इस फ़ाइल में हर प्रश्न के साथ पूरा लिखा हुआ उत्तर दिया गया है। पहले उत्तर पढ़िए, फिर पुस्तक बंद करके वही उत्तर अपनी कॉपी में लिखिए, और अंत में मिलाकर देखिए कि कौन-सी बात छूट गई।
उत्तर लिखने का तरीक़ा
| अंक | उत्तर की लंबाई | कैसे लिखें |
|---|---|---|
| 1 अंक | एक वाक्य | सीधे उत्तर लिखिए, भूमिका मत बाँधिए |
| 2 अंक | लगभग 30 से 40 शब्द, या 2 बिंदु | पहले एक वाक्य में उत्तर, फिर एक वाक्य में कारण या उदाहरण |
| 3 अंक | लगभग 60 से 80 शब्द, या 3 बिंदु | तीन अलग-अलग बातें लिखिए; हर बात पूरे वाक्य में |
| 4 अंक | लगभग 100 से 120 शब्द, या 4 से 5 बिंदु | एक वाक्य की भूमिका, फिर चार बिंदु, फिर एक वाक्य का निष्कर्ष |
| स्रोत-आधारित | जो पूछा है बस वही | उत्तर गद्यांश में ही छिपा होता है; उसी की भाषा इस्तेमाल कीजिए |
इस अध्याय के लिए एक विशेष सलाह। इस अध्याय में तिथियाँ, नाम और किताबों के नाम — तीनों बहुत हैं। हर बड़े उत्तर में कम से कम एक तिथि, एक व्यक्ति का नाम और एक किताब या अख़बार का नाम ज़रूर लिखिए।
दूसरी सलाह इससे भी ज़रूरी है। यह अध्याय एक बहस है — छपाई अच्छी थी या ख़तरनाक? इसलिए जहाँ भी ‘असर’ या ‘प्रभाव’ पूछा जाए, वहाँ दोनों पक्ष लिखिए। केवल एक पक्ष लिखने पर आधे अंक कट जाते हैं।
भाग क — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक)
1मुद्रण की सबसे पहली तकनीक कहाँ विकसित हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: चीन, जापान और कोरिया में।
2चीन में किताबें कब से छपने लगी थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: तक़रीबन 594 ई. से।
3चीन में शुरुआती छपाई किस तरह होती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख़्ती पर काग़ज़ को रगड़कर छपाई की जाती थी।
4चीनी किताबें ‘एकॉर्डियन’ शैली में क्यों बनाई जाती थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि काग़ज़ पतला और छिद्रित होता था, इसलिए उसके दोनों तरफ़ छपाई संभव नहीं थी; इसीलिए किनारों को मोड़कर सिलकर किताब बनाई जाती थी।
5ख़ुशनवीसी किसे कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: सुलेखन (Calligraphy) को, यानी हाथ से बड़े सुंदर-सुडौल अक्षरों में सही-सही कलात्मक लिखाई करने की कला को।
6लंबे अरसे तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक कौन था?
उत्तर देखिए
उत्तर: चीनी राजतंत्र।
7चीनी राजतंत्र किन परीक्षाओं के लिए किताबें छपवाता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: सिविल सेवा परीक्षा के लिए, जिससे चीन की नौकरशाही नियुक्त होती थी।
8चीन में छपी किताबों की मात्रा सोलहवीं सदी में क्यों बढ़ी?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि सोलहवीं सदी में सिविल सेवा परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ गई थी।
9सत्रहवीं सदी में चीन में छपाई के उपभोक्ता कौन-कौन हो गए?
उत्तर देखिए
उत्तर: विद्वानों और अधिकारियों के अलावा व्यापारी भी, जो अपने रोज़मर्रा के कारोबार की जानकारी के लिए मुद्रित सामग्री इस्तेमाल करने लगे।
10उन्नीसवीं सदी के अंत में चीन में प्रिंट-संस्कृति का नया केंद्र कौन-सा शहर बना?
उत्तर देखिए
उत्तर: शंघाई।
11जापान में छपाई की तकनीक कब और कौन लेकर आया?
उत्तर देखिए
उत्तर: चीनी बौद्ध प्रचारक 768–770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए।
12जापान की सबसे पुरानी छपी पुस्तक कौन-सी है?
उत्तर देखिए
उत्तर: 868 ई. में छपी डायमंड सूत्र, जिसमें पाठ के साथ-साथ काठ पर खुदे चित्र भी हैं।
13एदो को बाद में किस नाम से जाना गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: तोक्यो।
14त्रिपीटका कोरियाना क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: तेरहवीं शताब्दी के मध्य में वुडब्लॉक्स मुद्रण के रूप में तैयार किया गया बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह।
15त्रिपीटका कोरियाना कितने वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर।
16त्रिपीटका कोरियाना को यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में कब अंकित किया गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 2007 में।
17जिक्जी क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कोरिया की वह पुस्तक जो मूवेबल मेटल टाइप के साथ मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक है।
18जिक्जी में किस धर्म की विशेषताएँ हैं और कितने भिक्षुओं का उल्लेख है?
उत्तर देखिए
उत्तर: इसमें ज़ेन बौद्ध धर्म की मुख्य विशेषताएँ हैं और भारत, चीन तथा कोरिया के लगभग 150 बौद्ध भिक्षुओं का उल्लेख है।
19जिक्जी का दूसरा खंड आज कहाँ उपलब्ध है?
उत्तर देखिए
उत्तर: फ़्रांस की नेशनल लाइब्रेरी में।
20जिक्जी को यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में कब अंकित किया गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 2001 में।
21कितागावा उतामारो कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1753 ई. में एदो में जन्मे जापानी चित्रकार, जिन्होंने उकियो नाम की नयी चित्रकला शैली में अहम योगदान किया।
22‘उकियो’ का क्या अर्थ है?
उत्तर देखिए
उत्तर: तैरती दुनिया के चित्र।
23उतामारो की छपी प्रतियों ने किन यूरोपीय चित्रकारों को प्रभावित किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: माने, मोने और वान गॉग को।
24चीनी काग़ज़ यूरोप कब और किस रास्ते पहुँचा?
उत्तर देखिए
उत्तर: ग्यारहवीं सदी में, रेशम मार्ग से।
25मार्को पोलो चीन से इटली कब लौटा?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1295 ई. में।
26मार्को पोलो अपने साथ कौन-सा ज्ञान लेकर लौटा?
उत्तर देखिए
उत्तर: वुडब्लॉक यानी काठ की तख़्ती वाली छपाई की तकनीक का ज्ञान।
27वेलम क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: चर्म-पत्र, यानी जानवरों के चमड़े से बनी लेखन की सतह।
28यूरोप में छपी किताबों के विलासी संस्करण किस पर छपते थे और किसके लिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: वेलम या चर्म-पत्र पर, उन कुलीन वर्गों और भिक्षु-संघों के लिए जो मुद्रित किताबों को सस्ती और अश्लील मानते थे।
29यूरोप में एक पुस्तक-विक्रेता के यहाँ आम तौर पर कितने कातिब काम करते थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग 50 कातिब।
30पंद्रहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में तख़्ती की छपाई से क्या-क्या छापा जा रहा था?
उत्तर देखिए
उत्तर: कपड़े, ताश के पत्ते, और छोटी-छोटी टिप्पणियों के साथ धार्मिक चित्र।
31गुटेन्बर्ग ने अपना यंत्र कब मुकम्मल किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1448 तक।
32गुटेन्बर्ग ने कौन-सी पहली किताब छापी?
उत्तर देखिए
उत्तर: बाइबिल।
33गुटेन्बर्ग ने बाइबिल की कितनी प्रतियाँ कितने समय में छापीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: तक़रीबन 180 प्रतियाँ तीन साल में।
34गुटेन्बर्ग की 180 प्रतियों में से आज कितनी बची हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: केवल 50।
35प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल किस मशीन से लिया गया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: जैतून पेरने की प्रेस से।
36प्लाटेन क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: लेटरप्रेस छपाई में एक बोर्ड, जिसे काग़ज़ के पीछे दबाकर टाइप की छाप ली जाती है; पहले यह काठ का होता था, बाद में इस्पात का बनने लगा।
37गुटेन्बर्ग ने कितने अक्षरों के लिए टाइप बनाए?
उत्तर देखिए
उत्तर: रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए।
38गुटेन्बर्ग की मशीन को ‘मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन’ क्यों कहा गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि उसके अक्षरों को इधर-उधर ‘मूव’ कराकर या घुमाकर कोई भी शब्द बनाया जा सकता था।
39गुटेन्बर्ग प्रेस एक घंटे में कितने पन्ने छाप सकती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: 250 पन्ने, एक साइड।
40मूवेबल टाइप की तकनीक कितने साल तक छपाई की बुनियादी तकनीक बनी रही?
उत्तर देखिए
उत्तर: अगले 300 सालों तक।
41यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने किस काल में खुल गए?
उत्तर देखिए
उत्तर: क़रीब सौ सालों के दरम्यान, 1450 से 1550 के बीच।
42पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से और सोलहवीं सदी में यूरोप के बाज़ार में कितनी किताबें आईं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में 2 करोड़, और सोलहवीं सदी में 20 करोड़।
43कम्पोज़ीटर कौन होता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: छपाई के लिए इबारत कम्पोज़ करने वाला व्यक्ति।
44गैली क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: धातुई फ़्रेम, जिसमें टाइप बिछाकर इबारत बनाई जाती थी।
45गाथा-गीत (Ballad) क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: लोकगीत का ऐतिहासिक आख्यान, जिसे गाया और सुनाया जाता है।
46शराबघर (Tavern) क्या था?
उत्तर देखिए
उत्तर: वह जगह जहाँ लोग शराब पीने, खाने, दोस्तों से मिलने और बात-विचार के लिए आते थे।
47मार्टिन लूथर ने कितनी स्थापनाएँ लिखी थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पिच्चानवे (95) स्थापनाएँ।
48लूथर की स्थापनाओं की छपी प्रति कहाँ टाँगी गई थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर।
49लूथर के न्यू टेस्टामेंट अनुवाद की कितनी प्रतियाँ कुछ ही हफ़्तों में बिक गईं?
उत्तर देखिए
उत्तर: 5000 प्रतियाँ।
50मुद्रण के बारे में लूथर का प्रसिद्ध कथन क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।”
51प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार क्या था?
उत्तर देखिए
उत्तर: सोलहवीं सदी यूरोप में रोमन कैथलिक चर्च में सुधार का आंदोलन, जिसके प्रमुख सुधारकों में मार्टिन लूथर थे।
52मेनोकियो कौन था?
उत्तर देखिए
उत्तर: सोलहवीं सदी की इटली का एक किसान, जिसने अपने इलाक़े में उपलब्ध किताबें पढ़कर बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए थे।
53मेनोकियो का क्या हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: इन्क्वीज़ीशन ने उसे दो बार पकड़ा और आख़िरकार उसे मौत की सज़ा दे दी गई।
54इन्क्वीज़ीशन क्या था?
उत्तर देखिए
उत्तर: विधर्मियों की शिनाख़्त करने और उन्हें सज़ा देने वाली रोमन कैथलिक संस्था, जिसे धर्म-अदालत भी कहते हैं।
55रोमन चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची कब से रखनी शुरू की?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1558 ई. से।
56इरैस्मस कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक, जिन्होंने कैथलिक धर्म की ज़्यादतियों की आलोचना की, पर लूथर से भी दूरी बनाकर रखी।
57इरैस्मस ने प्रिंट के बारे में अपने विचार किस पुस्तक में लिखे?
उत्तर देखिए
उत्तर: एडेजेज़ (1508) में।
58इरैस्मस ने किताबों की तुलना किससे की थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: भिनभिनाती मक्खियों से।
59‘द मैकॉबर डान्स’ किसका चित्रण करती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: सोलहवीं सदी की इस वुडकट तसवीर में मुद्रण के आगमन को दुनिया के अंत से जोड़ा गया है और मुद्रक के वर्कशॉप को मौत के नाच का मंच बताया गया है।
60अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में साक्षरता दर कितनी हो गई थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: 60 से 80 प्रतिशत तक।
61पंचांग क्या होता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: चाँद, सूरज की गति, ज्वार-भाटा के समय और लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी अहम जानकारियाँ देता वार्षिक प्रकाशन।
62चैपबुक या गुटका क्या था?
उत्तर देखिए
उत्तर: पॉकेट बुक के आकार की छोटी किताबें, जिन्हें आमतौर पर फेरीवाले बेचते थे।
63इंग्लैंड में एकपैसिया किताबें बेचने वालों को क्या कहा जाता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: चैपमेन।
64बिब्लियोथीक ब्ल्यू क्या थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: फ़्रांस में सस्ते काग़ज़ पर छपी और नीली जिल्द में बँधी छोटी किताबें।
65फ़्रांस की चार-पाँच पन्ने की किताबों में क्या होता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्रेम-कहानियाँ और अतीत की थोड़ी गाथाएँ, जिन्हें ‘इतिहास’ कहते थे।
66यूरोप में पत्रिकाओं का प्रकाशन कब से शुरू हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: अठारहवीं सदी के आरंभ से।
67निरंकुशवाद किसे कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: राजकाज की ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी एक व्यक्ति को संपूर्ण शक्ति प्राप्त हो, और उस पर न क़ानूनी पाबंदी लगी हो, न ही संवैधानिक।
68लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: अठारहवीं सदी के फ़्रांस के एक उपन्यासकार, जिन्होंने छापेख़ाने को प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार बताया।
69मर्सिए का निरंकुश शासकों के नाम प्रसिद्ध कथन क्या था?
उत्तर देखिए
उत्तर: “हे निरंकुशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है! आभासी लेखक की क़लम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे!”
70फ़्रांस में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए प्रेस कब स्थापित हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1857 में।
71ग्रिम बंधुओं का लोक-कथा संकलन कब छपा?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1812 में।
72पेनी मैगज़ीन का प्रकाशन कब और किसने किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: इंग्लैंड में 1832 से 1850 के बीच ‘सोसायटी फ़ॉर द डिफ़्यूज़न ऑफ़ यूजफुल नॉलेज’ ने; यह मूलत: मज़दूर वर्ग के लिए थी।
73उन्नीसवीं सदी की तीन प्रमुख अंग्रेज़ लेखिकाओं के नाम बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें और जॉर्ज इलियट।
74थॉमस वुड कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: यॉर्कशायर के एक मेकैनिक, जो पुराने अख़बार ख़रीदकर शाम को आग की रोशनी में पढ़ते थे, क्योंकि उनके पास मोमबत्ती के लिए पैसे नहीं थे।
75मैक्सिम गोर्की की दो कृतियों के नाम बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: मेरा बचपन और मेरे विश्वविद्यालय।
76शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस किसने कारगर बनाया और उसकी क्षमता क्या थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो. ने; इससे प्रति घंटे 8000 शीट या ताव छप सकते थे।
77ऑफ़सेट प्रेस से कितने रंगों की छपाई मुमकिन थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: एक साथ छह रंगों की।
78शिलिंग शृंखला क्या थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबों को छापने वाली एक सस्ती शृंखला।
791930 की आर्थिक मंदी का प्रकाशकों पर क्या असर हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताबों की बिक्री गिरने के भय से उन्होंने पाठकों की जेब का ख़याल रखते हुए सस्ते पेपरबैक या अजिल्द संस्करण छापे।
80डस्ट कवर किस सदी की तकनीकी नवइयत है?
उत्तर देखिए
उत्तर: बीसवीं सदी की।
81भारत में पांडुलिपियाँ किस पर बनाई जाती थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर।
82भारत में पांडुलिपियों को उम्र बढ़ाने के लिए क्या किया जाता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: उन्हें तख़्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था।
83पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल की पाठशालाओं में पढ़ाई कैसे होती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे; इस तरह कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।
84भारत में प्रिंटिंग प्रेस पहले-पहल कहाँ और किसके साथ आई?
उत्तर देखिए
उत्तर: सोलहवीं सदी के मध्य में गोवा में, पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ।
85जेसुइट पुजारियों ने कौन-सी भाषा सीखी?
उत्तर देखिए
उत्तर: कोंकणी।
86पहली तमिल किताब कब और कहाँ छपी?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1579 में कोचीन में, कैथलिक पुजारियों द्वारा।
87पहली मलयालम किताब कब छपी?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1713 में।
881674 तक कोंकणी और कन्नड़ में कितनी किताबें छप चुकी थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग 50 किताबें।
89डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने कितनी तमिल किताबें छापीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: 32 तमिल किताबें, जिनमें से कई पुरानी किताबों के अनुवाद थीं।
90बंगाल गजट का संपादन किसने और कब शुरू किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से।
91हिक्की ने अपनी पत्रिका को किस रूप में परिभाषित किया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: ‘हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है।’
92हिक्की पर मुक़दमा किसने किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने।
93भारतीयों द्वारा निकाला गया पहला अख़बार कौन-सा था?
उत्तर देखिए
उत्तर: राजा राममोहन राय के क़रीबी गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित बंगाल गजट।
94संवाद कौमुदी किसने और कब प्रकाशित किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: राजा राममोहन राय ने 1821 से।
95रूढ़िवादियों ने राममोहन राय के विचारों से टक्कर लेने के लिए किस पत्र का सहारा लिया?
उत्तर देखिए
उत्तर: समाचार चंद्रिका का।
96उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में किन मुद्दों पर तेज़ बहस चल रही थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों पर।
97उलमा कौन होते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: इस्लामी क़ानून और शरिया के विद्वान।
98फ़तवा क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: अनिश्चय या असमंजस की स्थिति में इस्लामी क़ानून जानने वाले विद्वान, सामान्यत: मुफ़्ती, द्वारा की जाने वाली वैधानिक घोषणा।
99देवबंद सेमिनरी की स्थापना कब हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: सन् 1867 में।
100रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण कब और कहाँ से प्रकाशित हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1810 में कलकत्ता से।
101उन्नीसवीं सदी के दो प्रसिद्ध भारतीय प्रेसों के नाम बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: लखनऊ का नवल किशोर प्रेस और बंबई का श्री वेंकटेश्वर प्रेस।
102राजा रवि वर्मा का अपना प्रेस किस नाम से था?
उत्तर देखिए
उत्तर: रवि वर्मा प्रेस।
103भारत में कार्टून और कैरिकेचर कब से छपने लगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1870 के दशक तक।
104इंडियन शारिवारी क्या थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: उन्नीसवीं सदी के अंत में प्रकाशित होने वाले व्यंग्य और विद्रूप विधा के पत्रों में से एक।
105राससुन्दरी देबी की आत्मकथा का नाम क्या है और वह कब छपी?
उत्तर देखिए
उत्तर: आमार जीबोन, जो 1876 में प्रकाशित हुई।
106आमार जीबोन का क्या महत्त्व है?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी थी।
107राससुन्दरी देबी ने पढ़ना कहाँ सीखा था?
उत्तर देखिए
उत्तर: रसोई में छिप-छिप कर।
108कैलाशबाशिनी देवी ने कब से लिखना शुरू किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1860 के दशक से।
109महाराष्ट्र की उन दो लेखिकाओं के नाम बताइए जिन्होंने 1880 के दशक में उच्च जाति की नारियों की दशा पर लिखा।
उत्तर देखिए
उत्तर: ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई।
110गंभीर हिंदी छपाई की शुरुआत कब से हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1870 के दशक से।
111स्त्री धर्म विचार किसने लिखी और क्यों?
उत्तर देखिए
उत्तर: पंजाब के राम चड्ढा ने, औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देने के उद्देश्य से।
112खालसा ट्रैक्ट सोसायटी का दूसरा नाम क्या था?
उत्तर देखिए
उत्तर: खालसा पुस्तिका सभा।
113कलकत्ता का कौन-सा इलाक़ा लोकप्रिय किताबों के प्रकाशन को समर्पित हो गया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: बटाला।
114बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने 1926 में किस सम्मेलन को संबोधित किया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: बंग महिला शिक्षा सम्मेलन को।
115गुलामगिरी किसने और कब लिखी?
उत्तर देखिए
उत्तर: ज्योतिबा फुले ने 1871 में।
116ई.वी. रामास्वामी नायकर किस नाम से बेहतर जाने जाते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पेरियार के नाम से।
117छोटे और बड़े सवाल किसने और कब लिखी?
उत्तर देखिए
उत्तर: कानपुर के मिल-मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में।
118सच्ची कविताएँ किसके लेखन का संग्रह है?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1935 से 1955 के बीच ‘सुदर्शन चक्र’ के नाम से लिखने वाले एक मिल-मज़दूर के लेखन का।
119बंगलौर के सूती-मिल-मज़दूरों ने पुस्तकालय क्यों बनाए और प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर देखिए
उत्तर: ख़ुद को शिक्षित करने के लिए; प्रेरणा उन्हें बंबई के मिल-मज़दूरों से मिली थी।
120लक्ष्मीनाथ बेज़बरुवा की प्रसिद्ध पुस्तक और गीत कौन-से हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पुस्तक बूढ़ी आइर साधु (दादी की कहानियाँ) और गीत ‘ओ मोर अपुनर देश’।
121कंपनी के शुरुआती सेंसरशिप-क़दम किसके ख़िलाफ़ उठे थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़।
1221835 में किस गवर्नर जनरल ने प्रेस क़ानून की पुनर्समीक्षा की?
उत्तर देखिए
उत्तर: गवर्नर जनरल बेंटिंक ने।
123प्रेस की पहले की आज़ादियों को बहाल करते हुए नए क़ानून किसने बनाए?
उत्तर देखिए
उत्तर: उदारवादी औपनिवेशिक अफ़सर टॉमस मेकॉले ने।
124वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट कब लागू हुआ और किसके तर्ज पर बना था?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1878 में, आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर।
125बालगंगाधर तिलक का अख़बार कौन-सा था?
उत्तर देखिए
उत्तर: केसरी।
126तिलक को क़ैद कब किया गया और क्यों?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1908 में, क्योंकि उन्होंने 1907 में कालापानी भेजे गए पंजाब के क्रांतिकारियों के प्रति केसरी में गहरी हमदर्दी जताई थी।
127पहले विश्वयुद्ध में कितने अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी और उनमें से कितने बंद हो गए?
उत्तर देखिए
उत्तर: 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी, जिनमें से 18 ने ख़ुद को बंद कर देना उचित समझा।
128अगस्त 1942 में कितने अख़बारों का दमन किया गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: तक़रीबन 90 अख़बारों का।
129गांधी ने 1922 में किन तीन आज़ादियों की बात कही थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: वाणी की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और सामूहिकता की आज़ादी।
130स्टेट्समैन अख़बार की स्थापना कब हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1877 में।
भाग ख — लघूत्तरात्मक प्रश्न (2 अंक)
1चीन में शुरुआती छपाई की तकनीक का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: तक़रीबन 594 ई. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख़्ती पर काग़ज़ को रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं और यह छपाई हाथ से होती थी। चूँकि काग़ज़ पतला और छिद्रित होता था, इसलिए उसके दोनों तरफ़ छपाई संभव नहीं थी और पारंपरिक चीनी किताब ‘एकॉर्डियन’ शैली में किनारों को मोड़कर सिलकर बनाई जाती थी।
2चीनी राजतंत्र लंबे समय तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक क्यों था?
उत्तर देखिए
उत्तर: चीन की नौकरशाही सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त होती थी और यह नौकरशाही विशालकाय थी, इसलिए चीनी राजतंत्र इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। सोलहवीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी, लिहाज़ा छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गई।
3सत्रहवीं सदी में चीन में छपाई के इस्तेमाल में क्या विविधता आई?
उत्तर देखिए
उत्तर: शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से अब मुद्रित सामग्री के उपभोक्ता सिर्फ़ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे, बल्कि व्यापारी भी अपने रोज़मर्रा के कारोबार की जानकारी लेने के लिए इसका इस्तेमाल करने लगे। पढ़ना एक शग़ल भी बन गया और नए पाठक वर्ग को काल्पनिक क़िस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ और रूमानी नाटक पसंद थे; अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने अपने रचे काव्य और नाटक छापे।
4जापान में मुद्रण के आरंभ के बारे में बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: चीनी बौद्ध प्रचारक 768–770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए और जापान की सबसे पुरानी छपी पुस्तक 868 ई. की डायमंड सूत्र है, जिसमें पाठ के साथ काठ पर खुदे चित्र हैं। तसवीरें अकसर कपड़ों, ताश के पत्तों और काग़ज़ के नोटों पर बनाई जाती थीं, और मध्यकालीन जापान में किताबें सस्ती तथा सुलभ थीं।
5त्रिपीटका कोरियाना के बारे में लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: तेरहवीं शताब्दी के मध्य में बना त्रिपीटका कोरियाना वुडब्लॉक्स मुद्रण के रूप में बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह है और इन ग्रंथों को लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था। इसे 2007 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया।
6जिक्जी का क्या महत्त्व है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कोरिया की जिक्जी मूवेबल मेटल टाइप के साथ मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक है, जिसमें ज़ेन बौद्ध धर्म की मुख्य विशेषताएँ हैं और भारत, चीन तथा कोरिया के लगभग 150 बौद्ध भिक्षुओं का उल्लेख है। यह कार्य मुद्रण संस्कृति में एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन साबित हुआ, इसीलिए इसे 2001 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया।
7कितागावा उतामारो का यूरोप की चित्रकला पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1753 ई. में एदो में जन्मे उतामारो ने उकियो यानी तैरती दुनिया के चित्र नाम की एक नयी चित्रकला शैली में अहम योगदान किया, जिसमें आम शहरी जीवन का चित्रण किया गया। इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँचीं और माने, मोने तथा वान गॉग जैसे चित्रकारों को प्रभावित किया।
8वुडब्लॉक प्रिंट यूरोप में 1295 के बाद क्यों आई? (अभ्यास प्रश्न 1-क)
उत्तर देखिए
उत्तर: 1295 ई. में मार्को पोलो नामक महान खोजी यात्री चीन में काफ़ी साल खोज करने के बाद इटली वापस लौटा और चीन के पास पहले से मौजूद वुडब्लॉक वाली छपाई की तकनीक का ज्ञान वह अपने साथ लेकर लौटा। इसके बाद इतालवी भी तख़्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बाक़ी यूरोप में फैल गई।
9हस्तलिखित पांडुलिपियों से किताबों की बढ़ती माँग क्यों पूरी नहीं हो सकती थी?
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उत्तर: नक़ल उतारना बेहद ख़र्चीला, समयसाध्य और श्रमसाध्य काम था, और पांडुलिपियाँ अकसर नाज़ुक होती थीं जिनके लाने-ले जाने और रख-रखाव में तमाम मुश्किलें थीं। इसलिए उनका सर्कुलेशन सीमित रहा और किताबों की बढ़ती माँग के चलते वुडब्लॉक प्रिंटिंग उत्तरोत्तर लोकप्रिय होता गया।
10गुटेन्बर्ग ने अपने पुराने अनुभव का इस्तेमाल अपने आविष्कार में कैसे किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: गुटेन्बर्ग बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें देखता आया था, इसलिए जैतून प्रेस ही उसकी प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श बना। उसने पत्थर पर पॉलिश करने की कला, सुनारी और शीशे को इच्छित आकृतियों में गढ़ने की महारत हासिल की थी, इसलिए साँचे का उपयोग उसने अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़ने के लिए किया।
11गुटेन्बर्ग प्रेस काम कैसे करती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्क्रू से लगे लंबे हैंडल की मदद से स्क्रू घुमाकर प्लाटेन को गीले काग़ज़ पर दबा दिया जाता था, जिससे टाइप की छाप काग़ज़ पर आ जाती थी। गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए और यह जुगत लगाई कि इन्हें इधर-उधर घुमाकर शब्द बनाए जा सकें, इसीलिए इसे मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन कहा गया।
12शुरुआती छपी किताबें हस्तलिखित पांडुलिपियों जैसी क्यों दिखती थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: शुरू-शुरू में धातुई अक्षर हाथ की सजावटी शैली का अनुकरण करते थे, हाशिये पर फूल-पत्तियों की डिज़ाइन बनाई जाती थी और चित्र अकसर पेंट किए जाते थे। अमीरों के लिए बनाई किताबों में छपे पन्ने पर हाशिये की जगह बेल-बूटों के लिए ख़ाली छोड़ दी जाती थी, और हर ख़रीदार अपनी रुचि के हिसाब से डिज़ाइन और पेंटर ख़ुद तय करके उसे सँवार सकता था।
13गुटेन्बर्ग की बाइबिल की कोई दो प्रतियाँ एक जैसी क्यों नहीं थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: इन्हें गुटेन्बर्ग प्रेस की धातुई टाइप से छापा ज़रूर गया था, पर इनके हाशिए पर कलाकारों ने हाथ से टीकाकारी और सुघड़ चित्रकारी की थी, इसलिए हर प्रति का हर पन्ना अलग था। कुलीन तबक़ों ने इस विशिष्टता को पसंद किया, क्योंकि जो उनके पास था वह अनोखा था और किसी और के पास उसकी हू-ब-हू नक़ल नहीं थी।
14मुद्रण क्रांति क्या थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: छापेख़ाने का आविष्कार महज़ तकनीकी दृष्टि से नाटकीय बदलाव की शुरुआत नहीं था, बल्कि पुस्तक-उत्पादन के नए तरीक़ों ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी। इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, तथा संस्था और सत्ता से लोगों का रिश्ता ही बदल गया, जिससे लोकचेतना बदली और चीज़ों को देखने का नज़रिया भी बदल गया।
15छापेख़ाने के आने से नया पाठक वर्ग कैसे पैदा हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: छपाई से किताबों की क़ीमत गिरी, हर प्रति के उत्पादन में लगने वाला वक़्त और श्रम कम हो गया, और बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापना आसान हो गया। इससे बाज़ार किताबों से पट गया और पाठक वर्ग भी बृहत्तर होता गया।
16मौखिक संस्कृति और मुद्रित संस्कृति के बीच की रेखा कैसे धुँधली पड़ गई?
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उत्तर: चूँकि किताबें सिर्फ़ साक्षर पढ़ सकते थे, इसलिए मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कीं और ऐसी किताबें तसवीरों से ख़ूब सजी-धजी यानी सचित्र होती थीं। इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था, इस तरह मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाख़िल हुई और छपी सामग्री मौखिक अंदाज़ में प्रसारित हुई।
17लोगों को छपी किताब से क्या डर था?
उत्तर देखिए
उत्तर: कई लोगों को यह आशंका थी कि छपे शब्द की सुगमता का आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर होगा, और भय था कि अगर छपे हुए तथा पढ़े जा रहे पर कोई नियंत्रण न होगा तो लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। डर यह भी था कि ऐसा हुआ तो ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी, और धर्मगुरुओं, सम्राटों तथा कई लेखकों की यह चिंता नव-मुद्रित साहित्य की व्यापक आलोचना का आधार बनी।
18मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में क्यों था? (अभ्यास प्रश्न 1-ख)
उत्तर देखिए
उत्तर: लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवे स्थापनाएँ लिखीं, जिनकी छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँगी गई और छपाई की वजह से ही उसके लेख बड़ी तादाद में पढ़े जाने लगे। इसी के नतीजे में चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार शुरू हुआ, तथा उसके न्यू टेस्टामेंट अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ ही हफ़्तों में बिक गईं; इसीलिए कृतज्ञ लूथर ने कहा कि “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।”
19मेनोकियो कौन था और उसके साथ क्या हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: मेनोकियो सोलहवीं सदी की इटली का एक किसान था, जिसने अपने इलाक़े में उपलब्ध किताबें पढ़कर बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए और ईश्वर तथा सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन कैथलिक चर्च उससे क्रुद्ध हो गया। ऐसे धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए चर्च ने इन्क्वीज़ीशन शुरू किया, मेनोकियो को दो बार पकड़ा गया और आख़िरकार उसे मौत की सज़ा दे दी गई।
20रोमन कैथलिक चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची क्यों रखनी शुरू की? (अभ्यास प्रश्न 1-ग)
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उत्तर: छपे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित होने लगे थे और मेनोकियो जैसे साधारण किसान भी बाइबिल के अपने अर्थ लगाने लगे थे। धर्म के पास ऐसे पाठ और उस पर उठाए जा रहे सवालों से परेशान होकर रोमन चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर कई तरह की पाबंदियाँ लगाईं और 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा।
21छपी किताब को लेकर इरैस्मस के क्या विचार थे? (अभ्यास प्रश्न 2-ख)
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उत्तर: लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक इरैस्मस ने एडेजेज़ (1508) में लिखा कि किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं और दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ ये न पहुँच जाती हों, तथा इनका ज़्यादा हिस्सा विद्वता के लिए हानिकारक ही है। उनका कहना था कि मुद्रक बकवास, बेवकूफ़, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी और षड्यंत्रकारी किताबें छापते हैं और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।
22‘द मैकॉबर डान्स’ नामक तसवीर क्या दिखाती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: इस सोलहवीं सदी की वुडकट तसवीर में छपाई का ख़ौफ़ बड़ी नाटकीयता से पेश किया गया है और मुद्रण के आगमन को दुनिया के अंत से जोड़ा गया है। इसमें मुद्रक के वर्कशॉप को मौत के नाच का मंच बताया गया है, जहाँ मुद्रक और उसके मज़दूर कंकालों के नियंत्रण में हैं और उनसे मनचाही चीज़ें छपवाते हैं।
23अठारहवीं सदी में यूरोप में साक्षरता कैसे बढ़ी?
उत्तर देखिए
उत्तर: अलग-अलग संप्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों-कारीगरों को शिक्षित करना शुरू किया। इसका नतीजा यह हुआ कि अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गई थी।
24यूरोप में ग़रीब लोगों तक किताबें कैसे पहुँचीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पुस्तक विक्रेताओं ने गाँव-गाँव जाकर छोटी-छोटी किताबें बेचने वाले फेरीवालों को काम पर लगाया और इंग्लैंड में एक पैसे में मिलने वाली पेनी चैपबुक्स चैपमेन बेचते थे। फ़्रांस में सस्ते काग़ज़ पर छपी और नीली जिल्द में बँधी बिब्लियोथीक ब्ल्यू का चलन था, जिन्हें ग़रीब तबक़े भी ख़रीदकर पढ़ सकते थे।
25वैज्ञानिक और दार्शनिक विचार आम जनता तक कैसे पहुँचे?
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उत्तर: प्राचीन व मध्यकालीन ग्रंथ संकलित किए गए, और नक़्शों के साथ-साथ वैज्ञानिक ख़ाके भी बड़ी मात्रा में छापे गए, इसलिए जब आइज़ैक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने अपने आविष्कार प्रकाशित करने शुरू किए तो उनके लिए एक बड़ा पाठक-वर्ग तैयार हो चुका था। टॉमस पेन, वॉल्टेयर और ज़्याँ ज़ाक रूसो जैसे दार्शनिकों की किताबें भी भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं, जिससे विज्ञान, तर्क और विवेकवाद के विचार लोकप्रिय साहित्य में जगह पाने लगे।
26उन्नीसवीं सदी में बच्चे पाठकों की अहम श्रेणी कैसे बन गए?
उत्तर देखिए
उत्तर: उन्नीसवीं सदी के आख़िर से प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने के चलते बच्चे पाठकों की एक अहम श्रेणी बन गए और प्रकाशन उद्योग के लिए पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन महत्त्वपूर्ण हो गया। फ़्रांस में 1857 में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस स्थापित किया गया, जिसमें पुरानी और नयी दोनों तरह की परी-कथाओं और लोक-कथाओं का प्रकाशन किया गया।
27ग्रिम बंधुओं के काम से लोककथाओं में क्या बदलाव आया?
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उत्तर: जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक-कथाएँ जमा कीं, उनका संपादन हुआ और अंतत: उन्हें 1812 के एक संकलन में छापा गया। पर बच्चों के लिए अनुपयुक्त सामग्री या जो चीज़ें कुलीन वर्गों को अश्लील लगती थीं, उन्हें प्रकाशित संस्करण में शामिल नहीं किया गया, इस तरह लोककथाएँ छपने से दर्ज तो हुईं पर इस प्रक्रिया में बदल भी गईं।
28उन्नीसवीं सदी के उपन्यासों में ‘नयी नारी’ की कैसी छवि उभरी?
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उत्तर: जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें और जॉर्ज इलियट जैसी मशहूर लेखिकाओं के लेखन से नयी नारी की परिभाषा उभरी। यह ऐसी नारी थी जिसका व्यक्तित्व सुदृढ़ था, जिसमें गहरी सूझ-बूझ थी, और जिसका अपना दिमाग़ तथा अपनी इच्छाशक्ति थी।
29उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में पुस्तकालयों का क्या उपयोग हुआ?
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उत्तर: सत्रहवीं सदी से ही किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्तित्व में आ गए थे और उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में इनका उपयोग सफ़ेद-कॉलर मज़दूरों, दस्तकारों और निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने के लिए किया गया। काम के दिन छोटे होने के बाद मज़दूरों को आत्म-अभिव्यक्ति के लिए वक़्त मिला और उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पर्चे तथा आत्मकथाएँ लिखीं।
30उन्नीसवीं सदी में छपाई की तकनीक में क्या-क्या सुधार हुए?
उत्तर देखिए
उत्तर: अठारहवीं सदी के अंत तक प्रेस धातु से बनने लगे थे, उन्नीसवीं सदी के मध्य तक न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो. ने शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस कारगर बना लिया जिससे प्रति घंटे 8000 शीट छप सकते थे। सदी के अंत तक ऑफ़सेट प्रेस आ गया जिससे एक साथ छह रंग की छपाई मुमकिन थी, और बीसवीं सदी के शुरू से बिजली से चलने वाले प्रेस से छपाई बड़ी तेज़ी से होने लगी।
31प्रकाशकों ने अपने उत्पाद बेचने के कौन-से नए गुर अपनाए?
उत्तर देखिए
उत्तर: उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यासों को धारावाहिक छापा, इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें शिलिंग शृंखला के तहत छापी गईं, और किताबों की जिल्द का डस्ट कवर भी बीसवीं सदी की नवइयत है। 1930 की आर्थिक मंदी के आने पर बिक्री गिरने के भय से प्रकाशकों ने पाठकों की जेब का ख़याल रखते हुए सस्ते पेपरबैक संस्करण छापे।
32भारत में पांडुलिपियों का व्यापक दैनिक इस्तेमाल क्यों नहीं होता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थीं, काफ़ी महँगी भी थीं और उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था। इसके अलावा लिपियों के अलग-अलग तरीक़े से लिखे जाने के चलते उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था, इसीलिए उनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था।
33पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में लोग बिना किताब पढ़े साक्षर कैसे बन जाते थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक पाठशालाओं का बड़ा जाल था, लेकिन विद्यार्थी आमतौर पर किताबें नहीं पढ़ते थे। गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे, इस तरह कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।
34भारत में छपाई किस तरह आई?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्रिंटिंग प्रेस पहले-पहल सोलहवीं सदी में भारत के गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया, जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी सीखी और कई पुस्तिकाएँ छापीं तथा 1674 ई. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। कैथलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब और 1713 में पहली मलयालम किताब छापी, तथा डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने 32 तमिल किताबें छापीं।
35जेम्स ऑगस्टस हिक्की पर मुक़दमा क्यों हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: हिक्की ढेर सारे विज्ञापन छापता था, पर साथ ही वह भारत में कार्यरत वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छापता था। इससे नाराज़ होकर गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने उस पर मुक़दमा कर दिया और ऐसे सरकारी आश्रय-प्राप्त अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जो औपनिवेशिक राज की छवि की रक्षा कर सकें।
36उन्नीसवीं सदी में छपाई ने धार्मिक बहसों को किस तरह बदला?
उत्तर देखिए
उत्तर: छपी हुई पुस्तिकाओं और अख़बारों ने न केवल नए विचारों का प्रचार-प्रसार किया बल्कि उन्होंने बहस की शक्ल भी तय की। इन बहसों में व्यापक जन-समुदाय भी हिस्सा ले सकता था और अपना मत ज़ाहिर कर सकता था, इस तरह के मत-मंतांतर से नए विचार उभरे।
37उलमा ने लिथोग्राफ़ी प्रेस का इस्तेमाल क्यों किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: उत्तर भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे और उन्हें डर था कि कहीं औपनिवेशिक शासक धर्मांतरण को बढ़ावा न दें या मुस्लिम क़ानून न बदल डालें। इससे निबटने के लिए उन्होंने सस्ती लिथोग्राफ़ी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्मग्रंथों के फ़ारसी या उर्दू अनुवाद छापे और धार्मिक अख़बार तथा गुटके निकाले।
38देवबंद सेमिनरी ने क्या भूमिका निभाई?
उत्तर देखिए
उत्तर: सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने मुसलमान पाठकों को रोज़मर्रा का जीवन जीने का सलीक़ा और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हज़ारों फ़तवे जारी किए। पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान कई इस्लामी संप्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए, धर्म को लेकर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएँ थीं और हर कोई अपना संप्रदाय बढ़ाना चाहता था।
39छपाई से हिंदुओं में धार्मिक पढ़ाई को कैसे बल मिला?
उत्तर देखिए
उत्तर: तुलसीदास की सोलहवीं सदी की किताब रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ और उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राफ़ी संस्करणों से उत्तर भारत का बाज़ार पट गया। लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं, जो मुद्रित और लाने-ले जाने में आसान होने के कारण कहीं भी पढ़ी जा सकती थीं।
40भारत में उपन्यास नामक विधा क्यों लोकप्रिय हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: जैसे-जैसे नए लोग पढ़ने लगे, छपे हुए पन्नों में अपनी ज़िंदगी, अपने तजुर्बों और अपने भोगे हुए रिश्तों को देखने की चाहत बलवती होती गई, और यूरोप में विकसित उपन्यास इन ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम था। जल्दी ही इसने अपनी एक ख़ास भारतीय शक्ल और शैली अख़्तियार कर ली तथा अपने पाठकों को अनुभव का नया संसार और मानव जीवन की विविधता का बोध प्रदान किया।
41उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत में नयी दृश्य-संस्कृति कैसे बनी?
उत्तर देखिए
उत्तर: छापेख़ानों की बढ़ती तादाद के साथ छवियों की कई नक़लें आसानी से बनाई जा सकती थीं, और राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं। बाज़ार में सुलभ सस्ती तसवीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़रीब भी अपने घरों एवं दफ़्तरों में सजाते थे, और इन छपी तसवीरों ने आधुनिकता तथा परंपरा के लोकप्रिय विचार-लोक को गढ़ना शुरू किया।
42भारत में कार्टून और कैरिकेचर किन विषयों पर बनते थे?
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उत्तर: 1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और कार्टून छपने लगे थे; कुछ में शिक्षित भारतीयों की पश्चिमी पोशाक और अभिरुचियों का मज़ाक उड़ाया गया, जबकि कुछ में सामाजिक परिवर्तन को लेकर डर दिखा। साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों में राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाया जाता था, तो राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साधने में पीछे नहीं रहे।
43राससुन्दरी देबी के बारे में लिखिए।
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उत्तर: पूर्वी बंगाल में उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में कट्टर रूढ़िवादी परिवार में ब्याही कन्या राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा। बाद में चलकर उन्होंने आमार जीबोन नामक आत्मकथा लिखी जो 1876 में प्रकाशित हुई और यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी थी।
44महिलाओं के पढ़ने का विरोध किन कारणों से हुआ?
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उत्तर: अनेक परंपरावादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं, और इसी तरह दक़ियानूसी मुसलमानों को लगता था कि उर्दू के रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी। इसके बावजूद कभी-कभार बाग़ी औरतों ने इन प्रतिबंधों को अस्वीकार भी किया और गुपचुप ढंग से पढ़ना-लिखना सीखा।
45बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने नारी-शिक्षा के विरोधियों को क्या उत्तर दिया?
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उत्तर: उन्होंने 1926 में बंग महिला शिक्षा सम्मेलन में कहा कि जो लोग ख़ुद को मुसलमान बताते हैं, वे इस्लाम द्वारा औरतों को बराबरी की तालीम का हक़ देने के बुनियादी उसूल के ख़िलाफ़ जाते हैं। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि अगर पुरुष पढ़-लिखकर नहीं भटकते, तो महिलाएँ क्यों बिगड़ जाएँगी।
46पंजाब में महिलाओं के लिए किस तरह का साहित्य छपा?
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उत्तर: पंजाब में बीसवीं सदी के आरंभ से ही लोकप्रिय लोक साहित्य बड़े पैमाने पर छापा गया और राम चड्ढा ने औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देने के उद्देश्य से अपनी बेस्ट-सेलिंग कृति स्त्री धर्म विचार लिखी। खालसा ट्रैक्ट सोसायटी ने भी इसी तरह के संदेश देते हुए सस्ती पुस्तिकाएँ छापीं और अच्छी औरत बनने के उपदेश को कई बार संवाद के रूप में पेश किया गया।
47कलकत्ता के बटाला इलाक़े का क्या महत्त्व था?
उत्तर देखिए
उत्तर: केंद्रीय कलकत्ता का बटाला नामक पूरा इलाक़ा लोकप्रिय किताबों के प्रकाशन को समर्पित हो गया था, जहाँ धार्मिक गुटकों और ग्रंथों के सस्ते संस्करण के साथ-साथ अश्लील और सनसनीख़ेज़ समझा जाने वाला साहित्य भी उपलब्ध था। फेरीवाले बटाला के प्रकाशन लेकर घर-घर घूमते थे, जिससे महिलाओं को फ़ुरसत के वक़्त मनपसंद किताबें पढ़ने में सहूलियत हो गई।
48भारत में जाति-विरोधी लेखन में किन लोगों का योगदान रहा?
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उत्तर: ‘निम्न-जातीय’ आंदोलनों के मराठी प्रणेता ज्योतिबा फुले ने अपनी गुलामगिरी (1871) में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा। बीसवीं सदी में महाराष्ट्र में भीमराव अंबेडकर और मद्रास में ई.वी. रामास्वामी नायकर ने जाति पर ज़ोरदार क़लम चलाई और उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए।
49मज़दूरों ने अपनी बात छापकर कैसे कही?
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उत्तर: कानपुर के मिल-मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल लिख और छापकर जातीय तथा वर्गीय शोषण के बीच का रिश्ता समझाने की कोशिश की। 1935 से 1955 के बीच सुदर्शन चक्र के नाम से लिखने वाले एक और मिल-मज़दूर का लेखन सच्ची कविताएँ नामक संग्रह में छापा गया।
50ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती सेंसरशिप-क़दम किसके ख़िलाफ़ थे और क्यों?
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उत्तर: कंपनी के शुरुआती क़दम भारतीयों के नहीं, बल्कि कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले और उसके हुक्मरानों को कोसने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठे। कंपनी को चिंता थी कि इन आलोचनाओं का लाभ उठाकर इंग्लैंड में बैठे उसके निंदक कहीं भारत पर उसके व्यापारिक एकाधिकार पर हमला न बोल दें।
51वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट क्या था? (अभ्यास प्रश्न 2-ग)
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उत्तर: 1857 के विद्रोह के बाद भाषाई समाचार पत्र राष्ट्रवाद के समर्थन में मुखर होने लगे थे, इसलिए आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया गया। इससे सरकार को भाषाई प्रेस में छपी रपट और संपादकीय को सेंसर करने का व्यापक हक़ मिल गया; किसी रपट को बाग़ी क़रार दिए जाने पर अख़बार को पहले चेतावनी दी जाती थी और अनसुनी करने पर अख़बार ज़ब्त तथा छपाई की मशीनें छीनी जा सकती थीं।
52बालगंगाधर तिलक को क़ैद क्यों किया गया?
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उत्तर: जब पंजाब के क्रांतिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया तो बालगंगाधर तिलक ने अपने अख़बार केसरी में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई। नतीजे के तौर पर उन्हें 1908 में क़ैद कर लिया गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत-भर में व्यापक विरोध हुए।
53दोनों विश्वयुद्धों के दौरान भारत में प्रेस पर क्या दमन हुआ?
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उत्तर: पहले विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय रक्षा नियम के तहत 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी थी, जिनमें से 18 ने सरकारी आदेश मानने की जगह ख़ुद को बंद कर देना उचित समझा। द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत पर भारतीय रक्षा अधिनियम पारित किया गया और अगस्त 1942 में तक़रीबन 90 अख़बारों का दमन किया गया।
54गांधी ने 1922 में प्रेस की आज़ादी के बारे में क्या कहा? (अभ्यास प्रश्न 1-घ)
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उत्तर: गांधी ने कहा कि भारत सरकार वाणी की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और सामूहिकता की आज़ादी — जनमत को व्यक्त करने और बनाने के इन तीन ताक़तवर औज़ारों को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि स्वराज और ख़िलाफ़त की लड़ाई सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है, क्योंकि इनके बिना स्वराज की माँग रखने का साधन ही नहीं बचता।
भाग ग — लघूत्तरात्मक प्रश्न (3 अंक)
1पूर्वी एशिया में छपाई के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई और यह छपाई हाथ से होती थी। चीन में तक़रीबन 594 ई. से स्याही लगे काठ के ब्लॉक पर काग़ज़ रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं।
- जापान में चीनी बौद्ध प्रचारक 768–770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक लेकर आए और वहाँ की सबसे पुरानी छपी पुस्तक 868 ई. की डायमंड सूत्र है।
- कोरिया में तेरहवीं शताब्दी के मध्य का त्रिपीटका कोरियाना लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था, और चौदहवीं सदी के अंत की जिक्जी मूवेबल मेटल टाइप से मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक है।
2गुटेन्बर्ग प्रेस पर टिप्पणी लिखिए। (अभ्यास प्रश्न 2-क)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- गुटेन्बर्ग के पिता व्यापारी थे और वह बचपन से ही तेल तथा जैतून पेरने की मशीनें देखता आया था; बाद में उसने पत्थर पर पॉलिश करने की कला, सुनारी और शीशे को गढ़ने में महारत हासिल की।
- उसने अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए जैतून प्रेस को प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल बनाया और साँचे का उपयोग अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़ने के लिए किया। उसने 1448 तक अपना यंत्र मुकम्मल कर लिया और पहली किताब बाइबिल छापी, जिसकी तक़रीबन 180 प्रतियाँ बनाने में तीन साल लगे।
- गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए जिन्हें घुमाकर शब्द बनाए जा सकते थे, इसलिए इसे मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन कहा गया; यह प्रेस एक घंटे में 250 पन्ने छाप सकती थी और यही अगले 300 सालों तक छपाई की बुनियादी तकनीक रही।
3मुद्रण क्रांति ने लोगों की ज़िंदगी किस तरह बदल दी?
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उत्तर:
- छापेख़ाने का आविष्कार महज़ तकनीकी बदलाव नहीं था; पुस्तक-उत्पादन के नए तरीक़ों की बदौलत सूचना और ज्ञान से, तथा संस्था और सत्ता से लोगों का रिश्ता ही बदल गया, जिससे लोकचेतना और नज़रिया दोनों बदले।
- किताबों की क़ीमत गिरी, हर प्रति के उत्पादन में लगने वाला वक़्त और श्रम कम हुआ, बाज़ार किताबों से पट गया और पाठक वर्ग बृहत्तर होता गया।
- मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापीं जिन्हें ग्रामीण सभाओं और शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था, इस तरह मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की रेखा धुँधली पड़ गई और श्रोता तथा पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।
4छपाई के प्रसार से किन-किन लोगों को डर लगा और क्यों?
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उत्तर:
- कई लोगों को छपी किताब के व्यापक प्रसार और छपे शब्द की सुगमता को लेकर यह आशंका थी कि इसका आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर होगा; भय था कि नियंत्रण न होने पर लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे और ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी।
- धर्मगुरुओं और सम्राटों तथा कई लेखकों एवं कलाकारों द्वारा व्यक्त की गई यह चिंता नव-मुद्रित और नव-प्रसारित साहित्य की व्यापक आलोचना का आधार बनी। इरैस्मस ने किताबों को भिनभिनाती मक्खियों जैसा बताया।
- रोमन कैथलिक चर्च ने धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए इन्क्वीज़ीशन शुरू किया, मेनोकियो जैसे किसान को मौत की सज़ा दी, और 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा।
5मुद्रण संस्कृति और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार का क्या संबंध था?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- मार्टिन लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए पिच्चानवे स्थापनाएँ लिखीं, जिनकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँगी गई और जिसमें चर्च को शास्त्रार्थ की चुनौती दी गई थी।
- छपाई की वजह से लूथर के लेख बड़ी तादाद में छापे और पढ़े जाने लगे, जिसके नतीजे में चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत हुई; उसके न्यू टेस्टामेंट अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ हफ़्तों में बिक गईं और तीन महीने में दूसरा संस्करण निकालना पड़ा।
- इसीलिए कृतज्ञ लूथर ने कहा कि “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा”; कई इतिहासकारों का ख़याल है कि छपाई ने नया बौद्धिक माहौल बनाया जिससे धर्म-सुधार आंदोलन के नए विचारों के प्रसार में मदद मिली।
6अठारहवीं सदी के यूरोप में पढ़ने का जुनून कैसे पैदा हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- अलग-अलग संप्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों-कारीगरों को शिक्षित किया, जिससे अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गई।
- नए पाठकों की रुचि का ध्यान रखते हुए क़िस्म-क़िस्म का साहित्य छपने लगा — पंचांग, लोक-गाथाएँ, इंग्लैंड की पेनी चैपबुक्स और फ़्रांस की बिब्लियोथीक ब्ल्यू; इन्हें फेरीवाले गाँव-गाँव बेचते थे और ग़रीब तबक़े भी ख़रीद सकते थे।
- अठारहवीं सदी के आरंभ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों तथा टॉमस पेन, वॉल्टेयर और रूसो जैसे दार्शनिकों की किताबें भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं।
7मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए ज़मीन कैसे तैयार की?
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उत्तर:
- पहला तर्क यह है कि छपाई के चलते ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का प्रसार हुआ; उन्होंने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना की और चर्च तथा राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार करके परंपरा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को दुबला कर दिया।
- दूसरा तर्क यह है कि छपाई ने वाद-विवाद-संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया; पुराने मूल्यों, संस्थाओं और क़ायदों पर आम जनता के बीच बहस हुई और इस तरह बनी ‘सार्वजनिक दुनिया’ से सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रपात हुआ।
- तीसरा तर्क यह है कि 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मज़ाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था; कार्टूनों और कैरिकेचरों में यह भाव उभरता था कि जनता मुश्किलों में फँसी है जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी है, और इस भूमिगत साहित्य ने लोगों को राजतंत्र के ख़िलाफ़ भड़काया।
8उन्नीसवीं सदी में महिलाएँ और बच्चे नए पाठक वर्ग के रूप में कैसे उभरे?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- उन्नीसवीं सदी के आख़िर से प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने से बच्चे पाठकों की अहम श्रेणी बन गए; फ़्रांस में 1857 में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए प्रेस स्थापित हुआ और ग्रिम बंधुओं की जमा की गई लोक-कथाएँ 1812 के संकलन में छपीं।
- महिलाएँ पाठिका और लेखिका दोनों भूमिकाओं में अहम हो गईं; पेनी मैगज़ीन्स ख़ास तौर पर उन्हीं के लिए होती थीं और उपन्यास छपने पर महिलाओं को उनका अहम पाठक माना गया।
- जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें और जॉर्ज इलियट जैसी लेखिकाओं के लेखन से नयी नारी की परिभाषा उभरी — जिसका व्यक्तित्व सुदृढ़ था, जिसमें गहरी सूझ-बूझ थी, और जिसका अपना दिमाग़ तथा अपनी इच्छाशक्ति थी।
9भारत में मुद्रण युग से पहले पांडुलिपियों की परंपरा कैसी थी?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्त-लिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परंपरा थी; ये ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर नक़्ल कर बनाई जाती थीं और कभी-कभी पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाई जाती थीं।
- लेकिन पांडुलिपियाँ नाज़ुक और काफ़ी महँगी होती थीं, उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था और लिपियों के अलग-अलग तरीक़े से लिखे जाने के चलते उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था, इसलिए उनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था।
- पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण पाठशालाओं का बड़ा जाल था, पर विद्यार्थी किताबें नहीं पढ़ते थे; गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे, इस तरह कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।
10भारत में अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस के आरंभ का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस भारत में काफ़ी देर तक विकास नहीं कर पाया, यद्यपि इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्रहवीं सदी के अंत तक छापेख़ाने का आयात शुरू कर दिया था।
- जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से बंगाल गजट नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया, जिसे उन्होंने ‘हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है’ कहा।
- हिक्की वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छापता था, इसलिए गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने उस पर मुक़दमा कर दिया और सरकारी आश्रय-प्राप्त अख़बारों को प्रोत्साहित करना शुरू किया; भारतीयों में पहला प्रयास गंगाधर भट्टाचार्य का बंगाल गजट था।
11उन्नीसवीं सदी में भारत में धार्मिक बहसें प्रिंट में कैसे आईं?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- अलग-अलग समूह औपनिवेशिक समाज में हो रहे बदलावों से जूझते हुए धर्म की अपनी-अपनी व्याख्या पेश कर रहे थे; कुछ मौजूदा रीति-रिवाजों में सुधार चाहते थे तो कुछ समाज-सुधारकों के तर्कों के ख़िलाफ़ खड़े थे, और ये सारे वाद-विवाद प्रिंट में सरेआम हुए।
- विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों पर तेज़ बहस ठनी हुई थी; ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया।
- राममोहन राय ने 1821 से संवाद कौमुदी प्रकाशित किया और रूढ़िवादियों ने उनके विचारों से टक्कर लेने के लिए समाचार चंद्रिका का सहारा लिया; इस तरह छपी पुस्तिकाओं और अख़बारों ने न सिर्फ़ नए विचार फैलाए बल्कि बहस की शक्ल भी तय की।
12उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का महिलाओं के लिए क्या मतलब था? (अभ्यास प्रश्न 3-क)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- महिलाओं की ज़िंदगी और उनकी भावनाएँ बड़ी साफ़गोई और गहनता से लिखी जाने लगीं, मध्यवर्गीय घरों में महिलाओं का पढ़ना बहुत बढ़ गया, उदारवादी पिता और पति उन्हें घर पर पढ़ाने लगे और स्कूल बनने पर स्कूल भेजने लगे।
- कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और नारी-शिक्षा की ज़रूरत रेखांकित की; राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा और उनकी आमार जीबोन (1876) बंगाली की पहली संपूर्ण आत्मकथा बनी, तथा कैलाशबाशिनी देवी, ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने महिलाओं की दशा पर लिखा।
- पर सारे परिवार उदार-दिल नहीं थे — परंपरावादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं और दक़ियानूसी मुसलमानों को लगता था कि रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी; साथ ही स्त्री धर्म विचार जैसी किताबें औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनना सिखाती थीं।
13उन्नीसवीं सदी में ग़रीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ? (अभ्यास प्रश्न 3-ख)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- उन्नीसवीं सदी के मद्रासी शहरों में काफ़ी सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बेची जा रही थीं, जिससे ग़रीब लोग भी उन्हें ख़रीदने की स्थिति में आ गए; बीसवीं सदी के आरंभ से सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे जिससे किताबों की पहुँच और बढ़ी।
- जाति-भेद के बारे में तरह-तरह की पुस्तिकाएँ और निबंध लिखे जाने लगे — ज्योतिबा फुले की गुलामगिरी (1871), तथा भीमराव अंबेडकर और ई.वी. रामास्वामी नायकर के लेखन पूरे भारत में पढ़े गए।
- मज़दूरों ने भी लिखना शुरू किया — कानपुर के काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल छापी, सुदर्शन चक्र का लेखन सच्ची कविताएँ में छपा, और बंगलौर के सूती-मिल-मज़दूरों ने ख़ुद को शिक्षित करने के लिए पुस्तकालय बनाए।
14उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का सुधारकों के लिए क्या मतलब था? (अभ्यास प्रश्न 3-ग)
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उत्तर:
- सुधारकों के लिए प्रिंट एक ऐसा मंच बना जहाँ वे अपनी बात व्यापक जनता तक पहुँचा सकते थे; विधवा-दाह, मूर्ति-पूजा और ब्राह्मण पुजारीवर्ग जैसे मुद्दों पर उनकी बहस अब सार्वजनिक हो गई और आम बोलचाल की भाषा में छपने से इसमें आम लोग भी शामिल हो सके।
- राममोहन राय ने 1821 से संवाद कौमुदी निकाला; दूसरी तरफ़ उलमा ने सस्ती लिथोग्राफ़ी प्रेस से धर्मग्रंथों के अनुवाद तथा गुटके छापे और 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने हज़ारों फ़तवे जारी किए।
- हिंदुओं में भी स्थानीय भाषाओं में धार्मिक पढ़ाई को बल मिला — रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से आया और नवल किशोर प्रेस तथा श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं।
15भारत में प्रेस पर औपनिवेशिक नियंत्रण का क्रम बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- 1798 से पहले कंपनी सेंसरशिप को लेकर ज़्यादा परेशान नहीं थी, और उसके शुरुआती क़दम कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले अंग्रेज़ों के ही ख़िलाफ़ उठे थे।
- 1820 के दशक तक कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की आज़ादी को नियंत्रित करने वाले कुछ क़ानून पास किए; 1835 में संपादकों की अर्ज़ी पर गवर्नर जनरल बेंटिंक पुनर्समीक्षा को राज़ी हुआ और टॉमस मेकॉले ने पहले की आज़ादियाँ बहाल करते हुए नए क़ानून बनाए।
- 1857 के विद्रोह के बाद रवैया बदल गया और आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया गया, जिससे सरकार को भाषाई प्रेस की रपट और संपादकीय सेंसर करने का व्यापक हक़ मिल गया।
16दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार कैसे फैलते गए?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार देश के हर कोने में बढ़ते-फैलते गए और उन्होंने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग तथा राष्ट्रवादी ताक़तों की हौसला-अफ़ज़ाई जारी रखी।
- राष्ट्रवादी आलोचना को खामोश करने की तमाम कोशिशों का उग्र विरोध हुआ; जब 1907 में पंजाब के क्रांतिकारियों को कालापानी भेजा गया तो तिलक ने अपने केसरी में हमदर्दी जताई, नतीजे में 1908 में उन्हें क़ैद किया गया और भारत-भर में व्यापक विरोध हुए।
- यहाँ तक कि सरकार को वफ़ादार संपादक ढूँढ़ना भी मुश्किल पड़ता था — द फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया ने सरकारी मदद लेने से इसलिए इनकार कर दिया कि इससे उसे सरकारी आदेश मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
17मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- छपी हुई पुस्तिकाओं और अख़बारों ने न सिर्फ़ नए विचार फैलाए बल्कि यह भी तय किया कि बहस किस शक्ल में हो, और इनमें व्यापक जन-समुदाय हिस्सा ले सकता था; प्रिंट ने विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम किया।
- राष्ट्रवादी अख़बारों ने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग की और राष्ट्रवादी ताक़तों का हौसला बढ़ाया; समाज-सुधारकों ने मज़दूरों तक भी राष्ट्रवाद का संदेश पहुँचाने की कोशिश की।
- गांधी ने 1922 में कहा कि वाणी, प्रेस और सामूहिकता की आज़ादी जनमत बनाने के तीन ताक़तवर औज़ार हैं, और स्वराज की लड़ाई सबसे पहले इन्हीं संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।
18गुटेन्बर्ग की बाइबिल की छपाई और सजावट की प्रक्रिया समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- गुटेन्बर्ग ने कुल 180 प्रतियाँ छापी थीं, जिनमें से आज केवल 50 ही बची हैं; ये केवल नयी तकनीक की देन नहीं थीं क्योंकि इन्हें धातुई टाइप से छापने के बाद इनके हाशिए पर कलाकारों ने हाथ से टीकाकारी और सुघड़ चित्रकारी की थी।
- इसीलिए कोई दो प्रतियाँ एक-जैसी नहीं थीं और हर प्रति का हर पन्ना अलग था; कुलीन तबक़ों ने इस विशिष्टता को पसंद किया क्योंकि उनके पास जो था वह अनोखा था।
- इबारत में रंग भरने के दो फ़ायदे थे — पन्ना रंगीन हो जाता था और सारे पवित्र शब्द ज़्यादा दर्शनीय तथा महत्त्वपूर्ण बन जाते थे; इसीलिए गुटेन्बर्ग ने पाठ को काले में छापा और बाद में रंग भरे जाने के लिए जगह छोड़ दी।
19सोलहवीं सदी के मुद्रक की वर्कशॉप का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- इस वर्कशॉप में सारे काम एक ही छत के नीचे चलते थे; दाएँ छोर पर अगले हिस्से में कम्पोज़ीटर काम कर रहे होते थे।
- बाएँ सिरे पर गैलीज़ तैयार किए जा रहे होते थे और धातुई अक्षरों पर स्याही लगाई जा रही होती थी।
- पृष्ठभूमि में प्रिंटर्स प्रेस के पेंच कस रहे होते थे और उन्हीं के पास प्रूफ़रीडर काम में जुटे रहते थे, तथा बिलकुल अगले भाग में तैयार माल — दो-दो पृष्ठ वाले छपे हुए पन्ने — पड़ा रहता था जिनकी बाइंडिंग होनी होती थी।
20उन्नीसवीं सदी के तीन काष्ठचित्रों (चित्र 19, 20, 21) से समाज की किन चिंताओं का पता चलता है?
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उत्तर:
- घोर कलि नामक रंगीन काष्ठचित्र में पारिवारिक संबंधों के नष्ट-भ्रष्ट होने की कल्पना है; इसमें पत्नी पति के सिर पर सवार है और वह ख़ुद अपनी माँ को ज़ंजीर पहनाकर जानवरों की तरह रखता है।
- एक भारतीय दंपति वाले सफ़ेद-स्याह काष्ठचित्र में कलाकार का यह डर उजागर होता है कि पश्चिमी हमले से पारिवारिक व्यवस्था उलट-पुलट गई है, क्योंकि उसमें मर्द वीणा बजा रहा है और औरत हुक़्क़ा खींच रही है।
- इसके उलट यूरोपीय दंपति वाले काष्ठचित्र में पारंपरिक भूमिकाओं का निरूपण है, जहाँ साहब शराब की बोतल थामे हैं और मेमसाहब वायलिन बजा रही हैं; कुल मिलाकर ये चित्र महिलाओं की शिक्षा की पहल के बाद पारंपरिक भूमिकाओं के छिन्न-भिन्न होने की आशंका दिखाते हैं।
भाग घ — निबंधात्मक प्रश्न (4 अंक)
1“छपाई का आविष्कार सिर्फ़ तकनीकी बदलाव नहीं था।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
छपाई ने तकनीक से कहीं ज़्यादा समाज को बदला। इसे इन बिंदुओं से समझा जा सकता है —
- पाठ्यपुस्तक कहती है कि पुस्तक-उत्पादन के नए तरीक़ों ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी, क्योंकि इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, तथा संस्था और सत्ता से उनका रिश्ता ही बदल गया, जिससे लोकचेतना और चीज़ों को देखने का नज़रिया दोनों बदले।
- किताबों की क़ीमत गिरने से बाज़ार किताबों से पट गया और पाठक वर्ग बृहत्तर होता गया; जो जनता पहले सिर्फ़ श्रोता थी, वह अब पाठक-जनता बन गई।
- मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की विभाजक रेखा धुँधली पड़ गई, क्योंकि मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापीं जिन्हें सामूहिक सभाओं और शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था।
- छपाई से असहमति के विचार भी फैलने लगे; मार्टिन लूथर की स्थापनाओं ने चर्च में विभाजन करा दिया और मेनोकियो जैसे साधारण किसान भी धर्मग्रंथ की अपनी व्याख्या करने लगे।
- इसी कारण सत्ता डरने लगी — चर्च ने 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखी और भारत में औपनिवेशिक सरकार ने 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू किया।
इस प्रकार छपाई का असर मशीन तक सीमित नहीं था; उसने यह बदल दिया कि कौन पढ़ सकता है, कौन बोल सकता है, और सत्ता किससे डरती है।
2मुद्रण क्रांति से पैदा हुए नए पाठक वर्ग का वर्णन कीजिए और बताइए कि मुद्रकों ने साक्षरता की सीमा को कैसे पार किया।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- छपाई से किताबों की क़ीमत गिरी, हर प्रति के उत्पादन में लगने वाला वक़्त और श्रम कम हो गया और बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापना आसान हो गया, जिससे बाज़ार किताबों से पट गया।
- किताबों तक पहुँच आसान होने से पढ़ने की एक नयी संस्कृति विकसित हुई; इससे पहले आमलोग मौखिक संसार में जीते थे, धार्मिक किताबों का वाचन सुनते थे और गाथा-गीत उन्हें पढ़कर सुनाए जाते थे।
- लेकिन यह संक्रमण सरल नहीं था, क्योंकि किताबें सिर्फ़ साक्षर ही पढ़ सकते थे और यूरोप के अधिकांश देशों में बीसवीं सदी तक साक्षरता की दर सीमित थी।
- इसलिए मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कीं, ऐसी किताबें तसवीरों से ख़ूब सजी-धजी यानी सचित्र होती थीं, और इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था।
- इस तरह मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाख़िल हुई और छपी सामग्री मौखिक अंदाज़ में प्रसारित हुई; श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।
यानी छपाई ने पढ़ने-लिखने वालों की सीमा को अपनी चतुराई से पार कर लिया — जो पढ़ नहीं सकते थे, वे भी सुनकर मुद्रित संसार का हिस्सा बन गए।
3“छपाई ने कुछ लोगों को उम्मीद दी और कुछ को डर।” उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
यह अध्याय इन्हीं दो नज़रियों की टक्कर है।
| उम्मीद देखने वाले | डर देखने वाले |
|---|---|
| मार्टिन लूथर, जिसने कहा — “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।” | इरैस्मस, जिसने कहा कि किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं और उनका ज़्यादा हिस्सा विद्वता के लिए हानिकारक है। |
| लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए, जिसने कहा — “छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।” | रोमन कैथलिक चर्च, जिसने इन्क्वीज़ीशन चलाया, मेनोकियो को मौत की सज़ा दी और 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखी। |
| ज्ञानोदय के चिंतक, जिनके विचारों ने परंपरा और अंधविश्वास की आलोचना की। | धर्मगुरु और सम्राट, जिन्हें भय था कि नियंत्रण न होने पर लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपेंगे। |
| भारत में सुधारक, महिलाएँ और मज़दूर, जिन्हें अपनी बात कहने का मंच मिला। | औपनिवेशिक सरकार, जिसने 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू किया और अगस्त 1942 में क़रीब 90 अख़बारों का दमन किया। |
निष्कर्ष यह है कि जिसके पास सत्ता थी वह डरा, और जिसके पास आवाज़ नहीं थी उसे आवाज़ मिली। यही छपाई का दोहरा चेहरा है।
4यूरोप में हस्तलिखित पांडुलिपियों से लेकर गुटेन्बर्ग प्रेस तक की पूरी यात्रा का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- ग्यारहवीं सदी में चीनी काग़ज़ रेशम मार्ग से यूरोप पहुँचा, जिससे कातिबों या मुंशियों द्वारा सावधानीपूर्वक लिखी गई पांडुलिपियों का उत्पादन मुमकिन हुआ।
- 1295 ई. में मार्को पोलो चीन से वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान लेकर इटली लौटा, जिसके बाद इतालवी तख़्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और यह तकनीक बाक़ी यूरोप में फैल गई।
- पर हस्तलिखित पांडुलिपियों से माँग पूरी नहीं होती थी, क्योंकि नक़ल उतारना ख़र्चीला, समयसाध्य और श्रमसाध्य था तथा पांडुलिपियाँ नाज़ुक होने के कारण उनका सर्कुलेशन सीमित रहता था; एक विक्रेता के यहाँ 50 कातिब काम करने पर भी माँग पूरी नहीं होती थी।
- इसलिए वुडब्लॉक प्रिंटिंग लोकप्रिय होती गई और पंद्रहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में कपड़े, ताश के पत्ते और धार्मिक चित्र छापे जाने लगे; पर किताबों के लिए इससे भी तेज़ और सस्ती तकनीक चाहिए थी।
- यह 1430 के दशक में गुटेन्बर्ग ने कर दिखाया — जैतून प्रेस को मॉडल बनाकर और साँचे से धातुई अक्षर गढ़कर उसने 1448 तक अपना यंत्र मुकम्मल किया और पहली किताब बाइबिल छापी, जिसकी 180 प्रतियाँ तीन साल में बनीं।
1450 से 1550 के बीच यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने खुल गए; पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में 2 करोड़ किताबें बाज़ार में आईं और सोलहवीं सदी में यह संख्या 20 करोड़ हो गई।
5मुद्रण संस्कृति और फ़्रांसीसी क्रांति के संबंध का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
कई इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ रचीं। इसके तीन तर्क हैं —
- पहला, छपाई से ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का प्रसार हुआ। उन्होंने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना की, रीति-रिवाजों की जगह विवेक के शासन पर बल दिया और चर्च तथा राज्य की सत्ता पर प्रहार करके परंपरा-आधारित सामाजिक व्यवस्था को दुबला कर दिया। वॉल्टेयर और रूसो के पाठक एक नए, आलोचनात्मक और तार्किक नज़रिये से दुनिया देखने लगे।
- दूसरा, छपाई ने वाद-विवाद-संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया। सारे पुराने मूल्यों, संस्थाओं और क़ायदों पर आम जनता के बीच बहस हुई और उनके पुनर्मूल्यांकन का सिलसिला शुरू हुआ; इस तरह बनी ‘सार्वजनिक दुनिया’ से सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रपात हुआ।
- तीसरा, 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मज़ाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था। कार्टूनों और कैरिकेचरों में यह भाव उभरता था कि जनता मुश्किलों में फँसी है जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी हुई है, और भूमिगत घूमने वाले इस साहित्य ने लोगों को राजतंत्र के ख़िलाफ़ भड़काया।
पर इन तर्कों की एक सीमा भी है
- लोग-बाग़ हर तरह की सामग्री पढ़ते थे। एक तरफ़ अगर वे रूसो और वॉल्टेयर पढ़ रहे थे तो दूसरी तरफ़ चर्च और राज्य का प्रचार भी पढ़ रहे थे; वे हर पढ़ी या देखी चीज़ से सीधे प्रभावित नहीं हो सकते थे, वे कुछ विचारों को स्वीकारते थे तो कुछ को नकारते भी थे।
इसलिए सही निष्कर्ष यही है — “मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।”
6उन्नीसवीं सदी में यूरोप में मुद्रण के क्षेत्र में हुए तकनीकी और व्यावसायिक बदलावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
तकनीकी बदलाव —
- अठारहवीं सदी के अंत तक प्रेस धातु से बनने लगे थे, और उन्नीसवीं सदी के मध्य तक न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो. ने शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस को कारगर बना लिया, जिससे प्रति घंटे 8000 शीट या ताव छप सकते थे।
- सदी के अंत तक ऑफ़सेट प्रेस आ गया जिससे एक साथ छह रंग की छपाई मुमकिन थी, और बीसवीं सदी के शुरू से बिजली से चलने वाले प्रेस से छपाई का काम बड़ी तेज़ी से होने लगा।
- काग़ज़ डालने की विधि में सुधार हुआ, प्लेट की गुणवत्ता बेहतर हुई, तथा स्वचालित पेपर-रील और रंगों के लिए फ़ोटो-विद्युतीय नियंत्रण भी काम में आने लगे, जिससे छपे हुए पन्ने का रंग-रूप ही बदल गया।
व्यावसायिक बदलाव
- उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यासों को धारावाहिक छापा, जिससे उपन्यास लिखने की एक ख़ास शैली विकसित हुई; इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें शिलिंग शृंखला के तहत छापी गईं।
- किताबों की जिल्द का डस्ट कवर बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत है, और 1930 की आर्थिक मंदी के आने पर प्रकाशकों ने पाठकों की जेब का ख़याल रखते हुए सस्ते पेपरबैक संस्करण छापे।
इस तरह उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में छपाई सिर्फ़ तेज़ ही नहीं हुई, बल्कि किताब एक ऐसी वस्तु बन गई जिसे बाज़ार के हिसाब से गढ़ा और बेचा जाने लगा।
7भारत में छपाई के आगमन और उसके आरंभिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- प्रिंटिंग प्रेस पहले-पहल सोलहवीं सदी के मध्य में भारत के गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया; जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी सीखी और कई सारी पुस्तिकाएँ छापीं।
- कैथलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब छापी और 1713 में पहली मलयालम किताब भी उन्होंने ही छापी; 1674 ई. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं, तथा डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने 32 तमिल किताबें छापीं।
- अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस काफ़ी देर तक विकास नहीं कर पाया, यद्यपि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्रहवीं सदी के अंत तक छापेख़ाने का आयात शुरू कर दिया था; जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से बंगाल गजट का संपादन शुरू किया।
- हिक्की वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी छापता था, इसलिए वॉरेन हेस्टिंग्स ने उस पर मुक़दमा कर दिया और सरकारी आश्रय-प्राप्त अख़बारों को प्रोत्साहन देना शुरू किया।
भारतीयों के अपने प्रयासों में पहला था राजा राममोहन राय के क़रीबी गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित बंगाल गजट। ध्यान देने लायक़ बात यह है कि भारत में छपाई सबसे पहले धर्म-प्रचार के लिए आई, व्यापार या शिक्षा के लिए नहीं।
8“प्रिंट ने भारत में समुदायों को बाँटा भी और जोड़ा भी।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
बाँटने वाला पक्ष —
- उन्नीसवीं सदी में समाज-सुधारकों और रूढ़िवादियों के बीच विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों पर तेज़ बहस ठनी; राममोहन राय के संवाद कौमुदी के जवाब में रूढ़िवादियों ने समाचार चंद्रिका निकाला।
- उलमा ने डर के कारण धर्मग्रंथों के अनुवाद और फ़तवे छापे; पूरी उन्नीसवीं सदी में कई इस्लामी संप्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए, जिनमें हर कोई अपना संप्रदाय बढ़ाना और दूसरों का असर काटना चाहता था।
जोड़ने वाला पक्ष
- धार्मिक पुस्तकें बड़ी तादाद में व्यापक जन-समुदाय तक पहुँचीं और मुद्रित होने के कारण उन्हें कहीं भी, किसी समय पढ़ा जा सकता था तथा अनपढ़ लोगों की भीड़ में बोलकर भी सुनाया जा सकता था।
- पाठ्यपुस्तक स्वयं कहती है कि “प्रिंट ने समुदाय के बीच सिर्फ़ मत-मतांतर ही नहीं पैदा किए, बल्कि इसने समुदायों को अंदर से, और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया।”
- अंबेडकर और पेरियार के लेखन पूरे भारत में पढ़े गए, और राष्ट्रवादी अख़बार देश के हर कोने में फैलकर लोगों को एक साझा राजनीतिक बहस में शामिल कर सके।
इसलिए प्रिंट का असर एकतरफ़ा नहीं था — उसने मतभेद भी गहरे किए और एक साझा सार्वजनिक दुनिया भी बनाई।
9भारत में औपनिवेशिक सरकार ने प्रेस को नियंत्रित करने के लिए क्या-क्या क़दम उठाए?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- 1798 से पहले कंपनी सेंसरशिप को लेकर ज़्यादा परेशान नहीं थी; दिलचस्प बात यह है कि उसके शुरुआती क़दम कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ही उठे, क्योंकि उसे डर था कि इंग्लैंड में बैठे निंदक उसके व्यापारिक एकाधिकार पर हमला न बोल दें।
- 1820 के दशक तक कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की आज़ादी को नियंत्रित करने वाले कुछ क़ानून पास किए और कंपनी ने ब्रितानी शासन का उत्सव मनाने वाले अख़बारों को प्रोत्साहन देना शुरू किया; 1835 में बेंटिंक पुनर्समीक्षा को राज़ी हुआ और मेकॉले ने पुरानी आज़ादियाँ बहाल कीं।
- 1857 के विद्रोह के बाद रवैया बदल गया और आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू हुआ, जिससे सरकार को भाषाई प्रेस की रपट और संपादकीय सेंसर करने का व्यापक हक़ मिला; बाग़ी रपट पर पहले चेतावनी, फिर अख़बार की ज़ब्ती और मशीनों की छीना-झपटी होती थी।
- दोनों विश्वयुद्धों में दमन और तेज़ हुआ — पहले विश्वयुद्ध में 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी जिनमें से 18 ने ख़ुद को बंद कर दिया, 1919 में रॉलट समिति ने कार्रवाइयाँ सख़्त कीं, और अगस्त 1942 में क़रीब 90 अख़बारों का दमन हुआ।
पर दमन के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार फैलते ही गए, और तिलक की 1908 की क़ैद पर भारत-भर में व्यापक विरोध हुए।
10“छपाई ने महिलाओं को आवाज़ भी दी और उन्हें बाँधने के नए तरीक़े भी दिए।” उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
आवाज़ देने वाला पक्ष —
- महिलाओं की ज़िंदगी और भावनाएँ साफ़गोई और गहनता से लिखी जाने लगीं; मध्यवर्गीय घरों में महिलाओं का पढ़ना बहुत बढ़ गया और कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह देकर नारी-शिक्षा की ज़रूरत बार-बार रेखांकित की।
- राससुन्दरी देबी ने कट्टर रूढ़िवादी परिवार में रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा और उनकी आमार जीबोन (1876) बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी बनी।
- कैलाशबाशिनी देवी ने 1860 के दशक से लिखा कि महिलाएँ घरों में बंदी और अनपढ़ बनाकर रखी जाती हैं; ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने 1880 के दशक में उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत पर जोश और रोष से लिखा; और बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने 1926 में नारी-शिक्षा के विरोधियों की खुली निंदा की।
बाँधने वाला पक्ष
- अनेक परंपरावादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं, और दक़ियानूसी मुसलमानों को लगता था कि उर्दू के रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी।
- पंजाब में राम चड्ढा ने स्त्री धर्म विचार लिखी जिसका उद्देश्य औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देना था, और खालसा ट्रैक्ट सोसायटी ने भी ऐसे ही संदेश देती सस्ती पुस्तिकाएँ छापीं।
- कुछ पत्रिकाएँ महिलाओं को गृहस्थी चलाने और फ़ैशन के नुस्ख़े बताने तक सीमित रहीं।
इसलिए प्रिंट का असर महिलाओं पर दोतरफ़ा था — उसने कुछ महिलाओं को लेखिका बनाया और कुछ किताबों ने उन्हें पुरानी भूमिकाओं में ही बाँधे रखने की कोशिश की।
11उन्नीसवीं सदी के भारत में एक नयी दृश्य-संस्कृति (visual culture) कैसे बनी?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक छापेख़ानों की बढ़ती तादाद के साथ छवियों की कई नक़लें या प्रतियाँ बड़ी आसानी से बनाई जा सकती थीं।
- राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं और मिथकीय कहानियों पर अनगिनत चित्र बनाए, जो उनके अपने रवि वर्मा प्रेस में छपते थे; काठ की तख़्ती पर चित्र उकेरने वाले ग़रीब दस्तकारों ने लैटरप्रेस छापेख़ानों के क़रीब दुकानें लगाईं और मुद्रकों से काम पाने लगे।
- बाज़ार में सुलभ सस्ती तसवीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़रीब भी अपने घरों एवं दफ़्तरों में सजाया करते थे, और इन छपी तसवीरों ने आहिस्ता-आहिस्ता आधुनिकता और परंपरा, धर्म और राजनीति तथा समाज और संस्कृति के लोकप्रिय विचार-लोक को गढ़ना शुरू किया।
- 1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और कार्टून छपने लगे; कुछ में शिक्षित भारतीयों की पश्चिमी अभिरुचियों का मज़ाक उड़ा तो कुछ में सामाजिक परिवर्तन का डर दिखा।
साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों में राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाया जाता था, तो राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साधने में पीछे नहीं रहे — यानी तसवीर भी अब राजनीति का हथियार बन चुकी थी।
12निम्नलिखित के कारण दीजिए — (क) वुडब्लॉक प्रिंट यूरोप में 1295 के बाद आई (ख) मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था (ग) चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू की (घ) गांधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता की लड़ाई है। (अभ्यास प्रश्न 1)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) 1295 ई. में मार्को पोलो चीन में काफ़ी साल खोज करने के बाद इटली लौटा और चीन में पहले से मौजूद वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान अपने साथ लेकर आया; इसके बाद इतालवी भी तख़्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और तकनीक बाक़ी यूरोप में फैल गई।
- (ख) मार्टिन लूथर की पिच्चानवे स्थापनाएँ छपाई की वजह से ही बड़ी तादाद में पढ़ी गईं, जिसके नतीजे में चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार शुरू हुआ; उसके न्यू टेस्टामेंट अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ हफ़्तों में बिक गईं, इसलिए कृतज्ञ लूथर ने मुद्रण को ईश्वर की महानतम देन कहा।
- (ग) छपे लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित हो गए और मेनोकियो जैसे किसान बाइबिल के नए अर्थ लगाने लगे; इन सवालों से परेशान चर्च ने प्रकाशकों पर पाबंदियाँ लगाईं और 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा।
- (घ) गांधी मानते थे कि वाणी की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और सामूहिकता की आज़ादी — ये तीनों जनमत को व्यक्त करने और बनाने के सबसे ताक़तवर औज़ार हैं; अगर सरकार इन्हें दबा देगी तो स्वराज की माँग रखने का साधन ही नहीं बचेगा, इसलिए स्वराज की लड़ाई सबसे पहले इन्हीं संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।
13मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की? (चर्चा करें, प्रश्न 4)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- छपी हुई पुस्तिकाओं और अख़बारों ने नए विचारों का प्रचार-प्रसार किया और बहस की शक्ल तय की; इन बहसों में व्यापक जन-समुदाय हिस्सा ले सकता था और अपने मत ज़ाहिर कर सकता था।
- प्रिंट ने समुदायों को अंदर से और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम किया, जिससे लोगों में यह भाव पैदा हुआ कि वे एक ही बड़ी बहस का हिस्सा हैं।
- राष्ट्रवादी अख़बारों ने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग की और राष्ट्रवादी ताक़तों की हौसला-अफ़ज़ाई जारी रखी; तिलक ने अपने केसरी में क्रांतिकारियों के प्रति हमदर्दी जताई और 1908 में उनकी क़ैद पर भारत-भर में विरोध हुए।
- समाज-सुधारकों ने मज़दूरों के बीच पुस्तकालय और पर्चे के ज़रिए राष्ट्रवाद का संदेश पहुँचाने की कोशिश की, और अंबेडकर तथा पेरियार जैसे लेखकों की रचनाएँ पूरे भारत में पढ़ी गईं।
इसीलिए सरकार को 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लाना पड़ा और अगस्त 1942 में क़रीब 90 अख़बारों का दमन करना पड़ा। गांधी ने 1922 में ठीक ही कहा था कि स्वराज की लड़ाई सबसे पहले इन आज़ादियों की लड़ाई है।
14कुछ लोग किताबों की सुलभता को लेकर चिंतित क्यों थे? यूरोप और भारत से एक-एक उदाहरण देकर समझाइए। (चर्चा करें, प्रश्न 2)
उत्तर देखिए
उत्तर:
चिंता के कारण —
- कई लोगों को छपे शब्द की सुगमता को लेकर आशंका थी कि इसका आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर होगा, और भय था कि नियंत्रण न होने पर लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपेंगे तथा ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता नष्ट हो जाएगी।
यूरोप का उदाहरण
- सोलहवीं सदी की इटली के किसान मेनोकियो ने उपलब्ध किताबें पढ़कर बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए, जिससे रोमन कैथलिक चर्च क्रुद्ध हो गया; इन्क्वीज़ीशन ने उसे दो बार पकड़ा और मौत की सज़ा दे दी, तथा चर्च 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा। इरैस्मस ने भी किताबों को भिनभिनाती मक्खियों जैसा बताया।
भारत का उदाहरण
- भारत में परंपरावादी परिवार मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं और रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी, इसलिए महिलाओं के पढ़ने पर रोक लगाई जाती थी। दूसरी ओर औपनिवेशिक सरकार भाषाई अख़बारों से इतनी चिंतित थी कि उसने 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया।
दोनों जगह चिंता का असली कारण एक ही था — जिसके पास सत्ता थी, उसे डर था कि छपे शब्द से उसका नियंत्रण ढीला पड़ जाएगा।
15अठारहवीं सदी के यूरोप में कुछ लोगों को क्यों लगता था कि मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अंत और ज्ञानोदय होगा? (चर्चा करें, प्रश्न 1)
उत्तर देखिए
उत्तर:
- अठारहवीं सदी के मध्य तक यह आम विश्वास बन चुका था कि किताबों के ज़रिए प्रगति और ज्ञानोदय होता है; कई लोगों का मानना था कि किताबें दुनिया बदल सकती हैं और वे निरंकुशवाद तथा आतंकी राजसत्ता से समाज को मुक्ति दिलाकर ऐसा दौर लाएँगी जब विवेक और बुद्धि का राज होगा।
- लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए ने घोषणा की कि “छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा”, और निरंकुश शासकों को ललकारा कि “अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है!”।
- मर्सिए के उपन्यासों में नायक अकसर किताबें पढ़ने से बदल जाते हैं; वे किताबें घोंटते हैं, किताबों की दुनिया में जीते हैं और इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
- इसके पीछे वास्तविक अनुभव भी था — वॉल्टेयर और रूसो जैसे दार्शनिकों तथा न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों की किताबें भारी मात्रा में छप और पढ़ी जा रही थीं, जिससे विज्ञान, तर्क और विवेकवाद के विचार लोकप्रिय साहित्य तक पहुँच गए थे।
इसीलिए उस दौर के लोगों को लगा कि छपा हुआ शब्द निरंकुश सत्ता को हिला देगा।
भाग ङ — स्रोत-आधारित प्रश्न (4 अंक)
स्रोत 1 — किताब का डर (स्रोत-क, पृष्ठ 113)
लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक इरैस्मस ने एडेजेज़ (1508) में लिखा — “किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं, दुनिया का कौन-सा कोना है, जहाँ ये नहीं पहुँच जातीं? हो सकता है कि जहाँ-तहाँ, एकाध जानने लायक चीज़ें भी बताएँ, लेकिन इनका ज़्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है… (मुद्रक) दुनिया को सिर्फ़ तुच्छ चीज़ों से ही नहीं पाट रहे, बल्कि बकवास, बेवकूफ़, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी, अज्ञानी, और षड्यंत्रकारी किताबें छापते हैं, और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।”
प्रश्न 1. इरैस्मस कौन थे और उन्होंने ये विचार कहाँ लिखे? उत्तर: इरैस्मस लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक थे, जिन्होंने कैथलिक धर्म की ज़्यादतियों की आलोचना की पर लूथर से भी एक दूरी बनाकर रखी। उन्होंने ये विचार अपनी कृति एडेजेज़ में 1508 में लिखे।
प्रश्न 2. इरैस्मस ने किताबों की तुलना मक्खियों से क्यों की? उत्तर: क्योंकि उनके अनुसार किताबें मक्खियों की तरह हर जगह पहुँच जाती हैं और दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं बचता जहाँ वे न पहुँचें। इससे वे यह कहना चाहते थे कि छपी सामग्री पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है।
प्रश्न 3. इरैस्मस की सबसे बड़ी शिकायत क्या थी? उत्तर: उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि मुद्रक बकवास, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी और षड्यंत्रकारी किताबें इतनी बड़ी तादाद में छापते हैं कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।
प्रश्न 4. यह स्रोत अध्याय के किस मुख्य विचार को दिखाता है? उत्तर: यह स्रोत छपाई के डर वाले पक्ष को दिखाता है। इस अध्याय में एक तरफ़ मार्टिन लूथर मुद्रण को ईश्वर का सबसे बड़ा तोहफ़ा कहते हैं और दूसरी तरफ़ इरैस्मस उससे डरते हैं — यही टकराव पूरे अध्याय की धुरी है।
स्रोत 2 — मर्सिए का पाठक (स्रोत-ख, पृष्ठ 115)
“अगर किसी ने मुझे पढ़ते देखा होगा तो उसने मुझे उस प्यासे की तरह पाया होगा जो शुद्ध ताज़ा पानी मिलने पर गटगट पीने लगता है… बड़े एहतियात से लालटेन जलाने के बाद मैं ख़ुद को किताबों में डुबो देता था। और वाक और अर्थ के प्रवाह में मैं पन्ना-दर-पन्ना बहता चला जाता था, अनायास और अनजान। ख़ामोशी के साये में घड़ियाल हर घंटे बजता चला जाता था, पर मुझे सुनाई नहीं पड़ता था। तेल ख़त्म होने से मेरी लालटेन की लौ पीली पड़ने लगती थी, पर मैं था कि पढ़ता जाता… और वे नए विचार किस वेग से मेरे सिर में घुसते थे! मेरी बुद्धि कैसे उन्हें आत्मसात करती थी!” — रॉबर्ट डार्नटन की किताब द फ़ॉरबिडन बेस्ट-सेलर्स ऑफ़ प्री-रेवोलूशनरी फ़्रांस, 1995 से उद्धृत
प्रश्न 1. मर्सिए कौन थे? उत्तर: लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए अठारहवीं सदी के फ़्रांस के एक उपन्यासकार थे, जिन्होंने छापेख़ाने को प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार बताया था और कहा था कि जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।
प्रश्न 2. इस अंश में पढ़ने के अनुभव को किस तरह बताया गया है? उत्तर: पढ़ने वाले की तुलना उस प्यासे व्यक्ति से की गई है जो शुद्ध ताज़ा पानी मिलने पर गटगट पीने लगता है। वह पढ़ते समय समय का ध्यान ही खो देता है, घड़ियाल की आवाज़ नहीं सुनता और लालटेन की लौ पीली पड़ने पर भी पढ़ता जाता है।
प्रश्न 3. “वे नए विचार किस वेग से मेरे सिर में घुसते थे” — इस पंक्ति का क्या अर्थ है? उत्तर: इसका अर्थ है कि पढ़ने से पाठक के मन में नए विचार बड़ी तेज़ी से प्रवेश कर रहे थे और उसकी बुद्धि उन्हें आत्मसात कर रही थी। यही वह प्रक्रिया थी जिससे मर्सिए के अनुसार लोग बदलते थे और निरंकुशवाद कमज़ोर पड़ता था।
प्रश्न 4. मर्सिए के उपन्यासों में नायक किस तरह बदलते हैं? उत्तर: मर्सिए के उपन्यासों में नायक अकसर किताबें पढ़ने से बदल जाते हैं। वे किताबें घोंटते हैं, किताबों की दुनिया में जीते हैं और इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
स्रोत 3 — छापेख़ाने की कमी (स्रोत-ग, पृष्ठ 120)
विलियम बोल्ट्स नामक व्यक्ति को, 1768 ई. में भी, इस तरह की सूचना कलकत्ता के एक सार्वजनिक इमारत में टाँगने की ज़रूरत महसूस हुई — “जनसाधारण के लिए : मि. बोल्ट्स पब्लिक को यह बताने के लिए इस तरीक़े का सहारा ले रहे हैं कि चूँकि शहर में छापेख़ाने की घोर कमी से नुक़सान होता है… इसलिए वे उस व्यक्ति का हर संभव उत्साहवर्धन करेंगे… जो छपाई में माहिर हो।” पर जल्द ही बोल्ट्स महोदय इंग्लैंड चले गए और यह वादा हवा में लटका रहा।
प्रश्न 1. बोल्ट्स ने यह सूचना कब और कहाँ टाँगी? उत्तर: विलियम बोल्ट्स ने यह सूचना 1768 ई. में कलकत्ता के एक सार्वजनिक इमारत में टाँगी।
प्रश्न 2. इस सूचना से 1768 के कलकत्ता की क्या स्थिति पता चलती है? उत्तर: इससे पता चलता है कि 1768 तक कलकत्ता जैसे बड़े शहर में भी छापेख़ानों की घोर कमी थी और इससे नुक़सान हो रहा था। यानी भारत में अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस काफ़ी देर तक विकास नहीं कर पाया था।
प्रश्न 3. बोल्ट्स क्या करना चाहते थे? उत्तर: वे उस हर व्यक्ति का हर संभव उत्साहवर्धन करना चाहते थे जो छपाई के काम में माहिर हो, ताकि शहर में छापेख़ाने की कमी दूर हो सके।
प्रश्न 4. उनका वादा पूरा क्यों नहीं हो पाया? उत्तर: क्योंकि जल्द ही बोल्ट्स महोदय इंग्लैंड चले गए और उनका यह वादा हवा में लटका रह गया।
स्रोत 4 — अख़बार क्यों? (स्रोत-घ, पृष्ठ 122)
“पूना के कृष्णाजी त्रिम्बक राणाडे मराठी का एक अख़बार निकालना चाहते हैं, जिसमें स्थानीय दिलचस्पी की तमाम उपयोगी ख़बरों को जगह मिल सके। इसमें सार्वजनिक उपयोगिता, वैज्ञानिक अन्वेषण के अलावा प्राकृ-विद्या, सांख्यिकी, जिज्ञासाओं, देश के विभिन्न हिस्सों के बारे में आमतौर पर, और दक्कन पर ख़ासतौर पर जानकारियाँ होंगी… ऐसे तमाम लोगों से मदद और संरक्षण का निवेदन है, जो ज्ञान के प्रसार और जनकल्याण के इच्छुक हैं।” — बॉम्बे टेलीग्राफ़ एंड कोरियर, 6 जनवरी 1849
“देसी अख़बारों और राजनीतिक सभाओं की वही भूमिका होती है, जो इंग्लैंड के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में विपक्ष की होती है। यानी कि वह सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा कर, लोगों के हित साधने में अक्षम हिस्सों को निकालें और सुधार करें, तथा उनको तेज़ी से लागू करने का काम करें।” — नेटिव ओपिनियन, 3 अप्रैल, 1870
प्रश्न 1. 1849 के उद्धरण में अख़बार का उद्देश्य क्या बताया गया है? उत्तर: इसमें अख़बार का उद्देश्य ज्ञान का प्रसार और जनकल्याण बताया गया है। प्रस्तावित अख़बार में सार्वजनिक उपयोगिता, वैज्ञानिक अन्वेषण, प्राकृ-विद्या, सांख्यिकी तथा देश और दक्कन के बारे में जानकारियाँ होनी थीं।
प्रश्न 2. 1870 के उद्धरण में देसी अख़बारों की भूमिका किससे तुलना करके बताई गई है? उत्तर: इंग्लैंड के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में विपक्ष की भूमिका से तुलना करके। यानी अख़बारों का काम सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करना और सुधार सुझाना बताया गया है।
प्रश्न 3. इन दोनों उद्धरणों में क्या अंतर दिखाई देता है? उत्तर: 1849 के उद्धरण में अख़बार का काम मुख्यत: ज्ञान फैलाना बताया गया है, जबकि 1870 के उद्धरण में अख़बार का काम सरकार की आलोचना करना बताया गया है। इससे पता चलता है कि इन बीस-इक्कीस वर्षों में अख़बार की भूमिका ज्ञान से बदलकर राजनीति हो गई थी।
प्रश्न 4. इस बदलाव का औपनिवेशिक सरकार पर क्या असर पड़ा? उत्तर: ज्यों-ज्यों भाषाई समाचार पत्र राष्ट्रवाद के समर्थन में मुखर होते गए, त्यों-त्यों औपनिवेशिक सरकार में कड़े नियंत्रण के प्रस्ताव पर बहस तेज़ होने लगी, और अंतत: 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया गया।
स्रोत 5 — नारी-शिक्षा का पक्ष (स्रोत-ङ, पृष्ठ 124)
जानी-मानी शिक्षाविद और लेखिका बेगम रोकैया शेखावत हुसैन ने 1926 में, बंग महिला शिक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए, धर्म के नाम पर महिलाओं को पढ़ने से रोकने के लिए पुरुषों की निंदा की — “नारी-शिक्षा के विरोधी कहते हैं कि इससे महिलाएँ उद्दंड हो जाएँगी… छि:! ये ख़ुद को मुसलमान बताते हैं, और इस्लाम द्वारा औरतों को बराबरी की तालीम का हक़ देने के बुनियादी उसूल के ख़िलाफ़ जाते हैं। अगर पुरुष पढ़-लिखकर नहीं भटकते, तो महिलाएँ क्यों बिगड़ जाएँगी, भला?”
प्रश्न 1. बेगम रोकैया शेखावत हुसैन कौन थीं? उत्तर: वे जानी-मानी शिक्षाविद और लेखिका थीं, जिन्होंने 1926 में बंग महिला शिक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए नारी-शिक्षा का पक्ष रखा।
प्रश्न 2. नारी-शिक्षा के विरोधियों का तर्क क्या था? उत्तर: उनका तर्क यह था कि पढ़ाई-लिखाई से महिलाएँ उद्दंड हो जाएँगी। भारत में परंपरावादी हिंदू यह भी मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं, और दक़ियानूसी मुसलमानों को लगता था कि रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी।
प्रश्न 3. बेगम रोकैया ने विरोधियों को धर्म के आधार पर क्या उत्तर दिया? उत्तर: उन्होंने कहा कि जो लोग ख़ुद को मुसलमान बताते हैं, वे इस्लाम द्वारा औरतों को बराबरी की तालीम का हक़ देने के बुनियादी उसूल के ही ख़िलाफ़ जा रहे हैं। यानी उन्होंने विरोधियों को उन्हीं के धर्म के तर्क से उत्तर दिया।
प्रश्न 4. उनका सबसे तार्किक प्रश्न कौन-सा था? उत्तर: उनका सबसे तार्किक प्रश्न यह था — “अगर पुरुष पढ़-लिखकर नहीं भटकते, तो महिलाएँ क्यों बिगड़ जाएँगी, भला?” इस एक प्रश्न ने विरोधियों के पूरे तर्क को उलट दिया।
स्रोत 6 — गांधी और प्रेस की आज़ादी (स्रोत-च, पृष्ठ 127)
गांधी ने 1922 में कहा — “वाणी की स्वतंत्रता…. प्रेस की आज़ादी…. सामूहिकता की आज़ादी। भारत सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बनाने के इन तीन ताक़तवर औज़ारों को दबाने की कोशिश कर रही है। स्वराज, ख़िलाफ़त… की लड़ाई, सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।”
प्रश्न 1. गांधी ने किन तीन आज़ादियों की बात की? उत्तर: वाणी की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और सामूहिकता की आज़ादी।
प्रश्न 2. गांधी ने इन्हें ‘ताक़तवर औज़ार’ क्यों कहा? उत्तर: क्योंकि गांधी के अनुसार ये तीनों जनमत को व्यक्त करने और बनाने के औज़ार हैं। इनके बिना लोग न अपनी बात कह सकते हैं, न संगठित हो सकते हैं, और न ही जनमत बना सकते हैं।
प्रश्न 3. गांधी ने स्वराज की लड़ाई को इन आज़ादियों से क्यों जोड़ा? उत्तर: क्योंकि अगर सरकार इन तीनों आज़ादियों को दबा देगी तो स्वराज की माँग रखने का कोई साधन ही नहीं बचेगा। इसीलिए उन्होंने कहा कि स्वराज और ख़िलाफ़त की लड़ाई सबसे पहले इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।
प्रश्न 4. उस समय सरकार प्रेस पर किस तरह का दमन कर रही थी? उत्तर: पहले विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय रक्षा नियम के तहत 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी थी, जिनमें से 18 ने ख़ुद को बंद कर दिया था, और 1919 में रॉलट के अधीन षड्यंत्र समिति ने अख़बारों के ख़िलाफ़ जुर्माना आदि कार्रवाइयों को और सख़्त बना दिया था।
भाग च — चित्र-आधारित अभ्यास
| चित्र | पृष्ठ | संभावित प्रश्न | उत्तर की कुंजी |
|---|---|---|---|
| चित्र 1 — अख़लाक़-ए-नसीरी, 1595 | 105 | प्रिंट के आने से पहले भारत में किताबें कैसे बनती थीं? | एक शाही वर्कशॉप में पाठ पहले बोलकर लिखाया जाता था, फिर तसवीर बनाई जाती थी; पुस्तक-निर्माण में सुलेखन और चित्रकारी का बहुत महत्त्व था। |
| चित्र 2(क) — डायमंड सूत्र | 106 | यह चित्र किस पुस्तक का है और उसका क्या महत्त्व है? | 868 ई. में छपी डायमंड सूत्र का, जो जापान की सबसे पुरानी छपी पुस्तक है। |
| चित्र 2(ख) — त्रिपीटका कोरियाना | 107 | इसका क्या महत्त्व है? | तेरहवीं सदी के मध्य का बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह, लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया; 2007 में यूनेस्को रजिस्टर में अंकित। |
| चित्र 4(अ) — जिक्जी, कोरिया | 108 | जिक्जी क्यों महत्त्वपूर्ण है? | मूवेबल मेटल टाइप से मुद्रित सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक; 2001 में यूनेस्को रजिस्टर में अंकित। |
| चित्र 5 और 6 — गुटेन्बर्ग और उसकी प्रेस | 109 | गुटेन्बर्ग प्रेस के मुख्य भाग कौन-से थे? | स्क्रू, हैंडल, प्लाटेन, और काग़ज़ पर रखा प्रिंटिंग ब्लॉक; एक घंटे में 250 पन्ने। |
| चित्र 7 — गुटेन्बर्ग की बाइबिल | 110 | इसकी कोई दो प्रतियाँ एक जैसी क्यों नहीं थीं? | हाशिए पर कलाकारों की हाथ से की गई टीकाकारी और चित्रकारी के कारण। |
| चित्र 8 — मुद्रक की वर्कशॉप | 110 | वर्कशॉप में कौन-कौन से काम होते थे? | कम्पोज़ीटर का काम, गैलीज़ की तैयारी, स्याही लगाना, प्रेस के पेंच कसना, प्रूफ़रीडिंग और बाइंडिंग। |
| चित्र 9 — जे.वी. श्ले, लाग्रीमेरी, 1739 | 112 | यह चित्र क्या दिखाता है? | प्रिंट के आगमन का उत्सव — छापाख़ाना लेकर एक देवी स्वर्ग से उतर रही है; आजू-बाजू मिनर्वा (विद्या की देवी) और मर्करी (दूत-देव, विवेक का प्रतीक) हैं। |
| चित्र 10 — द मैकॉबर डान्स | 113 | इसमें छपाई का डर कैसे दिखाया गया है? | मुद्रक के वर्कशॉप को मौत के नाच का मंच बताया गया है; मुद्रक और मज़दूर कंकालों के नियंत्रण में हैं। |
| चित्र 11 — फ़्रांसीसी क्रांति से पहले का कार्टून | 116 | यह कार्टून क्या कहता है? | किसान, कारीगर और मज़दूर मुश्किल हालात में हैं जबकि ज़िंदगी के मज़े लेने वाला कुलीन वर्ग उनका दोहन करता है। |
| चित्र 12 — पेनी मैगज़ीन | 117 | यह पत्रिका किसके लिए थी? | इंग्लैंड में 1832–1850 के बीच ‘सोसायटी फ़ॉर द डिफ़्यूज़न ऑफ़ यूजफुल नॉलेज’ ने इसे मूलत: मज़दूर वर्ग के लिए प्रकाशित किया। |
| चित्र 13 — रेलवे स्टेशन के विज्ञापन, 1874 | 118 | इससे क्या पता चलता है? | छपी हुई सूचनाएँ और इश्तहार सड़कों की दीवारों, प्लैटफ़ॉर्म और सार्वजनिक इमारतों पर लगाए जाते थे। |
| चित्र 14, 15, 16 — भारतीय पांडुलिपियाँ | 119–120 | इनसे भारत की किस परंपरा का पता चलता है? | ताड़ के पत्तों और हाथ के काग़ज़ पर एकॉर्डियन शैली की हस्तलिखित पांडुलिपियाँ; प्रिंट आने के बाद भी ये अमीरों के लिए बनती रहीं। |
| चित्र 17 — राजा रवि वर्मा का चित्र | 123 | रवि वर्मा के चित्रों का क्या महत्त्व था? | उन्होंने मिथकीय कहानियों पर अनगिनत चित्र बनाए जो उनके अपने रवि वर्मा प्रेस में छपते थे और आम खपत के लिए थे। |
| चित्र 18 — इंडियन शारिवारी | 124 | इस आवरण में क्या दिखाया गया है? | बीचोबीच साम्राज्यवादी अंग्रेज़ की छवि, जो सत्ता और प्रभुता की प्रतिमूर्ति बनकर देसी लोगों को हिदायत दे रहा है। |
| चित्र 19, 20, 21 — तीन काष्ठचित्र | 125–126 | चित्रकार समाज के बदलाव पर क्या कह रहा है? | पारिवारिक भूमिकाओं के उलट-पुलट होने का डर; महिलाओं की शिक्षा की पहल के बाद पारंपरिक भूमिकाओं के छिन्न-भिन्न होने की आशंका। |
| चित्र 22 — लक्ष्मीनाथ बेज़बरुवा | 126 | वे कौन थे? | आधुनिक असमिया साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार; बूढ़ी आइर साधु और गीत ‘ओ मोर अपुनर देश’ के लेखक। |
भाग छ — तीन नमूना परीक्षा-पत्र (स्वयं अभ्यास के लिए)
नमूना पत्र 1 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | मुद्रण की सबसे पहली तकनीक कहाँ विकसित हुई? | 1 |
| 2 | गुटेन्बर्ग ने पहली कौन-सी किताब छापी और कितनी प्रतियाँ? | 1 |
| 3 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट कब लागू हुआ? | 1 |
| 4 | चीनी राजतंत्र मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक क्यों था? | 2 |
| 5 | मेनोकियो कौन था और उसके साथ क्या हुआ? | 2 |
| 6 | भारत में पांडुलिपियों का व्यापक दैनिक इस्तेमाल क्यों नहीं होता था? | 3 |
| 7 | मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए ज़मीन कैसे तैयार की? | 4 |
| 8 | स्रोत 4 (अख़बार क्यों?) पढ़कर चारों प्रश्नों के उत्तर दीजिए। | 4+2 = 6 |
नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | जिक्जी किस देश की पुस्तक है? | 1 |
| 2 | रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण कब और कहाँ छपा? | 1 |
| 3 | आमार जीबोन किसने लिखी? | 1 |
| 4 | मुद्रण क्रांति क्या थी? | 2 |
| 5 | मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में क्यों था? | 2 |
| 6 | मौखिक और मुद्रित संस्कृति के बीच की रेखा कैसे धुँधली पड़ गई? | 3 |
| 7 | “छपाई ने महिलाओं को आवाज़ भी दी और उन्हें बाँधने के नए तरीक़े भी दिए।” समझाइए। | 4 |
| 8 | स्रोत 1 (किताब का डर) पढ़कर चारों प्रश्नों के उत्तर दीजिए। | 4+2 = 6 |
नमूना पत्र 3 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | त्रिपीटका कोरियाना कितने वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया था? | 1 |
| 2 | गुलामगिरी किसने और कब लिखी? | 1 |
| 3 | अगस्त 1942 में कितने अख़बारों का दमन हुआ? | 1 |
| 4 | हिक्की पर मुक़दमा क्यों हुआ? | 2 |
| 5 | उलमा ने लिथोग्राफ़ी प्रेस का इस्तेमाल क्यों किया? | 2 |
| 6 | उन्नीसवीं सदी में ग़रीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ? | 3 |
| 7 | भारत में औपनिवेशिक सरकार ने प्रेस को नियंत्रित करने के लिए क्या-क्या क़दम उठाए? | 4 |
| 8 | स्रोत 6 (गांधी और प्रेस की आज़ादी) पढ़कर चारों प्रश्नों के उत्तर दीजिए। | 4+2 = 6 |
अंतिम सलाह। इस अध्याय के हर बड़े उत्तर में एक तिथि, एक नाम और एक किताब ज़रूर आनी चाहिए। और जहाँ ‘असर’ पूछा जाए, वहाँ दोनों पक्ष लिखिए — जिसे फ़ायदा हुआ और जिसे डर लगा। यही इस अध्याय की आत्मा है।