Chapter 1संसाधन एवं विकास

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कक्षा 10 · समकालीन भारत–2 (भूगोल) · पृष्ठ 1–12 (परीक्षा से पहले पढ़ने के लिए — केवल काम की बातें, पूरे वाक्यों में)


पहले पूरी कहानी एक पैराग्राफ़ में

पर्यावरण में उपलब्ध हर वह वस्तु संसाधन है जो हमारी आवश्यकता पूरी कर सके, जिसे बनाने की प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य हो। संसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, बल्कि मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं। इनका वर्गीकरण चार आधारों पर होता है — उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व और विकास का स्तर। मानव ने संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग किया, जिससे संसाधनों का ह्रास हुआ, समाज अमीर-गरीब में बँटा और वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हुआ। इसका हल सतत् पोषणीय विकास है, जिसकी संकल्पना 1987 की ब्रुन्ड्टलैंड रिपोर्ट ने दी और जिसे 1992 के रियो सम्मेलन ने एजेंडा 21 के रूप में स्वीकार किया। भारत में संसाधनों की विविधता के कारण संसाधन नियोजन ज़रूरी है, जिसके तीन सोपान हैं। भूमि हमारा सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है — 43 प्रतिशत मैदान, 30 प्रतिशत पर्वत और 27 प्रतिशत पठार। कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है और वन क्षेत्र 33 प्रतिशत के लक्ष्य से काफ़ी कम है। भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है, जिसके मुख्य कारण खनन, अति पशुचारण और अधिक सिंचाई हैं। मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य संसाधन है और भारत में इसके छह प्रकार हैं — जलोढ़, काली, लाल-पीली, लेटराइट, मरुस्थली और वन मृदा। मृदा अपरदन रोकने के लिए समोच्च जुताई, सोपान कृषि, पट्टी कृषि और रक्षक मेखला अपनाई जाती है।

यही पूरा अध्याय है। अब इसे भागों में देखिए।

भाग 1 — संसाधन की परिभाषा

परिभाषा (शब्दश: याद कीजिए)★★

“हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक ‘संसाधन’ है।”

चार शर्तें —

#शर्त
1आवश्यकता पूरी करे
2प्रौद्योगिकी उपलब्ध हो
3आर्थिक रूप से संभाव्य हो
4सांस्कृतिक रूप से मान्य हो

अध्याय का सबसे बड़ा वाक्य★★

“क्या आप भी अन्य बहुत से लोगों की तरह संसाधनों को प्राकृतिक उपहार समझते हैं? ऐसा नहीं है। संसाधन मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।”

  • “मानव स्वयं संसाधनों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें प्रयोग करते हैं।”

चित्र 1.1 — तीन कोनों वाला त्रिकोण

“वस्तुओं की रूपांतरण प्रक्रिया प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के पारस्परिक क्रियात्मक संबंध में निहित है।”

कोनाउदाहरण
भौतिक पर्यावरण (प्रकृति)कोयला, पानी, मिट्टी, धूप
प्रौद्योगिकीखदान की मशीन, बाँध, सोलर पैनल
संस्थाएँसरकार, पंचायत, क़ानून

भाग 2 — संसाधनों का वर्गीकरण (सबसे पक्का प्रश्न)

चार आधार — याद रखने का सूत्र: “उ-स-स्वा-वि”★★

आधारप्रकार
(क) उत्पत्तिजैव और अजैव
(ख) समाप्यतानवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य
(ग) स्वामित्वव्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
(घ) विकास का स्तरसंभावी, विकसित, भंडार और संचित कोष

चित्र 1.2 — पूरा वर्गीकरण एक तालिका में★

मुख्य वर्गउपवर्गआगे का उपवर्गउदाहरण
प्राकृतिकनवीकरण योग्यसतत् अथवा प्रवाहपवन, जल
प्राकृतिकनवीकरण योग्यजैवप्राकृतिक वनस्पति (वन), वन्य जीव
प्राकृतिकअनवीकरण योग्यपुन: चक्रीयधातु
प्राकृतिकअनवीकरण योग्यअचक्रीयजीवाश्म ईंधन
मानवीयसंरचनाएँ एवं संस्थाएँ—शिक्षा-व्यवस्था, सरकार
मानवीयमात्रा एवं गुणवत्ता—जनसंख्या, कौशल

★‘पुन: चक्रीय’ बनाम ‘अचक्रीय’ — धातु गलाकर दोबारा बनती है; पेट्रोल एक बार जला तो ख़त्म।

(क) उत्पत्ति के आधार पर

प्रकारअर्थउदाहरण
जैवजिनकी उत्पत्ति जीवमंडल से होती है, यानी जिनमें जीवन है।मनुष्य, वनस्पति जगत, प्राणी जगत, मत्स्य जीवन, पशुधन
अजैववे सभी वस्तुएँ जो निर्जीव पदार्थों से बनी हैं।चट्टानें और धातुएँ

(ख) समाप्यता के आधार पर

प्रकारअर्थउदाहरण
नवीकरण योग्यजिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा उत्पन्न किया जा सकता है।सौर और पवन ऊर्जा, जल, वन और वन्य जीवन
अनवीकरण योग्यजिनका विकास एक लंबे भूगर्भीय अंतराल में होता है, इसलिए वे एक बार समाप्त होने पर दोबारा नहीं बनते।खनिज और जीवाश्म ईंधन

(ग) स्वामित्व के आधार पर

प्रकारअर्थ
व्यक्तिगतजिन पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार होता है — जैसे किसान का अपना खेत, कुआँ या घर।
सामुदायिकजो समुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध हों — जैसे गाँव की चरागाह, तालाब, और शहरों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल तथा खेल के मैदान।
राष्ट्रीयदेश की सीमा के भीतर के सभी संसाधन, जिनमें तट रेखा से 12 समुद्री मील तक का महासागरीय क्षेत्र भी शामिल है।
अंतर्राष्ट्रीयजिनका नियमन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ करती हैं — तट रेखा से 200 समुद्री मील से परे खुले महासागरीय संसाधन।

(घ) विकास के स्तर के आधार पर★

प्रकारअर्थउदाहरण
संभावीकिसी प्रदेश में मौजूद, पर अभी उपयोग नहीं हुआ।राजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा।
विकसितसर्वेक्षण हो चुका, मात्रा-गुणवत्ता तय हो चुकी, उपयोग शुरू है।कोयले और लोहे की चालू खदानें।
भंडारआवश्यकता पूरी कर सकते हैं, पर उपयुक्त प्रौद्योगिकी नहीं है।पानी में मौजूद हाइड्रोजन।
संचित कोषउपलब्ध तकनीक से इस्तेमाल हो सकते हैं, पर अभी उपयोग शुरू नहीं हुआ।बाँधों में जमा जल, जिससे भविष्य में विद्युत बनेगी।

★★भंडार बनाम संचित कोष — एक वाक्य में: “भंडार में तकनीक नहीं है; संचित कोष में तकनीक है, पर इस्तेमाल नहीं किया।”

भाग 3 — संसाधनों का विकास

अंधाधुंध उपयोग की तीन समस्याएँ★

#समस्या
1कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास हुआ है।
2संसाधन कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए, जिससे समाज संसाधन संपन्न और संसाधनहीन — यानी अमीर और गरीब — में बँट गया।
3वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हुआ — भूमंडलीय तापन, ओज़ोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण।

तीन शब्दों में — ह्रास · बँटवारा · पारिस्थितिकी संकट।

और इसका हल —

  • “मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व शांति बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बँटवारा आवश्यक हो गया है।”
  • “यदि कुछ ही व्यक्तियों तथा देशों द्वारा संसाधनों का वर्तमान दोहन जारी रहता है, तो हमारी पृथ्वी का भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है।”
  • ★“सतत् अस्तित्व सही अर्थ में सतत् पोषणीय विकास का ही एक हिस्सा है।”

सतत् पोषणीय विकास (परिभाषा शब्दश:)★★

“सतत् पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।”

हिस्साअर्थ
1विकास से पर्यावरण को नुक़सान न पहुँचे।
2आज का विकास भविष्य की पीढ़ियों की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ न करे।

रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992★

बिंदुविवरण
कब और कहाँजून 1992, ब्राज़ील के शहर रियो डी जेनेरो में
कौन आए100 से भी अधिक राष्ट्राध्यक्ष
कौन-सा सम्मेलनप्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन
क्योंपर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की समस्याओं का हल ढूँढ़ने के लिए
किस पर हस्ताक्षरभूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता पर घोषणा पत्र
और क्याभूमंडलीय वन सिद्धांतों (Forest Principles) पर सहमति
सबसे बड़ा परिणाम21वीं शताब्दी के सतत् पोषणीय विकास के लिए एजेंडा 21 को स्वीकृति

एजेंडा 21★

  • 1992 में रियो डी जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वाधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकृत घोषणा।
  • उद्देश्य — भूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास हासिल करना।
  • यह एक कार्यसूची है जिसका उद्देश्य समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मिलित ज़िम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग द्वारा पर्यावरणीय क्षति, ग़रीबी और रोगों से निपटना है।
  • ★मुख्य उद्देश्य — “प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करे।”

भाग 4 — संसाधन नियोजन

चार प्रादेशिक उदाहरण (यह तालिका परीक्षा में सीधे आती है)★★

प्रदेशप्रचुरताकमी
झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार—
अरुणाचल प्रदेशजल संसाधन प्रचुर मात्रा मेंमूल विकास की कमी
राजस्थानपवन और सौर ऊर्जा की बहुतायतजल संसाधनों की कमी
लद्दाखसांस्कृतिक विरासत का धनीजल, आधारभूत अवसंरचना और कुछ महत्त्वपूर्ण खनिजों की कमी; शीत मरुस्थल होने से अलग-थलग

★राजस्थान वाली पंक्ति RBSE में लगभग हर साल आती है — इसे शब्दश: याद कीजिए।

निष्कर्ष —

“इसलिए राष्ट्रीय, प्रांतीय, प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता है।”

भारत में संसाधन नियोजन के तीन सोपान★★

सोपानक्या करना होता है
(क) पहचानदेश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना — इसमें क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन शामिल है।
(ख) प्रौद्योगिकीसंसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।
(ग) समन्वयसंसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना।
  • “स्वाधीनता के बाद भारत में संसाधन नियोजन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास किए गए।”

सिर्फ़ संसाधन होने से विकास नहीं होता★★

  • “किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है।”
  • “परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में तदनुरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है।”
  • “देश में बहुत से क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी आर्थिक रूप से विकसित हैं।”

उपनिवेशवाद का उदाहरण —

  • “उपनिवेशों में संसाधन संपन्न प्रदेश, विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे हैं।”
  • “उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।”

निष्कर्ष —

“संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ।” “भारत में विकास… संसाधनों की उपलब्धता पर ही आधारित नहीं था, बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है।”

भाग 5 — संसाधनों का संरक्षण

गांधी जी का कथन★★

“हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं।” “अर्थात् हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”

  • उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधन ह्रास के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृत्ति ज़िम्मेदार है।
  • “वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे।”

संरक्षण की कालरेखा (हर साल पूछी जाती है)★★

वर्षघटना
1968अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीक़े से संसाधन संरक्षण की वकालत क्लब ऑफ़ रोम ने की।
1974शुमेसर ने अपनी पुस्तक स्माल इज़ ब्यूटीफुल में गांधी जी के दर्शन की पुनरावृत्ति की।
1987ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास की संकल्पना प्रस्तुत की; यह रिपोर्ट बाद में हमारा साझा भविष्य (Our Common Future) नाम से प्रकाशित हुई।
1992रियो डी जेनेरो, ब्राज़ील में पृथ्वी सम्मेलन।

★याद रखने का सूत्र — 68 रोम · 74 शुमेसर · 87 ब्रुन्ड्टलैंड · 92 रियो। ! सावधानी — ‘सतत् पोषणीय विकास’ शब्द 1987 की ब्रुन्ड्टलैंड रिपोर्ट से आया, 1992 के रियो सम्मेलन से नहीं। यह अंतर परीक्षा में अकसर उलझाता है।

भाग 6 — भू-संसाधन

चित्र 1.3 के तीन आँकड़े (सबसे पक्का 1-अंक का प्रश्न)★★

भू-आकृतिप्रतिशतविशेषता
मैदानलगभग 43%कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक
पर्वत30%बारहमासी नदियों का प्रवाह सुनिश्चित करते हैं, पर्यटन विकास के लिए अनुकूल, पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण
पठारलगभग 27%खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष

43 – 30 – 27 → जोड़ पर 100। इसी तरह याद कीजिए।

भू-उपयोग की पाँच श्रेणियाँ★

#श्रेणीउपश्रेणियाँ
1वन—
2कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि(अ) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि · (ब) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि (इमारतें, सड़क, उद्योग)
3परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि(अ) स्थायी चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि · (ब) विविध वृक्षों, वृक्ष फ़सलों तथा उपवनों के अधीन भूमि · (स) कृषि योग्य बंजर भूमि (5 से अधिक वर्षों से खेती न हुई हो)
4परती भूमि(अ) वर्तमान परती (1 कृषि वर्ष या कम) · (ब) पुरातन परती (1 से 5 कृषि वर्ष)
5शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्रवह भूमि जिस पर फ़सलें उगाई व काटी जाती हैं
  • ★“एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है।”

★★तीन ‘परती’ का फ़र्क़ पक्का कीजिए — वर्तमान परती = 1 वर्ष या कम · पुरातन परती = 1 से 5 वर्ष · कृषि योग्य बंजर = 5 वर्ष से ज़्यादा।

भाग 7 — भारत में भू-उपयोग प्रारूप

भू-उपयोग तय करने वाले तत्त्व

प्रकारतत्त्व
भौतिक कारकभू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार
मानवीय कारकजनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परंपराएँ

क्षेत्रफल और आँकड़ों की सीमा★★

तथ्यविवरण
कुल भौगोलिक क्षेत्रफल32.8 लाख वर्ग किमी.
आँकड़े उपलब्धकेवल 93 प्रतिशत भाग के
कारण 1पूर्वोत्तर प्रांतों में असम को छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र की जानकारी उपलब्ध नहीं
कारण 2जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों का सर्वेक्षण नहीं हुआ

चित्र 1.4 — दोनों वर्षों की तुलना★★

भू-उपयोग संवर्ग1960–612014–15
वन18.11%23.3%
बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि12.01%5.5%
गैर-कृषि प्रयोजनों के अंतर्गत क्षेत्र4.95%8.7%
स्थायी चारागाहें तथा अन्य गोचर भूमि4.71%3.3%
विविध वृक्षों, वृक्ष फ़सलों तथा उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र1.50%1%
कृषि योग्य बंजर भूमि6.23%4.0%
पुरातन परती3.50%3.6%
वर्तमान परती3.73%4.9%
शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र45.26%45.5%

★★इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं (यही अभ्यास प्रश्न 3-i है) — 1. शुद्ध बोया गया क्षेत्र 54 साल में लगभग नहीं बढ़ा (45.26% → 45.5%)। 2. वन क्षेत्र बढ़ा तो पर बहुत धीरे (18.11% → 23.3%), जबकि लक्ष्य 33% है। 3. गैर-कृषि प्रयोजनों की भूमि लगभग दोगुनी हो गई (4.95% → 8.7%) — यही बताता है कि बस्तियाँ, सड़कें और उद्योग बढ़े।

खेती से जुड़े तीन ज़रूरी आँकड़े★

तथ्यआँकड़ा
कुल सूचित क्षेत्र का वह हिस्सा जिस पर अधिकतम खेती हो सकती हैलगभग 54 प्रतिशत
पंजाब और हरियाणा में शुद्ध बोया गया क्षेत्र80 प्रतिशत
अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार में10 प्रतिशत से भी कम

इन राज्यों में क्षेत्र कम क्यों है? — क्योंकि यहाँ पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्र अधिक है, ढाल तीव्र है और मिट्टी की परत पतली है।

राष्ट्रीय वन नीति (1952)★

  • इसके द्वारा वनों के अंतर्गत 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वांछित है, जिसकी तुलना में वास्तविक वन क्षेत्र काफ़ी कम है।
  • “वन नीति द्वारा निर्धारित यह सीमा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।”
  • “वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर करती है।”

भाग 8 — भूमि निम्नीकरण और संरक्षण

आँकड़े★

तथ्यआँकड़ा
मूल आवश्यकताओं (भोजन, मकान, कपड़ा) का वह भाग जो भूमि से मिलता है95 प्रतिशत
भारत में निम्नीकृत भूमिलगभग 13 करोड़ हेक्टेयर
वनों के अंतर्गत अपरदितलगभग 28 प्रतिशत
जल अपरदित56 प्रतिशत
शेषलवणीय और क्षारीय

राज्यवार कारण (यह तालिका बहुत पूछी जाती है)★★

कारणराज्यकैसे
खननझारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उड़ीसाखनन के बाद खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है; खनन से वनोन्मूलन भी होता है।
अति पशुचारणगुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्रज़रूरत से ज़्यादा पशु चराने से वनस्पति ख़त्म होती है और मिट्टी नंगी हो जाती है।
अधिक सिंचाईपंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेशअति सिंचन से जलाक्रांतता पैदा होती है, जिससे मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है।
खनिज प्रक्रियाएँ—सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर पीसना और मृदा बर्तन उद्योग में खड़िया मृदा तथा सेलखड़ी के प्रयोग से वायुमंडल में धूल विसर्जित होती है; परत जमने से मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है।
औद्योगिक जल निकास—इससे बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।

! सावधानी — मध्य प्रदेश दो सूचियों में है (खनन और अति पशुचारण), और राजस्थान अति पशुचारण वाली सूची में है। RBSE में यही उलझाया जाता है।

भूमि निम्नीकरण के सात उपाय★

#उपाय
1वनारोपण
2चरागाहों का उचित प्रबंधन
3पेड़ों की रक्षक मेखला (shelter belt) लगाना
4पशुचारण नियंत्रण
5रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाना
6बंजर भूमि का उचित प्रबंधन और खनन नियंत्रण
7औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात् विसर्जित करना

भाग 9 — मृदा संसाधन

परिभाषा★★

“मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है जो पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करती है।”

  • “मृदा एक जीवंत तंत्र है।”
  • ★“कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।”

मृदा बनने के पाँच कारक★

#कारक
1उच्चावच
2जनक शैल अथवा संस्तर शैल
3जलवायु
4वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ
5समय

और ये प्राकृतिक तत्त्व भी योगदान देते हैं — तापमान परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन क्रियाएँ।

  • “मृदा जैव (ह्यूमस) और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है।”

चित्र 1.5 — मृदा परिच्छेदिका की चार परतें (ऊपर से नीचे)

#परत
1ऊपरी संस्तर की मृदा
2उप-मृदा — अपक्षयित चट्टानें: बालू, गाद (सिल्ट) व मृत्तिका
3अध:स्तरीय अपक्षयित आधारी चट्टानें
4अपक्षय रहित आधारी चट्टानें

भाग 10 — मृदाओं का वर्गीकरण (सबसे बड़ा भाग)

क्रम याद कीजिए — जलोढ़ · काली · लाल-पीली · लेटराइट · मरुस्थली · वन

1. जलोढ़ मृदा★★

बिंदुविवरण
महत्त्वसबसे विस्तृत और देश की सबसे महत्त्वपूर्ण मृदा; संपूर्ण उत्तरी मैदान इसी से बना है।
किन नदियों सेहिमालय के तीन नदी तंत्रों — सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र — के निक्षेपों से।
और कहाँएक सँकरे गलियारे से राजस्थान और गुजरात तक; तथा महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के पूर्वी तटीय डेल्टे।
किन कणों सेरेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात।
कणों का आकारनदी के मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर जाते हुए कणों का आकार बढ़ता है; ऊपरी भाग में मोटे कण वाली मृदाएँ द्वार, ‘चो’ क्षेत्र और तराई में मिलती हैं।
पोषक तत्त्वपोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त।
फ़सलेंगन्ना, चावल, गेहूँ, अन्य अनाज और दलहन।
अन्यगहन कृषि होती है और जनसंख्या घनत्व भी अधिक है; सूखे क्षेत्रों की मृदाएँ अधिक क्षारीय होती हैं।

★आयु के आधार पर दो प्रकार —

प्रकारअर्थविशेषता
बांगरपुराना जलोढ़‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा ज़्यादा
खादरनया जलोढ़बांगर की तुलना में ज़्यादा महीन कण

2. काली मृदा★★

बिंदुविवरण
दूसरे नामरेगर मृदा और काली कपास मृदा
किससे बनीलावा जनक शैलों से; बहुत महीन कणों यानी मृत्तिका से
कहाँदक्कन पठार (बेसाल्ट) के उत्तर-पश्चिमी भाग — महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर; दक्षिण-पूर्व में गोदावरी और कृष्णा की घाटियों तक
सबसे बड़ा गुणनमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक
किससे परिपूर्णकैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूना
किसकी कमीफास्फोरस
मुख्य फ़सलकपास

★काली मृदा की अनोखी विशेषता —

  • “गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे इनमें अच्छी तरह वायु मिश्रण हो जाता है।”
  • “गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती हैं और इनको जोतना मुश्किल होता है।”
  • “इसलिए, इसकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही शुरू कर दी जाती है।”

3. लाल और पीली मृदा★

बिंदुविवरण
कहाँदक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर, कम वर्षा वाले भागों में
राज्यओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर, और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर
लाल रंग क्योंरवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार के कारण
पीला रंग क्योंजलयोजन के कारण

दो शब्दों में — लाल = लोहा · पीली = जलयोजन।

4. लेटराइट मृदा★

बिंदुविवरण
नाम का अर्थग्रीक शब्द लेटर (Later) से, जिसका अर्थ है ईंट
कैसे बनीउष्णकटिबंधीय तथा उपोषण कटिबंधीय जलवायु में आर्द्र और शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने से
किसका परिणामभारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching)
गुणअधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH<6.0); पोषक तत्त्वों की कमी
कहाँदक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ भाग तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेश
ह्यूमसपर्णपाती-सदाबहार वन क्षेत्रों में पर्याप्त; विरल वनस्पति और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में कम
फ़सलेंकर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफ़ी; तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लेटराइट मृदाएँ काजू के लिए

5. मरुस्थली मृदा★

बिंदुविवरण
रंगलाल और भूरा
गुणरेतीली और लवणीय
नमककुछ क्षेत्रों में इतना अधिक कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक बनाया जाता है
क्यों ऐसीशुष्क जलवायु और उच्च तापमान से वाष्पीकरण दर अधिक; ह्यूमस और नमी कम
नीचे क्याकैल्शियम बढ़ता जाता है और नीचे की परतों में चूने के कंकर की सतह; इससे जल अंत:स्यंदन (infiltration) अवरुद्ध हो जाता है
हल“सही तरीक़े से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है, जैसा कि पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है।”

6. वन मृदा★

बिंदुविवरण
कहाँपहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं
नदी घाटियों मेंदोमट और सिल्टदार
ऊपरी ढालों परमोटे कणों वाली
हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों मेंअधिक अपरदन; अधिसिलिक (acidic) तथा ह्यूमस रहित
कहाँ उपजाऊनदी घाटियों के निचले क्षेत्रों में, विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों में

छहों मृदाओं की एक तालिका (आख़िरी दिन के लिए)★★

मृदाकहाँविशेषता / फ़सल
जलोढ़संपूर्ण उत्तरी मैदान; राजस्थान-गुजरात तक; पूर्वी तटीय डेल्टेसबसे उपजाऊ; गन्ना, चावल, गेहूँ, दलहन
कालीदक्कन पठार का उत्तर-पश्चिम; महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, म.प्र., छत्तीसगढ़नमी धारण क्षमता सबसे अधिक; कपास
लाल और पीलीदक्कन पठार का पूर्वी-दक्षिणी हिस्सा; ओडिशा, छत्तीसगढ़, प. घाट का पहाड़ी पदलोहे से लाल, जलयोजन से पीली
लेटराइटदक्षिणी राज्य, प. घाट (महाराष्ट्र), ओडिशा, प. बंगाल, उत्तर-पूर्वी प्रदेशनिक्षालन से बनी; चाय, कॉफ़ी, काजू
मरुस्थलीपश्चिमी राजस्थानरेतीली-लवणीय; सिंचाई से उपजाऊ
वनपहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र, हिमालयनदी घाटी में दोमट; ऊपरी ढाल पर मोटे कण

भाग 11 — मृदा अपरदन और संरक्षण

परिभाषा★

“मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है।”

  • “मृदा के बनने और अपरदन की क्रियाएँ आमतौर पर साथ-साथ चलती हैं और दोनों में संतुलन होता है।”
  • “परंतु मानवीय क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन से यह संतुलन भंग हो जाता है; तथा प्राकृतिक तत्त्व जैसे पवन, हिमनदी और जल मृदा अपरदन करते हैं।”

अपरदन के प्रकार★★

प्रकारकैसे होता हैउदाहरण
अवनलिका अपरदनबहता जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है, जिन्हें अवनलिकाएँ कहते हैं।—
उत्खात भूमि (bad land)ऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती।चंबल बेसिन में ऐसी भूमि को खड्ड (ravine) भूमि कहा जाता है।
चादर अपरदन (Sheet erosion)जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे बहता है और ऊपरी मृदा घुलकर बह जाती है।—
पवन अपरदनपवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाना।—
ग़लत जुताई सेढाल पर ऊपर से नीचे की ओर हल चलाने से वाहिकाएँ बन जाती हैं, जिनके अंदर से बहता पानी मृदा का कटाव करता है।—

संरक्षण के चार तरीक़े (अभ्यास प्रश्न 2-iii)★★

तरीक़ाकैसे काम करता हैकहाँ
समोच्च जुताई (contour ploughing)समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती है।ढाल वाली भूमि पर
सोपान कृषि (terrace farming)ढाल पर सोपान बनाकर अपरदन को नियंत्रित किया जाता है।पश्चिमी और मध्य हिमालय में काफ़ी विकसित
पट्टी कृषि (strip farming)बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटकर फ़सलों के बीच घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं, जो पवनों के बल को कमज़ोर करती हैं।—
रक्षक मेखला (shelter belt)पेड़ों को कतारों में लगाने से पवनों की गति कम होती है।पश्चिम भारत में रेत के टीलों के स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान

अंत में — याद रखने के आसान तरीक़े

1. सिर्फ़ छह आँकड़े अनिवार्य

आँकड़ाकिससे जुड़ा
43 – 30 – 27मैदान – पर्वत – पठार
32.8 लाख वर्ग किमी.भारत का क्षेत्रफल
93 प्रतिशतजितने भाग के भू-उपयोग आँकड़े उपलब्ध हैं
54 प्रतिशतजितने पर खेती हो सकती है
33 प्रतिशतराष्ट्रीय वन नीति 1952 का लक्ष्य
13 करोड़ हेक्टेयरनिम्नीकृत भूमि

2. चार वर्ष

68 रोम · 74 शुमेसर · 87 ब्रुन्ड्टलैंड · 92 रियो

3. हर मृदा = एक फ़सल

काली = कपास · जलोढ़ = गेहूँ-चावल-गन्ना · लेटराइट = चाय-कॉफ़ी-काजू फ़सल याद रहेगी तो मृदा भी याद रहेगी।

4. तीन ‘परती’

वर्तमान = 1 वर्ष · पुरातन = 1–5 वर्ष · कृषि योग्य बंजर = 5 से ज़्यादा

5. राजस्थान इस अध्याय में चार बार आता है

कहाँक्या
संसाधन नियोजनपवन और सौर ऊर्जा की बहुतायत, पर जल की कमी
संभावी संसाधनराजस्थान और गुजरात में पवन तथा सौर ऊर्जा
भूमि निम्नीकरणअति पशुचारण वाले राज्यों में शामिल
मरुस्थली मृदापश्चिमी राजस्थान में सिंचाई से कृषि योग्य बनाई जा रही है

RBSE की परीक्षा में ये चारों पूछे जाते हैं। इन्हें अलग से याद कीजिए।

6. और अगर सब भूल जाएँ, तो यह याद रखिए

“संसाधन प्रकृति का उपहार नहीं, मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं।” और गांधी जी का वाक्य — “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है, लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”