ये प्रश्न रटने से हल नहीं होते। इनमें आपको सोचना, तुलना करना, दूसरों की जगह ख़ुद को रखकर देखना और कुछ नया बनाना पड़ता है। PARAKH (राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र) इसी तरह के प्रश्न पूछता है।
तीन आयाम —
| आयाम | क्या जाँचा जाता है | भार |
|---|---|---|
| जागरूकता | तथ्य को समझकर नयी स्थिति में लगाना | 50% |
| संवेदनशीलता | दूसरों के नज़रिये और भावनाओं को समझना | 20% |
| सृजनात्मकता | कल्पना, नयी रचना और ‘यदि…तो’ सोच | 30% |
उत्तर देखिए
उत्तर लिखने का तरीक़ा: इन प्रश्नों में ‘सही उत्तर’ एक नहीं होता। जो भी लिखें, उसके साथ कारण ज़रूर लिखें। जिस उत्तर में कारण है, उसे पूरे अंक मिलते हैं — चाहे वह किसी भी पक्ष में हो।
भाग क — जागरूकता (50%)
1केस-आधारित 4 अंक
नीचे दी गई स्थिति पढ़िए —
रामपुर गाँव में एक नयी लाइब्रेरी खुली है। पहले महीने में यह पता चला कि गाँव के 40 लोग वहाँ आए, पर उनमें से केवल 12 ने ही किताब पढ़ी। बाक़ी 28 लोग वहाँ इसलिए आते थे क्योंकि लाइब्रेरी में हर शाम एक व्यक्ति ऊँची आवाज़ में अख़बार पढ़कर सुनाता था।
(क) इस स्थिति की तुलना अठारहवीं सदी के यूरोप की उस स्थिति से कीजिए जिसका वर्णन पाठ्यपुस्तक करती है। (2 अंक)
(ख) क्या आप कहेंगे कि जिन 28 लोगों ने किताब नहीं पढ़ी, वे ‘पाठक’ नहीं थे? कारण सहित लिखिए। (2 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) यह ठीक वही स्थिति है जो पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 111 पर बताती है। यूरोप में भी साक्षरता सीमित थी, इसलिए मुद्रकों ने सचित्र किताबें छापीं जिन्हें ग्रामीण सभाओं और शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था। इस तरह मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाख़िल हुई।
- (ख) दोनों तरफ़ के तर्क स्वीकार्य हैं। पर सबसे अच्छा उत्तर वही है जो पाठ्यपुस्तक की पंक्ति का इस्तेमाल करे — “मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की विभाजक रेखा धुँधली पड़ गई। श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।”
2दावा-कारण 4 अंक
नीचे दावा (A) और कारण (R) दिए गए हैं। हर जोड़े के लिए बताइए कि (i) दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है, (ii) दोनों सही हैं पर R, A की व्याख्या नहीं है, (iii) A सही है पर R ग़लत, या (iv) A ग़लत है पर R सही। साथ में एक वाक्य में कारण भी लिखिए।
| # | दावा (A) | कारण (R) |
|---|---|---|
| 1 | चीनी राजतंत्र लंबे समय तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक था। | चीन की विशालकाय नौकरशाही सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त होती थी, जिसके लिए बड़ी तादाद में किताबें चाहिए थीं। |
| 2 | रोमन कैथलिक चर्च ने 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू की। | चर्च के पास छापेख़ाने नहीं थे। |
| 3 | गुटेन्बर्ग की बाइबिल की कोई दो प्रतियाँ एक जैसी नहीं थीं। | उन्हें अलग-अलग प्रेसों पर छापा गया था। |
| 4 | 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लाया गया। | भाषाई समाचार पत्र राष्ट्रवाद के समर्थन में मुखर होते जा रहे थे। |
उत्तर देखिए
- 1 → (i)। यही पाठ्यपुस्तक का दिया हुआ कारण है।
- 2 → (iii)। दावा सही है, पर कारण ग़लत है। असली कारण यह था कि छपी किताबों से मेनोकियो जैसे साधारण लोग धर्मग्रंथ की अपनी व्याख्या करने लगे थे, जिससे चर्च की सत्ता को ख़तरा हुआ।
- 3 → (iii)। दावा सही है, पर कारण ग़लत है। असली कारण यह था कि हाशिए पर कलाकारों ने हाथ से टीकाकारी और चित्रकारी की थी।
- 4 → (i)। यही पाठ्यपुस्तक का कारण है।
3डेटा-व्याख्या 4 अंक
नीचे यूरोप में छपी किताबों की संख्या दी गई है —
| काल | बाज़ार में आईं किताबें |
|---|---|
| पंद्रहवीं सदी का दूसरा हिस्सा | 2 करोड़ |
| सोलहवीं सदी | 20 करोड़ |
(क) एक सदी में यह संख्या कितने गुना बढ़ी? (1 अंक)
(ख) इस वृद्धि के दो कारण बताइए। (2 अंक)
(ग) इस वृद्धि का सबसे बड़ा सामाजिक परिणाम क्या था — केवल एक वाक्य में। (1 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) दस गुना।
- (ख) (i) गुटेन्बर्ग की मूवेबल टाइप प्रेस से छपाई तेज़ और सस्ती हो गई — एक घंटे में 250 पन्ने। (ii) 1450 से 1550 के बीच यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने खुल गए, क्योंकि जर्मनी के मुद्रक दूसरे देशों में जाकर छापेख़ाने खुलवाते थे।
- (ग) एक नया और बहुत बड़ा पाठक वर्ग पैदा हुआ, जिससे लोगों का सूचना, ज्ञान और सत्ता से रिश्ता ही बदल गया।
4वर्गीकरण 4 अंक
नीचे दस बातें दी गई हैं। इन्हें तीन ख़ानों में बाँटिए — (अ) छपाई के पक्ष में, (ब) छपाई के डर में, (स) छपाई पर नियंत्रण के लिए उठाया गया क़दम।
- “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है।”
- इन्क्वीज़ीशन की स्थापना
- “किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं।”
- 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची
- “छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है।”
- 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट
- ‘द मैकॉबर डान्स’ नामक तसवीर
- बेगम रोकैया का 1926 का भाषण
- 1942 में 90 अख़बारों का दमन
- यह चिंता कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं
उत्तर देखिए
- (अ) पक्ष में — 1, 5, 8
- (ब) डर — 3, 7, 10
- (स) नियंत्रण का क़दम — 2, 4, 6, 9
इस प्रश्न के बाद यह पूछिए“(ब) और (स) में क्या फ़र्क़ है?” उत्तर: (ब) सिर्फ़ एक राय है, (स) एक कार्रवाई है। डर तब ख़तरनाक बनता है जब उसके पास सत्ता आ जाती है।
5तुलना 4 अंक
नीचे दो कथन दिए गए हैं —
कथन 1 (यूरोप, 16वीं सदी): “मेनोकियो नामक किसान को किताबें पढ़कर अपने विचार बनाने के कारण मौत की सज़ा दी गई।” कथन 2 (भारत, 19वीं सदी): “उत्तर भारत के एक दक़ियानूसी मुसलमान परिवार की एक लड़की ने गुपचुप ढंग से न सिर्फ़ पढ़ना सीखा, बल्कि लिखा भी।”
(क) इन दोनों में एक बात समान है — वह क्या है? (2 अंक)
(ख) और एक बात अलग है — वह क्या है? (2 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) दोनों में एक साधारण व्यक्ति ने अपने लिए पढ़ने का अधिकार लिया, और दोनों जगह सत्ता ने उसे रोकना चाहा। दोनों जगह छपे हुए शब्द ने किसी को अपनी सोच बनाने की ताक़त दी।
- (ख) मेनोकियो को इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ी; भारत की उस लड़की ने चुपचाप जीतकर दिखाया। यानी एक जगह सत्ता ने हिंसा से जवाब दिया, दूसरी जगह परिवार का दबाव था जिसे चुपचाप पार किया जा सका।
6मानचित्र-सोच (बिना मानचित्र के) 4 अंक
पाठ्यपुस्तक बताती है कि भारत में छपाई पहले गोवा, कोचीन, कलकत्ता, लखनऊ, बंबई और मद्रास जैसे शहरों में पहुँची।
(क) इन शहरों में एक भौगोलिक समानता क्या है? (2 अंक)
(ख) इससे आप छपाई के भारत में फैलने के बारे में क्या निष्कर्ष निकालेंगे? (2 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) इनमें से ज़्यादातर बंदरगाह-शहर या समुद्र के पास के शहर हैं (गोवा, कोचीन, कलकत्ता, बंबई, मद्रास); लखनऊ अपवाद है, जो बाद में लिथोग्राफ़ी का केंद्र बना।
- (ख) छपाई भारत में बाहर से आई, इसलिए वह पहले उन जगहों पर पहुँची जहाँ जहाज़ आते थे। भीतरी इलाक़ों में वह देर से पहुँची — जैसे राजस्थान में पहला हिंदी दैनिक 1889 में आया, जबकि बंगाल में संवाद कौमुदी 1821 में ही निकल चुका था।
7कारण-परिणाम शृंखला 4 अंक
नीचे की शृंखला में तीन कड़ियाँ ग़ायब हैं। उन्हें भरिए —
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | चीन में सिविल सेवा परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी। |
| 2 | __________ |
| 3 | सत्रहवीं सदी में शहरी संस्कृति फली-फूली। |
| 4 | __________ |
| 5 | पढ़ना एक शग़ल भी बन गया। |
| 6 | __________ |
उत्तर देखिए
- 2 — इसलिए छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गई।
- 4 — इसलिए मुद्रित सामग्री के उपभोक्ता सिर्फ़ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे; व्यापारी भी कारोबार की जानकारी के लिए उसे पढ़ने लगे।
- 6 — इसलिए काल्पनिक क़िस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ और रूमानी नाटक छपने लगे, और अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना तथा छापना शुरू किया।
8स्रोत-व्याख्या 4 अंक
नीचे इरैस्मस के शब्द दिए गए हैं —
“(मुद्रक) दुनिया को सिर्फ़ तुच्छ चीज़ों से ही नहीं पाट रहे, बल्कि बकवास, बेवकूफ़, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी, अज्ञानी, और षड्यंत्रकारी किताबें छापते हैं, और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।”
(क) इरैस्मस के अनुसार समस्या ‘किताबों का होना’ है या ‘किताबों का बहुत ज़्यादा होना’? (1 अंक)
(ख) इस तर्क में एक कमज़ोरी बताइए। (2 अंक)
(ग) आज की दुनिया में इस तरह का तर्क कहाँ सुनाई देता है? (1 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) किताबों का बहुत ज़्यादा होना। इरैस्मस ख़ुद मानते हैं कि “जहाँ-तहाँ, एकाध जानने लायक चीज़ें भी बताएँ” — यानी उन्हें सारी किताबों से आपत्ति नहीं है।
- (ख) यह तर्क यह मान लेता है कि ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ साहित्य तय करने का हक़ किसी एक वर्ग के पास है। साथ ही, जो किताबें इरैस्मस को ‘तुच्छ’ लगती थीं, वही किताबें आम लोगों को पहली बार पढ़ने का मौक़ा दे रही थीं।
- (ग) आज सोशल मीडिया और इंटरनेट पर सूचना की अधिकता को लेकर बिलकुल यही तर्क दिया जाता है।
भाग ख — संवेदनशीलता (20%)
9दृष्टिकोण-विविधता 4 अंक
सन् 1876 है। राससुन्दरी देबी की आत्मकथा आमार जीबोन अभी-अभी छपी है। नीचे तीन लोग हैं। हर एक की तरफ़ से दो-दो वाक्य लिखिए —
| व्यक्ति | उसकी प्रतिक्रिया |
|---|---|
| राससुन्दरी देबी स्वयं | |
| उनके परिवार का एक रूढ़िवादी बुज़ुर्ग | |
| कलकत्ता की एक और स्त्री, जो पढ़ना चाहती है |
उत्तर देखिए
- राससुन्दरी: वर्षों तक रसोई में छिपकर सीखने के बाद अपनी बात छपे हुए अक्षरों में देखने का अनुभव — गर्व, राहत, और शायद डर भी।
- बुज़ुर्ग: चिंता कि परिवार की बात बाहर चली गई; यह मान्यता कि पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं।
- दूसरी स्त्री: उम्मीद कि “अगर वह कर सकीं तो मैं भी कर सकती हूँ” — यही तो छपाई की असली ताक़त है।
मूल्यांकन-नियमतीनों में सबसे ज़्यादा अंक उस उत्तर को दीजिए जो बुज़ुर्ग को भी ‘बुरा आदमी’ न बनाकर उसका डर समझाए। इतिहास में लोग बुरे नहीं होते, उनके कारण होते हैं।
10नैतिक विवेक 4 अंक
मेनोकियो को किताबें पढ़कर अपने विचार बनाने के कारण मौत की सज़ा दी गई।
(क) चर्च ने अपने बचाव में क्या तर्क दिया होगा? दो वाक्यों में लिखिए। (2 अंक)
(ख) क्या किसी भी परिस्थिति में किसी को उसके विचारों के लिए सज़ा देना उचित हो सकता है? अपना पक्ष कारण सहित लिखिए। (2 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) चर्च का तर्क यह होता कि लोगों की आस्था और विश्वास पर सिर्फ़ उसका अधिकार है और उसकी बात ही अंतिम है (पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 113); उसे लगता था कि ग़लत व्याख्या से समाज में अराजकता फैलेगी।
- (ख) कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं है। पर उत्तर में यह ज़रूर आना चाहिए कि आज भारत का संविधान अनुच्छेद 19 में सबको विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, और गांधी ने भी 1922 में इसी को स्वराज की पहली लड़ाई कहा था।
11समावेशिता 4 अंक
पाठ्यपुस्तक कहती है कि छपाई से महिलाओं को आवाज़ मिली, पर साथ ही स्त्री धर्म विचार जैसी किताबें भी छपीं जो उन्हें ‘आज्ञाकारी बीवी’ बनना सिखाती थीं।
(क) एक ही तकनीक ने दो उलटे काम कैसे किए? (2 अंक)
(ख) आज मोबाइल और इंटरनेट के साथ भी क्या ऐसा ही होता है? एक उदाहरण देकर समझाइए। (2 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) क्योंकि तकनीक अपने आप में न अच्छी होती है न बुरी — यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कौन इस्तेमाल कर रहा है और किस उद्देश्य से। छपाई मशीन राससुन्दरी देबी के हाथ में भी थी और राम चड्ढा के हाथ में भी।
- (ख) कोई भी उचित उदाहरण स्वीकार्य है — जैसे इंटरनेट से लड़कियों को पढ़ाई की सुविधा भी मिलती है, और वहीं से उन्हें रोकने वाली बातें भी फैलती हैं।
12सहयोगात्मक बहस 4 अंक
कक्षा को दो दलों में बाँटिए और यह विषय दीजिए —
“नयी तकनीक से डरना हमेशा ग़लत होता है।”
दल अ — पक्ष में। दल ब — विपक्ष में।
हर दल को अध्याय से कम से कम दो प्रमाण देने होंगे।
उत्तर देखिए
| दल अ (डरना ग़लत है) | दल ब (डरना हमेशा ग़लत नहीं) |
|---|---|
| छपाई से ही धर्म-सुधार, ज्ञानोदय और नारी-शिक्षा संभव हुई। | इरैस्मस की यह चिंता कि सनसनीख़ेज़ और झूठी किताबें भी उतनी ही तेज़ी से फैलती हैं, आज भी सच है। |
| डर के नाम पर ही चर्च ने मेनोकियो को मारा और अंग्रेज़ों ने 90 अख़बारों का दमन किया। | पाठ्यपुस्तक ख़ुद मानती है कि लोग “चर्च और राज्य का प्रोपेगैंडा” भी पढ़ते थे — यानी छपाई प्रचार का भी औज़ार थी। |
| गांधी ने प्रेस की आज़ादी को स्वराज की पहली लड़ाई कहा। | साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों ने भी छपाई का ही इस्तेमाल करके राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाया। |
शिक्षक के लिएबहस के अंत में विजेता घोषित मत कीजिए। उसकी जगह बोर्ड पर पाठ्यपुस्तक की वह पंक्ति लिखिए — “मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।” यही संतुलित निष्कर्ष है।
भाग ग — सृजनात्मकता (30%)
13कल्पनाशील पुनर्रचना 5 अंक
कल्पना कीजिए कि आप 1450 के जर्मनी में गुटेन्बर्ग के छापेख़ाने में काम करने वाले एक नौजवान हैं।
अपने गाँव में रहने वाले पिता को एक चिट्ठी लिखिए, जिसमें आप बताएँ —
- आप क्या काम करते हैं (कम्पोज़ीटर, गैली, स्याही, प्लाटेन में से कोई भी)
- यह मशीन कैसे काम करती है
- लोग इस मशीन के बारे में क्या कह रहे हैं — कुछ ख़ुश हैं और कुछ डरे हुए
- और आप ख़ुद क्या सोचते हैं
(यह पाठ्यपुस्तक पृष्ठ 108 की गतिविधि का ही विस्तार है।)
उत्तर देखिए
मूल्यांकन-संकेतकम से कम तीन तकनीकी शब्द सही इस्तेमाल हुए हों (टाइप, गैली, प्लाटेन, कम्पोज़ीटर, स्क्रू), और दोनों तरह की प्रतिक्रियाएँ — ख़ुशी और डर — दिखाई दें।
14डिज़ाइन-चुनौती 5 अंक
पाठ्यपुस्तक (पृष्ठ 111) की गतिविधि कहती है — “मान लीजिए आप नव-मुद्रित सस्ती किताबों का इश्तेहार देना चाहते हैं। अपनी दुकान के बाहर लगाने के लिए एक पोस्टर बनाएँ।”
इसे और आगे बढ़ाइए। आपको दो पोस्टर बनाने हैं —
| पोस्टर | किसके लिए | ध्यान रखिए |
|---|---|---|
| पोस्टर 1 | उन लोगों के लिए जो पढ़ना जानते हैं | शब्दों का इस्तेमाल कीजिए |
| पोस्टर 2 | उन लोगों के लिए जो पढ़ना नहीं जानते | केवल चित्रों और प्रतीकों से काम चलाइए |
फिर तीन-चार वाक्यों में लिखिए कि दूसरा पोस्टर बनाने में क्या मुश्किल आई।
उत्तर देखिए
मूल्यांकन-संकेतसबसे अच्छा उत्तर वह है जो यह समझ दिखाए कि उन्नीसवीं सदी के मुद्रकों ने भी ठीक यही समस्या हल की थी — उन्होंने किताबों को सचित्र बनाया और उन्हें गाकर सुनाया।
15प्रति-तथ्यात्मक (‘यदि… तो’) 5 अंक
नीचे तीन ‘यदि’ दिए गए हैं। हर एक के लिए दो-दो परिणाम कारण सहित लिखिए —
| # | यदि… | तो क्या होता? |
|---|---|---|
| 1 | यदि मार्को पोलो चीन से लौटकर छपाई की तकनीक न लाता | |
| 2 | यदि गुटेन्बर्ग ने बचपन में जैतून पेरने की मशीन न देखी होती | |
| 3 | यदि 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट न आता |
उत्तर देखिए
- 1 — यूरोप में छपाई देर से आती, धर्म-सुधार शायद इतनी तेज़ी से न फैलता। पर ध्यान रहे — कोरिया में धातु के चलअक्षर पहले से थे, इसलिए तकनीक कहीं और से भी आ सकती थी।
- 2 — प्रेस का मॉडल कुछ और होता, या शायद और देर लगती; इससे यह भी पता चलता है कि आविष्कार अकसर पुरानी चीज़ों को नए काम में लगाने से होते हैं।
- 3 — भाषाई अख़बारों पर सेंसर कम होता, पर सरकार शायद कोई दूसरा क़ानून ले आती — जैसे उसने विश्वयुद्धों में भारतीय रक्षा नियम और अधिनियम लाए।
मूल्यांकन-नियमसबसे ऊँचे अंक उस उत्तर को दीजिए जो यह भी कहे कि “शायद फिर भी कुछ और रास्ता निकल आता।” इतिहास में एक घटना पर पूरी कहानी नहीं टिकी होती — यह समझ सबसे क़ीमती है।
16विचार-संयोजन 5 अंक
अध्याय 4 (औद्योगीकरण का युग) की चित्र-8 वाली मुद्रक की वर्कशॉप और अध्याय 4 के कारख़ाने को साथ रखकर सोचिए।
एक तालिका बनाइए जिसमें कम से कम चार बिंदुओं पर छापेख़ाने और कपड़ा-कारख़ाने की तुलना हो।
उत्तर देखिए
संकेत — तालिका इस तरह बन सकती है
| बिंदु | छापाख़ाना | कपड़ा कारख़ाना |
|---|---|---|
| काम कहाँ होता था | सब एक छत के नीचे | सब एक छत के नीचे |
| मज़दूरों का बँटवारा | कम्पोज़ीटर, प्रेसमैन, प्रूफ़रीडर, बाइंडर | कातने वाले, बुनकर, फ़ुलर्स, रंगसाज़ |
| मुख्य मशीन | प्रेस | स्पिनिंग जेनी, पावरलूम |
| उत्पाद किसके लिए | पहले अमीरों के लिए, फिर आम जनता के लिए | पहले अमीरों के लिए, फिर उपनिवेशों के लिए |
| तकनीक ने किसे नुक़सान पहुँचाया | कातिब और सुलेखक | हाथ से कातने वाले |
इस आख़िरी पंक्ति पर ज़रूर चर्चा कीजिएहर नयी तकनीक किसी पुराने हुनर को बेरोज़गार करती है। छपाई ने कातिबों को, और मशीन ने कातने वालों को।
17नया प्रारूप 5 अंक
अपने गाँव या मोहल्ले के लिए एक एक-पन्ने का अख़बार बनाइए। उसमें ये चीज़ें होनी चाहिए —
| हिस्सा | क्या डालें |
|---|---|
| अख़बार का नाम | कोई अर्थपूर्ण नाम — जैसे संवाद कौमुदी का अर्थ है ‘ख़बरों की चाँदनी’ |
| एक मुख्य ख़बर | अपने आसपास की सच्ची घटना |
| एक संपादकीय | किसी समस्या पर अपनी राय, दो-तीन वाक्यों में |
| एक चित्र या कार्टून | कोई सामाजिक बात कहता हुआ |
| एक विज्ञापन | अपने मोहल्ले की किसी दुकान का |
फिर नीचे तीन वाक्य लिखिए — “अगर सरकार को मेरे संपादकीय पर आपत्ति हो, तो 1878 के क़ानून के तहत वह क्या-क्या कर सकती थी?”
उत्तर देखिए
संकेतपहले चेतावनी देती, और अनसुनी करने पर अख़बार ज़ब्त कर लेती तथा छपाई की मशीनें छीन लेती।
18इतिहास और आज 5 अंक
पाठ्यपुस्तक कहती है कि छपाई से पहले जनता ‘श्रोता’ थी और छपाई के बाद वह ‘पाठक-जनता’ बन गई।
अब यह सोचिए — आज मोबाइल पर हम ज़्यादातर वीडियो देखते हैं और ऑडियो सुनते हैं।
(क) क्या हम फिर से ‘श्रोता-जनता’ बन रहे हैं? अपना पक्ष कारण सहित लिखिए। (3 अंक)
(ख) अगर इरैस्मस आज ज़िंदा होते तो वे किस चीज़ के बारे में लिखते? दो वाक्य लिखिए। (2 अंक)
उत्तर देखिए
- (क) दोनों तरफ़ के तर्क सही माने जाएँगे। जो कहे कि “हाँ, क्योंकि पढ़ना कम हो रहा है” — उसे भी अंक मिलें; जो कहे कि “नहीं, क्योंकि हम मोबाइल पर लिखते और पढ़ते भी बहुत हैं” — उसे भी।
- (ख) संभवत: वे सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफ़वाहों और सूचना की अधिकता के बारे में लिखते — शायद उन्हीं शब्दों में कि “इनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान चीज़ों का मूल्य ही नहीं रह जाता।”
यह प्रश्न पूरे अध्याय का सबसे अच्छा समापन है। इससे बच्चों को समझ आता है कि इतिहास सिर्फ़ बीती बात नहीं — वह आज के सवालों को समझने का औज़ार है।
अंक-विभाजन
| भाग | प्रश्न | कुल अंक | प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| क — जागरूकता | 1 से 8 | 32 | 50% |
| ख — संवेदनशीलता | 9 से 12 | 16 | 25% |
| ग — सृजनात्मकता | 13 से 18 | 30 | ~47% |
(भार का यह वितरण सुझावात्मक है; परीक्षा में कुछ ही प्रश्न चुनकर पूछे जाएँगे।)
मूल्यांकन रूब्रिक
| स्तर | जागरूकता | संवेदनशीलता | सृजनात्मकता |
|---|---|---|---|
| प्रारंभिक | तथ्य बता पाता है, पर नयी स्थिति पर लागू नहीं कर पाता। | केवल एक पक्ष देख पाता है। | पाठ्यपुस्तक की बात ज्यों-की-त्यों दोहरा देता है। |
| विकासशील | तथ्य को नयी स्थिति पर लागू कर पाता है, पर कारण अधूरा होता है। | दूसरे पक्ष को पहचानता है, पर उसका कारण नहीं समझा पाता। | कुछ नया जोड़ता है, पर अध्याय से जोड़ नहीं पाता। |
| दक्ष | तथ्य, कारण और परिणाम — तीनों जोड़कर लिख पाता है। | दोनों पक्षों के कारण बता पाता है, बिना किसी को ‘बुरा’ कहे। | नयी रचना करता है और उसे अध्याय के तथ्यों से जोड़ता है। |
| उन्नत | अपनी तरफ़ से भी उदाहरण जोड़ता है और सीमाएँ पहचानता है। | यह भी कह पाता है कि “उनकी जगह मैं होता तो शायद मुझे भी डर लगता।” | आज की दुनिया से तुलना करके कोई मौलिक निष्कर्ष निकालता है। |
शिक्षक के लिए तीन सुझाव
- इन प्रश्नों को गृहकार्य मत बनाइए — कक्षा में करवाइए। इनका असली फ़ायदा तब मिलता है जब बच्चे एक-दूसरे के उत्तर सुनते हैं।
- जिन प्रश्नों में ‘अपना पक्ष’ पूछा गया है, वहाँ कभी मत कहिए कि “यह उत्तर ग़लत है।” पूछिए — “इसका कारण और बताओ।” कारण माँगने से सोच अपने आप सुधरती है।
- अध्याय की सबसे बड़ी बात यही है कि हर बदलाव के दो चेहरे होते हैं। हर PARAKH प्रश्न के बाद यह वाक्य बोर्ड पर लिखिए — “इससे किसे फ़ायदा हुआ, और किसे डर लगा?” यह एक सवाल पूरे अध्याय को खोल देता है।