पुस्तक: भारत और समकालीन विश्व–2 (कक्षा 10, NCERT) · खण्ड II — जीविका, अर्थव्यवस्था एवं समाज पाठ्यपुस्तक पृष्ठ: 79 से 102 तक
इस फ़ाइल को कैसे पढ़ें
यह फ़ाइल पूरे अध्याय की पूरी और आसान व्याख्या है। इसमें हर बात पूरे वाक्यों में लिखी गई है, ताकि आप इसे पढ़कर समझ भी सकें और वैसे ही उत्तर-पुस्तिका में लिख भी सकें।
कठिन शब्दों के अर्थ भाग 11 में और सभी महत्त्वपूर्ण तिथियाँ व आँकड़े भाग 12 में दिए गए हैं।
एक ज़रूरी बात पहले जान लीजिए। यह अध्याय पिछले अध्याय (भूमंडलीकृत विश्व का बनना) की सीधी अगली कड़ी है। वहाँ आपने पढ़ा था कि भारत के निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 1800 में 30 प्रतिशत था और 1870 तक घटकर केवल 3 प्रतिशत रह गया। यह अध्याय आपको बताएगा कि ऐसा हुआ कैसे, और उन बुनकरों का क्या हुआ जिनका रोज़गार चला गया।
0. सबसे पहले यह समझ लीजिए — यह अध्याय है किस बारे में?
अध्याय की शुरुआत दो तस्वीरों से होती है, और यही दोनों तस्वीरें अध्याय का मुख्य प्रश्न खड़ी करती हैं।
पहली तस्वीर — ‘डॉन ऑफ़ द सेंचुरी’ (नयी सदी का उदय), 1900। ई.टी. पॉल म्यूज़िक कंपनी ने सन् 1900 में संगीत की एक किताब प्रकाशित की थी जिसकी जिल्द पर ‘नयी सदी के उदय’ का ऐलान किया गया था।
- तसवीर के मध्य में एक देवी जैसी तसवीर है, जो हाथ में नयी शताब्दी की ध्वजा लिए प्रगति का फ़रिश्ता दिखाई देती है।
- उसका एक पाँव पंखों वाले पहिये पर टिका हुआ है। यह पहिया समय का प्रतीक है।
- उसकी उड़ान भविष्य की ओर है।
- उसके पीछे उन्नति के चिह्न तैर रहे हैं — रेलवे, कैमरा, मशीनें, प्रिंटिंग प्रेस और कारख़ाना।
दूसरी तस्वीर — ‘दो जादूगर’, इनलैंड प्रिंटर्स, 26 जनवरी 1901।
- ऊपर वाले हिस्से में प्राच्य (Orient) इलाक़े का अलादीन है जिसने अपने जादुई चिराग़ को रगड़ कर एक भव्य महल का निर्माण कर दिया है।
- नीचे एक आधुनिक मेकैनिक है जो अपने आधुनिक औज़ारों से एक नया जादू रच रहा है। वह पुल, पानी के जहाज़, मीनार और गगनचुंबी इमारतें बनाता है।
- अलादीन पूरब और अतीत का प्रतीक है; मेकैनिक पश्चिम और आधुनिकता का।
पाठ्यपुस्तक कहती है — “ये तसवीरें आधुनिक विश्व की विजयगाथा कहती हैं।” इस गाथा में “औद्योगीकरण का इतिहास विकास की कहानी के रूप में सामने आता है और आधुनिक युग तकनीकी प्रगति के भव्य युग के रूप में उभरता है।”
और अब अध्याय अपना असली प्रश्न पूछता है —
“ये छवियाँ किस प्रकार विकसित हुई हैं? क्या औद्योगीकरण के लिए तीव्र तकनीकी विकास हमेशा ज़रूरी होता है? औद्योगीकरण से लोगों की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ा है?”
इसलिए इस अध्याय की केंद्रीय बात यह है —
औद्योगीकरण केवल कारख़ानों और मशीनों की कहानी नहीं है। वह उतनी तेज़, उतनी चमकदार और उतनी सबके लिए फ़ायदेमंद नहीं थी जितनी ये तसवीरें दिखाती हैं।
अध्याय को छह भागों में देखिए —
| भाग | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| भाग 1 | औद्योगिक क्रांति से पहले | कारख़ानों से पहले भी बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था — ‘आदि-औद्योगीकरण’ |
| भाग 2 | हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति | ब्रिटेन के उद्योगपति मशीनों की जगह मज़दूरों को क्यों पसंद करते थे |
| भाग 3 | उपनिवेशों में औद्योगीकरण | भारत के बुनकर कैसे बरबाद हुए |
| भाग 4 | फ़ैक्ट्रियों का आना | भारत में मिलें किसने लगाईं और मज़दूर कहाँ से आए |
| भाग 5 | औद्योगिक विकास का अनूठापन | भारत में छोटे उद्योग और हथकरघे ख़त्म क्यों नहीं हुए |
| भाग 6 | वस्तुओं के लिए बाज़ार | विज्ञापन ने नयी उपभोक्ता संस्कृति कैसे रची |
1. औद्योगिक क्रांति से पहले (पाठ का भाग 1)
1.1 एक ग़लतफ़हमी जिसे पाठ्यपुस्तक तोड़ती है
“औद्योगीकरण को अकसर हम कारख़ानों के विकास के साथ ही जोड़कर देखते हैं। जब हम औद्योगिक उत्पादन की बात करते हैं तो हमारा आशय फ़ैक्ट्रियों में होने वाले उत्पादन से होता है।”
पर इस सोच में एक समस्या है —
“दरअसल, इंग्लैंड और यूरोप में फ़ैक्ट्रियों की स्थापना से भी पहले ही अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन फ़ैक्ट्रियों में नहीं होता था।”
बहुत सारे इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को ‘आदि-औद्योगीकरण’ (proto-industrialisation) का नाम देते हैं।
यहाँ ‘आदि’ शब्द का अर्थ पाठ्यपुस्तक ने ख़ुद बताया है — “किसी चीज़ की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत।” यानी आदि-औद्योगीकरण का सीधा अर्थ है — कारख़ानों से पहले वाला औद्योगीकरण।
1.2 सौदागर गाँवों की तरफ़ क्यों गए? — यह अभ्यास प्रश्न 1-ख है
सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरफ़ रुख़ करने लगे थे। वे किसानों और कारीगरों को पैसा देते थे और उनसे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए उत्पादन करवाते थे।
पर ऐसा क्यों हुआ? इसके कारण क्रम से समझिए —
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | उस समय विश्व व्यापार के विस्तार और दुनिया के विभिन्न भागों में उपनिवेशों की स्थापना के कारण चीज़ों की माँग बढ़ने लगी थी। |
| 2 | इस माँग को पूरा करने के लिए केवल शहरों में रहते हुए उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था। |
| 3 | वजह यह थी कि शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफ़ी ताक़तवर थे। |
| 4 | गिल्ड्स उत्पादकों के संगठन होते थे। ये उत्पादक कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे। |
| 5 | शासकों ने भी विभिन्न गिल्ड्स को ख़ास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था। |
| 6 | फलस्वरूप, नए व्यापारी शहरों में कारोबार नहीं कर सकते थे। इसलिए वे गाँवों की तरफ़ जाने लगे। |
1.3 गाँव वाले क्यों तैयार हो गए?
“गाँवों में ग़रीब काश्तकार और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करने लगे।” पर वे क्यों तैयार हुए, इसका उत्तर भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है —
- यह एक ऐसा समय था जब खुले खेत ख़त्म होते जा रहे थे और कॉमन्स की बाड़ाबंदी की जा रही थी।
- अब तक अपनी रोज़ी-रोटी के लिए साझा ज़मीनों से जलावन की लकड़ी, बेरियाँ, सब्ज़ियाँ, भूसा और चारा आदि बीन कर काम चलाने वाले छोटे किसान (कॉटेजर) और ग़रीब किसान आमदनी के नए स्रोत ढूँढ़ रहे थे।
- बहुतों के पास छोटे-मोटे खेत तो थे लेकिन उनसे घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर सकता था।
- इसीलिए, जब सौदागर वहाँ आए और उन्होंने माल पैदा करने के लिए पेशगी रक़म दी तो किसान फ़ौरन तैयार हो गए।
- सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँव में ही रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को भी सँभाल सकते थे।
- इस आदि-औद्योगिक उत्पादन से होने वाली आमदनी ने खेती के कारण सिमटती आय में बड़ा सहारा दिया।
- अब उन्हें पूरे परिवार के श्रम संसाधनों के इस्तेमाल का मौक़ा भी मिल गया।
चित्र 3 का विवरण यही बात कहता है — “अठारहवीं सदी में कताई। आप देख सकते हैं कि परिवार के सभी सदस्य धागा बनाने के काम में लगे हैं।”
1.4 पूरी व्यवस्था कैसे चलती थी — इंग्लैंड के कपड़ा व्यवसाय का उदाहरण
“इस व्यवस्था से शहरों और गाँवों के बीच एक घनिष्ठ संबंध विकसित हुआ। सौदागर रहते तो शहरों में थे लेकिन उनके लिए काम ज़्यादातर देहात में चलता था।”
अब इंग्लैंड के कपड़ा व्यवसाय की पूरी शृंखला देखिए —
स्टेप्लर (ऊन ख़रीदना) → कातने वाले (धागा) → बुनकर → फ़ुलर्स → रंगसाज़ → लंदन (फ़िनिशिंग) → अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार
हर कड़ी का काम क्या था —
| कड़ी | काम |
|---|---|
| स्टेप्लर (Staplers) | ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को ‘स्टेपल’ करता है या छाँटता है |
| कातने वाले | ऊन से धागा बनाते थे |
| बुनकर | धागे से कपड़ा बुनते थे |
| फ़ुलर्स (Fullers) | ऐसा व्यक्ति जो ‘फुल’ करता है यानी चुनटों के सहारे कपड़े को समेटता है |
| रंगसाज़ | कपड़े को रंगते थे |
| लंदन | यहाँ कपड़ों की फ़िनिशिंग होती थी, इसलिए लंदन को फ़िनिशिंग सेंटर के रूप में ही जाना जाने लगा था |
और इस पूरी व्यवस्था की तीन ख़ास बातें —
- यह आदि-औद्योगिक व्यवस्था व्यवसायिक आदान-प्रदान के नेटवर्क का हिस्सा थी।
- इस पर सौदागरों का नियंत्रण था और चीज़ों का उत्पादन कारख़ानों की बजाय घरों में होता था।
- उत्पादन के प्रत्येक चरण में प्रत्येक सौदागर 20–25 मज़दूरों से काम करवाता था। इसका मतलब यह था कि कपड़ों के हर सौदागर के पास सैकड़ों मज़दूर काम करते थे।
1.5 कारख़ानों का उदय
“इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारख़ाने खुले लेकिन उनकी संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा अठारहवीं सदी के आख़िर में ही हुआ।”
कपास पहला प्रतीक था —
- कपास (कॉटन) नए युग का पहला प्रतीक थी।
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई।
यह आँकड़ा ज़रूर याद रखिए —
| वर्ष | ब्रिटेन का कच्चे कपास का आयात |
|---|---|
| 1760 | 25 लाख पौंड |
| 1787 | 220 लाख पौंड |
यह बढ़ोतरी कैसे हुई?
- अठारहवीं सदी में कई ऐसे आविष्कार हुए जिन्होंने उत्पादन प्रक्रिया — कार्डिंग, ऐंठना व कताई, और लपेटने — के हर चरण की कुशलता बढ़ा दी।
- प्रति मज़दूर उत्पादन बढ़ गया और पहले से ज़्यादा मज़बूत धागों व रेशों का उत्पादन होने लगा।
- इसके बाद रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी।
यहाँ ‘कार्डिंग’ का अर्थ पाठ्यपुस्तक ने दिया है — “वह प्रक्रिया जिसमें कपास या ऊन आदि रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है।”
मिल क्यों बनी, यह तर्क बहुत महत्त्वपूर्ण है —
- अभी तक कपड़ा उत्पादन पूरे देहात में फैला हुआ था और यह काम लोग अपने-अपने घर पर ही करते थे।
- लेकिन अब महँगी नयी मशीनें ख़रीदकर उन्हें कारख़ानों में लगाया जा सकता था।
- कारख़ाने में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गई थीं।
- इसके चलते उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मज़दूरों पर नज़र रखना संभव हो गया था।
- जब तक उत्पादन गाँवों में हो रहा था तब तक ये सारे काम संभव नहीं थे।
और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में क्या हुआ?
“कारख़ाने इंग्लैंड के भूदृश्य का अभिन्न अंग बन गए थे। ये नए कारख़ाने इतने विशाल, और नयी प्रौद्योगिकी की ताक़त इतनी जादुई दिखाई देती थी कि उस समय के लोगों की आँखें चौंधिया जाती थीं। लोगों का ध्यान कारख़ानों पर टिका रह जाता था। वे इस बात को मानो भूल ही जाते थे कि उनकी आँखों से ओझल गलियों और वर्कशॉप्स में अभी भी उत्पादन चालू है।”
1.6 औद्योगिक परिवर्तन की रफ़्तार — चार बातें (बहुत महत्त्वपूर्ण)
पाठ्यपुस्तक पूछती है — “औद्योगीकरण की प्रक्रिया कितनी तेज़ थी? क्या औद्योगीकरण का मतलब केवल फ़ैक्ट्री उद्योगों के विकास तक ही सीमित होता है?” और चार उत्तर देती है।
पहली बात — सबसे तेज़ बढ़ने वाले उद्योग कौन-से थे?
- सूती उद्योग और कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे।
- तेज़ी से बढ़ता हुआ कपास उद्योग 1840 के दशक तक औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था।
- इसके बाद लोहा और स्टील उद्योग आगे निकल गए।
- 1840 के दशक से इंग्लैंड में और 1860 के दशक से उसके उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार होने लगा था। फलस्वरूप लोहे और स्टील की ज़रूरत तेज़ी से बढ़ी।
- 1873 तक ब्रिटेन के लोहा और स्टील निर्यात का मूल्य लगभग 7.7 करोड़ पौंड हो गया था। यह राशि इंग्लैंड के कपास निर्यात के मूल्य से दोगुनी थी।
दूसरी बात — परंपरागत उद्योग ख़त्म नहीं हुए।
- नए उद्योग परंपरागत उद्योगों को इतनी आसानी से हाशिए पर नहीं ढकेल सकते थे।
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भी तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों में 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी।
- कपड़ा उद्योग एक गतिशील उद्योग था लेकिन उसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा कारख़ानों में नहीं बल्कि घरेलू इकाइयों में होता था।
तीसरी बात — परंपरागत उद्योगों में भी बदलाव आ रहे थे।
- यद्यपि ‘परंपरागत’ उद्योगों में परिवर्तन की गति भाप से चलने वाले सूती और धातु उद्योगों से तय नहीं हो रही थी, लेकिन ये परंपरागत उद्योग पूरी तरह ठहराव की अवस्था में भी नहीं थे।
- खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, पॉटरी, काँच के काम, चर्मशोधन, फ़र्नीचर और औज़ारों के उत्पादन जैसे बहुत सारे ग़ैर-मशीनी क्षेत्रों में जो तरक़्क़ी हो रही थी वह मुख्य रूप से साधारण और छोटे-छोटे आविष्कारों का ही परिणाम थी।
चौथी बात — तकनीक अपनाने की गति धीमी थी।
- प्रौद्योगिकीय बदलावों की गति धीमी थी। औद्योगिक भूदृश्य पर ये बदलाव नाटकीय तेज़ी से नहीं फैले।
- नयी तकनीक महँगी थी।
- सौदागर व व्यापारी उनके इस्तेमाल के सवाल पर फूँक-फूँक कर क़दम बढ़ाते थे।
- मशीनें अकसर ख़राब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर काफ़ी ख़र्चा आता था।
- वे उतनी अच्छी भी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारकों और निर्माताओं का दावा था।
1.7 भाप के इंजन का उदाहरण — यह पूरी कहानी याद कीजिए
“इस बात को समझने के लिए आइए भाप के इंजन का उदाहरण लें।”
| क्रम | तथ्य |
|---|---|
| 1 | जेम्स वॉट ने न्यूकोमेन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किए और नए इंजन को पेटेंट करा लिया। |
| 2 | इस मॉडल का उत्पादन उनके दोस्त उद्योगपति मैथ्यू बूल्टन ने किया। |
| 3 | पर, सालों तक उन्हें कोई ख़रीदार नहीं मिला। |
| 4 | उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिर्फ़ 321 इंजन थे। |
| 5 | इनमें से 80 इंजन सूती उद्योगों में, 9 ऊन उद्योगों में और बाक़ी खनन, नहर निर्माण और लौह कार्यों में इस्तेमाल हो रहे थे। |
| 6 | और किसी उद्योग में भाप के इंजनों का इस्तेमाल काफ़ी समय बाद तक भी नहीं हुआ। |
इसका निष्कर्ष पाठ्यपुस्तक ने ख़ुद लिखा है — “यानी मज़दूरों की उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाने की संभावना वाली सबसे शक्तिशाली प्रौद्योगिकी को अपनाने में भी उद्योगपति बहुत हिचकिचा रहे थे।”
और इसीलिए —
“अब इतिहासकार इस बात को मानने लगे हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मज़दूर मशीनों पर काम करने वाला नहीं बल्कि परंपरागत कारीगर और मज़दूर ही होता था।”
ध्यान दीजिए — पाठ्यपुस्तक में पेटेंट का वर्ष ‘1871’ छपा है, जो असंभव है क्योंकि जेम्स वॉट का देहांत 1819 में हो चुका था। असली वर्ष 1781 है। इसका विस्तार 07-NCERT से आगे वाली फ़ाइल में है। बोर्ड परीक्षा में पाठ्यपुस्तक का ही उत्तर लिखिए।
2. हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति (पाठ का भाग 2)
यह भाग पूरा एक ही प्रश्न का उत्तर है — “उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे?” यह पाठ्यपुस्तक का ‘चर्चा करें’ प्रश्न 1 है और परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछा जाता है।
2.1 पाँच कारण — क्रम से याद कीजिए
| क्रम | कारण | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | मज़दूरों की कोई कमी नहीं थी | विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। ग़रीब किसान और बेकार लोग कामकाज की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे। |
| 2 | वेतन कम था, इसलिए मशीन की ज़रूरत नहीं थी | जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं। इसीलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई परेशानी नहीं थी। उन्हें ऐसी मशीनों में कोई दिलचस्पी नहीं थी जिनके कारण मज़दूरों से छुटकारा मिल जाए और जिन पर बहुत ज़्यादा ख़र्चा आने वाला हो। |
| 3 | बहुत सारे उद्योगों में काम मौसमी था | गैसघरों और शराबख़ानों में जाड़ों के दौरान ख़ासा काम रहता था। क्रिसमस के समय बुक बाइंडरों और प्रिंटरों को भी दिसंबर से पहले अतिरिक्त मज़दूरों की दरकार रहती थी। बंदरगाहों पर जहाज़ों की मरम्मत और साफ़-सफ़ाई व सजावट का काम भी जाड़ों में ही किया जाता था। जिन उद्योगों में मौसम के साथ उत्पादन घटता-बढ़ता रहता था वहाँ उद्योगपति मशीनों की बजाय मज़दूरों को ही काम पर रखना पसंद करते थे। |
| 4 | कुछ चीज़ें मशीन बना ही नहीं सकती थी | मशीनों से एक जैसे तय क़िस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा सकते थे। लेकिन बाज़ार में अकसर बारीक डिज़ाइन और ख़ास आकारों वाली चीज़ों की काफ़ी माँग रहती थी। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में उन्नीसवीं सदी के मध्य में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ बनाई जा रही थीं। इन्हें बनाने के लिए यांत्रिक प्रौद्योगिकी की नहीं बल्कि इनसानी निपुणता की ज़रूरत थी। |
| 5 | ऊँचे वर्ग हाथ से बनी चीज़ें पसंद करते थे | विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग — कुलीन और पूँजीपति वर्ग — हाथों से बनी चीज़ों को तरजीह देते थे। हाथ से बनी चीज़ों को परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। उनकी फ़िनिश अच्छी होती थी, उनको एक-एक करके बनाया जाता था और उनका डिज़ाइन अच्छा होता था। |
और एक बहुत ज़रूरी अंत —
“मशीनों से बनने वाले उत्पादों को उपनिवेशों में निर्यात कर दिया जाता था।”
अमेरिका से तुलना — यह ज़रूर लिखिए: “जिन देशों में मज़दूरों की कमी होती है वहाँ उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना ज़्यादा पसंद करते हैं ताकि कम से कम मज़दूरों का इस्तेमाल करके वे अपना काम चला सकें। उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में यही स्थिति थी। लेकिन ब्रिटेन में कामगारों की कोई कमी नहीं थी।”
2.2 मज़दूरों की ज़िंदगी
“बाज़ार में श्रम की बहुतायत से मज़दूरों की ज़िंदगी भी प्रभावित हुई।”
नौकरी कैसे मिलती थी?
- जैसे ही नौकरियों की ख़बर गाँवों में पहुँची सैकड़ों की तादाद में लोगों के हुजूम शहरों की तरफ़ चल पड़े।
- नौकरी मिलने की संभावना यारी-दोस्ती, कुनबे-कुटुंब के ज़रिए जान-पहचान पर निर्भर करती थी।
- अगर किसी कारख़ाने में आपका रिश्तेदार या दोस्त लगा हुआ है तो नौकरी मिलने की संभावना ज़्यादा रहती थी।
- सबके पास ऐसे सामाजिक संपर्क नहीं होते थे। रोज़गार चाहने वाले बहुत सारे लोगों को हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था।
- वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे। बहुत सारे निर्धन क़ानून विभाग द्वारा चलाए जाने वाले अस्थायी बसेरों में रुकते थे।
मौसमी काम की मार:
- बहुत सारे उद्योगों में मौसमी काम की वजह से कामगारों को बीच-बीच में बहुत समय तक ख़ाली बैठना पड़ता था।
- काम का सीज़न गुज़र जाने के बाद ग़रीब दोबारा सड़क पर आ जाते थे।
- कुछ लोग जाड़ों के बाद गाँवों में चले जाते थे जहाँ इस समय काम निकलने लगता था।
- लेकिन ज़्यादातर शहर में ही छोटा-मोटा काम ढूँढ़ने की कोशिश करते थे जो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भी आसान काम नहीं था।
वेतन का सच — यह हिस्सा बहुत गहरा है:
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में वेतन में कुछ सुधार आया। लेकिन इससे मज़दूरों की हालत में बेहतरी का पता नहीं चलता।
- औसत आँकड़ों से अलग-अलग व्यवसायों के बीच आने वाले फ़र्क़ और साल-दर-साल होने वाले उतार-चढ़ाव छिपे रह जाते थे।
- मिसाल के तौर पर, जब लंबे नेपोलियनी युद्ध के दौरान क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं तो मज़दूरों की आय के वास्तविक मूल्य में भारी कमी आ गई। अब उन्हें वेतन तो पहले जितना मिलता था लेकिन उससे वे पहले जितनी चीज़ें नहीं ख़रीद सकते थे।
- मज़दूरों की आमदनी भी सिर्फ़ वेतन दर पर ही निर्भर नहीं होती थी। रोज़गार की अवधि भी बहुत महत्त्वपूर्ण थी — मज़दूरों की औसत दैनिक आय इससे तय होती थी कि उन्होंने कितने दिन काम किया है।
ग़रीबी और बेरोज़गारी के आँकड़े:
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत शहरी आबादी निहायत ग़रीब थी।
- 1830 के दशक में आई आर्थिक मंदी जैसे दौरों में बेरोज़गारों की संख्या विभिन्न क्षेत्रों में 35 से 75 प्रतिशत तक पहुँच जाती थी।
2.3 स्पिनिंग जेनी पर हमले — यह अभ्यास प्रश्न 1-क है
“बेरोज़गारी की आशंका के कारण मज़दूर नयी प्रौद्योगिकी से चिढ़ते थे। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू किया गया तो हाथ से ऊन कातने वाली औरतें इस तरह की मशीनों पर हमला करने लगीं। जेनी के इस्तेमाल पर यह टकराव लंबे समय तक चलता रहा।”
स्पिनिंग जेनी क्या थी? — “जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा 1764 में बनाई गई इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी। एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कई धागे बनने लगते थे।”
स्रोत-ख (एक मजिस्ट्रेट की 1790 की रिपोर्ट) यही बात प्रमाणित करता है —
“कोयला मज़दूरों और उनकी बीवियों के गिरोह की परेशानी के कारण… क्योंकि उनकी बीवियों का काम स्पिनिंग इंजन के कारण छिन गया था… ऊन उत्पादन में अभी अपनाई गई मशीनों को वे टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते थे क्योंकि उनकी वजह से शारीरिक श्रम की माँग घटने वाली थी। औरतों ने हंगामा मचाया हुआ था।”
2.4 1840 के दशक के बाद क्या बदला
“1840 के दशक के बाद शहरों में निर्माण की गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ीं। लोगों के लिए नए रोज़गार पैदा हुए।”
- सड़कों को चौड़ा किया गया
- नए रेलवे स्टेशन बने
- रेलवे लाइनों का विस्तार किया गया
- सुरंगें बनाई गईं
- निकासी और सीवर व्यवस्था बिछाई गई
- नदियों के तटबंध बनाए गए
आँकड़ा: परिवहन उद्योग में काम करने वालों की संख्या 1840 के दशक में दोगुना और अगले 30 सालों में एक बार फिर दोगुना हो गई।
3. उपनिवेशों में औद्योगीकरण (पाठ का भाग 3)
“आइए अब भारत पर नज़र डालें और देखें कि एक उपनिवेश का औद्योगीकरण कैसे होता है। हमारा अध्ययन मुख्य रूप से कपड़ा उद्योग तक ही सीमित रहेगा।”
3.1 भारतीय कपड़े का युग — जो पहले था
“मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का ही दबदबा रहता था।”
भारत का कपास ख़ास क्यों था? — “बहुत सारे देशों में मोटा कपास पैदा होता था लेकिन भारत में पैदा होने वाला कपास महीन क़िस्म का था।”
दो रास्ते — ज़मीन और समुद्र:
| रास्ता | विवरण |
|---|---|
| ज़मीन का रास्ता | आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते यहाँ की चीज़ें लेकर जाते थे। यहाँ के बने महीन कपड़ों के थान ऊँटों की पीठ पर लाद कर पश्चिमोत्तर सीमा से पहाड़ी दर्रों और रेगिस्तानों के पार ले जाए जाते थे। |
| समुद्री रास्ता | मुख्य पूर्व औपनिवेशिक बंदरगाहों से फलता-फूलता समुद्री व्यापार चलता था। गुजरात के तट पर स्थित सूरत बंदरगाह के ज़रिए भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा हुआ था। कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और बंगाल में हुगली के माध्यम से भी दक्षिण-पूर्वी एशियाई बंदरगाहों के साथ ख़ूब व्यापार चलता था। |
नेटवर्क कैसे काम करता था?
- निर्यात व्यापार के इस नेटवर्क में बहुत सारे भारतीय व्यापारी और बैंकर सक्रिय थे।
- वे उत्पादन में पैसा लगाते थे, चीज़ों को लेकर जाते थे और निर्यातकों को पहुँचाते थे।
- माल भेजने वाले आपूर्ति सौदागरों के ज़रिये बंदरगाह नगर देश के भीतरी इलाक़ों से जुड़े हुए थे।
- ये सौदागर बुनकरों को पेशगी देते थे, बुनकरों से तैयार कपड़ा ख़रीदते थे और उसे बंदरगाहों तक पहुँचाते थे।
- बंदरगाह पर बड़े जहाज़ मालिक और निर्यात व्यापारियों के दलाल क़ीमत पर मोल-भाव करते थे और आपूर्ति सौदागरों से माल ख़रीद लेते थे।
3.2 सूरत का पतन — यह अभ्यास प्रश्न 1-ग है
“1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला यह नेटवर्क टूटने लगा था।”
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | यूरोपीय कंपनियों की ताक़त बढ़ती जा रही थी। |
| 2 | पहले उन्होंने स्थानीय दरबारों से कई तरह की रियायतें हासिल कीं। |
| 3 | उसके बाद उन्होंने व्यापार पर इज़ारेदारी अधिकार प्राप्त कर लिए। |
| 4 | इससे सूरत व हुगली, दोनों पुराने बंदरगाह कमज़ोर पड़ गए। इन बंदरगाहों से होने वाले निर्यात में नाटकीय कमी आई। |
| 5 | पहले जिस क़र्ज़ से व्यापार चलता था वह ख़त्म होने लगा। धीरे-धीरे स्थानीय बैंकर दिवालिया हो गए। |
आँकड़ा: सत्रहवीं सदी के आख़िरी सालों में सूरत बंदरगाह से होने वाले व्यापार का कुल मूल्य 1.6 करोड़ रुपये था। 1740 के दशक तक यह गिर कर केवल 30 लाख रुपये रह गया था।
और नए बंदरगाह उठे —
- सूरत व हुगली कमज़ोर पड़ रहे थे और बंबई व कलकत्ता की स्थिति सुधर रही थी।
- पुराने बंदरगाहों की जगह नए बंदरगाहों का बढ़ता महत्त्व औपनिवेशिक सत्ता की बढ़ती ताक़त का संकेत था।
- नए बंदरगाहों के ज़रिए होने वाला व्यापार यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण में था और यूरोपीय जहाज़ों के ज़रिए होता था।
- बहुत सारे पुराने व्यापारिक घराने ढह चुके थे। जो बचे रहना चाहते थे उनके पास भी यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के नियंत्रण वाले नेटवर्क में काम करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
3.3 बुनकरों का क्या हुआ — गुमाश्ता की कहानी
“1760 के दशक के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता के सुदृढ़ीकरण की शुरुआत में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट नहीं आई।” इसका कारण यह था कि “ब्रिटिश कपास उद्योग अभी फैलना शुरू नहीं हुआ था और यूरोप में बारीक भारतीय कपड़ों की भारी माँग थी। इसलिए कंपनी भी भारत से होने वाले कपड़े के निर्यात को ही और फैलाना चाहती थी।”
पहले बुनकर की स्थिति अच्छी थी —
- 1760 और 1770 के दशकों में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी को निर्यात के लिए लगातार सप्लाई आसानी से नहीं मिल पाती थी।
- बुने हुए कपड़े को हासिल करने के लिए फ़्रांसीसी, डच और पुर्तगालियों के साथ-साथ स्थानीय व्यापारी भी होड़ में रहते थे।
- इस प्रकार बुनकर और आपूर्ति सौदागर ख़ूब मोल-भाव करते थे और अपना माल सबसे ऊँची बोली लगाने वाले ख़रीदार को ही बेचते थे।
फिर सत्ता मिलते ही कंपनी ने व्यवस्था बदल दी —
“लेकिन एक बार ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक सत्ता स्थापित हो जाने के बाद कंपनी व्यापार पर अपने एकाधिकार का दावा कर सकती थी। फलस्वरूप उसने प्रतिस्पर्धा ख़त्म करने, लागतों पर अंकुश रखने और कपास व रेशम से बनी चीज़ों की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन और नियंत्रण की एक नयी व्यवस्था लागू कर दी।”
यह दो चरणों में हुआ —
पहला चरण — गुमाश्ता की नियुक्ति (यह अभ्यास प्रश्न 1-घ है):
- कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को ख़त्म करने तथा बुनकरों पर ज़्यादा प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की।
- कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात कर दिए जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।
दूसरा चरण — पेशगी और पाबंदी:
- कंपनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य ख़रीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गई।
- इसके लिए उन्हें पेशगी रक़म दी जाती थी।
- एक बार काम का ऑर्डर मिलने पर बुनकरों को कच्चा माल ख़रीदने के लिए क़र्ज़ा दे दिया जाता था।
- जो क़र्ज़ा लेते थे उन्हें अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था। उसे वे किसी और व्यापारी को नहीं बेच सकते थे।
बुनकर पहले तो ख़ुश हुए, पर फिर फँस गए —
- जैसे-जैसे क़र्ज़ें मिलते गए और महीन कपड़े की माँग बढ़ने लगी, ज़्यादा कमाई की आस में बुनकर पेशगी स्वीकार करने लगे।
- बहुत सारे बुनकरों के पास ज़मीन के छोटे-छोटे पट्टे थे जिन पर वे खेती करते थे और अपने परिवार की ज़रूरतें पूरी कर लेते थे।
- अब वे इस ज़मीन को भाड़े पर देकर पूरा समय बुनकरी में लगाने लगे। अब पूरा परिवार यही काम करने लगा। बच्चे व औरतें, सभी कुछ न कुछ काम करते थे।
और फिर टकराव शुरू हुआ —
- लेकिन जल्दी ही बहुत सारे बुनकर गाँवों में बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव की ख़बरें आने लगीं।
- इससे पहले आपूर्ति सौदागर अकसर बुनकर गाँवों में ही रहते थे और बुनकरों से उनके नज़दीकी ताल्लुक़ात होते थे। वे बुनकरों की ज़रूरतों का ख़याल रखते थे और संकट के समय उनकी मदद करते थे।
- नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे। उनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था।
- वे दंभपूर्ण व्यवहार करते थे, सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे और माल समय पर तैयार न होने की स्थिति में बुनकरों को सज़ा देते थे।
- सज़ा के तौर पर बुनकरों को अकसर पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे।
- अब बुनकर न तो दाम पर मोलभाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे।
- उन्हें कंपनी से जो क़ीमत मिलती थी वह बहुत कम थी पर वे क़र्ज़ों की वजह से कंपनी से बँधे हुए थे।
बुनकरों का विरोध — यह हिस्सा ज़रूर लिखिए:
- कर्नाटक और बंगाल में बहुत सारे स्थानों पर बुनकर गाँव छोड़ कर चले गए। वे अपने रिश्तेदारों के यहाँ किसी और गाँव में करघा लगा लेते थे।
- कई स्थानों पर कंपनी और उसके अफ़सरों का विरोध करते हुए गाँव के व्यापारियों के साथ मिलकर बुनकरों ने बग़ावत कर दी।
- कुछ समय बाद बहुत सारे बुनकर क़र्ज़ा लौटाने से इनकार करने लगे। उन्होंने करघे बंद कर दिए और खेतों में मज़दूरी करने लगे।
3.4 भारत में मैनचेस्टर का आना — यह सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है
“1772 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सर हेनरी पतुलो ने कहा था कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता।”
पर हुआ इसका उलटा —
“लेकिन हम देखते हैं कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट आने लगी जो लंबे समय तक जारी रही।”
आँकड़े ज़रूर याद रखिए —
| वर्ष | भारत के कुल निर्यात में सूती माल का हिस्सा |
|---|---|
| 1811–12 | 33 प्रतिशत |
| 1850–51 | मात्र 3 प्रतिशत |
ऐसा क्यों हुआ? — दो दबाव
पहला दबाव — ब्रिटेन ने अपना बाज़ार बंद कर दिया।
- जब इंग्लैंड में कपास उद्योग विकसित हुआ तो वहाँ के उद्योगपति दूसरे देशों से आने वाले आयात को लेकर परेशान दिखाई देने लगे।
- उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़ों पर आयात शुल्क वसूल करे जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में आराम से बिक सकें।
दूसरा दबाव — और भारत का बाज़ार खोल दिया गया।
- दूसरी तरफ़ उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में भी बेचे।
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन के वस्त्र उत्पादों के निर्यात में नाटकीय वृद्धि हुई।
आयात के आँकड़े —
| वर्ष | भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा |
|---|---|
| अठारहवीं सदी के आख़िर में | न के बराबर |
| 1850 | 31 प्रतिशत |
| 1870 | 50 प्रतिशत से ऊपर |
अब बुनकर के सामने दो समस्याएँ एक साथ थीं — यह वाक्य ज़रूर लिखिए:
“इस प्रकार भारत में कपड़ा बुनकरों के सामने एक-साथ दो समस्याएँ थीं। उनका निर्यात बाज़ार ढह रहा था और स्थानीय बाज़ार सिकुड़ने लगा था।”
स्थानीय बाज़ार क्यों सिकुड़ा?
- स्थानीय बाज़ार में मैनचेस्टर के आयातित मालों की भरमार थी।
- कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयातित कपास उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते थे।
- 1850 के दशक तक देश के ज़्यादातर बुनकर इलाक़ों में गिरावट और बेकारी के ही क़िस्सों की भरमार थी।
और फिर 1860 के दशक में तीसरी मार पड़ी —
- 1860 के दशक में बुनकरों के सामने नयी समस्या खड़ी हो गई। उन्हें अच्छी कपास नहीं मिल पा रही थी।
- जब अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू हुआ और अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई तो ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा।
- भारत से कच्चे कपास के निर्यात में इस वृद्धि से उसकी क़ीमत आसमान छूने लगी।
- भारतीय बुनकरों को कच्चे माल के लाले पड़ गए। उन्हें मनमानी क़ीमत पर कच्ची कपास ख़रीदनी पड़ती थी।
- ऐसी सूरत में बुनकरी के सहारे पेट पालना संभव नहीं था।
और अंत में चौथी मार —
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर में बुनकरों और कारीगरों के सामने एक और समस्या आ गई।
- अब भारतीय कारख़ानों में उत्पादन होने लगा और बाज़ार मशीनों की बनी चीज़ों से पट गया था।
दो स्रोत जो बुनकरों की तबाही दिखाते हैं —
स्रोत-ग (पटना के आयुक्त):
“ऐसा लगता है कि 20 साल पहले जहानाबाद और बिहार में कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। जहानाबाद में यह बिल्कुल बंद हो गया है जबकि बिहार में बहुत कम उत्पादन होता है। यह मैनचेस्टर में बनी सस्ती और टिकाऊ वस्तुओं का परिणाम है जिससे स्थानीय निर्माता प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।”
स्रोत-घ (सेंसस रिपोर्ट ऑफ़ सेंट्रल प्रोविंसेज़, 1872):
“भारत के अन्य भागों में महीन कपड़ा बनाने वाले बुनकरों की तरह कोष्टियों का भी बुरा समय चल रहा है। वे मैनचेस्टर से इतनी भारी तादाद में आने वाली आकर्षक चीज़ों का मुक़ाबला नहीं कर पा रहे हैं। हाल के सालों में वे बड़ी संख्या में यहाँ से जाने लगे हैं। वे मुख्य रूप से बिहार का रुख कर रहे हैं जहाँ दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर उन्हें रोज़ी-रोटी मिल जाती है…”
4. फ़ैक्ट्रियों का आना (पाठ का भाग 4)
4.1 भारत की पहली मिलें — यह तालिका याद कीजिए
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1854 | बंबई में पहली कपड़ा मिल लगी; दो साल बाद (1856) उसमें उत्पादन होने लगा |
| 1855 | बंगाल में देश की पहली जूट मिल चालू हुई |
| 1862 | दूसरी जूट मिल (7 साल बाद) चालू हुई; इसी समय बंबई में चार मिलें काम कर रही थीं जिनमें 94,000 तकलियाँ और 2,150 करघे थे |
| 1860 का दशक | उत्तरी भारत में एल्गिन मिल कानपुर में खुली |
| 1861 (साल भर बाद) | अहमदाबाद की पहली कपड़ा मिल चालू हो गई |
| 1874 | मद्रास में भी पहली कताई और बुनाई मिल खुल गई |
और फिर पाठ्यपुस्तक तीन सवाल पूछती है —
“ये उद्योग कौन लगा रहा था? उनके लिए पूँजी कहाँ से आ रही थी? मिलों में काम करने वाले कौन थे?”
4.2 प्रारंभिक उद्यमी — पूँजी कहाँ से आई?
“देश के विभिन्न भागों में तरह-तरह के लोग उद्योग लगा रहे थे।”
सबसे बड़ा स्रोत — चीन के साथ व्यापार:
- बहुत सारे व्यावसायिक समूहों का इतिहास चीन के साथ व्यापार के ज़माने से चला आ रहा था।
- अठारहवीं सदी के आख़िर से ही अंग्रेज़ भारतीय अफ़ीम का चीन को निर्यात करने लगे थे। उसके बदले में वे चीन से चाय ख़रीदते थे जो इंग्लैंड जाती थी।
- इस व्यापार में बहुत सारे भारतीय कारोबारी सहायक की हैसियत में पहुँच गए थे। वे पैसा उपलब्ध कराते थे, आपूर्ति सुनिश्चित करते थे और माल को जहाज़ों में लाद कर रवाना करते थे।
- व्यापार से पैसा कमाने के बाद उनमें से कुछ व्यवसायी भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित करना चाहते थे।
अब चार नाम याद कीजिए — यह परीक्षा में पूछा जाता है:
| नाम | विवरण |
|---|---|
| द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल) | उन्होंने चीन के साथ व्यापार में ख़ूब पैसा कमाया और उद्योगों में निवेश करने लगे। 1830–1840 के दशकों में उन्होंने 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगा ली थीं। 1840 के दशक में आए व्यापक व्यावसायिक संकटों में औरों के साथ-साथ टैगोर के उद्यम भी बैठ गए। |
| डिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा (बंबई) | इन पारसियों ने आंशिक रूप से चीन को निर्यात करके और आंशिक रूप से इंग्लैंड को कच्ची कपास निर्यात करके पैसा कमा लिया था। टाटा आगे चलकर देश में विशाल औद्योगिक साम्राज्य स्थापित करने वाले बने। |
| सेठ हुकुमचंद (कलकत्ता) | मारवाड़ी व्यवसायी, जिन्होंने 1917 में कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाई। उन्होंने भी चीन के साथ व्यापार किया था। |
| जी.डी. बिड़ला के पिता और दादा | यही काम प्रसिद्ध उद्योगपति जी.डी. बिड़ला के पिता और दादा ने किया था। |
पूँजी के दूसरे स्रोत:
- मद्रास के कुछ सौदागर बर्मा से व्यापार करते थे जबकि कुछ के मध्य-पूर्व व पूर्वी अफ़्रीका में संबंध थे।
- इनके अलावा भी कुछ वाणिज्यिक समूह थे लेकिन वे विदेश व्यापार से सीधे जुड़े हुए नहीं थे। वे भारत में ही व्यवसाय करते थे — एक जगह से दूसरी जगह माल ले जाते थे, सूद पर पैसा चलाते थे, एक शहर से दूसरे शहर में पैसा पहुँचाते थे और व्यापारियों को पैसा देते थे।
- जब उद्योगों में निवेश के अवसर आए तो उनमें से बहुतों ने फ़ैक्ट्रियाँ लगा लीं।
पर भारतीय व्यवसायियों के लिए जगह सिकुड़ती गई — यह वाक्य ज़रूर लिखिए:
“जैसे भारतीय व्यापार पर औपनिवेशिक शिकंजा कसता गया, वैसे-वैसे भारतीय व्यवसायियों के लिए जगह सिकुड़ती गई। उन्हें अपना तैयार माल यूरोप में बेचने से रोक दिया गया। अब वे मुख्य रूप से कच्चे माल और अनाज — कच्ची कपास, अफ़ीम, गेहूँ और नील — का ही निर्यात कर सकते थे जिनकी अंग्रेज़ों को ज़रूरत थी। धीरे-धीरे उन्हें जहाज़रानी व्यवसाय से भी बाहर धकेल दिया गया।”
यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ — यह भी ज़रूरी है:
- पहले विश्वयुद्ध तक यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ भारतीय उद्योगों के विशाल क्षेत्र का नियंत्रण करती थीं।
- इनमें बर्ड हीगलर्स एंड कंपनी, एंड्रयू यूल, और जार्डीन स्किनर एंड कंपनी सबसे बड़ी कंपनियाँ थीं।
- ये एजेंसियाँ पूँजी जुटाती थीं, संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाती थीं और उनका प्रबंधन सँभालती थीं।
- ज़्यादातर मामलों में भारतीय वित्तपोषक (फाइनेंसर) पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय से संबंधित फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं।
- यूरोपीय व्यापारियों-उद्योगपतियों के अपने वाणिज्यिक परिसंघ थे जिनमें भारतीय व्यवसायियों को शामिल नहीं किया जाता था।
4.3 मज़दूर कहाँ से आए?
“फ़ैक्ट्रियाँ होंगी तो मज़दूर भी होंगे। फ़ैक्ट्रियों के विस्तार से मज़दूरों की माँग बढ़ने लगी।”
| वर्ष | भारतीय फ़ैक्ट्रियों में मज़दूरों की संख्या |
|---|---|
| 1901 | 5,84,000 |
| 1946 | 24,36,000 |
वे कहाँ से आते थे?
- ज़्यादातर औद्योगिक इलाक़ों में मज़दूर आसपास के ज़िलों से आते थे।
- जिन किसानों-कारीगरों को गाँव में काम नहीं मिलता था वे औद्योगिक केंद्रों की तरफ़ जाने लगते थे।
- 1911 में बंबई के सूती कपड़ा उद्योग में काम करने वाले 50 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर पास के रत्नागिरी ज़िले से आए थे।
- कानपुर की मिलों में काम करने वाले ज़्यादातर कानपुर ज़िले के ही गाँवों से आते थे।
- मिल मज़दूर बीच-बीच में अपने गाँव जाते रहते थे। वे फ़सलों की कटाई व त्योहारों के समय गाँव लौट जाते थे।
- बाद में, जब नए कामों की ख़बर फैली तो दूर-दूर से भी लोग आने लगे। उदाहरण के लिए, संयुक्त प्रांत के लोग बंबई के कपड़ा मिलों और कलकत्ता के जूट मिलों में काम करने के लिए पहुँच रहे थे।
नौकरी पाना मुश्किल था और यहीं जॉबर आता है —
- नौकरी पाना हमेशा मुश्किल था। हालाँकि मिलों की संख्या बढ़ती जा रही थी और मज़दूरों की माँग भी बढ़ रही थी लेकिन रोज़गार चाहने वालों की संख्या रोज़गारों के मुक़ाबले हमेशा ज़्यादा रहती थी। मिलों में प्रवेश भी निषिद्ध था।
- उद्योगपति नए मज़दूरों की भर्ती के लिए प्राय: एक जॉबर रखते थे।
जॉबर कौन था? — यह पक्का याद कीजिए:
| जॉबर की बात | विवरण |
|---|---|
| वह कौन होता था | कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी |
| उसके काम | वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, उन्हें शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था |
| उसकी शक्ति | इस प्रकार जॉबर ताक़तवर और मज़बूत व्यक्ति बन गया था |
| उसकी बुराई | बाद में जॉबर मदद के बदले पैसे व तोहफ़ों की माँग करने लगे और मज़दूरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने लगे |
| दूसरे नाम | इन्हें अलग-अलग इलाक़ों में ‘सरदार’ या ‘मिस्त्री’ आदि भी कहते थे |
और इस भाग का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य — “समय के साथ फ़ैक्ट्री मज़दूरों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन जैसा कि आप देखेंगे, कुल औद्योगिक श्रम शक्ति में उनका अनुपात बहुत छोटा था।”
स्रोत-ङ (बंबई के मिल मज़दूर वसंत पारकर):
“मज़दूर अपने बेटों को मिल में काम पर रखवाने के लिए जॉबर को पैसा देते थे… मिल मज़दूर शारीरिक और भावनात्मक रूप से उसके गाँव से गहरे तौर पर जुड़े होते थे। वह गाँव जाकर फ़सलों की कटाई करता था। कोंकणी लोग धान काटने और घाटी यानी गन्ना काटने गाँव में जाते थे। यह एक स्वीकृत व्यवस्था थी जिसके लिए मिल वाले छुट्टी दे देते थे।”
स्रोत-च (भाई भोसले, बंबई के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, 1930–40 के दशकों की याद):
“उस ज़माने में दस घंटे की शिफ़्ट होती थी। शाम पाँच बजे से सुबह तीन बजे तक काम के सबसे भयानक घंटे। मेरे पिताजी ने 35 साल नौकरी की। उन्हें दमा जैसी बीमारी हो गई और वे काम करने से लाचार हो गए… इसके बाद मेरे पिताजी वापस गाँव चले गए।”
5. औद्योगिक विकास का अनूठापन (पाठ का भाग 5)
5.1 यूरोपीय एजेंसियों की दिलचस्पी किसमें थी?
- भारत में औद्योगिक उत्पादन पर वर्चस्व रखने वाली यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की कुछ ख़ास तरह के उत्पादों में ही दिलचस्पी थी।
- उन्होंने औपनिवेशिक सरकार से सस्ती क़ीमत पर ज़मीन लेकर चाय व कॉफ़ी के बाग़ान लगाए और खनन, नील व जूट व्यवसाय में पैसे का निवेश किया।
- इनमें से ज़्यादातर ऐसे उत्पाद थे जिनकी भारत में बिक्री के लिए नहीं बल्कि मुख्य रूप से निर्यात के लिए आवश्यकता थी।
5.2 भारतीय व्यवसायियों ने मैनचेस्टर से टकराव क्यों नहीं लिया?
“उन्नीसवीं सदी के आख़िर में जब भारतीय व्यवसायी उद्योग लगाने लगे तो उन्होंने भारतीय बाज़ार में मैनचेस्टर की बनी चीज़ों से प्रतिस्पर्धा नहीं की।”
इसका कारण यह था —
- भारत आने वाले ब्रिटिश मालों में धागा बहुत अच्छा नहीं था, इसलिए भारत के शुरुआती सूती मिलों में कपड़े की बजाय मोटे सूती धागे ही बनाए जाते थे।
- जब धागे का आयात किया जाता था तो वह हमेशा बेहतर क़िस्म का होता था।
- भारतीय कताई मिलों में बनने वाले धागे का भारत के हथकरघा बुनकर इस्तेमाल करते थे या उन्हें चीन को निर्यात कर दिया जाता था।
5.3 बीसवीं सदी में क्या बदला — तीन बदलाव
| क्रम | बदलाव |
|---|---|
| 1 | स्वदेशी आंदोलन को गति मिलने से राष्ट्रवादियों ने लोगों को विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। |
| 2 | औद्योगिक समूह अपने सामूहिक हितों की रक्षा के लिए संगठित हो गए और उन्होंने आयात शुल्क बढ़ाने तथा अन्य रियायतें देने के लिए सरकार पर दबाव डाला। |
| 3 | 1906 के बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में भी कमी आने लगी थी। चीनी बाज़ारों में चीन और जापान की मिलों के उत्पाद छा गए थे। फलस्वरूप, भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे। |
आँकड़ा: 1900 से 1912 के भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।
5.4 पहला विश्व युद्ध — भारतीय उद्योगों का असली मौक़ा
यह पाठ्यपुस्तक का ‘चर्चा करें’ प्रश्न 4 है — “पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा?”
पहले की स्थिति: “पहले विश्व युद्ध तक औद्योगिक विकास धीमा रहा।”
युद्ध ने क्या बदला — पाँच बिंदु क्रम से लिखिए:
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | ब्रिटिश कारख़ाने सेना की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे, इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। |
| 2 | भारतीय बाज़ारों को रातोंरात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया। |
| 3 | युद्ध लंबा खिंचा तो भारतीय कारख़ानों में भी फ़ौज के लिए जूट की बोरियाँ, फ़ौजियों के लिए वर्दी के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन तथा बहुत सारे अन्य सामान बनने लगे। |
| 4 | नए कारख़ाने लगाए गए और पुराने कारख़ाने कई पालियों में चलने लगे। |
| 5 | बहुत सारे नए मज़दूरों को काम पर रखा गया और हरेक को पहले से भी ज़्यादा समय तक काम करना पड़ता था। |
निष्कर्ष: युद्ध के दौरान औद्योगिक उत्पादन तेज़ी से बढ़ा।
और युद्ध के बाद —
- युद्ध के बाद भारतीय बाज़ार में मैनचेस्टर को पहले वाली हैसियत कभी हासिल नहीं हो पाई।
- आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जर्मनी व जापान के मुक़ाबले कमज़ोर पड़ जाने के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।
- कपास का उत्पादन बहुत कम रह गया था और ब्रिटेन से होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में ज़बरदस्त गिरावट आई।
- उपनिवेशों में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाज़ारों पर क़ब्ज़ा कर लिया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति मज़बूत बना ली।
5.5 लघु उद्योगों की बहुतायत — यह अध्याय का सबसे अनोखा हिस्सा है
“हालाँकि युद्ध के बाद फ़ैक्ट्री उद्योगों में लगातार इज़ाफ़ा हुआ लेकिन अर्थव्यवस्था में विशाल उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था।”
आँकड़े जो यह सिद्ध करते हैं —
| आँकड़ा | विवरण |
|---|---|
| 1911 | बड़े उद्योगों में से ज़्यादातर — 67 प्रतिशत — बंगाल और बंबई में स्थित थे |
| बाक़ी देश | पूरे देश में छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा रहा |
| 1911 | पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में कुल औद्योगिक श्रम शक्ति का केवल 5 प्रतिशत काम करता था |
| 1931 | यह संख्या बढ़कर 10 प्रतिशत हुई |
| बाक़ी मज़दूर | गली-मोहल्लों में स्थित छोटी-छोटी वर्कशॉप और घरेलू इकाइयों में काम करते थे |
और सबसे चौंकाने वाली बात — हाथ का उत्पादन बढ़ा:
- कुछ मामलों में तो बीसवीं सदी के दौरान हाथ से होने वाले उत्पादन में दरअसल इज़ाफ़ा हुआ था।
- यह बात हथकरघा क्षेत्र के बारे में भी सही है। सस्ते मशीन-निर्मित धागे ने उन्नीसवीं सदी में कताई उद्योग को तो ख़त्म कर दिया था लेकिन तमाम समस्याओं के बावजूद बुनकर अपना व्यवसाय किसी तरह चलाते रहे।
- बीसवीं सदी में हथकरघों पर बने कपड़े के उत्पादन में लगातार सुधार हुआ। 1900 से 1940 के बीच यह तीन गुना हो चुका था।
5.6 ऐसा कैसे हुआ? — तीन कारण
पहला कारण — तकनीकी बदलाव, विशेषकर फ़्लाई शटल।
- अगर लागत में बहुत ज़्यादा इज़ाफ़ा न हो और उत्पादन बढ़ सकता हो तो हाथ से काम करने वालों को नयी तकनीक अपनाने में कोई परेशानी नहीं होती।
- इसलिए, बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते हम ऐसे बुनकरों को देखते हैं जो फ़्लाई शटल वाले करघों का इस्तेमाल करते हैं।
- इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग में कमी आई।
फ़्लाई शटल क्या है? — “यह रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला एक यांत्रिक औज़ार है जिसका बुनाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह क्षैतिज धागे (ताना–the weft) को लम्बवत् धागे (बाना–the warp) में पिरो देती है। फ़्लाई शटल के आविष्कार से बुनकरों को बड़े करघे चलाना और चौड़े अरज का कपड़ा बनाने में काफ़ी मदद मिली।”
आँकड़े:
| क्षेत्र | फ़्लाई शटल वाले हथकरघों का प्रतिशत (1941) |
|---|---|
| पूरा भारत | 35 प्रतिशत से ज़्यादा |
| त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन, बंगाल | 70 से 80 प्रतिशत तक |
दूसरा कारण — कुछ बुनकर मिलों से बेहतर स्थिति में थे।
- बुनकरों में से कुछ मोटा कपड़ा बनाते थे जबकि कुछ महीन क़िस्म के कपड़े बुनते थे।
- मोटे कपड़े को मुख्य रूप से ग़रीब ही ख़रीदते थे और उसकी माँग में भारी उतार-चढ़ाव आते थे। ख़राब फ़सल और अकाल के समय जब ग्रामीण ग़रीबों के पास खाने को कुछ नहीं होता था और नक़द आय के साधन ख़त्म हो जाते थे तो वे कपड़ा नहीं ख़रीद सकते थे।
- बेहतर क़िस्म के कपड़े की माँग खाते-पीते तबक़े में ज़्यादा थी। उसमें उतार-चढ़ाव कम आते थे। जब ग़रीब भूखों मर रहे होते थे तब भी अमीर यह कपड़ा ख़रीद सकते थे।
- अकालों से बनारसी या बालूचरी साड़ियों की बिक्री पर असर नहीं पड़ता था।
तीसरा कारण — मिलें कुछ चीज़ें बना ही नहीं सकती थीं।
- मिल विशेष प्रकार की बुनाई की नक़ल नहीं कर सकते थे।
- बुने हुए बॉर्डर वाली साड़ियों या मद्रास की प्रसिद्ध लुंगियों की जगह ले लेना मिलों के लिए आसान नहीं था।
यही चित्र 23 का विवरण भी कहता है — “हाथ से बुने कपड़े के महीन डिज़ाइन की मिलों में नक़ल नहीं की जा सकती थी।”
5.7 पर बुनकर की ज़िंदगी आसान नहीं थी — यह अंत ज़रूर लिखिए
पाठ्यपुस्तक इस भाग का अंत एक बहुत ईमानदार वाक्य से करती है —
“ऐसा भी नहीं है कि बीसवीं सदी में भी उत्पादन बढ़ाते जा रहे बुनकरों व अन्य दस्तकारों को हमेशा फ़ायदा ही हो रहा था। उनकी ज़िंदगी बहुत कठोर थी। उन्हें दिन-रात काम करना पड़ता था। अकसर पूरा परिवार — बच्चे, बूढ़े, औरतें — उत्पादन के किसी न किसी काम में हाथ बढ़ाता था।”
और फिर एक बहुत महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष —
“लेकिन ये फ़ैक्ट्रियों के युग में अतीत के अवशेष भर नहीं थे। उनका जीवन और श्रम औद्योगीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग थे।”
6. वस्तुओं के लिए बाज़ार (पाठ का भाग 6)
6.1 नए उपभोक्ता कैसे बनाए गए?
“जब नयी चीज़ें बनती हैं तो लोगों को उन्हें ख़रीदने के लिए प्रेरित भी करना पड़ता है। लोगों को लगना चाहिए कि उन्हें उस उत्पाद की ज़रूरत है। इसके लिए क्या किया गया?”
उत्तर — विज्ञापन।
- नए उपभोक्ता पैदा करने का एक तरीक़ा विज्ञापनों का है।
- विज्ञापन विभिन्न उत्पादों को ज़रूरी और वांछनीय बना देते हैं।
- वे लोगों की सोच बदल देते हैं और नयी ज़रूरतें पैदा कर देते हैं।
- आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं जहाँ चारों तरफ़ विज्ञापन छाए हुए हैं — अख़बारों, पत्रिकाओं, होर्डिंग्स, दीवारों, टेलीविज़न के परदे पर, सब जगह।
- लेकिन अगर हम इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो पता चलता है कि औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभिन्न उत्पादों के बाज़ार को फैलाने में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में अपनी भूमिका निभाई है।
6.2 लेबल की कहानी
“जब मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने भारत में कपड़ा बेचना शुरू किया तो वे कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाते थे।”
लेबल के तीन फ़ायदे —
- लेबल का फ़ायदा यह होता था कि ख़रीदारों को कंपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चल जाती थी।
- लेबल ही चीज़ों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था।
- जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में ‘मेड इन मैनचेस्टर’ लिखा दिखाई देता तो ख़रीदारों को कपड़ा ख़रीदने में किसी तरह का डर नहीं रहता था।
पर लेबल पर केवल शब्द नहीं होते थे —
- लेबलों पर सिर्फ़ शब्द और अक्षर ही नहीं होते थे। उन पर तसवीरें भी बनी होती थीं जो अकसर बहुत सुंदर होती थीं।
- अगर हम पुराने लेबलों को देखें तो उनके निर्माताओं की सोच, उनके हिसाब-किताब और लोगों को आकर्षित करने के उनके तरीक़ों का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
6.3 देवी-देवताओं का इस्तेमाल — यह हिस्सा परीक्षा में पूछा जाता है
- इन लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की तसवीरें प्राय: होती थीं।
- देवी-देवताओं की तसवीर के बहाने निर्माता यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उस चीज़ को ख़रीदें।
- कृष्ण या सरस्वती की तसवीरों का फ़ायदा ये होता था कि विदेशों में बनी चीज़ भी भारतीयों को जानी-पहचानी सी लगती थी।
चित्रों के उदाहरण जो पाठ्यपुस्तक में दिए गए हैं —
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| चित्र 25 | ग्राइपवॉटर का कैलेंडर, एम.वी. धुरंधर का चित्र, 1928 — बच्चों की चीज़ों का प्रचार करने के लिए बाल कृष्ण की छवि का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता था |
| चित्र 26 (क) | मैनचेस्टर के लेबल, बीसवीं सदी का प्रारंभ — आयातित कपड़ों के लेबलों पर असंख्य भारतीय देवी-देवताओं (कार्तिक, लक्ष्मी, सरस्वती) को चित्रित किया जाता था जो संबंधित वस्तु की गुणवत्ता को दर्शाने का प्रयास था |
| चित्र 26 (ख) | मैनचेस्टर के लेबल पर महाराजा रणजीत सिंह का चित्र — उत्पाद के प्रति सम्मान पैदा करने हेतु ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का इस्तेमाल किया जा रहा था |
| चित्र 27 | सनलाइट साबुन का कैलेंडर, 1934 — यहाँ भगवान विष्णु आसमान से रोशनी लाते दिखाए गए हैं |
| चित्र 28 | एक भारतीय मिल में बने कपड़े का लेबल — इसमें एक देवी अहमदाबाद के मिल में बना कपड़ा दान कर रही हैं और लोगों से भारत में बने कपड़े के इस्तेमाल का आह्वान कर रही हैं |
6.4 कैलेंडर की भूमिका — बहुत महत्त्वपूर्ण तर्क
“उन्नीसवीं सदी के आख़िर में निर्माता अपने उत्पादों को बेचने के लिए कैलेंडर छपवाने लगे थे।”
कैलेंडर विज्ञापन से बेहतर क्यों था?
- अख़बारों और पत्रिकाओं को तो पढ़े-लिखे लोग ही समझ सकते थे लेकिन कैलेंडर उनको भी समझ में आ जाते थे जो पढ़ नहीं सकते थे।
- चाय की दुकानों, दफ़्तरों व मध्यवर्गीय घरों में ये कैलेंडर लटकते रहते थे।
- जो इन कैलेंडरों को लगाते थे वे विज्ञापन को भी हर रोज़, पूरे साल देखते थे।
- इन कैलेंडरों में भी नए उत्पादों को बेचने के लिए देवताओं की तसवीर होती थी।
महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का इस्तेमाल —
- देवताओं की तसवीरों की तरह महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों व नवाबों की तसवीरें भी विज्ञापनों व कैलेंडरों में ख़ूब इस्तेमाल होती थीं।
- इनका संदेश अकसर यह होता था: अगर आप इस शाही व्यक्ति का सम्मान करते हैं तो इस उत्पाद का भी सम्मान कीजिए; अगर इस उत्पाद को राजा इस्तेमाल करते हैं या उसे शाही निर्देश से बनाया गया है तो उसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता।
6.5 और भारतीय विज्ञापन — स्वदेशी का संदेश
“जब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था।”
- इनका आशय यह था कि अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो उन चीज़ों को ख़रीदिए जिन्हें भारतीयों ने बनाया है।
- ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे।
यहाँ अध्याय 2 से जोड़ बनता है — असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार हुआ था। ये विज्ञापन उसी आंदोलन का व्यावसायिक चेहरा थे।
7. निष्कर्ष (पाठ का अंतिम भाग)
पाठ्यपुस्तक का निष्कर्ष बहुत छोटा है, पर उसमें पूरा अध्याय भरा हुआ है —
“ज़ाहिर है कि उद्योगों के युग में बड़े-बड़े प्रौद्योगिकीय बदलाव आए हैं, फ़ैक्ट्रियों का उदय हुआ है और नयी औद्योगिक श्रमशक्ति अस्तित्व में आई है। लेकिन जैसा कि आपने देखा है, इस युग में हाथ से बनने वाली चीज़ें और छोटे पैमाने का उत्पादन भी औद्योगिक भूदृश्य का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है।”
और फिर पाठ्यपुस्तक आपको वापस पहले पन्ने पर ले जाती है —
“चित्र 1 और 2 को दोबारा देखिए। अब बताइए कि ये छवियाँ क्या दर्शाती हैं।”
इसका उत्तर यह है — ये छवियाँ औद्योगीकरण की केवल एक तरफ़ दिखाती हैं — चमकती मशीनें, ऊँची इमारतें और तेज़ प्रगति। ये यह नहीं दिखातीं कि उसी समय भारत के बुनकर बरबाद हो रहे थे, ब्रिटेन में मज़दूर मशीनों पर हमला कर रहे थे और लाखों लोग गली-मोहल्लों की छोटी वर्कशॉप्स में दिन-रात काम कर रहे थे।
8. पूरे अध्याय की एक तालिका
| पक्ष | ब्रिटेन में | भारत में |
|---|---|---|
| कारख़ानों से पहले | आदि-औद्योगीकरण; सौदागर गाँवों में उत्पादन करवाते थे | बुनकर घरों में महीन कपड़ा बनाते थे; सौदागर पेशगी देते थे |
| कारख़ाने कब आए | 1730 के दशक में पहले कारख़ाने; अठारहवीं सदी के आख़िर में तेज़ी | 1854 में बंबई में पहली कपड़ा मिल |
| मुख्य उद्योग | पहले कपास, फिर 1840 के दशक के बाद लोहा और स्टील | कपड़ा और जूट |
| मज़दूर कहाँ से | ग़रीब किसान और बेकार लोग गाँवों से शहर आते थे | आसपास के ज़िलों से; बंबई में 50% से ज़्यादा रत्नागिरी से |
| भर्ती कौन करता था | यारी-दोस्ती और जान-पहचान से | जॉबर (सरदार / मिस्त्री) |
| मशीन बनाम हाथ | उद्योगपति हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे क्योंकि मज़दूर सस्ते थे | हथकरघा उत्पादन 1900 से 1940 के बीच तीन गुना हो गया |
| सबसे बड़ा मोड़ | 1840 के दशक में रेलवे | पहला विश्व युद्ध |
9. अभ्यास प्रश्नों के संकेत (पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 102)
संक्षेप में लिखें —
1. निम्नलिखित की व्याख्या करें:
- (क) ब्रिटेन की महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमले किए। → भाग 2.3 देखिए
- (ख) सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में किसानों और कारीगरों से काम करवाने लगे। → भाग 1.2 देखिए
- (ग) सूरत बंदरगाह अठारहवीं सदी के अंत तक हाशिये पर पहुँच गया था। → भाग 3.2 देखिए
- (घ) ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्तों को नियुक्त किया था। → भाग 3.3 देखिए
2. प्रत्येक वक्तव्य के आगे ‘सही’ या ‘ग़लत’ लिखें —
| वक्तव्य | उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| (क) उन्नीसवीं सदी के आख़िर में यूरोप की कुल श्रम शक्ति का 80 प्रतिशत तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम कर रहा था | ग़लत | यह संख्या 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं थी |
| (ख) अठारहवीं सदी तक महीन कपड़े के अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार पर भारत का दबदबा था | सही | मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का ही दबदबा रहता था |
| (ग) अमेरिकी गृहयुद्ध के फलस्वरूप भारत के कपास निर्यात में कमी आई | ग़लत | कमी नहीं, वृद्धि आई — अमेरिका से आमद बंद होने पर ब्रिटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा |
| (घ) फ़्लाई शटल के आने से हथकरघा कामगारों की उत्पादकता में सुधार हुआ | सही | इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग में कमी आई |
3. पूर्व-औद्योगीकरण का मतलब बताएँ। → भाग 1.1 देखिए
चर्चा करें —
- उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे? → भाग 2.1 की पूरी तालिका
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी कपड़े की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए क्या किया? → भाग 3.3 के दोनों चरण
- ब्रिटेन तथा भारत में कपास के इतिहास पर विश्वकोश के लिए लेख। → 08-PARAKH फ़ाइल में इसका पूरा ढाँचा दिया गया है
- पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा? → भाग 5.4 के पाँच बिंदु
10. महत्त्वपूर्ण व्यक्ति — एक नज़र में
| नाम | पहचान |
|---|---|
| रिचर्ड आर्कराइट | इन्होंने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी |
| न्यूकोमेन | भाप के पहले इंजन के निर्माता, जिसमें बाद में जेम्स वॉट ने सुधार किए |
| जेम्स वॉट | न्यूकोमेन के भाप के इंजन में सुधार करके नए इंजन का पेटेंट कराया |
| मैथ्यू बूल्टन | जेम्स वॉट के दोस्त उद्योगपति, जिन्होंने इस मॉडल का उत्पादन किया |
| जेम्स हरग्रीव्ज़ | 1764 में स्पिनिंग जेनी बनाई |
| हेनरी पतुलो | ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सर, जिन्होंने 1772 में कहा था कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती |
| द्वारकानाथ टैगोर | बंगाल के उद्यमी; चीन के व्यापार से कमाकर 1830–1840 के दशकों में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं; मानते थे कि भारत पश्चिमीकरण और औद्योगीकरण के रास्ते पर चलकर ही विकास कर सकता है |
| जमशेदजी जीजीभोय | एक पारसी बुनकर के बेटे; चीन के साथ व्यापार और जहाज़रानी का काम किया; उनके पास जहाज़ों का एक विशाल बेड़ा था |
| डिनशॉ पेटिट | बंबई के पारसी उद्यमी |
| जमशेदजी नुसरवानजी टाटा | आगे चलकर देश में विशाल औद्योगिक साम्राज्य स्थापित करने वाले; उनके पुत्र जे.एन. टाटा ने 1912 में जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित किया |
| सेठ हुकुमचंद | मारवाड़ी व्यवसायी; 1917 में कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाई |
| जी.डी. बिड़ला | प्रसिद्ध उद्योगपति; उनके पिता और दादा ने भी चीन के साथ व्यापार किया था |
11. कठिन शब्द और उनके अर्थ (शब्दावली)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आदि (proto) | किसी चीज़ की पहली या प्रारंभिक अवस्था का संकेत |
| आदि-औद्योगीकरण | कारख़ानों की स्थापना से पहले का वह चरण जिसमें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन घरों में होता था |
| गिल्ड | उत्पादकों का संगठन, जो कारीगरों को प्रशिक्षण देता था, उत्पादन पर नियंत्रण रखता था, क़ीमतें तय करता था और नए लोगों को व्यवसाय में आने से रोकता था |
| कॉटेजर | छोटे किसान, जो साझा ज़मीनों से लकड़ी, बेरियाँ, सब्ज़ियाँ, भूसा और चारा बीनकर काम चलाते थे |
| स्टेप्लर (Stapler) | ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को ‘स्टेपल’ करता है या छाँटता है |
| फ़ुलर (Fuller) | ऐसा व्यक्ति जो ‘फुल’ करता है यानी चुनटों के सहारे कपड़े को समेटता है |
| कार्डिंग | वह प्रक्रिया जिसमें कपास या ऊन आदि रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है |
| स्पिनिंग जेनी | जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा 1764 में बनाई गई मशीन, जिसने कताई की प्रक्रिया तेज़ कर दी और मज़दूरों की माँग घटा दी |
| फ़्लाई शटल | रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला यांत्रिक औज़ार, जो क्षैतिज धागे (ताना) को लम्बवत् धागे (बाना) में पिरो देता है |
| प्राच्य (Orient) | भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित देश; आमतौर पर यह शब्द एशिया के लिए इस्तेमाल किया जाता है |
| गुमाश्ता | कंपनी का वेतनभोगी कर्मचारी, जो बुनकरों पर निगरानी रखता था, माल इकट्ठा करता था और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचता था |
| जॉबर | पुराना और विश्वस्त कर्मचारी, जो नए मज़दूरों की भर्ती करता था; इसे ‘सरदार’ या ‘मिस्त्री’ भी कहते थे |
| इज़ारेदारी (एकाधिकार) | किसी वस्तु के उत्पादन या व्यापार पर किसी एक का पूरा अधिकार |
| पेशगी | काम शुरू करने से पहले दी जाने वाली अग्रिम रक़म |
| प्रबंधकीय एजेंसी | वह यूरोपीय कंपनी जो पूँजी जुटाती थी, संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाती थी और उनका प्रबंधन सँभालती थी |
| कोष्टी | मध्य भारत का बुनकर समुदाय (स्रोत-घ में उल्लिखित) |
| करघा | कपड़ा बुनने का यंत्र |
| तकली | कताई में इस्तेमाल होने वाली छड़ी, जिस पर धागा लिपटता है |
| वर्कशॉप | छोटी उत्पादन इकाई, जो कारख़ाने से बहुत छोटी होती है |
12. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ और आँकड़े — एक नज़र में
तिथियाँ
| वर्ष / काल | घटना |
|---|---|
| सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी | यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरफ़ रुख़ करने लगे (आदि-औद्योगीकरण) |
| 1730 का दशक | इंग्लैंड में सबसे पहले कारख़ाने खुले |
| 1764 | जेम्स हरग्रीव्ज़ ने स्पिनिंग जेनी बनाई |
| 1772 | हेनरी पतुलो ने कहा कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती |
| 1790 | एक मजिस्ट्रेट ने स्पिनिंग इंजन पर मज़दूरों के हमले की रिपोर्ट दी (स्रोत-ख) |
| 1830–1840 के दशक | द्वारकानाथ टैगोर ने 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं |
| 1830 का दशक | आर्थिक मंदी; बेरोज़गारी 35 से 75 प्रतिशत तक |
| 1840 का दशक | कपास उद्योग सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था; इंग्लैंड में रेलवे का विस्तार शुरू; शहरों में निर्माण गतिविधियाँ तेज़ |
| 1850 का दशक से | लंदन में रेलवे स्टेशन बनने लगे |
| 1854 | बंबई में पहली कपड़ा मिल लगी |
| 1855 | बंगाल में देश की पहली जूट मिल |
| 1860 का दशक | उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार; कानपुर में एल्गिन मिल; अमेरिकी गृहयुद्ध से कच्ची कपास की क़ीमत बढ़ी |
| 1862 | बंबई में चार मिलें (94,000 तकलियाँ, 2,150 करघे); दूसरी जूट मिल |
| 1873 | ब्रिटेन के लोहा-स्टील निर्यात का मूल्य लगभग 7.7 करोड़ पौंड |
| 1874 | मद्रास में पहली कताई और बुनाई मिल |
| 1906 के बाद | चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में कमी |
| 1912 | जे.एन. टाटा ने जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित किया |
| 1917 | सेठ हुकुमचंद ने कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाई |
| पहला विश्व युद्ध | भारतीय औद्योगिक उत्पादन में तेज़ी |
आँकड़े
| आँकड़ा | किसका |
|---|---|
| 20–25 मज़दूर | आदि-औद्योगिक व्यवस्था में एक सौदागर हर चरण में इतने मज़दूरों से काम करवाता था |
| 25 लाख → 220 लाख पौंड | ब्रिटेन का कच्चे कपास का आयात (1760 → 1787) |
| 7.7 करोड़ पौंड | 1873 में ब्रिटेन का लोहा-स्टील निर्यात (कपास निर्यात से दोगुना) |
| 20 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं | उन्नीसवीं सदी के आख़िर में उन्नत औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूर |
| 500 और 45 | उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटेन में बनने वाले हथौड़ों और कुल्हाड़ियों के प्रकार |
| 321 इंजन | उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के इंजन (80 सूती, 9 ऊन, बाक़ी खनन-नहर-लोहा) |
| लगभग 10 प्रतिशत | उन्नीसवीं सदी के मध्य में निहायत ग़रीब शहरी आबादी |
| 35 से 75 प्रतिशत | 1830 के दशक की मंदी में बेरोज़गारी |
| 1.6 करोड़ → 30 लाख रुपये | सूरत बंदरगाह का व्यापार (सत्रहवीं सदी के आख़िर → 1740 का दशक) |
| 33% → 3% | भारत के निर्यात में सूती माल का हिस्सा (1811-12 → 1850-51) |
| 31% → 50% से ऊपर | भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा (1850 → 1870) |
| 94,000 तकलियाँ, 2,150 करघे | 1862 में बंबई की चार मिलों में |
| 5,84,000 → 24,36,000 | भारतीय फ़ैक्ट्रियों में मज़दूर (1901 → 1946) |
| 50 प्रतिशत से ज़्यादा | 1911 में बंबई के सूती मज़दूर जो रत्नागिरी ज़िले से आए थे |
| 67 प्रतिशत | 1911 में बंगाल और बंबई में स्थित बड़े उद्योग |
| 5% → 10% | पंजीकृत फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाली औद्योगिक श्रम शक्ति (1911 → 1931) |
| दोगुना | 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन |
| तीन गुना | 1900 से 1940 के बीच हथकरघों पर बने कपड़े का उत्पादन |
| 35 प्रतिशत से ज़्यादा | 1941 में फ़्लाई शटल वाले भारतीय हथकरघे (त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन, बंगाल में 70–80%) |