यह पन्ना उनके लिए है जो घर पर बारहवीं के बच्चे के साथ बैठते हैं। इतिहास आपको याद हो, यह ज़रूरी नहीं: हर सवाल के आगे लिखा है कि जवाब में क्या आना चाहिए।
बारहवीं के बच्चे से सवाल-जवाब करके परखने से ज़्यादा काम आता है उससे समझवाना। उससे कहिए कि आपने यह अध्याय नहीं पढ़ा है, वह आपको समझाए। समझाते समय बच्चे को ख़ुद पता चल जाता है कि कौन-सी बात पक्की है और कौन-सी कच्ची।
किताब की अपनी पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ संख्या के साथ दी हैं। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय (कक्षा 12, पुस्तक 2) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1. इस अध्याय में क्या है
यह अध्याय लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के उन गाँवों की बात करता है जिनमें हिंदुस्तान के करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग रहते थे। इसमें किसान और उनकी ज़मीन, सिंचाई और फ़सलें, गाँव की पंचायत और दस्तकार, महिलाएँ, जंगल वासी और ज़मींदार आते हैं, और साथ में मुग़ल राज्य, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था (पृष्ठ 196)।
अध्याय के पहले ही अनुभाग में स्रोतों का सवाल उठता है। आइन–ए–अकबरी उन ग्रंथों में एक है जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए, इसलिए किताब के अनुसार उससे किसानों के बारे में जो पता चलता है वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया” है। किसानों के अपने लिखे स्रोत नहीं हैं; उनकी तसवीर के लिए मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे दस्तावेज़ और कंपनी के दस्तावेज़ भी देखने पड़ते हैं (पृष्ठ 197)।
इस अध्याय में जाति, महिलाओं और “जंगली” कहे गए लोगों की बात आती है। इन्हें उसी तरह पढ़ना है जैसे किताब बताती है: इतिहास की तरह, किसी पर दोष डाले बिना। इसके लिए बच्चे से उसके अपने परिवार की जाति, ज़मीन या संपत्ति के बारे में कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं है। हर सवाल का जवाब किताब के स्रोत से आना चाहिए।
किताब यह बात इन हिस्सों में समझाती है:
| हिस्सा | किताब क्या बताती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1. किसान और कृषि उत्पादन (1.1 स्रोतों की तलाश, 1.2 किसान और उनकी ज़मीन) | गाँवों में रहने वाले लोग, आइन और दूसरे स्रोत, खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसान | 196–198 |
| 1.3 सिंचाई और तकनीक, 1.4 फ़सलों की भरमार | रहट और बालटी, नहरें, हल और बरमा, ख़रीफ़ और रबी की फ़सलें, नयी फ़सलें | 198–201 |
| 2. ग्रामीण समुदाय | जाति और ग्रामीण माहौल, पंचायतें और मुखिया, ग्रामीण दस्तकार, और एक “छोटा गणराज्य”? | 201–206 |
| 3. कृषि समाज में महिलाएँ | खेती और दस्तकारी में काम, संसाधन भी और काबू में भी, ज़मीन और ज़मींदारी पर हक़ | 206–207 |
| 4. जंगल और कबीले | “जंगली” का मतलब, शिकार, पेशकश, जंगलों में घुसपैठ | 208–211 |
| 5. ज़मींदार | ज़मींदार कौन थे, ज़मींदारी कैसे बनी, गाँव में उनकी भूमिका | 211–213 |
| 6. भू–राजस्व प्रणाली | जमा और हासिल, ज़मीन के चार वर्ग, वसूली के तरीक़े, मनसबदार | 213–215 |
| 7. चाँदी का बहाव | बड़े साम्राज्य और व्यापार, भारत में चाँदी का आना | 215–217 |
| 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी | ग्रंथ कैसे बना, पाँच भाग, सूचनाओं के स्रोत, सावधानी और सीमाएँ | 217–221 |
| काल रेखा और प्रश्न | काल रेखा, और किताब के बारह प्रश्न | 221–223 |
2. बच्चे से समझिए: दस सवाल
एक दिन में दो-तीन सवाल काफ़ी हैं। बच्चा अपने शब्दों में बताए, तो भी ठीक है; बस नीचे लिखी बातें उसके जवाब में आ जाएँ।
| सवाल | जवाब में यह आना चाहिए | पृष्ठ |
|---|---|---|
| किसानों के बारे में हमारी जानकारी किन स्रोतों से मिलती है, और आइन–ए–अकबरी किसका नज़रिया दिखाती है? | किसान ख़ुद नहीं लिखते थे। मुख्य स्रोत मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे ग्रंथ हैं, जिनमें आइन–ए–अकबरी सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक है। साथ में मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ हैं, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़। आइन से किसानों के बारे में जो पता चलता है, वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया” है। | 197 |
| खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों में क्या फ़र्क था? | खुद–काश्त किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। कोई किसान मर्ज़ी से भी पाहि–काश्त बनता था, जब किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें, और मजबूरी में भी, जैसे अकाल या भुखमरी के बाद। | 198 |
| कुओं से सिंचाई के दो तरीक़े कौन-से थे, और राज्य ने सिंचाई में क्या मदद की? | रहट में रस्सी के गोलाकार फंदों पर घड़े बाँधे जाते हैं। बालटी की रस्सी बेलन पर लपेटी जाती है और उसका दूसरा छोर बैल से बाँधा जाता है। राज्य ने उत्तर भारत में कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर। | 199–200 |
| गाँव की पंचायत में कौन लोग होते थे? पंचायत से बात न बनने पर किसान क्या करते थे? | पंचायत में गाँव के बुज़ुर्ग होते थे, आम तौर पर जिनके पास संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे; किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है। अत्यधिक कर के मामलों में पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती थी। समझौता न हो तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाने जैसा उग्र रास्ता अपनाते थे, जो उनके हाथ में “एक बड़ा प्रभावी हथियार” था। | 202–204 |
| गाँव के दस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले क्या मिलता था? “छोटा गणराज्य” किसकी राय थी? | आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा, या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा। “छोटा गणराज्य” उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी, जिससे किताब सहमत नहीं है। किताब के अनुसार गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती: जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं। | 205 |
| खेती और दस्तकारी में महिलाएँ क्या काम करती थीं? | महिलाएँ और मर्द साथ-साथ खेतों में काम करते थे। मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं। सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। | 206 |
| “जंगली” का मतलब क्या था? | “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। किताब के अनुसार इसका मतलब असभ्य नहीं था; यह गुज़ारे के तरीक़े का नाम था। उस समय अखिल भारतीय स्तर पर अंदाज़न करीब–करीब 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था। | 208 |
| ज़मींदार कौन थे? उनकी ऊँची हैसियत के दो कारण क्या थे? | ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। हैसियत के दो कारण थे: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)। | 211 |
| जमा और हासिल में क्या फ़र्क था? ज़मीन के चार वर्ग कौन-से थे? | जमा निर्धारित रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। चार वर्ग: पोलज (हर साल खेती), परौती (कुछ दिन खेती रोकी जाती), चचर (तीन या चार वर्ष खाली) और बंजर (पाँच या उससे ज़्यादा वर्ष खाली)। | 213–214 |
| भारत में इतनी चाँदी क्यों आई? | भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया; यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। इससे सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई। | 216 |
3. छह बातें जिनमें बच्चे अक्सर उलझते हैं
अगर बच्चा इनमें से कोई बात बोले या लिखे, तो वहीं रुककर उससे पूछिए कि किताब में यह कहाँ लिखा है।
| बच्चा लिख देता है | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| आइन–ए–अकबरी किसानों की अपनी आवाज़ है | किसान ख़ुद नहीं लिखते थे। किताब के अनुसार आइन से किसानों के बारे में जो पता चलता है, वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया” है। किसानों की राज्य से न्याय की उम्मीद और झगड़ों का हाल गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ों और कंपनी के दस्तावेज़ों से पता चलता है | 197 |
| खुद–काश्त किसान दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे | खुद–काश्त किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले पाहि–काश्त कहलाते थे | 198 |
| किताब मानती है कि भारतीय गाँव “छोटे गणराज्य” थे, जहाँ सब बराबर थे | “छोटे गणराज्य” उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी; किताब इससे सहमत नहीं है। किताब के अनुसार गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं | 205 |
| “जंगली” का मतलब असभ्य | किताब के अनुसार “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था, और इसका मतलब असभ्य नहीं था। यह गुज़ारे के तरीक़े का नाम था | 208 |
| जमा और हासिल एक ही रक़म हैं | जमा निर्धारित रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, पर स्थानीय हालात की वजह से कभी-कभी इतनी वसूली संभव नहीं हो पाती थी | 213 |
| 1600 से 1700 के बीच आबादी करीब 5 करोड़ बढ़ी | 1600 से 1800 के बीच (200 वर्षों में) लगभग 5 करोड़, करीब 33 फ़ीसदी। किताब में यहाँ ‘1600 से 1700’ छपा है, पर अगले ही वाक्य में ‘200 वर्षों’ लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है | 200 |
4. किताब के शब्द, आसान भाषा में
बच्चे से पूछिए कि इनमें से कौन-से शब्द वह बिना देखे समझा सकता है। जो न समझा पाए, उसे वहीं किताब का पृष्ठ खोलने दीजिए।
| किताब का शब्द | आसान मतलब | पृष्ठ |
|---|---|---|
| रैयत (बहुवचन रिआया), मुज़रियान | मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोतों में किसान के लिए शब्द; किसान या आसामी भी कहा जाता था | 197 |
| खुद–काश्त | उन्हीं गाँवों में रहने वाले किसान जिनमें उनकी ज़मीन थी | 197–198 |
| पाहि–काश्त | दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले किसान | 197–198 |
| जिन्स–ए–कामिल | सर्वोत्तम फ़सलें, जैसे कपास और गन्ना, जिनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था | 200 |
| मुक़द्दम या मंडल | गाँव का मुखिया, पंचायत का सरदार | 201–202 |
| पंचायत | गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा, आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले लोग | 202 |
| जाति पंचायत | गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत; राजस्थान में ये दीवानी के झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं और देखती थीं कि शादियाँ जाति के नियमों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं | 203 |
| मीरास या वतन | महाराष्ट्र में दस्तकारों को सेवा के बदले मिली ज़मीन, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था | 205 |
| जजमानी | दस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले अदायगी की व्यवस्था; बंगाल में ज़मींदार रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे | 205 |
| सराफ़ | मुद्रा की फेर–बदल करने वाले, जो बैंकर की तरह हवाला भुगतान भी करते थे | 206 |
| जंगली | वे लोग जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था | 208 |
| पेशकश | मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट | 209 |
| ज़मींदार | वे लोग जिनकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे | 211 |
| मिल्कियत | ज़मींदार की व्यक्तिगत ज़मीन, जिसे वह बेच सकता था, किसी और के नाम कर सकता था या गिरवी रख सकता था | 211 |
| जमा / हासिल | जमा निर्धारित राजस्व की रक़म, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म | 213 |
| अमील–गुज़ार | राजस्व वसूली करने वाला अधिकारी | 213 |
| पोलज, परौती, चचर, बंजर | अकबर के समय ज़मीन के चार वर्ग: हर साल खेती; कुछ समय खेती रोकी गई; तीन–चार साल ख़ाली; पाँच या ज़्यादा साल से ख़ाली | 214 |
| मनसबदारी | मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर सैनिक–नौकरशाही तंत्र, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी | 214 |
| कणकुत | कण यानी अनाज, कुत यानी अंदाज़ा: फ़सल का अंदाज़ा लगाकर राजस्व तय करना | 215 |
| बटाई (भाओली) | फ़सल काटकर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा | 215 |
5. लिखे हुए जवाब कैसे जाँचें
किताब के बारह प्रश्न पृष्ठ 222 और 223 पर हैं। प्रश्न 1 से 5 लगभग 100 से 150 शब्दों में लिखने हैं, प्रश्न 6 से 9 लगभग 250 से 300 शब्दों के छोटे निबंध हैं, प्रश्न 10 मानचित्र का काम है, और प्रश्न 11 और 12 परियोजनाएँ हैं (कोई एक करनी है)। हर प्रश्न के नीचे लिखा है कि अच्छे जवाब में क्या होना चाहिए। शब्द वही न हों तो चिंता मत कीजिए; बातें आ जाएँ, तो जवाब ठीक है।
प्रश्न 1:आइन से खेती का इतिहास लिखने की समस्याएँ (पृष्ठ 197, 218–220)
- मुख्य बात: आइन–ए–अकबरी अकबर के साम्राज्य के खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसकी सीमाएँ हैं, और इतिहासकार उसे दूसरे स्रोतों से मिलाकर पढ़ते हैं।
- ऊपर से देखा नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में आइन से जो पता चलता है, वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है”। उसका उद्देश्य ऐसे साम्राज्य का खाका पेश करना था जहाँ मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाए रखता था।
- जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी चूक या नकल उतारने वाले सहयोगियों की भूल; ये आम तौर पर मामूली हैं।
- आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे; जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है।
- कीमतें और मज़दूरी: सिर्फ़ राजधानी आगरा और उसके आस-पास की विस्तृत सूची है।
- इतिहासकार कैसे निपटते हैं: वे आइन को ध्यान से पढ़कर उसकी ग़लतियाँ पकड़ते हैं और उन्हें दूसरे स्रोतों से मिलाते हैं: सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़। ये किसानों, ज़मींदारों और राज्य के झगड़े और किसानों की नज़र भी दर्ज करते हैं।
प्रश्न 2: क्या खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए थी (पृष्ठ 196, 198–201, 205–206)
- मुख्य बात: सिर्फ़ कुछ हद तक। खेती का पहला उद्देश्य पेट भरना था, पर किताब कहती है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।
- गुज़ारे का पक्ष: चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
- जिन्स–ए–कामिल: कपास और गन्ना जैसी सर्वोत्तम फ़सलों की खेती को मुग़ल राज्य बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे ज़्यादा कर मिलता था; तिलहन और दलहन भी नकदी फ़सलें थीं।
- विविधता और नयी फ़सलें: आगरा प्रांत में 39 और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें; मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती और व्यापार की मुख्य वस्तु।
- बाज़ार गाँव तक: बिक्री के लिए उगाई फ़सलों की वजह से व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में आए; कपास, रेशम या नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था।
प्रश्न 3: कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका (पृष्ठ 206–207)
- मुख्य बात: सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे।
- खेत में: मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं।
- घर ही उत्पादन की बुनियाद: किसान की व्यक्तिगत खेती में घर-परिवार का श्रम ही उत्पादन का आधार था, इसलिए “घर के लिए महिलाएँ, बाहर के लिए मर्द” जैसा बँटवारा मुमकिन नहीं था।
- दस्तकारी: सूत कातना, बरतन के लिए मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर टिके थे; वाणिज्यीकरण बढ़ने के साथ इस श्रम की माँग बढ़ी।
- बाहर भी काम: किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करती थीं; फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती थीं।
- पाबंदियाँ: पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाएँ हल या कुम्हार का चाक नहीं छू सकती थीं; बंगाल में मासिक धर्म के समय पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।
प्रश्न 4: नकद के लेन-देन की अहमियत (पृष्ठ 205–206, 212–213, 216–217)
- मुख्य बात: सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में नकद का लेन-देन दरबार से गाँव तक फैल चुका था।
- चाँदी का बहाव: भारत के निर्यात का भुगतान करने के लिए चाँदी भारी मात्रा में भारत आई, जबकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
- कारेरी की गवाही: लगभग 1690 ई. में भारत आए जोवान्नी कारेरी के अनुसार यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं और नकद भारत में ही रह जाता था।
- राजस्व में नकद: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह खेतिहरों से नक़द भुगतान की कोशिश करे; मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी।
- गाँव में नकद: निर्यात के लिए काम करने वाले दस्तकारों और कपास, रेशम, नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था। फ़्रांसीसी यात्री तैवर्नियर के अनुसार वे गाँव बहुत छोटे माने जाते जिनमें सराफ़ न हों।
- ज़मींदार: ज़मींदारी की ख़रीद-फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ, और ज़मींदार हाट लगवाते थे।
प्रश्न 5: मुग़ल राजकोष के लिए भू-राजस्व का महत्त्व (पृष्ठ 200, 213–215, 218)
- मुख्य बात: किताब के अनुसार ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।
- पूरा प्रशासनिक तंत्र: दीवान के दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख-रेख थी; हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी कृषि संबंधों की निर्णायक ताकत बन गए।
- नपाई और आँकड़े: हर प्रांत में जुती और जोतने लायक ज़मीन नपवाई गई; आइन हर प्रांत की मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) दर्ज करती है; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव के खेतिहरों का सालाना हिसाब और आसामीवार जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
- बारीक नियम: ज़मीन के चार वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर), और कणकुत, बटाई जैसे वसूली के तरीक़े।
- फ़सलों पर नज़र: राज्य जिन्स–ए–कामिल को बढ़ावा देता था क्योंकि उनसे ज़्यादा कर मिलता था।
- मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।
प्रश्न 6: खेती के समाज में जाति (पृष्ठ 201–205, 211–212)
- मुख्य बात: जाति काम, हैसियत, न्याय और ज़मीन पर पकड़ तय करती थी; फिर भी बाज़ार, ज़मीन की ख़रीद-बिक्री और नकद के रिश्तों ने कुछ समूहों को ऊपर उठने का रास्ता दिया।
- काम और ग़रीबी: खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे। मुसलमान समुदायों में भी हलालख़ोरान गाँव की हदों के बाहर रहते थे।
- बीच के समूह: निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और हैसियत का सीधा रिश्ता था, बीच के समूहों में नहीं। पशुपालन और बागबानी के मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली ऊपर उठे; पूर्व में सदगोप और कैवर्त किसानों जैसी स्थिति पाने लगे।
- पंचायत में जाति: पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; ज़रूरत पर जुर्माना या निष्कासन देती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें दीवानी झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं, और यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं।
- ज़मींदारी में जाति: ज़मींदारों की ऊँची हैसियत का एक कारण जाति था; ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ग्रामीण समाज पर ठोस नियंत्रण था। पर ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी-बेची जाती थी, इसलिए “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।
प्रश्न 7: जंगल वासियों की ज़िंदगी में बदलाव (पृष्ठ 208–211)
- मुख्य बात: सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में राज्य, खेती और व्यापार, तीनों जंगलों तक पहुँचे, और जंगल वासियों की ज़िंदगी बदलने लगी।
- पहले कैसा जीवन: अखिल भारतीय स्तर पर अंदाज़न लगभग 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था। “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था। भीलों जैसे कबीले मौसम के हिसाब से काम बदलते और एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।
- राज्य की घुसपैठ: राज्य जंगल को बदमाशों का अड्डा (मवास) मानता था। सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए पेशकश में अक्सर हाथी लिए जाते थे। दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियानों के बहाने बादशाह साम्राज्य के कोने-कोने का दौरा करता था।
- खेती का फैलाव: मुकुंदराम चक्रवर्ती के चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल साफ़ करवाकर राज्य बसाता है; दूर-दूर से लोग आकर बाज़ार बसाते हैं।
- व्यापार: शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थी; लाक जैसी कुछ वस्तुएँ समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं। हाथी पकड़े और बेचे जाते थे; पंजाब का लोहानी कबीला भारत–अफ़ग़ानिस्तान के ज़मीनी व्यापार में लगा था।
- सरदार से राजा: कई कबीलाई सरदार ज़मींदार, कुछ राजा भी बने; सिंध की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल थे; अहोम राजाओं के पायक थे। उत्तर-पूर्व में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों पर कब्ज़ा किया।
- नए सांस्कृतिक प्रभाव: कुछ इतिहासकारों के अनुसार नए बसे इलाकों में सूफ़ी संतों (पीर) ने इस्लाम के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई।
प्रश्न 8: मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका (पृष्ठ 211–213)
- मुख्य बात: ज़मींदार मुग़ल गाँवों के सामाजिक पिरामिड के संकरे शीर्ष पर थे: वे राज्य के सहायक भी थे, किसानों के शोषक भी, और कुछ हद तक संरक्षक भी।
- कौन थे: उनकी कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे। हैसियत के दो कारण: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)। उनकी व्यक्तिगत ज़मीन मिल्कियत कहलाती थी, जिसे वे बेच या गिरवी रख सकते थे।
- राज्य के लिए: वे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे। उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं; आइन के अनुसार उनकी मिली-जुली शक्ति 384,558 घुड़सवार और 4,277,057 पैदल थी।
- ज़मींदारी कैसे बनती: जंग में जीत एक संभावित स्रोत थी, पर राज्य आम तौर पर सनद के बिना ऐसी इजाज़त नहीं देता था। ज़्यादातर धीमी प्रक्रिया से: नयी ज़मीनें बसाकर, अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
- गाँव की अर्थव्यवस्था में: उन्होंने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को साजो-सामान और उधार दिया। अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते और हाट लगवाते थे; ज़मींदारी की ख़रीद-फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ।
- शोषक, पर संरक्षक भी: भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनका निशाना राज्य का राजस्व अधिकारी था। सत्रहवीं सदी के कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।
- यह भी आए तो और अच्छा: किताब कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था”, पर रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी था।
प्रश्न 9: पंचायत और मुखिया का गाँव पर नियमन (पृष्ठ 202–204, 207)
- मुख्य बात: मुग़ल काल के गाँव में पंचायत और उसका सरदार, मुखिया, मिलकर गाँव का हिसाब, जाति के नियम और झगड़े सँभालते थे।
- कौन: पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, आम तौर पर संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार वाले लोग; उसका फ़ैसला सबको मानना पड़ता था। मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता और ज़मींदार उसे मंज़ूरी देता था; भरोसा न रहे तो उसे हटाया जा सकता था।
- हिसाब और आम ख़ज़ाना: मुखिया पटवारी की मदद से गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब बनवाता था। आम ख़ज़ाने से कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी विपदाओं से निपटना, और छोटे बाँध या नहर जैसे सामुदायिक काम होते थे।
- जाति के नियम: पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; पूर्वी भारत में शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं। वह जुर्माना लगा सकती थी, और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी। हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी थी; फ़ौजदारी मामलों को छोड़कर राज्य उसके फ़ैसले मानता था।
- शिकायतों की सुनवाई: सबसे निचले तबकों के लोग ज़बरन कर उगाही या बेगार के ख़िलाफ़ पंचायत को अर्ज़ियाँ देते थे; महिलाएँ भी न्याय और मुआवज़े के लिए दरख़्वास्त भेजती थीं। पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती; न बने तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाते थे।
- सीमाएँ: पंचायत “अल्पतंत्र” थी, जिसमें छोटे-मोटे काम करने वाले मज़दूरों की जगह कम थी। मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी से मिलकर हिसाब में हेरा-फेरी करते और कर का बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।
प्रश्न 10: मानचित्र का काम (पृष्ठ 210, 215–217, 223)
यह बच्चे का अपना काम है। किताब कहती है कि विश्व के बाहरी रेखाओं वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाइए जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था, और उनके यातायात-मार्ग भी। जाँचने की बातें ये हैं:
- ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार (मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों से होकर); भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार।
- चाँदी का रास्ता: अमेरिका से यूरोप के राज्यों होकर; थोड़ा तुर्की और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से भारत।
- कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की।
- भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते और सोना-चाँदी लाते थे; जापान की खानों की चाँदी भी डचों के ज़रिये भारत आती थी।
- यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल, जहाँ भेजी जाने वाली भारतीय वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं।
- भारत के बंदरगाह: किताब इन रास्तों पर भारत के बंदरगाहों के नाम नहीं देती। बच्चा एटलस देखे या अपने शिक्षक से पूछे।
प्रश्न 11 और 12: परियोजनाएँ (पृष्ठ 200–207, 217–220, 223)
इनमें से कोई एक करनी है। दोनों में बच्चा अपनी खोज करता है, इसलिए कोई एक जवाब नहीं है।
- प्रश्न 11, क्या करना है: पड़ोस के एक गाँव में पता करना कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन-सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन-से जानवर पाले जाते हैं, कौन-से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और पंचायत किस तरह काम करती है। फिर सोलहवीं–सत्रहवीं सदी की बातों से तुलना करके समानताएँ लिखना, और बदलाव तथा निरंतरता दोनों समझाना।
- प्रश्न 11, ढाँचा: चार ख़ानों की तालिका बने: पहलू, सोलहवीं–सत्रहवीं सदी (किताब से), आज का गाँव, बदलाव या निरंतरता।
- प्रश्न 11, किताब वाला ख़ाना: खरीफ़–रबी की फ़सलें और जिन्स–ए–कामिल; कहीं-कहीं 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के; पंजाब में ज़मीन बेचती महिलाएँ और ज़मींदारी पाने वाली महिलाएँ; बुज़ुर्गों की पंचायत, मुखिया, पटवारी और जाति पंचायत।
- प्रश्न 11, व्याख्या: हर बदलाव की वजह लिखी हो, और जो चीज़ें आज भी वैसी हैं (जैसे फ़सलों के मौसम) उन्हें निरंतरता के रूप में दिखाया गया हो। जो आँकड़े गाँव में मिलें वही लिखे हों; अंदाज़ा हो तो उसे अंदाज़ा ही लिखा हो।
- प्रश्न 11, सावधानी: हमारी ओर से: बच्चा गाँव अकेला न जाए। समूह में जाए, किसी शिक्षक या बड़े के साथ, और पहले गाँव के बुज़ुर्गों से इजाज़त लेकर। वह गिनती और क़िस्में लिखे (कितने लोग, कौन-सी फ़सलें, कौन-से जानवर, कौन-से दस्तकार समूह, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं: हाँ या नहीं); किसी का नाम, जाति या तसवीर न लिखी जाए, न ली जाए।
- प्रश्न 12, क्या करना है: आइन का 10 से 12 पृष्ठ का एक छोटा अंश चुनकर पढ़ना, और ब्योरा देना कि इतिहासकार उसका इस्तेमाल किस तरह कर सकता है। किताब आइन पढ़ने के लिए एक वेबसाइट बताती है; अंश की प्रति के लिए स्कूल के पुस्तकालय या शिक्षक की मदद लीजिए। अंग्रेज़ी अनुवाद ब्लॉकमेन और एच. एस. जैरेट के हैं।
- प्रश्न 12, ब्योरे के बिंदु: अंश आइन के पाँच दफ़्तरों में से किस भाग का है (जैसे मुल्क–आबादी, जिसमें सूबों, सरकारों और परगनों के आँकड़े हैं); उसमें क्या सूचना है (मापी गई ज़मीन, जमा, सुयूरग़ाल, ज़मींदारों की जातियाँ और फ़ौज, फ़सलें या रीति-रिवाज); वह किसका नज़रिया है (केंद्र का, समाज के शीर्ष से देखा हुआ)।
- प्रश्न 12, सावधानी और इस्तेमाल: जोड़ की ग़लतियाँ, सूबों के आँकड़ों में विषमता, और आगरा तक सीमित कीमतें-मज़दूरी, ये तीनों बातें लिखी हों। इतिहासकार इन आँकड़ों को गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के दस्तावेज़ों या ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से मिलाकर उस समय के समाज की तसवीर बनाता है।
अपने को जाँचने के लिए बच्चा रिवीजन नोट्स में किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर देख सकता है, लिखने के बाद।
6. घर पर दस मिनट की बातचीत
इनमें से कोई एक चुन लीजिए, चाहे खाने के बाद, चाहे सैर पर। पहले बच्चे को बोलने दीजिए; फिर नीचे की बातों से मिलाइए। ये तीनों प्रश्न किताब के अपने “चर्चा कीजिए” वाले प्रश्न हैं।
पहली बातचीत: खेती के तरीक़े, पिछली किताब में और इस अध्याय में (पृष्ठ 201)
किताब पूछती है कि इस अनुभाग में खेती के जिन कामों और तकनीकों की बात हुई, उनमें से कौन-सी भाग I के अध्याय 2 में बताई तकनीकों से मिलती-जुलती हैं और कौन-सी अलग हैं। पहले बच्चा बताए कि इस अध्याय की खेती में उसे क्या-क्या याद है; फिर नीचे से मिलाइए।
- मिलती-जुलती बात, हल: दोनों में लोहे के फाल वाला हल है। इस अध्याय में वह लकड़ी का हलका हल है जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी।
- मिलती-जुलती बात, सिंचाई: अध्याय 2 में कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरें थीं। इस अध्याय में कुएँ, रहट और बालटी हैं, और राज्य की खुदवाई नहरें भी, जैसे शाहजहाँ के समय पंजाब की शाह नहर।
- अलग बात: अध्याय 2 में गंगा की घाटी की धान की रोपाई है, यानी बीज अंकुरित करके पानी भरे खेत में पौधे लगाना। इस अध्याय में बीज ज़्यादातर हाथ से छिड़ककर बोए जाते थे।
- इस अध्याय में नया: बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा; गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी की मूठ वाले लोहे के पतले धार; खरीफ़ और रबी, और कहीं साल में तीन फ़सलें; जिन्स–ए–कामिल; और नयी फ़सलें (अफ्रीका और स्पेन के रास्ते मक्का; नयी दुनिया से टमाटर, आलू, मिर्च)।
- बच्चा जो भी कहे, उससे पूछिए कि किताब की कौन-सी बात उसके जवाब को सहारा देती है।
दूसरी बातचीत: ज़मींदार कौन थे और उनकी हैसियत किस पर टिकी थी (पृष्ठ 211–213)
किताब कहती है कि आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई, और अनुभाग पढ़कर उन कारणों की पहचान करने को कहती है। हमारी ओर से: बातचीत किताब के ज़मींदारों तक रहे, आज के किसी परिवार या जाति तक नहीं।
- कमाई, पर खेती में सीधा हाथ नहीं: ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे। उनकी मिल्कियत पर अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूर काम करते थे।
- शोषण: किताब कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था” (पृष्ठ 212)।
- राज्य और किसान के बीच: वे राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे।
- अपनी ताकत: उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।
- हैसियत के दो कारण: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)।
- दूसरा पहलू भी: किताब उनके और किसानों के रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी बताती है (पृष्ठ 212)।
- बच्चा जो भी कहे, उससे पूछिए कि किताब की कौन-सी बात उसके जवाब को सहारा देती है।
तीसरी बातचीत: क्या मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली लचीली थी (पृष्ठ 213–215)
किताब पूछती है कि क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे। जवाब हाँ हो या नहीं, बच्चा किताब से एक सबूत ज़रूर दे।
- ज़मीन के हिसाब से: ज़मीन चार वर्गों में बँटी थी, पहले दो वर्गों की तीन-तीन किस्में थीं, और हर वर्ग का राजस्व अलग रखा गया (पृष्ठ 214)।
- नक़द या फ़सल: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें, पर फ़सल में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे। फ़सल में वसूली के कणकुत और बटाई के कई तरीक़े थे (पृष्ठ 213, 215)।
- जमा और हासिल: निर्धारित रक़म और सचमुच वसूली गई रक़म अलग-अलग दर्ज की जाती थीं (पृष्ठ 213)।
- दोनों हितों का ध्यान: औरंगज़ेब के 1665 ई. के हुक्म में जमा तय करते समय सरकार के वित्तीय हित (किफ़ायत) और किसानों का कल्याण, दोनों देखने को कहा गया (पृष्ठ 215)।
- सीमा की तरफ़ का सबूत: राज्य के नुमाइंदे चाहते थे कि खेतों की जुताई हो और राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए (पृष्ठ 196)। राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था (पृष्ठ 213)।
- बच्चा जो भी कहे, उससे पूछिए कि किताब की कौन-सी बात उसके जवाब को सहारा देती है।
7. अध्याय का आख़िरी सवाल: आइन–ए–अकबरी क्या बताती है और क्या नहीं
अध्याय के आख़िरी हिस्से (पृष्ठ 217–221) में किताब एक ही ग्रंथ को परखती है: आइन–ए–अकबरी से हमें क्या पता चलता है, और क्या नहीं। आइन अकबरनामा की तीसरी जिल्द है। वह अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद पूरी हुई (पृष्ठ 217)। उसमें दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन, राजस्व के स्रोत और प्रांतों का भूगोल, और लोगों के रीति-रिवाज दर्ज हैं (पृष्ठ 217–218)। किताब के शब्दों में हमारे लिए वह “सूचनाओं की खान” है (पृष्ठ 218)। लेखक ने सावधानी भी बरती: पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की, मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में शामिल करने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि की कोशिश की, और सांख्यिकी वाले खंडों में आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी लिखे, ताकि नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों (पृष्ठ 220)।
पर किताब सीमाएँ भी गिनाती है (पृष्ठ 220)। जोड़ करने में कई ग़लतियाँ मिली हैं, जो आम तौर पर मामूली हैं। सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में इकट्ठे नहीं हुए: कई सूबों के लिए ज़मींदारों की जाति की विस्तृत सूचना है, पर बंगाल और उड़ीसा के लिए नहीं। राजकोषीय आँकड़े बड़ी तफ़सील से हैं, पर कीमतें और मज़दूरी उतनी अच्छी तरह दर्ज नहीं हुईं; कीमतों और मज़दूरी की विस्तृत सूची राजधानी आगरा या उसके आस-पास के इलाकों की है, इसलिए बाकी देश के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है।
ध्यान रखने की एक बात नज़रिये की है। किताब कहती है कि आइन का नज़रिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” (पृष्ठ 218)। किसान ख़ुद नहीं लिखते थे, और “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है” (पृष्ठ 197)। किसानों की राज्य से न्याय की उम्मीद और झगड़ों का हाल गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ों और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से पता चलता है (पृष्ठ 197)। इन सीमाओं के बावजूद किताब आइन को अपने समय के लिए “एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़” कहती है (पृष्ठ 220)।
बच्चे से कहिए कि आइन के बारे में दो बातें बताए जो उससे पता चलती हैं, और दो जो नहीं। उदाहरण के लिए, मुल्क–आबादी में सूबों की सरकारों की तालिकाएँ हैं, जिनके आठ ख़ानों में ज़मींदार, उनकी जातियाँ और उनकी फ़ौज भी दर्ज है (पृष्ठ 218)। पर बंगाल और उड़ीसा के लिए ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं मिलती (पृष्ठ 220), और किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे, यह आइन से नहीं, दूसरे स्रोतों से पता चलता है (पृष्ठ 197)।
अगर सिर्फ़ पाँच मिनट हों
ये चार सवाल पूछ लीजिए। चारों ठीक हों, तो अध्याय की मुख्य बातें आ गई हैं।
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| किसानों के बारे में आइन–ए–अकबरी से जो पता चलता है, वह किसके नज़रिये का है? | “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया”। किसान अपने बारे में ख़ुद नहीं लिखते थे; मुख्य स्रोत वे ग्रंथ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए, और आइन उनमें एक है (पृष्ठ 197)। |
| खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसान में क्या फ़र्क है? | खुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले पाहि–काश्त कहलाते थे (पृष्ठ 198)। |
| जमा और हासिल में क्या फ़र्क है? | जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म (पृष्ठ 213)। |
| भारत में चाँदी बाहर से क्यों आई? | भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, जिसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया (पृष्ठ 216)। |
बच्चे के लिए इसी अध्याय के और पन्ने
- रिवीजन नोट्स: पूरा अध्याय छोटे में, किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर के साथ।
- प्रश्न बैंक: परीक्षा जैसे प्रश्न, उत्तर के साथ। बच्चा पहले ख़ुद लिखे, फिर मिलाए।
- फ़्लैशकार्ड: बाईं ओर सवाल, दाईं ओर जवाब। जवाब ढककर बोलिए, फिर मिलाइए; रोज़ पाँच मिनट दोहराने के लिए।
- परख प्रश्न: सोचकर जवाब देने वाले प्रश्न, किताब के स्रोतों और उदाहरणों पर, हर प्रश्न का उत्तर साथ में।
- इंटरैक्टिव अध्याय: पूरा अध्याय स्क्रीन पर, हिस्सा-दर-हिस्सा।