पुस्तक: भारत और समकालीन विश्व–2 (कक्षा 10, NCERT) · खण्ड I — घटनाएँ और प्रक्रियाएँ पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 3 से 28 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप उसे सीधे पढ़कर समझ सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
हर भाग में तीन चीज़ें मिलेंगी। पहली — मूल बात, जो सरल भाषा में समझाई गई है। दूसरी — याद रखने योग्य तथ्य, जो तालिका में दिए गए हैं। तीसरी — परीक्षा के लिए संकेत, जो बताता है कि इस भाग से किस तरह का प्रश्न आ सकता है।
कठिन शब्दों के अर्थ इसी फ़ाइल के अंत में भाग 9 में दिए गए हैं।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
आज हम जिस दुनिया में रहते हैं, उसमें हर जगह देश हैं। भारत एक देश है, फ़्रांस एक देश है, जर्मनी एक देश है। हर देश की अपनी सरकार है, अपना झंडा है, अपनी सीमा है और अपने नागरिक हैं। हमें यह सब इतना सामान्य लगता है कि हम सोचते ही नहीं कि यह हमेशा से ऐसा नहीं था।
लेकिन सच यह है कि दो सौ साल पहले यूरोप में ऐसे देश थे ही नहीं। उस समय वहाँ राजाओं के राज्य थे। एक राजा के राज्य में कई तरह की भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते थे, और एक ही भाषा बोलने वाले लोग कई अलग-अलग राजाओं के राज्यों में बँटे हुए थे। लोगों की पहचान उनके राजा से होती थी, उनके देश से नहीं।
यह अध्याय बताता है कि यूरोप में यह बदलाव कैसे आया — यानी राजाओं के राज्यों की जगह राष्ट्र-राज्य कैसे बने, और लोगों के मन में यह भावना कैसे पैदा हुई कि “हम सब एक हैं, हमारा एक साझा इतिहास है, और हमें अपना एक अलग देश चाहिए।” इसी भावना को राष्ट्रवाद कहते हैं।
एक वाक्य में पूरा अध्याय: यूरोप में उन्नीसवीं सदी के दौरान राजाओं के बहु-राष्ट्रीय साम्राज्यों की जगह राष्ट्र-राज्यों ने ले ली, और यह बदलाव क्रांतियों, युद्धों, संस्कृति और आम लोगों के संघर्ष से हुआ।
इस अध्याय की सबसे ज़रूरी बात याद रखिए: पाठ्यपुस्तक साफ़ कहती है कि “साझेपन की यह भावना अनंत काल से नहीं थी; यह संघर्षों और नेताओं तथा आम लोगों की सरगर्मियों से निर्मित हुई थी।” इसका मतलब यह है कि राष्ट्र अपने आप नहीं बन जाते — उन्हें लोग बनाते हैं।
1. फ़्रेडरिक सॉर्र्यू का चित्र (1848) — अध्याय की शुरुआत
पाठ्यपुस्तक अध्याय की शुरुआत एक चित्र से करती है, और उस चित्र को समझ लेना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि उसी से पूरे अध्याय का भाव पता चलता है।
1848 में फ़्रांस के एक कलाकार फ़्रेडरिक सॉर्र्यू ने चार चित्रों की एक शृंखला बनाई। इन चित्रों में उसने सपनों का एक संसार दिखाया। उसके अपने शब्दों में यह संसार ‘जनतांत्रिक और सामाजिक गणतंत्रों’ से मिलकर बना था।
पहले चित्र में क्या दिखाया गया है — इसे ध्यान से समझिए:
- इसमें यूरोप और अमेरिका के लोग दिखाए गए हैं। ये सभी उम्र और सभी सामाजिक वर्गों के स्त्री-पुरुष हैं।
- ये सब लोग एक लंबी क़तार में चल रहे हैं और स्वतंत्रता की प्रतिमा की वंदना करते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
- स्वतंत्रता को एक महिला के रूप में दिखाया गया है। उसके एक हाथ में ज्ञानोदय की मशाल है और दूसरे हाथ में मनुष्य के अधिकारों का घोषणापत्र है।
- प्रतिमा के सामने ज़मीन पर निरंकुश संस्थानों के टूटे हुए अवशेष बिखरे पड़े हैं। इसका मतलब यह है कि पुरानी निरंकुश राजशाही अब टूट चुकी है।
- जुलूस का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड कर रहे हैं, क्योंकि ये दोनों तब तक राष्ट्र-राज्य बन चुके थे।
- उनके पीछे फ़्रांस है, जिसे उसके क्रांतिकारी तिरंगे से पहचाना जा सकता है।
- फ़्रांस के पीछे जर्मनी के लोग हैं, जो काला, लाल और सुनहरा झंडा थामे हुए हैं।
- जर्मनी के बाद ऑस्ट्रिया, दो सिसिलियों की राजशाही, लॉम्बार्डी, पोलैंड, इंग्लैंड, आयरलैंड, हंगरी और रूस के लोग हैं।
- सबसे ऊपर स्वर्ग से ईसा मसीह, संत और फ़रिश्ते इस दृश्य को देख रहे हैं। चित्रकार ने इन्हें दुनिया के राष्ट्रों के बीच भाईचारे के प्रतीक के रूप में दिखाया है।
यहाँ दो बहुत ज़रूरी बातें समझिए।
पहली बात — सॉर्र्यू के इस सपने में हर राष्ट्र की अपनी अलग पहचान है, जो उनके कपड़ों और राष्ट्रीय पोशाक से पता चलती है। यानी सब अलग-अलग हैं, फिर भी सब साथ-साथ चल रहे हैं।
दूसरी बात — जर्मनी का जो झंडा चित्र में है, वह 1848 की उदारवादी उम्मीदों को दिखाता है। उस समय जर्मन लोग चाहते थे कि उनकी अनेक जर्मन-भाषी रियासतों को मिलाकर एक प्रजातांत्रिक संविधान के अंतर्गत एक राष्ट्र-राज्य बनाया जाए।
सबसे बड़ी बात: यह चित्र एक कल्पनादर्शी (युटोपिया) है, यानी ऐसे समाज की कल्पना जो इतना आदर्श है कि उसका सचमुच बन पाना लगभग असंभव है। यानी 1848 में यह सब हुआ नहीं था — यह सिर्फ़ एक सपना था। पूरा अध्याय यही बताता है कि उस सपने का कितना हिस्सा सच हुआ और कितना नहीं।
2. ‘राष्ट्र क्या है?’ — अर्न्स्ट रेनन का उत्तर
पाठ्यपुस्तक में स्रोत-क के रूप में एक बहुत महत्त्वपूर्ण निबंध का अंश दिया गया है। इसे समझ लेना चाहिए, क्योंकि परीक्षा में इस पर स्रोत-आधारित प्रश्न आ सकता है।
फ़्रांसीसी दार्शनिक अर्न्स्ट रेनन (1823–92) ने 1882 में सॉर्बोन विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान दिया। बाद में यह व्याख्यान एक प्रसिद्ध निबंध के रूप में छपा, जिसका शीर्षक था ‘राष्ट्र क्या है?’ (Qu’est-ce qu’une nation?)।
रेनन ने पहले यह बताया कि राष्ट्र क्या नहीं है। उन्होंने उस विचार की आलोचना की कि राष्ट्र समान भाषा, नस्ल, धर्म या क्षेत्र से बनता है। यानी रेनन के अनुसार ये चीज़ें अकेले किसी राष्ट्र को नहीं बनातीं।
फिर उन्होंने बताया कि राष्ट्र असल में क्या है। उनके अनुसार —
- “एक राष्ट्र लंबे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का चरम बिंदु होता है।”
- राष्ट्र की नींव दो चीज़ों पर टिकी होती है — अतीत में समान गौरव का होना, और वर्तमान में एक समान इच्छा, संकल्प तथा साथ मिलकर महान काम करने और आगे भी ऐसे काम करने की इच्छा का होना।
- “राष्ट्र एक बड़ी और व्यापक एकता (Large-Scale Solidarity) है।”
- “उसका अस्तित्व रोज़ जनमत-संग्रह है।” (जनमत-संग्रह का अर्थ है — एक प्रत्यक्ष मतदान जिसके ज़रिए एक क्षेत्र के सभी लोगों से एक प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए पूछा जाता है।)
- “प्रांत उसके निवासी हैं; अगर सलाह लिए जाने का किसी का अधिकार है तो वह निवासी ही है।”
- राष्ट्रों का होना एक अच्छी बात है, बल्कि एक ज़रूरत भी है। रेनन कहते हैं कि “उनका होना स्वतंत्रता की गारंटी है, और अगर दुनिया में केवल एक क़ानून और उसका केवल एक मालिक होता तो स्वतंत्रता का लोप हो जाएगा।”
इसे आसान भाषा में समझिए। रेनन कह रहे हैं कि राष्ट्र कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो जन्म से मिल जाए। राष्ट्र वह है जिसे लोग रोज़-रोज़ अपनी इच्छा से चुनते हैं। इसीलिए उन्होंने इतना सुंदर वाक्य कहा कि राष्ट्र का अस्तित्व “रोज़ का जनमत-संग्रह” है।
परीक्षा के लिए संकेत: “रेनन के अनुसार राष्ट्र की विशेषताएँ बताइए” — यह प्रश्न सीधे पूछा जा सकता है, और यह पाठ्यपुस्तक का ‘चर्चा करें’ वाला प्रश्न भी है।
3. फ़्रांसीसी क्रांति और राष्ट्र का विचार (पाठ का भाग 1)
3.1 राष्ट्रवाद की पहली अभिव्यक्ति
राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 में फ़्रांसीसी क्रांति के साथ हुई।
1789 से पहले फ़्रांस एक ऐसा राज्य था जिसके पूरे भू-भाग पर एक निरंकुश राजा का शासन था। फ़्रांसीसी क्रांति से जो राजनीतिक और संवैधानिक बदलाव हुए, उनसे एक बहुत बड़ी बात हुई — प्रभुसत्ता राजा के हाथ से निकलकर फ़्रांसीसी नागरिकों के समूह के हाथ में चली गई।
क्रांति ने यह घोषणा की कि अब लोगों द्वारा राष्ट्र का गठन होगा और वे ही उसकी नियति तय करेंगे।
3.2 फ़्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या-क्या क़दम उठाए
यह सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्नों में से एक है (पाठ्यपुस्तक का अभ्यास प्रश्न 2 भी यही है), इसलिए इसे क्रम से याद कीजिए। क्रांतिकारियों ने ऐसे अनेक क़दम उठाए जिनसे फ़्रांसीसी लोगों में एक सामूहिक पहचान की भावना पैदा हो सके।
| क्रम | क़दम | इससे क्या हुआ |
|---|---|---|
| 1 | पितृभूमि (la patrie) और नागरिक (le citoyen) जैसे विचारों पर बल दिया गया | लोगों को यह लगने लगा कि वे एक संयुक्त समुदाय हैं, जिसे संविधान के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त हैं |
| 2 | एक नया फ़्रांसीसी झंडा — तिरंगा चुना गया | उसने पहले के राजध्वज की जगह ले ली |
| 3 | इस्टेट जेनरल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के समूह द्वारा किया जाने लगा और उसका नाम बदलकर नेशनल एसेंबली कर दिया गया | जनता के चुने प्रतिनिधियों की सभा बनी |
| 4 | नयी स्तुतियाँ रची गईं, शपथें ली गईं, और शहीदों का गुणगान हुआ | और यह सब राष्ट्र के नाम पर हुआ |
| 5 | एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई | उसने अपने पूरे भू-भाग में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान क़ानून बनाए |
| 6 | आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए | पूरे देश में व्यापार आसान हो गया |
| 7 | भार तथा नापने की एकसमान व्यवस्था लागू की गई | हर जगह एक जैसा माप-तौल हो गया |
| 8 | क्षेत्रीय बोलियों को हतोत्साहित किया गया | पेरिस में जो फ़्रेंच बोली और लिखी जाती थी, वही राष्ट्र की साझा भाषा बन गई |
इन आठों क़दमों में एक साझी बात देखिए। हर क़दम ने लोगों के बीच के फ़र्क़ को कम किया और एकरूपता को बढ़ाया — चाहे वह क़ानून हो, माप-तौल हो, या भाषा हो। राष्ट्र बनाने का मतलब ही यही था कि अलग-अलग लोगों को एक जैसा बनाया जाए।
साथ ही यह भी ध्यान दीजिए कि इसमें एक कीमत भी चुकानी पड़ी — क्षेत्रीय बोलियाँ हतोत्साहित की गईं, यानी कुछ लोगों की अपनी भाषा पीछे छूट गई।
3.3 क्रांति को यूरोप में फैलाना
क्रांतिकारियों ने यह भी घोषणा की कि फ़्रांसीसी राष्ट्र का यह भाग्य और लक्ष्य है कि वह यूरोप के लोगों को निरंकुश शासकों से मुक्त कराए। दूसरे शब्दों में, फ़्रांस यूरोप के अन्य लोगों को राष्ट्रों में गठित होने में मदद देगा।
जब फ़्रांस की घटनाओं की ख़बर यूरोप के विभिन्न शहरों में पहुँची, तो वहाँ छात्र तथा शिक्षित मध्य-वर्गों के अन्य सदस्य जैकोबिन क्लबों की स्थापना करने लगे। उनकी गतिविधियों और अभियानों ने उन फ़्रेंच सेनाओं के लिए रास्ता तैयार किया जो 1790 के दशक में हॉलैंड, बेल्जियम, स्विट्ज़रलैंड और इटली के बड़े इलाक़ों में घुसीं।
इस तरह क्रांतिकारी युद्धों के शुरू होने के साथ ही फ़्रांसीसी सेनाएँ राष्ट्रवाद के विचार को विदेशों में ले जाने लगीं।
3.4 नेपोलियन के सुधार — फ़ायदे और नुक़सान दोनों
नेपोलियन के बारे में एक बात पहले साफ़ कर लीजिए, क्योंकि विद्यार्थी यहाँ भ्रमित होते हैं। नेपोलियन ने फ़्रांस में राजतंत्र वापस लाकर वहाँ प्रजातंत्र को नष्ट कर दिया। यानी राजनीतिक रूप से उसने क्रांति के आदर्शों को पीछे धकेला।
लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सिद्धांतों को शामिल किया, ताकि पूरी व्यवस्था अधिक तर्कसंगत और कुशल बन सके।
नेपोलियन के मुख्य सुधार (यह अभ्यास प्रश्न 5 है, ध्यान से पढ़िए):
- 1804 की नागरिक संहिता, जिसे आमतौर पर नेपोलियन की संहिता कहा जाता है, ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए।
- उसने क़ानून के समक्ष बराबरी और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया।
- इस संहिता को फ़्रांसीसी नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में भी लागू किया गया।
- डच गणतंत्र, स्विट्ज़रलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया।
- उसने सामंती व्यवस्था को खत्म किया और किसानों को भू-दासत्व तथा जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई।
- शहरों में भी कारीगरों के श्रेणी-संघों के नियंत्रणों को हटा दिया गया।
- यातायात और संचार-व्यवस्थाओं को सुधारा गया।
इन सुधारों से किन्हें फ़ायदा हुआ? किसानों, कारीगरों, मज़दूरों और नए उद्योगपतियों ने नयी-नयी मिली आज़ादी चखी। उद्योगपति और ख़ासतौर पर समान बनाने वाले लघु उत्पादक यह समझने लगे कि एकसमान क़ानून, मानक भार तथा नाप और एक राष्ट्रीय मुद्रा से एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े में वस्तुओं और पूँजी के आवागमन में सहूलियत होगी।
3.5 लेकिन फिर विरोध क्यों हुआ?
यह हिस्सा बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह दिखाता है कि इतिहास सीधी रेखा में नहीं चलता।
जीते हुए इलाक़ों में स्थानीय लोगों की फ़्रांसीसी शासन के प्रति मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ थीं।
शुरुआत में स्वागत हुआ — अनेक स्थानों जैसे हॉलैंड और स्विट्ज़रलैंड में, और ब्रसेल्स, मेंज़, मिलान और वॉरसा जैसे शहरों में फ़्रांसीसी सेनाओं का स्वतंत्रता का तोहफ़ा देने वालों की तरह स्वागत किया गया।
मगर यह शुरुआती उत्साह जल्दी ही दुश्मनी में बदल गया। ऐसा तब हुआ जब यह साफ़ होने लगा कि नयी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ राजनीतिक स्वतंत्रता के अनुरूप नहीं थीं।
विरोध के तीन ठोस कारण:
- बढ़े हुए कर
- सेंसरशिप (यानी लिखने-बोलने पर रोक)
- बाक़ी यूरोप को जीतने के लिए फ़्रेंच सेना में जबरन भर्ती
इन नुक़सानों से मिले फ़ायदे कहीं ज़्यादा नज़र आने लगे।
पाठ्यपुस्तक में इसी बात पर एक शानदार चित्र है (चित्र 4)। जर्मनी के ज़्वेब्रकेन शहर में स्वतंत्रता के वृक्ष का रोपण दिखाया गया है। चित्र में फ़्रांसीसी सैनिकों को दमनकारियों के रूप में दिखाया गया है — वे एक किसान की गाड़ी छीन रहे हैं, युवा महिलाओं को तंग कर रहे हैं और एक किसान को घुटने टेकने पर मजबूर कर रहे हैं। स्वतंत्रता के वृक्ष पर लगी पट्टी पर जर्मन में लिखा है — “हमसे आज़ादी और समानता ले लो — यह मानवता का आदर्श रूप है।”
यह इस दावे पर व्यंग्य है कि फ़्रांसीसी जिन इलाक़ों में जाते थे वहाँ राजतंत्र का विरोध कर मुक्तिदाता बन जाते थे। यानी चित्रकार कह रहा है कि जो आज़ादी बंदूक के दम पर दी जाए, वह आज़ादी नहीं होती।
4. यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण (पाठ का भाग 2)
4.1 अठारहवीं सदी के यूरोप की तस्वीर
यह बात सबसे पहले समझ लीजिए, क्योंकि इसी पर पूरा अध्याय टिका है।
अगर आप मध्य अठारहवीं सदी के यूरोप का नक़्शा देखें, तो उसमें आपको वैसे ‘राष्ट्र-राज्य’ नहीं मिलेंगे जैसे कि आज हैं।
- जिन्हें आज हम जर्मनी, इटली और स्विट्ज़रलैंड के रूप में जानते हैं, वे तब राजशाहियों, डचियों (duchies) और कैंटनों (cantons) में बँटे हुए थे, जिनके शासकों के अपने स्वायत्त क्षेत्र थे।
- पूर्वी और मध्य यूरोप निरंकुश राजतंत्रों के अधीन थे और इन इलाक़ों में तरह-तरह के लोग रहते थे।
- वे अपने आप को एक सामूहिक पहचान या किसी समान संस्कृति का भागीदार नहीं मानते थे।
- अकसर वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते थे और विभिन्न जातीय समूहों के सदस्य थे।
हैब्सबर्ग साम्राज्य का उदाहरण (यह उदाहरण याद रखिए, बहुत काम आता है):
ऑस्ट्रिया-हंगरी पर शासन करने वाला हैब्सबर्ग साम्राज्य कई अलग-अलग क्षेत्रों और जनसमूहों को जोड़कर बना था।
| क्षेत्र | वहाँ की स्थिति |
|---|---|
| ऐल्प्स के टिरॉल, ऑस्ट्रिया और सुडेटनलैंड | जर्मन भाषा बोलने वाले |
| बोहेमिया | कुलीन वर्ग में जर्मन भाषा बोलने वाले ज़्यादा थे |
| लॉम्बार्डी और वेनेशिया | इतालवी-भाषी प्रांत |
| हंगरी | आधे लोग मैग्यार भाषा बोलते थे, बाक़ी विभिन्न बोलियाँ |
| गालीसिया | कुलीन वर्ग पोलिश भाषा बोलता था |
इन प्रभावशाली समूहों के अलावा, साम्राज्य की सीमा रेखाओं के भीतर भारी संख्या में खेती करने वाले लोग अधीन अवस्था में रहते थे — जैसे उत्तर में बोहेमियन और स्लोवाक, कार्निओला में स्लोवेन्स, दक्षिण में क्रोएट, और पूरब की तरफ़ ट्रांसिल्वेनिया में रहने वाले राउमन लोग।
अब सोचिए — इतनी तरह के लोग एक ही साम्राज्य में थे, तो उन्हें आपस में जोड़ने वाली चीज़ क्या थी?
पाठ्यपुस्तक का उत्तर बहुत साफ़ है: “इन तरह-तरह के समूहों को आपस में बाँधने वाला तत्व, केवल सम्राट के प्रति सबकी निष्ठा थी।”
यानी लोग एक-दूसरे से नहीं, राजा से जुड़े हुए थे। यही वह चीज़ है जो आगे चलकर बदली — और उसी बदलाव का नाम राष्ट्रवाद है।
4.2 कुलीन वर्ग और नया मध्यवर्ग (भाग 2.1)
कुलीन वर्ग (Aristocracy) कौन था?
- सामाजिक और राजनीतिक रूप से ज़मीन का मालिक कुलीन वर्ग यूरोपीय महाद्वीप का सबसे प्रभुत्वशाली वर्ग था।
- इस वर्ग के सदस्य एक साझा जीवन शैली से बँधे हुए थे, जो क्षेत्रीय विभाजनों के आर-पार व्याप्त थी।
- वे ग्रामीण इलाक़ों में जायदाद और शहरी-हवेलियों के मालिक थे।
- राजनीतिक कार्यों के लिए तथा उच्च वर्गों के बीच वे फ़्रेंच भाषा का प्रयोग करते थे।
- उनके परिवार अकसर वैवाहिक बंधनों से आपस में जुड़े होते थे।
- मगर यह शक्तिशाली कुलीन वर्ग संख्या के लिहाज़ से एक छोटा समूह था।
बाक़ी आबादी कौन थी?
- जनसंख्या के अधिकांश लोग कृषक थे।
- पश्चिम में ज़्यादातर ज़मीन पर किराएदार और छोटे काश्तकार खेती करते थे।
- पूर्वी और मध्य यूरोप में भूमि विशाल जागीरों में बँटी थी, जिस पर भूदास खेती करते थे।
नया मध्यवर्ग कैसे बना?
पश्चिमी और मध्य यूरोप के हिस्सों में औद्योगिक उत्पादन और व्यापार में वृद्धि से शहरों का विकास हुआ और वाणिज्यिक वर्गों का उदय हुआ, जिनका अस्तित्व बाज़ार के लिए उत्पादन पर टिका था।
| देश | औद्योगीकरण कब हुआ |
|---|---|
| इंग्लैंड | अठारहवीं सदी के दूसरे भाग में आरंभ हुआ |
| फ़्रांस और जर्मनी के कुछ हिस्से | उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान |
इस प्रक्रिया के फलस्वरूप नए सामाजिक समूह अस्तित्व में आए — श्रमिक-वर्ग के लोग, और मध्य वर्ग, जो उद्योगपतियों, व्यापारियों और सेवा क्षेत्र के लोगों से बना।
मध्य और पूर्वी यूरोप में इन समूहों का आकार उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों तक छोटा था।
इस भाग का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य यह है: “कुलीन विशेषाधिकारों की समाप्ति के बाद शिक्षित और उदारवादी मध्य वर्गों के बीच ही राष्ट्रीय एकता के विचार लोकप्रिय हुए।”
यानी राष्ट्रवाद का विचार सबसे पहले किसानों या मज़दूरों में नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग में फैला। यह बात परीक्षा में बार-बार काम आती है।
4.3 उदारवादी राष्ट्रवाद के क्या मायने थे? (भाग 2.2)
यह अध्याय का सबसे ज़रूरी और सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग है। इसे तीन हिस्सों में समझिए।
शब्द की उत्पत्ति: उदारवाद यानी liberalism शब्द लातिन भाषा के मूल liber पर आधारित है, जिसका अर्थ है ‘आज़ाद’।
(क) राजनीतिक रूप से उदारवाद का क्या मतलब था?
- नए मध्य वर्गों के लिए उदारवाद का मतलब था व्यक्ति के लिए आज़ादी और क़ानून के समक्ष सबकी बराबरी।
- राजनीतिक रूप से उदारवाद एक ऐसी सरकार पर ज़ोर देता था जो सहमति से बनी हो।
- फ़्रांसीसी क्रांति के बाद से उदारवाद निरंकुश शासक और पादरीवर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति, संविधान तथा संसदीय प्रतिनिधि सरकार का पक्षधर था।
- उन्नीसवीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के स्वामित्व की अनिवार्यता पर भी बल देते थे।
(ख) लेकिन एक बहुत बड़ी सीमा थी — मताधिकार
यह हिस्सा ध्यान से पढ़िए, क्योंकि यहीं उदारवाद की कमज़ोरी दिखती है।
पाठ्यपुस्तक साफ़ कहती है कि “यह ज़रूरी नहीं था कि क़ानून के समक्ष बराबरी का विचार सबके लिए मताधिकार (suffrage) के पक्ष में था।”
| समय | मताधिकार की स्थिति |
|---|---|
| क्रांतिकारी फ़्रांस (उदारवादी प्रजातंत्र का पहला राजनीतिक प्रयोग) | मत देने और चुने जाने का अधिकार केवल संपत्तिवान पुरुषों को |
| — | संपत्ति-विहीन पुरुष और सभी महिलाएँ राजनीतिक अधिकारों से वंचित |
| जैकोबिन शासन के समय | केवल थोड़े समय के लिए सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार मिला |
| नेपोलियन की संहिता | सीमित मताधिकार वापस आया; महिलाओं को अवयस्क का दर्जा देते हुए उन्हें पिताओं और पतियों के अधीन कर दिया |
| पूरी उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के आरंभ में | महिलाओं और संपत्ति-विहीन पुरुषों ने समान राजनीतिक अधिकारों की माँग करते हुए विरोध-आंदोलन चलाए |
इस तालिका का अर्थ समझिए। उदारवाद ने कहा “सब बराबर हैं” — पर व्यवहार में वोट का अधिकार केवल पैसे वाले पुरुषों को मिला। यानी बराबरी का वादा और बराबरी की हक़ीक़त अलग-अलग थे। यही कारण है कि महिलाओं और ग़रीब पुरुषों को उसके बाद सौ साल तक लड़ना पड़ा।
(ग) आर्थिक रूप से उदारवाद का क्या मतलब था?
आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद बाज़ारों की मुक्ति और चीज़ों तथा पूँजी के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को खत्म करने के पक्ष में था। उन्नीसवीं सदी के दौरान यह उभरते हुए मध्य वर्गों की ज़ोरदार माँग थी।
जर्मन-भाषी इलाक़ों का उदाहरण (यह उदाहरण बहुत महत्त्वपूर्ण है):
नेपोलियन के प्रशासनिक क़दमों से अनगिनत छोटे प्रदेशों से 39 राज्यों का एक महासंघ बना। इनमें से प्रत्येक की अपनी मुद्रा और नाप-तौल प्रणाली थी।
इससे कितनी दिक़्क़त होती थी, यह इन दो उदाहरणों से समझिए —
पहला उदाहरण — सीमाशुल्क: 1833 में हैम्बर्ग से न्यूरेम्बर्ग जाकर अपना माल बेचने वाले एक व्यापारी को ग्यारह सीमाशुल्क नाकों से गुज़रना पड़ता था और हर बार लगभग 5% सीमाशुल्क देना पड़ता था। शुल्क वस्तुओं के वज़न या आकार के अनुसार लगाए जाते थे।
दूसरा उदाहरण — नाप की गड़बड़ी: कपड़े को नापने का पैमाना ऐले (elle) था, जिसकी लंबाई जगह के साथ घटती-बढ़ती थी। देखिए एक ही ‘ऐले’ कपड़ा कहाँ कितना मिलता था —
| शहर | एक ‘ऐले’ कपड़े की लंबाई |
|---|---|
| फ़्रैंकफ़र्ट | 54.7 सेंटीमीटर |
| मेंज़ | 55.1 सेंटीमीटर |
| न्यूरेम्बर्ग | 65.6 सेंटीमीटर |
| फ़्राईबर्ग | 53.5 सेंटीमीटर |
इस तालिका को कक्षा में ज़रूर देखिए। एक ही नाम के पैमाने से एक जगह 53.5 सेंटीमीटर कपड़ा मिलता था और दूसरी जगह 65.6 सेंटीमीटर। यानी व्यापार करना बहुत मुश्किल था। इसीलिए व्यापारी चाहते थे कि पूरे जर्मनी में एक जैसी व्यवस्था हो। आर्थिक ज़रूरत ने राष्ट्रीय एकता की माँग को मज़बूत किया।
(घ) ज़ॉल्वेराइन (Zollverein) — शुल्क संघ
1834 में प्रशा की पहल पर एक शुल्क संघ ज़ॉल्वेराइन स्थापित किया गया, जिसमें अधिकांश जर्मन राज्य शामिल हो गए।
इस संघ ने दो बड़े काम किए —
- शुल्क अवरोधों को समाप्त कर दिया।
- मुद्राओं की संख्या तीस से घटाकर दो कर दी।
इसके अलावा रेलवे के जाल ने गतिशीलता बढ़ाई और आर्थिक हितों को राष्ट्रीय एकीकरण का सहायक बनाया।
पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष याद रखिए: “उस समय पनप रही व्यापक राष्ट्रवादी भावनाओं को आर्थिक राष्ट्रवाद की लहर ने मज़बूत बनाया।”
स्रोत-ख में फ़्रेडरिख लिस्ट का कथन (1834): जर्मनी के ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर फ़्रेडरिख लिस्ट ने लिखा —
“ज़ॉल्वेराइन का लक्ष्य जर्मन लोगों को आर्थिक रूप से एक राष्ट्र में बाँध देना है… जर्मन लोग यह समझ गए हैं कि एक मुक्त आर्थिक व्यवस्था ही राष्ट्रीय भावनाओं के उत्पन्न होने का एकमात्र ज़रिया है।”
4.4 1815 के बाद एक नया रूढ़िवाद (भाग 2.3)
(क) रूढ़िवाद क्या था?
1815 में नेपोलियन की हार के बाद यूरोपीय सरकारें रूढ़िवाद की भावना से प्रेरित थीं।
रूढ़िवादी क्या मानते थे? वे मानते थे कि राज्य और समाज की स्थापित पारंपरिक संस्थाएँ — जैसे राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार — को बनाए रखना चाहिए।
शब्द का अर्थ (पाठ्यपुस्तक का ‘नए शब्द’ बॉक्स): रूढ़िवाद ऐसा राजनीतिक दर्शन है जो परंपरा, स्थापित संस्थानों और रिवाज़ों पर ज़ोर देता है और तेज़ बदलावों की बजाय क्रमिक और धीरे-धीरे विकास को प्राथमिकता देता है।
(ख) पर यह ‘नया’ रूढ़िवाद क्यों था?
यह भाग बहुत बारीक है, इसलिए ध्यान से पढ़िए। यही ‘नया’ शब्द का रहस्य है।
अधिकतर रूढ़िवादी लोग क्रांति से पहले के दौर में वापसी नहीं चाहते थे। नेपोलियन द्वारा शुरू किए गए परिवर्तनों से उन्होंने यह जान लिया था कि आधुनिकीकरण, राजतंत्र जैसी पारंपरिक संस्थाओं को मज़बूत बनाने में सक्षम था।
उन्हें समझ आ गया कि आधुनिक व्यवस्था राज्य की ताक़त को ज़्यादा कारगर और मज़बूत बना सकती थी। एक आधुनिक सेना, कुशल नौकरशाही, गतिशील अर्थव्यवस्था, सामंतवाद और भूदासत्व की समाप्ति — ये सब यूरोप के निरंकुश राजतंत्रों को शक्ति प्रदान कर सकते थे।
इसे इस तरह समझिए: पुराने रूढ़िवादी कहते थे “कुछ मत बदलो।” नए रूढ़िवादी कहने लगे “थोड़ा बदलो, ताकि बाक़ी सब वैसा ही बना रहे।” यह चालाकी भरी सोच थी और बहुत कारगर भी।
(ग) वियना सम्मेलन और वियना संधि, 1815
1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया — जिन्होंने मिलकर नेपोलियन को हराया था — के प्रतिनिधि यूरोप के लिए एक समझौता तैयार करने के लिए वियना में मिले।
- इस सम्मेलन (Congress) की मेज़बानी ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की।
- प्रतिनिधियों ने 1815 की वियना संधि (Treaty of Vienna) तैयार की।
- इसका उद्देश्य उन कई सारे बदलावों को खत्म करना था जो नेपोलियाई युद्धों के दौरान हुए थे।
वियना संधि के मुख्य फ़ैसले (तालिका के रूप में याद कीजिए):
| फ़ैसला | विवरण |
|---|---|
| बूबों वंश की बहाली | फ़्रांसीसी क्रांति के दौरान हटाए गए बूबों वंश को सत्ता में बहाल किया गया |
| फ़्रांस का नुक़सान | फ़्रांस ने वे इलाक़े खो दिए जिन पर उसने नेपोलियन के अधीन क़ब्ज़ा किया था |
| फ़्रांस के चारों ओर घेरा | फ़्रांस की सीमाओं पर कई राज्य क़ायम कर दिए गए ताकि भविष्य में फ़्रांस विस्तार न कर सके |
| उत्तर में | नीदरलैंड्स का राज्य स्थापित किया गया, जिसमें बेल्जियम शामिल था |
| दक्षिण में | पीडमॉण्ट में जेनोआ जोड़ दिया गया |
| प्रशा को | उसकी पश्चिमी सीमाओं पर महत्त्वपूर्ण नए इलाक़े दिए गए |
| ऑस्ट्रिया को | उत्तरी इटली का नियंत्रण सौंपा गया |
| जर्मन महासंघ | नेपोलियन का बनाया 39 राज्यों वाला जर्मन महासंघ बरक़रार रखा गया |
| रूस को | पोलैंड का एक हिस्सा दिया गया |
| प्रशा को | सैक्सनी का एक हिस्सा प्रदान किया गया |
इस सबका मुख्य उद्देश्य उन राजतंत्रों की बहाली था जिन्हें नेपोलियन ने बर्ख़ास्त कर दिया था, और साथ ही यूरोप में एक नयी रूढ़िवादी व्यवस्था क़ायम करने का लक्ष्य भी था।
(घ) दमन और सेंसरशिप
1815 में स्थापित रूढ़िवादी शासन व्यवस्थाएँ निरंकुश थीं। वे आलोचना और असहमति बर्दाश्त नहीं करती थीं।
- उन्होंने उन गतिविधियों को दबाना चाहा जो निरंकुश सरकारों की वैधता पर सवाल उठाती थीं।
- ज़्यादातर सरकारों ने सेंसरशिप के नियम बनाए, जिनका उद्देश्य अख़बारों, किताबों, नाटकों और गीतों में व्यक्त उन बातों पर नियंत्रण लगाना था जिनसे फ़्रांसीसी क्रांति से जुड़े स्वतंत्रता और मुक्ति के विचार झलकते थे।
- लेकिन फिर भी फ़्रांसीसी क्रांति की स्मृति उदारवादियों को लगातार प्रेरित कर रही थी।
- नयी रूढ़िवादी व्यवस्था के आलोचक उदारवादी राष्ट्रवादियों द्वारा उठाया गया एक मुख्य मुद्दा था — प्रेस की आज़ादी।
पाठ्यपुस्तक में इस पर एक व्यंग्य चित्र है (चित्र 6, ‘चिंतकों का क्लब’, लगभग 1820)। उसमें बाईं तरफ़ की पट्टी पर लिखा है — “आज की बैठक का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है : हमें कब तक सोचने दिया जाएगा?” और दाईं तरफ़ क्लब के नियमों में लिखा है — “इस पढ़े-लिखे समाज का पहला नियम है ख़ामोशी।” साथ ही यह भी कि अगर कोई सदस्य बोलने की इच्छा करे तो उसे मुँह बंद रखने वाले मोहरे (Muzzle) बाँटे जाएँगे।
यह चित्र सेंसरशिप का मज़ाक उड़ा रहा है। चित्रकार कह रहा है कि सोचने की आज़ादी छीन ली गई है।
4.5 क्रांतिकारी (भाग 2.4)
1815 के बाद के वर्षों में दमन के भय ने अनेक उदारवादी-राष्ट्रवादियों को भूमिगत कर दिया।
- बहुत सारे यूरोपीय राज्यों में क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने और विचारों का प्रसार करने के लिए गुप्त संगठन उभर आए।
- उस समय क्रांतिकारी होने का मतलब उन राजतंत्रीय व्यवस्थाओं का विरोध करने से था जो वियना कांग्रेस के बाद स्थापित की गई थीं।
- साथ ही स्वतंत्रता और मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध होना और संघर्ष करना क्रांतिकारी होने के लिए ज़रूरी था।
- ज़्यादातर क्रांतिकारी राष्ट्र-राज्यों की स्थापना को आज़ादी के इस संघर्ष का अनिवार्य हिस्सा मानते थे।
ज्युसेपे मेत्सिनी — इस अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी
मेत्सिनी पर टिप्पणी लिखने को कहा जा सकता है (अभ्यास प्रश्न 1-क), इसलिए यह पूरा भाग याद कीजिए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 1805 में जेनोआ में |
| पहला संगठन | कार्बोनारी नामक गुप्त संगठन का सदस्य बना |
| बहिष्कार | चौबीस साल की युवावस्था में लिगुरिया में क्रांति करने के लिए उसे बहिष्कृत कर दिया गया |
| उसके अपने दो संगठन | मारसेई में ‘यंग इटली’ और बर्न में ‘यंग यूरोप’ |
| सदस्य कौन थे | पोलैंड, फ़्रांस, इटली और जर्मन राज्यों में समान विचार रखने वाले युवा |
मेत्सिनी का मुख्य विचार क्या था?
- उसका विश्वास था कि ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई थी।
- इसलिए इटली छोटे राज्यों और प्रदेशों के पैबंदों की तरह नहीं रह सकता था।
- उसे जोड़कर राष्ट्रों के व्यापक गठबंधन के अंदर एकीकृत गणतंत्र बनाना ही था।
- यह एकीकरण ही इटली की मुक्ति का आधार हो सकता था।
उसका प्रभाव: उसके इस मॉडल की देखा-देखी जर्मनी, फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड और पोलैंड में गुप्त संगठन क़ायम किए गए।
मेत्सिनी ने राजतंत्र का घोर विरोध करके और प्रजातांत्रिक गणतंत्रों के अपने स्वप्न से रूढ़िवादियों को डरा दिया। यही कारण है कि मैटरनिख ने उसे ‘हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे ख़तरनाक दुश्मन’ बताया।
यह अंतिम वाक्य परीक्षा में सोने जैसा है। अगर आप मेत्सिनी पर टिप्पणी लिख रहे हैं, तो मैटरनिख का यह कथन ज़रूर लिखिए — इससे उत्तर में वज़न आ जाता है।
5. क्रांतियों का युग: 1830–1848 (पाठ का भाग 3)
5.1 पृष्ठभूमि
जैसे-जैसे रूढ़िवादी व्यवस्थाओं ने अपनी ताक़त को और मज़बूत बनाने की कोशिश की, यूरोप के अनेक क्षेत्रों में उदारवाद और राष्ट्रवाद को क्रांति से जोड़कर देखा जाने लगा।
ऐसे क्षेत्र कौन-से थे? इटली और जर्मनी के राज्य, ऑटोमन साम्राज्य के सूबे, आयरलैंड और पोलैंड।
इन क्रांतियों का नेतृत्व किसने किया? उदारवादी-राष्ट्रवादियों ने, जो शिक्षित मध्यवर्गीय विशिष्ट लोग थे। इनमें प्रोफ़ेसर, स्कूली-अध्यापक, क्लर्क और वाणिज्य व्यापार में लगे मध्यवर्गों के लोग शामिल थे।
5.2 फ़्रांस की जुलाई क्रांति, 1830
- प्रथम विद्रोह फ़्रांस में जुलाई 1830 में हुआ।
- बूबों राजा, जिन्हें 1815 के बाद हुई रूढ़िवादी प्रतिक्रिया के दौरान सत्ता में बहाल किया गया था, उन्हें अब उदारवादी क्रांतिकारियों ने उखाड़ फेंका।
- उनकी जगह एक संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया गया जिसका अध्यक्ष लुई फ़िलिप था।
- मैटरनिख की मशहूर टिप्पणी: “जब फ़्रांस छींकता है तो बाक़ी यूरोप की सर्दी-ज़ुकाम हो जाता है।”
- जुलाई क्रांति से ब्रसेल्स में भी विद्रोह भड़क गया, जिसके फलस्वरूप बेल्जियम यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ द नीदरलैंड्स से अलग हो गया।
मैटरनिख की टिप्पणी का अर्थ: फ़्रांस में कोई छोटी घटना भी हो, तो पूरे यूरोप में उसका असर पड़ता है। यह वाक्य लिखने में बहुत अच्छा लगता है और परीक्षक को प्रभावित करता है।
5.3 यूनान का स्वतंत्रता संग्राम (1821–1832)
यह अभ्यास प्रश्न 1-ग है, इसलिए इसे पूरा याद कीजिए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पृष्ठभूमि | पंद्रहवीं सदी से यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था |
| आरंभ | यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों का आज़ादी के लिए संघर्ष 1821 में आरंभ हो गया |
| समर्थन कहाँ से मिला | निर्वासन में रह रहे यूनानियों से, और साथ ही पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों से जो प्राचीन यूनानी संस्कृति (Hellenism) के प्रति सहानुभूति रखते थे |
| कवियों और कलाकारों की भूमिका | उन्होंने यूनान को यूरोपीय सभ्यता का पालना बताकर प्रशंसा की और एक मुस्लिम साम्राज्य के विरुद्ध यूनान के संघर्ष के लिए जनमत जुटाया |
| लॉर्ड बायरन | अंग्रेज़ कवि ने धन इकट्ठा किया और बाद में युद्ध में लड़ने भी गए, जहाँ 1824 में बुख़ार से उनकी मृत्यु हो गई |
| अंत | 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी |
यह घटना क्यों महत्त्वपूर्ण है? क्योंकि इसने पूरे यूरोप के शिक्षित अभिजात वर्ग में राष्ट्रीय भावनाओं का संचार किया। यानी यूनान का संघर्ष सिर्फ़ यूनान का मामला नहीं रहा — वह पूरे यूरोप के लिए एक प्रेरणा बन गया।
5.4 रूमानी कल्पना और राष्ट्रीय भावना (भाग 3.1)
यह भाग बहुत सुंदर है और इससे ‘संस्कृति की भूमिका’ वाला प्रश्न बनता है (चर्चा प्रश्न 2)।
पाठ्यपुस्तक का मुख्य वाक्य: “राष्ट्रवाद का विकास केवल युद्धों और क्षेत्रीय विस्तार से नहीं हुआ। राष्ट्र के विचार के निर्माण में संस्कृति ने एक अहम भूमिका निभाई।”
किन चीज़ों ने राष्ट्रवादी भावनाओं को गढ़ा? कला, काव्य, कहानियों-क़िस्सों और संगीत ने।
(क) रूमानीवाद क्या था?
रूमानीवाद एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन था जो एक ख़ास तरह की राष्ट्रीय भावना का विकास करना चाहता था।
- रूमानी कलाकारों और कवियों ने आमतौर पर तर्क-वितर्क और विज्ञान के महिमामंडन की आलोचना की।
- उन्होंने उसकी जगह भावनाओं, अंतर्दृष्टि और रहस्यवादी भावनाओं पर ज़ोर दिया।
- उनका प्रयास था कि एक साझा-सामूहिक विरासत की अनुभूति और एक साझा सांस्कृतिक अतीत को राष्ट्र का आधार बनाया जाए।
(ख) योहान गॉटफ़्रीड और ‘दास वोल्क’
जर्मन दार्शनिक योहान गॉटफ़्रीड जैसे रूमानी चिंतकों ने दावा किया कि —
- सच्ची जर्मन संस्कृति उसके आम लोगों (das volk) में निहित थी।
- राष्ट्र (volkgeist) की सच्ची आत्मा लोकगीतों, जन-काव्य और लोकनृत्यों से प्रकट होती थी।
- इसलिए लोक संस्कृति के इन स्वरूपों को एकत्र और अंकित करना राष्ट्र के निर्माण की परियोजना के लिए आवश्यक था।
यह क्यों ज़रूरी था? पाठ्यपुस्तक बताती है कि स्थानीय बोलियों पर बल और स्थानीय लोक-साहित्य को एकत्र करने का उद्देश्य केवल प्राचीन राष्ट्रीय भावना को वापस लाना नहीं था, बल्कि आधुनिक राष्ट्रीय संदेश को ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना था, जिनमें से अधिकांश निरक्षर थे।
इस वाक्य को दो बार पढ़िए। अगर ज़्यादातर लोग पढ़ नहीं सकते, तो उन तक राष्ट्रवाद का संदेश किताबों से नहीं पहुँच सकता। इसलिए गीत, कहानी, नृत्य और संगीत का सहारा लिया गया। यही संस्कृति की असली भूमिका थी।
(ग) ग्रिम बंधुओं की कहानी (बॉक्स 1)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कौन | जैकब ग्रिम और विल्हेल्म ग्रिम, जन्म क्रमशः 1785 और 1786 में जर्मनी के हनाऊ शहर में |
| शुरुआत | जिस समय ये दोनों भाई क़ानून की पढ़ाई कर रहे थे, उसी समय उन्होंने शौक़िया तौर पर पुरानी लोक कथाएँ इकट्ठा करना शुरू कर दिया |
| कैसे किया | छह साल तक गाँव-गाँव जाकर यही काम करते रहे; लोगों से बात करते और पीढ़ियों से चली आ रही लोक कथा उसे लिखकर रख लेते |
| लोकप्रियता | ये कहानियाँ बच्चों और बड़ों में समान रूप से पसंद की जाती थीं |
| 1812 | उन्होंने इन कहानियों का पहला संग्रह प्रकाशित किया |
| राजनीति | बाद में दोनों भाई उदारवादी राजनीति के आंदोलन में सक्रिय हो गए; प्रैस की स्वतंत्रता के आंदोलन में उन्होंने विशेष रुचि ली |
| शब्दकोश | इसी बीच उन्होंने 33 खंडों में जर्मन भाषा का शब्दकोश भी प्रकाशित कर डाला |
ग्रिम बंधु फ़्रांस के वर्चस्व को जर्मन संस्कृति के लिए ख़तरा मानते थे। उनका विश्वास था कि उन्होंने जो लोककथाएँ इकट्ठा की हैं, वे विशुद्ध और सच्ची जर्मन भावना की अभिव्यक्ति हैं। लोक कथाएँ इकट्ठा करने और जर्मन भाषा को विकसित करने के अपने प्रयासों को वे फ़्रांसीसी प्रभुत्व का विरोध करने और एक जर्मन राष्ट्रीय पहचान गढ़ने की व्यापक योजना का हिस्सा मानते थे।
(घ) पोलैंड का उदाहरण — भाषा और संगीत से प्रतिरोध
यह उदाहरण सबसे शक्तिशाली है, क्योंकि इसमें राष्ट्र भूगोल में नहीं, संस्कृति में ज़िंदा रहा।
पोलैंड को अठारहवीं सदी के अंत में रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी बड़ी शक्तियों (Great Powers) ने विभाजन कर दिया था। यद्यपि पोलैंड अब स्वतंत्र भू-क्षेत्र नहीं था, किंतु संगीत और भाषा के ज़रिये राष्ट्रीय भावना जीवित रखी गई।
- कैरोल कुर्पिंस्की ने राष्ट्रीय संघर्ष का अपने ऑपेरा और संगीत से गुणगान किया और पोलोनेस तथा माजुरका जैसे लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया।
भाषा का संघर्ष:
- रूसी क़ब्ज़े के बाद पोलिश भाषा को स्कूलों से बलपूर्वक हटा कर रूसी भाषा को हर जगह जबरन लादा गया।
- 1831 में रूस के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह हुआ जिसे आख़िरकार कुचल दिया गया।
- इसके बाद अनेक सदस्यों ने राष्ट्रवादी विरोध के लिए भाषा को एक हथियार बनाया।
- चर्च के आयोजनों और संपूर्ण धार्मिक शिक्षा में पोलिश का इस्तेमाल हुआ।
- इसका नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में पादरियों और बिशपों को जेल में डाल दिया गया।
- रूसी अधिकारियों ने उन्हें सज़ा देते हुए साइबेरिया भेज दिया, क्योंकि उन्होंने रूसी भाषा का प्रचार करने से इनकार कर दिया था।
- इस तरह पोलिश भाषा रूसी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखी जाने लगी।
यह पूरा भाग यह सिखाता है कि राष्ट्र सिर्फ़ ज़मीन नहीं होता। पोलैंड नक़्शे से मिट गया था, फिर भी वह अपनी भाषा, संगीत और चर्च में ज़िंदा रहा। परीक्षा में ‘संस्कृति की भूमिका’ वाले प्रश्न में यह उदाहरण ज़रूर लिखिए।
5.5 भूख, कठिनाइयाँ और जन विद्रोह (भाग 3.2)
अब तक हमने विचारों की बात की। इस भाग में पेट की बात है — और यही आम लोगों को आंदोलन में लाती है।
1830 का दशक यूरोप में भारी कठिनाइयाँ लेकर आया। कारण इस प्रकार थे —
- उन्नीसवीं सदी के प्रथम भाग में पूरे यूरोप में जनसंख्या में ज़बरदस्त वृद्धि हुई।
- ज़्यादातर देशों में नौकरी ढूँढ़ने वालों की तादाद उपलब्ध रोज़गार से अधिक थी।
- ग्रामीण क्षेत्रों की अतिरिक्त आबादी शहर जाकर भीड़ से भरी ग़रीब बस्तियों में रहने लगी।
- नगरों के लघु उत्पादकों को अकसर इंग्लैंड से आयातित मशीन से बने सस्ते कपड़े से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था। ऐसा इसलिए था क्योंकि इंग्लैंड में औद्योगीकरण का स्तर महाद्वीप से ऊँचा था।
- यूरोप के उन इलाक़ों में जहाँ कुलीन वर्ग अभी भी सत्ता में था, कृषक सामंती शुल्कों और ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबे थे।
- खाने-पीने की चीज़ों के मूल्य बढ़ने या किसी वर्ष फ़सल के ख़राब होने से शहर और गाँवों में व्यापक ग़रीबी फैल जाती थी।
(क) 1848 का पेरिस — फ़रवरी की क्रांति
1848 ऐसा ही एक वर्ष था।
- खाने-पीने की कमी और व्यापक बेरोज़गारी से पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए।
- जगह-जगह अवरोध लगाए गए और लुई फ़िलिप को भागने पर मजबूर किया गया।
- राष्ट्रीय सभा (National Assembly) ने एक गणतंत्र की घोषणा करते हुए 21 वर्ष से ऊपर सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार प्रदान किया और काम के अधिकार की गारंटी दी।
- रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय कारख़ाने स्थापित किए गए।
(ख) सिलेसिया के बुनकरों का विद्रोह, 1845
यह घटना स्रोत-आधारित प्रश्न के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए पूरी पढ़िए।
1845 में सिलेसिया में बुनकरों ने उन ठेकेदारों के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था, जो उन्हें कच्चा माल देकर निर्मित कपड़ा लेते थे, परंतु दाम बहुत कम थे।
पत्रकार विल्हेम वोल्फ़ ने सिलेसिया के एक गाँव की घटनाएँ इस प्रकार बयान कीं —
“इन गाँवों में (18,000 आबादी वाले) सूती कपड़ा बुनने का व्यवसाय सबसे व्यापक है… श्रमिकों की हालत ख़स्ता है। काम के लिए बेताब लोगों का फ़ायदा उठा कर ठेकेदारों ने बनवाए जाने वाले माल की क़ीमतें गिरा दी हैं।”
घटना का क्रम इस प्रकार था:
- 4 जून को दोपहर 2 बजे बुनकरों की एक भीड़ अपने घरों से निकली और दो क़तारों में चलते हुए ठेकेदार की कोठी पहुँची।
- वे ज़्यादा मज़दूरी की माँग कर रहे थे।
- उनके साथ कभी घृणा और कभी व्यवहार किया गया तो कभी धमकियाँ दी गईं।
- इसके बाद यह भीड़ घर में ज़बरदस्ती घुस गई और चमचमाती खिड़कियाँ, फ़र्नीचर और चीनी-मिट्टी की बनी नफ़ीस चीज़ें तोड़ दीं।
- एक अन्य गुट ने भंडारगृह में घुस कर कपड़े के भंडार को लूट कर उसे तार-तार कर दिया।
- ठेकेदार अपने परिवार के साथ पड़ोस के गाँव भाग गया, हालाँकि ऐसे व्यक्ति को उस गाँव ने शरण देने से इनकार कर दिया।
- वह 24 घंटों बाद सेना को बुला कर उसकी मदद से लौटा।
- इसके बाद जो टकराव हुआ उसमें ग्यारह बुनकरों को गोली मार दी गई।
इस घटना से क्या समझ में आता है? राष्ट्रवाद केवल विचारों का आंदोलन नहीं था। भूख, बेरोज़गारी और शोषण भी लोगों को सड़कों पर लाते थे। और जब ग़रीब लोग सड़क पर आते थे, तो सेना बुलाई जाती थी। यह हिस्सा 1848 की क्रांति को समझने के लिए बहुत ज़रूरी है।
5.6 1848: उदारवादियों की क्रांति (भाग 3.3)
यह भाग दो हिस्सों में समझिए — पहला ग़रीबों की क्रांति, दूसरा पढ़े-लिखे मध्यवर्ग की क्रांति। दोनों एक साथ हुईं।
1848 में जब अनेक यूरोपीय देशों में ग़रीबी, बेरोज़गारी और भुखमरी से ग्रस्त किसान-मज़दूर विद्रोह कर रहे थे, तब उसके समानांतर पढ़े-लिखे मध्यवर्गों की एक क्रांति भी हो रही थी।
- फ़रवरी 1848 की घटनाओं से राजा को गद्दी छोड़नी पड़ी थी और एक गणतंत्र की घोषणा की गई जो सभी पुरुषों के सार्विक मताधिकार पर आधारित थी।
- यूरोप के अन्य भागों में जहाँ अभी तक स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में नहीं आए थे — जैसे जर्मनी, इटली, पोलैंड, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य — वहाँ के उदारवादी मध्यवर्गों के स्त्री-पुरुषों ने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया।
- उन्होंने बढ़ते जन असंतोष का फ़ायदा उठाया और एक राष्ट्र-राज्य के निर्माण की माँगों को आगे बढ़ाया।
- यह राष्ट्र-राज्य संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आज़ादी जैसे संसदीय सिद्धांतों पर आधारित था।
फ़्रैंकफ़र्ट संसद — यह अभ्यास प्रश्न 1-घ है, ध्यान से याद कीजिए
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| आरंभ | जर्मन इलाक़ों में बड़ी संख्या में राजनीतिक संगठनों ने फ़्रैंकफ़र्ट शहर में मिलकर एक सर्व-जर्मन नेशनल एसेंबली के पक्ष में मतदान का फ़ैसला लिया |
| तारीख़ और संख्या | 18 मई 1848 को, 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक सजे-धजे जुलूस में जाकर फ़्रैंकफ़र्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया |
| स्थान | यह संसद सेंट पॉल चर्च में आयोजित हुई |
| मुख्य काम | उन्होंने जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया |
| शासन-व्यवस्था | इस राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी गई जिसे संसद के अधीन रहना था |
| असफलता का कारण 1 | जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ़्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने की पेशकश की, तो उसने उसे अस्वीकार कर उन राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे |
| असफलता का कारण 2 | कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया, वहीं संसद का सामाजिक आधार कमज़ोर हो गया |
| असफलता का कारण 3 | संसद में मध्य वर्गों का प्रभाव अधिक था, जिन्होंने मज़दूरों और कारीगरों की माँगों का विरोध किया, जिससे वे उनका समर्थन खो बैठे |
| अंत | अंत में सैनिकों को बुलाया गया और एसेंबली भंग होने पर मजबूर हुई |
फ़्रैंकफ़र्ट संसद की असफलता से एक बड़ा सबक़ मिलता है। मध्यवर्ग ने राष्ट्र बनाने की बात तो की, पर मज़दूरों और कारीगरों को साथ नहीं लिया। इसलिए जब राजाओं और सेना ने हमला किया, तब आम लोग उनके साथ खड़े नहीं हुए। जो आंदोलन आम लोगों को साथ नहीं लेता, वह ताक़त के सामने टिक नहीं पाता।
महिलाओं की भूमिका — यह अभ्यास प्रश्न 1-ङ है
उदारवादी आंदोलन के अंदर महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्रदान करने का मुद्दा विवादास्पद था, हालाँकि आंदोलन में वर्षों से बड़ी संख्या में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया था।
महिलाओं ने क्या-क्या किया:
- अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए
- अख़बार शुरू किए
- राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में शिरकत की
इसके बावजूद उन्हें एसेंबली के चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित रखा गया था। जब सेंट पॉल चर्च में फ़्रैंकफ़र्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी, तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक-दीर्घा में खड़े होने दिया गया।
स्रोत-ग में तीन अलग-अलग राय दी गई हैं — इन्हें तुलना करके पढ़िए:
| कौन | क्या कहा |
|---|---|
| कार्ल वेल्कर (फ़्रैंकफ़र्ट संसद के निर्वाचित सदस्य) | “प्रकृति ने पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग कार्य करने के लिए निर्मित किया है… पुरुष ज़्यादा ताक़तवर है… महिला कमज़ोर, निर्भर और दब्बू है, उसे पुरुष की सुरक्षा की आवश्यकता है। उसका क्षेत्र घर, बच्चों की देखभाल और परिवार का पालन-पोषण है।” |
| लुइज़े ऑटो-पीटर्स (1819–95) — राजनीतिक कार्यकर्ता, जिसने महिलाओं की पत्रिका और एक नारीवादी राजनीतिक संगठन की स्थापना की | उसके अख़बार (21 अप्रैल, 1849) के प्रथम अंक में छपा — “आइए हम यह पूछें कि कितने पुरुष जो स्वतंत्रता के लिए जीने-मरने के विचारों से ओत-प्रोत हैं… स्वतंत्र पुरुषों को परतंत्रता से घिरे रहना मंज़ूर नहीं होना चाहिए।” |
| एक अनाम पाठक (25 जून 1850 का पत्र) | “महिलाओं को राजनैतिक अधिकारों से वंचित रखना बाक़ई बेतुका और अविवेकपूर्ण है जबकि उन्हें संपत्ति का अधिकार है… क्या यह लज्जा की बात नहीं कि सबसे मूर्ख मवेशी-पालक को मत देने का अधिकार सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि वह एक पुरुष है, जबकि अत्यंत क़ाबिल महिलाओं को… इसी हक़ से वंचित रखा जाता है?” |
इन तीन उद्धरणों से क्या साबित होता है? यह कि उदारवादी विचारधारा के भीतर भी महिलाओं के अधिकारों पर एकमत नहीं था। एक ही आंदोलन में एक सदस्य महिलाओं को घर तक सीमित रखना चाहता था और दूसरा उन्हें बराबर अधिकार देना चाहता था। इसलिए ‘उदारवाद’ का मतलब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं था।
1848 का असली नतीजा
यह हिस्सा बहुत महत्त्वपूर्ण है और अकसर विद्यार्थी छोड़ देते हैं।
हालाँकि रूढ़िवादी ताक़तें 1848 में उदारवादी आंदोलनों को दबा पाने में कामयाब हुईं, किंतु वे पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं कर पाईं।
राजाओं को यह समझ में आना शुरू हो गया था कि उदारवादी-राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों को रियायतें देकर ही क्रांति और दमन के चक्र को समाप्त किया जा सकता था।
इसका नतीजा क्या हुआ?
- 1848 के बाद के वर्षों में मध्य और पूर्वी यूरोप की निरंकुश राजशाहियों ने उन परिवर्तनों को आरंभ किया जो पश्चिमी यूरोप में 1815 से पहले हो चुके थे।
- हैब्सबर्ग अधिकार वाले क्षेत्रों और रूस में भूदासत्व और बंधुआ मज़दूरी समाप्त कर दी गई।
- हैब्सबर्ग शासकों ने हंगरी के लोगों को ज़्यादा स्वायत्तता प्रदान की, हालाँकि इससे निरंकुश मैग्यारों के प्रभुत्व का रास्ता ही साफ़ हुआ।
यानी 1848 की क्रांति ‘हार’ गई, पर ‘बेकार’ नहीं गई। क्रांति दब गई, लेकिन उसका डर इतना गहरा था कि राजाओं ने खुद ही सुधार करने शुरू कर दिए। यह इतिहास का एक ज़रूरी सबक़ है — कभी-कभी असफल आंदोलन भी बदलाव ले आते हैं।
6. जर्मनी और इटली का निर्माण (पाठ का भाग 4)
6.1 1848 के बाद बदलाव
1848 के बाद यूरोप में राष्ट्रवाद का जनतंत्र और क्रांति से अलगाव होने लगा।
राज्य की सत्ता को बढ़ाने और पूरे यूरोप पर राजनीतिक प्रभुत्व हासिल करने के लिए रूढ़िवादियों ने अकसर राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल किया।
इस एक वाक्य में पूरा मोड़ छिपा है। पहले राष्ट्रवाद क्रांतिकारियों का हथियार था; अब वह राजाओं का हथियार बन गया। यही कारण है कि जर्मनी और इटली का एकीकरण जनता की क्रांति से नहीं, बल्कि राजाओं और उनके मंत्रियों की कूटनीति और सेना से हुआ।
6.2 जर्मनी का एकीकरण — क्या सेना राष्ट्र की निर्माता हो सकती है? (भाग 4.1)
यह अभ्यास प्रश्न 4 है — ‘जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ।’ इसलिए यह पूरा भाग बहुत ध्यान से पढ़िए।
पहला प्रयास और उसकी विफलता:
- राष्ट्रवादी भावनाएँ मध्यवर्गीय जर्मन लोगों में काफ़ी व्याप्त थीं।
- उन्होंने 1848 में जर्मन महासंघ के विभिन्न इलाक़ों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया था।
- मगर राष्ट्र निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फ़ौज की ताक़त ने मिलकर दबा दी।
- उनका प्रशा के बड़े भूस्वामियों (Junkers) ने भी समर्थन किया।
दूसरा और सफल प्रयास — प्रशा का नेतृत्व:
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| नेतृत्व किसने लिया | प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व सँभाल लिया |
| मुख्य व्यक्ति | प्रमुख मंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क इस प्रक्रिया का जनक था |
| किसकी मदद ली | उसने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद ली |
| कैसे हुआ | सात वर्ष के दौरान ऑस्ट्रिया, डेन्मार्क और फ़्रांस से तीन युद्धों में प्रशा को जीत हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई |
| घोषणा | जनवरी 1871 में, वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया |
वर्साय के समारोह का दृश्य (पाठ्यपुस्तक इसे विस्तार से बताती है):
- 18 जनवरी 1871 की सुबह बेहद ठंडी थी।
- जर्मन राज्यों के राजकुमारों, सेना के प्रतिनिधियों और प्रमुख मंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क समेत प्रशा के महत्त्वपूर्ण मंत्रियों की एक बैठक वर्साय के महल के बेहद ठंडे शीशमहल (हॉल ऑफ़ मिरर्स) में हुई।
- सभा ने प्रशा के काइज़र विलियम प्रथम के नेतृत्व में नए जर्मन साम्राज्य की घोषणा की।
एकीकरण के बाद क्या हुआ:
- जर्मनी में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया ने प्रशा राज्य की शक्ति के प्रभुत्व को दर्शाया था।
- नए राज्य ने जर्मनी की मुद्रा, बैंकिंग और क़ानूनी तथा न्यायिक व्यवस्थाओं के आधुनिकीकरण पर काफ़ी ज़ोर दिया।
- प्रशा द्वारा उठाए क़दम और उसकी कार्रवाइयाँ बाक़ी जर्मनी के लिए अकसर एक मॉडल बना।
इस भाग का शीर्षक ही एक प्रश्न है — ‘क्या सेना राष्ट्र की निर्माता हो सकती है?’
उत्तर यह है कि जर्मनी में सचमुच ऐसा ही हुआ। 1848 में जनता ने संसद के रास्ते राष्ट्र बनाना चाहा और असफल रही; 1871 में सेना और कूटनीति के रास्ते राष्ट्र बन गया। लेकिन इसकी कीमत यह थी कि नया जर्मनी लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि प्रशा की सैन्य शक्ति के प्रभुत्व वाला राज्य बना।
6.3 इटली का एकीकरण (भाग 4.2)
एकीकरण से पहले इटली की हालत:
- जर्मनी की तरह इटली में भी राजनीतिक विखंडन का एक लंबा इतिहास था।
- इटली अनेक वंशानुगत राज्यों तथा बहु-राष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य में बिखरा हुआ था।
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली सात राज्यों में बँटा हुआ था जिनमें से केवल एक — सार्डिनिया पीडमॉण्ट — में एक इतालवी राजघराने का शासन था।
| क्षेत्र | किसके अधीन |
|---|---|
| उत्तरी भाग | ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्गों के अधीन |
| मध्य इलाक़े | पोप का शासन |
| दक्षिणी क्षेत्र | स्पेन के बूबों राजाओं के अधीन |
- इतालवी भाषा ने भी साझा रूप हासिल नहीं किया था और अभी तक उसके विविध क्षेत्रीय और स्थानीय रूप मौजूद थे।
एकीकरण की तीन कड़ियाँ — इन्हें क्रम से याद कीजिए:
(क) ज्युसेपे मेत्सिनी — विचार देने वाला
- 1830 के दशक में ज्युसेपे मेत्सिनी ने एकीकृत इतालवी गणराज्य के लिए एक सुविचारित कार्यक्रम प्रस्तुत करने की कोशिश की थी।
- उसने अपने उद्देश्यों के प्रसार के लिए ‘यंग इटली’ नामक एक गुप्त संगठन भी बनाया था।
- 1831 और 1848 में क्रांतिकारी विद्रोहों की असफलता के बाद ज़िम्मेदारी दूसरों पर आ गई।
(ख) काउंट कैमिलो दे कावूर — कूटनीति करने वाला (यह अभ्यास प्रश्न 1-ख है)
- युद्ध के ज़रिये इतालवी राज्यों को जोड़ने की ज़िम्मेदारी सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के शासक विक्टर इमेनुएल द्वितीय पर आ गई।
- इस क्षेत्र के शासक अभिजात वर्ग की नज़रों में एकीकृत इटली उनके लिए आर्थिक विकास और राजनीतिक प्रभुत्व की संभावनाएँ उत्पन्न करता था।
- मंत्री प्रमुख कावूर, जिसने इटली के प्रदेशों को एकीकृत करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया, न तो एक क्रांतिकारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखने वाला।
- इतालवी अभिजात वर्ग के तमाम अमीर और शिक्षित सदस्यों की तरह वह इतालवी भाषा से कहीं बेहतर फ़्रेंच बोलता था।
- फ़्रांस से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट की एक चतुर कूटनीतिक संधि, जिसके पीछे कावूर का हाथ था, से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट 1859 में ऑस्ट्रियाई बलों को हरा पाने में कामयाब हुआ।
कावूर के बारे में यह विरोधाभास ज़रूर लिखिए — जिस व्यक्ति ने इटली को एक किया, वह इतालवी से बेहतर फ़्रेंच बोलता था, और वह न क्रांतिकारी था न लोकतंत्रवादी। यह दिखाता है कि राष्ट्र-निर्माण हमेशा भावुक देशभक्ति से नहीं, कभी-कभी ठंडी कूटनीति से भी होता है।
(ग) ज्युसेपे गैरीबॉल्डी — लड़ने वाला (बॉक्स 2)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कौन | (1807–82), संभवतः इटली के स्वतंत्रता सेनानियों में सबसे मशहूर |
| पृष्ठभूमि | उसका संबंध एक ऐसे परिवार से था जो तटीय व्यापार में संलग्न था और वह स्वयं व्यापारिक नौसेना में एक नाविक था |
| 1833 | मेत्सिनी से मुलाक़ात; ‘यंग इटली’ आंदोलन से जुड़ा |
| 1834 | पीडमॉण्ट के गणतंत्रीय विद्रोह में भाग लिया; विद्रोह कुचल दिया गया और उसे दक्षिण अमेरिका भागना पड़ा, जहाँ वह 1848 तक निर्वासन में रहा |
| 1854 | उसने विक्टर इमेनुएल II का समर्थन किया, जो इतालवी राज्यों को एकीकृत करने का प्रयास कर रहा था |
| 1860 — सबसे प्रसिद्ध अभियान | गैरीबॉल्डी ने दक्षिण इटली की तरफ़ एक्सपिडिशन ऑफ़ द थाउज़ेंड (हज़ार लोगों का अभियान) का नेतृत्व किया। इस अभियान में नए स्वयंसेवक जुड़ते चले गए और उनकी संख्या लगभग 30,000 तक पहुँच गई। वे ‘रेड शर्ट्स’ के नाम से लोकप्रिय हुए |
| 1860 का परिणाम | वे दक्षिण इटली और दो सिसिलियों के राज्य में प्रवेश कर गए और स्पेनी शासकों को हटाने के लिए स्थानीय किसानों का समर्थन पाने में सफल रहे |
| 1867 | गैरीबॉल्डी के नेतृत्व में स्वयंसेवकों की एक सेना पेपल राज्यों से लड़ने रोम गई, जो इटली के एकीकरण में अंतिम बाधा थी। वहाँ एक फ़्रांसीसी सैनिक टुकड़ी तैनात थी और ‘रेड शर्ट्स’ फ़्रांसीसी और पेपल सैनिकों के सामने टिक नहीं पाए |
| 1870 — अंतिम कड़ी | जब प्रशा से युद्ध के दौरान फ़्रांस ने रोम से अपने सैनिक हटा लिए, तब जाकर पेपल राज्य अंततः इटली में सम्मिलित हुए |
1861 में इमेनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया।
एक बहुत ज़रूरी बात — आम लोग क्या जानते थे?
यह हिस्सा परीक्षा में बहुत काम आता है और विद्यार्थी को हैरान कर देता है।
पाठ्यपुस्तक लिखती है कि इटली के अधिकांश निवासी, जिनमें निरक्षरता की दर काफ़ी ऊँची थी, अभी भी उदारवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा से अनजान थे।
दक्षिणी इटली में जिन आम किसानों ने गैरीबॉल्डी को समर्थन दिया था, उन्होंने इटालिया (Italia) के बारे में कभी सुना ही नहीं था और वे मानते थे कि ला टालिया (La Talia) विक्टर इमेनुएल की पत्नी थी।
इस तथ्य को ज़रूर याद रखिए। जिस राष्ट्र के लिए वे लड़ रहे थे, उसका नाम तक उन्हें ठीक से नहीं पता था। यह दिखाता है कि ‘राष्ट्र’ का विचार पढ़े-लिखे वर्ग तक सीमित था और आम लोगों तक धीरे-धीरे पहुँचा।
6.4 ब्रिटेन की अजीब दास्तान (भाग 4.3)
यह अभ्यास प्रश्न ‘ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में किस प्रकार भिन्न था?’ का उत्तर है (चर्चा प्रश्न 4)।
मुख्य अंतर यह है: ब्रिटेन में राष्ट्र-राज्य का निर्माण अचानक हुई कोई उथल-पुथल या क्रांति का परिणाम नहीं था। यह एक लंबी चलने वाली प्रक्रिया का नतीजा था।
अठारहवीं सदी के पहले ब्रितानी राष्ट्र था ही नहीं।
ब्रितानी द्वीपसमूह में रहने वाले लोगों — अंग्रेज़, वेल्श, स्कॉट या आयरिश — की मुख्य पहचान नृजातीय (Ethnic) थी। इन सभी जातीय समूहों की अपनी सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपराएँ थीं।
फिर क्या हुआ? क्रम से समझिए:
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | जैसे-जैसे आंग्ल राष्ट्र की धन-दौलत, अहमियत और सत्ता में वृद्धि हुई, वह द्वीपसमूह के अन्य राष्ट्रों पर अपना प्रभुत्व बढ़ाने में सफल हुआ |
| 2 | 1688 में एक लंबे टकराव और संघर्ष के बाद आंग्ल संसद ने राजतंत्र से ताक़त छीन ली |
| 3 | इस संसद के माध्यम से एक राष्ट्र-राज्य का निर्माण हुआ जिसके केंद्र में इंग्लैंड था |
| 4 | 1707 में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच ‘ऐक्ट ऑफ़ यूनियन’ से ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन’ का गठन हुआ |
| 5 | इससे इंग्लैंड, व्यवहार में स्कॉटलैंड पर अपना प्रभुत्व जमा पाया; ब्रितानी संसद में आंग्ल सदस्यों का दबदबा रहा |
स्कॉटलैंड के साथ क्या हुआ?
- स्कॉटलैंड की ख़ास संस्कृति और राजनीतिक संस्थानों को योजनाबद्ध तरीक़े से दबाया गया।
- स्कॉटिश हाइलैंड्स के निवासी जिन कैथलिक कुलों ने जब भी अपनी आज़ादी को व्यक्त करने का प्रयास किया, उन्हें ज़बरदस्त दमन का सामना करना पड़ा।
- स्कॉटिश हाइलैंड्स के लोगों को अपनी गेलिक भाषा बोलने या अपनी राष्ट्रीय पोशाक पहनने की मनाही थी।
- उनमें से बहुत सारे लोगों को अपना वतन छोड़ने पर मजबूर किया गया।
आयरलैंड के साथ क्या हुआ?
- वह देश कैथलिक और प्रोटेस्टेंट धार्मिक गुटों में गहराई में बँटा हुआ था।
- अंग्रेज़ों ने आयरलैंड में प्रोटेस्टेंट धर्म मानने वालों को बहुसंख्यक कैथलिक देश पर प्रभुत्व बढ़ाने में सहायता की।
- ब्रितानी प्रभाव के विरुद्ध हुए कैथलिक विद्रोहों को निर्ममता से कुचल दिया गया।
- वोल्फ़ टोन और उसकी यूनाइटेड आयरिशमेन (1798) की अगुवाई में हुए असफल विद्रोह के बाद 1801 में आयरलैंड को बलपूर्वक यूनाइटेड किंगडम में शामिल कर लिया गया।
नए ‘ब्रितानी राष्ट्र’ का निर्माण कैसे हुआ?
- इस पर हावी आंग्ल संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया गया।
- नए ब्रिटेन के प्रतीक-चिह्नों, ब्रितानी झंडा (यूनियन जैक) और राष्ट्रीय गान (गॉड सेव अवर नोबल किंग) को ख़ूब बढ़ावा दिया गया।
- और पुराने राष्ट्र इस संघ में मातहत सहयोगी के रूप में ही रह पाए।
इसीलिए इस भाग का शीर्षक ‘ब्रिटेन की अजीब दास्तान’ है। बाक़ी यूरोप में राष्ट्र क्रांति और जनता की इच्छा से बने; ब्रिटेन में राष्ट्र एक राष्ट्र के दूसरे राष्ट्रों पर प्रभुत्व से बना। यानी वहाँ राष्ट्र-निर्माण और आंतरिक उपनिवेशवाद साथ-साथ चले।
7. राष्ट्र की दृश्य-कल्पना (पाठ का भाग 5)
यह भाग छोटा है, पर परीक्षा में बहुत पूछा जाता है (अभ्यास प्रश्न 3)।
7.1 समस्या क्या थी?
पाठ्यपुस्तक एक बहुत अच्छा प्रश्न उठाती है — “किसी शासक को एक चित्र या मूर्ति के रूप में अभिव्यक्त करना आसान है, किंतु एक राष्ट्र को चेहरा कैसे दिया जा सकता है?”
यानी राजा को तो चित्र में दिखा सकते हैं, क्योंकि वह एक व्यक्ति है। लेकिन ‘राष्ट्र’ तो एक विचार है — उसका चित्र कैसे बनाया जाए?
7.2 समाधान — नारी रूपक
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में कलाकारों ने राष्ट्र का मानवीकरण करके इस प्रश्न को हल किया।
- दूसरे शब्दों में, उन्होंने एक देश को कुछ यूँ चित्रित किया जैसे वह कोई व्यक्ति हो।
- उस समय राष्ट्रों को नारी भेष में प्रस्तुत किया जाता था।
- राष्ट्र को व्यक्ति का जामा पहनाते हुए जिस नारी रूप को चुना गया, वह असल जीवन में कोई ख़ास महिला नहीं थी।
- यह तो राष्ट्र के अमूर्त विचार को ठोस रूप प्रदान करने का प्रयास था।
- यानी नारी की छवि राष्ट्र का रूपक बन गई।
रूपक क्या होता है? (पाठ्यपुस्तक का ‘नए शब्द’ बॉक्स) — जब किसी अमूर्त विचार (जैसे लालच, ईर्ष्या, स्वतंत्रता, मुक्ति) को किसी व्यक्ति या किसी चीज़ के ज़रिए इंगित किया जाता है। एक रूपकात्मक कहानी के दो अर्थ होते हैं — एक शाब्दिक और एक प्रतीकात्मक।
7.3 फ़्रांस की मारीआन और जर्मनी की जर्मेनिया
इन दोनों के बारे में प्रश्न सीधे पूछा जाता है, इसलिए तालिका याद कीजिए।
| मारीआन (फ़्रांस) | जर्मेनिया (जर्मनी) | |
|---|---|---|
| नाम कैसे पड़ा | लोकप्रिय ईसाई नाम दिया गया, जिसने जन-राष्ट्र के विचार को रेखांकित किया | जर्मन राष्ट्र का रूपक |
| चिह्न | लाल टोपी, तिरंगा और कलगी — ये स्वतंत्रता और गणतंत्र के चिह्न थे | बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट, क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है |
| कहाँ दिखाई गई | प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौकों पर लगाई गईं ताकि जनता को एकता के राष्ट्रीय प्रतीक की याद आती रहे और लोग उससे तादात्म्य स्थापित कर सकें; छवि सिक्कों और डाक टिकटों पर भी अंकित की गई | चित्रों में — विशेषकर फ़िलिप वेट (1848) और लॉरेन्ज़ क्लासेन (1860) के चित्रों में |
फ़्रांसीसी क्रांति के दौरान भी कलाकारों ने स्वतंत्रता, न्याय और गणतंत्र जैसे विचारों को व्यक्त करने के लिए नारी रूपक का प्रयोग किया था। उदाहरण के लिए —
- स्वतंत्रता का प्रतीक — लाल टोपी या टूटी ज़ंजीर
- इंसाफ़ का प्रतीक — एक ऐसी महिला जिसकी आँखों पर पट्टी बँधी हुई है और वह तराजू लिए हुए है
7.4 जर्मेनिया के प्रतीकों के अर्थ (बॉक्स 3) — यह तालिका सीधे परीक्षा में आती है
| गुण (प्रतीक) | उसका महत्त्व (अर्थ) |
|---|---|
| टूटी हुई बेड़ियाँ | आज़ादी मिलना |
| बाज़-छाप कवच | जर्मन साम्राज्य की प्रतीक-शक्ति |
| बलूत पत्तियों का मुकुट | बहादुरी |
| तलवार | मुक़ाबले की तैयारी |
| तलवार पर लिपटी जैतून की डाली | शांति की चाह |
| काला, लाल और सुनहरा तिरंगा | 1848 में उदारवादी-राष्ट्रवादियों का झंडा, जिसे जर्मन राज्यों के ड्यूक्स ने प्रतिबंधित घोषित कर दिया |
| उगते सूर्य की किरणें | एक नए युग का सूत्रपात |
दो और महत्त्वपूर्ण चित्र:
- चित्र 18 — ‘द फ़ॉलेन जर्मेनिया’ (हताश जर्मेनिया), जूलियस ह्यूबनर, 1850। यह चित्र 1848 की क्रांति की असफलता के बाद की निराशा को दिखाता है।
- चित्र 19 — ‘जर्मेनिया गार्डिंग द राइन’ (राइन नदी पर पहरा देती जर्मेनिया), लॉरेन्ज़ क्लासेन, 1860। जर्मेनिया की तलवार पर खुदा हुआ है — ‘जर्मन तलवार जर्मन राइन की रक्षा करती है।’
इन तीन चित्रों को साथ रखकर देखिए — 1848 में जर्मेनिया आशा से भरी है (फ़िलिप वेट), 1850 में वह हताश और गिरी हुई है (ह्यूबनर), और 1860 में वह तलवार लिए पहरा देती है (क्लासेन)। यानी चित्रों से भी इतिहास पढ़ा जा सकता है।
8. राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद (पाठ का भाग 6)
यह अध्याय का अंतिम और सबसे गंभीर भाग है।
8.1 राष्ट्रवाद का बदला हुआ चेहरा
उन्नीसवीं सदी की अंतिम चौथाई तक राष्ट्रवाद का वह आदर्शवादी उदारवादी-जनतांत्रिक स्वभाव नहीं रहा जो सदी के प्रथम भाग में था।
अब राष्ट्रवाद सीमित लक्ष्यों वाला संकीर्ण सिद्धांत बन गया।
- इस बीच के दौर में राष्ट्रवादी समूह एक-दूसरे के प्रति अनुदार होते चले गए और लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
- साथ ही प्रमुख यूरोपीय शक्तियों ने भी अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अधीन लोगों की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं का इस्तेमाल किया।
यह मोड़ बहुत ज़रूरी है। शुरू में राष्ट्रवाद कहता था “हम आज़ाद होना चाहते हैं।” अब वह कहने लगा “हम दूसरों से बड़े हैं।” पहला विचार मुक्ति देता है, दूसरा युद्ध की ओर ले जाता है।
8.2 बाल्कन क्षेत्र — यूरोप का ‘बारूद का ढेर’
यह चर्चा प्रश्न 5 है — ‘बाल्कन प्रदेशों में राष्ट्रवादी तनाव क्यों पनपा?’ — इसलिए इसे पूरा याद कीजिए।
1871 के बाद यूरोप में गंभीर राष्ट्रवादी तनाव का स्रोत बाल्कन क्षेत्र था।
बाल्कन क्षेत्र में कौन-कौन शामिल था? आधुनिक रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्बेनिया, यूनान, मेसिडोनिया, क्रोएशिया, बोस्निया-हर्ज़ेगोविना, स्लोवेनिया, सर्बिया और मॉन्टिनिग्रो। क्षेत्र के निवासियों को आमतौर पर स्लाव पुकारा जाता था।
तनाव के कारण — इन्हें क्रम से लिखिए:
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | इस क्षेत्र में भौगोलिक और जातीय भिन्नता थी |
| 2 | बाल्कन क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा ऑटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था |
| 3 | बाल्कन क्षेत्र में रूमानी राष्ट्रवाद के विचारों के फैलने और ऑटोमन साम्राज्य के विघटन से स्थिति काफ़ी विस्फोटक हो गई |
| 4 | उन्नीसवीं सदी में ऑटोमन साम्राज्य ने आधुनिकीकरण और आंतरिक सुधारों के ज़रिए मज़बूत बनना चाहा था, किंतु इसमें उसे बहुत कम सफलता मिली |
| 5 | एक के बाद एक उसके अधीन यूरोपीय राष्ट्रीयताएँ उसके चंगुल से निकल कर स्वतंत्रता की घोषणा करने लगीं |
| 6 | बाल्कन लोगों ने आज़ादी या राजनीतिक अधिकारों के अपने दावों को राष्ट्रीयता का आधार दिया। उन्होंने इतिहास का इस्तेमाल यह साबित करने के लिए किया कि वे कभी स्वतंत्र थे, किंतु तत्पश्चात विदेशी शक्तियों ने उन्हें अधीन कर लिया |
| 7 | बाल्कन राज्य एक-दूसरे से भारी ईर्ष्या करते थे और हर एक राज्य अपने लिए ज़्यादा से ज़्यादा इलाक़ा हथियाने की उम्मीद रखता था |
| 8 | बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा — इस समय यूरोपीय शक्तियों के बीच व्यापार, और उपनिवेशों के साथ नौसैनिक और सैन्य ताक़त के लिए गहरी प्रतिस्पर्धा थी |
| 9 | रूस, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रो-हंगरी की हर ताक़त बाल्कन पर अन्य शक्तियों की पकड़ को कमज़ोर करके क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहती थी |
| परिणाम | इससे इस इलाक़े में कई युद्ध हुए और अंततः प्रथम विश्व युद्ध हुआ |
इस पूरी सूची का सार एक वाक्य में: बाल्कन में छोटे राष्ट्रवाद आपस में लड़ रहे थे, और बड़ी शक्तियाँ उनका इस्तेमाल कर रही थीं। यही मिश्रण 1914 में प्रथम विश्व युद्ध तक ले गया।
8.3 अंतिम निष्कर्ष
साम्राज्यवाद से जुड़कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया।
लेकिन इस बीच विश्व के अनेक देशों ने, जिनका उन्नीसवीं सदी में यूरोपीय शक्तियों ने औपनिवेशीकरण किया था, साम्राज्यवादी प्रभुत्व का विरोध करने लगे।
- हर तरफ़ जो साम्राज्य-विरोधी आंदोलन विकसित हुए इस अर्थ में राष्ट्रवादी थे कि वे सभी स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य का निर्माण करने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
- वे सभी एक सामूहिक राष्ट्रीय एकता की भावना से प्रेरित थे जो साम्राज्यवाद-विरोध की प्रक्रिया में उभरी।
- राष्ट्रवाद के यूरोपीय विचार कहीं और नहीं दोहराए गए, क्योंकि हर जगह लोगों ने अपनी तरह का विशिष्ट राष्ट्रवाद विकसित किया।
- मगर यह विचार कि समाजों को ‘राष्ट्र-राज्यों’ में गठित किया जाना चाहिए, अब स्वाभाविक और सार्वभौम मान लिया गया।
यह अंतिम वाक्य पूरे अध्याय का समापन है और अगले अध्याय की भूमिका भी।
राष्ट्र-राज्य का विचार यूरोप में जन्मा, पर वहीं नहीं रुका। वह उपनिवेशों तक पहुँचा — और वहाँ वह साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ हथियार बन गया। भारत में भी यही हुआ, और वही अगले अध्याय ‘भारत में राष्ट्रवाद’ का विषय है।
9. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
यह भाग सबसे ज़्यादा काम आएगा। जब भी कोई शब्द समझ न आए, यहाँ देखिए।
9.1 पाठ्यपुस्तक के ‘नए शब्द’ बॉक्स से
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निरंकुशवाद (Absolutism) | ऐसी सरकार या शासन व्यवस्था जिसकी सत्ता पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होता। इतिहास में ऐसी राजशाही सरकारों को निरंकुश सरकार कहा जाता है जो अत्यंत केंद्रीकृत, सैन्य बल पर आधारित और दमनकारी सरकारें होती थीं। |
| कल्पनादर्शी (युटोपिया) | एक ऐसे समाज की कल्पना जो इतना आदर्श है कि उसका साकार होना लगभग असंभव होता है। |
| जनमत-संग्रह | एक प्रत्यक्ष मतदान जिसके ज़रिए एक क्षेत्र के सभी लोगों से एक प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए पूछा जाता है। |
| रूढ़िवाद | ऐसा राजनीतिक दर्शन जो परंपरा, स्थापित संस्थानों और रिवाज़ों पर ज़ोर देता है और तेज़ बदलावों की बजाय क्रमिक और धीरे-धीरे विकास को प्राथमिकता देता है। |
| नारीवाद | स्त्री-पुरुष की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समानता की सोच के आधार पर महिलाओं के अधिकारों और हितों का बोध। |
| विचारधारा | एक ख़ास प्रकार की सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि को इंगित करने वाले विचारों का समूह। |
| नृजातीय (Ethnic) | एक साझा नस्ली, जनजातीय या सांस्कृतिक उद्गम अथवा पृष्ठभूमि जिसे कोई समुदाय अपनी पहचान मानता है। |
| रूपक | जब किसी अमूर्त विचार (जैसे लालच, ईर्ष्या, स्वतंत्रता, मुक्ति) को किसी व्यक्ति या किसी चीज़ के ज़रिए इंगित किया जाता है। एक रूपकात्मक कहानी के दो अर्थ होते हैं — एक शाब्दिक और एक प्रतीकात्मक। |
9.2 पाठ में आए अन्य कठिन शब्द
| शब्द | आसान अर्थ |
|---|---|
| राष्ट्रवाद | यह भावना कि हम सब एक हैं, हमारा एक साझा इतिहास और साझी पहचान है, और हमें अपना एक अलग देश चाहिए |
| राष्ट्र-राज्य | ऐसा राज्य जिसमें न केवल उसके शासकों बल्कि उसके अधिकांश नागरिकों में भी एक साझा पहचान और साझा इतिहास या विरासत की भावना हो |
| प्रभुसत्ता | सर्वोच्च सत्ता; यानी वह ताक़त जिसके ऊपर कोई और ताक़त न हो |
| उदारवाद (Liberalism) | लातिन शब्द liber (‘आज़ाद’) से बना; इसका मतलब है व्यक्ति की आज़ादी और क़ानून के समक्ष सबकी बराबरी |
| मताधिकार (Suffrage) | वोट देने का अधिकार |
| सार्विक मताधिकार | सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार |
| संवैधानिक राजतंत्र | ऐसी व्यवस्था जिसमें राजा तो होता है, पर वह संविधान के अनुसार शासन करता है |
| कुलीन वर्ग (Aristocracy) | ज़मीन के मालिक, ऊँचे ख़ानदान के लोग जो समाज पर हावी थे |
| भूदास | ऐसा किसान जो ज़मीन के साथ बँधा होता था और ज़मीन के मालिक की सेवा करने को मजबूर था |
| भूदासत्व | भूदास होने की व्यवस्था |
| श्रेणी-संघ | कारीगरों का संगठन, जो यह तय करता था कि कौन क्या बना सकता है |
| सेंसरशिप | सरकार द्वारा अख़बारों, किताबों, नाटकों और गीतों पर लगाई जाने वाली रोक |
| ज़ॉल्वेराइन (Zollverein) | 1834 में प्रशा की पहल पर बना शुल्क संघ, जिसने जर्मन राज्यों के बीच व्यापार आसान किया |
| डची (Duchy) | ड्यूक द्वारा शासित छोटा राज्य |
| कैंटन (Canton) | स्विट्ज़रलैंड का एक प्रशासनिक क्षेत्र |
| रूमानीवाद | एक सांस्कृतिक आंदोलन जो तर्क की जगह भावना, अंतर्दृष्टि और लोक-संस्कृति पर ज़ोर देता था |
| दास वोल्क (das volk) | जर्मन शब्द; अर्थ — आम लोग |
| फोल्कगाइस्ट (volkgeist) | जर्मन शब्द; अर्थ — राष्ट्र की आत्मा |
| हेलेनिज़्म (Hellenism) | प्राचीन यूनानी संस्कृति के प्रति लगाव |
| निर्वासन | अपने देश से निकाल दिया जाना |
| कार्बोनारी | इटली का एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन |
| जुंकर (Junkers) | प्रशा के बड़े भूस्वामी |
| काइज़र | जर्मन सम्राट की उपाधि |
| पेपल राज्य | इटली के वे क्षेत्र जिन पर पोप का शासन था |
| यूनियन जैक | ब्रिटेन का राष्ट्रीय झंडा |
| स्लाव | बाल्कन क्षेत्र के निवासियों के लिए प्रयुक्त सामान्य नाम |
10. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ — एक नज़र में
नीचे दी गई तिथियाँ पाठ्यपुस्तक के ‘कुछ महत्त्वपूर्ण तिथियाँ’ बॉक्स और पाठ दोनों से ली गई हैं।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1688 | आंग्ल संसद ने राजतंत्र से ताक़त छीन ली |
| 1707 | ऐक्ट ऑफ़ यूनियन — ‘यूनाइटेड किंगडम ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन’ का गठन |
| 1789 | फ़्रांसीसी क्रांति की शुरुआत — राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति |
| 1797 | नेपोलियन का इटली पर हमला; नेपोलियाई युद्धों की शुरुआत |
| 1798 | वोल्फ़ टोन की यूनाइटेड आयरिशमेन का असफल विद्रोह |
| 1801 | आयरलैंड को बलपूर्वक यूनाइटेड किंगडम में शामिल किया गया |
| 1804 | नेपोलियन की नागरिक संहिता |
| 1814–1815 | नेपोलियन का पतन; वियना शांति संधि |
| 1821 | यूनानी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष प्रारंभ |
| 1831 | रूस के विरुद्ध पोलिश विद्रोह (कुचल दिया गया) |
| 1832 | कुस्तुनतुनिया की संधि — यूनान को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता |
| 1833 | गैरीबॉल्डी की मेत्सिनी से मुलाक़ात; ‘यंग इटली’ से जुड़ाव |
| 1834 | ज़ॉल्वेराइन (शुल्क संघ) की स्थापना |
| जुलाई 1830 | फ़्रांस में जुलाई क्रांति; बेल्जियम नीदरलैंड्स से अलग हुआ |
| 1845 | सिलेसिया के बुनकरों का विद्रोह |
| 1848 | फ़्रांस में क्रांति; मध्यवर्ग द्वारा संविधान और प्रतिनिधित्वात्मक सरकार की माँग; 18 मई को फ़्रैंकफ़र्ट संसद |
| 1859–1870 | इटली का एकीकरण |
| 1861 | विक्टर इमेनुएल द्वितीय एकीकृत इटली का राजा घोषित |
| 1866–1871 | जर्मनी का एकीकरण |
| 18 जनवरी 1871 | वर्साय के शीशमहल में जर्मन साम्राज्य की घोषणा; विलियम प्रथम सम्राट |
| 1905 | हैब्सबर्ग और ऑटोमन साम्राज्यों में स्लाव राष्ट्रवाद मज़बूत होता है |
| 1914 | प्रथम विश्व युद्ध |
11. महत्त्वपूर्ण व्यक्ति — एक नज़र में
| व्यक्ति | कौन थे / क्या किया |
|---|---|
| फ़्रेडरिक सॉर्र्यू | फ़्रांसीसी कलाकार जिसने 1848 में चार चित्रों की शृंखला बनाई, जिसमें ‘जनतांत्रिक और सामाजिक गणतंत्रों’ का सपना दिखाया |
| अर्न्स्ट रेनन (1823–92) | फ़्रांसीसी दार्शनिक; 1882 में सॉर्बोन में ‘राष्ट्र क्या है?’ पर व्याख्यान; कहा कि राष्ट्र का अस्तित्व ‘रोज़ का जनमत-संग्रह’ है |
| नेपोलियन बोनापार्ट | फ़्रांस में राजतंत्र वापस लाया, पर 1804 की नागरिक संहिता से प्रशासनिक सुधार किए |
| ड्यूक मैटरनिख | ऑस्ट्रिया का चांसलर; 1815 की वियना कांग्रेस का मेज़बान; रूढ़िवाद का सबसे बड़ा प्रतिनिधि |
| ज्युसेपे मेत्सिनी (जन्म 1805, जेनोआ) | इतालवी क्रांतिकारी; ‘यंग इटली’ और ‘यंग यूरोप’ के संस्थापक; मैटरनिख ने उसे ‘हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे ख़तरनाक दुश्मन’ कहा |
| लुई फ़िलिप | 1830 की जुलाई क्रांति के बाद फ़्रांस का संवैधानिक राजा; 1848 में भागने पर मजबूर |
| लॉर्ड बायरन | अंग्रेज़ कवि; यूनानी स्वतंत्रता संग्राम के लिए धन इकट्ठा किया और लड़ने गए; 1824 में बुख़ार से मृत्यु |
| योहान गॉटफ़्रीड | जर्मन दार्शनिक; कहा कि सच्ची जर्मन संस्कृति आम लोगों (das volk) में निहित है |
| ग्रिम बंधु (जैकब और विल्हेल्म) | लोककथाओं का संग्रह (पहला संग्रह 1812) और 33 खंडों का जर्मन शब्दकोश |
| कैरोल कुर्पिंस्की | पोलिश संगीतकार; पोलोनेस और माजुरका को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया |
| विल्हेम वोल्फ़ | पत्रकार जिसने सिलेसिया के बुनकर विद्रोह का विवरण लिखा |
| फ़्रेडरिख लिस्ट | ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर; ज़ॉल्वेराइन के समर्थक |
| कार्ल वेल्कर | फ़्रैंकफ़र्ट संसद के सदस्य; महिलाओं को घर तक सीमित रखने के पक्षधर |
| लुइज़े ऑटो-पीटर्स (1819–95) | राजनीतिक कार्यकर्ता; महिलाओं की पत्रिका और नारीवादी संगठन की स्थापना |
| ऑटो वॉन बिस्मार्क | प्रशा का प्रमुख मंत्री; जर्मन एकीकरण का जनक |
| विलियम प्रथम | प्रशा का राजा; 18 जनवरी 1871 को जर्मनी का सम्राट (काइज़र) घोषित |
| विक्टर इमेनुएल द्वितीय | सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का शासक; 1861 में एकीकृत इटली का राजा |
| काउंट कैमिलो दे कावूर | सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का मंत्री प्रमुख; कूटनीति से इटली का एकीकरण; न क्रांतिकारी था न जनतंत्रवादी; फ़्रेंच बेहतर बोलता था |
| ज्युसेपे गैरीबॉल्डी (1807–82) | ‘रेड शर्ट्स’ का नेता; 1860 में ‘हज़ार लोगों का अभियान’; दक्षिण इटली को जोड़ा |
| वोल्फ़ टोन | यूनाइटेड आयरिशमेन (1798) का नेता |
| फ़्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ | प्रशा का राजा जिसने फ़्रैंकफ़र्ट संसद का ताज अस्वीकार किया |
| फ़िलिप वेट | चित्रकार; 1848 में ‘जर्मेनिया’ का चित्र बनाया |
| जूलियस ह्यूबनर | चित्रकार; 1850 में ‘द फ़ॉलेन जर्मेनिया’ |
| लॉरेन्ज़ क्लासेन | चित्रकार; 1860 में ‘जर्मेनिया गार्डिंग द राइन’ |