कक्षा 10 · समकालीन भारत–2 (भूगोल) · पृष्ठ 19–29 (परीक्षा से पहले पढ़ने के लिए — केवल काम की बातें, पूरे वाक्यों में)
पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में
पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से ढका है, पर प्रयोग योग्य अलवणीय जल बहुत कम है; यह जल सतही अपवाह और भौमजल से मिलता है और जलीय चक्र से लगातार नवीकृत होता रहता है। फिर भी जल की कमी होती है — और इसका मुख्य कारण कम वर्षा नहीं, बल्कि जल का अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और असमान वितरण है। इज़राइल में मात्र 25 सेमी. वर्षा होकर भी जल का अभाव नहीं, जबकि भारत में 114 सेमी. वर्षा होकर भी हर साल कहीं न कहीं सूखा पड़ता है — यानी समस्या पानी की नहीं, प्रबंधन की है। इसीलिए भारत ने जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू कीं। प्राचीन काल से हम बाँध बनाते आए हैं, और स्वतंत्रता के बाद बनी बहुउद्देशीय परियोजनाओं को नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा। पर इन परियोजनाओं की आलोचना भी हुई — नदी का प्राकृतिक बहाव रुका, तलछट जमा हुआ, मृदाओं का लवणीकरण हुआ, और सबसे बड़ी विडंबना यह कि बाढ़ रोकने वाले बाँध ही कभी-कभी बाढ़ का कारण बन गए। इसीलिए आज वर्षाजल संग्रहण को एक व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है — जैसे राजस्थान के टाँका, खादीन और जोहड़, हिमालय के गुल-कुल, और मेघालय की 200 वर्ष पुरानी बाँस ड्रिप सिंचाई।
यही पूरा अध्याय है। अब इसे भागों में देखिए।
अध्याय की दो केंद्रीय बहसें
1. बड़े बाँध बनाएँ या छोटे टाँके? 2. पानी की कमी है, या प्रबंधन की?
पाठ्यपुस्तक किसी एक का पक्ष नहीं लेती। इसलिए आपके हर बड़े उत्तर में दोनों पक्ष होने चाहिए — केवल एक पक्ष लिखने पर आधे अंक कट जाते हैं।
भाग 1 — जल एक नवीकरण योग्य संसाधन (अभ्यास प्रश्न 2-i)
जल नवीकरण योग्य क्यों है★★
- “तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है, परंतु इसमें प्रयोग में लाने योग्य अलवणीय जल का अनुपात बहुत कम है।”
- “यह अलवणीय जल हमें सतही अपवाह और भौमजल स्रोत से प्राप्त होता है।”
- “जिनका लगातार नवीकरण और पुनर्भरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है।”
- “सारा जल जलीय चक्र में गतिशील रहता है जिससे जल नवीकरण सुनिश्चित होता है।”
अध्याय का सूत्र-वाक्य
“जल जीवन दे भी सकता है और ले भी सकता है।” — पिंकी, पृष्ठ 19
और वह बड़ा सवाल
“ऐसी भविष्यवाणी क्यों की जा रही है कि 2025 में 20 करोड़ लोग जल की नितांत कमी झेलेंगे?”
भाग 2 — जल दुर्लभता और उसके कारण
पहले वह ग़लतफ़हमी जिसे किताब तोड़ती है★★
- जल की कमी सुनते ही हमें राजस्थान के मरुस्थल और मटके लिए पनिहारिनों के चित्र याद आते हैं।
- यह सच है कि वार्षिक और मौसमी परिवर्तन से जल की उपलब्धता में समय और स्थान के अनुसार विभिन्नता है।
पर असली कारण यह है —
★★“अधिकतया जल की कमी इसके अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और समाज के विभिन्न वर्गों में जल के असमान वितरण के कारण होती है।”
तीन शब्दों में — अतिशोषण · अत्यधिक प्रयोग · असमान वितरण।
प्रचुर जल के बावजूद दुर्लभता★
“क्या यह संभव है कि किसी क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में जल संसाधन होने के बावजूद भी वहाँ जल की दुर्लभता हो? हमारे कई शहर इसके उदाहरण हैं।”
- चित्र 3.1 का उदाहरण — कोलकाता में 180 मिलीमीटर की रिकॉर्ड बारिश के बाद पूरा शहर ठप, फिर भी एक लड़का सड़क के पानी से पीने का पानी भर रहा है।
जल सिर्फ़ पीने के लिए नहीं★
- “जल, अधिक जनसंख्या के लिए घरेलू उपयोग में ही नहीं बल्कि अधिक अनाज उगाने के लिए भी चाहिए।”
- “अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए जल संसाधनों का अतिशोषण करके ही सिंचित क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।”
- “सिंचित कृषि में जल का सबसे ज़्यादा उपयोग होता है।”
- हल — “शुष्क कृषि तकनीकों तथा सूखा प्रतिरोधी फसलों के विकास द्वारा अब कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने की आवश्यकता है।”
इज़राइल बनाम भारत — यह तुलना सबसे ज़्यादा पूछी जाती है★★
| देश | औसत वार्षिक वर्षा | स्थिति |
|---|---|---|
| इज़राइल | 25 सेमी. | जल का कोई अभाव नहीं |
| भारत | 114 सेमी. | प्रति वर्ष किसी भाग में सूखा अवश्य पड़ता है |
कारण —
“देश में जल की उपलब्धता और उसके स्वरूप के अनुसार समुचित जलप्रबंधन न होने के कारण ही वर्षा का जल नदी-नालों में तेज़ी से बहकर समुद्र में चला जाता है, जिससे वर्षा के बाद के लगभग नौ महीने देश के लिए पानी की कमी के होते हैं।” “यही ही मूल कारण है देश में जलीय अभाव के, जिसे हम वांछित प्रबंधन के द्वारा ही नियंत्रित कर सकते हैं।”
भौमजल, उद्योग और शहर
| कारण | असर |
|---|---|
| किसानों के निजी कुएँ और नलकूप | भौम जलस्तर नीचे गिर सकता है और भोजन सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है |
| औद्योगीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) | अलवणीय जल संसाधनों पर दबाव; उद्योगों को जल के अलावा ऊर्जा भी चाहिए, जिसकी पूर्ति काफ़ी हद तक जल विद्युत से होती है |
| शहरीकरण और शहरी जीवन शैली | शहरी आवास समितियों और कालोनियों ने अपने नलकूप लगा लिए; शहरों में जल संसाधनों का अति शोषण हो रहा है |
मात्रात्मक बनाम गुणात्मक दुर्लभता★★
| प्रकार | अर्थ |
|---|---|
| मात्रात्मक दुर्लभता | पानी की मात्रा ही कम है |
| गुणात्मक दुर्लभता | पानी है, पर घरेलू और औद्योगिक अपशिष्टों, रसायनों, कीटनाशकों और कृषि में प्रयुक्त उर्वरकों से प्रदूषित होने के कारण मानव उपयोग के लिए ख़तरनाक है |
संरक्षण क्यों ज़रूरी है — पाँच कारण★
| # | कारण |
|---|---|
| 1 | स्वयं को स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों से बचाना |
| 2 | खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करना |
| 3 | अपनी आजीविका सुनिश्चित करना |
| 4 | उत्पादक क्रियाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना |
| 5 | प्राकृतिक पारितंत्रों को निम्नीकृत होने से बचाना |
भाग 3 — तीन सरकारी योजनाएँ (ये आँकड़े अनिवार्य हैं)
| योजना | मुख्य बातें |
|---|---|
| जल जीवन मिशन (J.J.M.) | ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार और जीवनयापन आसान बनाना। लक्ष्य — प्रत्येक ग्रामीण परिवार को लंबी अवधि के आधार पर नियमित रूप से प्रति व्यक्ति 55 लीटर के सेवा स्तर पर पीने योग्य पाइप का पानी। (स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2020–21, पृष्ठ 357) |
| अटल भूजल योजना (अटल जल) | 7 राज्य — गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। 80 ज़िलों के 229 प्रशासनिक ब्लॉकों के 8220 जल की कमी वाले ग्राम पंचायतों में। यह चुने गए राज्यों के जल की कमी (अति-दोहित, गंभीर और अर्ध-गंभीर) वाले ब्लॉकों का लगभग 37 प्रतिशत है। प्रमुख पहलू — जनता के व्यवहार में परिवर्तन लाना। |
| प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना | खेत में पानी की वास्तविक उपलब्धता बढ़ाना; सुनिश्चित सिंचाई (हर खेत को पानी) के तहत बुवाई योग्य क्षेत्र का विस्तार; अपव्यय कम करना और पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार; जल बचत प्रौद्योगिकियाँ (प्रति बूंद अधिक फसल) और सतत जल संरक्षण प्रणालियाँ अपनाना। |
★राजस्थान अटल भूजल योजना के सात राज्यों में है — RBSE के लिए यह ज़रूर लिखिए। ★‘प्रति बूंद अधिक फसल’ — यह नारा सीधे पूछा जाता है।
भाग 4 — बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाएँ
प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ★
| समय | कहाँ | क्या |
|---|---|---|
| ईसा से एक शताब्दी पहले | इलाहाबाद के नज़दीक श्रिंगवेरा | गंगा की बाढ़ के जल को संरक्षित करने के लिए उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र |
| चन्द्रगुप्त मौर्य के समय | — | बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण |
| — | कलिंग (ओडिशा), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश), बेन्नूर (कर्नाटक), कोल्हापुर (महाराष्ट्र) | उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र के सबूत |
| 11वीं शताब्दी | भोपाल झील | अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक |
| 14वीं शताब्दी | दिल्ली, सिरी फोर्ट क्षेत्र | इल्तुतमिश ने हौज़ खास बनवाया |
स्रोत — डाईंग विज़डम, सी एस ई, 1997
बाँध की परिभाषा (शब्दश:)★★
“बाँध बहते जल को रोकने, दिशा देने या बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय, झील अथवा जलभरण बनाती हैं।” ★“बाँध का अर्थ जलाशय से लिया जाता है न कि इसके ढाँचे से।”
वर्गीकरण —
| आधार | प्रकार |
|---|---|
| संरचना और प्रयुक्त पदार्थ | लकड़ी के बाँध · तटबंध बाँध · पक्का बाँध |
| ऊँचाई | बड़े और मुख्य बाँध · नीचे बाँध · मध्यम बाँध · उच्च बाँध |
बहुउद्देशीय परियोजना के आठ उद्देश्य★★
| # | उद्देश्य | # | उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| 1 | सिंचाई | 5 | बाढ़ नियंत्रण |
| 2 | विद्युत उत्पादन | 6 | मनोरंजन |
| 3 | घरेलू और औद्योगिक उपयोग | 7 | आंतरिक नौचालन |
| 4 | जल आपूर्ति | 8 | मछली पालन |
“इसलिए बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कहा जाता है जहाँ एकत्रित जल के अनेकों उपयोग समन्वित होते हैं।”
दो उदाहरण★
| परियोजना | बेसिन | किन कामों के लिए |
|---|---|---|
| भाखड़ा-नांगल | सतलुज-ब्यास | जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई |
| हीराकुड | महानदी | जलसंरक्षण और बाढ़ नियंत्रण |
नेहरू का कथन★★
“जवाहरलाल नेहरू गर्व से बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा करते थे।”
- “उनका मानना था कि इन परियोजनाओं के चलते कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण और नगरीय अर्थव्यवस्था समन्वित रूप से विकास करेगी।”
दामोदर — ‘शोक की नदी’
- भादु लोकगीत दामोदर घाटी क्षेत्र में गाया जाता है और ‘शोक की नदी’ कही जाने वाली दामोदर में बाढ़ की समस्याओं का वर्णन करता है।
भाग 5 — बहुउद्देशीय परियोजनाओं की आलोचना
पारिस्थितिक आलोचनाएँ★★
| # | आलोचना |
|---|---|
| 1 | बाँध बनाने से नदी का प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध होता है, जिससे तलछट बहाव कम हो जाता है |
| 2 | अत्यधिक तलछट जलाशय की तली पर जमा होता है → नदी का तल अधिक चट्टानी → जलीय जीव-आवासों में भोजन की कमी |
| 3 | बाँध नदियों को टुकड़ों में बाँट देते हैं → अंडे देने की ऋतु में जलीय जीवों का स्थानांतरण अवरुद्ध |
| 4 | बाढ़ के मैदान के जलाशयों में वनस्पति और मिट्टियाँ डूब जाती हैं जो कालांतर में अपघटित हो जाती हैं |
सामाजिक और कृषि-संबंधी आलोचनाएँ★
- सिंचाई ने फसल प्रारूप परिवर्तित कर दिया — किसान जलगहन और वाणिज्य फसलों की ओर आकर्षित हुए।
- इससे मृदाओं के लवणीकरण जैसे गंभीर पारिस्थितिकीय परिणाम हो सकते हैं।
- बहुउद्देशीय योजनाओं से भूकंप आने की संभावना बढ़ जाती है।
- अत्यधिक जल के उपयोग से जल-जनित बीमारियाँ, फसलों में कीटाणु-जनित बीमारियाँ और प्रदूषण फैलते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना — यह वाक्य हर उत्तर में लिखिए★★
“नदी परियोजनाओं पर उठी अधिकतर आपत्तियाँ उनके उद्देश्यों में विफल हो जाने पर हैं।” ★★“यह एक विडंबना ही है कि जो बाँध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं उनके जलाशयों में तलछट जमा होने से वे बाढ़ आने के कारण बन जाते हैं।” “अत्यधिक वर्षा होने की दशा में तो बड़े बाँध भी कई बार बाढ़ नियंत्रण में असफल रहते हैं।”
और तलछट का दोहरा नुक़सान —
- तलछट जो एक प्राकृतिक उर्वरक है, बाढ़ के मैदानों तक नहीं पहुँचती, जिससे भूमि निम्नीकरण की समस्याएँ बढ़ती हैं।
सरदार सरोवर परियोजना — राजस्थान के लिए अनिवार्य★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | गुजरात में नर्मदा नदी पर |
| कितने राज्य | चार — महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान |
| उद्देश्य | सूखा ग्रस्त तथा मरुस्थलीय भागों की जल आवश्यकता पूरी करना |
| गुजरात | 15 ज़िलों के 3112 गाँवों की 18.45 लाख हेक्टेयर को सिंचाई |
| राजस्थान | बाड़मेर और जालौर के 2,46,000 हेक्टेयर की सिंचाई |
| महाराष्ट्र | लिफ्ट के माध्यम से 37,500 हेक्टेयर |
| सूखा प्रवण | गुजरात में लगभग 75 प्रतिशत कमांड क्षेत्र; राजस्थान में संपूर्ण कमांड क्षेत्र |
कृष्णा-गोदावरी विवाद★
- शुरुआत — महाराष्ट्र सरकार द्वारा कोयना पर जल विद्युत परियोजना के लिए बाँध बनाकर जल की दिशा परिवर्तन करने से।
- आपत्ति — कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सरकारों ने जताई।
- तर्क — इससे नदी के निचले हिस्सों में जल प्रवाह कम हो जाएगा और कृषि तथा उद्योग पर विपरीत असर पड़ेगा।
भाग 6 — वर्षा जल संग्रहण
क्यों?
“बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अलाभप्रद असर और उन पर उठे विवादों के चलते वर्षाजल संग्रहण तंत्र इनके सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प हो सकते हैं।”
- प्राचीन भारत में लोगों को वर्षा पद्धति और मृदा के गुणों का गहरा ज्ञान था और उन्होंने स्थानीय पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के अनुसार अनेक तरीके विकसित किए थे।
पारंपरिक तरीक़ों की तालिका (सबसे ज़्यादा पूछी जाती है)★★
| तरीक़ा | कहाँ | क्या करता था |
|---|---|---|
| गुल / कुल | पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र (पश्चिमी हिमालय) | वाहिकाएँ जो नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों में सिंचाई के लिए बनाई जाती थीं |
| छत वर्षा जल संग्रहण | पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान | पीने का जल एकत्रित करना |
| बाढ़ जल वाहिकाएँ | पश्चिम बंगाल | बाढ़ के मैदान में खेतों की सिंचाई |
| खादीन | राजस्थान का जैसलमेर ज़िला | वर्षा जल एकत्रित करने के गड्ढे |
| जोहड़ | अन्य शुष्क/अर्धशुष्क क्षेत्र | वर्षा जल एकत्रित करने के गड्ढे |
एक पंक्ति में — पहाड़ = गुल/कुल · राजस्थान = छत संग्रहण और खादीन · बंगाल = बाढ़ जल वाहिकाएँ · अन्य = जोहड़।
टाँका — यह अभ्यास प्रश्न 3(i) का पूरा उत्तर है★★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहाँ | राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्र, विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर |
| क्या है | पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक |
| आकार | एक बड़े कमरे जितना; फलोदी में एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लंबा और 2.44 मीटर चौड़ा |
| कहाँ बनता था | मुख्य घर या आँगन में; घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़ा |
| ★सबसे ख़ास बात | वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ़ करने में प्रयोग होता था और उसे संग्रहित नहीं किया जाता था; इसके बाद की वर्षा का जल संग्रह होता था |
| कब तक टिकता | अगली वर्षा ऋतु तक; इससे ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल मिलता रहता था |
| अतिरिक्त लाभ | कुछ घरों में टाँकों के साथ भूमिगत कमरे भी बनाए जाते थे, क्योंकि यह जल-स्रोत उन्हें ठंडा रखता था |
पालर पानी★
“वर्षाजल अथवा ‘पालर पानी’ जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है।”
आज की स्थिति — यह अभ्यास प्रश्न 1(iii)-ग है★
“यह दुख की बात है कि आज पश्चिमी राजस्थान में छत वर्षाजल संग्रहण की रीति इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण कम होती जा रही है।” “हालाँकि कुछ घरों में टाँकों की सुविधा अभी भी है क्योंकि उन्हें नल के पानी का स्वाद पसंद नहीं है।”
छत वर्षाजल संग्रहण की छह-चरणीय प्रक्रिया (चित्र 3.4)★
| क्रम | चरण |
|---|---|
| 1 | पी.वी.सी. पाइप से छत का वर्षाजल एकत्रित किया जाता है |
| 2 | रेत और ईंट से जल का छनन (filter) होता है |
| 3 | भूमिगत पाइप से जल हौज़ तक जाता है, जहाँ से तुरंत प्रयोग हो सकता है |
| 4 | हौज़ से अतिरिक्त जल कुएँ तक ले जाया जाता है |
| 5 | कुएँ का जल भूमिगत जल का पुनर्भरण करता है |
| 6 | बाद में इस जल का उपयोग किया जा सकता है |
तीन आधुनिक उदाहरण★
| कहाँ | विवरण |
|---|---|
| शिलांग (मेघालय की राजधानी) | चेरापूँजी और मॉसिनराम — जहाँ विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है — केवल 55 किलोमीटर दूर, फिर भी शहर पीने के जल की गंभीर समस्या झेलता है। लगभग हर घर में छत वर्षा जल संग्रहण है, जिससे घरेलू माँग के लगभग 15–25 प्रतिशत हिस्से की पूर्ति होती है। |
| गंडाथूर (मैसूर ज़िला, कर्नाटक) | लगभग 200 घरों में छत वर्षाजल संग्रहण; ‘वर्षा जल संपन्न गाँव’ की ख्याति; वार्षिक वर्षा लगभग 1,000 मिलीमीटर; 10 भराई के साथ 80 प्रतिशत संग्रहण दक्षता; हर घर लगभग 50,000 लीटर और 200 घरों द्वारा हर वर्ष लगभग 10,00,000 लीटर जल एकत्रित। |
| तमिलनाडु | वह राज्य जहाँ पूरे राज्य में हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण ढाँचों का बनाना आवश्यक कर दिया गया है; दोषी व्यक्तियों पर क़ानूनी कार्यवाही हो सकती है। |
बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली (मेघालय)★
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कितनी पुरानी | 200 वर्ष |
| क्या | नदियों व झरनों के जल को बाँस के पाइपों द्वारा एकत्रित करके ले जाना |
| कितना पानी | लगभग 18 से 20 लीटर |
| कितनी दूर | सैकड़ों मीटर |
| अंत में | बहाव 20 से 80 बूँद प्रति मिनट तक घटाकर पौधे की जड़ों के निकट छोड़ा जाता है |
| कैसे चलता है | गुरुत्वाकर्षण द्वारा — पहाड़ी शिखरों से जल निचले स्थानों तक |
★यह सबसे शानदार तथ्य है — 200 साल पहले, बिना बिजली और बिना प्लास्टिक के, सिर्फ़ बाँस और गुरुत्वाकर्षण से ड्रिप सिंचाई।
अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े
1. सिर्फ़ छह आँकड़े अनिवार्य
| आँकड़ा | किससे जुड़ा |
|---|---|
| 25 सेमी. बनाम 114 सेमी. | इज़राइल बनाम भारत |
| 55 लीटर | जल जीवन मिशन का प्रति व्यक्ति सेवा स्तर |
| 6.1 × 4.27 × 2.44 मीटर | फलोदी के एक घर का टाँका |
| 55 किलोमीटर | शिलांग से चेरापूँजी-मॉसिनराम की दूरी |
| 200 वर्ष | मेघालय की बाँस ड्रिप सिंचाई |
| 20 करोड़ | 2025 में जल की नितांत कमी झेलने वाले लोग |
2. दो जोड़ियाँ — बाँध और बेसिन
भाखड़ा-नांगल = सतलुज-ब्यास · हीराकुड = महानदी
3. राजस्थान के तीन बाँध
राणा प्रताप सागर · गांधी सागर · कोटा बैराज — तीनों चंबल नदी पर
4. पाँच पारंपरिक तरीक़े
गुल/कुल · खादीन · जोहड़ · टाँका · बाँस ड्रिप
5. तीन योजनाएँ, तीन नारे
जल जीवन मिशन = 55 लीटर · अटल जल = व्यवहार में परिवर्तन · PMKSY = प्रति बूंद अधिक फसल
6. राजस्थान इस अध्याय में दस बार आता है★
| कहाँ | क्या |
|---|---|
| जल दुर्लभता की भूमिका | मरुस्थल और पनिहारिनों का चित्र |
| अटल भूजल योजना | सात राज्यों में राजस्थान भी |
| सरदार सरोवर | बाड़मेर और जालौर के 2,46,000 हेक्टेयर; संपूर्ण कमांड क्षेत्र सूखा प्रवण |
| मानचित्र | राणा प्रताप सागर, गांधी सागर, कोटा बैराज |
| छत वर्षा जल संग्रहण | पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान |
| खादीन | जैसलमेर ज़िला |
| टाँका | बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर |
| पालर पानी | राजस्थान में वर्षाजल का नाम |
| इंदिरा गांधी नहर | जिससे टाँकों की रीति कम हो रही है |
| अभ्यास प्रश्न 3-i | पूरा प्रश्न ही राजस्थान पर है |
RBSE की परीक्षा में ये सब पूछे जाते हैं। इन्हें अलग से याद कीजिए।
7. और अगर सब भूल जाएँ, तो यह याद रखिए
“जल जीवन दे भी सकता है और ले भी सकता है।” और वह विडंबना — “जो बाँध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं, तलछट जमा होने से वे ही बाढ़ का कारण बन जाते हैं।” और सबसे बड़ी सीख — इज़राइल में 25 सेमी. वर्षा में भी पानी है, भारत में 114 सेमी. में भी सूखा। यानी कमी पानी की नहीं, प्रबंधन की है।