अध्याय 1पृथ्वी पर स्थानों की स्थिति

पाठ्यपुस्तक से आगे16 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT, समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 6), अध्याय 1

कक्षा — 6 · विषय — सामाजिक विज्ञान (समाज का अध्ययन) · बाहर की बातें जाँचीं — 9 अक्टूबर 2026 (8 अक्टूबर 2026 तक का हाल)

यह पन्ना किसलिए — किताब जहाँ रुकती है, उसके आगे आज क्या सच है, यह कक्षा को बताने के लिए: भारत का मानक समय कौन रखता है और उस पर बने नए नियम किस हाल में हैं, भारत का फैलाव मिनटों तक, उपग्रह से जगह बताने वाली भारत की अपनी प्रणाली NavIC, और 1884 का वह सम्मेलन जिसका ज़िक्र किताब एक वाक्य में करती है। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर आज क्या है (स्रोत और तारीख़ के साथ), और फिर इसे कक्षा में कैसे उठाएँ।

हमारी सलाह है कि परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें और अंक ही लिखें। यहाँ की बातें सिर्फ़ समझाने के लिए हैं, और 8 अक्टूबर 2026 तक की हैं। नियम और उपग्रहों का हाल बदलता रहता है, इसलिए पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। बाहर के सारे स्रोत अंग्रेज़ी में हैं; उनकी बात यहाँ हिंदी में अपने शब्दों में लिखी है, इसलिए उस पर उद्धरण-चिह्न नहीं हैं। जो बात किसी स्रोत की नहीं, हमारी अपनी समझ या हिसाब है, उसके आगे हमारी ओर से लिखा है।

भारतीय मानक समय — कौन रखता है, कौन-सा नियम

किताब कहाँ रुकती है। छपी किताब (पृष्ठ 20) समझाती है कि एक देश के भीतर अनेक स्थानीय समय चलाना ठीक नहीं होगा: “इसी कारण अधिकतर देश उनके मध्य से गुजरने वाले याम्योत्तर पर आधारित एक मानक समय को अपनाते हैं।” फिर वह बताती है कि भारतीय मानक समय ग्रिनिच के स्थानीय समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। यह समय कौन बनाता और सँभालता है, और इसके लिए कोई क़ानूनी नियम है या नहीं, यह किताब नहीं बताती।

आज का हाल, एक नज़र में

  • भारत सरकार ने विधिक माप विज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 [Legal Metrology (Indian Standard Time) Rules, 2026] जारी (अधिसूचित) किए हैं। उपभोक्ता मामले विभाग ने इन्हें 27 अगस्त 2026 को अधिसूचित किया और 29 अगस्त 2026 को सरकारी राजपत्र में छापा। ये नियम भारतीय मानक समय को बनाने, सँभालने, फैलाने और इस्तेमाल करने का ढाँचा देते हैं। स्रोत: PIB, 2 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • ये नियम राजपत्र में छपने की तारीख़ से 180 दिन बाद लागू होंगे। इसलिए 8 अक्टूबर 2026 को ये लागू नहीं थे। (हमारी ओर से: 29 अगस्त 2026 से 180 दिन फ़रवरी 2027 के आख़िरी हफ़्ते में पूरे होते हैं; लागू होने की ठीक तारीख़ स्रोत में नहीं लिखी है।) स्रोत: PIB, 2 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • भारतीय मानक समय CSIR-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (CSIR-NPL) बनाती और रखती है, परमाणु घड़ियों के एक समूह से। यह समय लगातार अंतरराष्ट्रीय संदर्भ समय UTC (समन्वित सार्वभौमिक समय) से कुछ नैनोसेकंड के भीतर मिलाकर रखा जाता है; UTC को अंतरराष्ट्रीय माप-तौल ब्यूरो (BIPM) रखता है। स्रोत: PIB, 2 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • देश के अलग-अलग हिस्सों तक सही समय पहुँचाने के लिए अहमदाबाद, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, फ़रीदाबाद और गुवाहाटी की पाँच क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं (RRSL) में सहायक समय-पैमाने बनाए गए हैं। स्रोत: PIB, 2 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • भारतीय मानक समय नेटवर्क के रास्ते (NTP, PTP जैसी तकनीकों से) और उपग्रह से भी भेजा जा सकता है; उपग्रहों में ISRO का NavIC शामिल है। स्रोत: PIB, 2 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में

सवाल रखिए: किताब कहती है कि भारत का समय ग्रिनिच से 5 घंटे 30 मिनट आगे है, और 15° का फ़र्क़ एक घंटे के बराबर है। तो भारत का मानक समय लगभग किस देशांतर के स्थानीय समय पर टिका होगा? क्या वह देशांतर भारत के बीच में पड़ता है?

उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): 5½ × 15° = 82½° पू. यह किताब के बताए भारत के फैलाव (लगभग 68° पू. से 97° पू.) के बीच के हिस्से में पड़ता है, जैसा किताब का “मध्य से गुजरने वाले याम्योत्तर” वाला नियम कहता है। यह हमारा हिसाब है; इसे किसी सरकारी पन्ने की पंक्ति की तरह मत बताइए। इसी पन्ने पर किताब पोरबंदर और तिनसुकिया के बीच 30° का संकेत देती है: 30° यानी 2 घंटे का स्थानीय-समय का अंतर, फिर भी दोनों शहरों की घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं।

दूसरा सवाल: नियम छप गए पर अभी लागू नहीं हुए, तो क्या आज हमारी घड़ियाँ ग़लत समय दिखा रही हैं? उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): नहीं। भारतीय मानक समय तो पहले से चल रहा है, किताब भी यही बताती है। नए नियम उसे बनाने, सँभालने और इस्तेमाल करने का क़ानूनी ढाँचा देते हैं, और वह ढाँचा 180 दिन बाद लागू होगा। बच्चों के लिए सीख: किसी नियम का जारी होना और लागू होना अलग बातें हैं।

भारत का फैलाव — “लगभग” से मिनटों तक

किताब कहाँ रुकती है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग के छापे मानचित्र (चित्र 1.6) के नीचे छपी किताब (पृष्ठ 18) कहती है: “भारत का अक्षांश लगभग 8° उ. से 37° उ. तक फैला हुआ है और देशांतर लगभग 68° पू. से 97° पू. तक फैला हुआ है”। किताब पूरे अंशों में बात करती है; अंश के भीतर का माप नहीं देती।

आज का माप, एक नज़र में

  • भारत की मुख्य भूमि अक्षांश 8°4′ उ. से 37°6′ उ. तक और देशांतर 68°7′ पू. से 97°25′ पू. तक फैली है।
  • अंतिम अक्षांशों के बीच उत्तर से दक्षिण की दूरी लगभग 3,214 किलोमीटर है, और अंतिम देशांतरों के बीच पूर्व से पश्चिम की दूरी लगभग 2,933 किलोमीटर।
  • भारत की मुख्य भूमि पूरी की पूरी उत्तरी गोलार्ध में है।
  • उसी पन्ने पर भारतीय मानक समय GMT + 05:30 लिखा है, यानी किताब वाला ही 5 घंटे 30 मिनट।

स्रोत (ऊपर की चारों बातें): भारतीय उच्चायोग, कोलंबो (विदेश मंत्रालय का मिशन), भारत का परिचय-पन्ना; पन्ने के नीचे की तारीख़ 8 अक्टूबर 2026 है, पर उसका पाठ कुछ साल पुराना है (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में

सवाल रखिए: 8°4′ में जो 4′ लिखा है, क्या वह घड़ी के 4 मिनट हैं?

उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): नहीं। यहाँ ′ का मतलब अंश का एक छोटा हिस्सा है: एक अंश के 60 हिस्से, और हर हिस्से को मिनट कहते हैं। इसलिए 8°4′ का मतलब है 8 अंश से थोड़ा-सा आगे। शायद इसी वजह से किताब 8° लिखती है और साथ में “लगभग” जोड़ती है।

दूसरा सवाल: स्रोत मुख्य भूमि (mainland) की बात क्यों करता है? चित्र 1.6 में अंडमान-निकोबार के द्वीप देखिए। उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): चित्र में ये द्वीप 10° उ. की रेखा से भी नीचे तक दिखते हैं। द्वीप जोड़ें तो फैलाव के अंक बदल सकते हैं, इसलिए माप बताते समय साफ़ करना पड़ता है कि बात मुख्य भूमि की है या पूरे देश की।

तीसरा सवाल, गणित वाले बच्चों के लिए: 97°25′ और 68°7′ में कितना अंतर है, और समय में यह कितना होगा? उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): 29°18′, यानी लगभग 29.3°। एक अंश = 4 मिनट (किताब के 15° = 1 घंटा से), तो लगभग 117 मिनट, यानी करीब 2 घंटे का स्थानीय-समय का अंतर।

निर्देशांक और उपग्रह — NavIC

किताब कहाँ रुकती है। छपी किताब (पृष्ठ 15) कहती है: “अक्षांश और देशांतर मिलकर एक स्थान के दो निर्देशांक होते हैं।” उपग्रह किसी जगह के ये निर्देशांक कैसे बताते हैं, और इसके लिए भारत की अपनी प्रणाली कौन-सी है, यह किताब नहीं बताती।

आज का हाल, एक नज़र में

  • NavIC (IRNSS) भारत की अपनी क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है। ISRO के अनुसार इसे भारत में और भारत की सीमा से 1500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में स्थान की सटीक जानकारी देने के लिए बनाया गया है; यही इसका मुख्य सेवा क्षेत्र है।
  • इसकी दो सेवाएँ बताई गई हैं: सबके लिए मानक स्थिति सेवा (SPS), और केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए गुप्त कोड वाली प्रतिबंधित सेवा (RS)। ISRO के इस पन्ने के अनुसार मुख्य सेवा क्षेत्र में स्थान की सटीकता 20 मीटर से बेहतर होने की उम्मीद है।
  • ISRO के गिनाए उपयोगों में मोबाइल फ़ोन से जुड़ाव, सटीक समय, नक्शे और भू-मापन के आँकड़े जुटाना, और ड्राइवरों के लिए दिखाकर और बोलकर रास्ता बताना भी है।

स्रोत (ऊपर की तीनों बातें): ISRO, IRNSS Programme का पन्ना; पन्ने पर तारीख़ नहीं, 9 अक्टूबर 2026 को पढ़ा (अंग्रेज़ी में)। यह पन्ना प्रणाली की बनावट बताता है; बाद का हाल नीचे की बातों में है।

  • उपग्रह भी पुराने होते हैं। ISRO के अनुसार मार्च 2016 में छोड़े गए उपग्रह IRNSS-1F ने 10 मार्च 2026 को अपनी तय 10 साल की आयु पूरी की, और 13 मार्च 2026 को उसमें लगी परमाणु घड़ी ने काम करना बंद कर दिया। उपग्रह कक्षा में रहकर एक-तरफ़ा संदेश भेजने का काम करता रहेगा। स्रोत: ISRO, 13 मार्च 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • 25 मार्च 2026 का हाल: संसद में दिए गए एक उत्तर के अनुसार तब तक 11 NavIC उपग्रह छोड़े गए थे, जिनमें से 8 काम कर रहे थे। इन 8 में से 3 जगह बताने वाले नेविगेशन संकेत भेज रहे थे, और 5 एक-तरफ़ा संदेश भेजने लायक थे। स्रोत: PIB, अंतरिक्ष विभाग, 25 मार्च 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • CSIR-NPL, NavIC के लिए ISRO को भारतीय मानक समय से जोड़ती है, ताकि उपग्रह के रास्ते भी भारतीय मानक समय पहुँच सके। स्रोत: PIB, 2 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में

सवाल रखिए: फ़ोन के नक्शे पर आपकी जगह एक बिंदु बनकर दिखती है। फ़ोन उस बिंदु को किन दो संख्याओं से पहचानता है?

उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): अक्षांश और देशांतर, यानी वही दो निर्देशांक जो किताब सिखाती है। फ़ोन की नक्शा-ऐप में अपनी जगह पर उँगली रखकर ये दोनों संख्याएँ बच्चों को दिखाइए, और किताब के दिल्ली वाले उदाहरण से मिलाइए।

दूसरा सवाल: उपग्रह में परमाणु घड़ी क्यों रखी गई होगी? उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): यहाँ किताब का उज्जयिनी वाला बॉक्स काम आता है, जो कहता है कि देशांतर नापने के लिए सही-सही समय रखना ज़रूरी है। ISRO की ख़बर भी यही इशारा करती है: घड़ी रुकने के बाद IRNSS-1F अब संदेश भेजने का काम करेगा। 25 मार्च 2026 को 8 NavIC उपग्रह काम कर रहे थे (ऊपर देखिए); यह गिनती बदलती रहती है, इसलिए बच्चे पूछें तो ISRO की वेबसाइट पर ताज़ा जानकारी साथ बैठकर देखिए।

ग्रिनिच और 1884 — “कुछ देशों ने तय किया” के पीछे

किताब कहाँ रुकती है। छपी किताब (पृष्ठ 15) बताती है कि प्रमुख याम्योत्तर को ग्रिनिच याम्योत्तर क्यों कहते हैं: “वर्ष 1884 में कुछ देशों ने तय किया कि इंग्लैंड में लंदन के एक क्षेत्र ग्रिनिच से गुजरने वाली याम्योत्तर, प्रमुख याम्योत्तर के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक मानी जाएगी।” कौन-से देश, कहाँ इकट्ठे हुए, और उन्होंने ठीक-ठीक क्या तय किया, यह किताब नहीं बताती।

1884 का रिकॉर्ड, एक नज़र में

  • यह बैठक अंतरराष्ट्रीय याम्योत्तर सम्मेलन (International Meridian Conference) थी, जो 1 अक्टूबर 1884 से अमेरिका के वॉशिंगटन शहर में हुई।
  • पहला प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ: उस समय चल रही अनेक शुरुआती याम्योत्तरों की जगह सभी देशों के लिए एक ही प्रमुख याम्योत्तर अपनाना अच्छा होगा।
  • दूसरे प्रस्ताव में सम्मेलन ने वहाँ मौजूद सरकारों के सामने यह प्रस्ताव रखा कि ग्रिनिच वेधशाला के एक यंत्र (transit instrument) के केंद्र से गुज़रने वाली याम्योत्तर को देशांतर की शुरुआती रेखा के रूप में अपनाया जाए। अंतिम दस्तावेज़ (Final Act) में इस पर 22 मत पक्ष में, 1 विरोध में (सैन डोमिंगो) दर्ज हैं, और 2 देशों (ब्राज़ील, फ़्रांस) ने मत नहीं दिया।
  • तीसरा प्रस्ताव: देशांतर इस याम्योत्तर से दोनों दिशाओं में 180 अंश तक गिना जाए, पूर्व को धन और पश्चिम को ऋण मानकर।
  • चौथे प्रस्ताव में एक सार्वभौमिक दिन का सुझाव था, इस शर्त के साथ कि जहाँ चाहिए वहाँ स्थानीय या मानक समय के इस्तेमाल में यह दख़ल न दे।
  • सम्मेलन का अंतिम दस्तावेज़ वॉशिंगटन में 22 अक्टूबर 1884 की तारीख़ का है।

स्रोत (ऊपर की सभी बातें): International Meridian Conference, Protocols of the Proceedings, वॉशिंगटन, 1884 (सम्मेलन की छपी कार्यवाही), Project Gutenberg पर उसकी टाइप की हुई पूरी प्रति (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में

सवाल रखिए: 1884 के सम्मेलन ने ग्रिनिच वाली रेखा को सीधे सब पर लागू कर दिया, या सरकारों के सामने प्रस्ताव रखा? दोनों में फ़र्क़ क्या है?

उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): रिकॉर्ड के शब्दों में सम्मेलन सरकारों के सामने प्रस्ताव रखता है; अपनाना हर सरकार का काम था। यह किताब के “कुछ देशों ने तय किया” से मेल खाता है। यही सीख भारतीय मानक समय वाले हिस्से में भी है: नियम छपना और नियम लागू होना अलग बातें हैं।

दूसरा सवाल: किताब में पूर्व के लिए “पू.” और पश्चिम के लिए “प.” जोड़ा जाता है। 1884 के तीसरे प्रस्ताव में इसी बात को कैसे लिखा गया? उत्तर की दिशा (हमारी ओर से): वहाँ पूर्व को धन (+) और पश्चिम को ऋण (−) माना गया। किताब भी समय-क्षेत्र वाले हिस्से में मानचित्र की संख्याओं के साथ यही चिह्न बरतती है: धनात्मक हो तो जी.एम.टी. में जोड़िए, ऋणात्मक हो तो घटाइए। (देशांतर का चिह्न और समय का चिह्न एक ही चीज़ नहीं हैं, पर सोचने का ढंग एक है।)

तीसरी बात, सावधानी के साथ: किताब का उज्जयिनी वाला बॉक्स ख़ुद कहता है कि ग्रिनिच पहली ज्ञात प्रमुख याम्योत्तर नहीं थी। कक्षा में उतनी ही बात रखिए जितनी किताब कहती है।

दूसरे अध्यायों से जोड़

  • महासागर एवं महाद्वीप: (हमारी ओर से) ग्लोब पर महाद्वीपों और महासागरों की जगह बताते समय इसी अध्याय के अक्षांश, देशांतर और गोलार्ध दोबारा काम आते हैं।
  • इतिहास की समय-रेखा एवं उसके स्रोत: (हमारी ओर से) वहाँ समय को एक रेखा पर रखकर देखा जाता है; यहाँ जगह को दो रेखाओं के जाल पर। दोनों में बात एक तय शुरुआती बिंदु से गिनने की है।

कक्षा के लिए पाँच सवाल (सोचने के, परीक्षा के नहीं)

  1. तिनसुकिया में सूरज पोरबंदर से पहले डूबता है, फिर भी दोनों जगह की घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं। स्कूल खुलने का समय तय करते वक़्त इसका क्या असर हो सकता है?
  2. भारतीय मानक समय के नियम अगस्त 2026 में छप गए, पर 180 दिन बाद लागू होंगे। अपने आस-पास कोई और उदाहरण सोचिए, जहाँ कोई बात घोषित पहले हुई और लागू बाद में।
  3. अगर हर देश अपनी अलग प्रमुख याम्योत्तर रखता, तो एक जहाज़ को दूसरे देश का नक्शा पढ़ने में क्या मुश्किल आती?
  4. फ़ोन बताता है कि आप कहाँ हैं। अगर उपग्रह की घड़ी थोड़ी आगे-पीछे हो जाए, तो फ़ोन पर दिखने वाली जगह का क्या होगा?
  5. 8°4′ का 4′ और घड़ी के 4 मिनट, दोनों को मिनट क्यों कहते हैं, और दोनों में फ़र्क़ क्या है?

अंत में

(हमारी ओर से) यह अध्याय दो बातों पर टिका है: जगह बताने के लिए दो संख्याएँ, और समय बताने के लिए एक तय रेखा। आज भी यही दोनों बातें काम कर रही हैं: CSIR-NPL की परमाणु घड़ियाँ भारतीय मानक समय रखती हैं, NavIC जैसी उपग्रह प्रणालियाँ जगह और समय दोनों बताने के लिए बनाई गई हैं, और किताब आज भी देशांतर ग्रिनिच से गिनती है, जिसका प्रस्ताव 1884 में सरकारों के सामने रखा गया था। ये बातें किताब को बदलती नहीं, उसे और साफ़ करती हैं। अध्याय का अंत किताब के इसी वाक्य पर कीजिए: “देशांतर को मापने के लिए सही-सही समय रखना आवश्यक है और यह वर्तमान की तुलना में तब उतना सटीक नहीं था।” (पृष्ठ 16)

जाँच की तिथि — बाहर की हर बात 8 अक्टूबर 2026 की स्थिति बताती है। ऊपर के सारे स्रोत 9 अक्टूबर 2026 को खोलकर पढ़े गए। जिन स्रोतों पर तारीख़ है, वे सब 8 अक्टूबर 2026 या उससे पहले के हैं; ISRO के NavIC वाले पन्ने पर तारीख़ नहीं है, इसलिए उससे सिर्फ़ प्रणाली की बनावट की बातें ली गई हैं।