 258–259)

सोचिए: विद्रोहियों ने तार क्यों काटा, और टेलीग्राफ़ दफ़्तरों पर हमला क्यों किया?

जवाब देखिए

तार से अंग्रेज़ अफ़सर दूर के शहरों तक जल्दी ख़बर भेज पाते थे। लाइन कट जाने पर मेरठ की ख़बर तार से दिल्ली नहीं पहुँच सकती थी। साथ ही, उन दिनों गोरों से जुड़ी हर चीज़ और हर आदमी विद्रोहियों के निशाने पर था, और टेलीग्राफ़ दफ़्तर अंग्रेज़ी सरकार की इमारत था (पृ. 259)।

वीडियो देखिए

Working of a Telegraph - PhysicsPlayढाई मिनट
Elearnin: मोर्स वाला टेलीग्राफ़: चाबी दबाने से बैटरी, तार और धरती का परिपथ पूरा होता है, और दूसरी ओर का विद्युत-चुंबक "क्लिक" करता है।

ऊपर की मशीन में सुई मुड़ती थी; इस वीडियो में सुई की जगह "क्लिक" है। विज्ञान दोनों का एक ही है: धारा का चुंबकीय प्रभाव।

पुराने स्रोत (अंग्रेज़ी में)

1विद्रोह का ढर्रा

इस पड़ाव का सवाल

मेरठ के बाद विद्रोह इतनी तेज़ी से कैसे फैला, और हर जगह एक जैसे ढर्रे पर क्यों चला?

पिछली बात से कड़ी मेरठ के सिपाही सीधे दिल्ली गए और बादशाह से आशीर्वाद माँगा (पृ. 258)। पुस्तक कहती है: "इस विद्रोह ने एक वैधता हासिल कर ली क्योंकि अब उसे मुग़ल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था" (पृ. 258)।

  1. 1.1सैन्य विद्रोह कैसे शुरू हुए
  2. 1.2संचार के माध्यम
  3. 1.3नेता और अनुयायी
  4. 1.4अफ़वाहें और भविष्यवाणियाँ
  5. 1.5लोग अफ़वाहों में विश्वास क्यों कर रहे थे?

इस पड़ाव के आख़िर में: किताब के प्रश्न 1, 2, 3

1.1सैन्य विद्रोह कैसे शुरू हुएपृ. 259–260

अगर इन विद्रोहों को तारीख़ के हिसाब से सिलसिलेवार रखें, तो लगता है कि जैसे-जैसे ख़बर एक शहर से दूसरे शहर पहुँची, वैसे-वैसे सिपाही हथियार उठाते गए। और हर छावनी में घटनाओं का क्रम कमोबेश एक जैसा था (पृ. 259)।

पहले पढ़िए: एक छावनी में विद्रोह कैसे चलता था (पृ. 259)

विद्रोह एक संकेत से शुरू होता था: कई जगह शाम के समय तोप का गोला दाग़ा गया, तो कहीं बिगुल बजा। सिपाहियों ने सबसे पहले शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा किया और सरकारी ख़ज़ाना लूटा। इसके बाद जेल, ख़ज़ाने, टेलीग्राफ़ दफ़्तर, रिकॉर्ड रूम और बंगलों पर हमले हुए, और सारे रिकॉर्ड जला दिए गए। शहरों में हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में अपीलें लगाई गईं कि हिंदू-मुसलमान सब एकजुट हों। जब आम लोग भी साथ आने लगे, तो हमलों का दायरा बढ़ा: लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे शहरों में साहूकार और अमीर भी निशाने पर आए (पृ. 259)।

अब क्रम में लगाइए: हर छावनी का एक जैसा ढर्रा

जो सबसे पहले हुआ, उसे सबसे ऊपर रखिए। अटकें, तो ऊपर का अंश फिर पढ़िए।

▲ पहले

  1. 1जेल, टेलीग्राफ़ दफ़्तर, रिकॉर्ड रूम और बंगलों पर हमला; सारे रिकॉर्ड जलाए
  2. 2संकेत: शाम की तोप दाग़ी गई, या बिगुल बजा
  3. 3आम लोग भी साथ आए: लखनऊ, कानपुर, बरेली में साहूकार और अमीर भी निशाने पर
  4. 4शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा, सरकारी ख़ज़ाना लूटा

▼ बाद में

सोचिए: पहले शस्त्रागार और ख़ज़ाना ही क्यों?

जवाब देखिए

लड़ने के लिए सबसे पहले हथियार और गोला-बारूद चाहिए, और वे शस्त्रागार में बंद रहते थे। ख़ज़ाने पर क़ब्ज़े से पैसा विद्रोहियों के हाथ आता और अंग्रेज़ों के हाथ से निकल जाता। हथियार और पैसा पास हो, तभी आगे की लड़ाई चल सकती थी।

सोचिए: रिकॉर्ड क्यों जलाए गए?

जवाब देखिए

रिकॉर्ड रूम में अंग्रेज़ी सरकार के काग़ज़ रहते थे, और उन दिनों गोरों से जुड़ी हर चीज़ और हर आदमी विद्रोहियों के निशाने पर था (पृ. 259)। गाँवों में विद्रोहियों ने साहूकारों के बहीखाते भी जलाए। किताब इसे ऊँच-नीच के पुराने ढाँचे को उलटने की कोशिश मानती है (पृ. 274)।

सैनिक विद्रोह से जन विद्रोह (पृ. 259)

सिपाहियों की क़तारों के छिटपुट विद्रोहों ने जल्दी ही एक चौतरफ़ा विद्रोह का रूप ले लिया। शासन की सत्ता और सोपानों की सरेआम अवहेलना होने लगी।

अख़बार पढ़िए: दिल्ली उर्दू अख़बार, 14 जून 1857 (पृ. 260)

विद्रोह के महीनों में शहरों में आम ज़िंदगी कैसी थी? दिल्ली के एक अख़बार की दो रिपोर्टें पढ़िए। किताब याद दिलाती है कि अख़बार की ख़बरें अक्सर पत्रकार की सोच से रंगी होती हैं। तो हर टुकड़े को छाँटिए: यह देखी-सुनी बात है, या लिखने वाले की राय और डर?

यही हालात सब्ज़ियों और साग (पालक) के भी हैं। लोग इस बात पर शिकायत कर रहे हैं कि बाज़ारों में कद्दू और बैंगन तक नहीं मिलते। …

… यहाँ एक और चीज़ पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे लोगों को बड़ा नुकसान हो रहा है। मामला यह है कि पानी भरने वालों ने पानी भरना बंद कर दिया है। …

हर टुकड़े को सही डिब्बे में डालिए, या टैप करके डिब्बे पर टैप कीजिए।

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • अख़बार बाज़ार की तंगी दर्ज करता है: कद्दू और बैंगन तक नहीं मिलते, और आलू-अरबी मिलें भी तो बासी और सड़ी (पृ. 260)।
  • वह सब्ज़ी बेचने वालों (कुँजड़ों) पर माल रोककर रखने का दोष लगाता है, यानी आम दुकानदारों को शक की नज़र से देखता है (पृ. 260)।
  • उसकी हमदर्दी ग़रीब शुरफ़ा (शरीफ़ लोग) के साथ है, जिन्हें पानी भरने वालों के काम बंद कर देने पर ख़ुद घड़ों में पानी लाना पड़ रहा है (पृ. 260)।
  • उसकी भाषा में ग़ुस्सा है: "हलालख़ोर हरामख़ोर हो गए हैं" (पृ. 260)।
  • कुल मिलाकर अख़बार आम लोगों के काम छोड़ने को अव्यवस्था की तरह देखता है और डरता है कि शहर महामारी की गिरफ़्त में आ जाएगा (पृ. 260)।

1.2संचार के माध्यमपृ. 260–261

अलग-अलग जगहों पर विद्रोह का ढर्रा एक जैसा क्यों था? पुस्तक कहती है: कुछ हद तक इसलिए कि उसकी योजना और समन्वय था। साथ ही, विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छा संचार बना हुआ था (पृ. 260)।

एक पलटन से दूसरी पलटन तक (पृ. 260)

सातवीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी48 नेटिव इन्फेंट्री

मई 1857 की शुरुआत

चिट्ठी खोलिए

"हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फ़ैसला लिया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतज़ार कर रहे हैं।"

कौन-सा फ़ैसला? नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार। सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे (पृ. 260)।

सिस्टन और तहसीलदार (पृ. 261)

सीतापुर के देसी ईसाई पुलिस इंसपेक्टर फ्रांसवाँ सिस्टन, मजिस्ट्रेट से मिलने सहारनपुर गए थे। वे हिंदुस्तानी कपड़े पहने थे और आलथी-पालथी मारकर बैठे थे। तभी बिजनौर का एक मुस्लिम तहसीलदार कमरे में आया। उसे पता चला कि सिस्टन अवध में तैनात हैं।

  1. बिजनौर का तहसीलदार"क्या ख़बर है अवध की? काम कैसा चल रहा है?"
  2. फ्रांसवाँ सिस्टन"अगर अवध में काम मिलता है तो जनाब-ए-आली को भी पता चल जाएगा।"
  3. बिजनौर का तहसीलदार"भरोसा रखो, इस बार हम कामयाब होंगे। मामला काबिल हाथों में है।"

बाद में पता चला कि यह तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता था (पृ. 261)।

सुराग़ ढूँढिए

किताब पूछती है: तहसीलदार ने सिस्टन को संभावित विद्रोही क्यों मान लिया? ऊपर के ब्योरे में से वे बातें चुनिए जो उसे भरोसा दिला सकती थीं।

पुस्तक सीधा जवाब नहीं छापती; ये तीन सुराग़ उसी के ब्योरे में हैं। और यह भी देखिए कि बातचीत में "विद्रोह" शब्द एक बार भी नहीं आया — बात इशारों में हुई।

किताब पूछती है (पृ. 261): "विद्रोही अपनी योजनाओं को किस तरह एक-दूसरे तक पहुँचाते थे, इस बारे में इस बातचीत से क्या पता चलता है?"

जवाब देखिए

पृ. 261 पर दोनों की बातें फिर पढ़िए। तहसीलदार पूछता है "क्या ख़बर है अवध की? काम कैसा चल रहा है?", सिस्टन कहता है "अगर हमें अवध में काम मिलता है तो जनाब-ए-आली को भी पता चल जाएगा।", और तहसीलदार भरोसा दिलाता है "मामला क़ाबिल हाथों में है।" (पृ. 261)। इस बातचीत में विद्रोह को "काम" और "मामला" कहा गया है: बात खुलकर नहीं, इशारों में होती थी, और योजना आदमी से आदमी तक ज़बानी पहुँचती थी। किताब यह भी बताती है कि सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे (पृ. 260), और यही तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता निकला (पृ. 261)।

रात की पंचायतें (पृ. 261)

अवध मिलिट्री पुलिस के कैप्टेन हियर्से की सुरक्षा भारतीय सिपाहियों के ज़िम्मे थी। वहीं तैनात 41वीं नेटिव इन्फेंट्री चाहती थी कि मिलिट्री पुलिस हियर्से को मार दे, या उसे गिरफ़्तार करके 41वीं नेटिव इन्फेंट्री के हवाले कर दे। मिलिट्री पुलिस ने दोनों बातें ठुकरा दीं, और तय हुआ कि हर रेजीमेंट के देशी अफ़सरों की पंचायत यह मामला सुलझाएगी। विद्रोह के शुरुआती इतिहासकारों में से एक, चार्ल्स बॉल ने लिखा है कि ये पंचायतें रात को कानपुर की सिपाही लाइनों में जुटती थीं।

सिपाही लाइनों में साथ रहते थे, उनकी जीवनशैली एक जैसी थी और बहुत से एक ही जाति के थे — इसलिए वे इकट्ठा बैठकर फ़ैसले ले रहे होंगे। पुस्तक का निष्कर्ष: "ये सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता ख़ुद ही थे।"

1.3नेता और अनुयायीपृ. 262–263

दिल्ली: बादशाह और उनका शहर

बूढ़े बहादुर शाह, सफ़ेद दाढ़ी, चारपाई पर तकियों के सहारे लेटे हुए; मुँह में हुक़्क़े की नली।

बहादुर शाह, मई 1858: जिन बादशाह के नाम पर 1857 में सिपाहियों ने विद्रोह चलाया (पृ. 258), दिल्ली पर अंग्रेज़ों का फिर से क़ब्ज़ा होने के बाद वे उनकी क़ैद में थे। तभी यह फ़ोटो खींची गई: चारपाई पर लेटे बादशाह, सामने हुक़्क़ा। पृ. 258 पर चित्र 10.1 में बादशाह की तसवीर से इसे मिलाइए: दोनों में वे कैसे दिखते हैं? बाद में अंग्रेज़ों ने उन्हें रंगून भेज दिया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हुई।

Photograph by Tytler and Shepherd, Delhi, May 1858; British Library. Wikimedia Commons, public domain.

पुरानी दिल्ली की एक सजी हुई हवेली: नक़्क़ाशीदार छज्जे और जालियाँ, नीचे दुकानें और चबूतरे पर बैठे कुछ लोग।

चाँदनी चौक, लगभग 1858: पुरानी दिल्ली का बड़ा बाज़ार: नक़्क़ाशीदार हवेली, ऊपर जालीदार छज्जे, नीचे दुकानें। 1857 की गर्मियों में यही शहर बादशाह और विद्रोही सिपाहियों का केंद्र था।

Photograph by Felice Beato, Delhi, about 1858; Victoria and Albert Museum. Wikimedia Commons, public domain.

और जानिए लगता नहीं है दिल मिरा: ज़फ़र के नाम से मशहूर ग़ज़ल

बहादुर शाह शायर भी थे। वे ‘ज़फ़र’ नाम से लिखते थे, जिसका मतलब है जीत। नीचे की ग़ज़ल उन्हीं के नाम से पूरे उपमहाद्वीप में मशहूर है। एक-एक शेर पढ़िए, कठिन शब्द देखिए, फिर मतलब खोलिए। पर पहले जानिए कि ग़ज़ल बनती कैसे है।

ग़ज़ल कैसे बनती है

शेर
दो पंक्तियों में कही गई एक पूरी बात। ग़ज़ल का हर शेर अपने-आप में पूरा होता है।
मतला
ग़ज़ल का पहला शेर। इसकी दोनों पंक्तियाँ एक ही तुक पर ख़त्म होती हैं।
मक़ता
आख़िरी शेर, जिसमें शायर अपना क़लमी नाम रखता है। यहाँ वह नाम है ‘ज़फ़र’।
रदीफ़
आख़िर में बार-बार लौटने वाला शब्द: मतले की दोनों पंक्तियों के अंत में, फिर हर शेर की दूसरी पंक्ति के अंत में। यहाँ ‘में’, जो रंगीन मोटे अक्षरों में है।
क़ाफ़िया
रदीफ़ से ठीक पहले आने वाली तुक: दयार, ना-पाएदार, दाग़-दार, बहार, यार। इनके नीचे रेखा खींची गई है।
  1. मतला

    लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार मेंकिस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

    • दयार देश, इलाक़ा, बस्ती
    • आलम दुनिया
    • ना-पाएदार जो टिके नहीं
    • किस की बनी है कौन फला-फूला है?
    मतलब देखिए

    उजड़ी हुई बस्ती में मेरा मन नहीं लगता। और इस दुनिया में, जहाँ कुछ भी टिकता नहीं, कौन सदा फला-फूला है? पहली पंक्ति में अपना दुख है, दूसरी में पूरी दुनिया का सच। शायर अपने दुख को सबके दुख से जोड़ देता है।

  2. इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसेंइतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में

    • हसरत अधूरी रह गई इच्छा
    • दाग़ घाव का निशान
    • दिल-ए-दाग़-दार घावों से भरा दिल
    मतलब देखिए

    मेरी अधूरी इच्छाओं से कह दो कि कहीं और जाकर बस जाएँ। मेरे दिल में पहले ही इतने घाव हैं कि उनके लिए जगह नहीं बची। देखिए, इच्छाओं को यहाँ ऐसे लोगों की तरह बताया गया है जो रहने के लिए घर ढूँढ़ रहे हों।

  3. काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में

    • चमन बाग़
    • बाग़बाँ माली
    • गुल फूल
    • बहार वसंत
    मतलब देखिए

    ऐ माली, बाग़ से काँटों को मत उखाड़ो। ये भी फूलों के साथ उसी वसंत में पले-बढ़े हैं। जिन्हें दुनिया बेकार समझकर निकाल फेंकना चाहती है, उनका भी इस बाग़ पर हक़ है।

  4. बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिलाक़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में

    • सय्याद चिड़िया पकड़ने वाला, बहेलिया
    • गिला शिकायत
    • क़ैद पिंजरे में बंद होना
    • फ़स्ल-ए-बहार वसंत का मौसम
    मतलब देखिए

    बुलबुल को न माली से शिकायत है, न बहेलिए से। उसकी क़िस्मत में ही लिखा था कि ठीक वसंत में, जब उसे गाना था, वह पिंजरे में बंद होगी। शायर किसी पर दोष नहीं डालता; सारा दुख क़िस्मत पर छोड़ देता है।

  5. मक़ता

    कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिएदो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

    • बद-नसीब अभागा
    • दफ़्न क़ब्र में दफ़नाना
    • गज़ लंबाई का एक पुराना नाप
    • कू-ए-यार प्यारे की गली
    मतलब देखिए

    ज़फ़र कितना अभागा है: दफ़न होने के लिए उसे अपने प्यारे की गली में दो गज़ ज़मीन भी न मिली। यह शेर पढ़कर अपने वतन से दूर हुए आख़िरी मुग़ल बादशाह की याद आती है: उनकी मृत्यु 7 नवंबर 1862 को दिल्ली से बहुत दूर रंगून में हुई और उन्हें वहीं उसी दिन दफ़नाया गया। क़ब्र के ऊपर घास बिछाकर ज़मीन बराबर कर दी गई। धीरे-धीरे लोग उसकी ठीक जगह भूल गए; 1991 में नाली खोदते मज़दूरों को वह क़ब्र फिर मिली।

यह शेर भी ज़फ़र के नाम से जोड़ा जाता है, पर उनका नहीं है

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिनदो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

  • उम्र-ए-दराज़ लंबी उम्र
  • आरज़ू चाह, इच्छा
मतलब देखिए

माँगी थी लंबी उम्र, पर वह कुल चार दिन लेकर आई। दो दिन चाहतों में बीत गए, दो इंतज़ार में। यह शेर शायर सीमाब अकबराबादी की एक ग़ज़ल का है। उस ग़ज़ल की तुक भी (…ार में) वैसी ही है; शायद इसी से लोग इसे ज़फ़र की ग़ज़ल का हिस्सा समझ लेते हैं।

किसकी लिखी है यह ग़ज़ल?

यह ग़ज़ल ज़फ़र के नाम से ही मशहूर है। 1960 की फ़िल्म ‘लाल क़िला’ में मोहम्मद रफ़ी ने इसे गाया, और उससे पहले रेडियो सीलोन पर हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में यह लोकप्रिय हो चुकी थी। पर लाहौर के उर्दू-शोधकर्ता इमरान ख़ान और कई बड़े उर्दू विद्वानों ने इस पर शक जताया है: ज़फ़र के चारों छपे दीवानों (कविता-संग्रहों) में यह ग़ज़ल नहीं मिलती। रंगून में उन्हें क़लम-काग़ज़ तक नहीं दिया गया था। दिल्ली की क़ैद के दिनों के बारे में अंग्रेज़ पत्रकार रसेल ने इतना लिखा कि कुछ लोगों के मुताबिक़ बादशाह अपने शेर गुनगुनाते थे और जली हुई लकड़ी से दीवार पर शायरी लिखते थे। कौन-से शेर, यह कोई नहीं बताता। इसलिए पक्का कुछ नहीं कहा जा सकता।

सोचिए: अगर यह ग़ज़ल ज़फ़र ने न भी लिखी हो, तो भी लोगों ने इसे उन्हीं से क्यों जोड़ा होगा? पृ. 258–259 पर पढ़िए कि विद्रोहियों ने बादशाह से क्या चाहा था, और ऊपर की फ़ोटो में देखिए कि मई 1858 में वे कहाँ थे।

जवाब देखिए

1857 में सिपाहियों ने बहादुर शाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख़्वास्त की, और बादशाह का नाम जुड़ने से विद्रोह को वैधता मिली (पृ. 258, 262)। उनका समर्थन मिलने की ख़बर फैलते ही गंगा घाटी की छावनियाँ भी उठ खड़ी हुईं (पृ. 259)। पर ऊपर की फ़ोटो में, मई 1858 में, वही बादशाह अंग्रेज़ों की क़ैद में हैं। जिसके नाम पर इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी गई और जो आख़िर में क़ैदी बना, उससे क़ैद में पड़ी बुलबुल और दो गज़ ज़मीन को तरसते शायर वाली ग़ज़ल लोगों को अपने आप जुड़ती लगी होगी। ग़ज़ल किसने लिखी, यह सवाल फिर भी खुला रहता है।

ग़ज़ल कहाँ पढ़ें

नेता कौन, कहाँ? (पृ. 262)

नेता का नाम चुनिए, फिर नक्शे पर उसकी जगह (?) टैप कीजिए। सही जगह पर किताब बताएगी कि वह नेता कैसे बने।

यमुनागंगा?दिल्ली?कानपुर?झाँसी?आरा?लखनऊ?बड़ौत

  • बहादुर शाह (दिल्ली): मुग़ल बादशाह। ख़बर सुनकर वे डरे हुए और बेचैन दिखे; नाममात्र का नेता बनना भी तब माना जब सिपाही जबरन दरबार में घुस आए और कोई चारा नहीं बचा (पृ. 262)।
  • नाना साहिब (कानपुर): पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी। सिपाहियों और शहर के लोगों ने उनके सामने बग़ावत की बागडोर सँभालने के सिवा कोई विकल्प नहीं छोड़ा (पृ. 262)।
  • रानी लक्ष्मीबाई (झाँसी): झाँसी में रानी को आम जनता के दबाव में बग़ावत का नेतृत्व सँभालना पड़ा (पृ. 262)।
  • कुँवर सिंह (आरा): बिहार में आरा के स्थानीय ज़मींदार। उनकी भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी (पृ. 262)।
  • बिरजिस क़द्र (लखनऊ): नवाब वाजिद अली शाह के युवा बेटे। लखनऊ में ब्रिटिश राज के ढहने की ख़बर पर लोगों ने उन्हें अपना नेता घोषित कर दिया (पृ. 262)।
  • शाह मल (बड़ौत): उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना के गाँव वालों को संगठित किया (पृ. 262)। दरबार से नहीं, गाँव से उभरे नेता।

मेरठ से ख़बरें आ रही थीं कि हाथी पर सवार एक फ़क़ीर से सिपाही बार-बार मिलने जाते थे; लखनऊ में धार्मिक नेता और स्वयंभू पैगम्बर-प्रचारक ब्रिटिश राज को मिटाने का अलख जगा रहे थे। छोटा नागपुर के सिंहभूम में आदिवासी काश्तकार गोनू ने इलाके के कोल आदिवासियों का नेतृत्व सँभाला (पृ. 262)।

Relief map, rivers and town points: Natural Earth (public domain); seven town points from Wikipedia coordinates.

दाढ़ी वाले एक आदमी का रेखाचित्र: रत्नों और कलगी वाली पगड़ी, कढ़ाईदार अंगरखा, कमरबंद में खुँसी कटार, हाथ तलवार की मूठ पर; पीछे मीनार, गुंबद और खजूर का पेड़।

नाना साहिब, लंदन के एक अख़बार में, 1857: लंदन के एक सचित्र अख़बार ने 26 सितंबर 1857 को नाना साहिब की यह तसवीर एक भेजे गए रेखाचित्र के आधार पर छापी। किताब (पृ. 262, चित्र 10.4) बताती है कि 1858 के अंत में विद्रोह विफल होने पर नाना साहिब भागकर नेपाल चले गए, और उनके भागने की कहानी उनके साहस और बहादुरी के क़िस्सों का हिस्सा बन गई।

The Illustrated London News, 26 September 1857 (from a sketch received by Major Gandini). Image: Wikimedia Commons, public domain.

1857 के दो विद्रोही (पृ. 263)

कार्ड पलटिए। पहले अंदाज़ा लगाइए कि वे लोगों को कैसे जोड़ते थे।

शाह मल ने पुल और सड़कें क्यों तोड़ीं? (पृ. 263)

पुस्तक दो कारण देती है: एक, वे सरकारी फ़ौजों का रास्ता रोकना चाहते थे; दो, पुल और सड़कें ब्रिटिश शासन का प्रतीक मानी जाती थीं।

चर्चा कीजिए (पृ. 265)

ऊपर के नेताओं को दो ढेरियों में बाँटकर देखिए: जो पुराने दरबारों से आए, और जो आम लोगों के बीच से उभरे (पृ. 262)।

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • समानता: कई जगह नेता ख़ुद आगे नहीं आए, उन्हें आगे किया गया। मेरठ के सिपाहियों ने बूढ़े हो चुके मुग़ल बादशाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख़्वास्त की, और झाँसी में रानी को आम जनता के दबाव में बग़ावत का नेतृत्व सँभालना पड़ा (पृ. 262)।
  • समानता: विद्रोही उन लोगों की ओर मुड़े जो अंग्रेज़ों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे, जैसे कानपुर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब और लखनऊ में नवाब के युवा बेटे बिरजिस क़द्र (पृ. 262)।
  • भिन्नता: हर नेता दरबार से नहीं आया। विद्रोह का संदेश आम लोगों और धार्मिक लोगों के ज़रिये भी फैला: मेरठ से ख़बरें थीं कि हाथी पर सवार एक फ़क़ीर से सिपाही बार-बार मिलने जाते थे, और लखनऊ में स्वयंभू पैग़ंबर-प्रचारक ब्रिटिश राज को नेस्तनाबूद करने का अलख जगा रहे थे। बड़ौत परगना में शाह मल और सिंहभूम में आदिवासी काश्तकार गोनू जैसे स्थानीय नेता भी उभरे (पृ. 262)।
  • शाह मल के इलाक़े में लगान की दर ज़्यादा और वसूली सख़्त थी, और व्यापारी और महाजन ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करते जा रहे थे; उन्होंने रात में गाँव-गाँव जाकर मुखियाओं और काश्तकारों को संगठित किया (पृ. 263)।
  • मौलवी अहमदुल्ला शाह गाँव-गाँव जाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जिहाद का प्रचार करते थे; हज़ारों लोग उनके पीछे चलते थे, बहुत सारे मुसलमान उन्हें पैग़ंबर मानने लगे थे, और लोग मानते थे कि उनके पास जादुई शक्तियाँ हैं (पृ. 263)।

1.4अफ़वाहें और भविष्यवाणियाँपृ. 264

मेरठ से आए सिपाहियों ने बहादुर शाह को उन कारतूसों के बारे में बताया था जिन पर गाय और सुअर की चर्बी का लेप लगा था, और यह बात उत्तर भारत की छावनियों में "जंगल की आग की तरह" फैलती चली गई (पृ. 264)। इस टॉपिक में देखिए कि और कौन-सी अफ़वाहें और भविष्यवाणियाँ चल रही थीं।

दम दम का पानी का लोटा (पृ. 264)

राइफ़ल इंस्ट्रक्शन डिपो के कमांडेंट कैप्टेन राइट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा: जनवरी 1857 के तीसरे हफ़्ते में दम दम के शस्त्रागार में काम करने वाले "नीची जाति" के एक खलासी ने एक ब्राह्मण सिपाही से पानी माँगा।

  1. ब्राह्मण सिपाहीब्राह्मण सिपाही ने मना कर दिया: "नीची जाति" के छूने से लोटा अपवित्र हो जाएगा।
  2. खलासी"(वैसे भी) जल्दी ही तुम्हारी जाति भ्रष्ट होने वाली है क्योंकि अब तुम्हें गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुँह से खींचना पड़ेगा।"

पुस्तक की सावधानी: इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता के बारे में कहना मुश्किल है। पर इसमें शक नहीं कि एक बार अफ़वाह फैली तो अंग्रेज़ अफ़सरों के तमाम आश्वासनों के बाद भी ख़त्म नहीं हुई, और सिपाहियों में गहरा ग़ुस्सा पैदा हुआ (पृ. 264)।

सिपाहियों का इशारा एन्फ़ील्ड राइफ़ल के उन कारतूसों की तरफ़ था जो हाल ही में उन्हें दिए गए थे (पृ. 264)। चित्र 10.5 का कैप्शन बताता है कि गवर्नर जनरल हार्डिंग ने सैनिक साज़ो-सामान के आधुनिकीकरण में ये राइफ़लें शुरू कीं।

काले कोट में खड़े सफ़ेद बालों वाले एक अंग्रेज़ अफ़सर, सीने पर सितारे जैसा तमग़ा, कमर पर तलवार; पीछे मैदान में एक तोप और तंबू।

हेनरी हार्डिंग, फ़्रांसेस ग्रांट का बनाया चित्र: इन्हीं हार्डिंग के चित्र 10.5 (पृ. 264) का कैप्शन एन्फ़ील्ड राइफ़लों की बात करता है। पीछे मैदान में तोप और तंबू देखिए: चित्रकार उन्हें एक फ़ौजी अफ़सर के रूप में दिखा रहा है।

Francis Grant, Henry Hardinge, 1st Viscount Hardinge; National Portrait Gallery, London. Image: Wikimedia Commons, public domain.

और जानिए राइफ़ल और कारतूस, चित्र में हिस्से पहचानिए

एन्फ़ील्ड राइफ़ल

काली पृष्ठभूमि पर आड़ी रखी लंबी राइफ़ल: बाईं ओर लकड़ी का कुंदा, बीच में घोड़ा और ट्रिगर, दाईं ओर लंबी नाल का मुँह।
  1. नाल का मुँह राइफ़ल यहीं से भरी जाती थी: पहले बारूद, फिर गोली।
  2. गज़ नाल के नीचे लगी धातु की लंबी छड़। इसे निकालकर गोली को नाल में नीचे तक ठेला जाता था।
  3. घोड़ा इसके ठीक नीचे की धातु की प्लेट पर इस राइफ़ल के बनने का साल "1863" खुदा है।
  4. लिबलिबी (ट्रिगर) इसे दबाने पर राइफ़ल चलती थी।
  5. शिस्त निशाना लगाने के लिए; इसे मोड़कर नीचे किया जा सकता था।
  6. कुंदा लकड़ी का पिछला हिस्सा, जिसे कंधे से टिकाया जाता था।

यह राइफ़ल 1863 में बनी, पर इसका नमूना वही "पैटर्न 1853" एन्फ़ील्ड है जिसके कारतूसों पर 1857 में झगड़ा हुआ। भरते समय सिपाही कारतूस का सिरा फाड़ता, बारूद नाल में डालता, फिर गोली रखता और गज़ से उसे नीचे तक ठेल देता।

Enfield Pattern 1853 rifle-musket, made 1863. Collection of the Smithsonian National Museum of African American History and Culture, CC0.

उसका कारतूस

काग़ज़ के कारतूस का पुराना रेखाचित्र: बाईं ओर पूरा कारतूस, ऊपर मुड़ा हुआ सिरा और नीचे गहरे रंग का हिस्सा; दाईं ओर बीच से काटकर दिखाया गया भीतरी भाग, ऊपर बारूद और नीचे गोली।
  1. मुड़ा हुआ सिरा भरते समय सबसे पहले यही सिरा खोला जाता था। सिपाहियों से कहा गया था कि इसे दाँतों से खींचें (पृ. 258, 264)।
  2. बारूद काग़ज़ की नली में भरा बारूद, गोली से अलग।
  3. गोली पीछे से खोखली गोली।
  4. लकड़ी की डाट गोली के खोखले हिस्से में लगी छोटी-सी डाट।
  5. चिकनाई वाला हिस्सा गोली वाला सिरा चिकनाई में डुबोया जाता था, इसलिए उसका रंग गहरा है। 1850 के दशक के एक अंग्रेज़ी फ़ौजी निर्देश में चिकनाई का नुस्ख़ा है: छह हिस्से चर्बी (टैलो) और एक हिस्सा मधुमक्खी का मोम। अफ़वाह यह थी कि इसमें गाय और सुअर की चर्बी है (पृ. 264)।

यह रेखाचित्र 1859 की एक अंग्रेज़ी किताब का है। दाईं ओर वही कारतूस बीच से काटकर दिखाया गया है।

Drawing by Arthur Briscoe Hawes, Rifle Ammunition (1859). Wikimedia Commons, public domain.

चर्बी: सच क्या था?

अफ़वाह कहती थी कि कारतूस की चिकनाई में गाय और सुअर की चर्बी है। उस समय के सरकारी काग़ज़ों और गवाहियों से जो पता चलता है, वह एक-एक करके पढ़िए।

  1. नुस्ख़ा

    चिकनाई थी: छह हिस्से टैलो (जानवरों की चर्बी) और एक हिस्सा मधुमक्खी का मोम। मार्च 1857 में कलकत्ता के एक कोर्ट-मार्शल में गोला-बारूद महकमे के अफ़सर ने यही बताया, और यह भी कि "चर्बी किस जानवर की है, यह पूछा ही नहीं जाता।"

  2. ठेकेदार

    सरकार की अपनी रिपोर्ट ने माना कि चर्बी एक ठेकेदार से ली गई थी और यह पक्का करने की पूरी सावधानी नहीं बरती गई कि उसमें कोई आपत्ति वाली चीज़ न हो। महकमे के सबसे बड़े अफ़सर ने गवाही दी कि उसमें गाय या दूसरे जानवरों की चर्बी "हो भी सकती थी, नहीं भी।"

  3. 27 जनवरी 1857

    दमदम की रिपोर्ट (पृ. 264) के बाद सरकार ने तय किया कि चिकनाई का सामान बाज़ार से ख़रीदा जाए और सिपाही अपने कारतूस ख़ुद चिकने करें। चिकने कारतूस वापस लिए गए, सादे दिए गए। दमदम के सिपाहियों ने ख़ुद यही माँगा था: सामान बाज़ार से लाने दीजिए, चिकनाई हम बना लेंगे।

  4. क्या बँटे?

    मार्च 1857 तक शस्त्रागार से ये नए कारतूस किसी भी पलटन को नहीं दिए गए थे; वे सिर्फ़ ट्रेनिंग के डिपो और एक अंग्रेज़ पलटन के लिए दिल्ली के गोदाम भेजे गए थे। डिपो की ट्रेनिंग में भी 10 मई तक किसी सिपाही ने चिकना कारतूस हाथ में नहीं लिया।

  5. मेरठ, 24 अप्रैल

    परेड में दिखाना था कि कारतूस दाँत से काटे बिना भी भरा जा सकता है। फिर भी तीसरी घुड़सवार पलटन के 85 सिपाहियों ने कारतूस लेने से मना कर दिया। बाद की जाँच ने पाया कि उन कारतूसों पर कोई चिकनाई नहीं थी; वे वैसे ही थे जैसे तीस-चालीस साल से चलते आ रहे थे।

  6. फ़ैसला

    आज भी पक्का पता नहीं। इतिहासकार जॉन केय (1864) ने लिखा कि सुअर की चर्बी तो नहीं दी गई, पर कुछ गाय-बैल की चर्बी ज़रूर इस्तेमाल हुई, और यह "एक चूक" थी। किम वैगनर (2010) लिखते हैं कि फ़ौज को ख़ुद नहीं पता था कि चर्बी किस जानवर की है, और "सच यही है कि हम पक्का नहीं जानते।" पुस्तक भी कहती है कि रिपोर्ट कितनी सच थी, हम नहीं जानते (पृ. 264)।

तो असली बात यह थी: चिकनाई में किस जानवर की चर्बी है, यह अंग्रेज़ अफ़सर ख़ुद पक्के तौर पर नहीं जानते थे। और एक बार अफ़वाह फैली, तो आश्वासनों से नहीं मिटी (पृ. 264): मेरठ में पुराने, बिना चिकनाई वाले कारतूस भी शक से नहीं बचे।

पुराने स्रोत (अंग्रेज़ी में)

अगले टॉपिक में किताब ख़ुद पूछती है: लोग इन अफ़वाहों पर विश्वास क्यों कर रहे थे (पृ. 265)?

1.5लोग अफ़वाहों में विश्वास क्यों कर रहे थे?पृ. 265–266

गाँव-गाँव चपाती (पृ. 265)

उत्तर भारत के कई हिस्सों से ख़बरें आ रही थीं कि गाँव-गाँव चपातियाँ बँट रही हैं। बताते हैं कि रात में एक आदमी आता, गाँव के चौकीदार को एक चपाती देता और कह जाता कि पाँच और चपातियाँ बनाकर अगले गाँवों तक पहुँचा दी जाएँ। "और यह सिलसिला यूँ ही चलता जाता था।"

पुस्तक कोई गिनती नहीं देती, इसलिए मान लीजिए कि हर गाँव अगली ही रात पाँच नए गाँवों तक चपाती भेज देता है। अब "अगली रात" दबाकर गिनिए।

पहला गाँव
  1. रात 11 गाँव
  2. रात 25 नए गाँव
  3. रात 325 नए गाँव
  4. रात 4125 नए गाँव

अब तक कुल 1 गाँवअब तक कुल 6 गाँवअब तक कुल 31 गाँवअब तक कुल 156 गाँव

सिर्फ़ चार रातों में 156 गाँव! अगर हर रात नए गाँव पाँच गुना होते, तो चपाती बहुत जल्दी दूर-दूर तक पहुँच जाती। पर क्या सचमुच ऐसा हुआ? नीचे देखिए।

उस समय के काग़ज़ों में क्या दर्ज है?

उन दिनों के अंग्रेज़ अफ़सरों की चिट्ठियाँ और रिपोर्टें आज भी पढ़ी जा सकती हैं। उनसे कुछ बातें साफ़ पता चलती हैं।

  1. शुरुआत

    सबसे पहली लिखी हुई ख़बर 12 जनवरी 1857 की है, निमाड़ ज़िले के मंडलेश्वर क़स्बे से। वहाँ के अंग्रेज़ अफ़सर ने लिखा कि चपातियाँ इंदौर की तरफ़ से आ रही हैं, जहाँ उन दिनों हैज़ा ज़ोरों पर था।

  2. गिनती

    पाँच वाला हिसाब हर जगह एक-सा नहीं था। गुड़गाँव में चौकीदार पाँच-छह चपातियाँ और बनवाता था। बदायूँ में दो आतीं, छह नई बनतीं, दो अपने पास रहतीं और बाक़ी अगले गाँव जातीं। अवध की सीमा पर दस बनवाई गईं, ताकि पास के पाँच गाँवों को दो-दो मिल सकें।

  3. रफ़्तार

    आगरा के कमिश्नर ने दावा किया कि चपातियाँ एक रात में 160 से 200 मील चल लेती हैं। पर उनकी अपनी दी हुई मिसाल से रफ़्तार एक रात में 100 मील से भी कम बैठती है।

  4. कहाँ तक

    उत्तर की ओर चपातियाँ मेरठ तक पहुँचीं। वे एक सीधी लहर में नहीं फैलीं: कहीं तेज़ चलीं, कहीं रुककर फिर चलीं, और कहीं सिलसिला वहीं ठंडा पड़ गया।

  5. चौकीदार

    चौकीदारों को ख़ुद नहीं पता था कि चपाती किसलिए है या कहाँ से आई। बहुत-से लोग मान रहे थे कि यह सरकार का हुक्म है। बुलंदशहर से दिल्ली चपाती लाने वाले चौकीदारों ने पूछने पर यही कहा।

  6. अफ़सर

    दिल्ली के जॉइंट मजिस्ट्रेट थियोफ़िलस मेटकाफ़ इस नतीजे पर पहुँचे: "इनके बारे में अंदाज़ों के सिवा कुछ नहीं है।"

ऊपर आपने जो 1 → 5 → 25 गिना, ठीक वही हिसाब मार्च 1857 की शुरुआत में अंग्रेज़ी अख़बार "द फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया" ने छापा था: एक चौकीदार से पाँच, पाँच से पच्चीस। पर अफ़सरों की रिपोर्टें बताती हैं कि असली फैलाव इतना नपा-तुला नहीं था।

लोगों ने इनके क्या-क्या मतलब निकाले?

  • निमाड़ में, जनवरी 1857

    बीमारी भगाने का टोटका: चपातियों पर मंतर पढ़कर उन्हें आगे भेजा जाता, ताकि हैज़ा भी उनके साथ गाँव से चला जाए।

  • एक ख़बरनवीस, बादशाह के मुक़दमे में

    जाट मल ने बताया कि कुछ लोग इसे आने वाली किसी विपदा को टालने की रस्म मानते थे। कुछ कहते थे कि सरकार जताना चाहती है कि सबको ईसाइयों जैसा खाना खाना पड़ेगा और धर्म छिन जाएगा।

  • पुस्तक, पृ. 265

    मतलब किसी को साफ़ नहीं था, फिर भी लोग इसे किसी आने वाली उथल-पुथल का संकेत मान रहे थे।

और कमल के फूल?

कुछ किताबों में लिखा मिलता है कि चपातियों के साथ-साथ कमल के फूल भी हाथों-हाथ घुमाए गए। यह बात 1858–59 में लंदन में छपी किताबों से आई, और उनमें से कोई नहीं बताता कि यह ख़बर कहाँ से मिली। मैसूर में अंग्रेज़ों के सामने सीताराम बावा नाम के एक आदमी ने बयान दिया कि चपातियाँ नाना साहब के लिए किया गया जादू थीं और हर चपाती में कमल की डंडी से बनी एक छोटी गोली डाली गई थी। इतिहासकार उसकी कहानी को ज़्यादातर अफ़वाहों और सुनी-सुनाई बातों पर टिकी मानते हैं। यानी कमल वाली बात का कोई पक्का सबूत नहीं मिलता।

तो सच क्या था?

इतिहासकार किम वैगनर ने ये सारी रिपोर्टें मिलाकर पढ़ीं। उनका अनुमान है कि चपातियाँ शायद इंदौर की तरफ़ से हैज़े के टोटके की तरह चलीं। रास्ते में असली मतलब छूट गया, पर सिलसिला नहीं टूटा, क्योंकि डर यह था कि आगे न भेजीं तो मुसीबत अपने ही पास रह जाएगी। फिर चपाती एक "ख़ाली संदेश" बन गई: जिसके मन में जो डर था, उसने उसमें वही पढ़ लिया। इसीलिए पुस्तक कहती है कि इनका मतलब न तब साफ़ था, न आज है (पृ. 265)।

पुराने स्रोत (अंग्रेज़ी में)

सोचिए: जिस चीज़ का मतलब किसी को पता न हो, लोग उसे किसी बड़ी घटना का संकेत क्यों मान लेते हैं?

जवाब देखिए

पुस्तक कहती है, "अफ़वाह तभी फैलती है जब उसमें लोगों के ज़हन में गहरे दबे डर और संदेह की अनुगूँज सुनाई देती है" (पृ. 265)। 1820 के दशक से अंग्रेज़ पश्चिमी शिक्षा ला रहे थे, सती प्रथा ख़त्म करने (1829) और हिंदू विधवा विवाह को वैधता देने के क़ानून बना रहे थे, और अवध, झाँसी और सतारा जैसी रियासतों पर क़ब्ज़ा कर रहे थे (पृ. 265)। लोगों को लगने लगा कि उनकी प्यारी और पवित्र चीज़ों की जगह एक "ज़्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी" व्यवस्था ले रही है, और ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से इस सोच को और बल मिला (पृ. 265–266)। ऐसे डर के माहौल में गाँव-गाँव घूमती चपाती भी लोगों को किसी बड़ी उथल-पुथल का संकेत लगी (पृ. 265)।

अफ़वाह या असल क़दम? (पृ. 264–265)

हर बात को खींचकर सही डिब्बे में डालिए। बाईं ओर वह जो लोगों में फैल रहा था, दाईं ओर वह जो अंग्रेज़ सचमुच कर चुके थे।

लोगों को लगता था कि जिन चीज़ों की वे क़द्र करते थे — राजे-रजवाड़े, सामाजिक-धार्मिक रीति-रिवाज, भूस्वामित्व, लगान की प्रणाली — उन सबको ख़त्म करके एक ज़्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी व्यवस्था लाई जा रही है (पृ. 265)।

किताब के अपने प्रश्न

1बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्या आग्रह किया?

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विद्रोही उन लोगों की ओर मुड़े जो अंग्रेज़ों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे (पृ. 262)।
  • दिल्ली पहुँचकर सिपाहियों की माँग थी कि बादशाह उन्हें अपना आशीर्वाद दें (पृ. 258), और उन्होंने बूढ़े हो चुके मुग़ल बादशाह से विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार करने की दरख़्वास्त की (पृ. 262)।
  • बहादुर शाह पहले भयभीत और बेचैन दिखे; उन्होंने नाममात्र का नेता बनना तब स्वीकार किया जब कुछ सिपाही शाही शिष्टाचार तोड़कर लाल क़िले के मुग़ल दरबार में जा घुसे (पृ. 262)।
  • कानपुर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब को नेता बनना पड़ा, और झाँसी में रानी को आम जनता के दबाव में बग़ावत का नेतृत्व सँभालना पड़ा (पृ. 262)।
  • बिहार में आरा के स्थानीय ज़मींदार कुँवर सिंह के साथ भी यही हुआ, और लखनऊ में लोगों ने नवाब वाजिद अली शाह के युवा बेटे बिरजिस क़द्र को अपना नेता घोषित कर दिया (पृ. 262)।
  • बादशाह के नाम से विद्रोह को वैधता मिली, क्योंकि अब उसे मुग़ल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था (पृ. 258)।

2उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबद्ध और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे?

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • जैसे-जैसे विद्रोह की ख़बर एक शहर से दूसरे शहर पहुँची, सिपाही हथियार उठाते गए, और हर छावनी में विद्रोह का घटनाक्रम कमोबेश एक जैसा था (पृ. 259)।
  • सातवीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी ने मई की शुरुआत में नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार किया और 48 नेटिव इन्फेंट्री को लिखा: "हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फ़ैसला लिया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतज़ार कर रहे हैं।" (पृ. 260)
  • सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे, और विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छा संचार बना हुआ था (पृ. 260)।
  • कैप्टेन हियर्से का मामला सुलझाने के लिए तय हुआ कि हर रेजीमेंट के देशी अफ़सरों की एक पंचायत बुलाई जाए, और चार्ल्स बॉल ने लिखा है कि ये पंचायतें रात को कानपुर सिपाही लाइनों में जुटती थीं (पृ. 261)।
  • सिपाही लाइनों में साथ रहते थे और उनमें से बहुत सारे एक ही जाति के थे, इसलिए यह मानना मुश्किल नहीं कि कुछ फ़ैसले मिलकर लिए जाते थे; किताब कहती है: "ये सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता ख़ुद ही थे।" (पृ. 261)
  • सिस्टन से बिजनौर का तहसीलदार पूछता है "काम कैसा चल रहा है?" और भरोसा देता है "मामला क़ाबिल हाथों में है।"; यही तहसीलदार बिजनौर के विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता था (पृ. 261)।

31857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी?

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • मेरठ के सिपाहियों ने बहादुर शाह से कहा कि गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूसों से हिंदू और मुसलमान, सबका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा (पृ. 258)।
  • चर्बी वाले कारतूसों की बात "जंगल की आग की तरह" फैली, और आटे में गाय और सुअर की हड्डियों के चूरे की अफ़वाह के बाद सिपाहियों और आम लोगों ने आटा छूने से इनकार कर दिया (पृ. 264)।
  • लोगों को डर था कि अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं (पृ. 264), और ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से इस सोच को बल मिल रहा था (पृ. 266)।
  • सिपाहियों की एक बची हुई अर्ज़ी पूछती है: "अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?" (पृ. 273)
  • घोषणाओं में डर जताया गया कि अंग्रेज़ जाति और धर्म नष्ट करके लोगों को ईसाई बना देंगे, और लोगों से रोज़गार, धर्म, इज़्ज़त और अस्मिता, चारों के लिए लड़ने को कहा गया (पृ. 274)।
  • किताब के अनुसार अफ़वाह तभी फैलती है जब उसमें लोगों के गहरे डर की गूँज हो, और यह डर 1820 के दशक से चल रही नीतियों से जुड़ा था: अंग्रेज़ी शिक्षा, सती प्रथा ख़त्म करने और हिंदू विधवा विवाह को वैधता देने के क़ानून, और रियासतों पर क़ब्ज़ा (पृ. 265)।

Checkpoint

  1. 1छावनियों में विद्रोह करते ही सिपाहियों ने सबसे पहले क्या किया?

  2. 2मेरठ से दिल्ली पहुँचकर सिपाही किसके पास गए?

  3. 3चार्ल्स बॉल के अनुसार सिपाहियों की पंचायतें कहाँ जुटती थीं?

  4. 4मौलवी अहमदुल्ला शाह को लोग किस नाम से बुलाने लगे?

  5. 5किस भविष्यवाणी के अनुसार 23 जून 1857 को अंग्रेज़ी राज ख़त्म होना था?

  6. 6सती प्रथा ख़त्म करने का क़ानून किस वर्ष बना?

2अवध में विद्रोह

इस पड़ाव का सवाल

अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था, और वहाँ कौन-कौन लड़ा?

पिछली बात से कड़ी पड़ाव 1 के आख़िर में हमने पढ़ा कि अवध, झाँसी और सतारा जैसे राज्य बहानों से छीने गए, और लोगों को नई व्यवस्था पराई और दमनकारी लगने लगी (पृ. 265)। अब किताब एक इलाक़े, अवध, को पास से देखती है, जहाँ यह असंतोष सबसे गहरा था (पृ. 266)।

  1. 2.1“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।”
  2. 2.2“देह से जान जा चुकी थी।”
  3. 2.3फ़िरंगी राज का आना और एक दुनिया का ख़ात्मा

इस पड़ाव के आख़िर में: किताब का प्रश्न 6

2.1“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।”पृ. 266

विद्रोह की जड़ें समझने के लिए पुस्तक अवध को नज़दीक से देखती है: "अवध 1857 के इस भव्य नाटक का बड़ा केंद्र था" (पृ. 266)।

"ये गिलास फल (Cherry) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।"

— गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी, 1851, अवध की रियासत के बारे में — पृ. 266

अवध पर क़ब्ज़ा, क़दम-दर-क़दम

पहले क्या हुआ, फिर क्या? पत्ते खिसकाकर क्रम लगाइए।

▲ सबसे पहले

  1. 1अवध ब्रिटिश साम्राज्य का अंग घोषित, नवाब वाजिद अली शाह कलकत्ता भेजे जाते हैं
  2. 2लॉर्ड वेलेज़्ली सहायक संधि की व्यवस्था तैयार करते हैं
  3. 3एकमुश्त बंदोबस्त: ताल्लुक़दार अपनी ज़मीनों से बेदख़ल होने लगते हैं
  4. 4डलहौज़ी कहते हैं: "ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा"
  5. 5अवध पर सहायक संधि थोप दी जाती है: नवाब की अपनी सेना ख़त्म

▼ सबसे बाद में

अंग्रेज़ों की नज़र अवध पर क्यों? (पृ. 266)

उन्हें लगता था कि वहाँ की ज़मीन नील और कपास की खेती के लिए मुफ़ीद है, और इस इलाक़े को उत्तरी भारत के एक बड़े बाज़ार के रूप में बढ़ाया जा सकता है।

ऊँचाई से देखा गया लखनऊ: पेड़ों के बीच महल, गुंबद और लंबी इमारतें; दाईं ओर एक बड़ी इमारत की छत।

लखनऊ, अवध की राजधानी: 1856 में अंग्रेज़ों ने अवध को अपने राज में मिला लिया था (पृ. 266)। यह चित्र लंदन के एक सचित्र अख़बार ने 2 जनवरी 1858 के अंक में छापा। उसके नीचे लिखा है कि यह वेधशाला (ऑब्ज़र्वेटरी) की छत से खींची गई एक फ़ोटो पर बना है।

The Illustrated London News, 2 January 1858. Wikimedia Commons, public domain.

सहायक संधि: शर्त थी या नहीं? (पृ. 266)

  1. अंग्रेज़ अपने सहयोगी की बाहरी और आंतरिक चुनौतियों से रक्षा करेंगे।

  2. सहयोगी के इलाक़े में तैनात ब्रिटिश टुकड़ी का ख़र्च अंग्रेज़ उठाएँगे।

  3. सहयोगी अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरे शासक के साथ संधि कर सकता है।

  4. अवध के नवाब को अपनी सेना ख़त्म करनी थी और दरबार के ब्रिटिश रेज़ीडेंट की सलाह पर काम करना था।

अपनी सैनिक ताक़त छिनने के बाद नवाब क़ानून-व्यवस्था के लिए दिनोंदिन अंग्रेज़ों पर निर्भर होता गया, और विद्रोही मुखियाओं और ताल्लुक़दारों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं रहा (पृ. 266)।

रेज़ीडेंट (पृ. 266)

गवर्नर जनरल का प्रतिनिधि, जिसे ऐसे राज्य में तैनात किया जाता था जो अंग्रेज़ों के प्रत्यक्ष शासन में नहीं था।

2.2“देह से जान जा चुकी थी।”पृ. 266–267

अधिग्रहण से कई इलाक़ों में असंतोष था, "लेकिन इतना गुस्सा कहीं नहीं था जैसा उत्तर भारत की शान कहे जाने वाले अवध की रियासत में था" (पृ. 266)। अंग्रेज़ों ने कहा कि वाजिद अली शाह अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे, और यह "निराधार निष्कर्ष" भी निकाला कि वे लोकप्रिय नहीं थे। पुस्तक कहती है: सच यह है कि लोग उन्हें दिल से चाहते थे। जब वे लखनऊ से विदा हुए तो बहुत से लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए (पृ. 267)।

नवाब साहब जा चुके हैं

अभिजात और किसान, सब रो रहे थे।

और सारा आलम रोता-चिल्लाता था।

हाय! जान-ए-आलम देस से विदा लेकर परदेस चले गए हैं।

— एक गीत — पृ. 267

"अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हीं।"

— एक लोक गीत — पृ. 267

यानी: अंग्रेज़ बहादुर आए और मुल्क ले लिया।

दरबार गया, तो किसकी रोज़ी गई? (पृ. 267)

देखिए
  • संगीतकार
  • नर्तक
  • कवि
  • कारीगर
  • बावर्ची
  • नौकर
  • सरकारी कर्मचारी

…और बहुत सारे लोग। दुख और अपमान के साथ अब रोज़ी-रोटी छिनने का नुक़सान भी जुड़ गया।

किताब का सवाल (पृ. 267): लोग वाजिद अली शाह की विदाई पर इतने दुखी क्यों थे?

किताब का जवाब देखिए

अंग्रेज़ मानते थे कि वाजिद अली शाह लोकप्रिय नहीं हैं, "मगर सच यह है कि लोग उन्हें दिल से चाहते थे" (पृ. 266–267)। जब वे लखनऊ से विदा हुए, तो बहुत सारे लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए (पृ. 267)। नवाब के जाने से दरबार और उसकी संस्कृति भी ख़त्म हो गई, और संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों और सरकारी कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी जाती रही (पृ. 267)। लोगों के लिए यह अपना राज छिन जाने जैसा था; एक लोकगीत कहता है, "अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हीं।" (पृ. 267)

2.3फ़िरंगी राज का आना और एक दुनिया का ख़ात्मापृ. 268–270

ताल्लुक़दार: सिपाही, क़िले और गाँव (पृ. 268)

अवध के समूचे देहात में ताल्लुक़दारों की जागीरें और क़िले बिखरे थे। पीढ़ियों से अपने इलाक़े की ज़मीन और सत्ता उनके हाथ में थी। कुछ बड़े ताल्लुक़दारों के पास 12,000 तक पैदल सिपाही थे; छोटे-मोटे ताल्लुक़दारों के पास भी 200 सिपाहियों की टुकड़ी। अधिग्रहण के फ़ौरन बाद उनकी सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए।

अंग्रेज़ों के आने से पहले

अवध के 67 प्रतिशत गाँव ताल्लुक़दारों के पास

एकमुश्त बंदोबस्त के बाद

अवध के 38 प्रतिशत गाँव ताल्लुक़दारों के पास

आँकड़े पृ. 268 के हैं। दक्षिण अवध के ताल्लुक़दारों को सबसे बुरी मार पड़ी: कुछ के तो आधे से ज़्यादा गाँव हाथ से जाते रहे।

बंदोबस्त इस मान्यता पर टिका था कि ताल्लुक़दार बिचौलिए हैं, ज़मीन के मालिक नहीं, और उन्होंने बल और धोखाधड़ी से अपना प्रभुत्व जमाया है। अफ़सरों को उम्मीद थी कि किसानों का शोषण घटेगा और राजस्व बढ़ेगा। राजस्व तो बढ़ा, पर किसानों का बोझ कम नहीं हुआ (पृ. 268)।

अंडाकार फ़्रेम में कुर्सी पर बैठे एक भारी-भरकम आदमी की पुरानी फ़ोटो: ऊँचा जड़ाऊ मुकुट, घनी मूँछें, कंधों पर शॉल, दोनों हाथ गोद में आड़ी रखी एक छड़ी पर।

राजा लाल माधो सिंह, अमेठी, 1880: यह फ़ोटो अवध के राजाओं और ताल्लुक़दारों की तसवीरों के एक एल्बम की है, जो 1880 में छपा। किताब के पृ. 268 पर चित्र 10.6 भी उसी साल की, अवध के एक ज़मींदार की फ़ोटो है। पहनावा और ठाठ देखिए: ताल्लुक़दार अपने इलाक़े के राजा जैसे थे।

Darogah Haji Abbas Ali, An Illustrated Historical Album of the Rajas and Taaluqdars of Oudh (Allahabad, 1880). Image: Wikimedia Commons, public domain.

राजस्व की माँग कितनी बढ़ी? (पृ. 269)

कुछ जगहों पर 30 से 70 प्रतिशत तक। यानी न ताल्लुक़दारों के पास इस अधिग्रहण पर ख़ुश होने का कोई कारण था, न काश्तकारों के पास।

जैसे, जहाँ माँग 100 रुपये थी, वहाँ अब 130 से 170 रुपये। (यह हिसाब हमारा है; पुस्तक सिर्फ़ प्रतिशत देती है।)

एक दुनिया का ख़ात्मा: किसने क्या खोया? (पृ. 266–270)

पुस्तक कहती है कि अवध की तरह-तरह की पीड़ाओं ने राजकुमारों, ताल्लुक़दारों, किसानों और सिपाहियों को एक-दूसरे से जोड़ दिया (पृ. 268)। हर समूह पर टैप कीजिए, फिर उसके नुक़सान पर।

  • नवाब और दरबार: गद्दी छिनी, नवाब कलकत्ता भेजे गए; दरबार और उसकी संस्कृति ख़त्म
  • ताल्लुक़दार: सेनाएँ भंग, दुर्ग ध्वस्त, गाँव छिने: 67 से 38 प्रतिशत
  • किसान: मनमाना राजस्व; बुरे वक़्त में मदद और तीज-त्योहारों पर क़र्ज़े की उम्मीद ख़त्म
  • सिपाही: कम वेतन, वक़्त पर छुट्टी नहीं, अफ़सरों का दुर्व्यवहार और नस्ली गाली-गलौज

ताल्लुक़दारों की सोच: राजा हनवन्त सिंह (पृ. 269)

रायबरेली के पास कालाकंकर के राजा हनवन्त सिंह ने विद्रोह के दौरान एक अंग्रेज़ अफ़सर को पनाह दी और उसे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। आख़िरी मुलाक़ात में उन्होंने उस अफ़सर से कहा:

साहिब, आपके मुल्क के लोग हमारे देश में आए और उन्होंने हमारे राजाओं को खदेड़ दिया।

आप अफ़सरों को भेज कर जिले-जिले में जागीरों के मालिकाने की जाँच करवाते हैं। एक ही झटके में आपने मेरे पुरखों की ज़मीन मुझसे छीन ली। मैं चुप रहा।

फिर अचानक आपका बुरा वक़्त शुरू हो गया। यहाँ के लोग आपके ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए। तब आप मेरे पास आए, जिसे आपने बर्बाद किया था। मैंने आपकी जान बचाई है।

लेकिन अब, अब मैं अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहा हूँ ताकि आपको देश से खदेड़ सकूँ।

किताब के सवाल (पृ. 269)

  1. इस अंश से आपको ताल्लुक़दारों के रवैये के बारे में क्या पता चलता है?
    किताब का जवाब देखिए

    हनवन्त सिंह ने एक अंग्रेज़ अफ़सर को पनाह दी और उसकी जान बचाई, पर विदा करते हुए साफ़ कहा कि अब वे अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहे हैं ताकि अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ सकें (पृ. 269)। ज़मीन छिनने पर वे ख़ुद कहते हैं, "मैं चुप रहा।" यानी नाराज़गी अंदर ही अंदर गहरी थी, और मौक़ा मिलते ही वे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़े हो गए। नवाब के वफ़ादार बहुत से ताल्लुक़दार लखनऊ जाकर बेगम हज़रत महल के खेमे में शामिल हुए, और कुछ उनकी हार के बाद भी उनके साथ डटे रहे (पृ. 269)।

  2. "यहाँ के लोगों" से हनवन्त सिंह का क्या आशय था?
    किताब का जवाब देखिए

    अंश में "यहाँ के लोग" वे हैं जो अंग्रेज़ों का "बुरा वक़्त" शुरू होते ही उनके ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए (पृ. 269)। हनवन्त सिंह रायबरेली के पास कालाकंकर के राजा थे, इसलिए उनका इशारा अपने इलाक़े, अवध के आम लोगों की तरफ़ लगता है। पुस्तक बताती है कि अवध में यह विद्रोह विदेशी शासन के ख़िलाफ़ लोक-प्रतिरोध बन गया था, और वहाँ ताल्लुक़दार और उनके किसान मिलकर लड़े (पृ. 268–269)।

  3. उन्होंने लोगों के ग़ुस्से की क्या वजह बताई?
    किताब का जवाब देखिए

    हनवन्त सिंह ने तीन बातें गिनाईं: अंग्रेज़ों ने "हमारे राजाओं को खदेड़ दिया", अफ़सर भेजकर ज़िले-ज़िले में जागीरों के मालिकाने की जाँच करवाई, और "एक ही झटके में" उनके पुरखों की ज़मीन छीन ली (पृ. 269)। पुस्तक बताती है कि 1856 के एकमुश्त बंदोबस्त के बाद अवध के गाँवों में ताल्लुक़दारों का हिस्सा 67 प्रतिशत से घटकर 38 प्रतिशत रह गया (पृ. 268)।

अफ़सर और सिपाही: 1820 का दशक या 1840 का? (पृ. 269–270)

हर बात को उस दशक में डालिए जिसका हाल वह बताती है।

"बंगाल आर्मी की पौधशाला" (पृ. 270)

बंगाल आर्मी के बहुत से सिपाही अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से भर्ती होकर आए थे। अवध को तो "बंगाल आर्मी की पौधशाला" कहा जाता था। गाँव में परिवार जो बदलाव और ख़तरे देख रहे थे, वे जल्दी ही सिपाही लाइनों में दिखने लगे; और कारतूसों का भय, छुट्टियों की शिकायतें, बढ़ता दुर्व्यवहार और नस्ली गाली-गलौज गाँवों तक। इसीलिए जब सिपाही अफ़सरों की अवज्ञा करके हथियार उठाते, तो फ़ौरन गाँवों के भाई-बिरादर भी साथ आ जुटते।

मज़ाक भी एक नज़र है

किताब में: पृ. 270, चित्र 10.7

यूरोपीय क़िस्म की वर्दी पहने बंगाल के सिपाही। पुस्तक कहती है, यहाँ कलाकार सिपाहियों की वर्दी का मज़ाक उड़ा रहा है।

ऐसी तसवीर से कलाकार क्या जताना चाहता होगा?

किताब का जवाब देखिए

पुस्तक का अनुमान (पृ. 270): शायद यह कि "पश्चिमी पोशाक पहन कर भी हिंदुस्तानी सुंदर नहीं दिख सकते।"

चर्चा कीजिए (पृ. 270)

एक सुराग़: पुस्तक के मानचित्र 2 (पृ. 275) में अजमेर भी विद्रोह के प्रमुख केंद्रों में दिखाया गया है।

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • अपने राज्य के इतिहास की किताब या संग्रहालय से पता कीजिए कि वहाँ किसने विद्रोह किया: सिपाहियों ने, किसानों ने, ज़मींदारों ने या किसी राजा ने; पुस्तक दिखाती है कि अलग-अलग जगह अलग लोग आगे आए (पृ. 262)।
  • अगर हाँ, तो वजहें पुस्तक की बातों से मिलाइए: लगान का बोझ और ज़मीन छिनना, रियासतों पर क़ब्ज़ा, धर्म और जाति पर ख़तरे का डर (पृ. 265, 268–269, 274)।
  • अगर नहीं, तो इसकी वजह खोजिए, क्योंकि हर जगह विद्रोह नहीं हुआ; पुस्तक बताती है कि पंजाब कमोबेश शांत था (पृ. 276)।
  • हर बात के साथ लिखिए कि वह किस स्रोत से ली गई है।

विद्रोह भड़का क्यों? पड़ाव 1 और 2 के कारण, एक जगह

पृ. 259 से 270 तक किताब ने जो कारण बताए हैं, उन्हें यहाँ तबक़ों के हिसाब से एक जगह रखा है। हर बात के साथ उसका पृष्ठ है, ताकि आप किताब में मिला सकें।

सिपाही
चर्बी लगे कारतूसों और आटे में हड्डियों के चूरे की अफ़वाहों से उन्हें अपनी जाति और धर्म भ्रष्ट होने का डर था (पृ. 264); कम वेतन और वक़्त पर छुट्टी न मिलने की शिकायत पुरानी थी (पृ. 269); और 1840 के दशक से अफ़सर उन्हें "कमतर नस्ल" का मानकर गाली-गलौज और मारपीट करने लगे थे (पृ. 270)।
राजा, रानियाँ और नवाब
शासकीय दुर्बलता और दत्तकता को अवैध बताने जैसे बहानों से अवध, झाँसी और सतारा जैसे राज्य छीन लिए गए (पृ. 265)। अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर कलकत्ता भेज दिया गया (पृ. 266)।
दरबार के सहारे जीने वाले
नवाब के जाते ही दरबार उजड़ गया, और संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों और सरकारी कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी जाती रही (पृ. 267)।
ताल्लुक़दार
अधिग्रहण के बाद उनकी सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग ढहा दिए गए; 1856 के एकमुश्त बंदोबस्त के बाद अवध के गाँवों में उनका हिस्सा 67 से घटकर 38 प्रतिशत रह गया (पृ. 268)।
किसान
कुछ जगह राजस्व माँग 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ गई, और मुसीबत या फ़सल ख़राब होने पर छूट का, या त्योहारों पर मदद का सहारा नहीं रहा (पृ. 269)। शहरों के साहूकारों और अमीरों को वे अपना उत्पीड़क और अंग्रेज़ों का पिट्ठू मानते थे (पृ. 259)।
हिंदू और मुसलमान, दोनों
लोगों को डर था कि अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं (पृ. 264), और ईसाई प्रचारकों की गतिविधियों से इस सोच को बल मिल रहा था (पृ. 266)।
समाज और रीति-रिवाज
1820 के दशक से अंग्रेज़ी शिक्षा, सती प्रथा ख़त्म करने (1829) और हिंदू विधवा विवाह के क़ानून, और अंग्रेज़ों का अपना प्रशासन, क़ानून और भूराजस्व: लोगों को लगा कि जिन चीज़ों की वे क़द्र करते थे, उनकी जगह एक "ज़्यादा हृदयहीन, परायी और दमनकारी" व्यवस्था आ रही है (पृ. 265)।
सबको जोड़ने वाली कड़ी
अवध में शिकायतों की यह कड़ी राजकुमारों, ताल्लुक़दारों, किसानों और सिपाहियों को एक-दूसरे से जोड़ रही थी (पृ. 268), और सिपाही अपने डर और शिकायतें अपने गाँवों तक ले गए, जहाँ से गाँव वाले भी साथ आ गए (पृ. 270)।

किताब के अपने प्रश्न

6अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुक़दार और ज़मींदार उसमें क्यों शामिल हुए?

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • अवध 1857 का बड़ा केंद्र था: नवाब वाजिद अली शाह को यह कहकर हटाया गया कि वे अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे, जबकि लोग उन्हें दिल से चाहते थे, और बहुत सारे लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए (पृ. 266–267)।
  • दरबार उजड़ने से संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों और सरकारी कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी जाती रही (पृ. 267)।
  • अधिग्रहण के फ़ौरन बाद ताल्लुक़दारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए; 1856 के एकमुश्त बंदोबस्त के बाद अवध के गाँवों में उनका हिस्सा 67 से घटकर 38 प्रतिशत रह गया (पृ. 268)।
  • ज़मीन छिनने का दर्द कालाकंकर के राजा हनवन्त सिंह के शब्दों में है: "एक ही झटके में आपने मेरे पुरखों की ज़मीन मुझसे छीन ली। मैं चुप रहा।" (पृ. 269)
  • किसानों का बोझ भी कम नहीं हुआ: कुछ जगह राजस्व माँग 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ गई, और मुसीबत या फ़सल ख़राब होने पर छूट का, या त्योहारों पर मदद का कोई भरोसा नहीं रहा (पृ. 268–269)।
  • अवध में लड़ाई ताल्लुक़दारों और उनके किसानों ने मिलकर लड़ी (पृ. 269), और बंगाल आर्मी के बहुत सारे सिपाही इन्हीं गाँवों से आते थे: अवध को "बंगाल आर्मी की पौधशाला" कहा जाता था (पृ. 270)।

Checkpoint

  1. 1अवध के बारे में "गिलास फल" वाली बात किसने कही थी?

  2. 2अंग्रेज़ों के आने से पहले अवध के कितने प्रतिशत गाँव ताल्लुक़दारों के पास थे?

  3. 3पृ. 270 पर अवध को "बंगाल आर्मी की पौधशाला" कहा गया है। उसी पन्ने पर बंगाल आर्मी के सिपाहियों के बारे में क्या लिखा है?

3विद्रोही क्या चाहते थे?

इस पड़ाव का सवाल

विद्रोही क्या चाहते थे, और यह जानना इतना मुश्किल क्यों है?

पिछली बात से कड़ी अवध में शिकायतों की एक कड़ी ने राजकुमारों, ताल्लुक़दारों, किसानों और सिपाहियों को एक-दूसरे से जोड़ दिया था (पृ. 268)। अब सवाल यह है कि ये सब लड़ किस चीज़ के लिए रहे थे।

  1. 3.1एकता की कल्पना
  2. 3.2उत्पीड़न के प्रतीकों के ख़िलाफ़
  3. 3.3वैकल्पिक सत्ता की तलाश

इस पड़ाव के आख़िर में: किताब के प्रश्न 4, 7

विद्रोहियों की आवाज़ कम क्यों बची?पृ. 270–271

इस पड़ाव का सवाल किताब के शीर्षक में ही है। पर जवाब ढूँढने से पहले एक मुश्किल समझिए: विद्रोहियों के अपने काग़ज़ बहुत कम बचे हैं (पृ. 270)।

अंग्रेज़ विद्रोहियों को "अहसानफ़रामोश और बर्बर लोगों का झुंड" मानते थे, और विद्रोह को कुचलने का मतलब उनकी आवाज़ दबाना भी था। बहुत कम विद्रोहियों को अपनी बात दर्ज करने का मौक़ा मिला; ज़्यादातर सिपाही और आम लोग "पढ़े-लिखे नहीं थे"। इसलिए विद्रोही नेताओं की "कुछ घोषणाओं व इश्तहारों" के सिवा उनका नज़रिया बताने वाला ज़्यादा कुछ नहीं बचा (पृ. 270)।

नतीजा (पृ. 271): इतिहासकारों को ज़्यादातर अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है, और पुस्तक कहती है: "विडंबना यह है कि इन स्रोतों से अंग्रेज़ अफ़सरों की सोच का तो पता चलता है लेकिन इस बारे में ज़्यादा सुराग़ नहीं मिल पाता कि विद्रोही क्या चाहते थे"।

दो अलमारियाँ (पृ. 277)

हर अलमारी खोलिए और देखिए कि उसमें किस तरह के काग़ज़ हैं।

विद्रोहियों के काग़ज़ खोलिए
  • घोषणाएँ
  • अधिसूचनाएँ
  • नेताओं के पत्र
अंग्रेज़ अफ़सरों और फ़ौजियों के काग़ज़ खोलिए
  • चिट्ठियाँ
  • डायरियाँ
  • आत्मकथाएँ
  • सरकारी इतिहास
  • मेमो
  • नोट्स
  • परिस्थितियों के आकलन
  • रिपोर्टें

ये दस्तावेज़ों की क़िस्में हैं, गिनती नहीं। पुस्तक कहती है कि सरकारी ब्योरों की "कमी नहीं है"। इनमें से बहुत सारे दस्तावेज़ सैनिक विद्रोह रिकॉर्ड्स पर केंद्रित खंडों में संकलित किए जा चुके हैं, और उनसे अफ़सरों के मन का डर और बेचैनी, और विद्रोहियों के बारे में उनकी सोच पता चलती है (पृ. 277)।

3.1एकता की कल्पनापृ. 271–273

घोषणाओं में जाति और धर्म का भेद किए बिना समाज के सभी तबकों को पुकारा जाता था। बहुत-सी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों के नाम से जारी हुईं, पर उनमें भी हिंदुओं की भावनाओं का ख़याल रखा जाता था। इसे ऐसे युद्ध की तरह पेश किया गया जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का नफ़ा-नुकसान बराबर था, और मुग़ल साम्राज्य में अलग-अलग समुदायों के साथ रहने का गौरवगान होता था।

बहादुर शाह के नाम से जारी घोषणा (पृ. 271)

मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई देते हुए जनता से इस लड़ाई में शामिल होने का आह्वान।

आज़मगढ़ घोषणा, 25 अगस्त 1857 (पृ. 271–272)

पुस्तक कहती है: "विद्रोही क्या चाहते थे, इसके बारे में हमारी जानकारी का यह एक मुख्य स्रोत है"। घोषणा "अधर्मी और षड्यंत्रकारी अंग्रेज़ों की निरंकुशता व उत्पीड़न" से शुरू होती है, और समाज के हर तबके से अलग-अलग बात करती है।

हर शिकायत पढ़िए और पहचानिए कि घोषणा का यह भाग किस तबके के बारे में है।

  • ज़मींदार: बेहिसाब जमा (भूराजस्व) थोपा; बकाया लगान पर जागीरें नीलाम; आम रैयत या नौकर के मुक़दमे पर भी अदालत में घसीटा गया
  • व्यापारी: नील, कपड़े, जहाज़ व्यवसाय जैसी बहुमूल्य चीज़ों के व्यापार पर अंग्रेज़ों का एकाधिकार; डाक ख़र्च, नाका वसूली
  • सरकारी कर्मचारी: न इज़्ज़त, न ताक़त, तनख़्वाह कम; प्रतिष्ठा और पैसे वाले सारे पद सिर्फ़ अंग्रेज़ों को
  • कारीगर: इंग्लैंड में बनी चीज़ों ने बुनकरों, बढ़इयों, लोहारों, मोचियों आदि को बेरोज़गार कर दिया
  • पंडित और फ़क़ीर: यूरोपीय हिंदू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के शत्रु हैं
घोषणा आगे के लिए क्या कहती है
  • ज़मींदार: जमा हलका रहेगा, हितों की रक्षा होगी, और हर ज़मींदार को अपनी ज़मींदारी में अपने ढंग से शासन का अधिकार होगा।
  • व्यापारी: ज़मीन और पानी, दोनों रास्तों से होने वाला हर चीज़ का व्यापार देसी व्यापारियों के लिए खोल दिया जाएगा।
  • सरकारी कर्मचारी: फ़िलहाल 200 और 300 रुपये प्रतिमाह की तनख़्वाह, और भविष्य में ऊँचे ओहदों की उम्मीद।
  • कारीगर: देसी कारीगरों को राजाओं और अमीरों की सेवा में तैनात किया जाएगा।
  • पंडित और फ़क़ीर: इस भाग में वादा नहीं, एक बुलावा है: ख़ुद सामने आकर इस पवित्र युद्ध में अपना हिस्सा निभाएँ।

घोषणा की शुरुआत में एक और बात है: जिनके पास अपनी सेवाएँ देने के साधन नहीं हैं, "उन्हें मेरी तरफ़ से दैनिक भोजन दिया जाएगा" (पृ. 271)।

किताब का सवाल (पृ. 272): इस घोषणा में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ कौन-से मुद्दे उठाए गए हैं? घोषणा की भाषा पर ध्यान दीजिए: उसमें किन भावनाओं पर ज़ोर दिया जा रहा है?

किताब का जवाब देखिए

घोषणा हर तबके की शिकायत अलग उठाती है: ज़मींदारों पर बेहिसाब जमा (भूराजस्व) और बकाये पर नीलामी, व्यापारियों के लिए नील, कपड़े और जहाज़ के व्यापार पर अंग्रेज़ों का एकाधिकार, सरकारी कर्मचारियों के लिए कम तनख़्वाह और ऊँचे ओहदे सिर्फ़ अंग्रेज़ों को, कारीगरों के लिए अंग्रेज़ी माल से बेरोज़गारी, और पंडितों-फ़क़ीरों के लिए दोनों धर्मों पर ख़तरा (पृ. 272)। भाषा देखिए: अंग्रेज़ों को "अधर्मी और षड्यंत्रकारी" कहा गया है और हिंदू-मुसलमान दोनों को एक साथ पुकारा गया है (पृ. 271), लड़ाई को "पवित्र युद्ध" कहा गया है और बादशाही राज में हल्के जमा, खुले व्यापार और अच्छी तनख़्वाह का वादा है (पृ. 272)। साथ में चेतावनी है: "अगर यह स्वर्णिम अवसर हमारे हाथ से चला गया तो हमें अपनी इस मूर्खता पर पश्चात्ताप करना पड़ेगा" (पृ. 271)। यानी घोषणा धर्म, इज़्ज़त, अपने फ़ायदे और मौक़ा चूक जाने के डर, सब भावनाओं को एक साथ जगाती है।

बरेली, दिसंबर 1857 (पृ. 273)

अंग्रेज़ शासन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली में हिंदुओं को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने के लिए 50,000 रुपये ख़र्च किए। नतीजा क्या रहा?

देखिए

"उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।" पुस्तक कहती है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेज़ों की कोशिशों के बावजूद आंदोलन में ऐसा कोई फ़र्क़ नहीं दिखाई दिया।

3.2उत्पीड़न के प्रतीकों के ख़िलाफ़पृ. 273–274

सिपाहियों की अपनी ज़बानी (पृ. 273)

विद्रोही सिपाहियों की एक अर्ज़ी बच गई है। उसके कुछ अंश:

हमारे पुरखों ने सदा उनकी सेवा की है और हम भी उनकी नौकरी में आए…

लेकिन सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने ये हुक्म जारी कर दिया कि अब सिपाहियों को इंग्लैंड से नए कारतूस और बंदूकें दी जाएँगी। नए कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी मिली हुई है और गेहूँ के आटे में हड्डियों का चूरा मिलाकर खिलाया जा रहा है।

हमें दो साल तक युद्ध जारी रखने पर मजबूर किया गया।

अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?

अर्ज़ी आगे बताती है: थर्ड लाइट केवेलरी के सवारों ने कारतूस दाँतों से खींचने से मना किया, तो 1400 अंग्रेज़ सिपाहियों और छर्रों से भरी छह-छह तोपों के घेरे में परेड हुई, और 84 नए सिपाहियों को बेड़ियाँ डालकर जेल में बंद कर दिया गया।

चर्बी और हड्डियों का चूरा अर्ज़ी में लिखे सिपाहियों के अपने आरोप हैं। ऐसी अफ़वाहें कैसे फैलीं, यह आप पड़ाव 1 के टॉपिक 1.4 में देख चुके हैं।

अर्ज़ी या ताल्लुक़दार? (पृ. 273, 269)

किताब कहती है: अर्ज़ी में बताए कारणों की तुलना ताल्लुक़दार के बताए कारणों से कीजिए। हर कारण को उसके कहने वाले के खाने में डालिए।

सही या ग़लत? घोषणाएँ और विद्रोही सत्ता (पृ. 273–274)

  1. घोषणाओं में देशी रियासतों पर क़ब्ज़े और समझौते तोड़ने के लिए अंग्रेज़ों की निंदा की जाती थी।

  2. गाँवों में विद्रोहियों ने सूदखोरों के बहीखाते जला दिए।

  3. विद्रोहियों की घोषणाओं में एक ज़्यादा बराबरी वाले समाज की बात साफ़-साफ़ लिखी थी।

  4. दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में विद्रोहियों की शासन-व्यवस्था बहुत लंबे समय तक चली।

  5. विद्रोही सरकारों ने लूटपाट बंद करने के लिए हुक्मनामे जारी किए।

लोगों को किसलिए लड़ने को कहा गया? (पृ. 274)

"अपने रोज़गार, धर्म, इज़्ज़त और अस्मिता के लिए।" घोषणाओं के शब्दों में यह "व्यापक सार्वजनिक भलाई" की लड़ाई थी।

3.3वैकल्पिक सत्ता की तलाशपृ. 274–275

विद्रोहियों की अपनी सरकार (पृ. 274)

अंग्रेज़ी शासन ढहने के बाद दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में विद्रोहियों ने क्या-क्या किया? हर कार्ड पर एक सवाल है: पहले खुद सोचिए, फिर पलटिए।

इन सब में विद्रोही अठारहवीं सदी के मुग़ल जगत से प्रेरणा ले रहे थे। पुस्तक कहती है, यह जगत "उन तमाम चीज़ों का प्रतीक बन गया जो उनसे छिन चुकी थीं" (पृ. 274)।

चर्चा कीजिए (पृ. 274)

इस पड़ाव की शुरुआत (पृ. 270–271) की दो बातें काम आएँगी: कौन लिख सकता था, और किसके काग़ज़ बचे। पड़ाव 5 की शुरुआत (पृ. 277) में किताब इसी बात पर लौटती है।

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • अधिकतर विद्रोही सिपाही और आम लोग पढ़े-लिखे नहीं थे, इसलिए उनकी अपनी लिखी बातें बहुत कम हैं (पृ. 270)।
  • दमन में विद्रोहियों की आवाज़ भी दबा दी गई; कुछ घोषणाओं और इश्तहारों के सिवा उनका बहुत कम लिखा बचा (पृ. 270)।
  • जीतने वाले अंग्रेज़ों ने अपनी मुश्किलों और बहादुरी के क़िस्से दर्ज किए और विद्रोहियों को "अहसानफ़रामोश और बर्बर लोगों का झुंड" कहकर ख़ारिज कर दिया (पृ. 270)।
  • इसलिए इतिहासकारों को अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनसे "अंग्रेज़ अफ़सरों की सोच का तो पता चलता है" पर यह कम पता चलता है कि विद्रोही क्या चाहते थे (पृ. 271)।
  • ब्रिटिश अख़बार और पत्रिकाएँ विद्रोहियों की हिंसा के ख़ौफ़नाक क़िस्से छापती थीं, जो "प्रतिशोध और सबक सिखाने की माँगों को हवा देती थीं" (पृ. 277)।

किताब के अपने प्रश्न

4विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए?

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में अपीलें जारी हुईं कि हिंदू और मुसलमान, तमाम लोग एकजुट होकर फ़िरंगियों का सफाया करें (पृ. 259)।
  • घोषणाओं में जाति और धर्म का भेद किए बिना समाज के सभी तबकों का आह्वान किया जाता था (पृ. 271)।
  • बहुत-सी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की तरफ़ से या उनके नाम पर थीं, पर उनमें हिंदुओं की भावनाओं का ख़याल रखा गया, और विद्रोह को ऐसा युद्ध बताया गया जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का नफ़ा-नुक़सान बराबर था (पृ. 271)।
  • इश्तहारों में मुग़ल साम्राज्य के तहत विभिन्न समुदायों के सहअस्तित्व का गौरवगान किया गया, और बहादुर शाह के नाम से जारी घोषणा में मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई दी गई (पृ. 271)।
  • आज़मगढ़ घोषणा ज़मींदारों, व्यापारियों, सरकारी कर्मचारियों, कारीगरों और पंडितों-फ़कीरों, हर तबके की शिकायतें अलग-अलग गिनाकर सबको इस जंग में साथ आने को कहती है (पृ. 271–272)।
  • अंग्रेज़ शासन ने दिसंबर 1857 में बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने के लिए 50,000 रुपये ख़र्च किए, पर उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही (पृ. 273)।

7विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फ़र्क़ था?

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विद्रोहियों की अपनी आवाज़ कम बची है: कुछ घोषणाओं और इश्तहारों के सिवा ज़्यादा कुछ नहीं, इसलिए उनकी चाहतें इन्हीं से पढ़नी पड़ती हैं (पृ. 270–271)।
  • घोषणाएँ अंग्रेज़ी राज से जुड़ी हर चीज़ को ठुकराती थीं, और विद्रोही अपनी उस दुनिया को दोबारा बहाल करना चाहते थे जो छिन गई थी (पृ. 273–274)।
  • आज़मगढ़ घोषणा हर तबके से अलग बात करती है: ज़मींदारों से हलके जमा का वादा, देसी व्यापारियों के लिए व्यापार खोलने का वादा, सरकारी कर्मचारियों से 200 और 300 रुपये महीना तनख़्वाह का वादा, कारीगरों से राजाओं और अमीरों के यहाँ रोज़गार का वादा, और पंडितों-फ़कीरों को पवित्र युद्ध में शामिल होने का बुलावा (पृ. 272)।
  • दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में विद्रोही नेता अठारहवीं सदी की पूर्व-ब्रिटिश दुनिया जैसी सत्ता खड़ी करना चाहते थे: पदों पर नियुक्तियाँ, लगान वसूली, सैनिकों की तनख़्वाह और लूटपाट पर रोक के हुक्म (पृ. 274)।
  • गाँवों में विद्रोहियों ने साहूकारों के बहीखाते जलाए; किताब कहती है कि इसमें शायद एक ज़्यादा समतापरक समाज की कल्पना झलकती है, जो घोषणाओं में लिखी नहीं गई (पृ. 274)।
  • दोनों को साथ रखकर देखिए: आज़मगढ़ घोषणा धनवानों से कहती है कि वे अपना जीवन और संपत्ति जनता की कुशलक्षेम के लिए होम कर दें (पृ. 271), जबकि किसान साहूकारों और अमीरों को अपना उत्पीड़क और अंग्रेज़ों का पिट्ठू मानते थे (पृ. 259)।

Checkpoint

  1. 1पुस्तक के अनुसार 1857 को समझने के लिए इतिहासकारों को मजबूरन किस पर निर्भर रहना पड़ता है?

  2. 2विद्रोहियों की तरफ़ से कौन-से दस्तावेज़ हमारे पास हैं?

  3. 3विद्रोहियों के अपने लिखे ब्योरे इतने कम क्यों हैं? पुस्तक की एक वजह चुनिए।

  4. 4आज़मगढ़ घोषणा किस तारीख़ की है?

  5. 5बहादुर शाह के नाम से जारी घोषणा में किन दोनों की दुहाई दी गई?

  6. 6आज़मगढ़ घोषणा ने सरकारी कर्मचारियों से क्या वादा किया?

4दमन

इस पड़ाव का सवाल

अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कैसे कुचला, और इसमें इतना समय क्यों लगा?

पिछली बात से कड़ी पड़ाव 3 के आख़िर में विद्रोही दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में अपनी सत्ता खड़ी करते दिखे (पृ. 274)। अब देखिए कि अंग्रेज़ों ने उसे गिराने के लिए क़ानून, फ़ौज और बड़े ज़मींदारों को जागीरें लौटाने का भरोसा, तीनों का सहारा कैसे लिया (पृ. 275–277)।

इस पड़ाव के आख़िर में: किताब का प्रश्न 5

ज़्यादातर जगहों पर विद्रोहियों की बनाई व्यवस्था अंग्रेज़ों की मार बरदाश्त नहीं कर पाई। अवध में प्रतिरोध सबसे लंबा चला: वहाँ 1857 के आख़िर और 1858 के शुरुआती महीनों तक विद्रोहियों की हुकुम की श्रेणियाँ बनी रहीं (पृ. 275)। पुस्तक कहती है, इस विद्रोह को कुचलना अंग्रेज़ों के लिए "बहुत आसान साबित नहीं हुआ" (पृ. 275)।

फ़ौज भेजने से पहले: मई और जून 1857 के क़ानून (पृ. 275)

हर कार्ड पर एक सवाल है: पहले खुद सोचिए, फिर पलटिए।

सोचिए: जब सिर्फ़ शक के आधार पर, बिना सामान्य मुक़दमे के, सज़ा दी जा सके, तो आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ता होगा?

जवाब देखिए

मई और जून 1857 के क़ानूनों से पूरे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगा, फ़ौजी अफ़सरों के साथ आम अंग्रेज़ों को भी उन हिंदुस्तानियों पर मुक़दमा चलाने और सज़ा देने का हक़ मिल गया जिन पर विद्रोह का शक हो, सामान्य क़ानून और मुक़दमे की प्रक्रिया रोक दी गई, और विद्रोह की "केवल एक ही सज़ा हो सकती है सज़ा-ए-मौत" (पृ. 275)। ऐसे में बेक़सूर आदमी भी अपने को सुरक्षित नहीं मान सकता था, क्योंकि शक ही काफ़ी था और अपना बचाव करने का सामान्य रास्ता बंद था। गाँव-शहर में डर फैलता होगा, और बहुत से लोग अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ कुछ कहने से भी डरते होंगे।

और जानिए तब और अब: आज का क़ानून क्या कहता है?

ख़बरों में आपने "धारा 144" सुनी होगी। वह पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा थी। 1 जुलाई 2024 से उसकी जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 लागू है, और इसी नई संहिता की धारा 531 ने पुरानी संहिता रद्द कर दी। एक सरकारी वेबसाइट पर छपी तुलना-तालिका में नई धारा 163 के सामने पुरानी धारा 144 लिखी है। अब 1857 के मार्शल लॉ (पृ. 275) और आज की धारा 163 को आमने-सामने रखकर देखिए।

1857 में

फ़ौजी अफ़सर, और यहाँ तक कि आम अंग्रेज़ भी, शक वाले हिंदुस्तानियों पर मुक़दमा चलाकर सज़ा दे सकते थे (पृ. 275)।

आज का क़ानून

जब फ़ौरन रोकथाम ज़रूरी हो, तब ज़िला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट, या राज्य सरकार से इसके लिए ख़ास अधिकार पाया कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट किसी को कोई ख़ास काम न करने, या अपने क़ब्ज़े की किसी संपत्ति की कोई ख़ास व्यवस्था करने, का आदेश दे सकता है, ताकि क़ानूनी काम पर लगे किसी व्यक्ति को रुकावट, परेशानी या चोट, जान-सेहत-सुरक्षा को ख़तरा, शांति भंग, बलवा या दंगा रोका जा सके। आदेश लिखित होगा, और उसमें मामले के ज़रूरी तथ्य लिखे होंगे (धारा 163(1))।

1857 में

मई और जून 1857 के क़ानूनों से समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया (पृ. 275)।

आज का क़ानून

आदेश किसी एक व्यक्ति पर, किसी जगह या इलाक़े में रहने वालों पर, या किसी जगह आने-जाने वाले आम लोगों पर लागू हो सकता है (धारा 163(3))। यह दो महीने से ज़्यादा नहीं चल सकता। जान, सेहत या सुरक्षा को ख़तरे से, या बलवे या दंगे से बचाने के लिए राज्य सरकार ज़रूरी समझे, तो अधिसूचना निकालकर इसे छह महीने तक और बढ़ा सकती है (धारा 163(4))।

1857 में

क़ानून और मुक़दमे की सामान्य प्रक्रिया रद्द कर दी गई (पृ. 275)।

आज का क़ानून

आपात हालत में, या जब समय पर सूचना देना संभव न हो, आदेश पहले सूचना दिए बिना भी दिया जा सकता है (धारा 163(2))। पर जिस किसी को आदेश से शिकायत हो, वह उसे हटवाने या बदलवाने की अर्ज़ी दे सकता है: मजिस्ट्रेट के आदेश पर मजिस्ट्रेट को, और राज्य सरकार की बढ़ाई अवधि पर राज्य सरकार को। उसे जल्दी, ख़ुद या वकील के ज़रिए, अपनी बात रखने का मौक़ा मिलेगा; अर्ज़ी नामंज़ूर हो तो उसके कारण लिखित में दर्ज करने होंगे (धारा 163(5)–(7))।

1857 में

विद्रोह की केवल एक ही सज़ा थी: सज़ा-ए-मौत (पृ. 275)।

आज का क़ानून

ऐसा आदेश जानते हुए न मानना भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 223 में अपराध है। अगर इससे क़ानूनी काम पर लगे किसी व्यक्ति को रुकावट, परेशानी या चोट पहुँचे, या इसका जोखिम हो, तो छह महीने तक की सादी क़ैद, या 2,500 रुपये तक जुर्माना, या दोनों। अगर जान, सेहत या सुरक्षा को ख़तरा हो, या बलवा या दंगा हो, या इनकी आशंका हो, तो एक साल तक की क़ैद, या 5,000 रुपये तक जुर्माना, या दोनों। नुक़सान पहुँचाने का इरादा होना ज़रूरी नहीं: आदेश की जानकारी होना काफ़ी है, अगर उसे न मानने से नुक़सान हो या होने की आशंका हो (धारा 223 की व्याख्या)।

ध्यान दीजिए: धारा 163 का आदेश मार्शल लॉ नहीं है। यह एक मजिस्ट्रेट का लिखित, कुछ समय का आदेश है, जिसके ख़िलाफ़ अर्ज़ी दी जा सकती है। हमारे संविधान में मार्शल लॉ को "सेना विधि" कहा गया है, और इसका ज़िक्र अनुच्छेद 34 में आता है: जिस इलाक़े में सेना विधि लागू रही हो, वहाँ व्यवस्था बनाए रखने या बहाल करने के लिए किए गए कामों के लिए संसद क़ानून बनाकर लोगों को क़ानूनी बचाव दे सकती है (संविधान का शब्द है "क्षतिपूर्ति"), और वहाँ दी गई सज़ाओं वग़ैरह को वैध ठहरा सकती है। यह अनुच्छेद सेना विधि लागू करने का तरीक़ा नहीं बताता।

सरकारी पाठ:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (हिंदी), धारा 163 और 5311 जुलाई 2024 से लागू होने की अधिसूचनाभारतीय न्याय संहिता, 2023 (हिंदी), धारा 223भारत का संविधान, अनुच्छेद 34 (अंग्रेज़ी, 1 मई 2026 तक का पाठ)भारत का संविधान (हिंदी, 26 नवंबर 2021 तक का पाठ)नई धारा 163 और पुरानी धारा 144: तुलना-तालिका

अंग्रेज़ों की बढ़त (पुस्तक का मानचित्र 2, पृ. 275)

बिंदु विद्रोह के प्रमुख केंद्र हैं। "आगे" दबाकर अंग्रेज़ों के हमले के रास्ते एक-एक करके देखिए।

सिंधुसतलजयमुनागंगानर्मदागोदावरीपेशावरलाहौरअंबालासहारनपुरमेरठदिल्लीअलीगढ़मथुराआगराअजमेरग्वालियरझाँसीलखनऊकानपुरइलाहाबादआज़मगढ़बनारसजबलपुरम्होअहमदाबादकराचीसूरतऔरंगाबादबम्बईकटककलकत्तादमदमचटगाँव
  • विद्रोह के प्रमुख केंद्र
  • अंग्रेज़ों की बढ़त
  1. 1पंजाब से दिल्ली की ओर कूच, "हालांकि पंजाब कमोबेश शांत था" (पृ. 276)।

  2. 2कलकत्ते से गंगा के मैदान में पश्चिम की ओर। मानचित्र में यह तीर बनारस और इलाहाबाद से होकर आगे बढ़ता है, और इसकी शाखाएँ आज़मगढ़, लखनऊ और कानपुर की ओर जाती हैं। पाठ कहता है, यहाँ बढ़त धीमी रही: अंग्रेज़ों को इलाक़ा "गाँव-दर-गाँव" जीतना पड़ा (पृ. 276)।

  3. 3मानचित्र में एक तीसरा रास्ता भी दिखता है: दक्षिण की ओर से जबलपुर होते हुए झाँसी और इलाहाबाद तक। पाठ में इसका ब्योरा नहीं है।

पुस्तक के मानचित्र 2 पर आधारित रेखाचित्र; तीर अंदाज़न खींचे गए हैं। आधार नक्शा Natural Earth (सार्वजनिक डोमेन) का है, और इसमें आज की कोई राजनीतिक सीमा नहीं दिखाई गई है।

Relief map, rivers and town points: Natural Earth (public domain); seven town points from Wikipedia coordinates.

दिल्ली: जून से सितंबर के आख़िर तक (पृ. 276)

विद्रोहियों की तरह अंग्रेज़ भी दिल्ली के सांकेतिक महत्त्व को समझते थे, इसलिए दोतरफ़ा हमला बोला गया। दिल्ली पर क़ब्ज़े की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई, पर यह मुहिम सितंबर के आख़िर में जाकर पूरी हो पाई। दोनों पक्षों को भारी नुक़सान हुआ। इसकी एक वजह यह थी कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी बचाने के लिए दिल्ली में आ जमे थे।

  1. जून
  2. जुलाई
  3. अगस्त
  4. सितंबर

अवध में कितने लोग विद्रोह के साथ थे? (पृ. 276)

अंग्रेज़ों को अहसास हो गया कि उनका सामना सिर्फ़ सिपाहियों की बग़ावत से नहीं, एक ऐसे विद्रोह से है जिसके पीछे "बेहिसाब जन-समर्थन" था। अवध में फॉरसिथ नाम के एक अंग्रेज़ अफ़सर का अनुमान था:

कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी।

ध्यान दीजिए: यह एक अफ़सर का अनुमान है, गिनती नहीं। अवध को अंग्रेज़ लंबी लड़ाई के बाद मार्च 1858 में जाकर ही फिर क़ब्ज़े में ले पाए।

एक अफ़सर की रिपोर्ट: विद्रोही ग्रामीण (पृ. 275)

ग्रामीण अवध क्षेत्र से रिपोर्ट भेजने वाले एक अफ़सर ने लिखा:

अवध के लोग उत्तर से जोड़ने वाली संचार लाइन पर ज़ोर बना रहे हैं…।

अवध के लोग गाँव वाले हैं…। ये गाँव वाले यूरोपियों की पकड़ से बिलकुल बाहर हैं। पल में बिखर जाते हैं, पल में फिर जुट जाते हैं।

शासकीय अधिकारियों का कहना है कि इन गाँव वालों की संख्या बहुत बड़ी है और उनके पास बाकायदा बंदूकें हैं।

किताब का सवाल (पृ. 275): इस विवरण के अनुसार गाँव वालों से निपटने में अंग्रेज़ों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा?

किताब का जवाब देखिए

अवध से रिपोर्ट भेजने वाला अफ़सर लिखता है, "ये गाँव वाले यूरोपियों की पकड़ से बिलकुल बाहर हैं। पल में बिखर जाते हैं, पल में फिर जुट जाते हैं" (पृ. 275)। उनकी संख्या बहुत बड़ी थी, उनके पास बाक़ायदा बंदूकें थीं, और वे उत्तर से आने वाली संचार की लाइन पर दबाव बनाए हुए थे (पृ. 275)। इसीलिए गंगा के मैदान में अंग्रेज़ों को गाँव-गाँव करके इलाक़ा वापस जीतना पड़ा, और अवध मार्च 1858 में जाकर फिर क़ाबू में आया (पृ. 276)।

बंदूक़ के अलावा दूसरा हथियार (पृ. 276–277)

अंग्रेज़ों ने सैनिक ताक़त का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया, "लेकिन यह उनका एकमात्र हथियार नहीं था।" आज के उत्तर प्रदेश के बड़े इलाक़ों में बड़े भूस्वामी और काश्तकार मिलकर लड़ रहे थे। इस एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने किसके साथ क्या किया? हर समूह पर टैप कीजिए, फिर उसके साथ हुए बरताव पर।

  • बड़े ज़मींदार: आश्वासन: उनकी जागीरें लौटा दी जाएँगी
  • विद्रोह करने वाले ज़मींदार: ज़मीन से बेदख़ल
  • वफ़ादार ज़मींदार: ईनाम

लड़ाई के बाद: तीन फ़ोटो

किताब के पृ. 276 पर चित्र 10.8 के नीचे लिखा है कि 1857 के बाद अंग्रेज़ फ़ोटोग्राफ़रों ने तबाही और खंडहरों की अनगिनत तसवीरें खींचीं। ये तीनों फ़ोटो उन्हीं में से हैं।

ऊँचे टीले पर पत्थर की एक पुरानी मस्जिद: गुंबद, मेहराबें, दीवारों में छेद और ढहे हुए कोने; सामने झाड़ियों के बीच कुछ आदमी बैठे और खड़े हैं।

दिल्ली रिज की एक मस्जिद, 1857–58: किताब का चित्र 10.8 (पृ. 276) यही फ़ोटो है। दीवारों के छेद और ढहे हुए कोने देखिए।

Felice Beato, Mosque piquet on Delhi Ridge after the siege, 1858; Google Art Project. Image: Wikimedia Commons, public domain.

दो मंज़िला पुराना घर, दीवारों पर अनगिनत निशान, ऊपर टूटी छत और एक सीढ़ी; सामने खुला मैदान।

हिंदू राव का घर, दिल्ली: दिल्ली के बाहर रिज पर बना यह घर 1857 में दिल्ली की घेरेबंदी के दिनों में अंग्रेज़ी फ़ौज की मुख्य चौकी था। उखड़ी दीवारें और टूटी छत देखिए: यह घर लड़ाई के बीच खड़ा था।

Photograph by Robert and Harriet Tytler, Delhi, 1858; British Library. Wikimedia Commons, public domain.

टूटी-फूटी बड़ी इमारत: ढही दीवारें, खुले मेहराब, छत से निकली कड़ियाँ; सामने ज़मीन पर पड़ी शहतीरों पर दो आदमी बैठे हैं।

लखनऊ रेज़ीडेंसी, घेरेबंदी के बाद: 1857 में विद्रोही सेनाओं ने लखनऊ को घेरा, तो अंग्रेज़ों ने इसी रेज़ीडेंसी में शरण ली और घेरे में रहे (पृ. 277–278)। घेरा उठने के बाद की यह फ़ोटो दिखाती है कि इमारत का क्या हाल हुआ।

Photograph by Felice A. Beato, Lucknow, 1858. The Cleveland Museum of Art, 2019.170.8, CC0.

सोचिए: इन तसवीरों में लड़ाई के बाद का सन्नाटा है, लड़ने वाले लोग नहीं। फ़ोटो खींचने वाले ने क्या दिखाना चुना, और ये तसवीरें किसके लिए बनी होंगी?

जवाब देखिए

फ़ोटो खींचने वालों ने लड़ने वाले लोग नहीं, लड़ाई के बाद की तबाही चुनी: छलनी दीवारें, टूटी छतें, खंडहर। पुस्तक कहती है कि 1857 के बाद ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़रों ने "तबाही और ध्वंस की असंख्य तसवीरें" उतारी थीं (पृ. 276)। ऐसी फ़ोटो ज़्यादातर अंग्रेज़ों के देखने के लिए बनी होंगी: उनसे लगता था कि अंग्रेज़ों ने कितना झेला और फिर भी जीते। इसी पन्ने पर पुस्तक लखनऊ की एक और फ़ोटो (सिकंदरा बाग) के बारे में लिखती है कि उसका मंज़र "विद्रोह की निरर्थकता की एक ठंडी चेतावनी" देता है (पृ. 276)। यानी ऐसी तसवीरें यह भी कहती थीं कि बग़ावत का अंजाम बर्बादी है।

किताब के अपने प्रश्न

5अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए?

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • मई और जून 1857 में पारित कई क़ानूनों से समूचे उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू किया गया; फ़ौजी अफ़सरों और आम अंग्रेज़ों को भी विद्रोह के संदेह में हिंदुस्तानियों पर मुक़दमा चलाने और सज़ा देने का अधिकार मिला, और विद्रोह की केवल एक सज़ा रखी गई: सज़ा-ए-मौत (पृ. 275)।
  • एक तरफ़ कलकत्ते से और दूसरी तरफ़ पंजाब से दिल्ली की तरफ़ कूच हुआ; दिल्ली पर क़ब्ज़े की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई और सितंबर के आख़िर में जाकर पूरी हो पाई (पृ. 276)।
  • गंगा के मैदान में अंग्रेज़ों को गाँव-दर-गाँव आगे बढ़ना पड़ा, क्योंकि वे ऐसे आंदोलन से जूझ रहे थे "जिसके पीछे बेहिसाब जन-समर्थन मौजूद है" (पृ. 276)।
  • अवध में फॉरसिथ नाम के एक अंग्रेज़ अफ़सर का अनुमान था कि कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी, और यह इलाक़ा मार्च 1858 में जाकर ही दोबारा अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आया (पृ. 276)।
  • बड़े भूस्वामियों और किसानों की एकता तोड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने बड़े ज़मींदारों को भरोसा दिया कि उनकी जागीरें लौटा दी जाएँगी; विद्रोह करने वालों की ज़मीनें छीनी गईं और वफ़ादारों को इनाम दिया गया (पृ. 276–277)।

Checkpoint

  1. 1मई और जून 1857 के क़ानूनों के अनुसार विद्रोह की सज़ा क्या थी?

  2. 2दिल्ली की ओर अंग्रेज़ों का दोतरफ़ा कूच किन दो दिशाओं से हुआ?

  3. 3लंबी लड़ाई के बाद अंग्रेज़ अवध को फिर से अपने नियंत्रण में कब ले पाए?

5विद्रोह की छवियाँ

इस पड़ाव का सवाल

विद्रोह के जो ब्योरे और तसवीरें हम तक पहुँचे, वे किसकी नज़र से बने, और लोगों को क्या महसूस कराना चाहते थे?

पिछली बात से कड़ी दमन के आख़िर में आपने देखा कि 1857 के बाद ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़रों ने "तबाही और ध्वंस की असंख्य तसवीरें" उतारीं (पृ. 276)। अब किताब लड़ाई से हटकर यह देखती है कि विद्रोह को काग़ज़ों और तसवीरों में कैसे दर्ज किया गया (पृ. 277)।

  1. 5.1रक्षकों का अभिनंदन
  2. 5.2अंग्रेज़ औरतें तथा ब्रिटेन की प्रतिष्ठा
  3. 5.3प्रतिशोध और सबक़
  4. 5.4दहशत का प्रदर्शन
  5. 5.5दया के लिए कोई जगह नहीं
  6. 5.6राष्ट्रवादी दृश्य कल्पना

इस पड़ाव के आख़िर में: किताब का प्रश्न 8

हम कैसे जानते हैं?पृ. 277

किताब यह हिस्सा एक सवाल से शुरू करती है (पृ. 277): हम इस विद्रोह, विद्रोहियों की गतिविधियों और उन पर हुए दमन के बारे में जानते कैसे हैं? पहले देखिए कि किसके काग़ज़ बचे, फिर तसवीरों की ओर चलिए।

अख़बारों ने आग में घी डाला (पृ. 277)

अंग्रेज़ों की तरफ़ के ब्योरे सिर्फ़ फ़ाइलों में बंद नहीं रहे। ब्रिटिश अख़बारों और पत्रिकाओं में सैनिक विद्रोहियों की हिंसा "बड़े लोमहर्षक शब्दों में" (रोंगटे खड़े कर देने वाले ढंग से) छापी जाती थी। ये कहानियाँ जनता की भावनाएँ भड़काती थीं और "प्रतिशोध और सबक सिखाने की माँगों को हवा देती थीं" (पृ. 277)। आगे के चित्रों में देखिए कि कलाकारों ने इसी "सदमे और पीड़ा" को कैसे आकार दिया (पृ. 279)।

यह आवाज़ किसकी है? (पृ. 260–277)

ये सब इसी अध्याय में आ चुकी हैं। हर एक को उस खाने में डालिए जिसकी आवाज़ वह है। अख़बार और गीत हिंदुस्तानी आवाज़ें हैं, पर विद्रोहियों के अपने शब्द नहीं, इसलिए उनका खाना अलग है।

अंग्रेज़ों और हिंदुस्तानियों ने विद्रोह की बहुत-सी तसवीरें बनाईं: पेंटिंग, पेंसिल रेखांकन, उत्कीर्ण चित्र, पोस्टर, कार्टून और बाज़ार-प्रिंट (पृ. 277)। हर तसवीर कुछ कहना चाहती है। इस पड़ाव में हम तसवीर पढ़ना सीखेंगे।

इस पड़ाव के चित्र आपकी किताब में हैं। हर चित्र के साथ उसका पृष्ठ लिखा है: किताब में चित्र खोलिए, फिर यहाँ हर पत्ता खोलकर वह चीज़ चित्र में ढूँढिए।

लंदन के अख़बार में 1857

लंदन का साप्ताहिक "द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़" 1857 में भारत की ख़बरें चित्रों के साथ छापता था। ये चित्र भारत से भेजे गए रेखाचित्रों और फ़ोटो पर बनते थे। नीचे के दोनों रेखाचित्र अंग्रेज़ों के ठिकानों से भेजे गए थे: एक दिल्ली के बाहर अंग्रेज़ी डेरे से, दूसरा इलाहाबाद के क़िले से।

मीनार की छत पर खड़े अंग्रेज़ अफ़सर और एक संतरी; नीचे फैला मैदान और दूर क्षितिज पर दिल्ली शहर, उसकी मीनारें और गुंबद।

26 सितंबर 1857 का अंक: फ़्लैगस्टाफ़ टावर से दिल्ली की ओर देखते अंग्रेज़ अफ़सर। तब दिल्ली विद्रोहियों के हाथ में थी, और अंग्रेज़ी फ़ौज शहर के बाहर रिज पर डेरा डाले थी।

The Illustrated London News, 26 September 1857. Wikimedia Commons, public domain.

ऊपर से देखा गया क़िले का बड़ा अहाता: क़तार में खड़े सिपाही, तंबू, बैलगाड़ियाँ; दीवार के पार मैदान और पेड़।

5 सितंबर 1857 का अंक: इलाहाबाद के क़िले में कूच के लिए तैयार हेवलॉक की फ़ौज, जुलाई 1857। चित्र के नीचे छपा शीर्षक कहता है कि यह फ़ौज कानपुर को "फिर से जीतने" निकल रही है।

The Illustrated London News, 5 September 1857. Wikimedia Commons, public domain.

किसकी नज़र से? ये चित्र अंग्रेज़ी डेरों से बने और लंदन के पाठकों के लिए छपे। देखिए: चित्र के बीच में कौन है, और कौन किनारे पर है या दिखता ही नहीं? पृ. 278 पर चित्र 10.10, बार्कर की पेंटिंग, से मिलाइए।

5.1रक्षकों का अभिनंदनपृ. 277–279

लखनऊ की घेरेबंदी: पहले कहानी (पृ. 278)

घटनाओं को सही क्रम में लगाइए।

▲ पहले

  1. 1लॉरेंस मारे गए; कर्नल इंगलिस के नेतृत्व में रेज़ीडेंसी सुरक्षित रहा
  2. 220 दिन बाद: नया कमांडर कॉलिन कैम्पबेल भारी सेना लेकर पहुँचा और घेरे से छुड़ाया
  3. 3विद्रोही टुकड़ियों ने लखनऊ पर घेरा डाला
  4. 425 सितंबर: जेम्स ऑट्रम और हेनरी हेवलॉक पहुँचे
  5. 5कमिश्नर हेनरी लॉरेंस ने ईसाइयों को इकट्ठा करके रेज़ीडेंसी में पनाह ली

▼ बाद में

“द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ”, टॉमस जोन्स बार्कर, 1859

किताब में: पृ. 278, चित्र 10.10

यह पेंटिंग कैम्पबेल के आगमन के क्षण का जश्न मनाती है। हर पत्ता खोलिए और वह चीज़ चित्र में ढूँढिए।

बड़ी पेंटिंग: बीच में तीन अंग्रेज़ अफ़सर हाथ मिला रहे हैं, पास में सफ़ेद घोड़ा; पीछे धुएँ में लखनऊ की मीनारें और गुंबद; नीचे के किनारे पर कुछ घायल और ज़मीन पर पड़े लोग।

टॉमस जोन्स बार्कर, 1859: यही पेंटिंग किताब में चित्र 10.10 है। पहले इसे ध्यान से देखिए, फिर नीचे के पत्ते खोलिए।

Thomas Jones Barker, The Relief of Lucknow, 1857, oil on canvas, 1859. National Portrait Gallery, London, NPG 5851. Image: Wikimedia Commons, public domain.

अंग्रेज़ जनता ने क्या समझा? (पृ. 278–279)

ऐसे चित्रों से अंग्रेज़ जनता में अपनी सरकार के प्रति भरोसा पैदा होता था: "संकट की घड़ी जा चुकी है और विद्रोह ख़त्म हो चुका है : अंग्रेज़ जीत चुके हैं।"

5.2अंग्रेज़ औरतें तथा ब्रिटेन की प्रतिष्ठापृ. 279–280

“इन मेमोरियम”, जोज़ेफ़ नोएल पेटन

किताब में: पृ. 279, चित्र 10.11

भारत में औरतों और बच्चों पर हुई हिंसा की कहानियाँ पढ़कर ब्रिटेन की जनता बदला लेने और सबक सिखाने की माँग करने लगी (पृ. 279)। उसी माहौल में पेटन ने यह चित्र बनाया।

पेंटिंग: पत्थर की एक कोठरी में अंग्रेज़ औरतें और बच्चे एक-दूसरे से लिपटे हैं; बीच की औरत ऊपर देख रही है और एक लड़की खुली बाइबल पकड़े है; पीछे सीढ़ियों और खिड़की से स्कॉटिश सैनिक आते दिखते हैं।

जोज़ेफ़ नोएल पेटन, बदला हुआ रूप: यही पेंटिंग किताब में चित्र 10.11 है। इसे देखकर नीचे की हर बात सही खाने में डालिए।

Joseph Noel Paton, In Memoriam (shown 1858, later altered), oil on panel, private collection. Image: Wikimedia Commons, public domain.

यह चित्र बदला क्यों गया?

पेटन ने यह पेंटिंग पहली बार 1858 में लंदन की रॉयल अकादमी की प्रदर्शनी में दिखाई। तब इसमें हिंदुस्तानी सिपाही दिखाए गए थे, जो इन औरतों पर हमला करने आ रहे थे। बहुत से दर्शक इस पर भड़क उठे। तब पेटन ने सिपाहियों की जगह स्कॉटिश सैनिकों की बचाव टुकड़ी बना दी। आज यही बदला हुआ रूप मिलता है, और 1862 में छापने के लिए इसी का उत्कीर्ण चित्र बना।

सोचिए: हमलावर हटा देने के बाद भी यह चित्र डर कैसे जगाता है?

जवाब देखिए

पुस्तक कहती है कि "इन मेमोरियम" में "भीषण हिंसा नहीं दिखती : उसकी तरफ़ सिर्फ़ एक इशारा है" (पृ. 280)। औरतें और बच्चे एक घेरे में सिमटे, बेबस और मासूम दिखते हैं, जैसे किसी भयानक घड़ी का इंतज़ार कर रहे हों (पृ. 279), और देखने वाला ख़ुद सोचने लगता है कि उनके साथ क्या होने वाला था। विद्रोही चित्र में दिखते ही नहीं, फिर भी वे हिंसक और क्रूर लगते हैं, और इससे देखने वाले की कल्पना और ग़ुस्सा, दोनों भड़कते हैं (पृ. 280)।

और पढ़िए

हर बात को सही खाने में डालिए: चित्र में सचमुच दिखती है, या सिर्फ़ उसका इशारा है?

कानपुर में मिस व्हीलर

किताब में: पृ. 280, चित्र 10.12

कुछ दूसरे रेखाचित्रों और पेंटिंग्स में औरतें अलग तेवर में दिखती हैं: विद्रोहियों के हमले से अपना बचाव करती हुई, "वीरता की मूर्ति" के रूप में (पृ. 280)।

एक कमरे के बीच खड़ी एक जवान अंग्रेज़ औरत पिस्तौल चला रही है; बाईं ओर तलवार उठाए एक सिपाही पीछे गिर रहा है, दाईं ओर से तलवार ताने और आदमी आ रहे हैं; फ़र्श पर दो आदमी पड़े हैं, पास में एक बंदूक, एक तलवार और एक किताब।

किताब का चित्र 10.12 यही है। नीचे के तीन कार्ड पलटिए और हर बात तसवीर में ढूँढिए।

Charles Ball, The History of the Indian Mutiny, vol. 1 (London Printing and Publishing Company), plate “Miss Wheeler defending herself against the sepoys at Cawnpore”. Image: Internet Archive, public domain.

बाइबल वहाँ क्यों दिखाई गई होगी?

किताब का जवाब देखिए

पुस्तक कहती है, इज़्ज़त और ज़िंदगी की रक्षा के लिए औरत के संघर्ष की आड़ में "एक गहरे धार्मिक विचार" को पेश किया गया है: "यह ईसाइयत की रक्षा का संघर्ष है" (पृ. 280)।

5.3प्रतिशोध और सबक़पृ. 280–281

ब्रिटेन में जैसे-जैसे गुस्से और सकते का माहौल बना, बदले की माँग बुलंद होती गई। चित्रों और ख़बरों ने ऐसा माहौल रचा जिसमें "हिंसक दमन और प्रतिशोध को लाज़िमी और वाजिब" माना जाने लगा। विद्रोह से आतंकित अंग्रेज़ों को लगता था कि उन्हें अपनी अपराजयता का प्रदर्शन करना ही चाहिए।

“जस्टिस (न्याय)”, पन्च, 12 सितंबर 1857

किताब में: पृ. 280, चित्र 10.13

लहराते बालों वाली एक विशाल औरत, एक हाथ में ऊपर उठी तलवार और दूसरे में ढाल, ज़मीन पर पड़े सिपाहियों पर पाँव रखे आगे बढ़ रही है; दाईं ओर घुटनों के बल बैठी औरतें और बच्चे डरे हुए हैं; पीछे दूर बंदूकें लिए सैनिक।

किताब का चित्र 10.13 यही है। नीचे पुस्तक का ब्योरा पढ़िए और हर बात तसवीर में ढूँढिए।

John Tenniel, “Justice”, Punch, September 1857. Image: Wikimedia Commons, public domain.

न्याय की एक रूपकात्मक स्त्री छवि: एक हाथ में तलवार, दूसरे में ढाल। मुद्रा आक्रामक है, चेहरे पर भयानक गुस्सा और बदला लेने की तड़प। वह सिपाहियों को पैरों तले कुचल रही है, और भारतीय औरतों और बच्चों की भीड़ भय से काँप रही है (पृ. 281)।

किताब में चित्र के नीचे पट्टी पर लिखा है: "कानपुर में हुए भीषण जनसंहार के समाचार ने समूचे इंग्लैंड में प्रतिशोध की गहरी चाह और भयानक अपमान का भाव पैदा कर दिया है।"

“बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध”, पन्च, 1857

किताब में: पृ. 281, चित्र 10.14

घास के बीच छलाँग लगाता एक बड़ा शेर, मुँह खोले, एक बाघ पर झपट रहा है; बाघ ज़मीन पर पड़ी एक औरत और एक बच्चे के ऊपर खड़ा है।

किताब का चित्र 10.14 यही है। नीचे के सवाल से पहले शेर, बाघ, और बाघ के नीचे पड़ी औरत और बच्चे को ध्यान से देखिए।

“The British Lion’s Vengeance on the Bengal Tiger”, Punch, 22 August 1857. Image: Wikimedia Commons, public domain.

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • तसवीर के नीचे लिखा है "बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध" (पृ. 281), यानी इसकी सोच बदले की है।
  • शेर ब्रिटेन का जाना-माना प्रतीक है, और "बंगाल टाइगर" का इशारा बंगाल आर्मी के बाग़ी सिपाहियों की तरफ़ लगता है; शेर का झपटना दिखाता है कि ब्रिटेन सज़ा देने आ पहुँचा है।
  • बाघ जिन औरत और बच्चे के ऊपर खड़ा है, वे उन अंग्रेज़ औरतों और बच्चों की याद दिलाते लगते हैं जिन पर हुई हिंसा की ख़बरों ने ब्रिटेन में बदले की माँग जगाई (पृ. 279, 281)।
  • ऐसी तसवीरें "निर्मम दमन और हिंसक प्रतिशोध की ज़रूरत पर ज़ोर" दे रही थीं (पृ. 281), और कड़ी सज़ा को ज़रूरी और जायज़ दिखा रही थीं (पृ. 280)।

ब्रिटिश प्रेस में ऐसी असंख्य दूसरी तसवीरें और कार्टून थे, "जो निर्मम दमन और हिंसक प्रतिशोध की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहे थे" (पृ. 281)।

5.4दहशत का प्रदर्शनपृ. 282

प्रतिशोध और सबक़ सिखाने की चाह इस बात में भी दिखती है कि विद्रोहियों को कितने निर्मम ढंग से मौत के घाट उतारा गया: उन्हें तोपों के मुहाने पर बाँधकर उड़ा दिया गया या फाँसी पर लटका दिया गया। इन सज़ाओं की तसवीरें आम पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए दूर-दूर तक पहुँच रही थीं। ऐसी एक तसवीर के बारे में पुस्तक कहती है: "यह सामान्य दंड का दृश्य नहीं है, यह दहशत का प्रदर्शन है।" लोगों को अहसास कराया जा रहा था कि सज़ा किसी बंद जगह पर नहीं, लोगों के बीच भी दी जा सकती है।

5.5दया के लिए कोई जगह नहींपृ. 282–283

जब प्रतिशोध के लिए ही शोर मच रहा हो, तो नर्म सुझाव मज़ाक का पात्र बनकर ही रह जाते हैं। जब गवर्नर-जनरल कैनिंग ने ऐलान किया कि नर्मी और दया भाव से सिपाहियों की वफ़ादारी हासिल करने में मदद मिलेगी, तो ब्रिटिश प्रेस में उनका मज़ाक उड़ाया गया।

“द क्लिमेंसी ऑफ़ केनिंग” (केनिंग का दयाभाव), पन्च, 24 अक्टूबर 1857

किताब में: पृ. 282, चित्र 10.17

कुर्सी पर बैठे एक लंबे-चौड़े अंग्रेज़ सज्जन मुस्कुराते हुए एक छोटे सिपाही के सिर पर हाथ रखे हैं; वर्दी और पगड़ी पहने सिपाही के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कटार है।

किताब का चित्र 10.17 यही है। नीचे के कार्ड पलटिए और हर बात तसवीर में ढूँढिए।

“The Clemency of Canning”, Punch, 24 October 1857 (vol. 33). Image: Internet Archive, public domain.

नीचे की पट्टी पर गवर्नर जनरल कहते हैं: "बिलकुल सही, फिर वे उसे घिनौनी बंदूकों से नहीं उड़ाएँगे बशर्ते वो एक अच्छा सिपाही बनने का वादा करे।"

सोचिए: कार्टून बनाने वाला कैनिंग की दया को सही ठहरा रहा है या उसका मज़ाक उड़ा रहा है? सिपाही के हाथ के हथियारों से आपको यह कैसे पता चलता है?

जवाब देखिए

कार्टून बनाने वाला मज़ाक उड़ा रहा है: कैनिंग ने कहा था कि नर्मी और दया से सिपाहियों की वफ़ादारी हासिल करने में मदद मिलेगी, और ब्रिटिश प्रेस में इसी बात का मज़ाक उड़ाया गया (पृ. 282)। कार्टून में कैनिंग एक नेक बुज़ुर्ग की तरह खड़े हैं, और उनका हाथ जिस सिपाही के सिर पर है, वह "अभी भी नंगी तलवार और कटार लिए हुए है और दोनों से ख़ून टपक रहा है" (पृ. 282–283)। ख़ून टपकते हथियार थामे सिपाही से "अच्छा सिपाही" बनने का वादा लेना (पृ. 282) देखने वाले को बेतुका लगे, यही कार्टून बनाने वाला चाहता है।

पुस्तक कहती है, यह "एक ऐसी छवि थी जो उस समय की बहुत सारी ब्रिटिश तसवीरों में बार-बार सामने आती थी" (पृ. 283)।

5.6राष्ट्रवादी दृश्य कल्पनापृ. 283

बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी आंदोलन को 1857 के घटनाक्रम से प्रेरणा मिल रही थी। इसे "प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" के रूप में याद किया जाता था, जिसमें देश के हर तबके के लोगों ने साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। इतिहास लेखन की तरह कला और साहित्य ने भी 1857 की स्मृति को जीवित रखा।

रानी झाँसी

कविताओं में एक हाथ में घोड़े की रास और दूसरे हाथ में तलवार थामे, अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए लड़ने वाली रानी के शौर्य का गौरवगान हुआ। लोक छवियों में रानी लक्ष्मीबाई को प्रायः फ़ौजी पोशाक में, घोड़े पर सवार और एक हाथ में तलवार लिए दिखाया जाता है: "अन्याय और विदेशी शासन के दृढ़ प्रतिरोध का प्रतीक"।

नीले-सफ़ेद घोड़े पर सवार रानी: लाल कपड़े, सिर पर कलगी वाला मुकुट, गले में मोतियों की मालाएँ; एक हाथ में ऊपर उठी तलवार, दूसरे में लगाम।

कालीघाट, कोलकाता, लगभग 1885: कोलकाता के कालीघाट के चित्रकारों का बनाया रानी लक्ष्मीबाई का चित्र, विद्रोह के लगभग तीस साल बाद का। घोड़ा, एक हाथ में लगाम और दूसरे में तलवार: वही रूप जिसकी बात पुस्तक करती है (पृ. 283)। पोशाक देखिए: यहाँ रानी फ़ौजी वर्दी में नहीं, मुकुट और गहनों में हैं।

Rani Lakshmi Bai of Jhansi on horseback, Kalighat, Kolkata, ca. 1885; Victoria and Albert Museum, IS.655-1950. Image: Wikimedia Commons, public domain.

सफ़ेद घोड़े पर सवार रानी: लाल धारीदार कपड़े, हरा दुपट्टा, सिर पर कलगी वाला मुकुट; एक हाथ में ऊपर उठी तलवार, दूसरे में लगाम।

कालीघाट, कोलकाता, लगभग 1890: उन्हीं चित्रकारों का एक और चित्र। दोनों को मिलाइए: घोड़ा, उठी हुई तलवार और कलगी वाला मुकुट लगभग एक जैसे हैं। रानी की एक छवि बन चुकी थी, जो बार-बार बनाई जाती थी।

The Mutiny of the Heroine Rani Lakshmi Bai of Jhansi, Kalighat, Kolkata, c. 1890. The Cleveland Museum of Art, 2003.146, CC0.

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता "झाँसी की रानी"

देश के अलग-अलग भागों में बच्चे इस कविता की यह पंक्ति पढ़ते हुए बड़े हो रहे थे: "खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी" (पृ. 283)। कविता का पहला छंद पढ़िए। यही पंक्ति हर छंद के अंत में लौटती है।

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पूरी कविता पढ़िए: कविता कोश

कविता रानी को किस रूप में दिखाती है? पुस्तक इस छवि के बारे में क्या कहती है?

जवाब देखिए

"मर्दानी" यानी मर्दों की तरह लड़ने वाली। पुस्तक (पृ. 283) कहती है कि राष्ट्रवादी कल्पना में रानी को एक मर्दाना शख़्सियत की तरह दिखाया गया, जो "दुश्मनों का पीछा करते हुए और ब्रिटिश सिपाहियों को मौत की नींद सुलाते हुए आगे बढ़ रही है"। कविता का पहला छंद 1857 को एक पुरानी तलवार के फिर से चमक उठने जैसा बताता है, जब सबने फिरंगी को दूर करने की ठान ली। ऊपर के कालीघाट चित्रों में भी रानी घोड़े पर हैं और हाथ में तलवार है। किताब का चित्र 10.18, एक फ़िल्म का पोस्टर, इसी मर्दाना योद्धा वाली छवि को आगे ले गया।

फ़िल्म का पोस्टर

किताब में: पृ. 283, चित्र 10.18

फ़िल्मों और पोस्टरों ने रानी लक्ष्मीबाई की छवि को एक मर्दाना योद्धा के रूप में स्थापित करने में मदद की।

अब आप ख़ुद एक तसवीर पढ़िएपृ. 283

किसकी नज़र से? (पृ. 277–283)

हर तसवीर या पंक्ति को उस नज़र के खाने में डालिए जिससे वह बनी है।

किसी भी स्रोत से चार सवाल पूछिए

ये सवाल हमारी तरफ़ से हैं, किताब के नहीं। हर कार्ड पलटिए; पीछे इसी अध्याय से एक मिसाल है।

एक तसवीर, बिना पते के

किताब में: पृ. 284, चित्र 10.19

अभ्यास के सवालों के साथ एक तसवीर छपी है, जिसका शीर्षक है "विद्रोहियों के चेहरे"। कैप्शन में न चित्र बनाने वाले का नाम है, न तारीख़।

सोचिए: ऊपर के चार सवालों में से किनका जवाब इस कैप्शन से नहीं मिलता? और तब इस तसवीर को विद्रोहियों के बारे में सबूत की तरह इस्तेमाल करने से पहले आप क्या पता करना चाहेंगे?

जवाब देखिए

कैप्शन में न चित्र बनाने वाले का नाम है, न तारीख़ (पृ. 284), इसलिए किसने बनाया और कब बनाया, इन दोनों सवालों के जवाब नहीं मिलते; किसके लिए बना और क्या छूट गया, यह भी पता नहीं चलता। इसे सबूत मानने से पहले पता कीजिए कि चित्र किसने बनाया (अंग्रेज़ ने या हिंदुस्तानी ने), कब बनाया (विद्रोह के दौरान या बरसों बाद), और किसके कहने पर इन चेहरों को विद्रोहियों का बताया गया। यह इसलिए ज़रूरी है कि पुस्तक के मुताबिक़ तसवीरों से यह पता चलता है कि उन्हें बनाने वाले चित्रकार घटनाओं को कैसे देखते थे (पृ. 283)।

चर्चा कीजिए (पृ. 283)

इस भाग में दिए गए प्रत्येक चित्र के विभिन्न तत्वों की जाँच कीजिए और चर्चा कीजिए कि उनके ज़रिए आपको कलाकार की सोच को पहचानने में कैसे मदद मिलती है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • बार्कर, "द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ" (चित्र 10.10): बीच में कैम्पबेल, ऑट्रम और हेवलॉक उजाले में हैं; आसपास खड़े लोगों के हाथ निगाह को बीच की ओर ले जाते हैं; पीछे टूटा-फूटा रेज़ीडेंसी और बीच में विजयी घोड़े। सोच: संकट ख़त्म हो गया, अंग्रेज़ जीत चुके हैं (पृ. 278–279)।
  • पेटन, "इन मेमोरियम" (चित्र 10.11): औरतें और बच्चे घेरे में एक-दूसरे से लिपटे, लाचार और मासूम; हिंसा दिखती नहीं, सिर्फ़ उसका इशारा है; विद्रोही चित्र में हैं ही नहीं; पीछे ब्रिटिश टुकड़ियाँ रक्षक बनकर आ रही हैं। सोच: दर्शक की कल्पना और गुस्सा भड़के, और अंग्रेज़ रक्षक दिखें (पृ. 279–280)।
  • मिस व्हीलर (चित्र 10.12): बीच में अकेली डटी औरत, उस पर चार कद्दावर हमलावर, फ़र्श पर बाइबल। सोच: औरत वीरता की मूर्ति, विद्रोही दानव, और लड़ाई ईसाइयत की रक्षा की (पृ. 280)।
  • "जस्टिस", पन्च (चित्र 10.13): तलवार और ढाल लिए न्याय की स्त्री-छवि, चेहरे पर गुस्सा और बदले की चाह, पैरों तले सिपाही, डरी हुई भारतीय औरतें और बच्चे। सोच: बदला लेना ही न्याय है (पृ. 280–281)।
  • शेर और बाघ, पन्च (चित्र 10.14): नीचे की पट्टी कहती है, "बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध"; बाघ एक औरत और बच्चे के ऊपर खड़ा है। इससे यह पढ़ा जा सकता है कि सिपाही को हिंसक जानवर और अंग्रेज़ी सत्ता को बदला लेने वाला शेर दिखाया गया (पृ. 281)।
  • "द क्लिमेंसी ऑफ़ केनिंग", पन्च (चित्र 10.17): कैनिंग एक नेक बुज़ुर्ग की तरह उस सिपाही के सिर पर हाथ रखे हैं जिसकी तलवार और कटार से ख़ून टपक रहा है। सोच: नर्मी का मज़ाक; दया के लिए कोई जगह नहीं (पृ. 282–283)।
  • रानी लक्ष्मीबाई की लोक छवियाँ: फ़ौजी पोशाक, घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार; अन्याय और विदेशी शासन के दृढ़ प्रतिरोध का प्रतीक। ये चित्र राष्ट्रवादी सोच को गढ़ने में मदद करते थे (पृ. 283)।
  • हर चित्र में चार बातें देखिए: बीच में कौन है, उजाले में कौन है, कौन दिखता ही नहीं, और किसके हाथ में हथियार है। इन्हीं से पता चलता है कि चित्रकार घटनाओं को कैसे देखते थे (पृ. 283)।

किताब के अपने प्रश्न

81857 के विद्रोह के बारे में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों का किस तरह विश्लेषण करते हैं?

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विद्रोह की छवियाँ अंग्रेज़ों और हिंदुस्तानियों, दोनों ने बनाईं: पेंटिंग, पेंसिल रेखांकन, उत्कीर्ण चित्र, पोस्टर, कार्टून और बाज़ार-प्रिंट (पृ. 277)।
  • टॉमस जोन्स बार्कर के चित्र ‘रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ’ (1859) में कैम्पबेल, ऑट्रम और हेवलॉक बीच में, रोशनी में हैं (पृ. 277–278); ऐसे चित्रों से अंग्रेज़ जनता को भरोसा मिला कि संकट ख़त्म हो चुका है और अंग्रेज़ जीत चुके हैं (पृ. 279)।
  • जोज़ेफ़ नोएल पेटन की “इन मेमोरियम” में भीषण हिंसा नहीं दिखती, सिर्फ़ उसका इशारा है: अंग्रेज़ औरतें और बच्चे लाचार दिखते हैं और पृष्ठभूमि में ब्रिटिश टुकड़ियाँ रक्षक बनकर आगे बढ़ रही हैं (पृ. 279–280)।
  • पन्च के चित्र "जस्टिस" में न्याय की स्त्री छवि सिपाहियों को पैरों तले कुचल रही है (पृ. 280–281); ब्रिटिश प्रेस की अनगिनत तसवीरों और कार्टूनों ने "निर्मम दमन और हिंसक प्रतिशोध की ज़रूरत पर ज़ोर" दिया, और जब कैनिंग ने नर्मी और दया की बात कही तो ब्रिटिश प्रेस में उसका मज़ाक उड़ाया गया (पृ. 281–282)।
  • राष्ट्रवादी आंदोलन ने 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया, और लोक छवियों में रानी लक्ष्मीबाई को अक्सर फ़ौजी पोशाक में, घोड़े पर सवार और एक हाथ में तलवार लिए दिखाया जाता है: "अन्याय और विदेशी शासन के दृढ़ प्रतिरोध का प्रतीक" (पृ. 283)।
  • चित्र को पढ़ने का तरीक़ा किताब ख़ुद दिखाती है: बीच में कौन है, रोशनी किस पर है, कौन लाचार दिखाया गया है (पृ. 278–279)। किताब कहती है कि ये तसवीरें बताती हैं कि बनाने वाले घटनाओं को कैसे देखते थे, और इन्होंने लोगों की भावनाएँ भी गढ़ीं (पृ. 283)।

Checkpoint

  1. 1टॉमस जोन्स बार्कर की पेंटिंग “द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ” किस क्षण का जश्न मनाती है?

  2. 2“इन मेमोरियम” में भीषण हिंसा कैसे दिखाई गई है?

  3. 3नरमी और दया की बात कहने वाले गवर्नर-जनरल कैनिंग के साथ ब्रिटिश प्रेस ने क्या किया?

सार और काल-रेखा

अब पूरे अध्याय को एक साथ देखिए। पहले घटनाओं को क्रम से जमाइए, फिर हर पड़ाव के सवाल का एक वाक्य वाला जवाब पलटकर देखिए। उसके बाद किताब का नक्शे वाला प्रश्न 10, निबंध वाला प्रश्न 9 और परियोजना कार्य।

इस अध्याय की तीन बड़ी बातें

  1. छिटपुट सैनिक विद्रोह जल्दी ही एक "चौतरफ़ा विद्रोह" बन गया, और आम लोग भी इसमें शामिल हो गए (पृ. 259)।
  2. अफ़वाहें इसलिए फैलीं क्योंकि उनमें लोगों के गहरे डर की गूँज थी: 1820 के दशक से चल रही अंग्रेज़ी नीतियों का डर (पृ. 265)।
  3. विद्रोह को जानने के लिए इतिहासकारों को ज़्यादातर अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है (पृ. 271), और तसवीरें बताती हैं कि उन्हें बनाने वाले घटनाओं को कैसे देखते थे (पृ. 283)। इसलिए हर स्रोत से पूछिए: यह किसने, किसके लिए कहा?

काल-रेखा जमाइए (पृ. 284)

घटनाओं को पहले से बाद के क्रम में लगाइए। तारीख़ें आख़िर में दिखेंगी।

▲ पहले

  1. 1चिनहट के युद्ध में अंग्रेज़ों की हार
  2. 2अवध में सहायक संधि लागू
  3. 3लंबी लड़ाई के बाद अवध फिर अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में
  4. 4मेरठ में सैनिक विद्रोह
  5. 5युद्ध में रानी झाँसी की मृत्यु
  6. 6नवाब वाजिद अली शाह गद्दी से हटाए गए, अवध का अधिग्रहण
  7. 7युद्ध में शाह मल की मृत्यु
  8. 8दिल्ली में बहादुर शाह सांकेतिक नेतृत्व स्वीकार करते हैं
  9. 9हेवलॉक और ऑट्रम की टुकड़ियाँ लखनऊ रेज़ीडेंसी में दाख़िल

▼ बाद में

ध्यान दीजिए: पृ. 284 की काल-रेखा में शाह मल की मृत्यु 1858 वाले हिस्से में छपी है, पर पृ. 263 का पाठ साफ़ कहता है, "जुलाई 1857 में शाह मल को युद्ध में मार दिया गया"। यहाँ पाठ की तारीख़ ली गई है।

हर पड़ाव, एक वाक्य में

पहले खुद जवाब सोचिए, फिर कार्ड पलटिए।

शब्द जोड़िए

हर संकेत के लिए अक्षरों को सही क्रम में टैप कीजिए। सारे शब्द इसी अध्याय से हैं, साथ में पृष्ठ लिखा है।

0 / 7 शब्द

  1. हथियार रखने की जगह, जिस पर सिपाहियों ने सबसे पहले धावा बोला (पृ. 259)

    शस्त्रागार

  2. हर रेजीमेंट के देशी अफ़सरों की सभा, जो रात को जुटती थी (पृ. 261)

    पंचायत

  3. गाँव-गाँव भेजी जाने वाली रोटी (पृ. 265)

    चपाती

  4. वेलेज़्ली की व्यवस्था: सहायक ___ (पृ. 266)

    संधि

  5. अवध के बड़े भूस्वामी; अंग्रेज़ों से पहले अवध के 67 प्रतिशत गाँव इनके पास थे (पृ. 268)

    ताल्लुक़दार

  6. पृ. 268 का शीर्षक: "___ राज का आना और एक दुनिया का ख़ात्मा"

    फ़िरंगी

  7. आज़मगढ़ में 25 अगस्त 1857 को जारी हुई (पृ. 271)

    घोषणा

कितनी दूर, कितनी पास? (पृ. 285, प्रश्न 10)

भारत के मानचित्र पर कलकत्ता (कोलकाता), बम्बई (मुंबई), मद्रास (चेन्नई) को चिह्नित कीजिए जो 1857 में ब्रिटिश सत्ता के तीन मुख्य केंद्र थे। मानचित्र 1 और 2 को देखिए तथा उन इलाक़ों को चिह्नित कीजिए जहाँ विद्रोह सबसे व्यापक रहा। औपनिवेशिक शहरों से ये इलाक़े कितनी दूर या कितनी पास थे?

पहले तीन शहरों में से एक चुनिए, फिर विद्रोह के किसी केंद्र पर टैप कीजिए।

सिंधुसतलजयमुनागंगानर्मदागोदावरीकृष्णाकावेरीपेशावरलाहौरअंबालासहारनपुरमेरठदिल्लीअलीगढ़मथुराआगराअजमेरग्वालियरझाँसीलखनऊकानपुरइलाहाबादआज़मगढ़बनारसजबलपुरम्होअहमदाबादकराचीसूरतऔरंगाबादबम्बईकटककलकत्तादमदमचटगाँवमद्रास

दूरियाँ हमने शहरों के अक्षांश-देशांतर से सीधी रेखा में निकाली हैं; किताब में दूरियाँ नहीं दी गई हैं, और सड़क या नदी के रास्ते से सफ़र इससे लंबा होता। मानचित्र 2 के केंद्रों में बम्बई और कलकत्ता भी हैं, इसलिए जवाब सोच-समझकर लिखिए।

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विद्रोह सबसे व्यापक उत्तर भारत में रहा: दिल्ली, गंगा घाटी की छावनियाँ और अवध, जहाँ प्रतिरोध सबसे लंबा चला (पृ. 259, 275)।
  • ऊपर के नक्शे में हर शहर चुनकर दूरियाँ देखिए: कलकत्ता पूरब में है, बम्बई पश्चिमी तट पर और मद्रास दूर दक्षिण में; दिल्ली, अवध और गंगा घाटी तक की दूरियाँ लिखिए।
  • मुश्किल: फ़ौज दूर से लानी पड़ी; अंग्रेज़ों ने एक तरफ़ कलकत्ते से और दूसरी तरफ़ पंजाब से दिल्ली की तरफ़ कूच किया (पृ. 276), और मानचित्र 2 में एक बढ़त दक्कन से जबलपुर होकर आती दिखती है (पृ. 275)।
  • मुश्किल: रास्ते के गाँव दुश्मन थे; गाँव वाले उत्तर से आने वाली संचार की लाइन पर दबाव बनाए हुए थे, गंगा के मैदान को गाँव-गाँव करके जीतना पड़ा, और अवध मार्च 1858 में जाकर क़ाबू में आया (पृ. 275–276)।
  • आसानी: पूरब में कलकत्ता अंग्रेज़ों के हाथ में था, इसलिए फ़ौज वहाँ से गंगा घाटी की तरफ़ चढ़ाई कर सकी (पृ. 276)।

Relief map, rivers and town points: Natural Earth (public domain); seven town points from Wikipedia coordinates.

आख़िर में एक बड़ा सवाल (पृ. 285, प्रश्न 9)

पड़ाव 5 की कोई एक तसवीर और पड़ाव 1 से 4 की कोई एक लिखी आवाज़ लीजिए, जैसे पृ. 269 पर हनवन्त सिंह की बात या पृ. 273 पर सिपाहियों की अर्ज़ी, और दोनों से वही चार सवाल पूछिए।

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • एक चित्र लीजिए, जैसे बार्कर का "द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ" (1859): रोशनी में बीच में खड़े अंग्रेज़ नायक और पीछे टूटी रेज़ीडेंसी; पुस्तक कहती है कि ऐसे चित्र अंग्रेज़ जनता को भरोसा दिलाते थे कि संकट ख़त्म हुआ और "अंग्रेज़ जीत चुके हैं" (पृ. 278–279)।
  • एक लिखित पाठ लीजिए, जैसे विद्रोही सिपाहियों की अर्ज़ी (पृ. 273): उसमें सिपाही नए कारतूस और आटे का डर बताते हैं और पूछते हैं, "अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?"
  • दोनों से वही चार सवाल पूछिए: किसने बनाया या लिखा, किसके लिए, कब, और क्या छूट गया।
  • तुलना कीजिए: विजेताओं की नज़र में अंग्रेज़ रक्षक और नायक हैं और विद्रोही "अहसानफ़रामोश और बर्बर" (पृ. 270), जबकि पराजितों की नज़र में यह लड़ाई धर्म, रोज़गार, इज़्ज़त और अस्मिता की थी (पृ. 273–274)।
  • आख़िर में लिखिए कि किसकी आवाज़ ज़्यादा बची और क्यों: विद्रोहियों के बहुत कम दस्तावेज़ बचे, इसलिए इतिहासकार अधिकतर अंग्रेज़ों के लिखे पर निर्भर हैं (पृ. 277)।

परियोजना कार्य (कोई एक)

  1. 1857 के विद्रोह के नेताओं में से किसी एक की जीवनी पढ़िए। देखिए कि उसे लिखने के लिए जीवनीकार ने किन स्रोतों का उपयोग किया है? क्या उनमें सरकारी रिपोर्टों, अख़बारी ख़बरों, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, चित्रों और किसी अन्य चीज़ का इस्तेमाल किया गया है? क्या सभी स्रोत एक ही बात कहते हैं या उनके बीच फ़र्क़ दिखाई देते हैं? अपने निष्कर्षों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
  2. 1857 पर बनी कोई फ़िल्म देखिए और लिखिए कि उसमें विद्रोह को किस तरह दर्शाया गया है। उसमें अंग्रेज़ों, विद्रोहियों और अंग्रेज़ों के भारतीय वफ़ादारों को किस तरह दिखाया गया है? फ़िल्म किसानों, नगरवासियों, आदिवासियों, ज़मींदारों और ताल्लुक़दारों के बारे में क्या कहती है? फ़िल्म किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाहती है?

इन परियोजनाओं का कोई एक तय जवाब नहीं है। जो जीवनी या फ़िल्म आप चुनें, उसके स्रोत और नज़रिया ख़ुद जाँचिए।

आख़िरी जाँच

  1. 1मेरठ में सैनिक विद्रोह किस तारीख़ को हुआ?

  2. 2अवध को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का अंग किस साल घोषित किया गया?

  3. 3पुस्तक के अनुसार 1857 में ब्रिटिश सत्ता के तीन मुख्य केंद्र कौन-से थे?

  4. 4शाह मल युद्ध में कब मारे गए?

आगे पढ़िए

पुस्तक की सूची (पृ. 285)

  • 1987 · गौतम भद्रा, फ़ोर रेबल्स ऑफ़ एटीन फ़िफ़्टी सेवन, सबॉल्टर्न स्टडीज़, खंड 4, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
  • 2006 · विलियम डेलरिम्पल, दि लास्ट मुग़ल : दि फ़ॉल ऑफ़ ए डायनेस्टी, दिल्ली 1857, पेंग्विन, वाइकिंग, नयी दिल्ली
  • 1984 · रूद्रांग्शू मुखर्जी, अवध इन रिवोल्ट 1857–58, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
  • 2006 · तापती रॉय, राज ऑफ़ दि रानी, पेंग्विन, नयी दिल्ली
  • 1980 · ऐरिक स्टॉक्स, पैज़ेन्ट्स एंड दि राज, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली

एक ऐतिहासिक एटलस (अंग्रेज़ी में)

जोसेफ़ श्वार्ट्ज़बर्ग के दक्षिण एशिया के ऐतिहासिक एटलस में 1857–1859 के विद्रोह का नक्शा। इसे वहीं ऑनलाइन देखिए; नक्शे पर अधिकार उसके लेखक का है। (Digital South Asia Library (DSAL), University of Chicago)