कक्षा 10 · भारत और समकालीन विश्व–2 · पृष्ठ 105–128 (परीक्षा से पहले पढ़ने के लिए — केवल काम की बातें, पूरे वाक्यों में)
पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में
छपाई की तकनीक सबसे पहले चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई। 1295 में मार्को पोलो यह तकनीक चीन से इटली लेकर आया और यह पूरे यूरोप में फैल गई। 1448 तक योहान गुटेन्बर्ग ने प्रिंटिंग प्रेस बना ली और पहली किताब बाइबिल छापी। इससे किताबें सस्ती हुईं, एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ, और लोगों का सूचना, सत्ता तथा धर्म से रिश्ता ही बदल गया — इसी को मुद्रण क्रांति कहते हैं। मार्टिन लूथर ने इसे ईश्वर का सबसे बड़ा तोहफ़ा कहा, जबकि इरैस्मस और रोमन कैथलिक चर्च इससे डरते रहे और चर्च ने 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी। अठारहवीं सदी तक किताबों ने ज्ञानोदय के विचार फैलाए और फ़्रांसीसी क्रांति की ज़मीन तैयार करने में मदद की। भारत में प्रेस सोलहवीं सदी में गोवा आई, और उन्नीसवीं सदी में इसने धार्मिक बहसों, महिलाओं की शिक्षा, ग़रीब जनता की आवाज़ और राष्ट्रवाद — सबको ताक़त दी। इसीलिए औपनिवेशिक सरकार ने 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू किया, पर दमन के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार फैलते ही गए।
यही पूरा अध्याय है। अब इसे भागों में देखिए।
अध्याय की धुरी — यह दो वाक्य किसी भी बड़े उत्तर में लिखिए
| कौन | क्या कहा |
|---|---|
| मार्टिन लूथर | “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।” |
| इरैस्मस | “किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं… इनका ज़्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है।” |
★पूरे अध्याय में यही दो नज़रिये टकराते हैं — छपाई आज़ादी है, या छपाई ख़तरा है।
भाग 1 — शुरुआती छपी किताबें (चीन, जापान, कोरिया)
चीन★
- मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई।
- तक़रीबन 594 ई. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख़्ती पर काग़ज़ रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं।
- काग़ज़ पतला और छिद्रित होता था, इसलिए दोनों तरफ़ छपाई संभव नहीं थी। इसी कारण चीनी किताब ‘एकॉर्डियन’ शैली में, किनारों को मोड़कर सिलकर बनाई जाती थी।
- ख़ुशनवीसी यानी सुलेखन करने वाले लोग दक्ष सुलेखक या ख़ुशख़त कहलाते थे।
चीनी राजतंत्र सबसे बड़ा उत्पादक क्यों था — पाँच कड़ी★
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | चीन की नौकरशाही सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त होती थी। |
| 2 | यह नौकरशाही विशालकाय थी। |
| 3 | राजतंत्र इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। |
| 4 | सोलहवीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी। |
| 5 | लिहाज़ा छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गई। |
सत्रहवीं सदी में क्या बदला
- शहरी संस्कृति फलने-फूलने से छपाई के इस्तेमाल में विविधता आई।
- अब उपभोक्ता सिर्फ़ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे — व्यापारी भी कारोबार की जानकारी के लिए मुद्रित सामग्री इस्तेमाल करने लगे।
- पढ़ना एक शग़ल बन गया। नए पाठकों को काल्पनिक क़िस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ और रूमानी नाटक पसंद थे।
- अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने अपने रचे काव्य और नाटक छापे।
उन्नीसवीं सदी का अंत
- पश्चिमी शक्तियों की चौकियों के साथ पश्चिमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस का आयात हुआ।
- शंघाई प्रिंट-संस्कृति का नया केंद्र बन गया।
- हाथ की छपाई की जगह मशीनी छपाई ने ले ली।
जापान★
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कब पहुँची | चीनी बौद्ध प्रचारक 768–770 ई. के आसपास तकनीक लेकर आए। |
| सबसे पुरानी किताब | 868 ई. में छपी डायमंड सूत्र, जिसमें पाठ के साथ काठ पर खुदे चित्र हैं। |
| कहाँ छपता था | कपड़ों, ताश के पत्तों और काग़ज़ के नोटों पर तसवीरें बनाई जाती थीं। |
| एदो | अठारहवीं सदी के अंत में एदो (बाद में तोक्यो) की चित्रकारी में शालीन शहरी संस्कृति दिखती है। |
| किन विषयों पर किताबें | महिलाओं, संगीत के साज़ों, हिसाब-किताब, चाय अनुष्ठान, फूलसाज़ी, शिष्टाचार और रसोई पर। |
कोरिया — दो यूनेस्को-अंकित ख़ज़ाने★
| नाम | विवरण | यूनेस्को |
|---|---|---|
| त्रिपीटका कोरियाना | तेरहवीं शताब्दी के मध्य का बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह; लगभग 80,000 वुडब्लॉक्स पर उकेरा गया। | 2007 |
| जिक्जी | मूवेबल मेटल टाइप से मुद्रित दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से एक; ज़ेन बौद्ध धर्म पर; भारत, चीन और कोरिया के लगभग 150 भिक्षुओं का उल्लेख; चौदहवीं सदी के अंत में मुद्रित; पहला खंड उपलब्ध नहीं, दूसरा फ़्रांस की नेशनल लाइब्रेरी में। | 2001 |
★यह तुलना याद रखिए — धातु के चलअक्षर कोरिया में चौदहवीं सदी के अंत में इस्तेमाल हो रहे थे, जबकि गुटेन्बर्ग ने यूरोप में 1448 तक अपना यंत्र बनाया।
बॉक्स 1 — कितागावा उतामारो
- 1753 ई. में एदो में जन्म।
- उकियो (तैरती दुनिया के चित्र) नाम की नयी चित्रकला शैली में अहम योगदान।
- इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँचीं और माने, मोने तथा वान गॉग जैसे चित्रकारों को प्रभावित किया।
- प्रकाशक त्सुताया जुज़ाबूरो विषय चुनकर कलाकारों से क़रार करते थे।
भाग 2 — यूरोप में मुद्रण का आना
पूरा क्रम — यही सबसे ज़्यादा पूछा जाता है★
| समय | घटना |
|---|---|
| ग्यारहवीं सदी | चीनी काग़ज़ रेशम मार्ग से यूरोप पहुँचा। काग़ज़ ने कातिबों द्वारा लिखी पांडुलिपियों का उत्पादन मुमकिन बनाया। |
| 1295 | मार्को पोलो चीन में कई साल खोज करने के बाद इटली लौटा और वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान साथ लाया। |
| इसके बाद | इतालवी तख़्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे; तकनीक बाक़ी यूरोप में फैली। |
| पंद्रहवीं सदी की शुरुआत | यूरोप में बड़े पैमाने पर तख़्ती की छपाई से कपड़े, ताश के पत्ते और धार्मिक चित्र छापे जा रहे थे। |
| 1430 का दशक | गुटेन्बर्ग ने नयी तकनीक पर काम किया। |
| 1448 | गुटेन्बर्ग ने अपना यंत्र मुकम्मल किया। |
★अभ्यास प्रश्न 1-क का उत्तर: वुडब्लॉक प्रिंट यूरोप में 1295 के बाद इसलिए आई क्योंकि उसी वर्ष मार्को पोलो चीन से लौटा और यह तकनीक अपने साथ लेकर आया।
किताबों का बँटवारा — अमीर बनाम आम पाठक
- मुद्रित किताबों को सस्ती और अश्लील माननेवाले कुलीन वर्गों और भिक्षु-संघों के लिए छपी किताबों के विलासी संस्करण बेशक़ीमती वेलम (चर्म-पत्र) पर छपते थे।
- व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी सस्ती मुद्रित किताबें ख़रीदते थे।
पांडुलिपियों से माँग पूरी क्यों नहीं होती थी — पाँच कारण★
| क्रम | कारण |
|---|---|
| 1 | नक़ल उतारना बेहद ख़र्चीला काम था। |
| 2 | यह समयसाध्य था। |
| 3 | यह श्रमसाध्य था। |
| 4 | पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थीं; उनके लाने-ले जाने और रख-रखाव में मुश्किलें थीं। |
| 5 | इसलिए उनका सर्कुलेशन सीमित रहा। |
- आम तौर पर एक पुस्तक-विक्रेता के यहाँ 50 कातिब काम करते थे — फिर भी माँग पूरी नहीं होती थी।
गुटेन्बर्ग और प्रिंटिंग प्रेस (अभ्यास प्रश्न 2-क)★★
उसका बचपन और सीख —
- पिता व्यापारी थे; वह खेती की एक बड़ी रियासत में पल-बढ़कर बड़ा हुआ।
- बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें देखता आया था।
- बाद में पत्थर पर पॉलिश करने की कला सीखी, फिर सुनारी सीखी, और अंत में शीशे को इच्छित आकृतियों में गढ़ने में महारत हासिल की।
अनुभव से आविष्कार —
| पुराना अनुभव | नए आविष्कार में क्या बना |
|---|---|
| जैतून प्रेस | प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श |
| सुनारी और साँचा | धातुई अक्षरों की आकृतियाँ गढ़ने का तरीक़ा |
पहली किताब —
- 1448 तक यंत्र मुकम्मल हुआ।
- पहली किताब बाइबिल थी।
- तक़रीबन 180 प्रतियाँ बनाने में तीन साल लगे, जो उस समय के हिसाब से काफ़ी तेज़ था।
- पर यह नयी तकनीक हाथ से किताबें छापने की तकनीक की जगह पूरी तरह नहीं ले पाई।
प्रेस कैसे काम करती थी —
- स्क्रू से लगा लंबा हैंडल घुमाकर प्लाटेन को गीले काग़ज़ पर दबाया जाता था।
- गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए और जुगत लगाई कि इन्हें ‘मूव’ कराकर शब्द बनाए जा सकें — इसीलिए इसे ‘मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन’ कहा गया।
- यही अगले 300 सालों तक छपाई की बुनियादी तकनीक रही।
- गुटेन्बर्ग प्रेस एक घंटे में 250 पन्ने (एक साइड) छाप सकता था।
शुरुआती छपी किताबें पांडुलिपियों जैसी क्यों दिखती थीं★
- धातुई अक्षर हाथ की सजावटी शैली का अनुकरण करते थे।
- हाशिये पर फूल-पत्तियों की डिज़ाइन बनाई जाती थी और चित्र अकसर पेंट किए जाते थे।
- अमीरों की किताबों में हाशिये की जगह बेल-बूटों के लिए ख़ाली छोड़ दी जाती थी।
- हर ख़रीदार अपनी रुचि से डिज़ाइन और पेंटर ख़ुद तय कर सकता था।
मुद्रण क्रांति के आँकड़े★
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| यूरोप-भर में छापेख़ाने खुलने का काल | 1450–1550 (क़रीब सौ साल) |
| कैसे फैला | जर्मनी के मुद्रक दूसरे देश जाकर छापेख़ाने खुलवाते थे। |
| पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में किताबें | 2 करोड़ |
| सोलहवीं सदी में | 20 करोड़ |
चित्र 7 — गुटेन्बर्ग की बाइबिल के बारे में तीन बातें
- 180 प्रतियों में से केवल 50 बची हैं।
- हाशिए पर कलाकारों ने हाथ से टीकाकारी और चित्रकारी की थी, इसलिए कोई दो प्रतियाँ एक-जैसी नहीं थीं।
- गुटेन्बर्ग ने पाठ काले में छापा और रंग भरने के लिए जगह छोड़ दी। रंग भरने के दो फ़ायदे थे — पन्ना रंगीन हो जाता था, और सारे पवित्र शब्द ज़्यादा दर्शनीय बन जाते थे।
भाग 3 — मुद्रण क्रांति और उसका असर
मुद्रण क्रांति की परिभाषा (शब्दश: याद कीजिए)★★
“छापेख़ाने का आविष्कार महज़ तकनीकी दृष्टि से नाटकीय बदलाव की शुरुआत नहीं था। पुस्तक-उत्पादन के नए तरीक़ों ने लोगों की ज़िंदगी बदल दी: इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, संस्था और सत्ता से उनका रिश्ता ही बदल गया। इससे लोकचेतना बदली और बदला चीज़ों को देखने का नज़रिया।”
इसके तीन हिस्से —
| हिस्सा | क्या बदला |
|---|---|
| 1 | सूचना और ज्ञान से रिश्ता |
| 2 | संस्था और सत्ता से रिश्ता |
| 3 | लोकचेतना और नज़रिया |
नया पाठक वर्ग कैसे बना — पाँच कड़ी★
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | छपाई से किताबों की क़ीमत गिरी। |
| 2 | हर प्रति के उत्पादन में लगने वाला वक़्त और श्रम कम हो गया। |
| 3 | बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापना आसान हो गया। |
| 4 | बाज़ार किताबों से पट गया। |
| 5 | पाठक वर्ग बृहत्तर होता गया। |
मौखिक से मुद्रित की ओर — यह पूरा उत्तर है★★
पहले क्या था —
- आमलोग मौखिक संसार में जीते थे।
- वे धार्मिक किताबों का वाचन सुनते थे, गाथा-गीत उन्हें पढ़कर सुनाए जाते थे, क़िस्से बोलकर पढ़े जाते थे।
- ज्ञान का मौखिक लेन-देन ही होता था।
समस्या —
- किताबें सिर्फ़ साक्षर पढ़ सकते थे, और यूरोप के अधिकांश देशों में बीसवीं सदी तक साक्षरता सीमित थी।
मुद्रकों का हल —
- मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कीं।
- ऐसी किताबें तसवीरों से ख़ूब सजी-धजी यानी सचित्र होती थीं।
- इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था।
नतीजा —
“मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाख़िल हुई, और छपी सामग्री मौखिक अंदाज़ में प्रसारित हुई। मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की विभाजक रेखा धुँधली पड़ गई। श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।” ★“अगर पहले की जनता श्रोता थी, तो अब पाठक-जनता अस्तित्व में आ गई थी।”
प्रिंट का डर — चार कारण★
| क्रम | डर |
|---|---|
| 1 | आशंका थी कि छपे शब्द की सुगमता का आमलोगों के ज़ेहन पर क्या असर हो। |
| 2 | भय था कि नियंत्रण न होने पर लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपेंगे। |
| 3 | डर था कि ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। |
| 4 | धर्मगुरुओं, सम्राटों, लेखकों और कलाकारों की यह चिंता नव-मुद्रित साहित्य की व्यापक आलोचना का आधार बनी। |
मार्टिन लूथर और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार (अभ्यास प्रश्न 1-ख)★★
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए पिच्चानवे स्थापनाएँ लिखीं। |
| 2 | इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँगी गई, जिसमें चर्च को शास्त्रार्थ की चुनौती थी। |
| 3 | लूथर के लेख बड़ी तादाद में छापे और पढ़े जाने लगे। |
| 4 | चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत हुई। |
| 5 | कुछ ही हफ़्तों में न्यू टेस्टामेंट के लूथर के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ बिक गईं; तीन महीने में दूसरा संस्करण निकालना पड़ा। |
| 6 | लूथर ने कहा — “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।” |
मेनोकियो की कहानी (अभ्यास प्रश्न 1-ग)★★
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | सोलहवीं सदी की इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने इलाक़े में उपलब्ध किताबें पढ़नी शुरू कीं। |
| 2 | उन किताबों के आधार पर उसने बाइबिल के नए अर्थ लगाने शुरू कर दिए। |
| 3 | उसने ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन कैथलिक चर्च क्रुद्ध हो गया। |
| 4 | चर्च ने धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए इन्क्वीज़ीशन (धर्म-अदालत) शुरू किया। |
| 5 | मेनोकियो दो बार पकड़ा गया और आख़िरकार उसे मौत की सज़ा दे दी गई। |
| 6 | चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर पाबंदियाँ लगाईं और 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगा। |
स्रोत-क — इरैस्मस (अभ्यास प्रश्न 2-ख)★
- इरैस्मस लातिन के विद्वान और कैथलिक धर्मसुधारक थे।
- उन्होंने कैथलिक धर्म की ज़्यादतियों की आलोचना की, पर लूथर से भी एक दूरी बनाकर रखी।
- उन्होंने एडेजेज़ (1508) में लिखा।
तीन बातें याद रखिए —
- “किताबें भिनभिनाती मक्खियों की तरह हैं, दुनिया का कौन-सा कोना है जहाँ ये नहीं पहुँच जातीं?”
- “इनका ज़्यादा हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है।”
- “मुद्रक बकवास, बेवकूफ़, सनसनीख़ेज़, धर्मविरोधी किताबें छापते हैं, और उनकी तादाद ऐसी है कि मूल्यवान साहित्य का मूल्य ही नहीं रह जाता।”
भाग 4 — पढ़ने का जुनून
साक्षरता का बढ़ना
- सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में यूरोप के ज़्यादातर हिस्सों में साक्षरता बढ़ती रही।
- अलग-अलग संप्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों-कारीगरों को शिक्षित किया।
- अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गई थी।
सस्ती किताबों की तालिका (यह बहुत पूछी जाती है)★
| नाम | क्या था | कहाँ |
|---|---|---|
| पंचांग | चाँद-सूरज की गति, ज्वार-भाटा और दैनिक जीवन की जानकारी देता वार्षिक प्रकाशन | यूरोप-भर |
| पेनी चैपबुक्स | एक पैसे में मिलने वाली पॉकेट-आकार की किताबें | इंग्लैंड |
| चैपमेन | इन किताबों को बेचने वाले फेरीवाले | इंग्लैंड |
| बिब्लियोथीक ब्ल्यू | सस्ते काग़ज़ पर छपी, नीली जिल्द में बँधी छोटी किताबें | फ़्रांस |
| चार-पाँच पन्ने की किताबें | प्रेम-कहानियाँ और अतीत की गाथाएँ, जिन्हें ‘इतिहास’ कहते थे | फ़्रांस |
पत्रिकाएँ, विज्ञान और दर्शन
- अठारहवीं सदी के आरंभ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, जिनमें ख़बर के साथ मनोरंजन भी था।
- अख़बारों में युद्ध, व्यापार और दूर देशों की ख़बरें होती थीं।
- जब आइज़ैक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने अपने आविष्कार छापे तो उनके लिए विज्ञान-बोध वाला बड़ा पाठक-वर्ग तैयार हो चुका था।
- टॉमस पेन, वॉल्टेयर और ज़्याँ ज़ाक रूसो की किताबें भारी मात्रा में छपीं और पढ़ी गईं।
मर्सिए के दो कथन★
| # | कथन |
|---|---|
| 1 | “छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।” |
| 2 | “हे निरंकुशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है! आभासी लेखक की क़लम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे!” |
मुद्रण संस्कृति और फ़्रांसीसी क्रांति — तीन तर्क★★
| तर्क | सार |
|---|---|
| पहला | छपाई से ज्ञानोदय के चिंतकों के विचार फैले। उन्होंने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना की, रीति-रिवाजों की जगह विवेक के शासन पर बल दिया, और चर्च तथा राज्य की सत्ता पर प्रहार करके परंपरा-आधारित सामाजिक व्यवस्था को दुबला कर दिया। वॉल्टेयर और रूसो के पाठक नए, आलोचनात्मक, सवालिया और तार्किक नज़रिये से दुनिया देखने लगे। |
| दूसरा | छपाई ने वाद-विवाद-संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया। पुराने मूल्यों, संस्थाओं और क़ायदों पर आम जनता के बीच बहस हुई और पुनर्मूल्यांकन शुरू हुआ। इस तरह बनी ‘सार्वजनिक दुनिया’ से सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रपात हुआ। |
| तीसरा | 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मज़ाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था। कार्टूनों और कैरिकेचरों में यह भाव उभरता था कि जनता मुश्किलों में फँसी है जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी है। भूमिगत साहित्य ने लोगों को राजतंत्र के ख़िलाफ़ भड़काया। |
पर यह सावधानी ज़रूर लिखिए — इसी से पूरे अंक मिलते हैं★★
“लोग-बाग़ हर तरह की सामग्री पढ़ते थे। एक तरफ़ वे अगर रूसो और वॉल्टेयर पढ़ रहे थे तो दूसरी तरफ़ चर्च और राज्य का प्रचार भी। वे कुछ विचारों को स्वीकारते थे, तो कुछ को नकारते भी थे। इस तरह, मुद्रण ने उनके मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।”
भाग 5 — उन्नीसवीं सदी: बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर
बच्चे★
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | उन्नीसवीं सदी के आख़िर से प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य होने से बच्चे पाठकों की अहम श्रेणी बन गए। |
| 2 | प्रकाशन उद्योग के लिए पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन महत्त्वपूर्ण हो गया। |
| 3 | फ़्रांस में 1857 में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस स्थापित किया गया। |
| 4 | जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक-कथाएँ जमा कीं; संपादन के बाद वे 1812 के संकलन में छपीं। |
| 5 | बच्चों के लिए अनुपयुक्त या कुलीन वर्गों को अश्लील लगने वाली सामग्री प्रकाशित संस्करण में शामिल नहीं की जाती थी। |
★यह वाक्य ज़रूर लिखिए — “पुरानी ग्रामीण लोककथाओं को नया रूप मिला — छपने से वे दर्ज तो हुईं, पर इस प्रक्रिया में बदल भी गईं।”
महिलाएँ★
- महिलाएँ पाठिका और लेखिका दोनों भूमिकाओं में अहम हो गईं।
- पेनी मैगज़ीन्स ख़ास तौर पर उन्हीं के लिए होती थीं, वैसे ही जैसे सही चाल-चलन और गृहस्थी सिखाने वाली निर्देशिकाएँ।
- उपन्यास छपने लगे तो महिलाओं को उनका अहम पाठक माना गया।
- मशहूर उपन्यासकारों में लेखिकाएँ अग्रणी थीं — जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें, जॉर्ज इलियट।
नयी नारी की तीन पहचान —
| # | पहचान |
|---|---|
| 1 | व्यक्तित्व सुदृढ़ था। |
| 2 | गहरी सूझ-बूझ थी। |
| 3 | अपना दिमाग़ था, अपनी इच्छाशक्ति थी। |
मज़दूर और पुस्तकालय
- सत्रहवीं सदी से किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्तित्व में आ गए थे।
- उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में इनका उपयोग सफ़ेद-कॉलर मज़दूरों, दस्तकारों और निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने में हुआ।
- काम के दिन छोटे होने पर मज़दूरों को आत्म-अभिव्यक्ति का वक़्त मिला; उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पर्चे और आत्मकथाएँ लिखीं।
- बॉक्स 3 — यॉर्कशायर के मेकैनिक थॉमस वुड पुराने अख़बार ख़रीदकर आग की रोशनी में पढ़ते थे, क्योंकि मोमबत्ती के पैसे नहीं थे। रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की मेरा बचपन और मेरे विश्वविद्यालय इन्हीं संघर्षों की कहानियाँ हैं।
नए तकनीकी परिष्कार — यह तालिका पक्की कीजिए★★
| समय | बदलाव |
|---|---|
| अठारहवीं सदी के अंत तक | प्रेस धातु से बनने लगे थे। |
| उन्नीसवीं सदी के मध्य तक | न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो. ने शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस कारगर बनाया — प्रति घंटे 8000 शीट। |
| उन्नीसवीं सदी के अंत तक | ऑफ़सेट प्रेस आया, जिससे एक साथ छह रंग की छपाई मुमकिन थी। |
| बीसवीं सदी के शुरू से | बिजली से चलने वाले प्रेस से छपाई बड़ी तेज़ी से होने लगी। |
अन्य सुधार — काग़ज़ डालने की विधि, प्लेट की गुणवत्ता, स्वचालित पेपर-रील, और रंगों के लिए फ़ोटो-विद्युतीय नियंत्रण।
बेचने के नए गुर★
| तरीक़ा | विवरण |
|---|---|
| धारावाहिक उपन्यास | उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यास धारावाहिक छापे, जिससे उपन्यास लिखने की ख़ास शैली विकसित हुई। |
| शिलिंग शृंखला | इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें इस सस्ती शृंखला में छपीं। |
| डस्ट कवर | जिल्द का आवरण — बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत। |
| सस्ते पेपरबैक | 1930 की आर्थिक मंदी में बिक्री गिरने के भय से प्रकाशकों ने अजिल्द संस्करण छापे। |
भाग 6 — भारत का मुद्रण संसार
मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ★
- भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परंपरा थी।
- ये ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर नक़्ल कर बनाई जाती थीं।
- कभी-कभी पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाई जाती थीं; फिर उन्हें तख़्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक, छपाई आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं।
चार समस्याएँ —
| क्रम | समस्या |
|---|---|
| 1 | नाज़ुक होती थीं। |
| 2 | काफ़ी महँगी थीं। |
| 3 | बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था। |
| 4 | लिपियों के अलग-अलग तरीक़े से लिखे जाने से पढ़ना आसान नहीं था। |
★बंगाल का उदाहरण ज़रूर लिखिए — पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण पाठशालाओं का बड़ा जाल था, पर विद्यार्थी किताबें नहीं पढ़ते थे। गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे। इस तरह कई-सारे लोग बिना कोई किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे।
छपाई भारत आई — यह तालिका याद कीजिए★★
| वर्ष / समय | घटना |
|---|---|
| सोलहवीं सदी के मध्य | प्रिंटिंग प्रेस पहले-पहल गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया। |
| — | जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी सीखी और कई पुस्तिकाएँ छापीं। |
| 1579 | कैथलिक पुजारियों ने कोचीन में पहली तमिल किताब छापी। |
| 1674 तक | कोंकणी और कन्नड़ में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। |
| 1713 | पहली मलयालम किताब भी कैथलिक पुजारियों ने छापी। |
| — | डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने 32 तमिल किताबें छापीं। |
जेम्स ऑगस्टस हिक्की★
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | हिक्की ने 1780 से बंगाल गजट नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया। |
| 2 | उन्होंने इसे ‘हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है’ कहा। |
| 3 | यह औपनिवेशिक शासन से आज़ाद, निजी अंग्रेज़ी उद्यम था। |
| 4 | हिक्की ढेर सारे विज्ञापन छापता था, जिनमें दासों की बिक्री के इश्तहार भी थे। |
| 5 | साथ ही वह वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छापता था। |
| 6 | नाराज़ होकर गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने उस पर मुक़दमा कर दिया। |
| 7 | और सरकारी आश्रय-प्राप्त अख़बारों को प्रोत्साहित करना शुरू किया। |
- भारतीयों द्वारा निकाला गया पहला अख़बार — राजा राममोहन राय के क़रीबी गंगाधर भट्टाचार्य का बंगाल गजट।
भाग 7 — धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें
छपाई ने बहस के साथ क्या किया — तीन कड़ी
| क्रम | प्रभाव |
|---|---|
| 1 | छपी पुस्तिकाओं और अख़बारों ने नए विचारों का प्रचार-प्रसार किया। |
| 2 | उन्होंने बहस की शक्ल भी तय की। |
| 3 | व्यापक जन-समुदाय भी बहस में हिस्सा ले सकता था और अपने मत ज़ाहिर कर सकता था। |
हिंदू सुधार-बहस★
- विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों पर तेज़ बहस ठनी हुई थी।
- ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया।
| प्रकाशन | किसने / कब | पक्ष |
|---|---|---|
| संवाद कौमुदी | राममोहन राय, 1821 से | सुधारवादी |
| समाचार चंद्रिका | रूढ़िवादी | सुधार-विरोधी |
| जाम-ए-जहाँ नामा, शम्सुल अख़बार | दो फ़ारसी अख़बार, इसी दौर में | फ़ारसी प्रेस |
! पाठ्यपुस्तक में इन दो फ़ारसी अख़बारों का वर्ष “1882” छपा है, जो छपाई की भूल है — सही वर्ष 1822 है। बोर्ड में पाठ्यपुस्तक का ही अनुसरण कीजिए। विस्तार से फ़ाइल 07 में।
उलमा और देवबंद★
| क्रम | कड़ी |
|---|---|
| 1 | उत्तर भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे। |
| 2 | डर था कि औपनिवेशिक शासक धर्मांतरण को बढ़ावा न दें। |
| 3 | या मुस्लिम क़ानून न बदल डालें। |
| 4 | इसलिए उन्होंने सस्ती लिथोग्राफ़ी प्रेस से धर्मग्रंथों के फ़ारसी और उर्दू अनुवाद, धार्मिक अख़बार तथा गुटके निकाले। |
- सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने मुसलमान पाठकों को रोज़मर्रा का जीवन जीने का सलीक़ा और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हज़ारों फ़तवे जारी किए।
हिंदू धार्मिक ग्रंथ★
- तुलसीदास की रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ।
- उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राफ़ी संस्करणों से उत्तर भारत का बाज़ार पट गया।
- लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं।
- मुद्रित और लाने-ले जाने में आसान होने के कारण आस्थावान इन्हें कहीं भी पढ़ सकते थे, और अनपढ़ लोगों की भीड़ में बोल-बोल कर भी पढ़ा जा सकता था।
★★निष्कर्ष के दो वाक्य — “धार्मिक पुस्तकें बड़ी तादाद में व्यापक जन-समुदाय तक पहुँच रही थीं, जिसके चलते विभिन्न धर्मों के बीच, और उनके अंदर, बहस-मुबाहिसे की नयी स्थिति बन गई थी।” “लेकिन प्रिंट ने समुदाय के बीच सिर्फ़ मत-मतांतर ही नहीं पैदा किए, बल्कि इसने समुदायों को अंदर से, और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया।”
भाग 8 — प्रकाशन के नए रूप
उपन्यास और नयी विधाएँ
- छापेख़ाने से नए तरह के लेखन के लिए भूख जागी।
- यूरोप में विकसित उपन्यास इन ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम था; जल्द ही इसने ख़ास भारतीय शक्ल और शैली अख़्तियार कर ली।
- गीत, कहानियाँ और सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर लेख भी पाठकों की दुनिया का हिस्सा बन गए।
नयी दृश्य-संस्कृति
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक छापेख़ानों की बढ़ती तादाद से छवियों की नक़लें आसानी से बनने लगीं।
- राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं; उनका अपना रवि वर्मा प्रेस था।
- काठ की तख़्ती पर चित्र उकेरने वाले ग़रीब दस्तकारों ने लैटरप्रेस छापेख़ानों के क़रीब दुकानें लगाईं।
- सस्ती तसवीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़रीब भी घरों और दफ़्तरों में सजाते थे।
- 1870 के दशक तक सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर कैरिकेचर और कार्टून छपने लगे।
- साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों में राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ता था, तो राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साधने में पीछे नहीं रहे।
महिलाएँ और मुद्रण (अभ्यास प्रश्न 3-क)★★
सकारात्मक पक्ष —
- महिलाओं की ज़िंदगी और भावनाएँ साफ़गोई और गहनता से लिखी जाने लगीं।
- मध्यवर्गीय घरों में महिलाओं का पढ़ना बहुत बढ़ गया।
- उदारवादी पिता और पति घर पर पढ़ाने लगे, और उन्नीसवीं सदी के मध्य में स्कूल बनने पर उन्हें स्कूल भेजने लगे।
- कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और नारी-शिक्षा की ज़रूरत बार-बार रेखांकित की।
विरोध का पक्ष —
| कौन | क्या मानता था |
|---|---|
| परंपरावादी हिंदू | पढ़ी-लिखी कन्याएँ विधवा हो जाती हैं। |
| दक़ियानूसी मुसलमान | उर्दू के रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी। |
★★राससुन्दरी देबी —
- पूर्वी बंगाल में, उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में, कट्टर रूढ़िवादी परिवार में ब्याही कन्या राससुन्दरी देबी ने रसोई में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा।
- बाद में उन्होंने आमार जीबोन नामक आत्मकथा लिखी, जो 1876 में प्रकाशित हुई।
- यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्म-कहानी थी।
अन्य लेखिकाएँ —
| लेखिका | कब / कहाँ | क्या लिखा |
|---|---|---|
| कैलाशबाशिनी देवी | 1860 के दशक से | महिलाएँ घरों में बंदी और अनपढ़ बनाकर रखी जाती हैं; घर-भर का बोझ उठाती हैं; और जिनकी सेवा करती हैं वही उन्हें दुत्कारते हैं। |
| ताराबाई शिंदे, पंडिता रमाबाई | 1880 का दशक, महाराष्ट्र | उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत पर जोश और रोष से लिखा। |
भाषाओं का क्रम —
- उर्दू, तमिल, बंगाली और मराठी प्रिंट-संस्कृति पहले विकसित हुई।
- गंभीर हिंदी छपाई की शुरुआत 1870 के दशक से हुई; इसका बड़ा हिस्सा नारी-शिक्षण को समर्पित हुआ।
- बीसवीं सदी के आरंभ में महिलाओं के लिए मुद्रित और कभी-कभी उनके द्वारा संपादित पत्रिकाएँ लोकप्रिय हुईं।
दूसरा पहलू ज़रूर लिखिए —
- पंजाब में राम चड्ढा ने औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देने के लिए स्त्री धर्म विचार लिखी।
- खालसा ट्रैक्ट सोसायटी ने ऐसे ही संदेशों वाली सस्ती पुस्तिकाएँ छापीं।
- कलकत्ता का बटाला इलाक़ा लोकप्रिय किताबों के प्रकाशन को समर्पित हो गया; फेरीवाले घर-घर घूमते थे।
★★उत्तर का संतुलन — छपाई ने महिलाओं को आवाज़ भी दी (राससुन्दरी देबी) और उन्हें बाँधने के नए तरीक़े भी दिए (स्त्री धर्म विचार)। दोनों पक्ष लिखने पर ही पूरे अंक मिलते हैं।
प्रिंट और ग़रीब जनता (अभ्यास प्रश्न 3-ख)★★
| क्रम | तथ्य |
|---|---|
| 1 | उन्नीसवीं सदी के मद्रासी शहरों में सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बिकती थीं, जिससे ग़रीब लोग भी उन्हें ख़रीद सकते थे। |
| 2 | बीसवीं सदी के आरंभ से सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे; स्थानीय अमीरों के लिए पुस्तकालय खोलना प्रतिष्ठा की बात थी। |
| 3 | ज्योतिबा फुले ने गुलामगिरी (1871) में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा। |
| 4 | भीमराव अंबेडकर (महाराष्ट्र) और ई.वी. रामास्वामी नायकर (मद्रास) ने जाति पर ज़ोरदार क़लम चलाई; उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए। |
| 5 | कानपुर के मिल-मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल लिख और छापकर जातीय तथा वर्गीय शोषण का रिश्ता समझाया। |
| 6 | 1935 से 1955 के बीच सुदर्शन चक्र नाम से लिखने वाले मिल-मज़दूर का लेखन सच्ची कविताएँ में छपा। |
| 7 | बंगलौर के सूती-मिल-मज़दूरों ने बंबई के मज़दूरों से प्रेरणा लेकर ख़ुद को शिक्षित करने के लिए पुस्तकालय बनाए। |
| 8 | समाज-सुधारकों की कोशिश थी कि मज़दूरों में नशाख़ोरी कम हो, साक्षरता आए, और उन तक राष्ट्रवाद का संदेश पहुँचे। |
भाग 9 — प्रिंट और प्रतिबंध
पहले कंपनी परेशान नहीं थी
- 1798 से पहले का औपनिवेशिक शासन सेंसरशिप को लेकर ज़्यादा परेशान नहीं था।
- ★मज़ेदार बात यह है कि मुद्रित सामग्री को नियंत्रित करने के शुरुआती क़दम कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठे।
- कंपनी को डर था कि इन आलोचनाओं का लाभ उठाकर इंग्लैंड में बैठे निंदक कहीं उसके व्यापारिक एकाधिकार पर हमला न बोल दें।
प्रेस-क़ानूनों का क्रम★
| समय | घटना |
|---|---|
| 1820 के दशक तक | कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की आज़ादी को नियंत्रित करने वाले कुछ क़ानून पास किए; कंपनी ने ब्रितानी शासन का उत्सव मनाने वाले अख़बारों को प्रोत्साहन दिया। |
| 1835 | संपादकों की अर्ज़ी के बाद गवर्नर जनरल बेंटिंक प्रेस क़ानून की पुनर्समीक्षा को राज़ी हुआ; उदारवादी अफ़सर टॉमस मेकॉले ने पहले की आज़ादियाँ बहाल करते हुए नए क़ानून बनाए। |
| 1857 के बाद | विद्रोह के बाद रवैया बदला; क्रुद्ध अंग्रेज़ों ने ‘देसी’ प्रेस का मुँह बंद करने की माँग की। |
| 1878 | आइरिश प्रेस क़ानून के तर्ज पर वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू हुआ। |
वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट ने क्या अधिकार दिए (अभ्यास प्रश्न 2-ग)★★
- सरकार को भाषाई प्रेस में छपी रपट और संपादकीय को सेंसर करने का व्यापक हक़ मिल गया।
- सरकार ने विभिन्न प्रदेशों के भाषाई अख़बारों पर नियमित नज़र रखनी शुरू कर दी।
- किसी रपट को बाग़ी क़रार दिए जाने पर अख़बार को पहले चेतावनी दी जाती थी।
- चेतावनी की अनसुनी होने पर अख़बार ज़ब्त किया जा सकता था और छपाई की मशीनें छीनी जा सकती थीं।
तिलक की घटना★
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | पंजाब के क्रांतिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया। |
| 2 | बालगंगाधर तिलक ने अपने केसरी में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई। |
| 3 | नतीजे में उन्हें 1908 में क़ैद कर लिया गया। |
| 4 | जिसके परिणामस्वरूप भारत-भर में व्यापक विरोध हुए। |
बॉक्स 5 — युद्धकाल का दमन★
| काल | दमन |
|---|---|
| पहला विश्वयुद्ध | भारतीय रक्षा नियम के तहत 22 अख़बारों को ज़मानत देनी पड़ी; इनमें से 18 ने ख़ुद को बंद कर देना उचित समझा। |
| 1919 | रॉलट के अधीन षड्यंत्र समिति ने जुर्माना आदि कार्रवाइयाँ और सख़्त कीं। |
| द्वितीय विश्वयुद्ध | भारतीय रक्षा अधिनियम पारित हुआ; भारत छोड़ो आंदोलन की रपटें इसी के तहत सेंसर होती थीं। |
| अगस्त 1942 | तक़रीबन 90 अख़बारों का दमन किया गया। |
गांधी, 1922 (अभ्यास प्रश्न 1-घ)★★
“वाणी की स्वतंत्रता…. प्रेस की आज़ादी…. सामूहिकता की आज़ादी। भारत सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बनाने के इन तीन ताक़तवर औज़ारों को दबाने की कोशिश कर रही है। स्वराज, ख़िलाफ़त… की लड़ाई, सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है।”
उत्तर में यह कारण लिखिए — गांधी मानते थे कि ये तीनों जनमत बनाने के सबसे ताक़तवर औज़ार हैं। अगर सरकार इन्हें दबा देगी तो स्वराज की माँग रखने का साधन ही नहीं बचेगा। इसलिए स्वराज की लड़ाई सबसे पहले इन तीन आज़ादियों की लड़ाई है।
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
1. सिर्फ़ छह तिथियाँ अनिवार्य
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 594 | चीन में छपाई शुरू |
| 1295 | मार्को पोलो लौटा |
| 1448 | गुटेन्बर्ग का यंत्र तैयार |
| 1780 | हिक्की का बंगाल गजट |
| 1878 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट |
| 1942 | 90 अख़बारों का दमन |
2. तीन देश, तीन शब्द
चीन = परीक्षा · जापान = डायमंड सूत्र · कोरिया = धातु के अक्षर
3. तीन नाम = तीन भारतीय हिस्से
राममोहन राय = बहस · राससुन्दरी देबी = महिलाएँ · काशीबाबा = मज़दूर
4. “मुद्रण क्रांति” के तीन शब्द
सूचना · सत्ता · सोच — तीनों से रिश्ता बदला, इसी को क्रांति कहते हैं।
5. हर बड़े उत्तर का अंतिम वाक्य
“मुद्रण ने लोगों के मानस को सीधे तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।”
6. और अगर सब भूल जाएँ, तो यह याद रखिए
छपाई ने एक साथ दो उलटे काम किए — उसने लोगों को बाँटा भी और जोड़ा भी। जिसके पास सत्ता थी, वह डरा; जिसके पास आवाज़ नहीं थी, उसे आवाज़ मिली।