कक्षा 10 · समकालीन भारत–2 (भूगोल) · पृष्ठ 1–12 (परीक्षा से पहले पढ़ने के लिए — केवल काम की बातें, पूरे वाक्यों में)
पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में
पर्यावरण में उपलब्ध हर वह वस्तु संसाधन है जो हमारी आवश्यकता पूरी कर सके, जिसे बनाने की प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य हो। संसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, बल्कि मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं। इनका वर्गीकरण चार आधारों पर होता है — उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व और विकास का स्तर। मानव ने संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग किया, जिससे संसाधनों का ह्रास हुआ, समाज अमीर-गरीब में बँटा और वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हुआ। इसका हल सतत् पोषणीय विकास है, जिसकी संकल्पना 1987 की ब्रुन्ड्टलैंड रिपोर्ट ने दी और जिसे 1992 के रियो सम्मेलन ने एजेंडा 21 के रूप में स्वीकार किया। भारत में संसाधनों की विविधता के कारण संसाधन नियोजन ज़रूरी है, जिसके तीन सोपान हैं। भूमि हमारा सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है — 43 प्रतिशत मैदान, 30 प्रतिशत पर्वत और 27 प्रतिशत पठार। कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है और वन क्षेत्र 33 प्रतिशत के लक्ष्य से काफ़ी कम है। भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है, जिसके मुख्य कारण खनन, अति पशुचारण और अधिक सिंचाई हैं। मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य संसाधन है और भारत में इसके छह प्रकार हैं — जलोढ़, काली, लाल-पीली, लेटराइट, मरुस्थली और वन मृदा। मृदा अपरदन रोकने के लिए समोच्च जुताई, सोपान कृषि, पट्टी कृषि और रक्षक मेखला अपनाई जाती है।
यही पूरा अध्याय है। अब इसे भागों में देखिए।
भाग 1 — संसाधन की परिभाषा
परिभाषा (शब्दश: याद कीजिए)★★
“हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक ‘संसाधन’ है।”
चार शर्तें —
| # | शर्त |
|---|---|
| 1 | आवश्यकता पूरी करे |
| 2 | प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो |
| 3 | आर्थिक रूप से संभाव्य हो |
| 4 | सांस्कृतिक रूप से मान्य हो |
अध्याय का सबसे बड़ा वाक्य★★
“क्या आप भी अन्य बहुत से लोगों की तरह संसाधनों को प्राकृतिक उपहार समझते हैं? ऐसा नहीं है। संसाधन मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।”
- “मानव स्वयं संसाधनों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें प्रयोग करते हैं।”
चित्र 1.1 — तीन कोनों वाला त्रिकोण
“वस्तुओं की रूपांतरण प्रक्रिया प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के पारस्परिक क्रियात्मक संबंध में निहित है।”
| कोना | उदाहरण |
|---|---|
| भौतिक पर्यावरण (प्रकृति) | कोयला, पानी, मिट्टी, धूप |
| प्रौद्योगिकी | खदान की मशीन, बाँध, सोलर पैनल |
| संस्थाएँ | सरकार, पंचायत, क़ानून |
भाग 2 — संसाधनों का वर्गीकरण (सबसे पक्का प्रश्न)
चार आधार — याद रखने का सूत्र: “उ-स-स्वा-वि”★★
| आधार | प्रकार |
|---|---|
| (क) उत्पत्ति | जैव और अजैव |
| (ख) समाप्यता | नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य |
| (ग) स्वामित्व | व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय |
| (घ) विकास का स्तर | संभावी, विकसित, भंडार और संचित कोष |
चित्र 1.2 — पूरा वर्गीकरण एक तालिका में★
| मुख्य वर्ग | उपवर्ग | आगे का उपवर्ग | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| प्राकृतिक | नवीकरण योग्य | सतत् अथवा प्रवाह | पवन, जल |
| प्राकृतिक | नवीकरण योग्य | जैव | प्राकृतिक वनस्पति (वन), वन्य जीव |
| प्राकृतिक | अनवीकरण योग्य | पुन: चक्रीय | धातु |
| प्राकृतिक | अनवीकरण योग्य | अचक्रीय | जीवाश्म ईंधन |
| मानवीय | संरचनाएँ एवं संस्थाएँ | — | शिक्षा-व्यवस्था, सरकार |
| मानवीय | मात्रा एवं गुणवत्ता | — | जनसंख्या, कौशल |
★‘पुन: चक्रीय’ बनाम ‘अचक्रीय’ — धातु गलाकर दोबारा बनती है; पेट्रोल एक बार जला तो ख़त्म।
(क) उत्पत्ति के आधार पर
| प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| जैव | जिनकी उत्पत्ति जीवमंडल से होती है, यानी जिनमें जीवन है। | मनुष्य, वनस्पति जगत, प्राणी जगत, मत्स्य जीवन, पशुधन |
| अजैव | वे सभी वस्तुएँ जो निर्जीव पदार्थों से बनी हैं। | चट्टानें और धातुएँ |
(ख) समाप्यता के आधार पर
| प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| नवीकरण योग्य | जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा उत्पन्न किया जा सकता है। | सौर और पवन ऊर्जा, जल, वन और वन्य जीवन |
| अनवीकरण योग्य | जिनका विकास एक लंबे भूगर्भीय अंतराल में होता है, इसलिए वे एक बार समाप्त होने पर दोबारा नहीं बनते। | खनिज और जीवाश्म ईंधन |
(ग) स्वामित्व के आधार पर
| प्रकार | अर्थ |
|---|---|
| व्यक्तिगत | जिन पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार होता है — जैसे किसान का अपना खेत, कुआँ या घर। |
| सामुदायिक | जो समुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध हों — जैसे गाँव की चरागाह, तालाब, और शहरों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल तथा खेल के मैदान। |
| राष्ट्रीय | देश की सीमा के भीतर के सभी संसाधन, जिनमें तट रेखा से 12 समुद्री मील तक का महासागरीय क्षेत्र भी शामिल है। |
| अंतर्राष्ट्रीय | जिनका नियमन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ करती हैं — तट रेखा से 200 समुद्री मील से परे खुले महासागरीय संसाधन। |
(घ) विकास के स्तर के आधार पर★
| प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| संभावी | किसी प्रदेश में मौजूद, पर अभी उपयोग नहीं हुआ। | राजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा। |
| विकसित | सर्वेक्षण हो चुका, मात्रा-गुणवत्ता तय हो चुकी, उपयोग शुरू है। | कोयले और लोहे की चालू खदानें। |
| भंडार | आवश्यकता पूरी कर सकते हैं, पर उपयुक्त प्रौद्योगिकी नहीं है। | पानी में मौजूद हाइड्रोजन। |
| संचित कोष | उपलब्ध तकनीक से इस्तेमाल हो सकते हैं, पर अभी उपयोग शुरू नहीं हुआ। | बाँधों में जमा जल, जिससे भविष्य में विद्युत बनेगी। |
★★भंडार बनाम संचित कोष — एक वाक्य में: “भंडार में तकनीक नहीं है; संचित कोष में तकनीक है, पर इस्तेमाल नहीं किया।”
भाग 3 — संसाधनों का विकास
अंधाधुंध उपयोग की तीन समस्याएँ★
| # | समस्या |
|---|---|
| 1 | कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास हुआ है। |
| 2 | संसाधन कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए, जिससे समाज संसाधन संपन्न और संसाधनहीन — यानी अमीर और गरीब — में बँट गया। |
| 3 | वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हुआ — भूमंडलीय तापन, ओज़ोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण। |
तीन शब्दों में — ह्रास · बँटवारा · पारिस्थितिकी संकट।
और इसका हल —
- “मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व शांति बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बँटवारा आवश्यक हो गया है।”
- “यदि कुछ ही व्यक्तियों तथा देशों द्वारा संसाधनों का वर्तमान दोहन जारी रहता है, तो हमारी पृथ्वी का भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है।”
- ★“सतत् अस्तित्व सही अर्थ में सतत् पोषणीय विकास का ही एक हिस्सा है।”
सतत् पोषणीय विकास (परिभाषा शब्दश:)★★
“सतत् पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।”
| हिस्सा | अर्थ |
|---|---|
| 1 | विकास से पर्यावरण को नुक़सान न पहुँचे। |
| 2 | आज का विकास भविष्य की पीढ़ियों की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ न करे। |
रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कब और कहाँ | जून 1992, ब्राज़ील के शहर रियो डी जेनेरो में |
| कौन आए | 100 से भी अधिक राष्ट्राध्यक्ष |
| कौन-सा सम्मेलन | प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन |
| क्यों | पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की समस्याओं का हल ढूँढ़ने के लिए |
| किस पर हस्ताक्षर | भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता पर घोषणा पत्र |
| और क्या | भूमंडलीय वन सिद्धांतों (Forest Principles) पर सहमति |
| सबसे बड़ा परिणाम | 21वीं शताब्दी के सतत् पोषणीय विकास के लिए एजेंडा 21 को स्वीकृति |
एजेंडा 21★
- 1992 में रियो डी जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वाधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकृत घोषणा।
- उद्देश्य — भूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास हासिल करना।
- यह एक कार्यसूची है जिसका उद्देश्य समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मिलित ज़िम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग द्वारा पर्यावरणीय क्षति, ग़रीबी और रोगों से निपटना है।
- ★मुख्य उद्देश्य — “प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करे।”
भाग 4 — संसाधन नियोजन
चार प्रादेशिक उदाहरण (यह तालिका परीक्षा में सीधे आती है)★★
| प्रदेश | प्रचुरता | कमी |
|---|---|---|
| झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ | खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार | — |
| अरुणाचल प्रदेश | जल संसाधन प्रचुर मात्रा में | मूल विकास की कमी |
| राजस्थान | पवन और सौर ऊर्जा की बहुतायत | जल संसाधनों की कमी |
| लद्दाख | सांस्कृतिक विरासत का धनी | जल, आधारभूत अवसंरचना और कुछ महत्त्वपूर्ण खनिजों की कमी; शीत मरुस्थल होने से अलग-थलग |
★राजस्थान वाली पंक्ति RBSE में लगभग हर साल आती है — इसे शब्दश: याद कीजिए।
निष्कर्ष —
“इसलिए राष्ट्रीय, प्रांतीय, प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता है।”
भारत में संसाधन नियोजन के तीन सोपान★★
| सोपान | क्या करना होता है |
|---|---|
| (क) पहचान | देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना — इसमें क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन शामिल है। |
| (ख) प्रौद्योगिकी | संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना। |
| (ग) समन्वय | संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना। |
- “स्वाधीनता के बाद भारत में संसाधन नियोजन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास किए गए।”
सिर्फ़ संसाधन होने से विकास नहीं होता★★
- “किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है।”
- “परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में तदनुरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है।”
- “देश में बहुत से क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी आर्थिक रूप से विकसित हैं।”
उपनिवेशवाद का उदाहरण —
- “उपनिवेशों में संसाधन संपन्न प्रदेश, विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे हैं।”
- “उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।”
निष्कर्ष —
“संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ।” “भारत में विकास… संसाधनों की उपलब्धता पर ही आधारित नहीं था, बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है।”
भाग 5 — संसाधनों का संरक्षण
गांधी जी का कथन★★
“हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं।” “अर्थात् हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”
- उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधन ह्रास के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृत्ति ज़िम्मेदार है।
- “वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे।”
संरक्षण की कालरेखा (हर साल पूछी जाती है)★★
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1968 | अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीक़े से संसाधन संरक्षण की वकालत क्लब ऑफ़ रोम ने की। |
| 1974 | शुमेसर ने अपनी पुस्तक स्माल इज़ ब्यूटीफुल में गांधी जी के दर्शन की पुनरावृत्ति की। |
| 1987 | ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास की संकल्पना प्रस्तुत की; यह रिपोर्ट बाद में हमारा साझा भविष्य (Our Common Future) नाम से प्रकाशित हुई। |
| 1992 | रियो डी जेनेरो, ब्राज़ील में पृथ्वी सम्मेलन। |
★याद रखने का सूत्र — 68 रोम · 74 शुमेसर · 87 ब्रुन्ड्टलैंड · 92 रियो। ! सावधानी — ‘सतत् पोषणीय विकास’ शब्द 1987 की ब्रुन्ड्टलैंड रिपोर्ट से आया, 1992 के रियो सम्मेलन से नहीं। यह अंतर परीक्षा में अकसर उलझाता है।
भाग 6 — भू-संसाधन
चित्र 1.3 के तीन आँकड़े (सबसे पक्का 1-अंक का प्रश्न)★★
| भू-आकृति | प्रतिशत | विशेषता |
|---|---|---|
| मैदान | लगभग 43% | कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक |
| पर्वत | 30% | बारहमासी नदियों का प्रवाह सुनिश्चित करते हैं, पर्यटन विकास के लिए अनुकूल, पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण |
| पठार | लगभग 27% | खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष |
43 – 30 – 27 → जोड़ पर 100। इसी तरह याद कीजिए।
भू-उपयोग की पाँच श्रेणियाँ★
| # | श्रेणी | उपश्रेणियाँ |
|---|---|---|
| 1 | वन | — |
| 2 | कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि | (अ) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि · (ब) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि (इमारतें, सड़क, उद्योग) |
| 3 | परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि | (अ) स्थायी चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि · (ब) विविध वृक्षों, वृक्ष फ़सलों तथा उपवनों के अधीन भूमि · (स) कृषि योग्य बंजर भूमि (5 से अधिक वर्षों से खेती न हुई हो) |
| 4 | परती भूमि | (अ) वर्तमान परती (1 कृषि वर्ष या कम) · (ब) पुरातन परती (1 से 5 कृषि वर्ष) |
| 5 | शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र | वह भूमि जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं |
- ★“एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है।”
★★तीन ‘परती’ का फ़र्क़ पक्का कीजिए — वर्तमान परती = 1 वर्ष या कम · पुरातन परती = 1 से 5 वर्ष · कृषि योग्य बंजर = 5 वर्ष से ज़्यादा।
भाग 7 — भारत में भू-उपयोग प्रारूप
भू-उपयोग तय करने वाले तत्त्व
| प्रकार | तत्त्व |
|---|---|
| भौतिक कारक | भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार |
| मानवीय कारक | जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परंपराएँ |
क्षेत्रफल और आँकड़ों की सीमा★★
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कुल भौगोलिक क्षेत्रफल | 32.8 लाख वर्ग किमी. |
| आँकड़े उपलब्ध | केवल 93 प्रतिशत भाग के |
| कारण 1 | पूर्वोत्तर प्रांतों में असम को छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र की जानकारी उपलब्ध नहीं |
| कारण 2 | जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों का सर्वेक्षण नहीं हुआ |
चित्र 1.4 — दोनों वर्षों की तुलना★★
| भू-उपयोग संवर्ग | 1960–61 | 2014–15 |
|---|---|---|
| वन | 18.11% | 23.3% |
| बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि | 12.01% | 5.5% |
| गैर-कृषि प्रयोजनों के अंतर्गत क्षेत्र | 4.95% | 8.7% |
| स्थायी चारागाहें तथा अन्य गोचर भूमि | 4.71% | 3.3% |
| विविध वृक्षों, वृक्ष फ़सलों तथा उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र | 1.50% | 1% |
| कृषि योग्य बंजर भूमि | 6.23% | 4.0% |
| पुरातन परती | 3.50% | 3.6% |
| वर्तमान परती | 3.73% | 4.9% |
| शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र | 45.26% | 45.5% |
★★इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं (यही अभ्यास प्रश्न 3-i है) — 1. शुद्ध बोया गया क्षेत्र 54 साल में लगभग नहीं बढ़ा (45.26% → 45.5%)। 2. वन क्षेत्र बढ़ा तो पर बहुत धीरे (18.11% → 23.3%), जबकि लक्ष्य 33% है। 3. गैर-कृषि प्रयोजनों की भूमि लगभग दोगुनी हो गई (4.95% → 8.7%) — यही बताता है कि बस्तियाँ, सड़कें और उद्योग बढ़े।
खेती से जुड़े तीन ज़रूरी आँकड़े★
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| कुल सूचित क्षेत्र का वह हिस्सा जिस पर अधिकतम खेती हो सकती है | लगभग 54 प्रतिशत |
| पंजाब और हरियाणा में शुद्ध बोया गया क्षेत्र | 80 प्रतिशत |
| अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार में | 10 प्रतिशत से भी कम |
इन राज्यों में क्षेत्र कम क्यों है? — क्योंकि यहाँ पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्र अधिक है, ढाल तीव्र है और मिट्टी की परत पतली है।
राष्ट्रीय वन नीति (1952)★
- इसके द्वारा वनों के अंतर्गत 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वांछित है, जिसकी तुलना में वास्तविक वन क्षेत्र काफ़ी कम है।
- “वन नीति द्वारा निर्धारित यह सीमा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।”
- “वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर करती है।”
भाग 8 — भूमि निम्नीकरण और संरक्षण
आँकड़े★
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| मूल आवश्यकताओं (भोजन, मकान, कपड़ा) का वह भाग जो भूमि से मिलता है | 95 प्रतिशत |
| भारत में निम्नीकृत भूमि | लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर |
| वनों के अंतर्गत अपरदित | लगभग 28 प्रतिशत |
| जल अपरदित | 56 प्रतिशत |
| शेष | लवणीय और क्षारीय |
राज्यवार कारण (यह तालिका बहुत पूछी जाती है)★★
| कारण | राज्य | कैसे |
|---|---|---|
| खनन | झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उड़ीसा | खनन के बाद खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है; खनन से वनोन्मूलन भी होता है। |
| अति पशुचारण | गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र | ज़रूरत से ज़्यादा पशु चराने से वनस्पति ख़त्म होती है और मिट्टी नंगी हो जाती है। |
| अधिक सिंचाई | पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश | अति सिंचन से जलाक्रांतता पैदा होती है, जिससे मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है। |
| खनिज प्रक्रियाएँ | — | सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर पीसना और मृदा बर्तन उद्योग में खड़िया मृदा तथा सेलखड़ी के प्रयोग से वायुमंडल में धूल विसर्जित होती है; परत जमने से मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। |
| औद्योगिक जल निकास | — | इससे बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। |
! सावधानी — मध्य प्रदेश दो सूचियों में है (खनन और अति पशुचारण), और राजस्थान अति पशुचारण वाली सूची में है। RBSE में यही उलझाया जाता है।
भूमि निम्नीकरण के सात उपाय★
| # | उपाय |
|---|---|
| 1 | वनारोपण |
| 2 | चरागाहों का उचित प्रबंधन |
| 3 | पेड़ों की रक्षक मेखला (shelter belt) लगाना |
| 4 | पशुचारण नियंत्रण |
| 5 | रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाना |
| 6 | बंजर भूमि का उचित प्रबंधन और खनन नियंत्रण |
| 7 | औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात् विसर्जित करना |
भाग 9 — मृदा संसाधन
परिभाषा★★
“मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है जो पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करती है।”
- “मृदा एक जीवंत तंत्र है।”
- ★“कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।”
मृदा बनने के पाँच कारक★
| # | कारक |
|---|---|
| 1 | उच्चावच |
| 2 | जनक शैल अथवा संस्तर शैल |
| 3 | जलवायु |
| 4 | वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ |
| 5 | समय |
और ये प्राकृतिक तत्त्व भी योगदान देते हैं — तापमान परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन क्रियाएँ।
- “मृदा जैव (ह्यूमस) और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है।”
चित्र 1.5 — मृदा परिच्छेदिका की चार परतें (ऊपर से नीचे)
| # | परत |
|---|---|
| 1 | ऊपरी संस्तर की मृदा |
| 2 | उप-मृदा — अपक्षयित चट्टानें: बालू, गाद (सिल्ट) व मृत्तिका |
| 3 | अध:स्तरीय अपक्षयित आधारी चट्टानें |
| 4 | अपक्षय रहित आधारी चट्टानें |
भाग 10 — मृदाओं का वर्गीकरण (सबसे बड़ा भाग)
क्रम याद कीजिए — जलोढ़ · काली · लाल-पीली · लेटराइट · मरुस्थली · वन
1. जलोढ़ मृदा★★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| महत्त्व | सबसे विस्तृत और देश की सबसे महत्त्वपूर्ण मृदा; संपूर्ण उत्तरी मैदान इसी से बना है। |
| किन नदियों से | हिमालय के तीन नदी तंत्रों — सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र — के निक्षेपों से। |
| और कहाँ | एक सँकरे गलियारे से राजस्थान और गुजरात तक; तथा महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के पूर्वी तटीय डेल्टे। |
| किन कणों से | रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात। |
| कणों का आकार | नदी के मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर जाते हुए कणों का आकार बढ़ता है; ऊपरी भाग में मोटे कण वाली मृदाएँ द्वार, ‘चो’ क्षेत्र और तराई में मिलती हैं। |
| पोषक तत्त्व | पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त। |
| फ़सलें | गन्ना, चावल, गेहूँ, अन्य अनाज और दलहन। |
| अन्य | गहन कृषि होती है और जनसंख्या घनत्व भी अधिक है; सूखे क्षेत्रों की मृदाएँ अधिक क्षारीय होती हैं। |
★आयु के आधार पर दो प्रकार —
| प्रकार | अर्थ | विशेषता |
|---|---|---|
| बांगर | पुराना जलोढ़ | ‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा ज़्यादा |
| खादर | नया जलोढ़ | बांगर की तुलना में ज़्यादा महीन कण |
2. काली मृदा★★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| दूसरे नाम | रेगर मृदा और काली कपास मृदा |
| किससे बनी | लावा जनक शैलों से; बहुत महीन कणों यानी मृत्तिका से |
| कहाँ | दक्कन पठार (बेसाल्ट) के उत्तर-पश्चिमी भाग — महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर; दक्षिण-पूर्व में गोदावरी और कृष्णा की घाटियों तक |
| सबसे बड़ा गुण | नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक |
| किससे परिपूर्ण | कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूना |
| किसकी कमी | फास्फोरस |
| मुख्य फ़सल | कपास |
★काली मृदा की अनोखी विशेषता —
- “गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे इनमें अच्छी तरह वायु मिश्रण हो जाता है।”
- “गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती हैं और इनको जोतना मुश्किल होता है।”
- “इसलिए, इसकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही शुरू कर दी जाती है।”
3. लाल और पीली मृदा★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर, कम वर्षा वाले भागों में |
| राज्य | ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर, और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर |
| लाल रंग क्यों | रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार के कारण |
| पीला रंग क्यों | जलयोजन के कारण |
दो शब्दों में — लाल = लोहा · पीली = जलयोजन।
4. लेटराइट मृदा★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| नाम का अर्थ | ग्रीक शब्द लेटर (Later) से, जिसका अर्थ है ईंट |
| कैसे बनी | उष्णकटिबंधीय तथा उपोषण कटिबंधीय जलवायु में आर्द्र और शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने से |
| किसका परिणाम | भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) |
| गुण | अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH<6.0); पोषक तत्त्वों की कमी |
| कहाँ | दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ भाग तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेश |
| ह्यूमस | पर्णपाती-सदाबहार वन क्षेत्रों में पर्याप्त; विरल वनस्पति और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में कम |
| फ़सलें | कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफ़ी; तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लेटराइट मृदाएँ काजू के लिए |
5. मरुस्थली मृदा★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| रंग | लाल और भूरा |
| गुण | रेतीली और लवणीय |
| नमक | कुछ क्षेत्रों में इतना अधिक कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक बनाया जाता है |
| क्यों ऐसी | शुष्क जलवायु और उच्च तापमान से वाष्पीकरण दर अधिक; ह्यूमस और नमी कम |
| नीचे क्या | कैल्शियम बढ़ता जाता है और नीचे की परतों में चूने के कंकर की सतह; इससे जल अंत:स्यंदन (infiltration) अवरुद्ध हो जाता है |
| हल | “सही तरीक़े से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है, जैसा कि पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है।” |
6. वन मृदा★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं |
| नदी घाटियों में | दोमट और सिल्टदार |
| ऊपरी ढालों पर | मोटे कणों वाली |
| हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों में | अधिक अपरदन; अधिसिलिक (acidic) तथा ह्यूमस रहित |
| कहाँ उपजाऊ | नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों में, विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों में |
छहों मृदाओं की एक तालिका (आख़िरी दिन के लिए)★★
| मृदा | कहाँ | विशेषता / फ़सल |
|---|---|---|
| जलोढ़ | संपूर्ण उत्तरी मैदान; राजस्थान-गुजरात तक; पूर्वी तटीय डेल्टे | सबसे उपजाऊ; गन्ना, चावल, गेहूँ, दलहन |
| काली | दक्कन पठार का उत्तर-पश्चिम; महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, म.प्र., छत्तीसगढ़ | नमी धारण क्षमता सबसे अधिक; कपास |
| लाल और पीली | दक्कन पठार का पूर्वी-दक्षिणी हिस्सा; ओडिशा, छत्तीसगढ़, प. घाट का पहाड़ी पद | लोहे से लाल, जलयोजन से पीली |
| लेटराइट | दक्षिणी राज्य, प. घाट (महाराष्ट्र), ओडिशा, प. बंगाल, उत्तर-पूर्वी प्रदेश | निक्षालन से बनी; चाय, कॉफ़ी, काजू |
| मरुस्थली | पश्चिमी राजस्थान | रेतीली-लवणीय; सिंचाई से उपजाऊ |
| वन | पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र, हिमालय | नदी घाटी में दोमट; ऊपरी ढाल पर मोटे कण |
भाग 11 — मृदा अपरदन और संरक्षण
परिभाषा★
“मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है।”
- “मृदा के बनने और अपरदन की क्रियाएँ आमतौर पर साथ-साथ चलती हैं और दोनों में संतुलन होता है।”
- “परंतु मानवीय क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन से यह संतुलन भंग हो जाता है; तथा प्राकृतिक तत्त्व जैसे पवन, हिमनदी और जल मृदा अपरदन करते हैं।”
अपरदन के प्रकार★★
| प्रकार | कैसे होता है | उदाहरण |
|---|---|---|
| अवनलिका अपरदन | बहता जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है, जिन्हें अवनलिकाएँ कहते हैं। | — |
| उत्खात भूमि (bad land) | ऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती। | चंबल बेसिन में ऐसी भूमि को खड्ड (ravine) भूमि कहा जाता है। |
| चादर अपरदन (Sheet erosion) | जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे बहता है और ऊपरी मृदा घुलकर बह जाती है। | — |
| पवन अपरदन | पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाना। | — |
| ग़लत जुताई से | ढाल पर ऊपर से नीचे की ओर हल चलाने से वाहिकाएँ बन जाती हैं, जिनके अंदर से बहता पानी मृदा का कटाव करता है। | — |
संरक्षण के चार तरीक़े (अभ्यास प्रश्न 2-iii)★★
| तरीक़ा | कैसे काम करता है | कहाँ |
|---|---|---|
| समोच्च जुताई (contour ploughing) | समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती है। | ढाल वाली भूमि पर |
| सोपान कृषि (terrace farming) | ढाल पर सोपान बनाकर अपरदन को नियंत्रित किया जाता है। | पश्चिमी और मध्य हिमालय में काफ़ी विकसित |
| पट्टी कृषि (strip farming) | बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटकर फ़सलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं, जो पवनों के बल को कमज़ोर करती हैं। | — |
| रक्षक मेखला (shelter belt) | पेड़ों को कतारों में लगाने से पवनों की गति कम होती है। | पश्चिम भारत में रेत के टीलों के स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान |
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
1. सिर्फ़ छह आँकड़े अनिवार्य
| आँकड़ा | किससे जुड़ा |
|---|---|
| 43 – 30 – 27 | मैदान – पर्वत – पठार |
| 32.8 लाख वर्ग किमी. | भारत का क्षेत्रफल |
| 93 प्रतिशत | जितने भाग के भू-उपयोग आँकड़े उपलब्ध हैं |
| 54 प्रतिशत | जितने पर खेती हो सकती है |
| 33 प्रतिशत | राष्ट्रीय वन नीति 1952 का लक्ष्य |
| 13 करोड़ हेक्टेयर | निम्नीकृत भूमि |
2. चार वर्ष
68 रोम · 74 शुमेसर · 87 ब्रुन्ड्टलैंड · 92 रियो
3. हर मृदा = एक फ़सल
काली = कपास · जलोढ़ = गेहूँ-चावल-गन्ना · लेटराइट = चाय-कॉफ़ी-काजू फ़सल याद रहेगी तो मृदा भी याद रहेगी।
4. तीन ‘परती’
वर्तमान = 1 वर्ष · पुरातन = 1–5 वर्ष · कृषि योग्य बंजर = 5 से ज़्यादा
5. राजस्थान इस अध्याय में चार बार आता है
| कहाँ | क्या |
|---|---|
| संसाधन नियोजन | पवन और सौर ऊर्जा की बहुतायत, पर जल की कमी |
| संभावी संसाधन | राजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा |
| भूमि निम्नीकरण | अति पशुचारण वाले राज्यों में शामिल |
| मरुस्थली मृदा | पश्चिमी राजस्थान में सिंचाई से कृषि योग्य बनाई जा रही है |
RBSE की परीक्षा में ये चारों पूछे जाते हैं। इन्हें अलग से याद कीजिए।
6. और अगर सब भूल जाएँ, तो यह याद रखिए
“संसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।” और गांधी जी का वाक्य — “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है, लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”