अध्याय 1यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

शिक्षक संदर्शिका16 मिनट

यह फ़ाइल विद्यार्थियों के लिए नहीं है। यह उस शिक्षक के लिए है जो कमज़ोर बुनियाद वाले विद्यार्थियों को यह अध्याय पढ़ा रहा है।

इसमें चार चीज़ें हैं — अध्याय की असली संरचना, वे बिंदु जहाँ बच्चे अटकते हैं, कक्षा में पूछे जाने वाले कठिन प्रश्नों के उत्तर, और विषय की वह गहराई जो शिक्षक को पता होनी चाहिए, भले ही कक्षा में पूरी न बताई जाए।


भाग 1 — अध्याय की असली संरचना (जो विषय-सूची से नहीं दिखती)

पाठ्यपुस्तक के छह शीर्षक हैं, पर कहानी की असली रीढ़ चार चरणों की है। अगर आप इन चार चरणों को बोर्ड पर एक बार बना दें, तो बच्चा पूरे अध्याय में कभी नहीं भटकेगा।

चरणक्या हुआमुख्य वर्ष
1. विचार का जन्मफ़्रांसीसी क्रांति ने कहा कि देश राजा का नहीं, जनता का है; नेपोलियन की सेनाएँ यह विचार पूरे यूरोप में ले गईं1789–1815
2. विचार को दबाने की कोशिशनेपोलियन की हार के बाद राजाओं ने वियना संधि करके पुरानी व्यवस्था लौटानी चाही; सेंसरशिप लागू हुई; क्रांतिकारी भूमिगत हो गए1815–1830
3. विचार का फूटना1830 और 1848 की क्रांतियाँ; संस्कृति (गीत, कथा, भाषा) के ज़रिए राष्ट्रीय भावना का फैलना; भूख और बेरोज़गारी से जन-विद्रोह1830–1848
4. विचार का राज्य बनना — और बिगड़नाजर्मनी और इटली का एकीकरण (पर सेना और कूटनीति से, जनता की क्रांति से नहीं); फिर राष्ट्रवाद का संकीर्ण होकर साम्राज्यवाद से जुड़ना1848–1914

शैक्षणिक निहितार्थ: कमज़ोर विद्यार्थी को सबसे बड़ी दिक़्क़त यह होती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह कहानी में कहाँ खड़ा है। इसलिए हर कालांश के शुरू में यह चार-खानों वाली तालिका बोर्ड के कोने में बना दीजिए और उस दिन जिस चरण की बात हो रही है, उस पर निशान लगा दीजिए। यह छोटी-सी आदत सबसे ज़्यादा फ़र्क़ डालती है।

भाग 2 — वे नौ जगहें जहाँ बच्चे सबसे ज़्यादा अटकते हैं

अटकाव 1 — ‘राष्ट्र’ और ‘राज्य’ का फ़र्क़ समझ नहीं आता

समस्या: बच्चा ‘देश’, ‘राज्य’, ‘राष्ट्र’ और ‘साम्राज्य’ को एक ही चीज़ समझता है। हिंदी में ‘राज्य’ शब्द ‘state’ और ‘प्रांत’ दोनों के लिए इस्तेमाल होता है, इससे भ्रम और बढ़ता है।

उपाय: बोर्ड पर यह सरल भेद बनाइए —

  • साम्राज्य = एक राजा, अनेक तरह के लोग, जो आपस में जुड़े नहीं हैं (जैसे हैब्सबर्ग साम्राज्य)
  • राष्ट्र = वे लोग जो ख़ुद को एक मानते हैं
  • राष्ट्र-राज्य = जब वैसे लोग अपनी सरकार और सीमा बना लें

फिर पूछिए — “भारत इनमें से क्या है? और 1947 से पहले क्या था?” इस एक प्रश्न से पूरी अवधारणा बैठ जाती है।

अटकाव 2 — ‘उदारवाद’ और ‘रूढ़िवाद’ आपस में गड्डमड्ड हो जाते हैं

समस्या: दोनों शब्द अपरिचित हैं और दोनों ‘वाद’ पर ख़त्म होते हैं।

उपाय: शब्द की जड़ से शुरू कीजिए। उदारवाद में ‘उदार’ है, यानी खुला — और उसका मूल लातिन शब्द liber है, जिसका अर्थ ‘आज़ाद’ है। रूढ़िवाद में ‘रूढ़ि’ है, यानी पुरानी परंपरा।

फिर एक वाक्य में अंतर लिखवाइए — उदारवादी कहते थे “बदलो”, रूढ़िवादी कहते थे “बचाओ”। यह एक वाक्य पूरे अध्याय में काम आता है।

अटकाव 3 — नेपोलियन ‘अच्छा’ था या ‘बुरा’?

समस्या: बच्चा हर व्यक्ति को अच्छे या बुरे खाने में डालना चाहता है, और नेपोलियन दोनों में नहीं बैठता।

उपाय: यहाँ अच्छा-बुरा का खाना ही तोड़ दीजिए। बोर्ड पर दो कॉलम बनाइए — “जो अच्छा किया” (नागरिक संहिता, भू-दासत्व की समाप्ति, समान क़ानून, बेहतर यातायात) और “जो बुरा किया” (राजतंत्र वापस लाया, कर बढ़ाए, सेंसरशिप, जबरन भर्ती)।

फिर कहिए — “इतिहास में ज़्यादातर लोग दोनों कॉलम में होते हैं। इतिहास पढ़ने का मतलब ही दोनों कॉलम देखना है।” यह वाक्य बच्चे को जीवन भर काम आता है।

अटकाव 4 — बहुत सारे नाम याद नहीं रहते

समस्या: मेत्सिनी, कावूर, गैरीबॉल्डी, बिस्मार्क, मैटरनिख, विक्टर इमेनुएल — बच्चा घबरा जाता है।

उपाय: नाम अकेले याद नहीं होते, काम के साथ होते हैं। हर नाम के साथ एक क्रिया जोड़ दीजिए —

  • मेत्सिनी — सोचा (विचार दिया)
  • कावूर — जोड़ा (कूटनीति की)
  • गैरीबॉल्डी — लड़ा (सेना ले गया)
  • बिस्मार्क — बनाया (जर्मनी बनाया)
  • मैटरनिख — रोका (पुरानी व्यवस्था बचाई)

फिर “मन का गीत” वाला सूत्र दीजिए — मेत्सिनी, कावूर, गीरीबॉल्डी। (यह 04-Revision फ़ाइल में भी दिया गया है।)

अटकाव 5 — तारीख़ों की भीड़

समस्या: अध्याय में तीस से ज़्यादा तारीख़ें हैं और बच्चा सब याद करने की कोशिश में सब भूल जाता है।

उपाय: केवल चार तारीख़ें पक्की करवाइए — 1789, 1815, 1848, 1871। बाक़ी सब इनके आगे-पीछे बैठ जाती हैं।

फिर हर तारीख़ को एक शब्द दीजिए — 1789 क्रांति, 1815 वापसी, 1848 विस्फोट, 1871 एकीकरण।

अटकाव 6 — नक़्शे में देश पहचान नहीं आते

समस्या: बच्चे को पता ही नहीं कि प्रशा, ऑस्ट्रिया, पीडमॉण्ट या सिलेसिया कहाँ हैं, इसलिए घटनाएँ हवा में लगती हैं।

उपाय: पहले केवल तीन साम्राज्य पहचनवाइए — रूसी (सबसे बड़ा, पूरब में), ऑस्ट्रियाई (बीच में), ऑटोमन (दक्षिण-पूरब में)। इन तीनों के बीच में ही बाक़ी सब कुछ है। इटली को जूते के आकार से और ग्रेट ब्रिटेन को द्वीप होने से पहचनवाइए।

अटकाव 7 — ‘रूपक’ समझ नहीं आता

समस्या: यह एक अमूर्त साहित्यिक अवधारणा है।

उपाय: कक्षा के भीतर से उदाहरण लीजिए। पूछिए — “तराजू क्या दिखाता है?” (न्याय)। “कबूतर क्या दिखाता है?” (शांति)। “तिरंगे का केसरिया रंग क्या दिखाता है?” फिर कहिए — “जब कोई चीज़ किसी विचार को दिखाने लगे, तो उसे रूपक कहते हैं। जर्मेनिया भी वैसी ही है।”

अटकाव 8 — लंबे उत्तर लिखने में डर लगता है

समस्या: बच्चा 4 अंक का प्रश्न देखकर घबरा जाता है और दो पंक्तियाँ लिखकर छोड़ देता है।

उपाय: उत्तर का साँचा दीजिए, फिर भरवाइए। बोर्ड पर लिखिए —

पंक्ति 1 — भूमिका (प्रश्न को ही वाक्य में बदल दीजिए) पंक्ति 2–5 — चार बिंदु, हर बिंदु अलग पंक्ति में अंतिम पंक्ति — निष्कर्ष

फिर 05-Question-Bank के मॉडल उत्तर दिखाकर कहिए — “देखिए, यह उत्तर भी इसी साँचे में बना है।” तीन बार यह अभ्यास कराने से डर निकल जाता है।

अटकाव 9 — बच्चे को लगता है यह “हमारा इतिहास नहीं है”

समस्या: यूरोप, जर्मनी, इटली — बच्चे को यह सब दूर की और बेकार की बात लगती है।

उपाय: अध्याय के पहले दिन ही जोड़ बना दीजिए। कहिए — “यही विचार आगे चलकर भारत पहुँचा, और उसी से हमारा स्वतंत्रता संग्राम बना। अगला अध्याय उसी के बारे में है।” और अंत में अध्याय का आख़िरी वाक्य पढ़वाइए — “राष्ट्रवाद के यूरोपीय विचार कहीं और नहीं दोहराए गए, क्योंकि हर जगह लोगों ने अपनी तरह का विशिष्ट राष्ट्रवाद विकसित किया।” इससे बच्चे को लगता है कि उसकी अपनी कहानी भी इसमें है।

भाग 3 — कक्षा में पूछे जाने वाले कठिन प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न: अगर 1848 की क्रांति असफल रही, तो उसे पढ़ने का क्या फ़ायदा? उत्तर: क्योंकि वह असफल तो हुई, पर बेकार नहीं गई। पाठ्यपुस्तक साफ़ कहती है कि रूढ़िवादी ताक़तें आंदोलन दबा तो पाईं, “किंतु वे पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं कर पाईं।” उसके बाद ही भूदासत्व और बंधुआ मज़दूरी समाप्त हुई। यानी डर से भी सुधार आते हैं।

प्रश्न: जर्मनी और इटली एक जैसे क्यों नहीं बने? उत्तर: दोनों में मुख्य राज्य अलग तरह के थे। जर्मनी में प्रशा एक मज़बूत सैन्य शक्ति थी, इसलिए वहाँ एकीकरण युद्धों से हुआ। इटली में सार्डिनिया-पीडमॉण्ट अपेक्षाकृत कमज़ोर था, इसलिए वहाँ कूटनीति (कावूर) और स्वयंसेवकों (गैरीबॉल्डी) दोनों की ज़रूरत पड़ी।

प्रश्न: कावूर को अच्छा माना जाए या नहीं? वह तो लोकतंत्र में विश्वास ही नहीं रखता था। उत्तर: यहाँ बच्चे की उलझन बिलकुल सही है, उसे सराहिए। पाठ्यपुस्तक स्वयं यह विरोधाभास दर्ज करती है कि वह “न तो एक क्रांतिकारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखने वाला” और इतालवी से बेहतर फ़्रेंच बोलता था। इससे यह सीखने को मिलता है कि राष्ट्र-निर्माण हमेशा आदर्शवादियों ने नहीं किया — कभी-कभी व्यावहारिक और ठंडे दिमाग़ वाले लोगों ने भी किया।

प्रश्न: फ़्रांसीसी क्रांति ने आज़ादी दी, तो नेपोलियन ने राजतंत्र वापस क्यों लाया? उत्तर: क्योंकि क्रांति के बाद अराजकता और युद्ध का लंबा दौर चला था और लोग स्थिरता चाहते थे। नेपोलियन ने राजनीतिक आज़ादी छीन ली, पर प्रशासनिक सुधार जारी रखे। यह इतिहास का एक आम पैटर्न है — क्रांति के बाद प्रायः एक मज़बूत शासक आता है।

प्रश्न: महिलाओं ने इतना काम किया, फिर उन्हें वोट क्यों नहीं मिला? उत्तर: यह प्रश्न बहुत अच्छा है और इसका सीधा उत्तर पाठ्यपुस्तक में है। स्रोत-ग में कार्ल वेल्कर का कथन दिखाता है कि उस समय के अनेक ‘उदारवादी’ भी मानते थे कि महिला का क्षेत्र “घर, बच्चों की देखभाल और परिवार का पालन-पोषण” है। यानी उदारवाद के भीतर ही मतभेद था। महिलाओं को अधिकार बहुत बाद में, लंबे संघर्ष के बाद मिले।

प्रश्न: क्या राष्ट्रवाद अच्छी चीज़ है या बुरी? उत्तर: यह अध्याय का सबसे गहरा प्रश्न है और इसका उत्तर ‘दोनों’ है। पाठ्यपुस्तक दोनों चेहरे दिखाती है — शुरू में वह आज़ादी दिलाने वाला था, और सदी के अंत तक वह “सीमित लक्ष्यों वाला संकीर्ण सिद्धांत” बन गया और “1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया।” कक्षा में इसे इस तरह रखिए — “जब राष्ट्रवाद कहता है ‘हमें भी आज़ादी चाहिए’, तब वह अच्छा होता है। जब वह कहने लगे ‘हम दूसरों से ऊँचे हैं’, तब वह ख़तरनाक हो जाता है।”

भाग 4 — विषय की वह गहराई जो शिक्षक को पता होनी चाहिए

यह भाग कक्षा में पूरा बताने के लिए नहीं है। यह इसलिए है कि जब कोई तेज़ विद्यार्थी कुछ पूछे, तो आप तैयार रहें।

(क) ‘कल्पित समुदाय’ — बेनेडिक्ट एंडरसन का विचार

अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य यह है कि “साझेपन की यह भावना अनंत काल से नहीं थी; यह संघर्षों और नेताओं तथा आम लोगों की सरगर्मियों से निर्मित हुई थी।”

यह वाक्य आधुनिक इतिहास-लेखन की एक बड़ी अवधारणा का सरल रूप है। विद्वान बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को ‘कल्पित समुदाय’ (imagined community) कहा। उनका तर्क यह था कि किसी राष्ट्र के अधिकांश सदस्य कभी एक-दूसरे से मिलते ही नहीं, फिर भी वे एक-दूसरे को अपना मानते हैं — यानी वह समुदाय कल्पना में बनता है।

कक्षा में इसका सरल रूप: पूछिए — “क्या आप भारत के सभी लोगों को जानते हैं?” (नहीं)। “फिर भी आप उन्हें अपना क्यों मानते हैं?” यही राष्ट्र है।

(ख) मुद्रण और अख़बार की भूमिका

अध्याय में सेंसरशिप, प्रेस की आज़ादी और लुइज़े ऑटो-पीटर्स के अख़बार का बार-बार ज़िक्र है, पर उनका आपसी संबंध खुलकर नहीं बताया गया।

असल में मुद्रण ही वह तकनीक थी जिसने राष्ट्रवाद को संभव बनाया — क्योंकि उसी से एक ही ख़बर, एक ही भाषा में, एक ही दिन हज़ारों लोगों तक पहुँच सकती थी। इसीलिए राजाओं ने सबसे पहले प्रेस पर ही नियंत्रण लगाया और इसीलिए उदारवादियों का सबसे बड़ा मुद्दा प्रेस की आज़ादी बना।

यह बात पाँचवें अध्याय (‘मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया’) से सीधे जुड़ती है — इसलिए तब इसे दोबारा उठाइए।

(ग) ‘आविष्कृत परंपरा’

जब आप बताते हैं कि ग्रिम बंधुओं ने लोक कथाएँ इकट्ठी कीं या कुर्पिंस्की ने लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीक बनाया, तो असल में आप एक बड़ी अवधारणा पढ़ा रहे हैं।

विद्वान एरिक हॉब्सबॉम ने इसे ‘आविष्कृत परंपरा’ (invented tradition) कहा — यानी अनेक ‘प्राचीन’ लगने वाली परंपराएँ वास्तव में उन्नीसवीं सदी में राष्ट्र-निर्माण के लिए गढ़ी गईं।

सावधानी: इसे कक्षा में ‘नक़ली परंपरा’ कहकर मत पढ़ाइए — इससे बच्चे भ्रमित और असहज होते हैं। बेहतर वाक्य यह है — “पुरानी चीज़ों को इकट्ठा करके उन्हें नया अर्थ दिया गया।”

(घ) आंकड़ों का संदर्भ — यह अध्याय किसकी कहानी है

एक असहज पर ज़रूरी बात यह है कि यह अध्याय मुख्यतः पढ़े-लिखे मध्यवर्ग की कहानी है। पाठ्यपुस्तक स्वयं यह स्वीकार करती है — क्रांतियों का नेतृत्व “शिक्षित मध्यवर्गीय विशिष्ट लोग” कर रहे थे, और इटली के “अधिकांश निवासी, जिनमें निरक्षरता की दर काफ़ी ऊँची थी, अभी भी उदारवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा से अनजान थे।”

इसे कक्षा में ज़रूर बताइए, क्योंकि यह विद्यार्थी को यह समझने में मदद करता है कि बड़े विचार हमेशा सबसे पहले सबके पास नहीं पहुँचते — और आगे चलकर यही प्रश्न भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में भी उठता है।

भाग 5 — पाठ्यपुस्तक की भाषा-संबंधी कुछ सावधानियाँ

यह अध्याय अनुवाद से आया है, इसलिए कुछ जगहों पर भाषा कठिन है। नीचे वे जगहें दी गई हैं जहाँ पहले ही समझा देना चाहिए।

पाठ्यपुस्तक का शब्द/वाक्यबच्चे को क्या समझाना है
“बहु-राष्ट्रीय वंशीय साम्राज्य”ऐसा साम्राज्य जिसमें एक राजघराने के नीचे कई तरह के लोग हों
“अभिजात वर्ग”ऊँचे और ताक़तवर लोग; यह ‘कुलीन वर्ग’ का ही दूसरा शब्द है
“संविधानवाद”यह माँग कि शासन संविधान के अनुसार चले
“निर्वासन”अपने देश से निकाल दिया जाना
“भूमिगत”छिपकर काम करना
“डची” और “कैंटन”छोटे राज्यों के नाम — डची पर ड्यूक का शासन, कैंटन स्विट्ज़रलैंड का प्रशासनिक क्षेत्र
“पेपल राज्य”वे इलाक़े जिन पर पोप का शासन था
“सार्विक मताधिकार”सभी वयस्कों को वोट का अधिकार
“श्रेणी-संघ”कारीगरों का संगठन
“जनमत जुटाया”लोगों की राय अपने पक्ष में की

एक और बात: अध्याय में ‘प्रशा’ (Prussia) और ‘रूस’ (Russia) दो अलग देश हैं, पर हिंदी में लिखने पर बच्चे इन्हें मिला देते हैं। पहले दिन ही बोर्ड पर दोनों को नक़्शे पर अलग-अलग दिखा दीजिए — प्रशा जर्मनी के भीतर था, रूस उससे कहीं ज़्यादा पूरब में एक विशाल साम्राज्य था।

भाग 6 — मूल्यांकन की योजना

क्या जाँचना हैकैसे जाँचेंकब
शब्दों का अर्थशब्दावली से मौखिक प्रश्नहर कालांश के अंत में
तथ्यफ्लैशकार्ड (06 फ़ाइल)हर तीसरे कालांश में
नक़्शाखाली मानचित्र पर अंकनकालांश 3 और 11 में
छोटे उत्तर2 और 3 अंक के प्रश्नकालांश 6 और 9 के बाद
लंबे उत्तर4 अंक का एक प्रश्न, साँचे के साथकालांश 11 में
सोचने की क्षमता08-PARAKH से कोई एक प्रश्नअध्याय के अंत में

भाग 7 — अंतिम शिक्षक-टिप्पणी

इस अध्याय को पढ़ाने में तीन ग़लतियाँ सबसे आम हैं, और तीनों से बचना चाहिए।

पहली ग़लती — तारीख़ें रटाना। इस अध्याय में तीस से ज़्यादा तारीख़ें हैं, पर परीक्षा में केवल कुछ ही आती हैं। चार तारीख़ें पक्की करवाइए और बाक़ी कहानी के रूप में पढ़ाइए।

दूसरी ग़लती — चित्रों को छोड़ देना। इस अध्याय में बीस चित्र हैं और वे सजावट नहीं, स्रोत हैं। परीक्षा में स्रोत-आधारित प्रश्न प्रायः इन्हीं से बनते हैं। हर चित्र पर कम से कम एक मिनट ज़रूर दीजिए और बच्चों से ही चित्र पढ़वाइए।

तीसरी ग़लती — यह मान लेना कि बच्चा भूगोल जानता है। वह नहीं जानता। जब तक जगह का पता न हो, इतिहास हवा में लटका रहता है।

और अंत में एक सुझाव। इस अध्याय का सबसे सुंदर वाक्य अर्न्स्ट रेनन का है — “राष्ट्र का अस्तित्व रोज़ जनमत-संग्रह है।” इसे अध्याय के पहले दिन बोर्ड पर लिखिए और अध्याय के आख़िरी दिन तक वहीं रहने दीजिए। अंतिम दिन बच्चों से पूछिए — “अब आपको इस वाक्य का क्या मतलब समझ आता है?”

अगर उनका उत्तर पहले दिन से बेहतर है, तो अध्याय सफल रहा।