यह पन्ना उनके लिए है जो घर पर बारहवीं के बच्चे के साथ बैठते हैं। इतिहास आपको याद हो, यह ज़रूरी नहीं: हर सवाल के आगे लिखा है कि जवाब में क्या आना चाहिए।
बारहवीं के बच्चे से सवाल-जवाब करके परखने से ज़्यादा काम आता है उससे समझवाना। उससे कहिए, “मुझे यह अध्याय समझाओ, मैंने नहीं पढ़ा।” समझाते समय बच्चे को ख़ुद पता चल जाता है कि कौन-सी बात पक्की है और कौन-सी कच्ची।
किताब की अपनी पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ संख्या के साथ दी हैं। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय (कक्षा 12, पुस्तक 2) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1. इस अध्याय में क्या है
यह अध्याय लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी के बीच के धार्मिक विश्वासों और आचरणों का इतिहास है। इसके नए स्रोत संत कवियों की रचनाएँ हैं। संतों ने अपनी बात लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से कही; रचनाएँ अधिकतर संगीतबद्ध थीं, और संतों की मृत्यु के बाद अनुयायियों ने उन्हें संकलित किया (पृष्ठ 140)।
यहाँ धर्म को इतिहास की तरह पढ़ना है: किसने क्या माना, कैसे आचरण किए, और हमें यह किन ग्रंथों और रचनाओं से पता चलता है। बच्चे को किसी धर्म या संत को अच्छा या बुरा नहीं कहना है। हर सवाल का जवाब किताब के स्रोत से आना चाहिए।
किताब यह बात इन हिस्सों में समझाती है:
| हिस्सा | किताब क्या बताती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1. पूजा-प्रणालियों का मेल और टकराव | पुराणों और स्थानीय परंपराओं का मेल, पुरी के जगन्नाथ, देवियाँ, तांत्रिक पूजा, और परंपराओं के बीच तनाव | 141–142 |
| 2. उपासना की कविताएँ | तमिलनाडु के अलवार और नयनार, जाति पर उनका रुख, स्त्री भक्त, और चोल राज्य से रिश्ता | 143–146 |
| 3. कर्नाटक के वीरशैव | बासवन्ना और लिंगायत, उनके आचरण और वचन | 146–147 |
| 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान | नाथ, जोगी और सिद्ध, और तुर्कों के आगमन का असर | 147–148 |
| 5. इस्लामी परंपराएँ | शासकों और जनता का इस्लाम, शरिया, ज़िम्मी, और मस्जिदों की बनावट | 148–152 |
| 6. सूफ़ीमत का विकास | सूफ़ी कौन थे, ख़ानक़ाह और सिलसिला | 152–153 |
| 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला | ख़ानक़ाह का जीवन, ज़ियारत, भाषा और कव्वाली, और राज्य से रिश्ता | 153–159 |
| 8. नवीन भक्ति पंथ | कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई | 160–164 |
| 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहास कैसे जोड़े जाते हैं | इतिहासकारों के स्रोत, चार तरह के सूफ़ी ग्रंथ, और परंपराओं का बदलना | 164–166 |
| काल-रेखा और प्रश्न | धार्मिक शिक्षकों की काल-रेखा, और बारह प्रश्न | 167–169 |
2. बच्चे से समझिए: दस सवाल
एक दिन में दो-तीन सवाल काफ़ी हैं। बच्चा अपने शब्दों में बताए, तो भी ठीक है; बस नीचे लिखी बातें उसके जवाब में आ जाएँ।
| सवाल | जवाब में यह आना चाहिए | पृष्ठ |
|---|---|---|
| इस अध्याय के स्रोत इतिहासकारों के लिए चुनौती क्यों हैं? | संत कवियों की रचनाएँ मौखिक थीं और संगीतबद्ध थीं, और संतों की मृत्यु के बाद अनुयायियों ने उन्हें संकलित किया। किताब कहती है कि ये परंपराएँ “प्रवाहमान” थीं: पीढ़ियों ने संदेश आगे बढ़ाया और कुछ विचार बदले या छोड़ दिए। | 140 |
| पूजा-प्रणालियों का मेल क्या है? पुरी का उदाहरण दीजिए। | दो प्रक्रियाएँ: पौराणिक ग्रंथों के ज़रिए ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार, और ब्राह्मणों द्वारा स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे वर्गों के विश्वासों को स्वीकार करके नया रूप देना। पुरी में एक स्थानीय देवता को बारहवीं शताब्दी तक जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया। | 141 |
| अलवार और नयनार कौन थे, और जाति पर किताब क्या कहती है? | अलवार विष्णु भक्त और नयनार शिवभक्त; उनके नेतृत्व में लगभग छठी शताब्दी में प्रारंभिक भक्ति आंदोलन हुआ। जाति और ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध की बात कुछ इतिहासकारों का मत है, जिसे किताब कुछ हद तक सत्य कहती है। | 143–144 |
| भक्त परंपरा में स्त्रियाँ कौन थीं? | अंडाल अलवार स्त्री थीं और अपने को विष्णु की प्रेयसी मानती थीं; कराइक्काल अम्मइयार शिव भक्त थीं और उन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया। किताब के अनुसार इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी। | 144–145 |
| चोल शासकों ने भक्त संतों से रिश्ता क्यों जोड़ा? | वेल्लाल किसान संतों का आदर करते थे, इसलिए शासक भी उनका समर्थन चाहते थे; चोल शासक दैवीय समर्थन का दावा करते थे। 945 ईसवी के अभिलेख के अनुसार परांतक प्रथम ने संतों की धातु प्रतिमाएँ शिव मंदिर में लगवाईं। | 145–146 |
| वीरशैव या लिंगायत कौन थे? | बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में बासवन्ना के नेतृत्व में उभरा आंदोलन। उन्होंने जाति और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने का विरोध किया, श्राद्ध नहीं किया और मृतकों को दफ़नाया, और वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह अपनाए। | 146–147 |
| सूफ़ी कौन थे, और ख़ानक़ाह क्या है? | इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके लोग, ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता के विरोध में। ख़ानक़ाह उनका संगठित समुदाय है, जिसका नियंत्रण शेख, पीर या मुर्शीद के हाथ में था। | 152 |
| सिलसिला, दरगाह, ज़ियारत और उर्स का क्या मतलब है? | सिलसिला यानी जंज़ीर: शेख और मुरीद का निरंतर रिश्ता। पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह भक्ति का स्थल बनती थी; वहाँ जाना ज़ियारत है, और बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया। | 153 |
| चिश्ती सत्ताधारी वर्ग से कैसे जुड़े? | वे सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर बिना माँगे मिला अनुदान या भेंट स्वीकार करते थे, और उसे जोड़ने के बजाय ख़र्च कर देते थे। स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने ज़मीन और बगीचों की भेंट नहीं ली। | 158–159 |
| कबीर, बाबा गुरु नानक या मीराबाई में से किसी एक के बारे में बताइए। | कबीर: बानी तीन परिपाटियों में, परम सत्य के कई नाम। बाबा गुरु नानक: निर्गुण भक्ति, पंजाबी में शबद, संगत और गुरुपद। मीराबाई: कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना, भजन मौखिक रूप से चले। | 160–164 |
3. छह बातें जिनमें बच्चे अक्सर उलझते हैं
अगर बच्चा इनमें से कोई बात बोले या लिखे, तो वहीं रुककर पूछिए: “किताब में यह कहाँ लिखा है?”
| बच्चा लिख देता है | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति ईसा से पहले के हैं | किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) की पहली पंक्ति में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं: लगभग 500–800 ईसवी। | 143, 167 |
| सारे अलवार और नयनार जाति और ब्राह्मणों के विरोधी थे | यह कुछ इतिहासकारों का मत है, जो कुछ हद तक ही सत्य प्रतीत होता है। संतों में ब्राह्मण भी थे, जैसे तोंदराडिप्पोडि। | 144 |
| उत्तर भारत में चौदहवीं शताब्दी से पहले भी अलवार–नयनार जैसी रचनाएँ मिलती हैं | इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से ऐसी रचनाएँ नहीं मिलीं। | 147 |
| “हिंदू” और “मुसलमान” हमेशा से चले आ रहे नाम हैं | बहुत समय तक इनका चलन नहीं था; लोग जन्मस्थान से पहचाने जाते थे: तुरुष्क, ताजिक, पारसीक। | 151 |
| “सूफ़ीवाद” इस्लामी ग्रंथों का शब्द है | यह उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ़ आता है। | 152 |
| रामानंद कबीर के पक्के गुरु थे | यह बात जीवनियों की है। इतिहासकार दोनों का समकालीन होना मुश्किल मानते हैं, और कबीर के पद गुरु और सतगुरु शब्द किसी ख़ास व्यक्ति के लिए नहीं बरतते। | 162 |
4. किताब के शब्द, आसान भाषा में
बच्चे से पूछिए कि इनमें से कौन-से शब्द वह बिना देखे समझा सकता है। जो न समझा पाए, उसे वहीं किताब का पृष्ठ खोलने दीजिए।
| किताब का शब्द | आसान मतलब | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सगुण, निर्गुण | सगुण: शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियाँ, जिनकी मूर्त रूप में उपासना होती थी। निर्गुण: अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना। | 143 |
| उलमा | इस्लाम धर्म के ज्ञाता, जो धार्मिक, कानूनी और अध्यापन की ज़िम्मेदारी निभाते थे। | 148 |
| शरिया | मुसलमान समुदाय को राह दिखाने वाला कानून, जो कुरान शरीफ़ और हदीस पर आधारित है। | 149 |
| ज़िम्मी, जज़िया | ज़िम्मी: संरक्षित श्रेणी, यानी उद्घाटित धर्मग्रंथ मानने वाले लोग। जज़िया: वह कर जिसे चुकाकर वे संरक्षण के अधिकारी बनते थे। | 149 |
| तसव्वुफ़ | सूफ़ीवाद के लिए इस्लामी ग्रंथों में आने वाला शब्द। | 152 |
| ख़ानक़ाह | सूफ़ियों का संगठित समुदाय, जिसका नियंत्रण शेख, पीर या मुर्शीद के हाथ में होता था। | 152 |
| मुरीद, खलीफ़ा | मुरीद: शेख के अनुयायी। खलीफ़ा: शेख का नियुक्त किया हुआ वारिस। | 152 |
| सिलसिला | शाब्दिक अर्थ जंज़ीर; शेख और मुरीद के निरंतर रिश्ते की कड़ी। | 153 |
| दरगाह, ज़ियारत, उर्स | दरगाह: पीर की मृत्यु के बाद भक्ति का स्थल। ज़ियारत: दरगाह पर जाना। उर्स: बरसी पर ज़ियारत। | 153 |
| लंगर, फ़ुतूह | लंगर: सामुदायिक रसोई। फ़ुतूह: बिना माँगी खैर, जिस पर वह चलती थी। | 154 |
| ज़िक्र, समा | ज़िक्र: ईश्वर का नाम-जाप। समा: श्रवण करना, यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल। | 156 |
| कौल | अरबी शब्द, अर्थ कहावत; कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था। | 157 |
| उलटबाँसी | उलटी कही उक्तियाँ, जिनमें रोज़ के अर्थ को उलट दिया जाता है। | 160 |
| शबद, संगत | शबद: बाबा गुरु नानक के विचार, पंजाबी में, रागों में गाए गए। संगत: सामुदायिक उपासना, जहाँ सामूहिक पाठ होता था। | 163 |
| मुलफुज़ात, मक्तुबात, तज़किरा | मुलफुज़ात: सूफ़ी संतों की बातचीत। मक्तुबात: लिखे हुए पत्रों का संकलन। तज़किरा: सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण। | 165 |
5. लिखे हुए जवाब कैसे जाँचें
किताब के बारह प्रश्न पृष्ठ 168 और 169 पर हैं। प्रश्न 1 से 5 लगभग 100 से 150 शब्दों में लिखने हैं, प्रश्न 6 से 9 लगभग 250 से 300 शब्दों के छोटे निबंध हैं, प्रश्न 10 मानचित्र का काम है, और प्रश्न 11 और 12 परियोजनाएँ हैं (कोई एक करनी है)। हर प्रश्न के नीचे लिखा है कि अच्छे जवाब में क्या होना चाहिए। शब्द वही न हों तो चिंता मत कीजिए; बातें आ जाएँ, तो जवाब ठीक है।
प्रश्न 1: संप्रदायों का समन्वय, उदाहरण सहित (पृष्ठ 141–142)
- मुख्य बात: समन्वय यानी अलग-अलग पूजा-प्रणालियों का आपस में मिलना। इतिहासकार कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं।
- पहली प्रक्रिया: पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में रचे गए, जिन्हें वैदिक विद्या से दूर स्त्रियाँ और शूद्र भी समझ सकते थे।
- दूसरी प्रक्रिया: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को स्वीकार किया और उन्हें नया रूप दिया।
- उदाहरण: पुरी में बारहवीं शताब्दी तक एक स्थानीय देवता को जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया; स्थानीय देवियों को लक्ष्मी या पार्वती के रूप में मान्यता मिली।
- यह भी आए तो और अच्छा: समाजशास्त्री रेडफील्ड के शब्द “महान” और “लघु” परंपरा, और तांत्रिक विचारों का शैव और बौद्ध दर्शन पर असर।
प्रश्न 2: मस्जिदों का स्थापत्य (पृष्ठ 151–152)
- मुख्य बात: किताब के अनुसार एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के साथ मेल का सबसे अच्छा उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दिखता है।
- सार्वभौमिक हिस्सा: किताब के अनुसार मस्जिदों के कुछ स्थापत्य तत्व सार्वभौमिक थे, जैसे इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन, जो मेहराब और मिम्बर से पता चलता है।
- स्थानीय हिस्सा: छत और निर्माण का सामान, जैसे केरल की तेरहवीं शताब्दी की मस्जिद की शिखर जैसी छत, मैमनसिंग की अतिया मस्जिद (1609) की ईंटें, और श्रीनगर की शाह हमदान मस्जिद (1395) की कश्मीरी लकड़ी की कला।
- अच्छा निष्कर्ष: मक्का की ओर अनुस्थापन जैसे कुछ तत्व हर जगह एक थे, पर दिखने में मस्जिद अपने इलाके की परिपाटी से बनी।
प्रश्न 3: बे-शरिया और बा-शरिया सूफ़ी (पृष्ठ 152–153)
- मुख्य बात: दोनों सूफ़ी परंपरा से निकले, पर शरिया के बारे में उनका रास्ता अलग था।
- समानता: किताब के अनुसार बे-शरिया आंदोलनों की नींव भी कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर ही रखी।
- बा-शरिया: ये शरिया का पालन करते थे। किताब में सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द संगठित दिखते हैं, जहाँ शेख, पीर या मुर्शीद की देखरेख होती थी।
- बे-शरिया: ये ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे। इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी जैसे नामों से जाना जाता था।
- नाम का कारण: शरिया की अवहेलना करने के कारण इन्हें बे-शरिया कहा गया।
प्रश्न 4: अलवार, नयनार और वीरशैवों की जाति की आलोचना (पृष्ठ 144–147)
- मुख्य बात: तमिलनाडु के भक्त संतों और कर्नाटक के वीरशैवों दोनों में जन्म और कुल से ऊपर भक्ति की बात मिलती है, पर किताब का स्वर अलग-अलग है।
- अलवार और नयनार: जाति और ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध की बात कुछ इतिहासकारों का मत है; किताब इसे कुछ हद तक सत्य प्रतीत होने वाला कहती है। संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और “अस्पृश्य” मानी गई जातियों से भी थे।
- स्रोत 1 और 2: तोंदराडिप्पोडि वर्ण-व्यवस्था के परे के “दासों” को उन चतुर्वेदियों से ऊपर रखते हैं जो विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते; अप्पार पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”
- वीरशैव: जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने का विरोध, पुनर्जन्म पर प्रश्न, वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह, इसलिए ब्राह्मणीय व्यवस्था में नीचा स्थान पाए समुदाय इनके अनुयायी बने।
प्रश्न 5: कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के उपदेश और उनका संप्रेषण (पृष्ठ 160–163)
- मुख्य बात: किताब का प्रश्न “अथवा” वाला है, यानी दोनों में से एक लिखना है; बच्चा जिसे चुने, उसके दोनों हिस्से (उपदेश और संप्रेषण) आने चाहिए।
- कबीर, उपदेश: परम सत्य के कई नाम, जो इस्लामी दर्शन, वेदांत और योगी परंपरा से आए; स्रोत 10 में अनेक नामों के पीछे एक ही ईश्वर की बात।
- कबीर, संप्रेषण: बानी तीन परिपाटियों में (कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, आदि ग्रंथ साहिब); उन्नीसवीं शताब्दी में पद बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में छापे गए।
- बाबा गुरु नानक, उपदेश: निर्गुण भक्ति; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप जैसे बाहरी आडंबरों को नकारा; रब का कोई लिंग या आकार नहीं; निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
- बाबा गुरु नानक, संप्रेषण: पंजाबी में शबद, रागों में गाए गए; संगत में सामूहिक पाठ; अंगद को गुरुपद; अर्जन देव जी ने बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की।
प्रश्न 6: सूफ़ी मत के मुख्य विश्वास और आचार (पृष्ठ 152–158)
- मुख्य बात: जवाब में सूफ़ीमत की शुरुआत, ख़ानक़ाह और सिलसिला, दरगाह और उर्स, और चिश्ती आचार, ये चार हिस्से आने चाहिए।
- शुरुआत और विश्वास: ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता के विरोध में रहस्यवाद और वैराग्य; मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों का पालन; पैगम्बर मोहम्मद को इंसान-ए-कामिल बताना।
- संगठन: ख़ानक़ाह का नियंत्रण शेख के हाथ में; सिलसिला यानी जंज़ीर; दीक्षा में निष्ठा का वचन, सिर मुँड़ाना और थेगड़ी लगे वस्त्र।
- दरगाह और उर्स: पीर की मृत्यु के बाद दरगाह भक्ति का स्थल; बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया।
- चिश्ती आचार: लंगर, ज़िक्र और समा, अमीर खुसरो का कौल; स्थानीय परंपराएँ अपनाईं; सत्ता से दूर रहने पर बल।
- अच्छा निष्कर्ष: सूफ़ी मत में ईश्वर से निजी प्रेम केंद्र में था, और उसके आचार स्थानीय परिवेश में ढलते गए।
प्रश्न 7: शासकों ने नयनार और सूफ़ी संतों से संबंध क्यों और कैसे बनाए (पृष्ठ 145–159)
- मुख्य बात: जवाब के दो हिस्से होने चाहिए: चोल शासक और नयनार, फिर सुल्तान, मुग़ल और सूफ़ी।
- चोल शासक, कैसे: विष्णु और शिव के मंदिरों को भूमि-अनुदान; चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के बड़े शिव मंदिर; तमिल शैव भजनों का तवरम में संकलन; 945 ईसवी में परांतक प्रथम द्वारा संतों की धातु प्रतिमाएँ।
- चोल शासक, क्यों: वेल्लाल किसान संतों का आदर करते थे; शासक दैवीय समर्थन का दावा करते थे।
- सुल्तान और मुग़ल: ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि; मुहम्मद बिन तुगलक अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान; अकबर का चौदह बार आना।
- क्यों और तनाव: सूफ़ी संतों की धर्मनिष्ठा और विद्वता में लोगों का विश्वास उन्हें लोकप्रिय बनाता था; सुल्तानों ने उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकराई; दूसरी ओर झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर दोनों का बल था।
प्रश्न 8: संतों ने अलग-अलग भाषाएँ क्यों अपनाईं (पृष्ठ 140–163)
- मुख्य बात: संत आम लोगों तक पहुँचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपनी बात कही।
- भक्त संत: अलवार और नयनार तमिल में; वीरशैवों के वचन कन्नड़ में; कबीर कई भाषाओं और बोलियों में, कुछ संत भाषा में; बाबा गुरु नानक पंजाबी में शबद।
- सूफ़ी: दिल्ली के चिश्ती हिंदवी में बात करते थे; बाबा फरीद की क्षेत्रीय भाषा का काव्य गुरु ग्रंथ साहिब में; जायसी की पद्मावत जैसी मसनवी; बीजापुर के आसपास दक्खनी में चक्की और चरखे के गीत।
- अच्छा निष्कर्ष: भाषा श्रोता को देखकर चुनी गई, ताकि संदेश घर, खेत और काम के बीच तक पहुँचे।
प्रश्न 9: पाँच स्रोतों के विचार (पृष्ठ 144–160)
- मुख्य बात: बच्चा अध्याय के कोई भी पाँच स्रोत चुन सकता है; हर स्रोत के साथ एक सामाजिक या धार्मिक विचार लिखना है।
- एक संभव चुनाव: स्रोत 1 (भक्ति जन्म से बड़ी है, पृष्ठ 144), स्रोत 4 (दिखावटी कर्मकांड का विरोध, पृष्ठ 147), स्रोत 6 (औरंगज़ेब का जोगी के प्रति आदर, पृष्ठ 150), स्रोत 9 (चिश्तियों की सत्ता और संपत्ति से दूरी, पृष्ठ 159), स्रोत 10 (अनेक नामों वाला एक ईश्वर, पृष्ठ 160)।
- जाँचने की बात: हर स्रोत के साथ बच्चा उसकी एक पंक्ति बताए, और फिर पूछिए कि उससे क्या पता चलता है।
प्रश्न 10: मानचित्र का काम (पृष्ठ 168)
यह बच्चे का अपना काम है। जाँचने की बातें ये हैं:
- भारत के मानचित्र पर तीन सूफ़ी स्थल: अध्याय से अजमेर, दिल्ली और फतेहपुर सीकरी चुने जा सकते हैं।
- विष्णु से जुड़ा एक स्थल: पुरी (जगन्नाथ)।
- शिव से जुड़ा एक स्थल: चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम।
- देवी से जुड़ा स्थल: किताब के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता, इसलिए इसके लिए एटलस या अध्यापक की मदद ठीक है।
- अजोधन और मुल्तान भी अध्याय में आते हैं, पर किताब इन्हें पाकिस्तान में बताती है (पृष्ठ 154, 169), और लाहौर भी आज पाकिस्तान में है; भारत के मानचित्र पर इन्हें नहीं दिखाना है।
प्रश्न 11 और 12: परियोजनाएँ (पृष्ठ 169)
इनमें से कोई एक करनी है। दोनों में बच्चा अपनी खोज करता है, इसलिए कोई एक जवाब नहीं है।
- प्रश्न 11, दो संतों या चिंतकों पर विवरण: बच्चा इस अध्याय में आए कोई भी दो संत या चिंतक चुने (नाम पृष्ठ 167 की काल-रेखा में भी देखे जा सकते हैं), जैसे एक भक्त संत और एक सूफ़ी, और हर एक का समय, क्षेत्र और मुख्य विचार लिखे। साथ में यह भी कि हमें उनके बारे में कैसे पता चलता है, और वे क्यों महत्त्वपूर्ण हैं। स्रोत के रूप में उनकी अपनी रचनाएँ, बाद की जीवनियाँ, मुलफुज़ात या तज़किरा आ सकते हैं (पृष्ठ 165)।
- प्रश्न 12, तीर्थयात्रा के आचार: किताब सूफ़ी और देव स्थलों से जुड़ी तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में और जानकारी जुटाने को कहती है। बच्चे के पास अध्याय का आधार है: दरगाह पर ज़ियारत, उर्स, समा और कव्वाली (पृष्ठ 153–157), और जहाँआरा की अजमेर यात्रा का वर्णन (स्रोत 7, पृष्ठ 156)। स्थानीय जानकारी के लिए किसी जानकार से बात करनी हो, तो पहले समय और अनुमति ले लीजिए।
अपने को जाँचने के लिए बच्चा रिवीजन नोट्स में किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर देख सकता है, लिखने के बाद।
6. घर पर दस मिनट की बातचीत
इनमें से कोई एक चुन लीजिए, चाहे खाने के बाद, चाहे सैर पर। पहले बच्चे को बोलने दीजिए; फिर नीचे की बातों से मिलाइए। ये तीनों प्रश्न किताब के अपने “चर्चा कीजिए” वाले प्रश्न हैं।
पहली बातचीत: शासक भक्तों से संबंध क्यों दिखाना चाहते थे? (पृष्ठ 146)
बच्चे से पूछिए कि उसके विचार में शासक भक्तों से अपने संबंध को दर्शाने के लिए क्यों उत्सुक थे। किताब के ये सुराग उसके जवाब में आ सकते हैं:
- नयनार और अलवार संतों का वेल्लाल किसान आदर करते थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया।
- चोल शासक भव्य मंदिर बनवाकर और उनमें पत्थर और धातु की मूर्तियाँ लगवाकर दैवीय समर्थन जताते थे।
- परांतक प्रथम ने 945 ईसवी में संत कवियों की प्रतिमाएँ शिव मंदिर में लगवाईं, जिन्हें उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।
- बच्चा अपनी राय भी जोड़े, तो पूछिए कि किताब की कौन-सी बात उसका आधार है।
दूसरी बातचीत: धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के स्रोत (पृष्ठ 159)
पूछिए कि उसके विचार में धार्मिक और राजनीतिक नेताओं के बीच टकराव के संभावित स्रोत क्या-क्या हो सकते हैं। जवाब में ये बातें आ सकती हैं:
- दोनों झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे (पृष्ठ 158)।
- शेखों को आडंबरपूर्ण पदवियाँ मिलती थीं, जैसे सुल्तान–उल–मशेख (शेखों में सुल्तान)।
- सुल्तानों ने उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकराई।
- भेंट और ज़मीन का सवाल: स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने ज़मीन और बगीचों की भेंट नहीं ली।
तीसरी बातचीत: कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई की बातें आज भी क्यों याद की जाती हैं? (पृष्ठ 164)
पूछिए कि उसके विचार में ये तीनों इक्कीसवीं शताब्दी में भी महत्त्वपूर्ण क्यों हैं। यह उसकी अपनी राय का प्रश्न है; किताब से ये सुराग काम आ सकते हैं:
- कबीर: स्रोत 10 में अनेक नामों के पीछे एक ईश्वर की बात।
- बाबा गुरु नानक: बाहरी आडंबर के बजाय नाम का स्मरण, और संगत में सामूहिक उपासना।
- मीराबाई: उनके पद आज भी स्त्रियाँ और पुरुष गाते हैं (पृष्ठ 164)।
- बच्चा जो भी कहे, उससे पूछिए कि किताब की कौन-सी बात उसके जवाब को सहारा देती है।
7. अध्याय का आख़िरी सवाल: जो बचा और जो बदला
अध्याय के आख़िर में (पृष्ठ 165–166) किताब कहती है कि हर परिपाटी से अनेक साहित्यिक और मौखिक संदेश जुड़े थे। उनमें से कुछ सुरक्षित रहे, बहुत से संप्रेषण के दौरान बदल गए, और कुछ हमेशा के लिए भुला दिए गए।
किताब आगे कहती है कि लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं। इससे इतिहासकार आज के आचार–व्यवहार की तुलना साहित्य और पुरानी चित्रकला में मिले वर्णन से कर सकते हैं और बदलावों की रूपरेखा बना सकते हैं। पर किताब यह भी कहती है कि ये परंपराएँ लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, इसलिए लोगों के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि समय के साथ इनमें बदलाव आया होगा। इतिहासकारों के लिए चुनौती यह याद रखना है कि धार्मिक परंपराएँ भी दूसरी परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।
बच्चे से कहिए कि अध्याय में से किसी एक संत की रचना चुने, और अपने शब्दों में बताए कि वह रचना हम तक कैसे पहुँची: मौखिक रूप से, अनुयायियों के संकलन से, या बाद की जीवनी से। फिर पूछिए कि इस रास्ते में कोई बात बदल गई होगी या छूट गई होगी, तो इतिहासकार उसे कैसे पहचानेंगे।
अगर सिर्फ़ पाँच मिनट हों
ये चार सवाल पूछ लीजिए। चारों ठीक हों, तो अध्याय की मुख्य बातें आ गई हैं।
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| अलवार और नयनार कौन थे, और प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग किस शताब्दी का है? | अलवार विष्णु भक्त और नयनार शिवभक्त; लगभग छठी शताब्दी (पृष्ठ 143)। |
| सिलसिला का शाब्दिक अर्थ क्या है, और दरगाह पर बरसी की ज़ियारत को क्या कहा गया? | सिलसिला यानी जंज़ीर; बरसी की ज़ियारत को उर्स कहा गया (पृष्ठ 153)। |
| चिश्ती शासकों की भेंट के बारे में क्या रुख रखते थे? | बिना माँगी भेंट स्वीकार करते थे, पर जोड़ते नहीं थे; स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने ज़मीन की भेंट नहीं ली (पृष्ठ 158–159)। |
| आदि ग्रंथ साहिब का संकलन किसने किया? | पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने (पृष्ठ 163)। |
बच्चे के लिए इसी अध्याय के और पन्ने
- रिवीजन नोट्स: पूरा अध्याय छोटे में, किताब के सभी प्रश्नों के उत्तर के साथ।
- प्रश्न बैंक: परीक्षा जैसे प्रश्न, उत्तर के साथ। बच्चा पहले ख़ुद लिखे, फिर मिलाए।
- फ़्लैशकार्ड: बाईं ओर सवाल, दाईं ओर जवाब। जवाब ढककर बोलिए, फिर मिलाइए; रोज़ पाँच मिनट दोहराने के लिए।
- परख प्रश्न: सोचकर जवाब देने वाले प्रश्न, किताब के स्रोतों और उदाहरणों पर, हर प्रश्न का उत्तर साथ में।
- इंटरैक्टिव अध्याय: पूरा अध्याय स्क्रीन पर, हिस्सा-दर-हिस्सा।