Chapter 4विचारक, विश्वास और इमारतें

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NCERT — भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), अध्याय 4 (पृ. 82–113)।

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पढ़िए, छाँटिए, क्रम लगाइए, सवाल पूछिए

विचारक, विश्वास और इमारतें

यह अध्याय ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के विचारों, विश्वासों और इमारतों की कहानी है। किताब बौद्ध धर्म पर ज़्यादा ठहरती है, पर याद रखिए: बौद्ध परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई, कई परंपराएँ एक-दूसरे से लगातार वाद-विवाद और संवाद कर रही थीं (पृष्ठ 82)।

अध्याय का समय

ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक

इस लंबी यात्रा में किताब तीन बातें देखती है: दार्शनिकों के विचार, मौखिक और लिखित परंपराओं में उनका सहेजा जाना, और स्थापत्य और मूर्तिकला में उनकी अभिव्यक्ति (पृष्ठ 82)।

अध्याय का रास्ता

  1. विचार और विश्वास: ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के दार्शनिकों और चिंतकों ने जीवन, मृत्यु, दुख और मुक्ति पर क्या पूछा और क्या उत्तर दिए?
  2. इमारतें और मूर्तियाँ: ये विचार स्तूपों, मूर्तियों, मंदिरों और गुफाओं में कैसे दिखे, और इतिहासकार उन्हें कैसे पढ़ते हैं?
  1. 1साँची की एक झलकउन्नीसवीं सदी में साँची का स्तूप अपनी जगह कैसे बचा रहा?पृष्ठ 82–83
  2. 2पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवादयज्ञ की परंपरा के बाद लोगों ने कौन-से नए प्रश्न पूछे, और उन पर कैसे बहस हुई?पृष्ठ 84–87
  3. 3महावीर का संदेशजैन विचारकों ने संसार और मुक्ति के बारे में क्या सिखाया?पृष्ठ 88–89
  4. 4बुद्ध और ज्ञान की खोजसिद्धार्थ राजमहल छोड़कर ज्ञान की खोज में क्यों निकले?पृष्ठ 89–90
  5. 5बुद्ध की शिक्षाएँबुद्ध ने संसार, दुख और उससे मुक्ति के बारे में क्या सिखाया?पृष्ठ 91–92
  6. 6बुद्ध के अनुयायीसंघ में कौन आए, और स्त्रियों ने वहाँ क्या कहा और किया?पृष्ठ 92–94
  7. 7स्तूपस्तूप क्यों और कैसे बनाए गए, और उनकी बनावट कैसी थी?पृष्ठ 95–97
  8. 8स्तूपों की 'खोज'अमरावती का स्तूप क्यों खो गया और साँची का क्यों बचा?पृष्ठ 98–99
  9. 9मूर्तिकलापत्थर पर गढ़ी कथाएँ, प्रतीक और लोक परंपराएँ कैसे पढ़ी जाती हैं?पृष्ठ 99–103
  10. 10नयी धार्मिक परंपराएँमहायान, वैष्णव और शैव परंपराओं के साथ मूर्तियाँ और मंदिर कैसे बदले?पृष्ठ 103–107
  11. 11क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?अनजानी मूर्तियों को पढ़ने में इतिहासकार कहाँ अटकते हैं?पृष्ठ 107–109
  12. 12सार और काल-रेखापूरा अध्याय एक नज़र में, किताब की दोनों काल रेखाएँ और एशिया का नक्शापृष्ठ 110, 113

अध्याय की दो कड़ियाँ

पहली कड़ी: विचारक और विश्वास

  • यज्ञ की परंपरा, उपनिषदों के प्रश्न, नियतिवादी और भौतिकवादी विचारक।
  • जैन और बौद्ध शिक्षक: महावीर और बुद्ध, और बुद्ध के अनुयायियों का संघ।
  • बाद की परंपराएँ: महायान बौद्ध मत, वैष्णव और शैव परंपराएँ।

दूसरी कड़ी: इमारतें और मूर्तियाँ

  • स्तूप (साँची, अमरावती), पत्थर पर गढ़ी मूर्तियाँ, मंदिर और चट्टान काटकर बनी गुफाएँ।
  • इतिहासकार इन्हें कैसे पढ़ते हैं, और जहाँ ग्रंथ और मूर्ति मेल नहीं खाते वहाँ क्या करते हैं।

इतिहासकार किन स्रोतों से यह कहानी जोड़ते हैं (पृष्ठ 82)

  • बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ।
  • भौतिक साक्ष्य: इमारतें, मूर्तियाँ और अभिलेख।
  • उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप, इसलिए किताब बार-बार उसी पर लौटती है।

1साँची की एक झलक

इस पड़ाव का सवाल

उन्नीसवीं सदी में जब यूरोप के लोग प्राचीन इमारतों के हिस्से उठा ले जा रहे थे, तब साँची का स्तूप अपनी जगह कैसे बचा रहा?

शुरुआत से कड़ी किताब इस अध्याय की शुरुआत उस युग की सबसे सुरक्षित बची इमारत, साँची के स्तूप से करती है।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 3 (खोज वाले पड़ाव में)

साँची कनखेड़ा गाँव भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व में एक पहाड़ी की तलहटी में बसा है, और स्तूप पहाड़ी के ऊपर दिखता है। किताब पूछती है: यह टीला क्यों बना, इसके अंदर क्या था, इसके चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों है, इसे किसने बनवाया या किसने धन दिया, और इसकी "खोज" कब हुई? इनके उत्तर ग्रंथों, मूर्तियों, स्थापत्य और अभिलेखों से मिलते हैं (पृष्ठ 82, 84)।

भोपाल की शासक शाहजहाँ बेगम के वर्णन से (पृष्ठ 82)

"भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत साँची कनखेड़ा की इमारतें हैं।"

शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) ने यह वर्णन अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) में लिखा; 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने इसका अनुवाद किया।

भोपाल की शासक शाहजहाँ बेगम का 1872 का छायाचित्र

तस्वीर: शाहजहाँ बेगम, भोपाल की शासक; 1872 का एक छायाचित्र।

Bourne & Shepherd (British Library). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

साँची की उन्नीसवीं सदी की कहानी, किताब के क्रम में

हर क़दम खोलकर पढ़िए।

  1. 1बेगम का वर्णन

    शाहजहाँ बेगम ने साँची में पत्थर की वस्तुओं, बुद्ध की मूर्तियों और एक प्राचीन तोरणद्वार का निरीक्षण किया और अपनी आत्मकथा में उनका वर्णन किया (पृष्ठ 82)।

  2. 2कनिंघम की छानबीन

    बेगम के वर्णन के अनुसार मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम इस इलाक़े में कई हफ़्तों तक रुके। उन्होंने जगह के चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, गुंबदनुमा ढाँचे के बीचोंबीच खुदाई की और अपने निष्कर्ष एक अंग्रेज़ी पुस्तक में लिखे। किताब की कालरेखा 2 के अनुसार कनिंघम ने 1854 में भिलसा टोप्स लिखी, जो साँची पर सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है (पृष्ठ 82, 110)।

  3. 3तोरणद्वार यूरोप ले जाने की कोशिश

    फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचा पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस के संग्रहालय में दिखाने के लिए शाहजहाँ बेगम से ले जाने की इजाज़त माँगी। कुछ समय अंग्रेज़ों ने भी ऐसी कोशिश की। दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा (पृष्ठ 83)।

  4. 4बेगमों का धन

    शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया। सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए भी अनुदान दिया (पृष्ठ 83)।

  5. 5जॉन मार्शल के ग्रंथ

    जॉन मार्शल ने साँची पर अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ वहीं रहकर लिखे और उन्हें सुल्तानजहाँ बेगम को समर्पित किया; उन पुस्तकों के खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया (पृष्ठ 83)। कालरेखा 2 में 1914 में जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची का प्रकाशन दर्ज है (पृष्ठ 110)।

  6. 6शायद भाग्य भी साथ रहा

    किताब के शब्दों में: "शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।" (पृष्ठ 83)

  7. 7आज का साँची

    किताब के अनुसार साँची आज भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का "जीता जागता उदाहरण" है (पृष्ठ 83)। कालरेखा 2 के अनुसार 1989 में साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया (पृष्ठ 110)।

पहाड़ी पर साँची का महान स्तूप, गोल गुंबद और उसके चारों ओर पत्थर की रेलिंग

तस्वीर: साँची का महान स्तूप। किताब बताती है कि पहाड़ी पर चढ़ते हुए पूरा स्तूप समूह दिखता है: एक विशाल गोलार्ध ढाँचा और कई दूसरी इमारतें, जिनमें पाँचवीं सदी में बना एक मंदिर भी है (पृष्ठ 83)।

Suyash Dwivedi, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

यहाँ चित्र 3 का मतलब इसी अध्याय का चित्र 4.3 है, साँची के महान स्तूप का छायाचित्र। बेगम का वर्णन और यह छायाचित्र एक ही स्थल के हैं, पर अलग समय और अलग नज़र से।

  • समानताएँ: दोनों में एक पहाड़ी है: बेगम पहाड़ी की तलहटी में बसे गाँव की बात करती हैं, और चित्र 4.3 में स्तूप पहाड़ी के ऊपर दिखता है। बेगम एक प्राचीन तोरणद्वार का ज़िक्र करती हैं, और छायाचित्र में दाईं ओर एक तोरणद्वार का खंभा दिखता है (पृष्ठ 82–83)।
  • असमानताएँ: बेगम उन्नीसवीं सदी का हाल बताती हैं: पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ, और कनिंघम का काम (चित्र बनाना, अभिलेख पढ़ना, गुंबद के बीचोंबीच खुदाई)। छायाचित्र में ये बातें नहीं हैं; उसमें बड़ा गुंबद, उसके नीचे रेलिंग और ऊपर हर्मिका और छत्री दिखती है। चित्र के साथ लिखा है कि पहाड़ी पर चढ़ते हुए पूरा स्तूप समूह दिखता है: एक विशाल गोलार्ध ढाँचा और कई दूसरी इमारतें, जिनमें पाँचवीं सदी का एक मंदिर भी है (पृष्ठ 83)।
  • बेगम शब्दों में एक शासक की नज़र से लिखती हैं; छायाचित्र बिना शब्दों के वही दिखाता है जो कैमरे के सामने था।

किताब के अनुसार आज यह जगह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का उदाहरण है (पृष्ठ 83)।

वीडियो

Sanchi Stupa | DocumentaryPlay
Prasar Bharati Archives: दूरदर्शन का वृत्तचित्र, जो किताब से आगे जाकर साँची का स्तूप दिखाता है।Watch on YouTube

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 के युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित कौन-सी है?

  2. 2उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों ने साँची का पूर्वी तोरणद्वार ले जाना चाहा। आख़िर में क्या हुआ?

  3. 3साँची में संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए किसने अनुदान दिया?

2पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद

इस पड़ाव का सवाल

ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि में लोग यज्ञ की परंपरा से आगे कौन-से नए प्रश्न पूछने लगे, और उन पर बहस कहाँ और कैसे हुई?

पिछली बात से कड़ी साँची के स्तूप को समझने के लिए पहले वे विचार जानने होंगे जिनसे बौद्ध धर्म निकला।

  1. 2.1यज्ञों की परंपरा
  2. 2.2नए प्रश्न
  3. 2.3वाद-विवाद और चर्चाएँ

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 1

ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि: विश्व इतिहास का एक मोड़ (पृष्ठ 84)

  • ईरान में जरथुस्त्र; चीन में खुंगत्सी; यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु; भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य चिंतक।
  • ये चिंतक जीवन के रहस्य और इनसानों तथा विश्व व्यवस्था के रिश्ते को समझना चाहते थे।
  • उसी समय गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक-आर्थिक जीवन बदल रहा था; ये मनीषी इन बदलते हालात को भी समझने की कोशिश कर रहे थे।

2.1यज्ञों की परंपरापृष्ठ 84

वैदिक यज्ञ: किसलिए और कौन करता था

स्रोत 1: अग्नि की प्रार्थना (पृष्ठ 84)

  • ऋग्वेद के दो छंदों में अग्निदेव से प्रार्थना है: आहुति देवताओं तक ले जाइए, और खाद्य पदार्थ, प्रचुर धन, गाय और वंश आगे बढ़ाने वाला पुत्र दीजिए।
  • ऐसे छंद वैदिक संस्कृत में रचे गए थे और पुरोहित परिवारों के लोगों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 1, पृष्ठ 84

स्रोत 1 में ऋग्वेद के दो छंद हैं, जिनमें अग्निदेव से प्रार्थना की गई है।

यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए।

जवाब देखिए

किताब और स्रोत 1 के अनुसार यज्ञ इन बातों के लिए होते थे:

  • आहुति देवताओं तक पहुँचाना;
  • खूब सारे खाद्य पदार्थ और प्रचुर धन पाना;
  • गाय और मवेशी पाना;
  • वंश आगे बढ़ाने वाले बेटे पाना;
  • स्वास्थ्य और लंबी आयु पाना।

2.2नए प्रश्नपृष्ठ 84–85

उपनिषदों के नए प्रश्न (पृष्ठ 84)

  • उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) की विचारधाराएँ दिखाती हैं कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे। प्रश्न था: क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता है?
  • मनीषी परम यथार्थ की प्रकृति को समझने में लगे थे; वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक पूछ रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व पर भी सोचने लगे।

स्रोत 2: छांदोग्य उपनिषद के दो श्लोक (संस्कृत, लगभग छठी सदी ईसा पूर्व)

  • आत्मा की प्रकृति: मन के अंदर छुपी आत्मा धान, यव, सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है, और पृथ्वी, क्षितिज, स्वर्ग और सभी लोकों से भी बड़ी है।
  • सच्चा यज्ञ: बहता हुआ पवन "निश्चय ही एक यज्ञ है", क्योंकि बहते-बहते वह सबको पवित्र करता है। किताब कहती है कि लोग यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी चिंतन करने लगे (पृष्ठ 85)।

2.3वाद-विवाद और चर्चाएँपृष्ठ 85–87

वाद-विवाद कहाँ और कैसे (पृष्ठ 85)

  • समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख है; इससे उस समय की जीवंत चर्चाओं की झाँकी मिलती है।
  • शिक्षक जगह-जगह घूमकर एक-दूसरे से और आम लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में या उन उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे।
  • जो शिक्षक प्रतिद्वंद्वी को तर्कों से समझा लेता, वह प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता; इसलिए किसी संप्रदाय का समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था।
  • महावीर और बुद्ध समेत कई शिक्षकों ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए और माना कि जीवन के दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है। यह समझ ब्राह्मणवाद से बिलकुल भिन्न थी, जो मानता था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से तय होता है।
और जानिए बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार हुए और बचे (पृष्ठ 86)
  • बुद्ध, दूसरे शिक्षकों की तरह, चर्चा और बातचीत से मौखिक शिक्षा देते थे। महिलाएँ और पुरुष (शायद बच्चे भी) ये प्रवचन सुनते और उन पर चर्चा करते थे। बुद्ध का कोई भी संभाषण उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया।
  • बुद्ध की मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने 'ज्येष्ठों', यानी ज़्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली में बुलाई; वेसली बिहार की वैशाली का पालि भाषा में रूप है। वहीं उनकी शिक्षाओं का संकलन हुआ।
  • इन संग्रहों को त्रिपिटक कहा गया, जिसका शब्दार्थ है 'तीन टोकरियाँ', अलग-अलग प्रकार के ग्रंथ रखने के लिए। पहले ये मौखिक रूप से आगे बढ़ाए गए, बाद में लिखकर विषय और लंबाई के अनुसार बाँटे गए।
  • बौद्ध धर्म श्रीलंका जैसे नए इलाकों में फैला तो दीपवंश (द्वीप का इतिहास) और महावंश (महान इतिहास) जैसे क्षेत्र-विशेष के बौद्ध इतिहास लिखे गए। ज़्यादातर पुराने बौद्ध ग्रंथ पालि में हैं; बाद के युगों में संस्कृत में ग्रंथ लिखे गए।
  • फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए और पुस्तकें अपने देश ले गए। कई सदियों तक ये पांडुलिपियाँ एशिया के बौद्ध विहारों में सुरक्षित रहीं; पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं के इन ग्रंथों से आधुनिक अनुवाद बने हैं।

त्रिपिटक की 'तीन टोकरियाँ'

ताड़ के लंबे पत्ते पर लिखी पांडुलिपि का एक पन्ना, बीच में छोटे चित्र

तस्वीर: ताड़ के पत्ते पर संस्कृत में लिखी बौद्ध ग्रंथ अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता की पांडुलिपि का एक पन्ना, लगभग 12वीं सदी, पूर्वी भारत; भारतीय संग्रहालय, कोलकाता।

Biswarup Ganguly, CC BY 3.0. Image: Wikimedia Commons.

स्रोत 3: किसने क्या कहा? (पृष्ठ 87)

सुत्त पिटक के इस दृष्टांत में मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल की बातें बताते हैं; उसके बाद अजीत केसकंबलिन् का उपदेश आता है। बाईं ओर का नाम चुनिए, फिर दाईं ओर उसकी बात।

मक्खलि गोसाल
"सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।"
अजीत केसकंबलिन्
"मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।" और "मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।"
आजीविक परंपरा
अक्सर नियतिवादी कही जाती है: ऐसे लोग जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है
लोकायत परंपरा
सामान्यतः भौतिकवादी कही जाती है

मक्खलि गोसाल के अनुसार जैसे फेंका गया धागे का गोला अपनी पूरी लंबाई तक खुलता जाता है, वैसे ही मूर्ख और विद्वान दोनों पहले से तय रास्ते से होकर ही दुखों का अंत करेंगे (पृष्ठ 87)।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 3, पृष्ठ 87

स्रोत 3 सुत्त पिटक से है: मक्खलि गोसाल (आजीविक परंपरा) और अजीत केसकंबलिन् (लोकायत परंपरा) के विचार।

क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?

जवाब देखिए

उनकी बातों से नाम ठीक लगते हैं:

  • मक्खलि गोसाल कहते हैं कि सुख-दुख पहले से माप कर दिए गए हैं, यानी सब पूर्व निर्धारित: इसलिए नियतिवादी।
  • अजीत केसकंबलिन् कहते हैं कि मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता: इसलिए भौतिकवादी।

पर किताब कहती है कि उन्हें "अक्सर" और "सामान्यत:" ये नाम दिए जाते हैं; इन परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं और उनके बारे में हमें अन्य परंपराओं से ही जानकारी मिलती है, इसलिए पूरी तस्वीर शायद नहीं मिलती।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

कई समस्याएँ आती हैं:

  • विरोधी स्रोतों पर निर्भरता: आजीविक और लोकायत परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके विचार दूसरी परंपराओं से मिलते हैं, जो उन्हें अधूरा या अपने ढंग से बता सकती हैं।
  • अनलिखी परंपराएँ: किताब कहती है कि कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में लिखे ही नहीं गए (पृष्ठ 95)।
  • मूर्तियाँ और इमारतें पढ़ना कठिन: ग्रंथ की जानकारी के बिना मूर्ति का अर्थ समझना कठिन होता है; किताब का उदाहरण: बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ जेम्स फर्गुसन ने सिर्फ़ उत्कीर्णित मूर्तियाँ देखकर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया था (पृष्ठ 103)।
  • जो दर्ज़ नहीं हुआ: बहुत-से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज़ नहीं किए गए; इनमें रोज़ के और ख़ास अवसरों के रीति-रिवाज भी हैं (पृष्ठ 109)।

किताब के अपने प्रश्न

1क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • हाँ। तीनों जीवन, मृत्यु और कर्म के उन्हीं प्रश्नों पर चल रही बहस का हिस्सा थे, पर उनके उत्तर अलग थे।
  • उपनिषद (छठी सदी ई.पू. से): जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म पर प्रश्न पूछते थे, जैसे क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता है। छांदोग्य उपनिषद आत्मा को बीज की गिरी से छोटी और सब लोकों से बड़ी बताता है, और बहते पवन के बारे में कहता है कि वह "निश्चय ही एक यज्ञ है" (पृष्ठ 84–85)।
  • नियतिवादी (आजीविक परंपरा, जैसे मक्खलि गोसाल): सब कुछ पूर्व निर्धारित है; सुख और दुख मानो माप कर दिए गए हैं, उन्हें बदला, बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता (पृष्ठ 87)।
  • भौतिकवादी (लोकायत परंपरा, जैसे अजीत केसकंबलिन्): मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता, और दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती (पृष्ठ 87)।
  • तर्क: उपनिषद आत्मा, मृत्यु के बाद के जीवन और कर्म पर प्रश्न पूछते हैं; नियतिवादी मानते हैं कि कर्म से कुछ नहीं बदलता, और भौतिकवादी कहते हैं कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता।
  • ध्यान रहे: नियतिवादियों और भौतिकवादियों के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए; उनके विचार सुत्त पिटक जैसे दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से पता चलते हैं।

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार पूर्व वैदिक परंपरा की जानकारी देने वाला ऋग्वेद कब संकलित हुआ?

  2. 2महावीर और बुद्ध के समय के घुमक्कड़ शिक्षकों की चर्चाएँ जिन कुटागारशालाओं में होती थीं, वे क्या थीं?

  3. 3बुद्ध की मृत्यु के बाद वेसली की सभा में संकलित बौद्ध ग्रंथों के संग्रह त्रिपिटक का शब्दार्थ क्या है?

3लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश

इस पड़ाव का सवाल

वर्धमान महावीर और जैन विचारकों ने संसार, कर्म और मुक्ति के बारे में क्या सिखाया?

पिछली बात से कड़ी वाद-विवाद के उसी दौर में वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाने वाले शिक्षकों में महावीर एक थे।

  1. 3.1जैन धर्म का विस्तार

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 2

जैन दर्शन की मुख्य बातें (पृष्ठ 88)

  • जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे।
  • जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे। उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है, यानी "वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।"
  • जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: "संपूर्ण विश्व प्राणवान है"। पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
  • जीवों के प्रति अहिंसा, खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना, जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है। जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया।
  • जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या ज़रूरी है, जो संसार के त्याग से ही संभव है; इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में रहना एक अनिवार्य नियम बन गया।

जैन साधु और साध्वी के पाँच व्रत (पृष्ठ 88)

  • हत्या न करना
  • चोरी न करना
  • झूठ न बोलना
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना
  • धन संग्रह न करना

सही या ग़लत? जैन धर्म के बारे में

  1. जैन परंपरा के अनुसार वर्धमान महावीर पहले तीर्थंकर थे।

  2. जैन दर्शन पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन मानता है।

  3. जैन दर्शन के अनुसार कर्म के चक्र से मुक्ति यज्ञ करने से मिलती है।

  4. धन संग्रह न करना जैन साधु और साध्वी के पाँच व्रतों में से एक था।

स्रोत 4: महल के बाहर की दुनिया (उत्तराध्ययन सूत्र से, पृष्ठ 88)

  • महावीर के शिष्यों ने उनके उपदेश अक्सर कहानियों के रूप में संकलित किए, जो आम लोगों को आकर्षित करती थीं। इस अंश में महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझाती हैं:
  • संपूर्ण विश्व के खज़ाने मिल जाएँ तब भी संतोष नहीं होगा, न वे बचा पाएँगे।
  • मृत्यु पर सारा धन पीछे छूट जाएगा, तब सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा।
  • जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से नफ़रत करती हैं; वे राज्य और इंद्रिय सुख छोड़कर तपस्या करने को कहती हैं।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 4, पृष्ठ 88

स्रोत 4 जैन ग्रंथ उत्तराध्ययन सूत्र से है: महारानी कमलावती अपने पति राजा को संन्यास लेने के लिए समझाती हैं।

महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तर्क आपको सबसे ज़्यादा युक्तियुक्त लगता है?

जवाब देखिए

यह आपकी अपनी राय है; एक तर्क चुनिए और कारण दीजिए। महारानी के तर्क ये हैं:

  • पूरे विश्व के खज़ाने भी संतोष नहीं देंगे और न बचा पाएँगे;
  • मृत्यु पर धन पीछे छूट जाएगा, तब सिर्फ़ धर्म रक्षा करेगा;
  • जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से;
  • सुख छोड़ने वाले पक्षियों की तरह स्वतंत्र घूमते हैं।

उदाहरण के लिए, मृत्यु पर सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा, यह तर्क इसलिए मज़बूत लगता है कि धन सचमुच साथ नहीं जाता।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

हाँ, और आज भी। अपने उत्तर में किताब की ये बातें जोड़िए:

  • अहिंसा का अर्थ: जैन दर्शन में जीवों के प्रति अहिंसा, खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना; इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया (पृष्ठ 88)।
  • प्रकृति का आदर: "संपूर्ण विश्व प्राणवान है", यानी पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन है; आज यह जल, जंगल और जीवों को बचाने की सीख बनता है।
  • करुणा: बौद्ध शिक्षा में छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा का आदर्श है (पृष्ठ 94)।

फिर अपने समय के उदाहरण सोचिए, जैसे झगड़े बातचीत से सुलझाना या जानवरों के साथ दया, और बताइए कि अहिंसा उनमें कैसे काम आती है।

3.1जैन धर्म का विस्तारपृष्ठ 89

जैन धर्म का विस्तार (पृष्ठ 89)

  • धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैल गया।
  • बौद्धों की तरह जैन विद्वानों ने भी प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी कई भाषाओं में बहुत साहित्य रचा। इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ सैकड़ों वर्षों से मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं।
  • धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थंकरों के उपासकों की बनवाई मूर्तियाँ हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में मिली हैं।
ध्यान की मुद्रा में बैठे एक जिन की पत्थर की मूर्ति

तस्वीर: ध्यान में बैठे एक जिन (तीर्थंकर) की मूर्ति, कुषाण काल; राजकीय संग्रहालय, मथुरा।

Biswarup Ganguly, CC BY 3.0. Image: Wikimedia Commons.

पांडुलिपि के पन्ने पर बना रंगीन चित्र: सिंहासन पर बैठे राजा के सामने एक ज्योतिषी

तस्वीर: कल्पसूत्र की एक पांडुलिपि का पन्ना, चौदहवीं सदी के आख़िरी बरसों का, गुजरात: महावीर के पिता राजा सिद्धार्थ एक ज्योतिषी से अपने पुत्र महावीर के जन्म का भविष्यफल सुनते हैं।

Metropolitan Museum of Art, New York. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: चित्र 4.6, पृष्ठ 89

किताब का चित्र 4.6 चौदहवीं सदी के एक जैन ग्रंथ की पांडुलिपि का एक पन्ना है।

क्या आप इसकी लिपि को पहचान सकते हैं?

जवाब देखिए

लिपि आपको स्वयं पहचाननी है। ऐसे कीजिए:

  • किताब का चित्र 4.6 ध्यान से देखिए;
  • अक्षरों की बनावट आज की देवनागरी से मिलाइए और देखिए कि कौन-से अक्षर पहचान में आते हैं;

फिर शिक्षक से या किसी संग्रहालय की जानकारी से पुष्टि कीजिए।

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किताब के अपने प्रश्न

2जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे; जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे। मुख्य शिक्षाएँ:
  • संपूर्ण विश्व प्राणवान है: पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
  • अहिंसा: जीवों के प्रति अहिंसा, खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना, जैन दर्शन का केंद्र है; इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया।
  • कर्म और मुक्ति: जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है; इससे मुक्ति त्याग और तपस्या से, यानी संसार के त्याग से, मिलती है। इसलिए विहारों में रहना अनिवार्य नियम बना।
  • पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना।
  • धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैला, और जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी भाषाओं में बहुत साहित्य रचा (पृष्ठ 88–89)।

Checkpoint

  1. 1जैन परंपरा में तीर्थंकर किसे कहा जाता है?

  2. 2जैन दर्शन के अनुसार कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए विहारों में रहना अनिवार्य नियम क्यों बना?

  3. 3जैन विद्वानों ने किन भाषाओं में साहित्य रचा?

4बुद्ध और ज्ञान की खोज

इस पड़ाव का सवाल

शाक्य कबीले के सरदार के बेटे सिद्धार्थ महल छोड़कर क्यों निकले, और वे बुद्ध कैसे बने?

पिछली बात से कड़ी महावीर की तरह बुद्ध भी उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे।

बुद्ध उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। सैकड़ों वर्षों में उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में, फिर मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले (पृष्ठ 89)।

हम बुद्ध के बारे में कैसे जानते हैं? (पृष्ठ 89)

  • बुद्ध की शिक्षाएँ बौद्ध ग्रंथों के बहुत परिश्रम से किए गए संपादन, अनुवाद और विश्लेषण से फिर से जोड़ी गई हैं।
  • उनके जीवन की जानकारी चरित लेखन से मिली; इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए।
  • संतचरित्र यानी किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी। ये संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्य के रूप में पूरी तरह सही नहीं होतीं; फिर भी ये उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वास बताते हैं, इसलिए महत्वपूर्ण हैं।

बौद्ध परंपराओं के अनुसार सिद्धार्थ से बुद्ध तक: घटनाएँ क्रम से लगाइए

कार्ड को ऊपर या नीचे खिसकाइए, फिर जाँचिए।

▲ पहले

  1. 1सिद्धार्थ महल छोड़कर सत्य की खोज में निकले
  2. 2शाक्य कबीले के सरदार के बेटे सिद्धार्थ महल की चारदीवारी के अंदर सब सुखों के बीच पाले गए
  3. 3अतिवादी तरीके छोड़कर कई दिन ध्यान करने के बाद उन्हें ज्ञान मिला
  4. 4उन्होंने एक गृहत्याग किए संन्यासी को देखा, जो बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से परेशान नहीं था
  5. 5वे बुद्ध कहलाए और बाकी जीवन उन्होंने धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी
  6. 6रथकार के साथ शहर घूमते हुए उन्होंने एक वृद्ध, एक बीमार और एक लाश देखी
  7. 7उन्होंने साधना के कई मार्ग आज़माए; शरीर को अधिक से अधिक कष्ट देने के चलते वे मरते-मरते बचे

▼ बाद में

एक वृद्ध, एक बीमार और एक लाश को देखकर सिद्धार्थ को अनुभूति हुई कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है; शांत संन्यासी को देखकर उन्होंने भी संन्यास का रास्ता अपनाने का निश्चय किया (पृष्ठ 90)।

पत्थर की पट्टिका पर उकेरा दृश्य: बिना सवार का घोड़ा, ऊपर छत्र और आसपास लोग

तस्वीर: सिद्धार्थ का महल छोड़कर जाना; अमरावती क्षेत्र (आंध्र प्रदेश) की दूसरी सदी ई. की एक पत्थर की पट्टिका; गीमे संग्रहालय, पेरिस।

sailko, CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

शायद नहीं। किताब का चित्र 4.7 अमरावती की लगभग 200 ईसवी की मूर्ति है, जिसमें बुद्ध को महल से जाते हुए दिखाया गया है।

  • मूर्ति में सजा हुआ एक घोड़ा है जिस पर कोई सवार नहीं दिखता, ऊपर छत्र जैसा कुछ है और आसपास लोग हैं; बिना कहानी जाने यह कोई जुलूस लगेगा।
  • सिद्धार्थ के महल छोड़ने की कथा पता हो, तभी समझ आता है कि खाली घोड़ा बुद्ध के जाने को दिखाता है।

किताब भी कहती है कि ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता, और इसे समझने के लिए इतिहासकारों को चरित लेखन जानना पड़ा।

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Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार बुद्ध के जीवन के बारे में जानकारी देने वाले कई चरित ग्रंथ कब लिखे गए?

  2. 2किस दृश्य को देखकर सिद्धार्थ ने संन्यास का रास्ता अपनाने का निश्चय किया?

  3. 3सिद्धार्थ को ज्ञान कैसे मिला?

5बुद्ध की शिक्षाएँ

इस पड़ाव का सवाल

बुद्ध ने संसार, दुख, निर्वाण और अच्छे व्यवहार के बारे में क्या सिखाया?

पिछली बात से कड़ी ज्ञान मिलने के बाद बुद्ध ने बाकी जीवन धम्म की शिक्षा दी।

बुद्ध की शिक्षाएँ सुत्त पिटक की कहानियों के आधार पर फिर से जोड़ी गई हैं। कुछ कहानियों में अलौकिक शक्तियाँ हैं, पर दूसरी कहानियाँ दिखाती हैं कि बुद्ध ने लोगों को विवेक और तर्क से समझाया: मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ आई तो बुद्ध ने बच्चे को जीवित करने के बजाय उसे मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई। ये कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गई थीं, ताकि आसानी से समझी जा सकें (पृष्ठ 91)।

बौद्ध दर्शन के मूल विचार (पृष्ठ 91)

पृष्ठ 91 पर "आत्माविहीन" के आगे कोष्ठक में 'आत्मा' लिखा है; अर्थ आत्माविहीन ही है, क्योंकि किताब के अनुसार "यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।"

समाज, निर्वाण और अंतिम निर्देश (पृष्ठ 92)

  • बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था, न कि ईश्वर ने। इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी; माना जाता था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश बदला जा सकता है।
  • बुद्ध ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्म-ज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति-केंद्रित हस्तक्षेप और सम्यक कर्म की कल्पना की। निर्वाण का मतलब था "अहं और इच्छा का खत्म हो जाना", जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था।
  • बौद्ध परंपरा के अनुसार शिष्यों के लिए बुद्ध का अंतिम निर्देश था: "तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।"

स्रोत 5: व्यवहार में बौद्ध धर्म (सुत्त पिटक से, पृष्ठ 91)

  • इस अंश में बुद्ध सिगल नाम के एक अमीर गृहपति को सलाह देते हैं।
  • मालिक नौकरों और कर्मचारियों की पाँच तरह से देखभाल करे: क्षमता के अनुसार काम देकर, भोजन और मज़दूरी देकर, बीमारी में परिचर्या करके, सुस्वादु भोजन बाँटकर और समय-समय पर छुट्टी देकर।
  • कुल के लोग श्रमणों (जिन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया है) और ब्राह्मणों की भी पाँच तरह से देखभाल करें, जैसे कर्म, वचन और मन से अनुराग, उनके स्वागत के लिए घर हमेशा खुले रखना और उनकी दिन-प्रतिदिन की ज़रूरतें पूरी करना।
  • सिगल को माता-पिता, शिक्षक और पत्नी के साथ व्यवहार के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 5, पृष्ठ 91

स्रोत 5 में बुद्ध अमीर गृहपति सिगल को नौकरों, कर्मचारियों, श्रमणों और ब्राह्मणों की "पाँच तरह से" देखभाल करने की सलाह देते हैं।

आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे।

जवाब देखिए

स्रोत 5 बस इतना बताता है कि सिगल को माता-पिता, शिक्षक और पत्नी के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए; निर्देश आपको स्वयं सोचने हैं। स्रोत 5 के ढंग से, "पाँच तरह से" देखभाल वाले कर्तव्यों के रूप में लिखिए, जैसे:

  • माता-पिता के लिए: आदर और बुढ़ापे में देखभाल;
  • शिक्षकों के लिए: सम्मान और मन लगाकर सीखना;
  • पत्नी के लिए: सम्मान और घर की ज़रूरतों का ध्यान।

ये आपके सुझाव हैं, बौद्ध ग्रंथ के शब्द नहीं।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

दोनों में समानताएँ भी हैं और असमानताएँ भी:

  • समानताएँ: बुद्ध सिगल से नौकरों और कर्मचारियों की देखभाल और श्रमणों और ब्राह्मणों की सेवा करने को कहते हैं; अध्याय 2 के अनुसार असोक का धम्म भी बड़ों के आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता और सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार की बात करता है।
  • असमानताएँ: स्रोत 5 के इस अंश में बुद्ध की सलाह एक गृहपति के अपने लोगों के प्रति कर्तव्यों की है; असोक ने अपनी सलाह पूरी प्रजा के लिए अभिलेखों में लिखवाई, दूसरों के धर्मों और परंपराओं के आदर की बात भी जोड़ी, और धम्म के प्रचार के लिए अधिकारी नियुक्त किए।

Checkpoint

  1. 1बौद्ध दर्शन के अनुसार विश्व आत्माविहीन क्यों है?

  2. 2बुद्ध के अनुसार निर्वाण का मतलब क्या था?

  3. 3बुद्ध ने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह क्यों दी?

6बुद्ध के अनुयायी

इस पड़ाव का सवाल

बुद्ध के संघ में कौन आए, वहाँ कैसे नियम थे, और स्त्रियों ने वहाँ क्या कहा और किया?

पिछली बात से कड़ी शिक्षाएँ सुनने वालों का दल बढ़ा तो बुद्ध ने संघ की स्थापना की।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 4, 5

संघ: भिक्खु और भिक्खुनी (पृष्ठ 92)

  • शिष्यों का दल बढ़ा तो बुद्ध ने संघ की स्थापना की: ऐसे भिक्षुओं की संस्था, जो धम्म के शिक्षक बन गए।
  • ये श्रमण सादा जीवन बिताते थे; जीवन के लिए बहुत ज़रूरी चीज़ों के अलावा उनके पास कुछ नहीं होता था, जैसे दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा। वे दान पर निर्भर थे, इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था।
  • शुरू-शुरू में सिर्फ़ पुरुष संघ में आ सकते थे, बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर यह अनुमति पाई।
  • बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी बनीं। संघ में आई कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और आगे चलकर थेरी बनीं, यानी ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।

संघ में कौन आए, और संघ कैसे चलता था (पृष्ठ 92)

  • राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन, जैसे कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी बुद्ध के अनुयायी बने।
  • संघ में आने पर सभी बराबर माने जाते थे, क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर अपनी पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी।
  • संघ की संचालन पद्धति गणों और संघों की परंपरा पर आधारित थी: लोग बातचीत से एकमत होने की कोशिश करते थे; ऐसा न हो पाता तो मतदान से निर्णय होता था।

स्रोत 6: थेरीगाथा से पुन्ना की रचना (पृष्ठ 93)

  • थेरीगाथा सुत्त पिटक का हिस्सा है, जिसमें भिक्खुनियों के रचे छंद हैं; इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों की झलक मिलती है।
  • पुन्ना नाम की एक दासी रोज़ सुबह मालिक के घर के लिए नदी का पानी लाने जाती थी और वहाँ एक ब्राह्मण को स्नान कर्म करते देखती थी।
  • पुन्ना कहती है कि वह सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से ठंडे पानी में उतरती है; वह ब्राह्मण से पूछती है कि उसे किसका डर है।
  • ब्राह्मण कहता है कि जल में स्नान करके बुरा करने वाला मुक्त हो जाता है। पुन्ना का उत्तर: "वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे"; इसलिए वे कर्म ही मत कीजिए जिनका डर पानी की ओर खींचता है।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 6, पृष्ठ 93

स्रोत 6 थेरीगाथा से दासी पुन्ना की रचना है, जिसमें वह नदी पर स्नान कर्म करते एक ब्राह्मण से बात करती है।

बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं?

जवाब देखिए

पुन्ना की रचना में ये शिक्षाएँ दिखती हैं:

  • विवेक और तर्क: अगर पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति मिलती, तो पानी में रहने वाले मेंढक और कछुए भी स्वर्ग जाते; यानी कर्मकांड पर तर्क से प्रश्न।
  • सम्यक कर्म: बुराई से बचने का रास्ता वे कर्म छोड़ना है जिनका डर पानी की ओर खींचता है।
  • हर व्यक्ति की मुक्ति: एक दासी भी धर्म पर अपनी बात कह सकती है; मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
  • करुणा: अंत में वह ब्राह्मण से अपने शरीर को ठंड से बचाने को कहती है।

स्रोत 7: विनय पिटक में संघ के कुछ नियम (पृष्ठ 94)

  • नया कंबल या गलीचा बनाने पर भिक्खु को उसका प्रयोग कम से कम छह वर्षों तक करना होगा; उससे पहले बिना भिक्खुओं की अनुमति के नया बनवाने पर वह ले लिया जाएगा और अपराध स्वीकार करना होगा।
  • गृहस्थ के घर टिकिया या पके अनाज का भोजन मिले तो वह दो से तीन कटोरा भर ही ले सकता है, और उसे दूसरे भिक्खुओं के साथ बाँटना होगा: "यही सम्यक आचरण है।"
  • विहार से जाने से पहले बिछाया हुआ बिस्तरा न समेटने पर, या बिना विदाई लिए चले जाने पर, अपराध स्वीकार करना होगा।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 7, पृष्ठ 94

स्रोत 7 विनय पिटक से है, जिसमें संघ में रहने वाले भिक्खुओं के नियम हैं: कंबल, भोजन और विहार के बिस्तरे के बारे में।

क्या आप बता सकते हैं कि ये नियम क्यों बने?

जवाब देखिए

नियमों के पीछे संघ के जीवन की ये ज़रूरतें दिखती हैं:

  • सादा जीवन: भिक्खु के पास सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ें होती थीं; कंबल या गलीचा कम से कम छह वर्ष चलाने का नियम लालच और संग्रह रोकता है।
  • दान पर निर्भरता: भिक्खु दान पर जीते थे; दो-तीन कटोरे से ज़्यादा न लेना और उसे बाँटना गृहस्थों पर बोझ कम करता है और बराबरी रखता है ("यही सम्यक आचरण है")।
  • विहार का अनुशासन: बिस्तरा समेटना और विदा लेकर जाना साझा विहार को व्यवस्थित रखता है।
  • अपराध स्वीकार करना: नियम तोड़ने पर अपराध स्वीकार करने से संघ में अनुशासन बना रहता है।

बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला (पृष्ठ 94)

  • बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौद्ध धर्म तेज़ी से फैला। लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे, और तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझनों में बाँध रखा था।
  • बौद्ध शिक्षाओं ने जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया, इसलिए महिलाएँ और पुरुष आकर्षित हुए।
  • ख़ुद से छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा के आदर्श बहुत लोगों को भाए।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

पुन्ना की रचना और किताब की बातों से कारण सोचिए:

  • कठिन जीवन: रचना में पुन्ना कहती है कि सज़ा और ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से वह कड़ी ठंड में भी पानी में उतरती है (पृष्ठ 93)।
  • बराबरी: संघ में आने पर पुरानी पहचान छूट जाती थी और सब बराबर माने जाते थे; कर्मकार और दास भी बुद्ध के अनुयायी बने (पृष्ठ 92)।
  • आचरण का महत्त्व: बौद्ध शिक्षा जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व देती थी (पृष्ठ 94)।
  • नया स्थान: संघ में आई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बन सकती थीं और आगे चलकर थेरी बनीं (पृष्ठ 92)।

इसलिए संघ उसे बराबरी और दुख से मुक्ति का रास्ता दिखाता था।

एक अभिलेख पढ़िए: किताब का प्रश्न 4 (पृष्ठ 111)

"महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता–पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।"

अभिलेख के हर टुकड़े को सही खाने में रखिए: वह तारीख बताता है, दान करने वाली को, मूर्ति को या जगह को?

ध्यान से पढ़िए: धनवती बुद्धमिता के बहन की बेटी हैं। "भिक्खु बल की शिष्या" शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी; इसलिए धनवती के गुरु भिक्खु बल भी हो सकते हैं और उनकी मौसी बुद्धमिता भी।

किताब के अपने प्रश्न

4निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए: "महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता–पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।" (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की? (ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की? (ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं? (घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थीं? (ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • (क) शासक के राज्य वर्ष और ऋतु के महीने-दिन से: कुषाण शासक महाराजा हुविष्क के तैंतीसवें साल में, गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन।
  • (ख) यह अभिलेख और किताब के आधार पर अनुमान है: महायान परंपरा में बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए और बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बन गई (पृष्ठ 103); स्तूपों के अभिलेख दिखाते हैं कि भिक्खु और भिक्खुनियाँ भी दान देते थे और दानकर्ता अपना और रिश्तेदारों का नाम लिखवाते थे (पृष्ठ 96)। इसलिए धनवती ने शायद अपनी श्रद्धा दिखाने, उपासकों की पूजा के लिए और दान को याद रखवाने के लिए मूर्ति स्थापित की।
  • (ग) अपने माता-पिता का, जिनके साथ उन्होंने मूर्ति स्थापित की, और बुद्धमिता का, जिनकी बहन की बेटी वे हैं (यानी बुद्धमिता उनकी मौसी हैं)। भिक्खु बल रिश्तेदार नहीं हैं: वे त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु हैं, और "भिक्खु बल की शिष्या" शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी।
  • (घ) अभिलेख भिक्खु बल को "त्रिपिटक जानने वाले" और बुद्धमिता को "त्रिपिटक जानने वाली" बताता है, इसलिए माना जा सकता है कि धनवती भी त्रिपिटक, यानी विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक, जानती थीं (पृष्ठ 86)।
  • (ङ) भिक्खु बल से, या अपनी मौसी बुद्धमिता से। अगर "भिक्खु बल की शिष्या" धनवती के लिए है, तो धनवती ने त्रिपिटक भिक्खु बल से सीखा; अगर यह बुद्धमिता के लिए है, तो धनवती ने शायद अपनी मौसी बुद्धमिता से सीखा, जो त्रिपिटक जानती थीं। अभिलेख का वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है, इसलिए उत्तर में ये दोनों नाम लिखिए (पृष्ठ 111)।

5आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • प्रश्न आपकी राय पूछता है; किताब की इन बातों से कारण जोड़िए।
  • बराबरी: राजा, धनवान, गृहपति से लेकर कर्मकार, दास, शिल्पी तक बुद्ध के अनुयायी बने; संघ में पुरानी पहचान छोड़ने पर सभी बराबर माने जाते थे, और निर्णय बातचीत या मतदान से होते थे (पृष्ठ 92)।
  • सादा जीवन और धम्म: भिक्खु और भिक्खुनी सादा जीवन बिताते थे और धम्म के शिक्षक बने; संघ में आई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और आगे चलकर थेरी बनीं (पृष्ठ 92)।
  • स्वयं मुक्ति का रास्ता: बुद्ध ने सिखाया कि दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है: "तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो" (पृष्ठ 85, 92)।
  • किताब पृष्ठ 94 पर बताती है कि बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला: लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे; बौद्ध शिक्षाओं ने जन्म की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया; और छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा के आदर्श लोगों को भाए। आपके अनुसार यही बातें लोगों को संघ की ओर भी खींच सकती थीं।
  • थेरीगाथा में पुन्ना जैसी दासी भी अपनी बात कहती है (पृष्ठ 93)। इसलिए संघ बहुतों को सादा, बराबरी वाला और अर्थपूर्ण जीवन देता था।

Checkpoint

  1. 1बौद्ध ग्रंथों के अनुसार संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी कौन बनीं?

  2. 2भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर संघ में सभी बराबर क्यों माने जाते थे?

  3. 3संघ में कोई निर्णय बातचीत से एकमत होकर न हो पाए, तो क्या होता था?

7स्तूप

इस पड़ाव का सवाल

स्तूप क्यों बनाए गए, किसके दान से बने, और उनकी बनावट कैसी थी?

पिछली बात से कड़ी बौद्ध परंपरा ग्रंथों के साथ-साथ पवित्र स्थलों और इमारतों में भी दिखती है।

  1. 7.1स्तूपों का निर्माण क्यों किया जाता था?
  2. 7.2स्तूपों का निर्माण कैसे हुआ?
  3. 7.3स्तूप की संरचना

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 9

बौद्ध आदर्श और व्यवहार ब्राह्मण, जैन और कई अन्य परंपराओं के साथ संवाद और तर्क-वितर्क से उभरे। इनमें से कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में नहीं लिखे गए; यह मेलजोल पवित्र स्थलों के उभरने में भी दिखता है (पृष्ठ 95)।

पवित्र स्थल और चैत्य (पृष्ठ 95–96)

  • बहुत प्राचीन काल से लोग ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानों या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों को पवित्र मानते थे। ऐसे कुछ स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी होती थी, जिसे कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।
  • किताब के किनारे के बॉक्स के अनुसार शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे; अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए।
  • बौद्ध साहित्य में बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहों का वर्णन है: लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान); धीरे-धीरे ये पवित्र स्थल बन गए।
  • बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद असोक ने लुम्बिनी की अपनी यात्रा की याद में वहाँ एक स्तंभ बनवाया।

मानचित्र 1: महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल (पृष्ठ 95)

किताब के मानचित्र 1 जैसा हमारा अपना रेखाचित्र: वही 14 स्थल, 7 नदियाँ और 2 सागर। किसी नाम पर या नीचे की पट्टी में उसके बटन पर टैप कीजिए।

सिंधुगंगायमुनानर्मदामहानदीगोदावरीकृष्णाअरब सागरबंगाल की खाड़ीलुम्बिनीश्रावस्तीकुशीनगरसारनाथबराबरबोधगयाभरहुतसाँचीअजंतानासिकजुन्नारकार्लेनागार्जुनकोंडाअमरावती

रेखाचित्र / पैमाना नहीं दिया गया है।

इनमें से चार जगहें बुद्ध के जीवन से जुड़ी हैं: लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान) (पृष्ठ 95–96)।

Relief map: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.

7.1स्तूपों का निर्माण क्यों किया जाता था?पृष्ठ 96

स्तूप क्यों बनाए जाते थे (पृष्ठ 96)

  • कुछ पवित्र जगहों पर बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे उनकी अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान, गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।
  • स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, पर वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। उनमें पवित्र माने जाने वाले अवशेष रहते थे, इसलिए पूरा स्तूप ही बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया।
  • अशोकावदान नाम के बौद्ध ग्रंथ के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया।
  • ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बन चुके थे।

स्रोत 8: महापरिनिब्बान सुत्त से (पृष्ठ 96)

  • सुत्त पिटक के इस अंश में परिनिर्वाण से पहले आनंद पूछते हैं कि तथागत (बुद्ध का दूसरा नाम) के अवशेषों का क्या करें।
  • पहले बुद्ध कहते हैं कि अवशेषों को विशेष आदर देने में मत उलझो; विशेष आग्रह करने पर कहते हैं: "उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए।"
  • जो वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा, सिर नवाएगा या हृदय में शांति लाएगा, उसके लिए वह स्तूप चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।

किताब के किनारे का प्रश्न: स्रोत 8, पृष्ठ 96

स्रोत 8 में बुद्ध बताते हैं कि स्तूप पर लोग धूप या माला चढ़ाएँगे, सिर नवाएँगे और हृदय में शांति लाएँगे। किताब का चित्र 4.15 एक स्तूप की पूजा दिखाता है।

चित्र 4.15 को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाज़ों को पहचान सकते हैं?

जवाब देखिए

चित्र 4.15 में स्तूप के नीचे उपासकों की भीड़ और ऊपर उड़ती आकृतियाँ हैं। अपनी किताब में चित्र खोलकर देखिए:

  • कौन हाथ में माला जैसी चीज़ लिए है;
  • कौन सिर झुकाए या हाथ जोड़े खड़ा है;

फिर उन्हें स्रोत 8 के रिवाज़ों (धूप, माला, सिर नवाना, मन में शांति) से मिलाइए।

7.2स्तूपों का निर्माण कैसे हुआ?पृष्ठ 96

स्तूप कैसे बने: दान से (पृष्ठ 96)

  • स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेख बताते हैं कि इन्हें बनाने और सजाने के लिए दान किसने दिया।
  • कुछ दान राजाओं ने दिए, जैसे सातवाहन वंश के राजा। कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों ने दिए; जैसे साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना।
  • सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम लिखवाया, कभी गाँव या शहर का नाम, कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी। भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी इन इमारतों के लिए दान दिया।
  • किताब के चित्र 4.9 में साँची का एक दानात्मक अभिलेख है; किताब कहती है, "ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं।" (पृष्ठ 97)
साँची के तोरणद्वार के पत्थर पर खुदे अक्षरों की एक पंक्ति

तस्वीर: साँची का एक अभिलेख; इसके अनुसार विदिशा के हाथीदाँत का काम करने वालों ने यह नक्काशी की।

Photo Dharma from Sadao, Thailand, CC BY 2.0. Image: Wikimedia Commons.

7.3स्तूप की संरचनापृष्ठ 96–97

स्तूप की संरचना (पृष्ठ 96–97)

बाद में टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी होने लगी। अमरावती में और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी के स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उकेरने के बहुत उदाहरण मिलते हैं (पृष्ठ 97)।

स्तूप दो तरह से देखिए

किताब के चित्र 4.10 (क-ख) की तरह का हमारा सरल रेखाचित्र। हिस्सों के नाम किताब के भाग 7.3 से हैं; किसी नाम के बटन पर टैप कीजिए।

(क) योजना: ऊपर से देखा गया स्तूप, यानी समतलीय परिप्रेक्ष्य

तोरणद्वारहर्मिकाअंडवेदिकापरिक्रमा का रास्ता

(ख) ऊँचाई: सामने से देखा गया स्तूप, यानी ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य

छत्रीयष्टिहर्मिकाअंडवेदिकातोरणद्वार

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

दोनों एक ही महास्तूप दिखाते हैं।

  • समानताएँ: गोल टीला, उसके चारों ओर की वेदिका और तोरणद्वार दोनों में हैं।
  • फ़र्क: मापचित्र ऊपर से देखी गई योजना है: उसमें गोल घेरे, बीच में छोटा चौकोर और चारों दिशाओं के चारों तोरणद्वार एक साथ दिखते हैं, पर ऊँचाई नहीं।
  • छायाचित्र में एक ओर से देखा गया असली स्तूप है: गुंबद की ऊँचाई, ऊपर हर्मिका और छत्री, पेड़ और ढलान, पर चारों द्वार एक साथ नहीं।

किताब के किनारे का प्रश्न: चित्र 4.10, पृष्ठ 97

किताब का चित्र 4.10 (क) साँची के महास्तूप की योजना (समतलीय परिप्रेक्ष्य) है, और चित्र 4.10 (ख) उसकी ऊँचाई (ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य)।

इस इमारत की कौन-सी विशेषताएँ नक्शे में सबसे ज़्यादा स्पष्ट हैं? कौन-सी विशेषताएँ ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य से देखने पर ज़्यादा स्पष्ट होती हैं?

जवाब देखिए

योजना और ऊँचाई का चित्र एक ही इमारत को दो तरह से दिखाते हैं।

  • नक्शे (योजना) में: स्तूप का गोल आकार, एक के अंदर एक घेरे (टीला, परिक्रमा का रास्ता, वेदिका), बीच का चौकोर, सीढ़ियाँ और चारों दिशाओं में निकले चार तोरणद्वार।
  • ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य में: गुंबद की ऊँचाई और आकार, ऊपर हर्मिका और तीन तल वाली छत्री, आधार के चारों ओर की वेदिका, सीढ़ी, नक्काशीदार तोरणद्वार और उसके सामने खड़ा स्तंभ।

किताब के अपने प्रश्न

9स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।

लघु निबंध, लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • स्तूप बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेषों पर बने टीले थे, जो धीरे-धीरे बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक बन गए; इन्हें बहुत-से लोगों के दान से बनाया और सजाया गया।
  • पवित्र स्थल: बहुत प्राचीन काल से लोग कुछ जगहों को पवित्र मानते थे, जहाँ कभी-कभी छोटी वेदी (चैत्य) होती थी। लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसी बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहें पवित्र स्थल बनीं (पृष्ठ 95–96)।
  • अवशेषों पर टीला: कुछ जगहों पर बुद्ध की अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान गाड़ दिए गए; इन टीलों को स्तूप कहा गया। स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, पर वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई (पृष्ठ 96)।
  • बुद्ध का निर्देश: महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) के अनुसार बुद्ध ने कहा कि तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप बनाया जाए; वहाँ धूप या माला चढ़ाने, सिर नवाने या हृदय में शांति लाने वाले के लिए वह चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा (पृष्ठ 96)।
  • असोक: अशोकावदान के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया। ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बन चुके थे (पृष्ठ 96)।
  • दान से: वेदिकाओं और स्तंभों के अभिलेख दानकर्ताओं के नाम बताते हैं: सातवाहन जैसे राजवंशों के राजा, शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ (साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वालों के दान से बना), सैकड़ों स्त्री-पुरुष, और भिक्खु-भिक्खुनियाँ भी (पृष्ठ 96)।
  • संरचना: गोलार्ध मिट्टी का टीला अंड; उसके ऊपर छज्जे जैसी हर्मिका (देवताओं के घर का प्रतीक); उससे निकला मस्तूल यष्टि और उस पर अक्सर छत्री; टीले के चारों ओर वेदिका, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी; और चारों दिशाओं में नक्काशीदार तोरणद्वार (पृष्ठ 96–97)।
  • परिक्रमा और अलंकरण: उपासक पूर्वी तोरणद्वार से घुसकर टीले को दाईं ओर रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे। बाद में टीले पर भी नक्काशी होने लगी, जैसे अमरावती और शाह जी की ढेरी (पेशावर, पाकिस्तान) में (पृष्ठ 97)।
  • निष्कर्ष: स्तूप आस्था (अवशेषों की पूजा) और समाज (राजा से शिल्पी तक के दान) दोनों के मेल से बने। इनमें से साँची का स्तूप आज भी अपनी जगह खड़ा है, जबकि अमरावती का महाचैत्य अब एक छोटा-सा टीला रह गया है (पृष्ठ 99)।

Checkpoint

  1. 1किताब के किनारे के बॉक्स (पृष्ठ 95) के अनुसार चैत्य किन टीलों को कहा गया?

  2. 2स्तूप के अंड के ऊपर बनी हर्मिका किसका प्रतीक थी?

  3. 3साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा किसके दान से बना?

8स्तूपों की 'खोज'

इस पड़ाव का सवाल

उन्नीसवीं सदी में अमरावती का स्तूप क्यों बिखर गया और साँची का क्यों बचा रहा?

पिछली बात से कड़ी स्तूप कैसे बने, यह एक इतिहास है; उनकी "खोज" कैसे हुई, यह दूसरा।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 3

हर स्तूप का एक इतिहास यह है कि वह कैसे बना, और दूसरा यह कि उसकी खोज कैसे हुई (पृष्ठ 98)। अमरावती और साँची, दो स्तूपों की कहानी बिलकुल अलग निकली।

अमरावती: एक स्तूप कैसे बिखर गया (पृष्ठ 98)

  1. 11796: एक स्थानीय राजा

    मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले। उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया; उन्हें लगा कि इस छोटी-सी पहाड़ी में शायद कोई खज़ाना छुपा हो।

  2. 2कुछ वर्षों बाद: कॉलिन मेकेंज़ी

    यह अंग्रेज़ अधिकारी इस इलाके से गुज़रे। उन्होंने कई मूर्तियाँ पाईं और उनका विस्तृत चित्रांकन किया, पर उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं।

  3. 31854: गुंटूर के कमिश्नर

    गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की, कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर जमा किए और उन्हें मद्रास ले गए; ये उनके नाम पर एलियट संगमरमर कहलाते हैं। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार भी खोज निकाला और माना कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था।

  4. 41850 का दशक: पत्थर बिखर गए

    अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर अलग-अलग जगहों पर ले जाए गए: कुछ कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल पहुँचे, कुछ मद्रास में इंडिया ऑफिस, और कुछ लंदन तक। कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बागों में अमरावती की मूर्तियाँ थीं; इलाके का हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उससे पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया।

पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल की अलग राय (पृष्ठ 98–99)

"इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।"

कोल उन मुट्ठी भर लोगों में थे जो अलग सोचते थे। वे मानते थे कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें। कोल अधिकारियों को अमरावती के लिए राज़ी नहीं कर पाए, पर साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई।

साँची के स्तूप 1 का ऊँचा पत्थर का तोरणद्वार, खंभों और आड़ी पट्टियों पर भरी नक्काशी

सजीव मूर्तियों को देखिए: साँची के स्तूप 1 का पूर्वी तोरणद्वार।

Biswarup Ganguly, CC BY 3.0. Image: Wikimedia Commons.

साँची क्यों बचा (पृष्ठ 99)

  • शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब तक विद्वान यह नहीं समझ पाए थे कि अवशेष उठा ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना ज़रूरी है।
  • 1818 में जब साँची की खोज हुई, उसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला अच्छी हालत में था। तब भी सुझाव आया कि तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेज दिए जाएँ; अंत में कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा।
  • आज साँची का स्तूप बना हुआ है, जबकि अमरावती का महाचैत्य "अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।"
उन्नीसवीं सदी का श्वेत-श्याम छायाचित्र: झाड़ियों के बीच साँची का गोल स्तूप

तस्वीर: साँची का महान स्तूप, उत्तर की ओर से; लाला दीन दयाल का 1885 और 1887 के बीच खींचा छायाचित्र।

Lala Deen Dayal (J. Paul Getty Museum), CC0. Image: Wikimedia Commons.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

खंड एक यानी किताब का भाग 1, "साँची की एक झलक" (पृष्ठ 82–83)। उसे और भाग 8 को मिलाकर ये कारण बनते हैं:

  • फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की जगह प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
  • शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया; सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए भी अनुदान दिया।
  • किताब के शब्दों में, "शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।"
  • भाग 8 के अनुसार साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई; शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब यह समझ नहीं बनी थी।

कालरेखा 2: प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण (पृष्ठ 110)

घटनाओं को पहले से बाद के क्रम में लगाइए, फिर जाँचिए। सही क्रम और साल नीचे की तालिका में हैं।

▲ पहले

  1. 1अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है
  2. 2जॉन मार्शल की पुस्तक कंजर्वेशन मैनुअल का प्रकाशन
  3. 3रामराजा लिखित एसेज़ ऑन द आर्किटैक्चर ऑफ़ द हिंदूज़ का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की
  4. 4साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया
  5. 5एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया
  6. 6इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना
  7. 7जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची पुस्तक का प्रकाशन
  8. 8गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास की स्थापना
  9. 9प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी
  10. 10जेम्स फर्गुसन ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया
  11. 11ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट का बनाया जाना। इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी
  12. 12राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक, बुद्ध गया : द हेरिटेज़ ऑफ़ शाक्य मुनि का प्रकाशन

▼ बाद में

और जानिए कालरेखा 2 की पूरी तालिका
वर्षघटना
1814इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना
1834रामराजा लिखित एसेज़ ऑन द आर्किटैक्चर ऑफ़ द हिंदूज़ का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की
1835-1842जेम्स फर्गुसन ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया
1851गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास की स्थापना
1854अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है
1878राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक, बुद्ध गया : द हेरिटेज़ ऑफ़ शाक्य मुनि का प्रकाशन
1880एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया
1888ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट का बनाया जाना। इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी
1914जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची पुस्तक का प्रकाशन
1923जॉन मार्शल की पुस्तक कंजर्वेशन मैनुअल का प्रकाशन
1955प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी
1989साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया

किताब के अपने प्रश्न

3साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।

लगभग 100 से 150 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • साँची का स्तूप आज जिस हालत में है, उसमें भोपाल की दो शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम, के फ़ैसलों और अनुदान की बड़ी भूमिका है।
  • तोरणद्वार अपनी जगह रहा: उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले जाने की इजाज़त शाहजहाँ बेगम से माँगी; अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की। अंत में दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा (पृष्ठ 83)।
  • रख-रखाव का धन: दोनों बेगमों ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया (पृष्ठ 83)।
  • संग्रहालय और अतिथिशाला: सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनवाने के लिए अनुदान दिया। जॉन मार्शल ने वहीं रहकर साँची पर अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे और उन्हें सुल्तानजहाँ को समर्पित किया; उन ग्रंथों के खंडों के प्रकाशन के लिए भी बेगम ने अनुदान दिया (पृष्ठ 83)।
  • लिखित वर्णन: शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) ने अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल में साँची के अवशेषों और कनिंघम के काम का वर्णन किया (पृष्ठ 82)।
  • किताब के शब्दों में, स्तूप समूह बचा रहा तो "इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।" आज यह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल संरक्षण का उदाहरण है, और 1989 में इसे विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया (पृष्ठ 83, 110)।

Checkpoint

  1. 11854 में अमरावती से मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले जाने वाले गुंटूर के कमिश्नर के नाम पर उन पत्थरों को क्या कहा जाता है?

  2. 2पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल असली मूर्तियों को कहाँ रखना चाहते थे?

  3. 3किताब के अनुसार अमरावती का स्तूप शायद क्यों नहीं बच पाया?

9मूर्तिकला

इस पड़ाव का सवाल

साँची जैसे स्तूपों की मूर्तियाँ पत्थर में कौन-सी कथाएँ, प्रतीक और लोक विश्वास दिखाती हैं, और इतिहासकार उन्हें कैसे पढ़ते हैं?

पिछली बात से कड़ी जिन मूर्तियों को देखकर लोग उन्हें उठा ले जाना चाहते थे, अब उन्हीं को पढ़ते हैं।

  1. 9.1पत्थर में गढ़ी कथाएँ
  2. 9.2उपासना के प्रतीक
  3. 9.3लोक परंपराएँ

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 6, 7

जिन लोगों ने स्तूपों की मूर्तियाँ देखीं, उन्हें वे खूबसूरत और मूल्यवान लगीं, इसलिए वे उन्हें अपने लिए रखना चाहते थे। घुमक्कड़ कथावाचक कपड़े या कागज़ पर बने चित्र (चारणचित्र) लेकर घूमते हैं और कहानी कहते हुए उन्हें दिखाते हैं; साँची की मूर्तियाँ भी पत्थर में कहानियाँ कहती हैं (पृष्ठ 99)।

9.1पत्थर में गढ़ी कथाएँपृष्ठ 99–100

एक दृश्य, दो नज़रें: साँची के उत्तरी तोरणद्वार का एक हिस्सा (किताब का चित्र 4.13, पृष्ठ 99–100)

  1. 1पहली नज़र में क्या दिखता है?

    फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला एक ग्रामीण दृश्य।

  2. 2कला इतिहासकार इसे क्या बताते हैं?

    साँची की मूर्तिकला का गहराई से अध्ययन करने वाले कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का एक दृश्य बताते हैं।

  3. 3वेसान्तर जातक की कहानी क्या है?

    यह एक दानी राजकुमार की कहानी है, जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया।

  4. 4इतिहासकार यह कैसे पहचानते हैं?

    इतिहासकार अक्सर किसी मूर्ति की व्याख्या लिखित साक्ष्यों से तुलना करके करते हैं (पृष्ठ 100)।

9.2उपासना के प्रतीकपृष्ठ 100–101

उपासना के प्रतीक: कौन-सा प्रतीक किस बात का? (पृष्ठ 100)

कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई। बुद्ध के चरित के अनुसार उन्हें एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान मिला। प्रतीक चुनिए, फिर उसका अर्थ।

रिक्त स्थान
बुद्ध के ध्यान की दशा
स्तूप
महापरिनिब्बान
चक्र
सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश
पेड़
सिर्फ़ पेड़ नहीं, बुद्ध के जीवन की एक घटना

किताब कहती है, "ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।" ऐसे प्रतीक समझने के लिए इतिहासकारों को कलाकृतियाँ बनाने वालों की परंपराएँ जाननी पड़ती हैं (पृष्ठ 100–101)।

पत्थर के खंभे पर उकेरा दृश्य: बीच में पेड़, उसके नीचे खाली आसन और दोनों ओर हाथ जोड़े लोग

तस्वीर: साँची के पूर्वी तोरणद्वार के एक खंभे पर बोधि वृक्ष की पूजा: वृक्ष, उसके नीचे खाली आसन, और दोनों ओर हाथ जोड़े लोग।

Biswarup Ganguly, CC BY 3.0. Image: Wikimedia Commons.

9.3लोक परंपराएँपृष्ठ 101–103

लोक परंपराएँ: साँची की वे मूर्तियाँ जो बौद्ध ग्रंथों से सीधी नहीं खुलतीं (पृष्ठ 101–103)

शालभंजिका जैसी मूर्तियाँ बताती हैं कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया (पृष्ठ 101)।

कला पर लिखने वाले शुरुआती आधुनिक इतिहासकारों में से एक, जेम्स फर्गुसन, ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना। वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे, क्योंकि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था; उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर निष्कर्ष निकाले (पृष्ठ 102–103)।

सही या ग़लत? साँची की मूर्तियाँ

  1. साँची की हर मूर्ति बौद्ध ग्रंथों से सीधे समझ में आ जाती है।

  2. कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दिखाया।

  3. जेम्स फर्गुसन ने बौद्ध ग्रंथ पढ़कर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना।

और जानिए अतीत से प्राप्त चित्र: अजंता (पृष्ठ 102)
  • पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक बचती हैं, पर अतीत में चित्रकारी भी संप्रेषण का माध्यम थी। सबसे अच्छी हालत में गुफाओं की दीवारों के चित्र बचे हैं; इनमें अजंता (महाराष्ट्र) की चित्रकारी बहुत प्रसिद्ध है।
  • अजंता के चित्र जातकों की कथाएँ दिखाते हैं: राज दरबार का जीवन, शोभा यात्राएँ, काम करते हुए स्त्री-पुरुष और त्यौहार।
  • कलाकारों ने चित्रों को त्रिविम रूप देने के लिए आभाभेद तकनीक का प्रयोग किया; कुछ चित्र बिलकुल स्वाभाविक और सजीव लगते हैं।
अजंता की गुफा की दीवार पर बना रंगीन चित्र: बीच में बैठी एक आकृति और आसपास सेवक

तस्वीर: अजंता की गुफा 2 का एक भित्ति चित्र, लगभग पाँचवीं सदी ई.; इसे बुद्ध के रूप में जन्म लेने से पहले तुषित स्वर्ग में बैठे बोधिसत्त का दृश्य माना जाता है।

SpeakingArch, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

वीडियो

Ajanta | Monuments of IndiaPlay
Prasar Bharati Archives: दूरदर्शन का वृत्तचित्र, जो किताब से आगे जाकर अजंता की गुफाएँ और चित्र दिखाता है।Watch on YouTube

किताब के अपने प्रश्न

6साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?

लघु निबंध, लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • बौद्ध साहित्य साँची की बहुत-सी मूर्तियों की कुंजी है, पर हर मूर्ति उससे नहीं खुलती; कुछ के लिए लोक परंपराएँ और दूसरे साहित्य भी जानने पड़ते हैं।
  • जातक कथा: उत्तरी तोरणद्वार का एक दृश्य (चित्र 4.13) पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं, जिसमें दानी राजकुमार सब कुछ एक ब्राह्मण को देकर पत्नी और बच्चों के साथ जंगल चला गया (पृष्ठ 99–100)।
  • चरित लेखन और प्रतीक: बुद्ध के चरित के अनुसार उन्हें वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान मिला। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को प्रतीकों से दिखाया: रिक्त स्थान (ध्यान), स्तूप (महापरिनिब्बान), चक्र (सारनाथ का पहला उपदेश), और पेड़ (उनके जीवन की एक घटना) (पृष्ठ 100)।
  • स्तूप का अर्थ: महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) के अनुसार बुद्ध ने कहा कि तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप बनाया जाए और वहाँ माला चढ़ाने, सिर नवाने वाले को सुख मिलेगा; इससे स्तूप की पूजा के दृश्य समझ आते हैं (पृष्ठ 96)।
  • शालभंजिका: तोरणद्वार पर पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नहीं दिखता था। साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से पता चला कि यह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका है, और लोक परंपरा में माना जाता था कि इसके छूने से वृक्षों में फूल और फल आते थे (पृष्ठ 101)।
  • जानवर, माया या गजलक्ष्मी, सर्प: जानवर शायद लोगों को आकर्षित करने के लिए और मनुष्य के गुणों के प्रतीक के रूप में उकेरे गए; कमल और हाथियों के बीच की महिला को कुछ इतिहासकार माया, दूसरे गजलक्ष्मी मानते हैं, और उपासक शायद दोनों से जोड़ते थे; सर्प उन लोक परंपराओं से आए लगते हैं, जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था (पृष्ठ 101–103)।
  • साहित्य न जानने का नतीजा: जेम्स फर्गुसन बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे (तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था), इसलिए उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया (पृष्ठ 102–103)।
  • निष्कर्ष: बौद्ध साहित्य बहुत हद तक मदद करता है, पर किताब के अनुसार ऐसी मूर्तिकला को "अक्षरश: नहीं समझा जा सकता"; इतिहासकार को मूर्तियाँ बनाने वालों की परंपराएँ, लोक विश्वास और दूसरे साहित्य भी जानने पड़ते हैं।

7चित्र 4.32 और 4.33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नज़र आता है? वास्तुकला, पेड़–पौधे, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम–धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन से ग्रामीण और कौन से शहरी परिदृश्य हैं?

लघु निबंध, लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • दोनों चित्र किताब के पृष्ठ 112 पर हैं; अपनी किताब खोलकर इन बातों से मिलाइए। चित्र 4.32 ग्रामीण परिदृश्य लगता है और चित्र 4.33 शहरी।
  • चित्र 4.32, वास्तुकला: गुंबद जैसी छत वाली दो झोंपड़ियाँ, जिनमें लोग बैठे हैं; बड़ी इमारत कोई नहीं।
  • चित्र 4.32, पेड़-पौधे और जानवर: पेड़, नीचे पानी के पौधे, बीच में मवेशी जैसे जानवर और एक हाथी।
  • चित्र 4.32, लोग और काम: ऊपर खड़े स्त्री-पुरुषों की कतार, और कंधे पर डंडे उठाए खड़े पुरुष, जैसे गाँव के रोज़ के काम चल रहे हों।
  • चित्र 4.33, वास्तुकला: खंभों वाली दो मंज़िला इमारत; खंभों के ऊपर छोटी-छोटी जानवरों की आकृतियाँ; बीच में रेलिंग की पट्टी; नीचे मेहराब वाली जालीदार तीन खिड़कियाँ।
  • चित्र 4.33, लोग: दोनों मंज़िलों के खानों में बहुत-से लोग भीड़ में बैठे हैं; खेत, झोंपड़ी या खुले जानवर नहीं दिखते।
  • कारण सहित निष्कर्ष: झोंपड़ी, पेड़, पानी और जानवर गाँव की ओर इशारा करते हैं; दो मंज़िला, सजी हुई, खंभों और खिड़कियों वाली इमारत और भीड़ नगर की ओर। आप अपने कारण भी जोड़िए।

Checkpoint

  1. 1साँची के उत्तरी तोरणद्वार के जिस दृश्य (किताब का चित्र 4.13) में पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ दिखते हैं, उसे कला इतिहासकार क्या बताते हैं?

  2. 2प्रारंभिक बौद्ध मूर्तिकला में चक्र किस बात का प्रतीक था?

  3. 3अजंता के चित्रकारों ने चित्रों को त्रिविम रूप देने के लिए किस तकनीक का प्रयोग किया?

10नयी धार्मिक परंपराएँ

इस पड़ाव का सवाल

महायान, वैष्णव और शैव परंपराओं के साथ मूर्तियाँ, मंदिर और चट्टान काटकर बनी गुफाएँ कैसे विकसित हुईं?

पिछली बात से कड़ी बौद्ध मूर्तियों के बाद अब वे नयी परंपराएँ, जिनमें मूर्ति पूजा और भक्ति बढ़ी।

  1. 10.1महायान बौद्ध मत का विकास
  2. 10.2पौराणिक हिंदू धर्म का उदय
  3. 10.3मंदिरों का बनाया जाना

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 8

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

यह आपको स्वयं पता करना है। ऐसे शुरू कीजिए:

  • अपने आसपास के कुम्हार, धातु का काम करने वाले कारीगर या किसी संग्रहालय से पूछिए: मूर्ति किस चीज़ की है;
  • वह कैसे बनती है (गढ़कर, साँचे में ढालकर, पकाकर);
  • वह कितने समय टिकती है।

फिर सोचिए कि पत्थर की मूर्तियाँ ज़्यादा क्यों बची हैं: किताब के अनुसार पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक सुरक्षित बचती हैं।

10.1महायान बौद्ध मत का विकासपृष्ठ 103–104

किताब के भाग 10.1 के अनुसार "ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।" (पृष्ठ 103)। कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) में महायान बौद्ध मत का विकास "लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे" वाली पंक्ति में रखा गया है।

प्रारंभिक बौद्ध मत से महायान तक (पृष्ठ 103–104)

लाल पत्थर में बैठे हुए बुद्ध की मूर्ति, सिर के पीछे गोल प्रभामंडल

तस्वीर: बैठे हुए बुद्ध की मूर्ति, मथुरा, कुषाण काल, लगभग 120 ई.; सिर के पीछे गोल प्रभामंडल; क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, अमेरिका।

Cleveland Museum of Art, CC0. Image: Wikimedia Commons.

10.2पौराणिक हिंदू धर्म का उदयपृष्ठ 104–105

पौराणिक हिंदू धर्म का उदय (पृष्ठ 104)

  • मुक्तिदाता जैसे विश्वास अलग ढंग से उन परंपराओं में भी विकसित हो रहे थे, जिन्हें आज हिंदू धर्म कहा जाता है: वैष्णव (वह हिंदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है) और शैव (वह संकल्पना जिसमें शिव परमेश्वर हैं)।
  • इन परंपराओं में एक विशेष देवता की पूजा को ख़ास महत्त्व दिया जाता था, और भक्त और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना जाता था। इसे भक्ति कहते हैं।
  • वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना है। माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव से जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आती, तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते।
  • शायद अलग-अलग अवतार देश के अलग-अलग हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एक एकीकृत धार्मिक परंपरा बनाने का महत्वपूर्ण तरीका था।

देवताओं की मूर्तियाँ और पुराण (पृष्ठ 104–105)

  • कई अवतारों और दूसरे देवताओं की मूर्तियाँ बनीं। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था, पर कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया।
  • देवताओं की खूबियाँ और प्रतीक उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दिखाए जाते थे।
  • इन मूर्तियों का अर्थ समझने के लिए इतिहासकारों को इनकी कहानियाँ जाननी पड़ती हैं। कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में मिलती हैं।
  • पुराण सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में लिखे गए और ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, ताकि कोई भी सुन सके। महिलाएँ और शूद्र, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराण सुन सकते थे।
  • पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से बनीं: पुजारी, व्यापारी और आम स्त्री-पुरुष जगह-जगह आते-जाते अपने विश्वासों का आदान-प्रदान करते थे। जैसे, वासुदेव-कृष्ण मथुरा इलाके के महत्वपूर्ण देवता थे, और कई शताब्दियों में उनकी पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी फैल गई।
चट्टान में उकेरी विशाल मूर्ति: वराह रूप में विष्णु, बाँह पर पृथ्वी देवी को उठाए

तस्वीर: विष्णु का वराह अवतार, पृथ्वी देवी को उठाए हुए; रावणफड़ी गुफा मंदिर, एहोल (कर्नाटक), छठी सदी।

Ms Sarah Welch, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: चित्र 4.23, पृष्ठ 104

किताब का चित्र 4.23 एहोल (कर्नाटक) की लगभग छठी सदी की मूर्ति है: विष्णु का वराह अवतार, पृथ्वी देवी को बचाते हुए।

मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फ़र्क से क्या बात समझ में आती है?

जवाब देखिए

वराह अवतार की आकृति बहुत बड़ी है और उनकी बाँह पर पृथ्वी देवी छोटी दिखती हैं।

  • बड़ा आकार शायद देवता की शक्ति और महत्त्व दिखाता है: वे पृथ्वी को बचाने वाले हैं, इसलिए सबसे बड़े बनाए गए।
  • अपनी किताब में चित्र देखकर नीचे की आकृतियों का आकार भी मिलाइए।
चट्टान में उकेरा दृश्य: शेर पर सवार कई भुजाओं वाली दुर्गा और सामने भैंसे के सिर वाला असुर

तस्वीर: महिषासुरमर्दिनी मंडप, महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी) का पैनल, पल्लव काल।

SpeakingArch, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: चित्र 4.24, पृष्ठ 105

किताब का चित्र 4.24 महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की छठी सदी की मूर्ति है: कई भुजाओं वाली दुर्गा शेर पर सवार हैं, और आसपास सहायकों की भीड़ है।

कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए।

जवाब देखिए

गति देखने के लिए इन बातों पर ध्यान दीजिए:

  • शरीरों का झुकाव;
  • उठी हुई भुजाएँ और उनके आयुध;
  • शेर की मुद्रा और आकृतियों की भीड़।

कहानी की जानकारी आपको स्वयं इकट्ठी करनी है: पुराणों पर आधारित किसी पुस्तक से या शिक्षक से पता कीजिए कि यह दृश्य किस कथा का है, क्योंकि किताब के अनुसार ऐसी मूर्तियाँ पुराणों की कहानियों से समझी जाती हैं।

10.3मंदिरों का बनाया जानापृष्ठ 105–107

गर्भगृह से शिखर तक: मंदिर कैसे बढ़ा (पृष्ठ 105–106)

  1. 1पहले मंदिर कब बने?

    जिस समय साँची जैसी जगहों पर स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बने (पृष्ठ 105)। कालरेखा 1 सबसे पुराने मंदिरों को "लगभग तीसरी सदी ईसवी" में रखती है (पृष्ठ 110)।

  2. 2गर्भगृह

    शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिसे गर्भगृह कहा जाता था। इसमें एक दरवाज़ा होता था, जिससे उपासक मूर्ति की पूजा के लिए भीतर जा सकता था।

  3. 3शिखर

    धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा, जिसे शिखर कहा जाता था। मंदिर की दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उकेरे जाते थे।

  4. 4बाद के मंदिर

    बाद के युगों में मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए, और जल आपूर्ति का इंतज़ाम भी होने लगा।

1897 का श्वेत-श्याम छायाचित्र: ऊँचे चबूतरे पर पत्थर का छोटा मंदिर, ऊपर टूटा शिखर

तस्वीर: देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का दशावतार मंदिर, 1897 का एक छायाचित्र: ऊपर टूटा हुआ शिखर, दीवार पर उकेरी मूर्तियाँ।

Leiden University Library (KITLV). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

पत्थर की पट्टी पर उकेरी मूर्ति: शेषनाग पर लेटे विष्णु और आसपास आकृतियाँ

तस्वीर: शेषनाग पर आराम करते विष्णु की मूर्ति, देवगढ़ (उत्तर प्रदेश)।

Bob King, CC BY 2.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: चित्र 4.25, पृष्ठ 106

किताब का चित्र 4.25 देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का पाँचवीं सदी का मंदिर है।

गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।

जवाब देखिए

किताब के चित्र 4.25 में सीढ़ीदार चबूतरे पर एक छोटा मंदिर है।

  • सामने का दरवाज़ा गर्भगृह का प्रवेशद्वार है, जिससे उपासक मूर्ति तक जाता था;
  • उसके ऊपर का टूटा हुआ ऊँचा भाग शिखर के अवशेष हैं।

चट्टान काटकर बने मंदिर (पृष्ठ 106–107)

  • शुरू के कुछ मंदिर पहाड़ियों को काटकर, खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। यह परंपरा बहुत पुरानी थी: "सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।"
  • किताब का चित्र 4.27 बराबर (बिहार) की गुफाएँ दिखाता है, लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व की।
  • चट्टान काटकर बनाने की यह परंपरा अलग-अलग चरणों में बढ़ती रही। इसका सबसे विकसित रूप आठवीं सदी का कैलाशनाथ (शिव का एक नाम) मंदिर, एलोरा (महाराष्ट्र) है, जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया।
  • एक ताम्रपत्र अभिलेख में एलोरा का प्रमुख तक्षक काम पूरा होने पर अपना आश्चर्य कहता है: "हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!"
चट्टान में काटा गया गुफा का प्रवेशद्वार, ऊपर मेहराब जैसी नक्काशी

तस्वीर: बराबर (बिहार) की लोमस ऋषि गुफा का प्रवेशद्वार।

Photo Dharma from Penang, Malaysia, CC BY 2.0. Image: Wikimedia Commons.

चट्टान से काटकर बना विशाल मंदिर, आँगन के बीच ऊँचा शिखर

तस्वीर: एलोरा (महाराष्ट्र) का कैलाशनाथ मंदिर, जो एक चट्टान को काटकर बनाया गया है।

Shishirdasika, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के अपने प्रश्न

8वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।

लघु निबंध, लगभग 500 शब्दों में

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) की एक पंक्ति में "लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे" महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ रखी गई हैं, और अगली पंक्ति में "लगभग तीसरी सदी ईसवी" में सबसे पुराने मंदिर। इन परंपराओं ने मूर्ति और मंदिर दोनों को नया रूप दिया।
  • भक्ति और अवतार: वैष्णव परंपरा में विष्णु और शैव परंपरा में शिव सबसे बड़े देवता माने गए; एक विशेष देवता की पूजा, और भक्त और ईश्वर के बीच प्रेम और समर्पण का रिश्ता, यानी भक्ति, इनका केंद्र था। वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना है; स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा बनाने का तरीका था (पृष्ठ 104)।
  • मूर्तिकला: एहोल (कर्नाटक) का वराह अवतार, जो पृथ्वी देवी को बचा रहे हैं (लगभग छठी सदी); देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) में शेषनाग पर आराम करते विष्णु (पाँचवीं सदी); शिव का प्रतीक लिंग, कई बार मनुष्य रूप भी; महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की मूर्ति (छठी सदी) (पृष्ठ 104–106)।
  • पहचान के चिह्न और कहानियाँ: देवताओं की खूबियाँ शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से दिखाई जाती थीं; इनका अर्थ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों की कहानियों से समझ आता है, जो ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे और जिन्हें महिलाएँ और शूद्र भी सुन सकते थे (पृष्ठ 104–105)।
  • मंदिर: जब साँची जैसे स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय पहले मंदिर बने: एक चौकोर कमरा, गर्भगृह, जिसमें एक दरवाज़ा होता था; धीरे-धीरे उसके ऊपर ऊँचा शिखर बनने लगा (देवगढ़ का मंदिर, पाँचवीं सदी); बाद में विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण और जल आपूर्ति का इंतज़ाम जुड़ा (पृष्ठ 105–106)।
  • चट्टान काटकर बने मंदिर: कुछ शुरू के मंदिर पहाड़ी काटकर कृत्रिम गुफाओं के रूप में बने। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनीं; यह परंपरा आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा में सबसे विकसित हुई, जहाँ पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया (पृष्ठ 106–107)।
  • पढ़ने की कठिनाई: उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों को कई सिरों और हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगीं; महाबलीपुरम् की विशाल चट्टान पर गंगा का अवतरण है या अर्जुन की तपस्या, इस पर विद्वानों में मतभेद हैं (पृष्ठ 107–109)।
  • निष्कर्ष: भक्ति की इन परंपराओं से देवताओं की पहचान वाली मूर्तियाँ और गर्भगृह से शिखर और विशाल मंदिर तक की वास्तुकला विकसित हुई, जिन्हें पुराणों की कहानियों के साथ पढ़ना पड़ता है।

Checkpoint

  1. 1महायान परंपरा में बोधिसत्त कौन माने गए?

  2. 2पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे। इससे कौन उन्हें सुन सकते थे, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी?

  3. 3शुरू के मंदिरों में मूर्ति रखने वाले चौकोर कमरे को क्या कहा जाता था?

11क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?

इस पड़ाव का सवाल

अनजानी मूर्तियों को समझने में उन्नीसवीं सदी के विद्वान और आज के इतिहासकार कहाँ अटकते हैं?

पिछली बात से कड़ी कई सिरों और हाथों वाली मूर्तियाँ और चट्टानों पर उकेरी कथाएँ हर देखने वाले को आसानी से नहीं खुलतीं।

  1. 11.1अनजाने को समझने की कोशिश
  2. 11.2यदि लिखित और दृश्य का मेल न हो…

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 11, 12

हमारे अतीत की दृश्य परंपराएँ ईंट और पत्थर के स्थापत्य, मूर्ति कला और चित्रकला के रूप में सामने आई हैं। समय के साथ बहुत कुछ नष्ट हो गया, पर जो बचा है वह इन्हें बनाने वाले कलाकारों, मूर्तिकारों, राजगीरों और वास्तुकारों की दृष्टि से परिचित कराता है। किताब पूछती है: क्या हम उनका संदेश बिना दुविधा के समझ सकते हैं? (पृष्ठ 107)

11.1अनजाने को समझने की कोशिशपृष्ठ 107–108

अनजाने को समझने की कोशिश (पृष्ठ 107–108)

  1. 1उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वान किस बात पर उलझे?

    देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखकर वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व नहीं समझ पाए। कई सिरों, कई हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूप मिलाकर बनी मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं (पृष्ठ 107–108)।

  2. 2उन्होंने समझने की कोशिश कैसे की?

    उन्होंने इनकी तुलना उस परंपरा से की जिससे वे परिचित थे: प्राचीन यूनान की कला। वे प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनानी कला से निम्न मानते थे (पृष्ठ 108)।

  3. 3किन मूर्तियों से वे उत्साहित हुए?

    बुद्ध और बोधिसत्त की उन मूर्तियों से, जो यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं और ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिली थीं। इन इलाकों में ईसा से दो सौ साल पहले भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे। ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं, इसलिए उन विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना (पृष्ठ 108)।

  4. 4यह तरीका क्या था?

    परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना बनाना, जो हम सब अक्सर करते हैं (पृष्ठ 108)।

स्लेटी पत्थर की खड़ी मूर्ति: लहराते बाल, भारी सिलवटों वाला लंबा वस्त्र

उनके कपड़ों और केश विन्यास पर ध्यान दीजिए: गांधार क्षेत्र की खड़े हुए बोधिसत्त मैत्रेय की मूर्ति, लगभग तीसरी सदी, स्लेटी पत्थर (शिस्ट); मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, न्यूयॉर्क।

Metropolitan Museum of Art, New York. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

11.2यदि लिखित और दृश्य का मेल न हो…पृष्ठ 108–109

मूर्ति का महत्त्व और संदर्भ समझने के लिए कला इतिहासकार अक्सर लिखित ग्रंथों से जानकारी लेते हैं। यह यूनानी मूर्तियों से तुलना करने से बेहतर तरीका है, पर बहुत आसान नहीं (पृष्ठ 108)।

महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान: एक दृश्य, दो पढ़ाइयाँ (पृष्ठ 108–109)

इस चट्टान पर किसी कथा का सजीव चित्रण है, पर कौन-सी कथा? कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में बहुत खोजबीन की है, फिर भी उनमें काफ़ी मतभेद हैं।

पहली पढ़ाई: गंगा का अवतरण

  • कुछ विद्वान मानते हैं कि इसमें गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण है।
  • चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है।
  • यह कथा महाकाव्यों और पुराणों में है।

दूसरी पढ़ाई: अर्जुन की तपस्या

  • दूसरे विद्वान मानते हैं कि यहाँ महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या दिखाई गई है।
  • वे मूर्तियों के बीच एक साधु के केंद्र में होने को महत्त्व देते हैं।
विशाल चट्टान पर उकेरी अनगिनत आकृतियाँ, बीच से नीचे जाती एक दरार

तस्वीर: महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में एक चट्टान पर उकेरा गया शैल शिल्प का समूह।

Bernard Gagnon, CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.

जो कभी दर्ज़ नहीं हुआ (पृष्ठ 109)

  • बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार, जैसे रोज़ के और ख़ास अवसरों के रीति-रिवाज, इमारतों, मूर्तियों या चित्रों के रूप में स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए।
  • कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत न लगी हो; किताब कहती है, "संभव है कि धार्मिक गतिविधियों और दार्शनिक मान्यताओं की उनकी सक्रिय परंपरा रही हो।"
  • किताब के अनुसार इस अध्याय के शानदार उदाहरण "एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।"

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

यह आपके अपने अनुभव से लिखना है। वर्णन में बताइए:

  • अनुष्ठान कहाँ और कब हुआ, कौन लोग थे;
  • क्या बोला, गाया या चढ़ाया गया;
  • वह कहीं दर्ज़ होता है या नहीं: किसी ग्रंथ, चित्र, मूर्ति, इमारत, फ़ोटो या वीडियो में, या सिर्फ़ लोगों की याद और परंपरा में।

किताब याद दिलाती है कि बहुत-से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रकला के द्वारा स्थायी दृश्य माध्यमों के रूप में दर्ज़ नहीं किए गए, इनमें रोज़ के और ख़ास अवसरों के रीति-रिवाज भी हैं; फिर भी संभव है कि उनकी सक्रिय परंपरा रही हो (पृष्ठ 109)।

परियोजना कार्य (कोई एक): काम करने का तरीका

इन दोनों का उत्तर आपकी अपनी खोज से बनेगा; नीचे सिर्फ़ तरीका है, नतीजे आपके होंगे।

किताब के अपने प्रश्न

11इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परंपराओं में से क्या कोई परंपरा आपके अड़ोस–पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती–जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।

परियोजना कार्य

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • परंपरा चुनिए: अध्याय की परंपराओं (जैन, बौद्ध, वैष्णव, शैव, देवी पूजा) में से जो आपके आसपास मानी जाती है, उसका एक पूजा स्थल चुनिए और वहाँ के लोगों से विनम्रता से अनुमति लेकर बात कीजिए।
  • ग्रंथ: पूछिए कि कौन-से ग्रंथ पढ़े जाते हैं, वे किस भाषा में हैं, छपी किताब हैं या हाथ की लिखी पांडुलिपि, और कैसे आगे बढ़ते हैं: मौखिक पाठ, प्रवचन, कथा, या पुस्तकालय में संरक्षण। किताब से मिलाइए: बौद्ध शिक्षाएँ पहले मौखिक रहीं (पृष्ठ 86), और जैन पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में रखी गईं (पृष्ठ 89)।
  • मूर्तियाँ: देखिए कि मूर्ति है या प्रतीक, और उसकी पहचान शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से कैसे होती है (पृष्ठ 104); अध्याय के चित्रों (तीर्थंकर, बुद्ध, बोधिसत्त, वराह, दुर्गा) से मिलाइए कि वे मिलती-जुलती हैं या अलग।
  • इमारत: इमारत का सरल रेखाचित्र बनाइए और उसकी तुलना साँची के स्तूप (अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका, तोरणद्वार, दक्षिणावर्त परिक्रमा) और शुरू के मंदिरों (चौकोर गर्भगृह, एक दरवाज़ा, शिखर) से कीजिए (पृष्ठ 96–97, 105)।
  • रिपोर्ट: जो देखा और सुना, उसकी तुलना, और आपका अपना निष्कर्ष लिखिए; जिनसे बात की, उनका ज़िक्र उनकी अनुमति से ही कीजिए।

12इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परंपराओं से जुड़े अलग–अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तसवीरें इकट्ठी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक तसवीर दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोर्ट लिखिए।

परियोजना कार्य

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • तसवीरें चुनिए: अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच तसवीरें लीजिए, जैसे मथुरा का तीर्थंकर, साँची का कोई दृश्य, अजंता का कोई चित्र, एहोल का वराह (लगभग छठी सदी) और महाबलीपुरम् की दुर्गा। हर तसवीर का असली शीर्षक, जगह और काल अलग पन्ने पर लिख लीजिए।
  • दिखाइए और पूछिए: शीर्षक हटाकर हर तसवीर दो लोगों को दिखाइए और एक जैसे प्रश्न पूछिए: इसमें क्या दिखता है, यह कौन हो सकता है, कहाँ और कब का लगता है? उनके शब्द जैसे के तैसे लिखिए।
  • तुलना कीजिए: हर तसवीर के लिए दोनों लोगों के वर्णन और असली जानकारी साथ-साथ रखिए।
  • रिपोर्ट: लिखिए कि लोग किन चीज़ों से पहचान पाए और कहाँ चूके। अध्याय से जोड़िए: इतिहासकार भी परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित को समझते हैं (पृष्ठ 108), और बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ जेम्स फर्गुसन ने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया था (पृष्ठ 103)।

Checkpoint

  1. 1उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों ने तक्षशिला और पेशावर जैसे नगरों में मिली बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियों को भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना क्यों माना?

  2. 2महाबलीपुरम् की विशाल चट्टान पर उकेरी कथा के बारे में कला इतिहासकार क्या कहते हैं?

  3. 3किताब के अनुसार किसी मूर्ति का महत्त्व और संदर्भ समझने का यूनानी मूर्तियों से तुलना करने से बेहतर तरीका क्या है?

सार और काल-रेखा

इस पड़ाव का सवाल

ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के विचार, विश्वास और इमारतें एक नज़र में कैसे दिखते हैं?

पिछली बात से कड़ी अब पूरा अध्याय, किताब की दोनों काल रेखाएँ और बौद्ध धर्म के प्रसार का नक्शा।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 10

पूरा अध्याय एक नज़र में

  • ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि विश्व इतिहास का एक मोड़ थी: यज्ञ की परंपरा के साथ उपनिषदों ने जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म पर प्रश्न पूछे, और नियतिवादी और भौतिकवादी जैसे शिक्षकों ने अपने उत्तर दिए (पृष्ठ 84–87)।
  • महावीर ने अहिंसा, कर्म से मुक्ति और पाँच व्रतों की शिक्षा दी; बुद्ध ने अनित्य और दुख भरी दुनिया में मध्यम मार्ग और निब्बान की बात की, और संघ में स्त्री-पुरुष बराबरी से आए (पृष्ठ 88–94)।
  • बुद्ध के अवशेषों पर स्तूप बने, जिन्हें राजाओं से लेकर शिल्पियों तक के दान से सजाया गया; अमरावती का स्तूप बिखर गया, साँची का अपनी जगह बचा रहा (पृष्ठ 95–99)।
  • मूर्तियाँ पत्थर में कथाएँ कहती हैं, पर उन्हें पढ़ने के लिए ग्रंथ और लोक परंपराएँ, दोनों जानने पड़ते हैं (पृष्ठ 99–103)।
  • महायान में बोधिसत्त और मूर्ति पूजा, और वैष्णव और शैव परंपराओं में भक्ति, अवतार, मूर्तियाँ और मंदिर विकसित हुए (पृष्ठ 103–107)।
  • अनजानी मूर्तियाँ पढ़ना कठिन है: जहाँ ग्रंथ और मूर्ति मेल नहीं खाते, वहाँ विद्वानों में मतभेद रहते हैं (पृष्ठ 107–109)।

कालरेखा 1: महत्वपूर्ण धार्मिक बदलाव (पृष्ठ 110)

बदलावों को पहले से बाद के क्रम में लगाइए, फिर जाँचिए। सही क्रम और तिथियाँ नीचे की तालिका में हैं।

▲ पहले

  1. 1प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म
  2. 2सबसे पुराने मंदिर
  3. 3प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ
  4. 4महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ
  5. 5उत्तर वैदिक परंपराएँ
  6. 6आरंभिक स्तूप

▼ बाद में

और जानिए कालरेखा 1 की पूरी तालिका
तिथिघटना / विकास
लगभग 1500-1000 ई. पू.प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ
लगभग 1000-500 ई. पू.उत्तर वैदिक परंपराएँ
लगभग छठी सदी ई. पू.प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म
लगभग तीसरी सदी ई. पू.आरंभिक स्तूप
लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगेमहायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ
लगभग तीसरी सदी ईसवीसबसे पुराने मंदिर

बौद्ध धर्म का प्रसार: किताब का प्रश्न 10 (पृष्ठ 113)

इस मानचित्र पर सिर्फ़ उन इलाकों के नाम हैं जिनका ज़िक्र किताब पृष्ठ 89 पर करती है: सैकड़ों वर्षों के दौरान बुद्ध के संदेश पूरे उपमहाद्वीप में, फिर मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।

उपमहाद्वीपमध्य एशियाचीनकोरियाजापानश्रीलंकाम्याँमारथाइलैंडइंडोनेशिया
  • ठोस रेखा = स्थल मार्ग (मध्य एशिया होते हुए)
  • बिंदुदार रेखा = जल मार्ग (श्रीलंका से समुद्र पार)

रेखाचित्र, पैमाना नहीं दिया गया है।

इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।

किताब के अपने प्रश्न

10विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइए।

मानचित्र कार्य

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • किताब जिन इलाकों का नाम लेती है, सिर्फ़ उन्हीं पर निशान लगाइए, और मार्ग भी वही दिखाइए जो किताब बताती है (पृष्ठ 89)। ऊपर के रेखाचित्र में रेखाओं का ठीक रास्ता अंदाज़ा भर है; किताब इतना ही बताती है कि संदेश मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।
  • उपमहाद्वीप: किताब के अनुसार बुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले। चाहें तो मानचित्र 1 (पृष्ठ 95) के कुछ स्थल, जैसे लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, साँची, छोटे बिंदुओं से दिखाइए।
  • स्थल मार्ग: उपमहाद्वीप से मध्य एशिया होते हुए एक ठोस रेखा खींचिए, और चीन, कोरिया और जापान पर निशान लगाइए, क्योंकि किताब कहती है कि संदेश "मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान" तक फैले। किताब के अनुसार फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए थे (पृष्ठ 86)।
  • जल मार्ग: श्रीलंका पर निशान लगाइए, और श्रीलंका से समुद्र पार करती बिंदुदार रेखा म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक खींचिए, क्योंकि किताब कहती है "श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक"।
  • संकेत सूची: मानचित्र के कोने में लिखिए: ठोस रेखा = स्थल मार्ग, बिंदुदार रेखा = जल मार्ग, छायांकित इलाका = बौद्ध धर्म का प्रसार।
  • चीन से कोरिया और जापान तक, और उपमहाद्वीप से श्रीलंका तक, रास्ता अपनी ओर से मत गढ़िए; एटलस में देखकर या शिक्षक से पूछकर ही जोड़िए।

आख़िरी जाँच

  1. 1किताब की कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) के अनुसार प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म और बौद्ध धर्म किस समय के हैं?

  2. 2किताब के पृष्ठ 89 के अनुसार बुद्ध के संदेश चीन, कोरिया और जापान तक किस रास्ते फैले?

  3. 3किताब की कालरेखा 2 (पृष्ठ 110) के अनुसार साँची को विश्व कला दाय स्थान कब घोषित किया गया?

  4. 4अमरावती और साँची के स्तूपों में से कौन-सा आज अपनी जगह बचा हुआ है?