यह पन्ना उनके लिए है जो घर पर बारहवीं के बच्चे के साथ बैठते हैं। इतिहास आपको याद हो, यह ज़रूरी नहीं: हर सवाल के आगे लिखा है कि जवाब में क्या आना चाहिए।
बारहवीं के बच्चे से सवाल-जवाब करके परखने से ज़्यादा काम आता है उससे समझवाना। उससे कहिए, “मुझे यह अध्याय समझाओ, मैंने नहीं पढ़ा।” समझाते समय बच्चे को ख़ुद पता चल जाता है कि कौन-सी बात पक्की है और कौन-सी कच्ची।
किताब की अपनी पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ संख्या के साथ दी हैं। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय (कक्षा 12, पुस्तक 2) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1. इस अध्याय में क्या है
यह अध्याय लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक के उन यात्रियों की बात करता है जो उपमहाद्वीप में आए और अपने वृत्तांत छोड़ गए। किताब तीन व्यक्तियों पर ध्यान देती है: ग्यारहवीं शताब्दी का अल–बिरूनी, चौदहवीं शताब्दी का इब्न बतूता और सत्रहवीं शताब्दी का फ्रांस्वा बर्नियर। तीनों ने जो देखा, उसे अपने ढंग से लिखा।
इसलिए अध्याय का असली सवाल यह है कि किसी यात्री के लिखे को इतिहास के साक्ष्य की तरह कैसे पढ़ा जाए। किताब आख़िर में याद दिलाती है कि यात्री वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या “एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं” (पृष्ठ 136)। बच्चा हर यात्री के बारे में तीन बातें पकड़े: उसे क्या ध्यान देने लायक लगा, उसने वह किसके लिए और किस नज़र से लिखा, और किताब उसके लिखे को कहाँ परखती है।
किताब यह बात इन हिस्सों में समझाती है:
| हिस्सा | किताब क्या बताती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| शुरुआत | लोग काम की तलाश में, आपदाओं से बचने के लिए, व्यापार, तीर्थ और साहस की भावना से यात्राएँ करते रहे हैं। अध्याय तीन यात्रियों के वृत्तांत देखता है। | 115 |
| अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द | ख़्वारिज़्म से पंजाब तक की उसकी कहानी; अरबी में लिखी किताब–उल–हिन्द के अस्सी अध्याय और उनकी बनावट। | 116–117 |
| इब्न बतूता का रिह्ला | मोरक्को के तैंजियर में जन्मा यात्री; सन् 1333 में सिंध पहुँचना, दिल्ली का क़ाज़ी बनना, मालाबार, मालद्वीप, बंगाल, असम, सुमात्रा और चीन तक की यात्राएँ; यात्रा के जोखिम। | 118–121 |
| फ्रांस्वा बर्नियर | फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार; 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में; “पूर्व” और “पश्चिम” की तुलना। | 122–123 |
| एक अपरिचित संसार की समझ | अल–बिरूनी की कठिनाइयाँ, संस्कृत ग्रंथों का सहारा और जाति व्यवस्था का उसका विवरण। | 124–125 |
| इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा | नारियल और पान; दिल्ली और दौलताबाद जैसे शहर और उनके बाज़ार; डाक की अनूठी प्रणाली। | 126–129 |
| बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व | बर्नियर का नज़रिया; भूमि स्वामित्व का प्रश्न; इस पर टिके पश्चिमी सिद्धांत। | 130–132 |
| एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई | बर्नियर के अपने विवरणों में दिखती जटिलता: नगर और शिल्प। | 133–134 |
| महिलाएँ: दासियाँ, सती तथा श्रमिक | दास प्रथा, सती प्रथा और काम करने वाली महिलाएँ; यात्री वृत्तांतों की सीमा। | 135–136 |
| काल-रेखा | कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े, दसवीं–ग्यारहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक। | 137 |
| प्रश्न और परियोजना कार्य | बारह प्रश्न: पाँच छोटे उत्तर वाले, चार निबंध, एक मानचित्र कार्य और दो परियोजनाएँ। | 138–139 |
2. बच्चे से समझिए: दस सवाल
एक दिन में दो-तीन सवाल काफ़ी हैं। बच्चा अपने शब्दों में बताए, तो भी ठीक है; बस नीचे लिखी बातें उसके जवाब में आ जाएँ।
| सवाल | जवाब में यह आना चाहिए | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अध्याय के तीन यात्री कौन हैं, कब के हैं और कहाँ से आए? | अल–बिरूनी ग्यारहवीं शताब्दी का था; उसका जन्म आज के उज़्बेकिस्तान के ख़्वारिज़्म में हुआ। इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी का मोरक्को का यात्री था, जन्म तैंजियर में। बर्नियर सत्रहवीं शताब्दी का फ्रांसीसी चिकित्सक था, जो 1656 से 1668 तक भारत में रहा। | 116, 118, 122 |
| अल–बिरूनी भारत कैसे पहुँचा? | सन् 1017 में महमूद के ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया; पर धीरे–धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा। | 116 |
| किताब–उल–हिन्द क्या है और कैसी बनी है? | अल–बिरूनी की अरबी में लिखी किताब, जिसकी भाषा सरल और स्पष्ट है और जो अस्सी अध्यायों में बँटी है। सामान्यत: हर अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। | 116–117 |
| इब्न बतूता अपने परिवार और अपनी श्रेणी के दूसरे लोगों से अलग कैसे था? | उसका परिवार इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था, पर वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्राओं से मिले अनुभव को ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था। | 118 |
| इब्न बतूता दिल्ली कैसे पहुँचा और वहाँ उसका क्या हुआ? | सन् 1333 में वह स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा, और सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक की ख्याति सुनकर दिल्ली गया। सुल्तान उसकी विद्वता से प्रभावित हुआ और उसे दिल्ली का क़ाज़ी, यानी न्यायाधीश, नियुक्त किया। | 118 |
| इब्न बतूता को भारत में अनजानी चीज़ों में क्या दिखा और उसने उन्हें क्यों लिखा? | उसने नारियल और पान जैसी चीज़ों, दिल्ली जैसे शहरों और डाक व्यवस्था का ब्योरा दिया। उसने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया; उस समय की कहानियों में भी अपरिचित बातें विशेष रूप से रेखांकित की जाती थीं, ताकि पाठक प्रभावित हों। | 126–130 |
| इब्न बतूता ने डाक व्यवस्था के बारे में क्या लिखा? | वह डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ। दो तरह की डाक थी: घोड़ों वाली उलुक और पैदल दावा। इससे व्यापारी लंबी दूरी तक सूचना और उधार भेज सकते थे, और कम समय की सूचना पर माल भी। | 129 |
| बर्नियर ने भारत को किस नज़र से देखा? | वह जो भी देखता, उसकी तुलना यूरोप से, ख़ासकर फ्रांस से करता था, और ख़ास तौर पर उन स्थितियों को उजागर करता था जिन्हें वह अवसादकारी पाता था। वह नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करना चाहता था। | 130 |
| बर्नियर ने भूमि के बारे में क्या कहा और किताब उस पर क्या कहती है? | उसके अनुसार सम्राट सारी भूमि का स्वामी था। किताब कहती है कि एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। | 130–132 |
| बर्नियर के “शिविर नगर” वाले चित्र में क्या अधूरा था? | वह मुग़लकालीन शहरों को राजकीय शिविर पर टिके नगर मानता था। किताब इसे अतिसरलीकृत चित्रण कहती है: सत्रहवीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोग नगरों में रहते थे, और उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर और तीर्थ स्थान जैसे सभी प्रकार के नगर थे। | 134 |
3. छह बातें जिनमें बच्चे अक्सर उलझते हैं
अगर बच्चा इनमें से कोई बात बोले या लिखे, तो वहीं रुककर पूछिए: “किताब में यह कहाँ लिखा है?”
| बच्चा लिख देता है | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अल–बिरूनी अपनी मर्ज़ी से ग़ज़नी आया | महमूद के आक्रमण के बाद वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया; बाद में उसे यह शहर पसंद आने लगा | 116 |
| “हिंदू” शब्द शुरू से धर्म का नाम था | यह एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला, जो सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए था; किताब के अनुसार इन शब्दों में से कोई भी धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था | 117 |
| इब्न बतूता श्रीलंका पहुँचा | किताब केवल इतना बताती है कि उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया | 118 |
| इब्न बतूता दिल्ली में हमेशा क़ाज़ी रहा | किताब के शब्दों में: “वह इस पद पर कई वर्षों तक रहा, पर फिर उसने विश्वास खो दिया” | 118 |
| बर्नियर को लगा कि मुग़ल राज्य में किसान ज़मीन के मालिक थे | बर्नियर के अनुसार सम्राट सारी भूमि का स्वामी था; किताब इसे उसका अपना तर्क बताकर परखती है | 130–132 |
| बर्नियर के अनुसार मुग़ल शहर बड़े और मज़बूत थे | वह उन्हें “शिविर नगर” कहता था, जो राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते और उसके चले जाने पर तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते थे | 134 |
4. किताब के शब्द, आसान भाषा में
बच्चे से पूछिए कि इनमें से कौन-से शब्द वह बिना देखे समझा सकता है। जो न समझा पाए, उसे वहीं किताब का पृष्ठ खोलने दीजिए।
| किताब का शब्द | आसान मतलब | पृष्ठ |
|---|---|---|
| किताब–उल–हिन्द | अल–बिरूनी की अरबी में लिखी किताब, अस्सी अध्यायों में | 116–117 |
| रिह्ला | इब्न बतूता का अरबी में लिखा यात्रा वृत्तांत | 118 |
| शरिया | इस्लामी कानून | 118 |
| क़ाज़ी | न्यायाधीश; सुल्तान ने इब्न बतूता को दिल्ली का क़ाज़ी नियुक्त किया | 118 |
| संस्कृतवादी परंपरा | संस्कृत ग्रंथों पर आधारित वर्णन; अल–बिरूनी के हर अध्याय में दूसरा हिस्सा | 117 |
| उलुक | घोड़ों वाली राजकीय डाक व्यवस्था | 129 |
| दावा | पैदल डाक व्यवस्था | 129 |
| अंत्यज | “व्यवस्था से परे” कहलाने वाले लोग, जिनसे सामान्यतया किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी | 125 |
| अपवित्रता | जाति व्यवस्था में छिपी मान्यता कि कुछ लोग या वस्तुएँ अपवित्र होती हैं; अल–बिरूनी ने इसे नहीं माना | 125 |
| शिविर नगर | बर्नियर का नाम उन नगरों के लिए जो उसके अनुसार अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे | 134 |
| प्राच्य निरंकुशवाद | मॉन्टेस्क्यू का सिद्धांत कि एशिया (प्राच्य या पूर्व) में शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे | 132 |
| एशियाई उत्पादन शैली | कार्ल मार्क्स का सिद्धांत कि उपनिवेशवाद से पहले भारत में अधिशेष राज्य लेता था | 132 |
| अतिसरलीकृत | ज़रूरत से ज़्यादा सरल करके दिखाया गया; किताब यह शब्द बर्नियर के नगरों वाले चित्र के लिए कहती है | 134 |
5. लिखे हुए जवाब कैसे जाँचें
किताब के बारह प्रश्न पृष्ठ 138 और 139 पर हैं। प्रश्न 1 से 5 लगभग 100 से 150 शब्दों में लिखने हैं, प्रश्न 6 से 9 लगभग 250 से 300 शब्दों के छोटे निबंध हैं, प्रश्न 10 मानचित्र का काम है, और प्रश्न 11 और 12 परियोजनाएँ हैं (कोई एक करनी है)। हर प्रश्न के नीचे लिखा है कि अच्छे जवाब में क्या होना चाहिए। शब्द वही न हों तो चिंता मत कीजिए; बातें आ जाएँ, तो जवाब ठीक है।
प्रश्न 1:किताब–उल–हिन्द पर लेख (पृष्ठ 116–117, 124–125)
- मुख्य बात: किताब–उल–हिन्द ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) में जन्मे अल–बिरूनी की किताब है, जो उपमहाद्वीप के बारे में बताती है।
- भाषा और आकार: अरबी में है, भाषा सरल और स्पष्ट है, और किताब अस्सी अध्यायों में बँटी है।
- विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून और मापतंत्र विज्ञान।
- बनावट: सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) हर अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना।
- किसके लिए और जानकारी कहाँ से: उसने संभवत: अपनी कृतियाँ उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं। वह संस्कृत, पाली तथा प्राकृत ग्रंथों के अरबी अनुवादों और रूपांतरणों से परिचित था।
- यह भी आए तो और अच्छा: जाति व्यवस्था का उसका विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे नियामक संस्कृत ग्रंथों पर टिका था (पृष्ठ 125)।
प्रश्न 2: इब्न बतूता और बर्नियर के नज़रिए (पृष्ठ 118–123, 126–130)
- मुख्य बात: दोनों बाहर से आए थे, पर इब्न बतूता ने उसका वर्णन किया जो उसे अनूठा लगा और जिसने उसे प्रभावित और उत्सुक किया; बर्नियर जो भी देखता, उसकी तुलना यूरोप से, ख़ासकर फ्रांस से, करता था (पृष्ठ 130)।
- इब्न बतूता: पुस्तकों से ज़्यादा यात्राओं के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था। नारियल, पान, दिल्ली का वर्णन, डाक व्यवस्था जैसी चीज़ें उसने इसलिए रेखांकित कीं कि वे उसके पाठकों के लिए अपरिचित थीं।
- बर्नियर: एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था। उसकी चिंता यूरोप से तुलना और भिन्नता को उजागर करने की थी, ख़ासकर उन स्थितियों की जिन्हें उसने अवसादकारी पाया।
- लक्ष्य का अंतर: इब्न बतूता की कहानियों को दर्ज करने के निर्देश स्थानीय शासक ने दिए (पृष्ठ 120); बर्नियर नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करना चाहता था।
- निष्कर्ष की बात: एक यात्री जो अनूठा लगा उसे लिखता है, दूसरा तुलना करके अपनी बात साबित करना चाहता है।
प्रश्न 3: बर्नियर और शहरी केंद्र (पृष्ठ 132–134)
- मुख्य बात: बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है, पर किताब इसे अतिसरलीकृत चित्रण कहती है (पृष्ठ 134)।
- बर्नियर का चित्र: ऐसे नगर जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे; दरबार के आने पर अस्तित्व में आते और उसके कहीं और चले जाने पर तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते थे।
- किताब का आकलन: सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
- हर तरह के नगर: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि। ये समृद्ध व्यापारिक समुदायों और व्यावसायिक वर्गों के सूचक हैं।
- यह भी आए तो और अच्छा: व्यापारी अक्सर मज़बूत सामुदायिक या बंधुत्व के संबंधों से जुड़े होते थे, और महाजन तथा उनके मुखिया सेठ कहलाते थे (पृष्ठ 134)।
प्रश्न 4: इब्न बतूता और दास प्रथा (पृष्ठ 135)
- मुख्य बात: किताब के अनुसार बाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। यहाँ बच्चे से केवल यह लिखवाइए कि स्रोत क्या कहते हैं; किसी को “अच्छा” या “बुरा” ठहराना ज़रूरी नहीं।
- भेंट के उदाहरण: सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने सुल्तान के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे, और मुल्तान में गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा” भेंट दिया।
- दासों में विभेद: सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए भी दासियों को नियुक्त करता था।
- घरेलू श्रम: दासों को सामान्यत: घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था; पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में उनकी सेवाएँ विशेष रूप से अपरिहार्य पाई गईं।
- कीमत: दासों की कीमत, विशेष रूप से उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी, और अधिकांश परिवार जो उन्हें रख पाने में समर्थ थे, कम से कम एक या दो को रखते ही थे।
- यह भी आए तो और अच्छा: स्रोत 15 के अनुसार अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।
प्रश्न 5: सती प्रथा और बर्नियर का ध्यान (पृष्ठ 135)
यह विषय संवेदनशील है। बच्चे को स्रोत 16 का ब्योरा दोहराने की ज़रूरत नहीं; उसे केवल यह बताना है कि बर्नियर ने किन बातों पर ध्यान दिया।
- मुख्य बात: सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था, इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना।
- इच्छा या ज़बरदस्ती: उसने लिखा कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
- कम उम्र की विधवा: लाहौर में उसने जिस विधवा की बलि देखी, उसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी।
- विवशता: उसने उस बच्ची को असहाय बताया, और लिखा कि वह अपनी भावनाएँ दबा नहीं पा रहा था।
- यह भी आए तो और अच्छा: किताब इसे बर्नियर के वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है।
प्रश्न 6: अल–बिरूनी और जाति व्यवस्था (पृष्ठ 124–125)
यह छोटा निबंध है। जवाब में चार हिस्से आने चाहिए।
- दूसरे समाजों से तुलना: अल–बिरूनी ने बताया कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी: “घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार।” इससे वह दिखाना चाहता था कि ऐसे वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे। उसने यह भी बताया कि इस्लाम में सभी लोग समान माने जाते थे।
- ग्रंथों के आधार पर चार वर्ण (स्रोत 5): ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न माने गए, क्षत्रिय कंधों और हाथों से, वैश्य जंघाओं से, शूद्र चरणों से। उसके अनुसार अंतिम दो वर्गों में अधिक अंतर नहीं था; लेकिन वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में, समान घरों में मिल–जुलकर रहते थे।
- अपवित्रता की मान्यता से इनकार: ब्राह्मणवादी व्याख्या मानते हुए भी उसने अपवित्रता की मान्यता नहीं मानी। उसका तर्क था कि अपवित्र हुई हर वस्तु अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है: सूर्य हवा को स्वच्छ करता है, और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।
- व्याख्या की सीमा: उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित था, जो ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे। वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी: अंत्यज कहलाने वाले लोगों से सामान्यतया किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी, और वे अक्सर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र का हिस्सा थे।
- अच्छा निष्कर्ष: उसकी व्याख्या तुलना करने वाली और कुछ हद तक आलोचनात्मक थी, पर ग्रंथों पर टिकी होने से वह समाज की असली तस्वीर पूरी तरह नहीं दिखाती।
प्रश्न 7: इब्न बतूता और शहरी जीवन (पृष्ठ 126–129, 136)
यह प्रश्न राय माँगता है (“अपने उत्तर के कारण दीजिए”), इसलिए ऐसा जवाब ठीक रहता है जो कहे कि हाँ, पर सीमाओं के साथ। जवाब में कारण आने चाहिए।
- शहरों का आम चित्र: उसके अनुसार शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे, हालाँकि कभी–कभी युद्धों और अभियानों से उनका विध्वंस भी होता था। भीड़–भाड़ वाली सड़कें और रंगीन बाज़ार थे, जो तरह–तरह की वस्तुओं से भरे रहते थे।
- दिल्ली और दौलताबाद: वह दिल्ली को भारत का सबसे बड़ा शहर बताता है और दौलताबाद को ऐसा शहर जो आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। स्रोत 8 में दिल्ली की प्राचीर का बारीक वर्णन है (पृष्ठ 127)।
- बाज़ार: ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था। दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद का वर्णन स्रोत 9 में है (पृष्ठ 128)।
- व्यापार और डाक: भारतीय कपड़ों की माँग थी; व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह थे; और डाक प्रणाली से व्यापारी सूचना, उधार और माल भेज सकते थे (पृष्ठ 129)।
- सीमा: उसने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया (पृष्ठ 130), और उस समय की कहानियों में अपरिचित बातें विशेष रूप से रेखांकित की जाती थीं (पृष्ठ 126)। किताब आख़िर में याद दिलाती है कि यात्री वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं (पृष्ठ 136)।
- अच्छा निष्कर्ष: वृत्तांत शहरों, बाज़ारों और व्यापार की जीवंत जानकारी देता है, इसलिए सहायक है; पूरी तस्वीर के लिए उसे दूसरे साक्ष्यों के साथ पढ़ना चाहिए।
प्रश्न 8: बर्नियर और ग्रामीण समाज (पृष्ठ 130–133)
- मुख्य बात: केवल सीमित हद तक। बर्नियर ग्रामीण समाज के बारे में बहुत कुछ कहता है, पर उसका चित्रण एक ख़ास तर्क के लिए था, इसलिए इतिहासकारों को उसे दूसरे साक्ष्यों से जाँचना पड़ता है।
- बर्नियर का चित्र: उसके अनुसार मुग़ल सम्राट सारी भूमि का स्वामी था। भूधारक भूमि अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश नहीं करते थे; नतीजा, उसके अनुसार, कृषि का विनाश और किसानों का असीम उत्पीड़न। स्रोत 11 में वह बंजर भूमि और गाँव छोड़ते किसानों का वर्णन करता है।
- चित्र एकतरफ़ा क्यों: वह यूरोप में राज्य और समाज पर चल रही बहस में भाग ले रहा था और चाहता था कि उसका विवरण निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने। एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।
- इस पर टिके सिद्धांत: फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत से प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत बनाया, और कार्ल मार्क्स ने एशियाई उत्पादन शैली का। किताब कहती है कि ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।
- असली ग्रामीण समाज: सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: बड़े ज़मींदार, भूमिविहीन श्रमिक, किराए का श्रम लगाने वाले बड़े किसान, और मुश्किल से गुज़ारा करने वाले छोटे किसान।
- अच्छा निष्कर्ष: बर्नियर कुछ सुराग देता है, जैसे भूमि राजस्व की ऊँची माँग और किसानों की कठिनाइयाँ, पर केवल उसके आधार पर ग्रामीण समाज का चित्र नहीं बनाया जा सकता।
प्रश्न 9: बर्नियर का शिल्प वाला अंश (पृष्ठ 133–134, 138)
किताब का यह प्रश्न ऐसे छपा है: “उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।” यहाँ “अलिखित” का मतलब “उल्लिखित” है, यानी अंश में बताए गए शिल्प। बच्चा अटके तो यह बता दीजिए।
- अंश में बताए गए शिल्प: बिना औज़ारों के बनी सुंदर शिल्पकारी; यूरोप की वस्तुओं की इतनी निपुण नकल कि असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो; बेहतरीन बंदूकें; सुंदर स्वर्णाभूषण; और सुंदर, मृदु और सूक्ष्म चित्र।
- अध्याय में बताई गई शिल्प गतिविधियाँ: स्रोत 13 में गलीचे, ज़री, कसीदाकारी और तरह–तरह के रेशमी और सूती वस्त्र; स्रोत 14 में राजकीय कारखानों के कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, बढ़ई, खरादी, दर्जी और जूते बनाने वाले।
- तुलना: अंश के स्वर्णाभूषण कारखाने के सुनारों से और अंश के चित्र कारखाने के चित्रकारों से मेल खाते हैं। अंश में बंदूकें हैं, जबकि अध्याय के दूसरे विवरणों में कपड़ों का काम बार–बार आता है।
- अच्छा निष्कर्ष: यहाँ बर्नियर कारीगरों की कुशलता सराहता है, जबकि पृष्ठ 133 पर वही बर्नियर उत्पादन के पतन की बात करता है। यानी उसके अपने विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।
प्रश्न 10: मानचित्र का काम (पृष्ठ 118–120, 139)
यह बच्चे की अपनी खोज है। जाँचने की बातें ये हैं।
- सिर्फ़ वही जगहें चिह्नित हों जिनका किताब नाम लेती है: मोरक्को (तैंजियर), मक्का, सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के तटीय बंदरगाह (पृष्ठ 118)। फिर सिंध, मुल्तान, उच्छ और दिल्ली; मध्य भारत से मालाबार तट, मालद्वीप, बंगाल, असम, सुमात्रा और चीन।
- श्रीलंका के बारे में किताब केवल इतना बताती है कि उसने वहाँ जाने का निश्चय किया (पृष्ठ 118)। इसलिए वहाँ पक्का निशान न लगे।
- किताब का सार (पृष्ठ 120): उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग, भारतीय उपमहाद्वीप और चीन; किताब यह भी कहती है “(हो सकता है वह रूस भी गया हो)”, इसलिए रूस को पक्का न मानें।
- समुद्र: किताब कहती है कि वह जहाज़ से सुमात्रा गया और वहाँ से दूसरे जहाज़ से चीन के बंदरगाह नगर। प्रश्न में “पार किया होगा” पूछा है, इसलिए जवाब “होगा” की भाषा में रहे। समुद्रों के नाम बच्चा एटलस में रास्ते की जगहें देखकर लिखे।
- मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) में पैमाना नहीं दिया गया है, इसलिए उससे दूरी का सवाल न पूछिए। रास्ते की रेखाएँ अपने मन से न खींची जाएँ।
प्रश्न 11 और 12: परियोजनाएँ (पृष्ठ 139)
इनमें से कोई एक करनी है। दोनों में बच्चा अपनी खोज करता है, इसलिए कोई एक जवाब नहीं है।
- प्रश्न 11, घर के बड़ों का साक्षात्कार: बच्चा माता, पिता, दादा–दादी, नाना–नानी, चाचा या चाची में से किसी ऐसे बड़े से बात करे जिन्होंने अपने नगर या गाँव के बाहर यात्राएँ की हों। किताब के पाँच सवाल: वे कहाँ गए, यात्रा कैसे की, कितना समय लगा, यात्रा क्यों की, और क्या कोई कठिनाई आई। फिर भाषा, पहनावा, खानपान, रीति–रिवाज, इमारतों, सड़कों और पुरुषों–महिलाओं की जीवन–शैली में समानताएँ और भिन्नताएँ सूचीबद्ध हों। बातचीत से पहले उनसे समय और अनुमति ले लीजिए।
- प्रश्न 12, एक यात्री पर रिपोर्ट: बच्चा इस अध्याय में उल्लिखित यात्रियों में से एक चुने (पृष्ठ 137 की काल-रेखा में बारह यात्री हैं), उसके जीवन और कृति के बारे में और जानकारी जुटाए, और रिपोर्ट में इस पर ज़ोर दे कि उसने समाज का कैसा विवरण किया। फिर उसकी तुलना अध्याय में दिए गए उद्धरणों से हो। हर नई बात के साथ बच्चा लिखे कि वह कहाँ से ली।
अपने को जाँचने के लिए बच्चा रिवीजन नोट्स में किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर देख सकता है, लिखने के बाद।
6. घर पर दस मिनट की बातचीत
इनमें से कोई एक चुन लीजिए, चाहे खाने के बाद, चाहे सैर पर। पहले बच्चे को बोलने दीजिए; फिर नीचे की बातों से मिलाइए। ये तीनों प्रश्न किताब के अपने “चर्चा कीजिए” वाले प्रश्न हैं।
पहली बातचीत: अल–बिरूनी और इब्न बतूता का उद्देश्य (पृष्ठ 121)
बच्चे से पूछिए कि उसके विचार में अल–बिरूनी और इब्न बतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान और किन मायनों में भिन्न थे। किताब के ये सुराग उसके जवाब में आ सकते हैं:
- अल–बिरूनी ने अरबी में अपनी किताब उन लोगों के लिए लिखी, जो हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते थे (स्रोत 1, पृष्ठ 116)।
- इब्न बतूता की कहानियों को दर्ज करने के निर्देश स्थानीय शासक ने दिए (पृष्ठ 120), और उसने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया (पृष्ठ 130)।
- बच्चा “समान” या “भिन्न” जो भी कहे, उससे पूछिए कि किताब की कौन-सी बात इसका आधार है।
दूसरी बातचीत: बर्नियर ने यूरोप से तुलना क्यों की? (पृष्ठ 134)
पूछिए कि उसके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की। जवाब में ये बातें आ सकती हैं:
- वह जो भी देखता, उसकी तुलना यूरोप से, ख़ासकर फ्रांस से, करता था, और भिन्नता को उजागर करने के लिए चिंतित था (पृष्ठ 130)।
- वह नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करना चाहता था।
- वह चाहता था कि उसका विवरण निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने।
तीसरी बातचीत: महिला श्रमिकों पर यात्रियों का ध्यान क्यों नहीं गया? (पृष्ठ 136)
पूछिए कि उसके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्न बतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा। किताब सीधा उत्तर नहीं देती, पर ये सुराग देती है:
- लिखित वृत्तांत छोड़ने वाले यात्री सामान्यतया पुरुष थे।
- कभी–कभी वे सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” परिस्थिति मान लेते थे।
- महिलाओं का श्रम कृषि और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था, और व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं।
- बच्चा इन सुराग़ों से अपना तर्क बनाए; यहाँ जवाब से ज़्यादा कारण मायने रखता है।
7. अध्याय का आख़िरी सवाल: उपमहाद्वीप के अपने यात्री
अध्याय के आख़िर में (पृष्ठ 136) किताब एक ऐसी कमी की ओर इशारा करती है जिसका जवाब अभी अधूरा है। जिन यात्रियों को हमने पढ़ा, वे बाहर से आए थे। पर उपमहाद्वीप के जिन पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) ने समुद्रों और पर्वतों को पार किया और उपमहाद्वीप से परे साहसिक यात्राएँ कीं, उनके अनुभव और प्रेक्षण किताब के अनुसार “अपेक्षाकृत अज्ञात हैं”।
किताब कुछ सवाल भी उठाती है: उन्होंने क्या देखा और सुना, सुदूर क्षेत्रों के लोगों के साथ उनके संबंध किस प्रकार ढले, और वे किन भाषाओं का प्रयोग करते थे। किताब उम्मीद जताती है कि आने वाले वर्षों में इतिहासकार इन पर योजनापूर्ण तरीके से ध्यान केंद्रित करेंगे।
बच्चे से कहिए कि अपनी या परिवार की किसी यात्रा के बारे में पाँच पंक्तियाँ लिखे: कहाँ गए, वहाँ क्या अनजाना लगा, और यह किसे पढ़वाना है। फिर पूछिए कि इन पाँच पंक्तियों में उसने क्या छोड़ दिया। यही बात किताब यात्री वृत्तांतों के बारे में कहती है: कुछ आयाम अनछुए रह जाते हैं, और बाकी एक ख़ास दृष्टिकोण से देखे जाते हैं।
अगर सिर्फ़ पाँच मिनट हों
ये चार सवाल पूछ लीजिए। चारों ठीक हों, तो अध्याय की मुख्य बातें आ गई हैं।
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| अध्याय के तीन यात्री कौन हैं? | ग्यारहवीं शताब्दी का अल–बिरूनी, जिसकी किताब किताब–उल–हिन्द है; चौदहवीं शताब्दी का मोरक्को का इब्न बतूता, जिसका वृत्तांत रिह्ला है; और सत्रहवीं शताब्दी का फ्रांसीसी बर्नियर, जो 1656 से 1668 तक भारत में रहा। |
| इब्न बतूता और बर्नियर के नज़रिए में क्या फ़र्क़ था? | इब्न बतूता ने वह लिखा जो उसे अनूठा लगा और जिसने उसे प्रभावित और उत्सुक किया; बर्नियर जो भी देखता, उसकी तुलना यूरोप से करता था और भिन्नता को उजागर करता था। |
| बर्नियर के भूमि वाले तर्क पर किताब क्या कहती है? | बर्नियर के अनुसार सम्राट सारी भूमि का स्वामी था; किताब कहती है कि एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था, और बर्नियर का चित्र अतिसरलीकृत था। |
| यात्रियों के वृत्तांत पढ़ते हुए किस बात का ध्यान रखना है? | ये वृत्तांत अपने समय के पुरुषों और महिलाओं के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं, पर इनमें सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं। |
बच्चे के लिए इसी अध्याय के और पन्ने
- रिवीजन नोट्स: पूरा अध्याय छोटे में, किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर के साथ।
- प्रश्न बैंक: परीक्षा जैसे प्रश्न, उत्तर के साथ। बच्चा पहले ख़ुद लिखे, फिर मिलाए।
- फ़्लैशकार्ड: बाईं ओर सवाल, दाईं ओर जवाब। जवाब ढककर बोलिए, फिर मिलाइए; रोज़ पाँच मिनट दोहराने के लिए।
- परख प्रश्न: सोचकर जवाब देने वाले प्रश्न, किताब के स्रोतों और उदाहरणों पर, हर प्रश्न का उत्तर साथ में।
- इंटरैक्टिव अध्याय: पूरा अध्याय स्क्रीन पर, हिस्सा-दर-हिस्सा।